संविधान सभा के प्रमुख सदस्यों में शामिल महिला सदस्य के रूप में श्रीमती सरोजिनी नायडू, श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित, श्रीमती हंसा राय , रेणुका चौधरी थी।
भारतीय संविधान के निर्माण हेतु संविधान सभा का गठन सन 1946 में किया गया था और इसके प्रथम अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा थे।
1) रक्षा 2) वैदेशिक मामले
२९ अगस्त १९४७ को प्रारूप समिति के गठन होने पर समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर बनाये गए. प्रारूप समिति में डॉ. अम्बेडकर के अलावा छ: सदस्य और थे।
1) संसदात्मक शासन व्यवस्था । 2) कठोरता व लचीलेपन का समन्वय ।
अधिकांश नवाब और रजवाड़े ब्रिटिश ताज की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तो ये नवाब और राजा भारत में स्वतंत्र सत्ता का सपना देखने लगे थे।
वे तीन नेता -जवाहर लाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल और डॉ॰राजेंद्र प्रसाद थे। वे कांग्रेस के सदस्य थे।
नेहरू के अनुसार शक्ति का स्रोत भारत के लोग थे जिंहोने अपने और राष्ट्र के लिए संविधान का निर्माण करने के लिए अपने प्रतिनिधियों को निर्वाचित किया है।
समवर्ती सूची में शासन से सम्बंधित विषयों का समावेश होता है, जिन पर केन्द्र और राज्य दोनों के मध्य जिम्मेदारीयॉं का बँटवारा होता है, असहमति के मामले में केन्द्र की इच्छा को महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारतीय संविधान का स्वरूप जटिल है। इसके स्वरूप के विषय में विशेषज्ञों की राय एक नहीं है- संविधान के प्रसिद्द आलोचक दुर्गादास बसु के अनुसार- "भारतीय संविधान संघात्मक एवं एकात्मकता का मिश्रण है। " वहीं प्रो. डी.एन.बनर्जी के अनुसार- "भारत के संविधान का स्वरूप संघात्मक है, परन्तु उसमें एकात्मकता की झलक मिलती है।"
A.
राजनीतिक भूगोल
B.
क्षेत्रीय भूगोल
C.
सामान्य भूगोल
D.
भू-आकृति विज्ञान
भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) भू-आकृतियों और उनको आकार देने वाली प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है; तथा अधिक व्यापक रूप में, उन प्रक्रियाओं का अध्ययन है जो किसी भी ग्रह के उच्चावच और स्थलरूपों को नियंत्रित करती हैं।
भूआकृति विज्ञान (Gemophology), भौतिक भूगोल की एक प्रमुख शाखा है जिसमें स्थलमंडल के भौतिक तत्वों का अध्ययन किया जाता है। इसके अन्तर्गत भूआकृतियों (स्थल रूपो) की उत्पत्ति एवं विकास (अनाच्छादन, अपक्षय, अपरदन तथा निक्षेपण के प्रक्रमों द्वारा निर्मित स्थल रूपों) का विश्लेषण किया जाता है।
भौतिक भूगोल (Physical geography) भूगोल की एक प्रमुख शाखा है जिसमें पृथ्वी के भौतिक स्वरूप का अध्ययन किया जाता हैं, जिसमें स्थलाकृतियाँ, मृदाएँ, जलवायु, जल और विविध वनस्पति और जीव शामिल हैं|
मानव भूगोल अस्थिर पृथ्वी एवं क्रियाशील मानव के परस्पर परिवर्तनशील सम्बन्धों का अध्ययन है ।
व्यवहारवादी भूगोल एवं सांस्कृतिक भूगोल ।
भौतिक भूगोल व मानव भूगोल (i) स्थलमण्डल (ii) वायुमण्डल (iii) जल मण्डल व जैव मण्डल
1) प्रादेशिक उपागम 2) क्रमबद्ध उपागम
व्यवहारवादी भूगोल, सामाजिक कल्याण का भूगोल, अवकाश का भूगोल, सांस्कृतिक भूगोल, लिंग भूगोल, ऐतिहासिक भूगोल, चिकित्सा भूगोल निर्वाचन भूगोल, सैन्य भूगौल संसाधन भूगोल,कृषि भूगोल,उद्योग भूगोल,विपणन भूगोल,पर्यटन भूगोल तथा अन्र्तराष्ट्रीय व्यापार का भूगोल,मानव भूगोल के महत्त्वपूर्ण उप क्षेत्र है।
जर्मन के प्रख्यात भूगोलवेत्ता रेटजेल को मानव भूगोल का जन्म-दाता कहा जाता है।
मानव भूगोल वह विज्ञान है। जिसमें पृथ्वी तल पर मानवीय तथ्यों के स्थानिक वितरणों का अर्थात् विभिन्न प्रदेशों के मानव वर्गो द्वारा किए गए वातावरण समायोजनों और स्थानिक संगठनों का अध्ययन किया जाता है।
क्लाडियस टॉलमी एक प्रमुख भूगोलवेत्ता था। वह मिस्त्र का निवासी था। टॉलमी (100-168 ईसवी) ने ग्रीक और रोमन अध्ययनों को अपनी कृति ‘जियोग्राफिया’ में संकलित किया है| ग्रहीय सिद्धान्त और एनेलिमा उनकी अन्य रचनाएँ हैं| उसने सिकन्दरिया के निकट के एक नगर नोरस से कई खगोलिए बेध किए।
भौतिक भूगोल- इसके अंतर्गत पृथ्वी की उत्पत्ति, आभ्यांतरिक संरचना, शैल संरचना, ज्वालामुखी, भूकम्प, जल मण्डल, वायुमण्डल आदि का अध्ययन किया जाता है।मानव भूगोल-इसमें मानव उत्पत्ति, उसकी प्रजातियों, आर्थिक क्रियाओं व सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है।
भूगोल और इतिहास एक दूसरे से अन्र्तसम्बन्धित है वर्तमान भौगोलिक घटनाएँ ही अतीत के गर्भ में इतिहास बनकर प्रकट होती है इतिहास मानव की भूतकालीन घटनाओं का पूर्ण विवरण प्रस्तुत करता है । भूगोल की पृष्ठ भूमि में जो घटनाएँ जन्म लेती है वे ही आगे चलकर इतिहास को सुदृढ़ आधार प्रदान करती है । इस प्रकार प्राचीन इतिहास वर्तमान भूगोल है जबकि बीता हुआ भूगोल इतिहास है ।
व्यवहारवादी भूगोल, सामाजिक कल्याण का भूगोल, अवकाश का भूगोल, सांस्कृतिक भूगोल, लिंग भूगोल, ऐतिहासिक भूगोल, चिकित्सा भूगोल निर्वाचन भूगोल, सैन्य भूगौल संसाधन भूगोल,कृषि भूगोल,उद्योग भूगोल,विपणन भूगोल,पर्यटन भूगोल तथा अन्र्तराष्ट्रीय व्यापार का भूगोल,मानव भूगोल के महत्त्वपूर्ण उप क्षेत्र है ।
कार्ल रिटर (7 अगस्त, 1779 ई॰ - 28 सितम्बर 1859 ई॰) विश्वविख्यात जर्मन भूगोलवेत्ता थे। ये आधुनिक भूगोल के संस्थापक तथा भूगोल के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र तुलनात्मक भूगोल के जनक माने जाते हैं। अन्य रचनाओं (अर्द्कुण्डे, यूरोप का एतिहासिक, भौगोलिक एवं सांख्यिकीय अध्ययन, काला सागर एवं कैस्पियन सागर के मध्य के प्रदेशों का मानव स्थानान्तरण) में 'यूरोप, एक भौगोलिक, ऐतिहासिक तथा तथ्यात्मक अध्ययन' प्रमुख है।
अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट, जर्मनी (तत्कालीन प्रशा) के भूगोलवेत्ता, प्रकृति विज्ञानी, और खोजकर्ता थे। हम्बोल्ट ने सर्वप्रथम वनस्पति विज्ञान में परिमाणात्मक विधियों का प्रयोग किया जिनसे जैव भूगोल की मजबूत आधारशिला का निर्माण हुआ। हम्बोल्ट कि सबसे प्रमुख कृति कॉसमॉस है जिसमें उन्होंने संश्लेषणात्मक विचारों के साथ ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में सामंजस्य और एकता लाने का प्रयास किया है।
भूगोल के इस उपागम में भूगोल के विभिन्न पक्षों या लवणों का क्रम से अध्ययन किया जाता है जैसे - भू आकृति, मिटटी ,जलवायु, पशु पक्षी, जनसँख्या व उनकी विशेषताएं व आर्थिक क्रिया कलाप आदि तथ्यों का अध्ययन समस्त भूतल के सन्दर्भ में अलग अलग किया जाता है। इस प्रकार क्रमबद्ध उपागम में प्रत्येक भौगोलिक तथ्य का विश्लेषण किया जाता है।
भूगोल में द्वैतवाद: द्वैतवाद दो भागों की एक अवस्था को प्रदर्शित करता है|
भूगोल में निम्न द्वैतवाद आये हैं:
क. प्रथम द्वैतवाद यह है कि क्या भूगोल को एक विषय के रूप में नियमों का संगठन या वर्णन होना चाहिए?
ख. द्वितीय द्वैतवाद यह है कि क्या इसकी विषय-वस्तु संगठित होनी चाहिए अथवा अध्ययन के उपागम क्षेत्रीय या व्यस्थित होने चाहिए?
ग. तृतीय द्वैतवाद यह है कि क्या भौगोलिक घटनाओं की व्याख्या सैंद्धांतिक रूप में की जानी चाहिए या फिर ऐतिहासिक-संस्थागत उपागमों से की जानी चाहिए?
छाया सीमा (शेडो लाइंस) दोनों नए राज्यों के बीच की सरहद बँटवारे के दौरान चौतरफा हिंसा देखी गई।
अ)कई लाख लोग मारे गए, न जाने कितनी औरतों का बलात्कार और अपहरण हुआ।
ब)दोनों तरफ करोड़ों लोग उजड़ गए, रातों-रात अजनबी जमीन पर रिफ़्यूजी (शरणार्थी) बनकर रह गए।
अशिक्षा से आज भी भारतीय महिलाएं पीडि़त हैं । दहेज प्रथा ने तो उसकी स्थिति कोऔर भी अधिक शोचनीय बना दिया है। दहेज़ प्रथा ने तो उनकी स्थिति को और भी अधिक शोचनीय बना दिया है, दहेज प्रथा के कारण महिलाओं को प्रताडि़त करने, मारपीट करने तथा उनहें जलाकर मार देने सम्बन्धी अनेक घटनाएँ निरन्तर घटित हो जाती हैं। देहज प्रथा सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था के लिए अभिशाप बन गई है। किन्तु इस स्थिति के साथ-साथ स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रश्चात् भारतीय समाज में महिलाओं की दशा सुधारने के लिए अनेक क्रांतिकारी प्रयास भी किए गए हैं ।
हालांकि यह अंग्रेजों की फूट डालो राज करों की ब्रह्मस्त्रीय नीति, मुस्लिम लीग
मुहम्मद अली जिन्ना ने 22 मार्च, 1940 ई. को पृथक राष्ट्र की मांग करते हुए द्विराष्ट्र की घोषणा की जिसके अनुसार कहा गया कि भारत में हिन्दू व मुस्लिम दो राष्ट्र हैं व किसी भी क्षेत्र में उनके हित एक जैसे नहीं हैं । जिन्ना के अनुसार पाकिस्तान का गठन ही भारत में सांप्रदायिक समस्या का स्थायी समाधान है । उनके अनुसार उत्तरी पश्चिमी व उत्तरी पूर्वी भारत के दो हिस्से स्वतंत्र राष्ट्र का निर्माण करेंगे जहां मुसलमान बहुसंख्यक हैं।
छाया सीमा (शेडो लाइंस) दोनों नए राज्यों के बीच की सरहद बँटवारे के दौरान चौतरफा हिंसा देखी गई।
अ)कई लाख लोग मारे गए, न जाने कितनी औरतों का बलात्कार और अपहरण हुआ।
ब)दोनों तरफ करोड़ों लोग उजड़ गए, रातों-रात अजनबी जमीन पर रिफ़्यूजी (शरणार्थी) बनकर रह गए।
अशिक्षा से आज भी भारतीय महिलाएं पीडि़त हैं । दहेज प्रथा ने तो उसकी स्थिति कोऔर
जब भारत आजाद हुआ तो उसके सामने कई बड़ी चुनौतियाँ थी। स्वतंत्रता के समय भारत की एक विशाल संख्या गाँवों में रहती थी। आजीविका के लिए किसान और काश्तकार बारिश पर निर्भर रहते थे। शहरों में फैक्ट्री मजदूर भीड़ भरी झुग्गी बस्तियों में रहते थे जहाँ शिक्षा या स्वास्थ्य सुविधाओं की खास व्यवस्था नहीं थी। नए राष्ट्र के लिए इस विशाल आबादी को गरीबी के चंगुल से निकालने के लिए न केवल खेती की उपज बढ़ाना जरूरी था बल्कि नए उद्योगों का निर्माण भी करना था जहाँ लोगों को रोजगार मिल सके।
स्वतंत्रता के तत्काल बाद भारत के सामने आने वाली दो प्रमुख समस्याएं-एकता को बनाए रखने और राष्ट्र के विकास को सुनिश्चित करने की थी।
व्यक्तिगत स्मृतियों -जो एक तरह का मौखिक स्त्रोत है ,की एक ख़ूबी यह है कि उनमें हमें अनुभवों और स्मृतियों को और बारीकी से समझने का मौका मिलता है। इससे इतिहासकारों को बँटवारे जैसी घटनाओं के दौरान लोगों के साथ क्या-क्या हुआ, इस बारे में बहुरंगी और सजीव वृत्तांत लिखने की काबिलियत मिलती है। सरकारी दस्तावेजों से इस तरह की जानकारियाँ हासिल कर पाना नामुमकिन होता है।
व्यक्तिगत स्मृतियों -जो एक तरह का मौखिक स्त्रोत है ,की एक ख़ूबी यह है कि उनमें हमें अनुभवों और स्मृतियों को और बारीकी से समझने का मौका मिलता है। इससे इतिहासकारों को बँटवारे जैसी घटनाओं के दौरान लोगों के साथ क्या-क्या हुआ, इस बारे में बहुरंगी और सजीव वृत्तांत लिखने की काबिलियत मिलती है। सरकारी दस्तावेजों से इस तरह की जानकारियाँ हासिल कर पाना नामुमकिन होता है।
भारत का विभाजन बीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी दुखद घटना है, इस काल में घटित घटनाओं तथा नेताओं के व्यवहार ने अंत में भारत को दो भागों -हिंदुस्तान एवं पकिस्तान में बाँट दिया, इस विभाजन के निम्नलिखित कारण थे-
1) अंग्रेजों की नीति -
अंग्रेजों की नीति भारत में प्रारम्भ से ही फूट डालो राज करो की रही थी, अंग्रेज निरंतर हिंदुओं के खिलाफ मुसलामानों के दिमाग में विष घोलते रहे, उन्हें भड़काते रहे कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग-अलग कौमें हैं, अतः डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का यह कथन बिलकुल सत्य प्रतीत होता है कि, "पाकिस्तान के निर्माता कवी इकबाल तथा मी. जिन्ना नहीं, वरन लॉर्ड मिन्टों थे," ।
2) हिन्दू साम्प्रदायिकता -
कुछ विद्वानों का मानना है कि हिन्दू साम्प्रदायिकता भारत विभाजन के लिए दोषी है, किन्तु जब अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग को भड़काकर भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगें कराये तो विवश होकर हिंदुओं को संगठित होना पड़ा, यह तथ्य असंगत प्रतीत होता है ।
3) लीग के प्रति कांग्रेस की नीति -
मुस्लिम लीग के प्रति कांग्रेस की नीति सदैव तुष्टिकरण की रही थी,जो अंत में देश के विभाजन का कारण बनी, 1916 में लखनऊ पैक्ट के रूप में साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार करना, सिंध को मुम्बई से अलग करना, सी.आर. योजना को स्वीकार करना तथा कांग्रेस मंत्री मंडल में मुस्लिम लीग के मत्रियों को स्वीकार करने में कठोरता दिखाना, ये भयंकर भूलें थीं, जो कि कालान्तर में भारत वीभाजन का कारण बनी ।
4)जिन्ना की महत्वाकांक्षा-
मी.मुहम्मद अली जिन्ना एक मटवाकांक्षी व्यक्ति थे, महात्मा गांधी द्वारा दिए गए प्रधानमंत्री के अवसर को भी उन्होंने इसीलिये ठुकरा दीया था, क्योंकि वे एक राष्ट्र निर्माता बनना चाहते थे ।
5) जिन्ना की हठ-
1940 ई. में संवैधानिक गतिरोध दूर करने के लीये अनेक सुझाव कांग्रेस द्वारा दिए गए थे, किन्तु जिन्ना महोदय प्रारम्भ से ही अपनी पाकिस्तान की मांग को लेकर जिद पर अड़े रहे ।
6) अंतरिम सरकार की असफलता-
सन 1946 ई. में निर्वाचन के पश्चात केंद्र में एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ, जिसमें कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों के नेता थे । प. जवाहर नेहरू प्रधानमंत्री बनाये गए , सरदार पटेल को गृह मंत्री एवं मुस्लिम लीग के लियाकत अली वित्त मंत्री बनाये गए, कांग्रेस ने जब भी विकास के लिए अपनी योजनाएं प्रस्तुत की, उन्हें लियाकत अली द्वारा धन की कमी का बहानका बनाकर अस्वीकृत कर दिया जाता , विवश होकर सरदार पटेल को कहना पड़ा कि "एक वर्ष के मेरे प्रशासनिक अनुभव अनुभव ने मुझे यह विशवास दिला दिया कि हैम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं" ।
7) पाकिस्तान की स्थिरता में संदेह-
कांगेस के अनेक नेताओं का मानना था कि पाकिस्तान यदि बन भी गया तो, वह उसकी भौगोलिक, आर्थिक , सैनिक , राजनितिक दृष्टि से स्थायी राष्ट्र नहीं बन सकेगा और एक दिन उसका भारत में विलय हो जाएगा।
8 लीग के साम्प्रदायिक कार्य-
जब मुस्लिम लीग को अपने संवैधानिक कार्यों में असफलता मिली तो उसने मुस्लिम जनता को भड़काकर जगह-जगह सांप्रदायिक दंगें करवा दिए, अकेले नोवाखाली में ही करीब सात हजार लोगों की जानें इन साम्प्रदायिक दंगों में गयी थी ।
9 सत्ता के प्रति कांग्रेसी नेताओं का आकर्षण -
एक अंग्रेजी विचारक माईकल बरचर ने यह विचार प्रस्तुत किये थे कि, कांगेसी नेताओं का सत्ता के प्रति आकर्षण था, और वे विजय की घड़ी में ये आकर्षण छोड़ना नहीं चाहते थे, किन्तु यह आरोप सत्य प्रतीत नहीं होता है, कांग्रेसी नेता शुरू से देशभक्त थे, वे भारत्त की अखंडता में विशवास रखते थे, किन्तु जब उन्हें ये विश्वास हो गया कि या तो भारत स्वतन्त्र होगा अथवा गृहयुद्ध की स्थिति उत्त्पन्न होगी तो उन्होंने एक खंडित भारत को स्वीकार करना तय किया था।
10 सत्ता हस्तांतरण के बारे में अंग्रेजों का दृष्टिकोण-
अंग्रेजों का विचार था कि भारत विभाजन से उत्त्पन्न दोनों राष्ट्र, हिंदुस्तान एवं पाकिस्तान सर्वदा आपस में लड़ते रहेंगें जो कि भारत को एक दुर्बल राष्ट्र बना देगा, यह विचार सत्य साबित हुआ ।
11 लीग के साथ स्थायी एकता न होने का विचार -
मुस्लिम लीग की सीधी कार्यवाही के बाद, कांग्रेस नेताओं को यह आभास होने लगा था कि, उसे साथ लेकर चलना असम्भव होगा, अंग्रेजों ने 30 जून 1947 तक भारत छोड़ने का निर्णय कर लिया था, ऎसी स्थिति में जबकि मुस्लिम लीग सम्पूर्ण भारत में दंगें करा रही थी, कांग्रेस नेताओं के सामने दो ही विकल्प थे-भारत का विभाजन स्वीकार करना या गृह युद्ध, अतः कांग्रेस ने प्रथम विकल्प को चुनना पसंद किया।
12 लॉर्ड माउंटबेटन का प्रभाव- भारत विभाजन को अपने चरम पर पहुंचाने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड माउण्ट बेटन को भारत भेजा, उन्होंने राजनीति, कूटनीति, व्यवहार कुशलता सभी का प्रयोग कर अपने इस कार्य में सफलता प्राप्त कर ली, पं. जवाहरलाल नेहरू तथा सरदार पटेल मुस्लिम लीग के कार्यों एवं कटु अनुभवों के कारण भारत- विभाजन के लिए सहमत हो गए।
उपरोक्त परिस्थितियां भारत-विभाजन के लिए उत्तरदायी रहीं, यद्यपि महात्मा गांधी भारत-विभाजन के विरुद्ध थे और उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि , भारत का विभाजन उनकी लाश पर ही होगा, किन्तु अंग्रेजों की कुटिलता एवं मुस्लिम लीग की हरकतों से भारत विभाजन होकर ही रहा!लॉर्ड माउंटबेटन का प्रभाव- भारत विभाजन को अपने चरम पर पहुंचाने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड माउण्ट बेटन को भारत भेजा, उन्होंने राजनीति, कूटनीति, व्यवहार कुशलता सभी का प्रयोग कर अपने इस कार्य में सफलता प्राप्त कर ली, पं. जवाहरलाल नेहरू तथा सरदार पटेल मुस्लिम लीग के कार्यों एवं कटु अनुभवों के कारण भारत- विभाजन के लिए सहमत हो गए।
उपरोक्त परिस्थितियां भारत-विभाजन के लिए उत्तरदायी रहीं, यद्यपि महात्मा गांधी भारत-विभाजन के विरुद्ध थे और उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि , भारत का विभाजन उनकी लाश पर ही होगा, किन्तु अंग्रेजों की कुटिलता, मुस्लिम लीग की हरकतों से भारत विभाजन होकर ही रहा ।
हिंसक काल जो अपने साथ विभाजन लेकर आया के दौरान औरतों के साथ भयानक अनुभव हुए। उनके साथ बलात्कार हुए, उनको अगवा किया गया, बार-बार बेचा-ख़रीदा गया, अनजान हालात में अजनबियों के साथ एक नयी ज़िंदगी बसर करने के लिए मजबूर किया गया। औरतों ने जो कुछ भुगता था उसके गहरे सदमे के बावजूद बदले हुए हालात में कुछ औरतों ने अपने नए पारिवारिक बंधन विकसित किए। लेकिन भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने इनसानी संबंधों की जटिलता के बारे में कोई संवेदनशील रवैया नहीं अपनाया। इस तरह की बहुत सारी औरतों को जबरदस्ती घर बिठा ली गई मानते हुए उन्हें उनके नए परिवारों से छीनकर दोबारा पुराने परिवारों या स्थानों पर भेज दिया गया। जिन औरतों के बारे में फैसले लिए जा रहे थे उनसे इस बार भी सलाह नहीं ली गई। अपनी ज़िंदगी के बारे में फैसला लेने के उनके अधिकार को एक बार फिर नजरअंदाज कर दिया।
हिंसक काल जो अपने साथ विभाजन लेकर आया के दौरान औरतों के साथ भयानक अनुभव हुए। उनके साथ बलात्कार हुए, उनको अगवा किया गया, बार-बार बेचा-ख़रीदा गया, अनजान हालात में अजनबियों के साथ एक नयी ज़िंदगी बसर करने के लिए मजबूर किया गया। औरतों ने जो कुछ भुगता था उसके गहरे सदमे के बावजूद बदले हुए हालात में कुछ औरतों ने अपने नए पारिवारिक बंधन विकसित किए। लेकिन भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने इनसानी संबंधों की जटिलता के बारे में कोई संवेदनशील रवैया नहीं अपनाया। इस तरह की बहुत सारी औरतों को जबरदस्ती घर बिठा ली गई मानते हुए उन्हें उनके नए परिवारों से छीनकर दोबारा पुराने परिवारों या स्थानों पर भेज दिया गया। जिन औरतों के बारे में फैसले लिए जा रहे थे उनसे इस बार भी सलाह नहीं ली गई। अपनी ज़िंदगी के बारे में फैसला लेने के उनके अधिकार को एक बार फिर नजरअंदाज कर दिया।
अभी तक हम आम लोगों के जिन अनुभवों पर चर्चा कर रहे हैं वे उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी इलाके से संबंधित थे। कलकत्ता और नोआखली में 1946 में भी जनसंहार हो चुके थे लेकिन विभाजन का सबसे ख़ूनी और विनाशकारी रूप पंजाब में सामने आया। पश्चिमी पंजाब से तकरीबन सभी हिंदुओं और सिखों को भारत की तरफ और तकरीबन सभी पंजाबी भाषी मुसलमानों को पाकिस्तान की तरफ हाँक दिया गया। और यह सब कुछ 1946 से 1948 के बीच, महज़ दो साल में हो गया।
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और हैदराबाद (आंध्र प्रदेश) के बहुत सारे परिवार पचास के दशक और साठ के दशक के शुरुआती सालों में भी पाकिस्तान जाकर बसते रहे लेकिन बहुत सारों ने भारत में ही रहने का फैसला किया। पाकिस्तान गए ऐसे ज़्यादातर उर्दू भाषी लोग, जिन्हें मुहाजिर (अप्रवासी) कहा जाता है, सिंध के कराची-हैदराबाद इलाके में बस गए।
बंगाल में यह पलायन ज्यादा लंबे समय तक चलता रहा। लोग ढीली-ढाली अंतर्राष्ट्रीय सीमा के आर-पार जाते रहे। इसका एक अर्थ यह था कि बंगाली विभाजन से जो पीड़ा उपजी वह उतनी तीखी नहीं थी लेकिन जिसकी टीस लगातार महसूस होती रही। पंजाब के विपरीत, बंगाल में धर्म के आधार पर आबादी का बँटवारा भी उतना साफ नहीं था। बहुत सारे बंगाली हिंदू पूर्वी पाकिस्तान में जबकि बहुत सारे बंगाली मुसलमान पश्चिम बंगाल में ही रुके रहे। आखि़रकार, बंगाली मुसलमानों (पूर्वी पाकिस्तानियों) ने अपनी राजनीतिक पहलकदमी के जरिए जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धान्त को नकारते हुए पाकिस्तान से अलग होने का फैसला लिया और 1971-72 में बांग्लादेश की स्थापना हुई। जाहिर है, इस्लाम पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को एक-दूसरे से जोड़कर नहीं रख पाया। इसके बावजूद पंजाब और बंगाल के अनुभवों में जबरदस्त समानताएँ भी दिखाई देती हैं। दोनों ही जगह औरतों व लड़कियों को यातना का मुख्य निशाना बनाया गया। हमलावर औरतों की देह को जीते जाने वाले इलाके की तरह देखते थे। एक समुदाय की औरतों के अपमान को उनके पूरे समुदाय के अपमान तथा बदले की कार्रवाई के रूप में देखा जाता था।
इस सारी उथल-पुथल में सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करने के लिए एक आदमी की बहादुराना कोशिशें आखि़रकार रंग लाने लगीं। 77 साल के बुजुर्ग गाँधीजी ने अहिंसा के अपने जीवनपर्यंत सिद्धान्त को एक बार फिर आजमाया और अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। उनका फैसला इस यकीन पर आधारित था कि लोगों का हृदय परिवर्तन किया जा सकता है। वे पूर्वी बंगाल के नोआखली (वर्तमान बांग्लादेश) से बिहार के गाँवों में और उसके बाद कलकत्ता व दिल्ली के दंगों में झुलसी झोंपड़-पट्टियों की यात्रा पर निकल पड़े। उनकी कोशिश थी कि हिन्दू मुसलमान एक दूसरे को ना मारें और हर जगह उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय को हिन्दू अथवा मुस्लिम, दिलासा दी। अक्तूबर 1946 में पूर्वी बंगाल के मुसलमान हिंदुओं पर निशाना कस रहे थे। गांधीजी वहाँ गए, पैदल, गाँव-गाँव पहुँचे और उन्होंने स्थानीय मुसलमानों को समझाया कि वे हिंदुओं की रक्षा करें। इसी तरह अन्य स्थानों पर, जैसे कि दिल्ली में, उन्होंने दोनों समुदायों में पारस्परिक भरोसा और विश्वास बनाने की कोशिश की।
गांधीजी अपनी हत्या तक दिल्ली में ही रहे और आखि़री दिनों में मुसलमानों को शहर से बाहर खदेड़ने की सोच से तंग आकर उन्होंने अनशन शुरू कर दिया था। आश्चर्यजनक बात है कि पाकिस्तान से आए हिंदू और सिख शरणार्थी भी अनशन में उनके साथ बैठते थे। मौलाना आजाद ने लिखा है कि इस अनशन का असर, ‘आसमान की बिजली’ जैसा रहा। लोगों को मुसलमानों के सफाए के अभियान की निरर्थकता दिखाई देने लगी। मगर हिंसा का यह नंगा नाच आखि़रकार गाँधीजी की शाहदत के साथ ही ख़त्म हुआ। दिल्ली के बहुत सारे मुसलमानों ने बाद में कहा, “दुनिया सच्चाई की राह पर आ गई थी”।
मौखिक वृत्तांत,संस्मरण, डायरियाँ, पारिवारिक इतिहास और स्वलिखित ब्योरे- इन सबसे तक्सीम के दौरान आम लोगों की कठिनाइयों व मुसीबतों को समझने में मदद मिलती है। लाखों लोग बँटवारे को पीड़ा तथा एक स्याह दौर की चुनौती के रूप में देखते हैं। उनके लिए यह सिर्फ संवैधानिक विभाजन या मुस्लिम लीग, कांग्रेस अथवा औरों की दलगत सियासत का मामला ही नहीं था। उनके लिए यह जीवन में अनपेक्षित बदलावों का वक्त था। 1946-1950 के और उसके बाद भी जारी रहने वाले इन बदलावों से निपटने के लिए मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक समायोजन की जरूरत थी। यूरोपीय महाध्वंस (होलोकॉस्ट) की तरह हमें विभाजन को सिर्फ एक राजनीतिक घटना के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि इससे गुजरने वालों द्वारा उसे दिए गए अर्थों के जरिए भी समझना चाहिए। किसी घटना की हकीकत को स्मृतियों और अनुभवों से भी आकार मिलता है।
व्यक्तिगत स्मृतियों -जो एक तरह का मौखिक स्त्रोत है ,की एक ख़ूबी यह है कि उनमें हमें अनुभवों और स्मृतियों को और बारीकी से समझने का मौका मिलता है। इससे इतिहासकारों को बँटवारे जैसी घटनाओं के दौरान लोगों के साथ क्या-क्या हुआ, इस बारे में बहुरंगी और सजीव वृत्तांत लिखने की काबिलियत मिलती है। सरकारी दस्तावेजों से इस तरह की जानकारियाँ हासिल कर पाना नामुमकिन होता है। सरकारी दस्तावेज नीतिगत और दलगत मामलों तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं से संबंधित होते हैं। विभाजन के मामले में सरकारी रिपार्टों व फाइलों और आला सरकारी अफसरों के निजी लेखन से अंग्रेजों तथा प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के बीच भारत के भविष्य या शरणार्थियों के पुनर्वास के बारे में चलने वाली वार्ताओं पर तो काफी रोशनी पड़ती है लेकिन उनसे देश विभाजन के लिए सरकार द्वारा लिए गए फैसलों से प्रभावित होने वालों के रोजमर्रा हालात और अनुभवों के बारे में ख़ास पता नहीं चलता।
मौखिक इतिहास से इतिहासकारों को गरीबों और कमजोरों के अनुभवों को उपेक्षा के अंधकार से निकाल कर अपने विषय के किनारों को और फैलाने का मौका मिलता है। इस प्रकार संपन्न और सुज्ञात लोगों की गतिविधियों से आगे जाते हुए विभाजन का मौखिक इतिहास ऐसे मर्दों-औरतों के अनुभवों की पड़ताल करने में कामयाब रहा है जिनके वजूद को अब तक नजरअंदाज कर दिया जाता था, सहज-स्वाभाविक मान लिया जाता था, या जिनका मुख्यधारा के इतिहास में बस चलते-चलते जिक्र कर दिया जाता था। यह उल्लेखनीय बात है क्योंकि जो इतिहास हम आमतौर पर पढ़ते हैं उसमें आम इनसानों के जीवन और कार्यों को अकसर पहुँच के बाहर या महत्वहीन मान लिया जाता है।
अभी भी बहुत सारे इतिहासकार मौखिक इतिहास के बारे में शंकालु हैं। वे यह कह कर इसको खारिज कर रहे हैं कि मौखिक जानकारियों में सटीकता नहीं होती और उनसे घटनाओं का जो क्रम उभरता है वह अकसर सही नहीं होता। इतिहासकारों की दलील है कि निजी तजुर्बों की विशिष्टता के सहारे समान्यकरण करना, यानी किसी सामान्य नतीजे पर पहुँचना मुश्किल होता है। उनका कहना है कि इस तरह के छोटे-छोटे अनुभवों से मुकम्मल तसवीर नहीं बनाई जा सकती और सिर्फ एक गवाह को गवाह नहीं माना जा सकता। उनको यह भी लगता है कि मौखिक विवरण सतही मुद्दों से ताल्लुक रखते हैं और यादों में चस्पां रह जाने वाले छोटे-छोटे अनुभव इतिहास की वृहत्तर प्रक्रियाओं का कारण ढूँढ़ने में अप्रासंगिक होते हैं।
भारत के विभाजन और जर्मनी के महाध्वंस जैसी घटनाओं के संदर्भ में ऐसी गवाहियों की कोई कमी नहीं होगी जिनसे पता चलता है कि उनके दरमियान अनगिनत लोगों ने कितनी तरह की और कितनी भीषण कठिनाइयों व तनावों का सामना किया। इस प्रकार इनमें रुझानों की शिनाख़्त करने और अपवादों को चिन्हित करने के लिए साक्ष्यों की भरमार है। मौखिक या लिखित बयानों की तुलना करके उनसे निकलने वाले नतीजों को दूसरे स्त्रोतों से मिलाकर देखने और आंतरिक अंतर्विरोधों के बारे में चौकस रहते हुए इतिहासकार किसी भी दिए गए साक्ष्य की विश्वसनीयता को तौल सकते हैं। इसके अलावा वैसे भी, अगर इतिहास में साधारण व कमजोरों के वजूद को जगह देनी है तो यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि बँटवारे का मौखिक इतिहास केवल सतही मुद्दों से संबंधित नहीं है। विभाजन के अनुभव पूरी कहानी का इस कदर केन्द्रीय हिस्सा हैं कि अन्य स्त्रोतों की जाँच करने के लिए मौखिक स्त्रोतों तथा मौखिक स्त्रोतों की जाँच करने के लिए अन्य स्त्रोतों का इस्तेमाल किया ही जाना चाहिए। अलग तरह के सवालों के जवाब ढूँढ़ने के लिए अलग तरह के स्त्रोतों को तो ढूँढ़ना ही होगा।
भारतीय संविधान विश्व के अनेक देशों के संविधानों की विशेषताओं का मिश्रण है। ब्रिटेन के संविधान से संसदीय शासन प्रणाली, एकल नागरिकता और स्पीकर के पद को शामिल किया गया है। जबकि फ़्रांस के संविधान से गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था को लिया गया है।
संविधान सभा के प्रमुख सदस्यों में जवाहर लाल नेहरु, सरदार बल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ, अम्बेडकर, सी. राजगोपालाचारी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पंडित, फिरोज गाँधी आदि लोग थे।
संविधान सभा का गठन का गठन ९ दिसम्बर १९४६ को हुआ। संविधान सभा में कुल ३०८ लोग थे, जो देश के विभिन्न हिस्सों से निर्वाचित होकर आये थे।
मूल संविधान में कुल ३९५ अनुच्छेद और ८ अनुसूचियाँ थीं. वर्तमान में अनुसूचियों की संख्या १२ है। इसी कारण भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान माना जाता है।
भारत एक संप्रभुत्व संपन्न (देश के आंतरिक एवं बाहरी मामलों में अपनी इच्छानुसार कार्य करने को स्वतंत्र), समाजवादी (आर्थिक स्थिति में समानता), धर्मनिरपेक्ष(सभी धर्मों का समान आदर), प्रजातान्त्रिक (सरकार जनता के लिए और जनता के द्वारा) और गणतंत्रात्मक राज्य है. यह अपने नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय देना चाहता है।
भारतीय संविधान के भाग IV में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत सन्निहित है जो निर्देश देश में एक समाज की स्थापना के मार्गदर्शन करने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को दिया जाते है। वे प्रकृति में गैर न्यायोचित हैं। ये एक सामाजिक व्यवस्था बनाने का इरादा रखते हैं जो हर तरह के न्यायिक रुप से मान्य होगा, उदाहरण के लिए: -राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि (क) नागरिकों के पास आजीविका के पर्याप्त साधन हो, (ख) आर्थिक प्रणाली धन की एकाग्रता का परिणाम नहीं होनी चाहिए।
भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताएं हैं:-
1.शक्तियों का पृथक्करण: - संविधान के अनुसार राज्य के तीन अंग हैं। ये विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका हैं, राज्य की एक शाखा द्वारा सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के क्रम में संविधान का कहना है कि इन अंगों में से प्रत्येक को भिन्न शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।
2. मौलिक अधिकार:- ये अधिकार हर नागरिक का पूर्ण शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास सुनिश्चित करते हैं। वे उन बुनियादी स्वतंत्रता और शर्तों में शामिल है जो जीवन जीने के लायक बना सकते हैं। ये सरकार पर एक जांच के रूप में सेवा करते हैं।
3. धर्मनिरपेक्षता: - एक धर्मनिरपेक्ष राज्य सभी को विश्वास और पूजा को बराबर स्वतंत्रता की अनुमति देता है। 42 वें संशोधन अधिनियम, 1976, संविधान की प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द डाला गया।
समानता का अधिकार भारतीय संविधान के भाग III में उल्लेख छह मौलिक अधिकारों में से एक है। इसके अनुसार सभी व्यक्ति कानून के समक्ष समान हैं। किसी भी नागरिकके साथ केवल धर्म के आधार पर, जन्म, मूलवंश, जाति, लिंग, स्थान या इनमें से किसी से दुकान, सार्वजनिक रेस्तरां, होटल और सार्वजनिक मनोरंजन या कुओं, तालाबों, स्नान घाट के स्थानों के लिए उपयोग के संबंध में भेदभाव नहीं किया जाएगा और सड़कें पूरी तरह या आंशिक रूप से राज्य निधि से बनायी जाएगी और इन्हे आम जनता के उपयोग के लिए समर्पित किया जाएगा। राज्य रोजगार के मामलों में किसी के खिलाफ भेदभाव नहीं कर सकता। इस अनुच्छेद के तहत अस्पृश्यता की प्रथा को समाप्त कर दिया गया है।
(i) समानता का अधिकार
(ii)स्वतंत्रता का अधिकार
(iii) शोषण के विरुद्ध अधिकार
(iv)धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
(v) सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार
(vi) सांविधानिक उपचारों का अधिकार
क) यह कुछ निश्चित आदर्शों को निर्धारित करता है जो देश के आधार को बनाता है जिसमें नागरिक के रूप में हम रहते है।
ख ) यह देश की राजनीतिक व्यवस्था की प्रकृति को परिभाषित करता है।
ग) बहुमत शासन अल्पसंख्यक शासन पर हावी नहीं होना चाहिए। प्रमुख समूह कम शक्तिशाली लोगो या समूह के खिलाफ अपनी शक्ति का उपयोग न करें।
(1) स्थायित्व - लिखित संविधान अलिखित संविधान की अपेक्षा स्थायी होता है। इसके साथ ही यदि वह कठोर भी हो तो उसका स्थायित्व और भी बढ़ जाता है और वह राजनीतिक दलों के हाथों का खिलौना नहीं हो सकता।
(2) अधिकारों की रक्षा - लिखित संविधान के द्वारा नागरिक अधिकारों की सुरक्षा अधिक अच्छे प्रकार से की जा सकती है। अतः अल्पसंख्यक वर्ग भी संविधान के प्रति पूर्ण विश्वास की भावना रखता है।
(3) स्पष्ट तथा निश्चित - लिखित संविधान स्पष्ट तथा निश्चित होता है, अतः उसका पालन सरलता से किया जा सकता है और उसकी व्याख्या में कोई कठिनाई नहीं होती है।
(4) संघात्मक शासन के लिए लिखित संविधान होना अनिवार्य - संघात्मक शासन के लिए लिखित संविधान का होना आवश्यक है, क्योंकि संघीय शासनमें शक्तियां केन्द्र तथा राज्यों में बंटी हुई होती है और ऐसा केवल लिखित संविधान के अन्तर्गत ही सम्भव हैं।
शक्तियों के विभाजन के पीछे मूल उद्देश्य है कि जब भी व्यक्ति या समूह शक्ति बहुतायत होती है तो वे नागरिकों के लिए खतरनाक हो सकती है। सत्ता का विभाजन किसी भी समूह के हाथों में सत्ता की एकाग्रता को दूर करने की एक विधि है। इसका दुरुपयोग इसे और अधिक जटिल बना रहा है। यह सरकार के तीन अंगों के बीच अलग-अलग विभाजित है अर्थात कार्यपालिका, विधायिका और न्यायिक। विशिष्ट शक्तियाँ जिनका वे उपयोग करते है वे भी अलग करती है। विधायी शाखा के पास कानून बनाने की क्षमता है। कार्यकारी शाखा के पास उन कानूनों को लागू करने अवलोकन करने की क्षमता है। न्यायिक शाखा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है। यह संविधान का संरक्षक है। इस माध्यम से, प्रत्येक अंग अधिनियम राज्य के अन्य अंगों पर एक जाँच के रूप में और इस सब के बीच शक्ति संतुलन सुनिश्चित करता है।
भारत का संविधान इस प्रकार तीव्र वाद-विवाद और चर्चा की एक प्रक्रिया के माध्यम से अस्तित्व में आया, इसके कई प्रावधान, दो विपरीत स्थितियों के मध्य, एक बीच का रास्ता बनाकर, आदान-प्रदान की एक प्रक्रिया के माध्यम से अस्तित्व में आए थे।हालांकि, संविधान की एक केंद्रीय विशेषता, प्रत्येक वयस्क भारतीय को मत देने,पर पर्याप्त सहमति थी।यह आस्था का एक अभूतपूर्व कार्य था क्योंकि अन्य लोकतांत्रिक देशों में मतदान धीरे धीरे, और चरणों में किया गया था। संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में, केवल संपत्ति धारक पुरुषों को ही मतदान किया गया था।फिर, शिक्षा प्राप्त पुरुषों को भी लोकप्रिय मंडली में अनुमति प्रदान की गई थी।एक लंबे और अप्रिय संघर्ष के बाद,मजदूर वर्ग अथवा किसान पृष्ठभूमि के लोगों को भी मतदान का अधिकार दिया गया था,महिलाओं को यह अधिकार दिलाने के लिए इससे भी अधिक लम्बा संघर्ष आवश्यक था।संविधान की एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता,धर्मनिरपेक्षता पर बल देना था।प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता की कोई गुंजायमान घोषणा नहीं की गई थी, लेकिन व्यावहारिक तौर पर,भारतीय संदर्भ में इसकी जो प्रमुख विशेषताएं समझी जाती थीं, उनकी अनुकरणीय रूप में व्याख्या की गई थी।ऐसा,मौलिक अधिकारों की सावधानीपूर्वक तैयार की गई श्रृंखला के माध्यम से किया गया था "धर्म की स्वतंत्रता" (अनुच्छेद 25-28), "सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार" (अनुच्छेद 29, 30), और "समानता का अधिकार" (अनुच्छेद 14, 16, 17 ), राज्य की ओर से सभी धर्मों के साथ समतुल्य व्यवहार कीया जाना सुनिश्चित किया गया और धर्मार्थ संस्थाओं को बनाए रखने का अधिकार दिया गया।
राज्य ने,राज्य द्वारा संचालित सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में अनिवार्य धार्मिक निर्देशों पर प्रतिबंध लगाकर,और रोजगार में धार्मिक भेदभाव को अवैध घोषित कर ,धार्मिक समुदायों से स्वयं को दूर करने का प्रयास किया।हालांकि, समुदायों में सामाजिक सुधार हेतु एक निश्चित कानूनी अन्तराल उत्त्पन्न कीया गया था,यह अन्तराल, अस्पृश्यता पर प्रतिबंध लगाने और व्यक्तिगत और पारिवारिक कानूनों में परिवर्तन लागू करने के लिए इस्तेमाल किया गया था।राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता की भारतीय असंगति में,फिर धर्म से राज्य का कोई निरपेक्ष पृथक्करण नहीं वरन दोनों के बीच एक प्रकार का न्यायसंगत अन्तराल किया गया है।संविधान सभा के वाद विवाद,कईं परस्पर विरोधी विचारों, जिनका संविधान का निर्माण करने में मोल-भाव किया जाना चाहिए था, और कई मांगों को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया था,को समझने में हमारी सहायता करते हैं।वे हमें आदर्शों जो लागू किये गए थे और सिद्धांतों,जिन्हें संविधान के निर्माताओं के द्वारा संचालित किया गया था,के बारे में बताते हैं।लेकिन इन वाद-विवादों को पढ़ते समय हमें जागरूक रहने की आवश्यकता है कि जिन आदर्शों को लागू किया गया था,उन पर एक संदर्भ जिसके अंतर्गत वे उचित लग रहे थे,के अनुसार पुनः कार्य बहूत प्रायः ही किया गया था।कभी-कभी विधानसभा के सदस्य भी अपने विचारों को बदल देते थे, क्योंकि वाद -विवाद तीन वर्षों में प्रकाश में आया था।दूसरों के तर्क को सुनकर, कुछ सदस्यों ने अपनी स्थिति पर पुनः विचार किया,विपरीत विचारों के प्रति खूली मानसिकता को अपनाया, जबकि दूसरों ने आसपास की घटनाओं की प्रतिक्रिया में अपने विचार बदल दिए।


संविधान सभा की, केंद्र सरकार और राज्य सरकार से संबंधित अधिकरों पर एक लंबी बातचीत हुई, एक सशक्त केंद्र के लिए तर्क देने वाले उन लोगों में जवाहरलाल नेहरू थे।प्रारूप संविधान ने, विषय की तीन सूचियां प्रदान की; संघ सूची, राज्य सूची, और समवर्ती सूची
जबसे संविधान सभा ने इसका सत्र शुरू कीया था, उसके बाद से एक मजबूत केंद्र की आवश्यकता को कई अवसरों पर रेखांकित किया गया था।
विभाजन से पूर्व,कांग्रेस प्रांतों को अधिक स्वायत्तता देने के लिए सहमत थी
विभाजन के पश्चात अधिकांश राष्ट्रवादियों ने उनकी स्थिति में बदलाव कर लिया, क्योंकि उन्होनें महसूस कीया था कि एक विकेन्द्रीकृत संरचना के लिए पूर्व में आरोपित राजनितिक दबाव अब अस्तीत्व में नहीं रह गया था।उसके स्थान पर औपनिवेशिक सरकार द्वारा आरोपित एकात्मक प्रणाली, वहां पहले से मौजूद थी
उस समय की हिंसा ने केंद्रीकरण को और बढ़ावा दिया, अब दोनों को, पहले से अराजकता की रोकथाम करना और देश के आर्थिक विकास हेतु योजना का निर्माण करना, आवश्यक लगा
संविधान ने इस प्रकार, घटक राज्यों पर, भारत के संघ के अधिकारों के प्रति एक अलग पूर्वाग्रह दर्शाया
अ)13 दिसंबर 1946 को जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा के सामने ‘‘उद्देश्य प्रस्ताव’’ पेश किया। जिसे 1946 में भारत के संविधान का निर्माण करने के लिए निर्वाचित किया गया था।
ब)यह एक ऐतिहासिक प्रस्ताव था जिसमें स्वतंत्र भारत के संविधान के मूल आदर्शों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई थी और वह फ्रेमवर्क सुझाया गया था जिसके तहत संविधान का कार्य आगे बढ़ना था।
स) प्रस्ताव की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार थीं-
1)इसमें भारत को एक स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य घोषित किया गया था।
2)नागरिकों को न्याय, समानता व स्वतंत्रता का आश्वासन दिया गया था, और यह वचन दिया गया था कि अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों एवं दमित व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षात्मक प्रावधान किए जाएँगे।
3)इसमें यह उल्लेखित किया गया कि भारतीय संविधान का उद्देश्य यह होगा कि लोकतंत्र के उदारवादी विचारों और आर्थिक न्याय के समाजवादी विचारों का एक-दूसरे में समावेश किया जाए और भारतीय संदर्भ में इन विचारों की रचनात्मक व्याख्या की जाए।
1)भारत की संविधान सभा भारतीय नेताओं और ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के सदस्यों के बीच हुई वार्ता का परिणाम थी। बातचीत का एक परिणाम के रूप में स्थापित किया गया था। संविधान सभा का चुनाव प्रांतीय विधान सभा के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से हुआ था। इसकी प्रथम बैठक 9 दिसंबर, 1946 को दिल्ली में उस समय हुई थी जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। इसमें मूल रूप से वो प्रांत सम्मिलित थे जो अब पाकिस्तान और बांग्लादेश का गठन करते हैं। इसके अलावा भारत की रियासतों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रांत इसमें शामिल थे। अंतिम संविधान सभा में पंद्रह महिलाओं सहित दो सौ सात सदस्य थे। मुस्लिम लीग के केवल 28 सदस्य अंततः भारतीय विधानसभा में सम्मिलित हुए थे। बाद में, 93 सदस्यों को रियासतों से मनोनीत किया गया था। 15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र देश बन गया और संविधान सभा भारत की संसद बन गई।
2)संविधान सभा महत्त्वपूर्ण में तीन सौ सदस्य में जवाहर लाल नेहरू थे।एक निर्णायक प्रस्ताव, उद्देश्य प्रस्ताव को नेहरू ने पेश किया था। उनके साथ पटेल मुख्य रूप से परदे के पीछे कई महत्त्वपूर्ण काम कर रहे थे। उन्होंने कई रिपोर्टों के प्रारूप लिखने में खास मदद की और कई परस्पर विरोधी विचारों के बीच सहमति पैदा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे। सभा में चर्चा रचनात्मक दिशा ले और सभी सदस्यों को अपनी बात कहने का मौका मिले-यह उनकी जिम्मेदारियाँ थीं।बी.आर. अम्बेडकर भी सभा के सबसे महत्त्वपूर्ण सदस्यों में से एक थे।उन्होंने संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में काम किया। उनके साथ दो अन्य वकील भी काम कर रहे थे। एक गुजरात के के. एम. मुंशी थे और दूसरे मद्रास के अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर। दोनों ने ही संविधान के प्रारूप पर महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। इन छह सदस्यों को दो प्रशासनिक अधिकारियों ने महत्त्वपूर्ण सहायता दी। इनमें से एक बी.एन. राव थे। वह भारत सरकार के संवैधानिक सलाहकार थे और उन्होंने अन्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का गहन अध्ययन करके कई चर्चा पत्र तैयार किए थे। दूसरे अधिकारी एस.एन. मुखर्जी थे। इनकी भूमिका मुख्य योजनाकार की थी। मुखर्जी जटिल प्रस्तावों को स्पष्ट वैधिक भाषा में व्यक्त करने की क्षमता रखते थे।अम्बेडकर के पास सभा में संविधान के प्रारूप को पारित करवाने की जिम्मेदारी थी।
1) पृथक निर्वाचिका की मांग से राष्ट्रवादी से ज्यादातर राष्ट्रवादी भड़क गए। पृथक निर्वाचन के विचार को ब्रिटिश राज के निर्माण के रूप में देखते थे और देश की आजादी के बाद इस विचार को और आगे नहीं ढोना चाहते थे।ज्यादातर राष्ट्रवादियों को लग रहा था कि पृथक निर्वाचिका की व्यवस्था लोगों को बाँटने के लिए अंग्रेजों की चाल थी उन्हें देश के धार्मिक आधार पर विभाजित होने पर निरंतर गृहयुद्ध, दंगों और हिंसा की आशंका दिखाई दे रही थी। उनकी राय में यह एक ऐसी माँग थी जो देश के विभाजन के मुख्य कारणों में से एक थी।
2) मुस्लिम समुदाय के कुछ मुसलमान भी पृथक निर्वाचिका की माँग के समर्थन में नहीं थे। उन्हे लगता था कि पृथक निर्वाचिका आत्मघाती साबित होगी क्योंकि इससे अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों से कट जाएँगे। उन्हें लगा कि इसकी शुरुआत से ही समुदाय में हताशा की भावना का विकास होगा क्योंकि उन्हें स्वतंत्र भारत की सरकार के अंतर्गत किसी भी प्रभावी निर्णय द्वारा अलग कर दिया जाएगा।
3) दलित जाति के सदस्यों को ऐसा लगता था कि अकेले संवैधानिक सुरक्षा के उपाय का विचार उनके समुदाय की समस्याओं को हल नहीं करने वाला है । उन्हें लगता था कि उनके समुदाय से संबन्धित समस्याओं के पीछे जाति विभाजित समाज के सामाजिक कायदे-कानूनों और नैतिक मूल्य-मान्यताओं का हाथ है।उन्होनें सोचा कि संवैधानिक सुरक्षा उनके समुदाय के प्रति भारतीय जनता की धारणा को नहीं बदल सकेगी।
(i)प्रारूप संविधान की समवर्ती सूची में, केंद्र और राज्य शक्तियों का बँटवारा करने वाले थे। हालांकि, समवर्ती और केंद्रीय सूचियों में कई मदों को केंद्र के नियंत्रण में रखा गया था
(ii)के. संथानम जैसे लोगों ने यह तर्क देकर कि केंद्र जिम्मेदारियों से अत्यधिक बोझिल हो जाएगा और प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर पायेगा, यदि वह राज्य के साथ अपनी जिम्मेदारियों का बँटवारा नहीं करता है, उन्होंने यह भी महसूस किया कि संविधान में वित्तीय प्रावधानों से प्रांत साधनहीन हो जाएंगे, क्योंकि अधिकाँश करों को केंद्र के लिए आरक्षित का दिया गया था और राज्य अपने प्रांतों के विकास हेतु किन्हीं भी महत्वपूर्ण परियोजनाओं को शुरू नहीं कर सकता था।
(iii) अम्बेडकर ने एक मजबूत केंद्र के विचार का समर्थन किया, क्योंकि उसने महसूस किया था कि भारत में दंगे और हिंसा राष्ट्र को खंडित कर देंगे
संविधान निर्माण से पहले के साल काफी उथल-पुथल वाले थे। यह महान आशाओं का क्षण भी था और भीषण मोहभंग का भी। 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद तो कर दिया गया किन्तु इसके साथ ही इसे विभाजित भी कर दिया गया। लोगों की स्मृति में 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन अभी भी जीवित था जो ब्रिटिश राज के खिलाफ संभवतः सबसे व्यापक जनांदोलन था। विदेशी सहायता से सशस्त्र संघर्ष के जरिए स्वतंत्रता पाने के लिए सुभाष चंद्र बोस द्वारा किए गए प्रयास भी लोगों को बखूबी याद थे। 1946 के वसंत में बम्बई तथा अन्य शहरों में रॉयल इंडियन नेवी (शाही भारतीय नौसेना) के सिपाहियों का विद्रोह भी लोगों को बार-बार आंदोलित कर रहा था। लोगों की सहानुभूति सिपाहियों के साथ थी। चालीस के दशक के आखिरी सालों में देश के विभिन्न भागों में मजदूरों और किसानों के आंदोलन भी हो रहे थे। व्यापक हिंदू-मुस्लिम एकता इन जनांदोलनों का एक अहम पहलू था। इसके विपरीत कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों प्रमुख राजनीतिक दल धार्मिक सौहार्द्र और सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने के लिए सुलह-सफाई की कोशिशों में नाकामयाब होते जा रहे थे।
अगस्त 1946 में कलकत्ता में शुरू हुई हिंसा के साथ उत्तरी और पूर्वी भारत में लगभग साल भर तक चलने वाला दंगे-फसाद और हत्याओं का लंबा सिलसिला शुरू हो गया था। बर्बर हिंसा का यह वीभत्स नाच भीषण जनसंहारों के साथ हुआ। इसके साथ ही देश-विभाजन की घोषणा हुई और असंख्य लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने लगे।
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस पर आनंद और उम्मीद का जो माहौल था वह उस समय के लोगों को कभी नहीं भूलेगा। लेकिन भारत के बहुत सारे मुसलमानों और पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं व सिखों के लिए यह एक निर्मम चुनाव का क्षण था-उनके सामने यह तत्क्षण मृत्यु तथा पीढि़यों पुरानी जड़ों से उखड़ जाने के बीच चुनाव का क्षण था। करोड़ों शरणार्थी यहाँ से वहाँ जा रहे थे। मुसलमान पूर्वी व पश्चिमी पाकिस्तान की तरफ तो हिंदू और सिख पश्चिमी बंगाल व पूर्वी पंजाब की तरफ बढ़े जा रहे थे। उनमें से बहुत सारे कभी मंजिल तक नहीं पहुँचे, बीच रास्ते में ही मर गए।
नवजात राष्ट्र के सामने इतनी ही गंभीर एक और समस्या देशी रियासतों को लेकर थी। ब्रिटिश राज के दौरान उपमहाद्वीप का लगभग एक-तिहाई भू-भाग ऐसे नवाबों और रजवाड़ों के नियंत्रण में था जो ब्रिटिश ताज की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। उनके पास अपने राज्यों को जैसे चाहे चलाने की सीमित ही सही लेकिन काफी आजादी थी।
जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तो इन नवाबों और राजाओं की संवैधानिक स्थिति बहुत अजीब हो गई। एक समकालीन प्रेक्षक ने कहा था कि कुछ महाराजा तो बहुत सारे टुकड़ों में बँटे भारत में स्वतंत्र सत्ता का सपना देख रहे थे।
उदारवादियों की सफलताओं और भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में उनके योगदान को निम्नवत व्यक्त किया जा सकता है -
ब्रिटिश शासन के दोषों को स्पष्ट करना - कांग्रेस के द्वारा अपनी स्थापना के समय से ही ब्रिटिश शासन के विभिन्न दोषों की तरफ संकेत दिया गया । नौकरशाही की बुराइयों को सामने लाया गया । उन्होंने उग्रवादी आन्दोलनकारियों को विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए एक शक्तिशाली शास्त्र प्रदान किया ।
भारतीय राष्ट्रीयता के जनक - उदारवादियों के कार्य तथा नीतियों तात्कालिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण न होते हुए भी ऐसे थे जिनके भविष्य में महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए । उन्होंने देशवासियों को शिस्खा दी कि वे साम्प्रदायिक तथा प्रांतीय भावनाओं से ऊपर उठकर सामान्य राष्ट्रीयता की भावना से कार्य करें ।
जनतंत्र को शिक्षा देना - उदारवादियों ने भारतीय जनतंत्र को राजनीतिक शिक्षा देना व उनमे जनता में स्वतंत्रता का विचारों के बीजरोहण किया । उन्होंने समाज, जाति, धर्म आदि से ऊपर उठकर राष्ट्रीय मंच का निर्माण किया था । इससे समाज में जनमत की भावना जाग्रत होने लगी।
भारतीय परिषद् अधिनियम, 1892 ई० - उदारवादियों की सफलता को 1892 ई० के भारतीय परिषद् अधिनियम के सन्दर्भ में भी लिया जा सकता है लेकिन यह भारतीयों को संतुष्ट न कर सका । फिर भी देश संवैधानिक विकास की दिशा में यह निश्चित प्रगतिशील कदम था ।
1)1945 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी। यह सरकार भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में थी। उसी समय वायसराय लॉर्ड वावेल ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों के बीच कई बैठकों का आयोजन किया।
2)1946 की शुरुआत में प्रांतीय विधान मंडलों के लिए नए सिरे से चुनाव कराए गए। सामान्य श्रेणी में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भारी बहुमत प्राप्त हुआ।
3)946 की गर्मियों में कैबिनेट मिशन भारत आया। इस मिशन ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को एक ऐसी संघीय व्यवस्था पर राज़ी करने का प्रयास किया कैबिनेट मिशन का यह प्रयास भी विफल रहा। वार्ता टूट जाने के बाद जिन्ना ने पाकिस्तान की स्थापना के लिए लीग की माँग के समर्थन में एक प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस का आह्वान किया। इसके लिए 16 अगस्त, 1946 का दिन तय किया गया था। उसी दिन कलकत्ता में खूनी संघर्ष शुरू हो गया।
4) फरवरी 1947 में वावेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को वायसराय नियुक्त किया गया। उन्होंने वार्ताओं के एक अंतिम दौर का आह्वान किया जिसका कोई नतीजा नहीं निकला। प्रयास के विफल होने पर 15 अगस्त का दिन विभाजन के साथ स्वतंत्रता के लिए नियत किया गया।
15 अगस्त 1947 को राजधानी में हो रहे उत्सवों में भाग लेने से महात्मा गाँधी ने इंकार कर दिया था।उस समय वे कलकत्ता में थे जहां वे हिंदु-मुस्लिम दंगों की वजह से आहत हुए समाज की मरहम पट्टी करने में लगे थे। उन्होंने वहाँ भी न तो किसी कार्यक्रम में हिस्सा लिया, न ही कहीं झंडा फहराया। उन्होंने इतने दिन तक जिस स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था वह एक अकल्पनीय कीमत पर उन्हें मिली थी। उनका राष्ट्र विभाजित हो गया था। गाँधी जी उस दिन 24 घंटे के उपवास पर थे। सांप्रदायिक शांति स्थापित करने के लिए और स्थानीय आबादी पर अनशन के प्रभाव को देखकर कई लोगों द्वारा इसे एक चमत्कार के रूप में माना गया था।गाँधी जी पीड़ितों को सांत्वना देते हुए अस्पतालों और शरणार्थी शिविरों के चक्कर लगा रहे थे। उन्होंने कलकत्ता में मुसलमानों की सहायतार्थ सिखों, हिंदुओं का आह्वान किया। उन्होंने आह्वान किया कि वे एक-दूसरे के प्रति भाईचारे का हाथ बढ़ाएँ ।
महात्मा गाँधी और उनके सहयोगियों व प्रतिद्वंद्वियों, दोनों तरह के समकालीनों के लेखन और भाषण एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है भाषणों से हमें किसी व्यक्ति के सार्वजनिक विचारों को सुनने का मौका मिलता है जबकि उसके व्यक्तिगत पत्र हमें उसके निजी विचारों की झलक देते हैं। हात्मा गाँधी हरिजन नामक अपने अखबार में उन पत्रों को प्रकाशित करते थे जो उन्हें लोगों से मिलते थे। आत्मकथा, "माई एक्सपेरियंस विद ट्रुथ" गांधी के जीवन के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं । नेहरू ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान उन्हें लिखे गए पत्रों का एक संकलन तैयार किया और उसे ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स (पुराने पत्रों का पुलिंदा) के नाम से प्रकाशित किया।
भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति में महात्मा गाँधी जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नया रूप प्रदान किया ।
असहयोग आन्दोलन :- महात्मा गाँधी ने 20 अगस्त 1920 को अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन शुरू कर दिया । राजनीति के क्षेत्र में अहिंसा का अभिनव प्रयोग था उन्होंने भारतीय से अपील की वे ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गयी । उपाधियों, सरकारी पदों को त्याग दे उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा के लिए प्रयास किये ।
गाँधी जी के रचनात्मक कार्यक्रम :- गाँधी जी ने रचनात्मक कार्यक्रम बनाये ।
एक करोड़ रूपये का तिलक फंड स्थापित करना ।
एक करोड़ स्वयंसेवकों की भर्ती करना ।
20 लाख चरखों का वितरण करना ।
स्वदेशी माल खरीदने पर बल दिया ।
लोक अदालतों की स्थापना करना ।
नेहरु रिपोर्ट :- गाँधी जी ने सर्वमान्य विधान निर्माण करने में लगी पहले दल के नेता सुभाष चन्द्र बोस और दूसरे दल के नेता जवाहर लाल नेहरु के बीच गाँधी जी ने मेल काराने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया जिसको कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया ।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन :- गाँधी जी ने अपने कुछ साथियों के साथ नमक कानून तोड़कर सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ करने की सूचना 2 मार्च 1930 का एक पत्र लिखकर लार्ड इरविन को दी । 12 मार्च को महात्मा गाँधी डांडी में नमक कानून को तोड़ दिया ।
पूना पैक्ट :- पूना पैक्ट का अनुसार 26 सितम्बर 1932 को अम्बेडकर और गाँधी के बीच पूना पैक्ट हो गया । इस पैक्ट में दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था समाप्त कर दी। गयी केंद्रीय विधान मंडल में 18 प्रतिशत सीटे एवं प्रांतीय विधान मंडलों में 148 सीटे दलितों के लिए आरक्षित की गयी ।
भारत छोडो आन्दोलन :- 8 अगस्त 1942 को मुंबई में गाँधी जी के नेतृत्व में भारत छोडो प्रस्ताव शुरू किया ।
1)1945 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी। यह सरकार भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में थी। उसी समय वायसराय लॉर्ड वावेल ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों के बीच कई बैठकों का आयोजन किया।
2)1946 की शुरुआत में प्रांतीय विधान मंडलों के लिए नए सिरे से चुनाव कराए गए। सामान्य श्रेणी में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भारी बहुमत प्राप्त हुआ।
3)946 की गर्मियों में कैबिनेट मिशन भारत आया। इस मिशन ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को एक ऐसी संघीय व्यवस्था पर राज़ी करने का प्रयास किया कैबिनेट मिशन का यह प्रयास भी विफल रहा। वार्ता टूट जाने के बाद जिन्ना ने पाकिस्तान की स्थापना के लिए लीग की माँग के समर्थन में एक प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस का आह्वान किया। इसके लिए 16 अगस्त, 1946 का दिन तय किया गया था। उसी दिन कलकत्ता में खूनी संघर्ष शुरू हो गया।
4) फरवरी 1947 में वावेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को वायसराय नियुक्त किया गया। उन्होंने वार्ताओं के एक अंतिम दौर का आह्वान किया जिसका कोई नतीजा नहीं निकला। प्रयास के विफल होने पर 15 अगस्त का दिन विभाजन के साथ स्वतंत्रता के लिए नियत किया गया।
महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गए असहयोग आंदोलन के कार्यक्रमों एवं प्रगतिगांधीजी को रोलेट ऐक्ट, जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड, हण्टर समिति की रिपोर्ट व खिलाफत के प्रश्न ने अंग्रेजों का विरोधी बना दिया । फलस्वरूप वे सहयोगी से असहयोगी बन गये । सितंबर 1920 ई. में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन कलकत्ता में हुआ । इस अधिवेशन में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा । प्रस्ताव की स्वीकृति के साथ ही गांधी ने संपूर्ण देश का भ्रमण किया व आंदोलन का वातावरण तैयार कर लिया । दिसंबर 1920 ई. में कांग्रेस का नियमित अधिवेशन नागपुर में हुआ जहां इस प्रस्ताव की पुष्टि कर दी गई । असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम 1) सरकारी वैतनिक ,अवैतनिक पदों व उपाधियों का त्याग किया जाय । 2) सरकारी व अर्द्ध-सरकारी स्कूल व कालेजों का बहिष्कार किया जाए । 3) विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाय ।4) मेसापोटमिया के क्षेत्र में सैनिक, क्लर्क व मजदूर अपनी सेवाऐं देने से इंकार कर दे। 5) सरकारी समारोहों का बहिष्कार किया जाय । 6) स्वदेशी का प्रचार व उपयोग । 7) राष्ट्रीय स्कूल व कॉलेजों की स्थापना । 8) अस्पृश्यता का निवारण किया जाय । 9) हिन्दू मुस्लिम एकता को मजबूत किया जाए । 10) हाथ की कताई व बुनाई को प्रोत्साहित किया जाय । 1922 ई. तक असहयोग आंदोलन अपने चरम पर पहुँच गया था समस्त बड़े नेता जेल में बंद थे। फरवरी 1922 को चैरी-चैरी नामक स्थान पर निहत्थे प्रदर्शन कारियों पर किए लाठीचार्ज ने प्रदर्शन कारियों को उद्वेलित कर दिया व उन्होंने स्थानीय पुलिस चैकी को आग लगा दी । इस घटना में 22 पुलिस वाले जिंदा जलकर मर गए। आंदोलन का हिंसक रूप देखकर गाँधी जी ने आंदोलन को स्थगित कर दिया। विश्लेषण - गाँधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन समाप्त करने की अप्रत्याशित घोषणा ने समस्त नेताओं ने इसे गलत निर्णय करार दिया। लेकिन नेतृत्वविहीन आंदोलन अक्सर अनियंत्रित भीड़ की तरह होता है जिसके क्षणिक प्रभाव तो बड़ी तीव्रता लिए होते हैं पर दूरगामी प्रभाव विपरीत इसी बात को ध्यान रखकर गांधीजी ने आंदोलन को समाप्त घोषित कर दिया। हाँलाकि इससे गाँधीजी द्वारा एक वर्ष में स्वराज दिलाने का भरोसा टूट गया फिर भी इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़े हिला दी। सभी देशवासी एक नेतृत्व एक झंड़े के नीचे संगठित हो गये। उनमें राष्ट्रीयता की भावना का संचार हुआ। स्वदेशी की भावना ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार द्वारा ब्रिटिश अर्थ व्यवस्था को धक्का पहुँचाया।
महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गए असहयोग आंदोलन के कार्यक्रमों एवं प्रगतिगांधीजी को रोलेट ऐक्ट, जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड, हण्टर समिति की रिपोर्ट व खिलाफत के प्रश्न ने अंग्रेजों का विरोधी बना दिया । फलस्वरूप वे सहयोगी से असहयोगी बन गये । सितंबर 1920 ई. में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन कलकत्ता में हुआ । इस अधिवेशन में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा । प्रस्ताव की स्वीकृति के साथ ही गांधी ने संपूर्ण देश का भ्रमण किया व आंदोलन का वातावरण तैयार कर लिया । दिसंबर 1920 ई. में कांग्रेस का नियमित अधिवेशन नागपुर में हुआ जहां इस प्रस्ताव की पुष्टि कर दी गई । असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम 1) सरकारी वैतनिक ,अवैतनिक पदों व उपाधियों का त्याग किया जाय । 2) सरकारी व अर्द्ध-सरकारी स्कूल व कालेजों का बहिष्कार किया जाए । 3) विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाय ।4) मेसापोटमिया के क्षेत्र में सैनिक, क्लर्क व मजदूर अपनी सेवाऐं देने से इंकार कर दे। 5) सरकारी समारोहों का बहिष्कार किया जाय । 6) स्वदेशी का प्रचार व उपयोग । 7) राष्ट्रीय स्कूल व कॉलेजों की स्थापना । 8) अस्पृश्यता का निवारण किया जाय । 9) हिन्दू मुस्लिम एकता को मजबूत किया जाए । 10) हाथ की कताई व बुनाई को प्रोत्साहित किया जाय । 1922 ई. तक असहयोग आंदोलन अपने चरम पर पहुँच गया था समस्त बड़े नेता जेल में बंद थे। फरवरी 1922 को चैरी-चैरी नामक स्थान पर निहत्थे प्रदर्शन कारियों पर किए लाठीचार्ज ने प्रदर्शन कारियों को उद्वेलित कर दिया व उन्होंने स्थानीय पुलिस चैकी को आग लगा दी । इस घटना में 22 पुलिस वाले जिंदा जलकर मर गए। आंदोलन का हिंसक रूप देखकर गाँधी जी ने आंदोलन को स्थगित कर दिया। विश्लेषण - गाँधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन समाप्त करने की अप्रत्याशित घोषणा ने समस्त नेताओं ने इसे गलत निर्णय करार दिया। लेकिन नेतृत्वविहीन आंदोलन अक्सर अनियंत्रित भीड़ की तरह होता है जिसके क्षणिक प्रभाव तो बड़ी तीव्रता लिए होते हैं पर दूरगामी प्रभाव विपरीत इसी बात को ध्यान रखकर गांधीजी ने आंदोलन को समाप्त घोषित कर दिया। हाँलाकि इससे गाँधीजी द्वारा एक वर्ष में स्वराज दिलाने का भरोसा टूट गया फिर भी इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़े हिला दी। सभी देशवासी एक नेतृत्व एक झंड़े के नीचे संगठित हो गये। उनमें राष्ट्रीयता की भावना का संचार हुआ। स्वदेशी की भावना ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार द्वारा ब्रिटिश अर्थ व्यवस्था को धक्का पहुँचाया।
महात्मा गाँधी ने घोषणा की कि वे ब्रिटिश भारत के सर्वाधिक घृणित कानूनों में से एक, जिसने नमक के उत्पादन और विक्रय पर राज्य को एकाधिकार दे दिया है, को तोड़ने के लिए एक यात्रा का नेतृत्व करेंगे। नमक एकाधिकार के जिस मुद्दे का उन्होंने चयन किया था वह गाँधी जी की कुशल समझदारी का एक अन्य उदाहरण था। प्रत्येक भारतीय घर में नमक का प्रयोग अपरिहार्य था लेकिन इसके बावजूद उन्हें घरेलू प्रयोग के लिए भी नमक बनाने से रोका गया और इस तरह उन्हें दुकानों से ऊँचे दाम पर नमक खरीदने के लिए बाध्य किया गया। नमक पर राज्य का एकाधिपत्य बहुत अलोकप्रिय था। इसी को निशाना बनाते हुए गाँधी जी अंग्रेजी शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष को संगठित करने की सोच रहे थे।
नमक कर के बारे में महात्मा गाँधी ने लिखा है:प्रतिदिन प्राप्त होने वाली सूचनाओं से पता चलता है कि कैसे अन्यायपूर्ण तरीके से नमक कर को तैयार किया गया है। बिना कर (जो कभी-कभी नमक के मूल्य का चौदह गुना तक होता था) अदा किए गए नमक के प्रयोग को रोकने के लिए सरकार उस नमक को, जिससे वह लाभ पर नहीं बेच पाती थी, नष्ट कर देती थी। अतः यह राष्ट्र की अत्यधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता पर कर लगाती है, यह जनता को इसके उत्पादन से रोकती है और प्रकृति ने जिसे बिना किसी श्रम के उत्पादित किया है उसे नष्ट कर देती है। अतः किसी भी वजह से किसी चीज़ को स्वयं प्रयोग न कर पाने तथा अन्य को भी उसका प्रयोग न करने देने तथा ऐसे में उस चीज़ को नष्ट कर देने की इस अन्यायपूर्ण नीति को किसी भी विशेषण द्वारा नहीं बताया जा सकता है। विभिन्न स्त्रोतों से मैं भारत के सभी भागों में इस राष्ट्र संपति को बेलगाम ढंग से नष्ट किए जाने की कहानियाँ सुन रहा हूँ। बताया गया है टनों न सही पर कई मन नमक कोंकण तट पर नष्ट कर दिया गया । दाण्डी से भी इस तरह की बातें पता चली हैं। जहाँ कहीं भी ऐसे क्षेत्रों के आस-पास रहने वाले लोगों द्वारा अपने व्यक्तिगत प्रयोग हेतु प्राकृतिक नमक उठा ले जाने की संभावना दिखती है वहाँ तुरंत अधिकारी नियुक्त कर दिए जाते हैं जिनका एकमात्र कार्य विनाश करना होता है। इस प्रकार बहुमूल्य राष्ट्रीय संपदा को राष्ट्रीय खर्चे से ही नष्ट किया जाता है और लोगों के मुँह से नमक छीन लिया जाता है। नमक एकाधिकार एक तरह से चौतरफा अभिशाप है। यह लोगों को बहुमूल्य सुलभ ग्राम उद्योग से वंचित करता है, प्रकृति द्वारा बहुतायत में उत्पादित संपदा का यह अतिशय विनाश करता है। इस विनाश का मतलब ही है और अधिक राष्ट्रीय खर्च। चौथा और इस मूर्खता का चरमोत्कर्ष भूखे लोगों से हजार प्रतिशत से अधिक की उगाही है। सामान्य जन की उदासीनता की वजह से ही लम्बे समय से यह कर अस्तित्व में बना रहा है। आज जनता पर्याप्त रूप से जग चुकी है अतः इस कर को समाप्त करना होगा। कितनी जल्दी इसे खत्म कर दिया जाएगा यह लोगों की क्षमता पर निर्भर करता है।
असहयोग आन्दोलन की तरह अधिकृत रूप से स्वीकृत राष्ट्रीय अभियान के अलावा भी विरोध की असंख्य धाराएँ थीं। देश के विशाल भाग में किसानों ने दमनकारी औपनिवेशिक वन कानूनों का उल्लंघन किया जिसके कारण वे और उनके मवेशी उन्हीं जंगलों में नहीं जा सकते थे जहाँ एक जमाने में वे बेरोकटोक घूमते थे। कुछ कस्बों में फैक्ट्री कामगार हड़ताल पर चले गए, वकीलों ने ब्रिटिश अदालतों का बहिष्कार कर दिया और विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षा संस्थानों में पढ़ने से इनकार कर दिया। 1920-22 की तरह इस बार भी गाँधी जी के आह्वान ने तमाम भारतीय वर्गों को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध अपना असंतोष व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया। जवाब में सरकार असंतुष्टों को हिरासत में लेने लगी। नमक सत्याग्रह के सिलसिले में लगभग 60,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार होने वालों में गाँधी जी भी थे।
6 जनवरी 1930 को लाहौर में ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाए जाने के तुरंत बाद महात्मा गाँधी ने घोषणा की कि वे ब्रिटिश भारत के सर्वाधिक घृणित कानूनों में से एक, जिसने नमक के उत्पादन और विक्रय पर राज्य को एकाधिकार दे दिया है, को तोड़ने के लिए एक यात्रा का नेतृत्व करेंगे। नमक एकाधिकार के जिस मुद्दे का उन्होंने चयन किया था वह गाँधी जी की कुशल समझदारी का एक अन्य उदाहरण था। प्रत्येक भारतीय घर में नमक का प्रयोग अपरिहार्य था लेकिन इसके बावजूद उन्हें घरेलू प्रयोग के लिए भी नमक बनाने से रोका गया और इस तरह उन्हें दुकानों से ऊँचे दाम पर नमक खरीदने के लिए बाध्य किया गया। नमक पर राज्य का एकाधिपत्य बहुत अलोकप्रिय था। इसी को निशाना बनाते हुए गाँधी जी अंग्रेजी शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष को संगठित करने की सोच रहे थे।
अधिकांश भारतीयों को गाँधी जी की इस चुनौती का महत्व समझ में आ गया था किन्तु अंग्रेजी राज को नहीं। हालाँकि गाँधी जी ने अपनी ‘नमक यात्रा’ की पूर्व सूचना वाइसराय लार्ड इरविन को दे दी थी किन्तु इरविन उनकी इस कार्रवाही के महत्व को न समझ सके। 12 मार्च 1930 को गाँधी जी ने साबरमती में अपने आश्रम से समुद्र की ओर चलना शुरू किया। तीन हफ्तों बाद वे अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचे। वहाँ उन्होने मुट्ठी भर नमक बनाकर स्वयं को कानून की निगाह में अपराधी बना दिया। इसी बीच देश के अन्य भागों में समान्तर नमक यात्राएँ अयोजित की गईं।
नमक यात्रा कम से कम तीन कारणों से उल्लेखनीय थी। पहला, यही वह घटना थी जिसके चलते महात्मा गाँधी दुनिया की नजर में आए। इस यात्रा को यूरोप और अमेरिकी प्रेस ने व्यापक कवरेज दी। अमेरिकी समाचार पत्रिका टाइम को गाँधी जी की कदकाठी पर हँसी आती थी। पत्रिका ने उनके तकिए जैसे शरीर और मकड़ी जैसे पैर का ख़ूब मजाक उड़ाया था। इस यात्रा के बारे में अपनी पहली रिपोर्ट में ही टाइम ने नमक यात्रा के मंजिल तक पहुँचने पर अपनी गहरी शंका व्यक्त कर दी थी। उसने दावा किया कि दूसरे दिन पैदल चलने के बाद गाँधी जी जमीन पर पसर गए थे। पत्रिका को इस बात पर विश्वास नहीं था कि इस मरियल साधु के शरीर में और आगे जाने की ताकत बची है। लेकिन एक हफ्ते में ही पत्रिका की सोच बदल गई। टाइम ने लिखा कि इस यात्रा को जो भारी जनसमर्थन मिल रहा है उसने अंग्रेज शासकों को गहरे तौर पर बेचैन कर दिया है। अब वे भी गाँधी जी को ऐसा साधु और राजनेता कह सलामी देने लगे हैं जो ईसाई धर्मावलंबियों के खिलाफ ईसाई तरीकों का ही हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।
दूसरे, यह पहली राष्ट्रवादी गतिविधि थी जिसमें औरतों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। समाजवादी कार्यकर्ता कमलादेवी चट्टोंपाध्याय ने गाँधी जी को समझाया कि वे अपने आंदोलनों को पुरुषों तक ही सीमित न रखें। कमलादेवी खुद उन असंख्य औरतों में से एक थीं जिन्होंने नमक या शराब कानूनों का उल्लंघन करते हुए सामूहिक गिरफ्तारी दी थी। तीसरा और संभवतः सबसे महत्वपूर्ण कारण यह था कि नमक यात्रा के कारण ही अंग्रेजों को यह अहसास हुआ था कि अब उनका राज बहुत दिन नहीं टिक सकेगा और उन्हें भारतीयों को भी सत्ता में हिस्सा देना पड़ेगा।
क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का फैसला लिया। अगस्त 1942 में शुरू हुए इस आंदोलन को अंग्रेजों भारत छोड़ो का नाम दिया गया था। हालांकि गाँधी जी को फौरन गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन देश भर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फोड़ की कार्रवाइयों के जरिए आंदोलन चलाते रहे। कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी सदस्य भूमिगत प्रतिरोध गतिविधियों में सबसे ज्यादा सक्रिय थे। पश्चिम में सतारा और पूर्व में मेदिनीपुर जैसे कई जिलों में स्वतंत्र सरकार (प्रतिसरकार) की स्थापना कर दी गई थी। अंग्रेजों ने आंदोलन के प्रति काफी सख्त रवैया अपनाया फिर भी इस विद्रोह को दबाने में सरकार को साल भर से ज्यादा समय लग गया। भारत छोड़ो आंदोलन सही मायने में एक जनांदोलन था जिसमें लाखों आम हिंदुस्तानी शामिल थे। इस आंदोलन ने युवाओं को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने अपने कॉलेज छोड़कर जेल का रास्ता अपनाया। जिस दौरान कांग्रेस के नेता जेल में थे उसी समय जिन्ना तथा मुस्लिम लीग वेफ उनवेफ साथी अपना प्रभाव क्षेत्र फैलाने में लगे थे। इन्हीं सालों में लीग को पंजाब और सिंध में अपनी पहचान बनाने का मौका मिला जहाँ अभी तक उसका कोई खास वजूद नहीं था। जून 1944 में जब विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था तो गाँधी जी को रिहा कर दिया गया। जेल से निकलने के बाद उन्होंने कांग्रेस और लीग के बीच फासले को पाटने के लिए जिन्ना के साथ कई बार बात की। 1945 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी। यह सरकार भारतीय स्वतंत्राता के पक्ष में थी। उसी समय वायसराय लॉर्ड वावेल ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों के बीच कई बैठकों का आयोजन किया। 1946 की शुरुआत में प्रांतीय विधान मंडलों के लिए नए सिरे से चुनाव कराए गए। सामान्य श्रेणी में कांग्रेस को भारी सफलता मिली।
मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भारी बहुमत प्राप्त हुआ। राजनीतिक ध्रुवीकरण पूरा हो चुका था। 1946 की गर्मियों में कैबिनेट मिशन भारत आया। इस मिशन ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को एक ऐसी संघीय व्यवस्था पर राज़ी करने का प्रयास किया जिसमें भारत के भीतर विभिन्न प्रांतों को सीमित स्वायत्तता दी जा सकती थी। कैबिनेट मिशन का यह प्रयास भी विफल रहा। वार्ता टूट जाने के बाद जिन्ना ने पाकिस्तान की स्थापना के लिए लीग की माँग के समर्थन में एक प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस का आह्वान किया। इसके लिए 16 अगस्त, 1946 का दिन तय किया गया था। उसी दिन कलकत्ता में खूनी संघर्ष शुरू हो गया। यह हिंसा कलकत्ता से शुरू होकर ग्रामीण बंगाल, बिहार और संयुक्त प्रांत व पंजाब तक फैल गई। वुफछ स्थानों पर मुसलमानों को तो कुछ अन्य स्थानों पर हिंदुओं को निशाना बनाया गया।
फरवरी 1947 में वावेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को वायसराय नियुक्त किया गया। उन्होंने वार्ताओं के एक अंतिम दौर का आह्वान किया। जब सुलह के लिए उनका यह प्रयास भी विफल हो गया तो उन्होंने ऐलान कर दिया कि ब्रिटिश भारत को स्वतंत्राता दे दी जाएगी लेकिन उसका विभाजन भी होगा। औपचारिक सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त का दिन नियत किया गया।
हमारे पास बहुत सारे स्त्रोत उपलब्ध हैं जिनके जरिए हम गाँधी जी के गांधीजी के विषय में राजनीतिक एवं व्यक्तिगत जानकारी की पुनर्रचना कर सकते हैं। कुछ महत्वपूर्ण स्त्रोत इस प्रकार हैं -
1)समकालीन साहित्य:
समकालीन साहित्य से हमें गांधीजी राजनीतिक जीवन एवं व्यक्तित्व की जानकारी प्राप्त होती है। प्रसिद्ध विद्वानों द्वारा गांधीजी पर अच्छी तरह से छानबीन कर लिखी गई पुस्तकें उपलब्द्ध हैं। इन प्रसिद्ध विद्वानों द्वारा गांधीजी एवं उनके सहयोगियों एवं राजनीतिक विरोधियों सहित उनके समकालीनों द्वारा रचित लेखनों एवं भाषणों का अध्ययन किया गया था।
इन लेखनों में हमें इस बात का खयाल रखना चाहिए कि किस चीज को जनता के लिए लिखा गया था और किस चीज को अन्य उद्देश्यों के लिए लिखा गया था। बहुत सारे पत्र व्यक्तियों को लिखे जाते हैं इसलिए वे व्यक्तिगत पत्र होते हैं लेकिन कुछ हद तक वे जनता के लिए भी होते हैं। उन पत्रों की भाषा इस अहसास से भी तय होती है कि संभव है एक दिन उन्हें प्रकाशित कर दिया जाएगा।
इसलिए, समकालीन साहित्य गांधी जी के जीवन के बारे में बहुत से तथ्यों को उजागर करते हैं। हमें इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि एक लेखक का लेखन प्राप्त साक्ष्यों पर आधारित होता है और हो सकता है साक्ष्यों की उपलब्धता से लेखक का लेखन प्रभावित रहा होगा।
2)गांधी की आत्मकथा:
आत्मकथाए भी हमें उस अतीत का ब्यारा देती हैं जो मानवीय विवरणों के हिसाब से काफी समृद्ध होता है। परंतु यहा भी हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम आत्मकथाओं को किस तरह पढ़ते हैं और उनकी कैसे व्याख्या करते हैं। आत्मकथा लिखना अपनी तसवीर गढ़ने का एक तरीका है। फलस्वरूप, इन विवरणों को पढ़ते हुए हमें वह देखने का प्रयास करना चाहिए जो लेखक हमें नहीं दिखाना चाहता। हमें उन चुप्पियों का कारण समझना चाहिए-इच्छित या अनिच्छित विस्मृति के उन कृत्यों को समझना चाहिए।
हमें उन व्यक्तिगत कारणों को समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि क्यों वह कुछ तथ्यों को छुपाना चाहता है और क्यों अन्य तथ्यों को प्रकाशित करना चाहता है। दूसरे शब्दों में, एक विद्वान जिस दृष्टिकोण से आत्मकथा को पढ़ने का प्रयास करता है उसे समझने हेतु पाठक को एक तटस्थ दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है ।
3) सरकारी रिकॉर्ड: पुलिस की डायरी:
औपनिवेशिक शासक ऐसे तत्वों पर हमेशा कड़ी नजर रखते थे जिन्हें वे अपने विरुद्ध मानते थे। इस लिहाज से सरकारी रिकोर्ड्स भी हमारे अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। उस समय पुलिसकर्मियों तथा अन्य अधिकारियों द्वारा लिखे गए पत्र तथा रिपोर्टें गोपनीय होती थीं, लेकिन अब ये दस्तावेज अभिलेखागारों में उपलब्ध हैं जिन्हें कोई भी देख सकता है।
ये रिकॉर्ड आसानी से महात्मा गांधी के संबंध में सरकार के रुख के बारे में सूचना प्रदान कर सकते हैं।
4) समाचार पत्र और पत्रिकाएँ: एक महत्वपूर्ण स्रोत:
अंग्रेजी तथा विभिन्न भारतीय भाषाओं में छपने वाले समकालीन अख़बार भी एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं जो महात्मा गाँधी की गतिविधियों पर नजर रखते थे और उनके बारे में ख़बरें छापते थे। ये अख़बार इस बात का भी संकेत देते हैं कि आम भारतीय उनके बारे में क्या सोचते थे। लेकिन अख़बारी ब्योरों को पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं माना जाना चाहिए। ये अख़बार प्रकाशित करने वाले ऐसे लोग थे जिनकी अपनी राजनीतिक सोच और विश्व दृष्टिकोण था। उनके विचारों से ही यह तय होता था कि क्या प्रकाशित किया जाएगा और घटनाओं की रिपोर्टिंग किस तरह की जाएगी।
ऐसी बहुत सी पत्रिकाएँ भी थीं जिंहोने गांधी जी के बारे में तथ्यों को प्रकाशित किया। गांधीजी ने नियमित रूप से अपनी पत्रिका हरिजन, में भारत में कार्यस्थिति पर अपने स्वयं के विचार प्रकाशित किए। हालांकि, ये उनके व्यक्तिगत विचार थे जो समाज के बारे में उनकी समझ से निर्मित हुए थे और इन्हें ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
A. भारत छोड़ो आंदोलन
B. मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग की जीत
C. कैबिनेट मिशन की विफलता
D. द्वितीय विश्वयुद्ध
कांग्रेस और मुस्लिम लीग में कैबिनेट मिशन प्रस्तावों की अस्वीकृति के बाद, विभाजन लगभग अपरिहार्य हो गया।
A. 1900
B. 1905
C. 1910
D. 1915
हिंदू महासभा हिंदू राष्ट्रवादी संगठन था।
A. रहमान अली
B. चौधरी रहमत अली
C. रहमान-उर-अली
D. रहमत खान
१९३३ में चौधरी रहमत अली ने 'पाक-स्टेन',बनाया था
A. ढाका।
B. दिल्ली।
C. बंबई।
D. कोलकाता।
मुस्लिम लीग नवाब सलिमुल्ला खान द्वारा स्थापित किया गया था।
A. चौधरी रहमत अली द्वारा
B. एम ए जिन्ना द्वारा
C. मौलाना आजाद
D. मोहम्मद इकबाल।
१९४० में लाहौर सेशन में मुसलिम लीग की अध्यक्षिका जिन्नाह ने की थी
A. हिंदू महासभा
B. संघी पार्टी
C. मुस्लिम लीग
D. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
द्विराष्ट्र सिद्धांत' भारत और पाकिस्तान के गठन का आधार बना ।
A. 1920 में
B. 1921 में
C. 1922 में
D. 1923 में
ताब्लिध (प्रचार) और तंजीम 1923 के बाद, सांप्रदायिक मुसलमानों द्वारा शुरू किये गये
A. 1904 में
B. 1906 में
C. 1908में
D. 1910में
मुस्लिम लीग को ढाका में १९०६ में नवाब सलीमुल्लाह द्वारा स्थापित किया गया था
भूगोलभूगोल को अंग्रेजी भाषा में ज्योग्राफी कहते हैं ज्यो का अर्थ है पृथ्वी और ग्राफी का अर्थ है वर्णन। हैटनर के अनुसार -“भूगोल एक क्षेत्र विवरण विज्ञान है। “स्टेम्प के अनुसार -“भूगोल पृथ्वी को मानव का ग्रह मानकर उसके भौतिक पर्यावरण एवं मानवीय प्रजाति के अध्ययन की विधा है। “अर्थात् पृथ्वी तल की विभिन्नताओं, परिवर्तनशीलता स्थानीय सम्बन्धों और दृश्य भूमि के अध्ययन को भूगोल में सम्मिलित किया गया है । भूगोल की विषय - वस्तु अथवा क्षेत्र - भूगोल का क्षेत्र व विषय सामग्री विकसित होती गई है और इसके क्षेत्र को सीमा बदलती रही हैं । संक्षेप में प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक भूगोल के अध्ययन क्षेत्रों को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है । 1) प्राचीन काल में भूगोल का क्षेत्र तथा सामग्री-प्राचीन काल में मानव का पृथ्वी से अत्यंत निकट सम्बन्ध था अतः उस समय केवल पृथ्वी ही भूगोल का विषय क्षेत्र था। 2) मध्यकाल में भूगोल का क्षेत्र तथा सामग्री - 16वीं शताब्दी में जर्मन विद्धान वारेनियस ने सबसे पहले भूगोल को एक नया रूप दिया । 3) वर्तमान काल में भूगोल का क्षेत्र तथा सामग्री - इस युग में भूगोल के अध्ययन की नयी-नयी विधियों का विकास हुआ । भूगोल को अनेक शाखाओं में बाँटकर उनका अलग-अलग विवरण प्रस्तुत किया गया । यह शाखाएँ है भौतिक-भूगोल, मानव भूगोल, वाणिज्य भूगोल, प्रादेशिक भूगोल आदि । को अंगे्रजी भाषा में ळमवहतंचील कहते है ळमव का अर्थ है पृथ्वी और हतंचील का अर्थ है वर्णन। हैटनर के अनुसार -“भूगोल एक क्षेत्र विवरण विज्ञान है। “स्टेम्प के अनुसार -“भूगोल पृथ्वी को मानव का ग्रह मानकर उसके भौतिक पर्यावरण एवं मानवीय प्रजाति के अध्ययन की विधा है। “अर्थात् प्थ्वी तल की विभिन्नताओं, परिवर्तनशीलता स्थानीय सम्बन्धों और दृश्य भूमि के अध्ययन को भूगोल में सम्मिलित किया गया है । भूगोल की विषय - वस्तु अथवा क्षेत्र - भूगोल का क्षेत्र व विषय सामग्री विकसित होती गई है और इसके क्षेत्र को सीमा बदलती रही हैं । संक्षेप में प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक भूगोल के अध्ययन क्षेत्रों को निम्नलिखित भागों मेे ंबाँटा जा सकता है । 1) प्राचीन काल में भूगोल का क्षेत्र तथा सामग्री-प्राचीन काल में मानव का पृथ्वी से अत्यंत निकट सम्बन्ध था अतः उस समय केवल पृथ्वी ही भूगोल का विषय क्षेत्र था । 2) मध्यकाल में भूगोल का क्षेत्र तथा सामग्री - 16वीं शताब्दी में जर्मन विद्धान वारेनियस ने सबसे पहले भूगोल को एक नया रूप दिया । 3) वर्तमान काल में भूगोल का क्षेत्र तथा सामग्री - इस युग में भूगोल के अध्ययन की नयी-नयी विधियों का विकास हुआ । भूगोल को अनेक शाखाओं में बाँटकर उनका अलग-अलग विवरण प्रस्तुत किया गया । यह शाखाएँ है भौतिक-भूगोल, मानव भूगोल, वाणिज्य भूगोल, प्रादेशिक भूगोल आदि ।
A.
प्रति वर्ग किमी० 120 व्यक्ति
B.
प्रति वर्ग किमी० 105 व्यक्ति
C.
प्रति वर्ग किमी० 104 व्यक्ति
D.
प्रति वर्ग किमी० 102 व्यक्ति
छोटे क्षेत्र का घनत्व अधिक होने के कारण कुल जनसंख्या कम है|
A.
प्रति वर्ग किमी० 289 व्यक्ति
B.
प्रति वर्ग किमी० 327 व्यक्ति
C.
प्रति वर्ग किमी० 382 व्यक्ति
D.
प्रति वर्ग किमी० 325 व्यक्ति
भारत की जनगणना 2011 के अनुसार भारत की में जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति है, जबकि 2001 में यह 325 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था l
A.
प्रति वर्ग किमी० 112 व्यक्ति
B.
प्रति वर्ग किमी० 25 व्यक्ति
C.
प्रति वर्ग किमी० 28 व्यक्ति
D.
प्रति वर्ग किमी० 85 व्यक्ति
संयुक्त राज्य अमेरिका जनसंख्या के मामले में तीसरे स्थान पर है लेकिन बहुत बड़ा क्षेत्र होने के कारण जनसंख्या घनत्व बहुत कम है|
A.
जल
B.
भू-आकृतियाँ
C.
जलवायु
D.
बस्तियां
बस्तियां, सांस्कृतिक पर्यावरण का एक भाग हैं|
A.
आखेट एवं भोजन संग्रह
B.
कृषि क्रांति
C.
औद्योगिक क्रांति
D.
हरित क्रांति
हरित क्रांति सन् 1940-60 के मध्य कृषि क्षेत्र में हुए शोध विकास, तकनीकि परिवर्तन एवं अन्य कदमों की श्रृंखला को संदर्भित करता है जिसके परिणाम स्वरूप पूरे विश्व में कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
A.
42 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी०
B.
48 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी०
C.
43 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी०
D.
52 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी०