A.
प्राथमिक
से
विनिर्माण
क्षेत्र की
ओर
B. कृषि से सेवा क्षेत्र की ओर
C. सेवा से कृषि क्षेत्र की ओर
D. प्राथमिक से द्वितीयक क्षेत्र की ओर
भारत और पाकिस्तान में भारत और पाकिस्तान में विकास एवं रोजगार प्रदान करने के क्षेत्र में सेवा क्षेत्रक एक प्रमुख क्षेत्रक के रूप में उभर रहा है।
A.
भारत
B.
पाकिस्तान
C.
चीन
D.
अफगानिस्तान
जीवन प्रत्याशा का अर्थ है एक नवजात द्वारा जिए जाने वाले जीवन के अनुमानित वर्ष। यह वर्ष 2013 के अनुसार चीन में 71.6 वर्ष के साथ सबसे अधिक है।
A.
भारत
B. चीन
C. पकिस्तान
D. दक्षिण आफ्रिका
इन देशों में सबसे कम जनसँख्या पाकिस्तान की है। पाकिस्तान की जनसंख्या भारत और चीन का दसवां हिस्सा है।
1990 के दशक में, पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता के कारण अर्थव्यवस्था में बहुत ही तेजी से गिरावट आई ।
पाकिस्तान और भारत दोनों ही अपनी प्रतिव्यक्ति आय को दोगुना करने में सफल रहे हैं। दोनों ही देशों में गरीबी कम हुई है।
कुछ क्षेत्रीय और आर्थिक समूहीकरण हैं दक्षेस, यूरोपीय संघ, आसियान, जी8, जी 20 आदि।
चीन की जनसंख्या लगभग 1.3 बिलियन है, जो विश्व की जनसंख्या का लगभग 20 प्रतिशत है। इसके बावजूद चीन में जनसंख्या घनत्व काफी कम है क्योंकि यह चीन में इसके बड़े भूभाग के कारण अपेक्षाकृत रूप से काफी कम है, यह वहां पर प्रति वर्गकिलोमीटर 145 व्यक्ति हैं।
ग्रेट लीप फारवर्ड चीन में वृहद स्तर पर औद्योगीकरण करने के लिए नीति थी।
भारत, पकिस्तान और चीन मानव विकास सूचकांक 2013 में क्रमश: 135, 146 और 91 स्थान पर थे।
नगरीकरण से अभिप्राय वैश्विक परिवर्तनों के कारण शहरी क्षेत्रों का विस्तार से होता है।
वर्ष 2013 में 53 प्रतिशत चीनी नागरिक षहरी क्षेत्रों में निवास करते थे । 32 प्रतिशत भारतीय जनसंख्या शहरों में निवास करती है जो पाकिस्तान की शहरी जनसंख्या के अनुपात के लगभग बराबर थे अर्थात 38 प्रतिशत।
चीन की तुलना में भारत और पाकिस्तान में नगरीकरण की गति बहुत ही धीमी थे।
स्वंतत्रता संकेतक को मानव विकास सूचकांक के साथ मानव कल्याण के साथ संज्ञान में लिया जाना चाहिए। स्वतंत्रता संकेतकों से अर्थ है सामाजिक और राजनीतिक निर्णय लेने में जनता की प्रतिभागिता।
मानव विकास सूचकांक जीवन की गुणवत्ता के आधार पर विविध देशों के आर्थिक विकास को मापने के लिए एक संगठित सूचकांक है | जीवन प्रत्याशा, शिक्षा और प्रति व्यक्ति आय इसके प्रमुख उपागम है |
संयुक्त राज्य विकास मानव विकास सूचकांक तैयार करता है।
इसके कारण इस प्रकार हैं –
1. ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च आय के अवसर कम होते हैं|
2. अधिकांश व्यक्ति स्कूल, महाविद्यालय या किसी प्रशिक्षण संस्थान में नहीं जा पाते।
गरीबी के कारण गावं के लोगों कों कोई ना कोई काम करना पड़ता है|
अल्पबेरोजगारी वह स्तिथि है जिसमे लोग नौकरी तो कर रहे होते हैं लेकिन वे अपनी इच्छा या क्षमता से कम समय के लिए काम पाते हैं या वे अपनी योग्यता से कम स्तर का काम कर रहे होते हैं।
ऐसे लोगों को पूर्ण रूप से रोजगार दिए जाने पर उनकी आय एवं उत्पादकता में वृद्धि होगी| इससे उनके जीवन स्तर में वृद्धि होगी और वे मानसिक तौर पे सन्तुष्ट भी होंगे| साथ ही उत्पादन में वृद्धि होने से देश की अर्थिकव्यवस्था विकसित होगी|
खुली बेरोजगारी एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति जो काम करने में सक्षम और तैयार है, उसे एक प्रचलित मजदूरी दर पर काम करने का अवसर नहीं मिलता है। मान लीजिये कि 50 व्यक्ति काम करने के लिए तैयार हैं, लेकिन केवल 30 व्यक्तियों को ही काम मिल पाया हैं। इस प्रकार खुली बेरोजगारी के संख्या 20 है।
प्रच्छन्न बेरोजगारी ऐसी स्थिति होती है जिसमे किसी काम में आवश्यकता से अधिक श्रमिक कार्यरत होते हैं| ऐसी अवस्था में कुछ कार्यकर्ताओं को हटा देने पर भी कुल उत्पादन प्रभावित नहीं होता। उदाहरण के लिए –
· मान लीजिए 6 किसान एक खेत में कार्य करते हैं।
· वे साथ मिलकर, साल में 10 क्विंटल गेहूँ का उत्पादन कर लेते हैं।
अब हम इस गतिविधि से 2 किसानों को हटा देते हैं। अगर फिर भी एक साल की अवधि में अन्य बचे 4 किसान 10 क्विंटल गेहूँ का उत्पादन करने में सक्षम हैं तो इसका अर्थ यह है कि यहाँ प्रच्छन्न बेरोजगारी मौजूद है|
भारत में बेरोजगारी की स्थिति की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
1. भारत में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी बहुत अधिक है|
2. महिलाओं के लिए बेरोजगारी की दर पुरुषों की तुलना में अधिक है।
3. शहरी क्षेत्रों में महिला श्रम दर केवल 15% है जबकि ग्रामीण क्षेत्रो में यह 25% है। क्योंकि प्रायः शहरों में पुरुषों की आय गांव की तुलना में अधिक होती है, इसलिए शहरी महिलाओं को श्रम करने से निरुत्साहित किया जाता।
4. अल्परोजगार की स्थिति महिला श्रमिकों में अधिक है।
5. ग्रामीण क्षेत्र में बहुत से लोग खेतों में उत्पादन में कुछ योगदान दिए बिना ही काम करते हैं।
6. शिक्षितों में बेरोजगारी बहुत अधिक है क्योंकि बहरत में शिक्षितों के लिए और कुशल श्रमिकों के लिए रोजगार अवसर कमी हैं। जबकि अकुशल श्रमिकों को बहुत ही आसानी से नौकरी मिल जाती है।
श्रम बल उन व्यक्तियों की संख्या है जो वर्तमान मजदूरी दर पर कार्य करने योग्य हैं और कार्य करने के इच्छुक भी हैं। इसका अर्थ है, श्रम बल में जनसंख्या के कार्यरत एवं बेरोजगार, दोनों प्रकार के व्यक्ति सम्मिलित है। कार्यबल में वे व्यक्ति सम्मिलित होते हैं जो किसी ना किसी आर्थिक क्रिया में संलग्न हों जैसे वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन|
दूसरे शब्दों में रोजगारकृत श्रम बल को कार्यबल के रूप में जाना जाता है। विद्यार्थी, गृहणियों और बच्चों को श्रमबल में नहीं गिना जाता है।
अत: अगर हम श्रम बल में से काम कर रहे श्रमिकों की संख्या घटा दें तो हामी बेरोजगार व्यक्तियों की संख्या का पता चलेगा|
निम्नलिखित सूत्र से बेरोजगारी का पता लगाया जा सकता है:
बेरोजगारी = श्रम बल की संख्या – कार्यबल की संख्या
भारत में दो प्रकार के श्रम हैं। एक तरफ वे श्रमिक हैं जिन्हें कम वेतन मिलता है और उन्हें नियमित कार्य भी नहीं मिलता है। और दूसरी तरफ वे श्रमिक हैं जिन्हें नियमित रूप से कार्य मिल रहा है और पर्याप्त वेतन भी मिलता है। अत: कार्यबल को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है;(क)- औपचारिक कार्यबल और (ख)-अनौपचारिक कार्यबल। वे सभी श्रमिक जो सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में और निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में कार्य कर रहे हैं और जिनमें दस से अधिक श्रमिक कार्यरत हों, उन्हें औपचारिक श्रमिक कहा जाएगा| इन श्रमिकों सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लाभ मिलते हैं| वे सभी प्रतिष्ठान जों श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लाभ नहीं देते, अनौपचारिक क्षेत्रक के अन्दर वर्गीकृत होते हैं| अनौपचारिक क्षेत्रक के प्रतिष्ठानों और उनके श्रमिकों की आय नियमित नहीं होती| उन्हें सरकार से किसी प्रकार का संरक्षण और नियमन नहीं मिलता। इस क्षेत्रक में कार्यरत श्रमिकों को बिना क्षति पूर्ति के ही काम से निकाल दिया जाता है| अनौपचारिक क्षेत्र में भारी संख्या में किसान और लघु उपक्रमों के स्वामी सम्मिलित हैं, जिनके पास नियुक्त श्रमिक नहीं होते हैं।
यह माना गया था कि जैसे जैसे देश की अर्थव्यवस्था विकसित होगी, अधिकाधिक श्रमिक औपचारिक क्षेत्रक में सम्मलित होते जाएगे। लेकिन वर्ष 2009 से 2012 तक भी केवल 6.34% श्रमिक ही औपचारिक क्षेत्रक में काम करते पाए गए| हालांकि अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रयासों के आग्रह के चलते, भारत सरकार ने अनौपचारिक क्षेत्र का आधुनिकीकरण और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा उपायों के प्रावधानों को आरम्भ किया है।
किसी भी अर्थव्यवस्था को अर्थशास्त्री तीन प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित करते हैं। ये हैं: (क) प्राथमिक क्षेत्र (ख) द्वितीयक क्षेत्र और (ग) तृतीयक क्षेत्र।प्राथमिक क्षेत्रक में कृषि, खनन और उत्खनन जैसे औद्योगिक वर्ग सम्मलित हैं| द्वितीयक क्षेत्रक में विनिर्माण, विद्युत, गैस एवं जलापूर्ति और निर्माण कार्य जैसे औद्योगिक वर्ग सम्मलित हैं| सेवा क्षेत्रक में वाणिज्य, परिवहन और भंडारण तथा सेवाएँ जैसे औद्योगिक वर्ग सम्मलित हैं।
निम्नलिखित तालिका वर्ष 2011-12 के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में कामकाजी व्यक्तियों के वितरण के प्रतिशत को प्रदर्शित करती है:
|
औद्योगिक श्रेणी |
आवास का स्थान |
लिंग |
योग |
||
|
ग्रामीण |
शहरी |
पुरूष |
महिला |
||
|
प्राथमिक क्षेत्र द्वितीयक क्षेत्र तृतीयक क्षेत्र |
66.6 16.0 17.4 |
9.0 31.0 60.0 |
43.6 25.9 30.5 |
62.8 20.0 17.2 |
48.9 24.3 26.8 |
|
योग |
100 |
100 |
100 |
100 |
100 |
यह तालिका स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है कि भारत में अभी भी प्राथमिक क्षेत्रक ही रोजगार प्रदान करने का मुख्य क्षेत्र है जो लगभग 50% श्रमबल को रोजगार दे रहा है। द्वितीयक क्षेत्र केवल 24.3% लोगों को ही रोजगार प्रदान करता है और लगभग 26.8% श्रमिक ही सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं। यह तालिका यह भी प्रदर्शित करती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग दो तिहाई कार्यबल प्राथमिक क्षेत्रक की गतिविधियों पर निर्भर है। लगभग 16% ग्रामीण श्रमिक द्वितीयक क्षेत्र में काम कर रहे हैं। सेवा प्रदाता लगभग 17% ग्रामीण श्रमिकों को रोजगार प्रदान करते हैं।
प्राथमिक क्षेत्र शहरी क्षेत्रों में मुख्य रोजगार प्रदाता नहीं है। शहरी क्षेत्रों में लोग मुख्यत: सेवा क्षेत्र में कार्य करते हैं। 60% शहरी श्रमिक सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं। द्वितीयक क्षेत्र 31% शहरी कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है। हालांकि पुरुष और महिलाएं दोनों ही प्राथमिक क्षेत्र में भारी संख्या में कार्य कर रहे है, प्राथमिक क्षेत्र में महिलाऐं काफी काम कर रही हैं। प्राथमिक क्षेत्र में लगभग दो तिहाई महिलाऐं कार्यरत हैं, वहीं 45% पुरुष इस क्षेत्र में कार्यरत हैं।
श्रमिक-जनंसख्या अनुपात का प्रयोग यह सूचित करने के लिए किया जाता है कि जनसंख्या का कितना अनुपात किसी आर्थिक क्रिया में संलग्न होते हैं। वे सभी व्यक्ति जो किसी आर्थिक क्रिया में संलग्न होते हैं, श्रमिक कहलाते हैं।
भारत में श्रमिकों में पुरुषों की संख्या अधिक है। लगभग 70% श्रमिक पुरुष हैं और बाकी महिलाएं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण श्रमशक्ति का एक तिहाई हिस्सा महिलाएं हैं, लेकिन शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी शहरी श्रमशक्ति का केवल पांचवा हिस्सा हैं। भारत में महिलाओं के द्वारा की जा रही कई गतिविधियों को आर्थिक गतिविधियाँ भी नहीं माना जाता है। इनमें खाना पकाना, बच्चों का पालनपोषण और घरेलू कार्य करना सम्मिलित हैं। इससे देश में महिला श्रमिकों की संख्या के बारे में भ्रम उत्पन्न होता है। क्योंकि महिलाओं के काम का भुगतान नहीं किया जाता इसलिए श्रमिकों की श्रेणी में नहीं गिना जाता है एक भी पैसा नहीं मिलता है।
उपलब्ध आंकड़ों से हम देख सकते हैं कि देश में कामकाजी पुरुषों की संख्या महिलाओं की संख्या से अधिक है। यह अंतर श्री क्षेत्रों में बहुत अधिक है। शहरी क्षेत्रों में हर 100 शहरी महिलाओं में केवल 15 महिलाएं आर्थिक गतिविधियों में संग्लन हैं, जबकि शहरी पुरुषों में यह आंकडा 55 है। सामान्य रूप से महिलाएं और शहरी महिलाएं वेतनभोगी कार्यों में हाथ नहीं बंटाती है क्योंकि:
क- अमीर परिवार अपने घर की महिला सदस्यों को कार्य करने से हतोत्साहित करते हैं क्योंकि पुरुष आय अर्जित करने में सक्षम हैं।
ख- काम की संकुचित परिभाषा होने के कारण कामकाजी महिलाओं की संख्या बहुत कम मानी जाती है।
आज देश के सामने बेरोजगारी की समस्या सबसे बड़ी समस्या है क्योंकि इसके कई सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम होते हैं |
1) उत्पादक संसाधनों की बर्बादी: बेरोजगारी के कारण संसाधनों की बर्बादी होती है। मानव श्रम के व्यर्थ रहने से राष्ट्र का उत्पादन अपनी कुल श्रमता से कम रह जाता है| इसके कुल चार मुख्य प्रभाव होते हैं:
Ø समाज में उन वस्तुओं और सेवाओं की कमी हो सकती है जो बेरोजगार व्यक्ति उत्पन्न कर सकते थे। इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय कल्याण प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है।
Ø बेरोजगारी के कारण होने वाले मानव दिवसों के नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती क्योंकि यह भविष्य में प्रयोग करने के लिए उपलब्ध नहीं सकता। किसी समय पर व्यर्थ जो जाने वाला श्रम हमेशा के लिए खो जाता है।
Ø अगर शिक्षित व्यक्तियो में बेरोजगारी अधिक है तो संसाधनों की बर्बादी की मात्रा अधिक होती है क्योंकि इससे श्रमिकों में शिक्षा और कौशल में किए गए निवेश की बर्बादी होती है।
Ø जब श्रमिक काफी लम्बे समय तक बेरोजगार रहते हैं तो इससे उनका कौशल और कार्य करने की आदत नष्ट होती है। कार्य और वेतन के अभाव के कारण उनके लिए पर्याप्त भोजन पाना कठिन हो जाता है। यह भी उनकी कुशलता और कमाने करने की क्षमता को विपरीत रूप से प्रभावित करता है।
2. आय में असमानता: बेरोजगारी आय में असमानताओं का एक बहुत बड़ा स्रोत है। बेरोजगारी से गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि हुई है। अत्यधिक बेरोजगारी की अवधि के दौरान, गरीबी की सीमा और आय में असमानताएं बढ़ती हैं।
3. सामाजिक प्रभाव: बेरोजगारी न केवल एक आर्थिक बुराई है बल्कि यह एक सामाजिक बुराई भी है। यह सामाजिक असंतोष और तनाव में वृद्धि करती है। बेरोजगारी से समाज में शोषण की घटनाएं बढ़ती हैं। आर्थिक असुरक्षा के कारण श्रमिकों के पास अपने नियोक्ताओं की शोषणपूर्ण बरताव को सहने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। बेरोजगारी से कई सामाजिक समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं जैसे बेईमानी, भ्रष्टाचार, चोरी, आतंकवाद आदि। इसके परिणामस्वरूप, सामाजिक सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है।
4. सामाजिक प्रभाव: बहुकालीन और व्यापक बेरोजगारी से वर्तमान में सामाजिक आर्थिक प्रणाली के खिलाफ आक्रोश उत्पन्न होता है। राजनेता और असामाजिक समूह इन बेरोजगार लोगों का प्रयोग अपने स्वार्थी हितों की पूर्ति करने के लिए करते हैं। परिणामस्वरुप बेरोजगार लोगों में अराजकतावाद भावना उत्पन्न होती है। इससे समाज में उपद्रव की स्थिति भी उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता है।
इस प्रकार बेरोजगारी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से एक खतरनाक समस्या है।
भारत में हम बेरोजगारी को प्रमुख रूप से दो श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं; ग्रामीण बेरोजगारी और शहरी बेरोजगारी|
i) ग्रामीण बेरोजगारी – ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी कम परिलक्षित होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में, मौसमी और छिपी हुई बेरोजगारी वृहद स्तर पर मौजूद होती है। वर्ष में 4 से 6 माह तक भारी संख्या में ग्रामीण मजदूर या किसान बेकार रहते हैं क्योंकि कृषि एक मौसमी व्यवसाय है और ग्रामीण क्षेत्रों में जब कृषि का मौसम नहीं होता तब उसके एवज में दूसरे रोजगार के अवसर नही होते। इस प्रकार, मौसमी बेरोजगारी भारत में पाई जाने वाली बेरोजगारी का सबसे आम रूप है। प्रच्छन्न बेरोजगारी भी ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक होती है क्योंकि भारत में रोज़गार के लिए अधिक मात्रा में जनसंख्या कृषि पर निर्भर करती है। भारत में कृषि आमतौर पर परिवार के सदस्यों के द्वारा की जाती है। इसके कारण कृषि में कार्यरत लोग आवश्यकता से अधिक होते हैं। अगर उन अतिरिक्त लोगों को कृषि से निकाल भी लिया जाए तो उत्पादन अप्रभावित रहेगा।
भारत में प्रच्छन्न बेरोजगारी मुख्यत इन कारणों से होती है – (क)- भारी संख्या में श्रम बल की उपलब्धता, (ख)- सहायक/वैकल्पिक व्यवसाय की अनुपलब्धता (ग)- पारिवारिक कृषि| अनुमान लगाने पर पाया गया है कि भारत में लगभग एक तिहाई कृषि श्रमिक छिपे हुए बेरोजगार हैं।
ii) शहरी बेरोजगारी- भारत में शहरी बेरोजगारी दो समूहों में विभाजित है:- शिक्षित बेरोजगारी और औद्योगिक बेरोजगारी|
(क) शिक्षित बेरोजगारी: शिक्षित बेरोजगार वे लोग होते हैं जो दसवीं उत्तीर्ण या उच्च शिक्षित होने के बावजूद रोज़गार नहीं प्राप्त कर पाते। ऐसे लोग खुले रूप से बेरोजगार होना कहलाते हैं। मगर कुछ शिक्षित लोग ऐसे भी होते हैं जो कार्यरत तो होते हैं लेकिन उनके काम का स्तर उनकी शिक्षा के अनुसार नहीं होता। शिक्षित बेरोजगारी मुख्यत: निम्न कारणों से उत्पन्न होती है-
i) देश में सामान्य शिक्षा का तेजी से विस्तार।
ii) त्रुटिपूर्ण शिक्षा प्रणाली जो लोगों को व्यावसायिक प्रशिक्षण नहीं देती|
(ख) औद्योगिक बेरोजगारी: औद्योगिक बेरोजगारी से वे लोह पीड़ित होते हैं जो उद्योगों, खनन, परिवहन, व्यापार और निर्माण गतिविधियों में रोजगार पाने के इच्छुक होते हैं पर रोजगार नहीं प्राप्त कर पाते| रोजगार की तलाश में ग्रामीणों का औद्योगीकृत क्षेत्रों में प्रवासन ने भारत में औद्योगिक बेरोजगारी की समस्या को अधिक गंभीर बना दिया है। लेकिन हमारा औद्योगिक क्षेत्र अभी इतना सक्षम नहीं है कि यह इतनी मात्रा में ग्रामीण श्रमिकों को अवशोषित कर सके| साथ ही औद्योगिक क्षेत्रों में पूंजी सघन तकनीकों के अधिक इस्तेमाल से औद्योगिक बेरोजगारी में बढ़त हुई है।
भारत में बेरोजगारी की समस्या का सबसे बड़ा पहलू यह है कि यहाँ पर महिलाओं को या रोजगार बाज़ार में भाग लेने से निरोत्साहित किया जाता है या उन्हें कुछ सीमित क्षेत्रों में काम करने दिया जाता हैं। अगर महिलाओं के लिए रोजगार अवसरों में सुधार किया जाए तो भारत में रोजगार परिद्रश्य में सुधार होगा। असंगठित क्षेत्रों की तुलना में संगठित क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि होनी चाहिए क्योंकि संगठित क्षेत्र (निजी कोर्पोरेट और सार्वजनिक क्षेत्र) महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित और बेहतर भुगतान वाले रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं।
वर्तमान में, संगठित क्षेत्र महिलाओं के लिए कुछ ही रोजगार अवसर प्रदान कर रहा है जिसके कारण महिलाओं की रोज़गार बाज़ार में भागीदारी कम है।
महिलाओं की श्रमशक्ति भागीदारी बढाने के लिए, निम्न उपायों की अनुशंसा की जा सकती है:
i) महिला कर्मचारियों को लेकर कर्मचारियों और नियोक्ताओं के मस्तिष्क में एक भेदभाव की भावना होती है। महिला कर्मचारियों को सम्मिलित किया जाना चाहिए और इस तरह के भेदभाव से उबरना चाहिए।
ii) महिलाओं के लिए शिक्षा तथा प्रशिक्षण के अवसरों में वृद्धि होनी चाहिए।
iii) कामकाजी माहिलाओं के लिए आवासीय परिसर में वृद्धि की जानी चाहिए।
iv) माओं के कामकाजी घंटों के दौरान क्रेच और शिशु देखभाल जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
महिलाओं के रोजगार के पक्ष में हमें एक सकारात्मक सार्वजनिक विचार का निर्माण करना चाहिए। महिलाओं की शिक्षा, प्रशिक्षण और उनके घर से दूर काम करने से संबंधित परम्परागत भेदभाव को दूर करने के लिए लोगों की सोच को बदलने का प्रयास करना चाहिए|
A.
केवल ग्रामीण आधारिक संरचना का
B.
केवल शहरी आधारिक संरचना का
C.
आर्थिक आधारिक संरचना का
D.
सामाजिक आधारिक संरचना का
आधारिक संरचना को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: आर्थिक आधारिक संरचना और सामाजिक आधारिक संरचना। आर्थिक आधारिक संरचना प्रत्यक्ष रूप से उत्पादन और वितरण को प्रभावित करती है।
A.
कम्पनी
B.
सरकार
C.
व्यक्ति
D.
अर्थशास्त्री
आधारिक संरचना के विकास के लिए सरकार उत्तरदायी है। निजी क्षेत्र यह कदम इसलिए नहीं उठाता हैं क्योंकि उनका लक्ष्य अधिकतम लाभ कमाना होता है । इसके अतिरिक्त औद्योगिक विकास के अत्यधिक निवेश की भी आवश्यकता होती है, जिसकी पूर्ति करने में निजी क्षेत्र अक्षम होता है।
A.
शिक्षा
B.
स्वास्थ्य
C.
परिवहन
D.
आवास
आर्थिक आधारिक संरचना में ऊर्जा, परिवहन, संवाद आदि सम्मिलित है। सामाजिक आधारिक संरचना में शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास सम्मिलित है।
A.
मिलियन टन्स ऑफ ऑयल ईक्वीवैलेन्ट
B. मिलियन टन्स ऑफ ऑयल एनर्जी (energy)
C. मिलियन कुल (total) ऑफ ऑयल ईक्वीवैलेन्ट
D. मध्यम टन्स ऑफ ऑयल ईक्वीवैलेन्ट
भारत में ऊर्जा के भिन्न स्रोतों को एक सर्वनिष्ठ इकाई ‘‘मिलियन टन्स ऑफ ऑयल ईक्वीवैलेन्ट (एम.टी.ओ.ई.)’’ में परिवर्तित किया जाता है।
A.
परिवहन
B.
संवाद
C.
शिक्षा
D.
ऊर्जा
सामाजिक आधारिक संरचना में शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास सम्मिलित हैं। सामाजिक आधारिक संरचना समाज के कुल विकास और उसकी सभी आवश्यक आवश्यकताओं में सहायता करती है ।
A.
आधुनिकीकरण
B.
रोजगार अवसर
C.
मानव पूंजी निर्माण
D.
आधारिक संरचना
आधारिक संरचना औद्योगिक और कृषि उत्पादन, घरेलू और विदेशी व्यापार और वाणिज्य के मुख्य क्षेत्र में समर्थन सेवाएं प्रदान करती हैं और आधुनिक अर्थव्यवस्था के सुचारू रूप से परिचालन में मदद करती है ।
भारत का आधारिक संरचना पर कुल सकल घरेलू उत्पाद का 5% निवेश किया जाता है। निवेश का यह प्रतिशत चीन की तुलना में काफी कम है |
A.
20%
B.
40%
C.
60%
D.
80%
काम्पैक्ट फ्ल्यूरोसेन्ट लैम्प्स (सी.एफ.एल.) के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि यह साधारण बल्ब की तुलना में 80 प्रतिशत कम बिजली की खपत करता है।
A.
मातृत्व
मृत्यु दर
B. विश्व रोग भार
C. रोग
D. जीवन प्रत्याशा
विश्व रोग भार एक संकेतक है जिसका प्रयोग किसी विशेष बीमारी के कारण समय से पूर्व लोगों के मरने की संख्या तथा बीमारी के कारण अशक्ता की स्थिति में बिताए गए वर्षों की संख्या ज्ञात करने के लिए होता है।
पर्यावरण का अर्थ संसाधनों के भंडारण के रूप में और उत्पादन प्रणाली के हानिकारक उप-उत्पादों के अवशोषक के रूप में प्रकृति की क्षमता है। दूसरे शब्दों में, पर्यावरण का अर्थ है समस्त भूमंडलीय विरासत और सभी संसाधनों की समग्रता। इसमें हर प्रकार के जैविक और अजैविक तत्व सम्मिलित हैं, जो एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।
भूमि के अपक्षय के लिए उत्तरदायी कारण इस प्रकार हैं:
i) वन विनाश के फलस्वरूप वनस्पति की हानि।
ii) जलाऊ लकड़ी और चारे का निष्कर्षण अधारणीय रूप से ।
iii) खेती-बाडी
iv) वनों का अतिक्रमण।
v) वन की आग और अत्यधिक चराई।
vi) भूमि-संरक्षण हेतु समुचित उपायों को न अपनाया जाना।
vii) अनुचित फसल-चक्र।
viii)कृषि रसायन जैसे, रसायनिक खाद और कीटनाशक का अनुचित प्रयोग।
ix) सिंचाई व्यवस्था का अविवेकपूर्ण नियोजन और प्रबंधन।
x) भूजल का पुनर्भरण क्षमता से अधिक उपयोग।
मृदा की उत्पादक और प्रजनन क्षमताओं के क्षरण को मृदा क्षरण के रूप में जाना जाता है। मृदा के क्षरण का मुख्य स्रोत है उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग। मृदा क्षरण के निम्न प्रकार हैं:
i) मृदा की लवणीयता और क्षारीयता: रासायनिक उपकरणों के अत्यधिक प्रयोग ने मृदा में कई प्रकार के अम्ल एवं क्षार संवर्धित कर दिए हैं। भूजल के प्रयोग ने लवणीयता की समस्या में वृद्धि की है।
ii) वायु एवं जल क्षरण के साथ, मैदान अब रेगिस्तान में बदलते जा रहे हैं।
iii) कीटनाशकों एवं तृणनाशकों के रसायनों ने मृदा, जल एवं अन्य इकाइयों को प्रदूषित कर दिया है।
iv) सिंचाई के अत्यधिक प्रयोग ने खेतों में पानी के इकट्ठे होने में वृद्धि की है। इससे मृदा के लवण घटक में वृद्धि हुई है।
पर्यावरण का अर्थ संसाधनों के भंडारण के रूप में और उत्पादन प्रणाली के हानिकारक उप-उत्पादों के अवशोषक/सफाई एजेंट के रूप में प्रकृति की क्षमता है। दूसरे शब्दों में, पर्यावरण का अर्थ है समस्त भूमंडलीय विरासत और सभी संसाधनों की समग्रता। इसमें हर प्रकार के जैविक और अजैविक तत्व सम्मिलित हैं, जो एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।
पर्यावरण के निम्नलिखित कार्य हैं:
i) पर्यावरण संसाधनों की पूर्ति करता है। पर्यावरण नवीकरणीय संसाधनों की निरंतर पूर्ति प्रदान करता है।
ii) पर्यावरण अवशेष समाहित करता है।
iii) पर्यावरण जननिक एवं जैव विविधता प्रदान कर जीवन को पोषण प्रदान करता है।
iv) पर्यावरण प्राकृतिक द्रश्य जैसी सौंदर्य विषयक सेवाएं भी प्रदान करता है।
पर्यावरणीय संसाधनों की मांग लोगों के द्वारा उत्पादन और उपभोग उद्देश्य के लिए की जाती है, मगर पर्यावरणीय संसाधनों की पूर्ति प्रकृति के द्वारा की जाती है। औद्योगिक क्रान्ति से पहले, कम जनसंख्या और संसाधनों पर विकास का कम बोझ होने के कारण पर्यावरणीय संसाधनों की मांग अपनी धारण क्षमता के अंदर ही थी। औद्योगिक क्रान्ति के बाद पर्यावरणीय संसाधनों की मांग आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गई अर्थात संसाधनों के पुनर्सृजन की दर से बहुत अधिक, जिसने माँग-पूर्ति संबंध पूरी तरह
से उलट डाला| मांग पूर्ति की तुलना में अधिक है। पूर्ति-मांग प्रतिलोम की अवधारणा आज के युग की परिघटना है।
पर्यावरण को प्रदूषित करने के लिए औद्योगीकरण निम्नलिखित तरीके से उत्तरदायी है:
i) धुंआ पैदा करने वाले कारखाने पृथ्वी पर जीवों के लिए खतरा उत्पन्न करते हैं।
ii) औद्योगिक अपशिष्टों और रसायनों को नदियों में नालों के माध्यम से छोड़ा जाता है, जिससे जल प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है।
iii) मशीनें बहुत ही आवाज़ करती हैं जिससे ध्वनि प्रदूषण होता है।
iv) भारी और हलके वाहनों के आने जाने से, पम्पसेट आदि को चलाने से ध्वनि प्रदूषण होता है।
v) औद्योगीकरण ने जंगल के कवर को कम किया है
vi) वाहन के यातायात ने वायु प्रदूषण को जन्म दिया है
निम्न रणनीतियों या क़दमों को धारणीय विकास हासिल करने के लिए अपनाया जा सकता है:
भारत में पर्यावरण संकट के लिए उत्तरदायी कारक निम्नलिखित हैं:
i) बढ़ती जनसंख्या: जनसंख्या में वृद्धि से उत्पादन और उपभोग दोनों के ही स्तर पर संसाधनों की मांग बढ़ जाती है जो पर्यावरण पर दबाव उत्पन्न करती है। बढ़ती हुई जनसंख्या से भोजन, आवास और परिवहन सुविधाओं में समस्याएं उत्पन्न हुए हैं।
ii) वायु प्रदूषण: वायु प्रदूषण हवा की गुणवत्ता में कमी करता है। वायु प्रदूषण सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। वायु प्रदूषण ने सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भारी व्यय का बोझ बढ़ा दिया है।
iii) पानी का संदूषण: नदियों, नहरों, झील आदि में औद्योगिक कचरा और रसायन डाले जाने से पानी भारी मात्रा से संदूषित हो जाता है। पानी के संदूषण के कारण पानी से होने वाली बीमारियाँ फैलती हैं और मानव के साथ साथ पशुओं के जीवन को भी ख़तरा होता है। पानी के संदूषण ने पेयजल, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पशु जीवन की रक्षा पर भारी व्यय में वृद्धि की है।
iv) समृद्ध उपभोग मानक: समृद्ध उपभोग मानकों ने संसाधनों के लिए मांग उत्पन्न की है और पर्यावरण पर दबाव डाला है। इनके कारण पर्यावरण के संरक्षण पर सरकारी व्यय में वृद्धि हुई है।
v) निरक्षरता: निरक्षरता ने भारत में पर्यावरण की कई समस्याओं में वृद्धि की है। इसने विज्ञान और तकनीक के प्रचार प्रसार में और वैज्ञानिक द्रष्टिकोण के प्रचार में समस्याएं उत्पन्न की हैं। निरक्षर लोग आधुनिक विचारों का स्वागत नहीं करते हैं। इसके परिणामस्वरूप लोग पर्यावरण की समस्याओं में अधिक ध्यान नहीं देते हैं। सरकार को पर्यावरण के मुद्दों के प्रचार के लिए काफी भारी मात्रा में खर्च करना पड़ जाता है।
vi) औद्योगीकरण: औद्योगीकरण ने समाज की बढ़ती हुई मांगों को पूरा करना संभव किया है। उत्पादन के लिए भारी मात्रा में स्रोतों की समस्या होती है। औद्योगीकरण ने वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की समस्याओं का निर्माण किया है। भारत सरकार प्रदूषणों को कम करने के लिए भारी मात्रा में धन खर्च कर रही है।
vii) शहरीकरण: शहरीकरण ने संसाधनों के दुरूपयोग और अत्यधिक उपयोग की समस्याओं का निर्माण किया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और भूमि पर दवाब के कारण शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण की चुनौती है। सरकार को शहरी क्षेत्रों में सामाजिक संरचना का निर्माण करना चाहिए।
viii) वन आवरण में कमी: सरकार को वनीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए काफी धन खर्च करना पड़ा है।
ix) वैश्विक उष्णता: वैश्विक उष्णता से अभिप्राय औद्योगिक क्रान्ति के बाद से ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि के परिणामस्वरूप पृथ्वी के औसत तापमान में धीरे धीरे होने वाली वृद्धि है। सरकार जीवाश्म ईंधन को जलाने और वनीकरण को नियंत्रित करने जैसे क़दमों को उठाकर बचावात्मक कदम उठा रही है।
पर्यावरण में किसी हानिकारक या जहरीले प्रभाव वाले पदार्थों के प्रवेश को प्रदूषण कहते हैं। प्रदूषण को प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता में अवांछित परिवर्तनों के रूप में भी बताया जा सकता है जो जीवित प्राणियों के लिए हानिकारक होते हैं।
विभिन्न
प्रकार के
प्रदूषण :
|
प्रदूषण के प्रकार |
परिभाषा |
कारण |
परिणाम |
सुझावात्मक कदम |
|
वायु प्रदूषण |
वायु प्रदूषण तब होता है जब हानिकारक तत्व हवा में घुल जाते हैं और हवा की गुणवत्ता को कम करते हैं। |
i) कारखानों से आने वाला धुंआ ii) विनिर्माण संयंत्रों से रसायन |
i) इससे लोगों के स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है, जिससे भारी खर्च का बोझ बढ़ता है ii) ओजोन का क्षरण |
i) जीवाश्म ईंधन का जलना कम होना चाहिए। ii) वन्यकरण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। iii) गैर-संदूषित संसाधनों को ऊर्जा के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए। iv) बेहतर ऑटोमोबाइल इंजन को प्रयोग करना चाहिए। v) कारखाने आवासीय क्षेत्रों से दूर स्थित होने चाहिए। |
|
जल प्रदूषण |
जल प्रदूषण तब होता है जब कुछ हानिकारक पदार्थ पानी में घुल कर पानी की भौतिक और रासायनिक विशेषताओं को इस तरह बदल देते हैं कि पानी को प्रयोग के लिए अनुपयोगी बना जाता है| |
i) रसायनों और औद्योगिक अपशिष्टों को नदियों, नहर और झीलों में डालना ii) कपड़ों, बर्तनों और जानवरों आदि को तालाबों में धोना iii) शहरों से मल के पानी को छोड़ा जाना iv) कृषि में कीटनाशक और उर्वरकों का बेंतहा प्रयोग |
i) इससे पानी से होने वाली कई बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं जैसे पेचिश, टायफोइड, हैजा और अमीबा से होने वाली गंभीर बीमारियाँ। ii) जल प्रदूषण जलीय पौधों और पशुओं को प्रभावित करता है iii) मानव द्वारा जलीय पौधों और जीवों का सेवन करने से मानव को भी हानि होती है |
i) कारखानों से निकलने वाले अपशिष्टों को नदी और सागर में नहीं फेंका जाना चाहिए। ii) कागज़ की मिल और चमड़े के कारखाने से निकले अपशिष्टों को भूमि पर नहीं दबाना चाहिए। iii) कारखाने के अपशिष्टों को पुनर्प्रयोग करना चाहिए। iv) नदियों में सीवेज के निस्तारण की अनुमति नहीं होनी चाहिए। इसका शोधन होना चाहिए और मैले को खेतों में खाद की तरह प्रयुक्त किया जाना चाहिए। |
|
ध्वनि प्रदूषण |
ध्वनि प्रदूषण का अर्थ उन अवांछित और कर्कश शोर से होता है जो पर्यावरण को जीवों के लिए असुविधा उत्पन्न करते हैं। |
यह औद्योगिक संस्कृति की एक आवश्यक बुराई है: i) मशीनों से बहुत ही तेज आवाज़ आती है जिससे ध्वनि प्रदूषण होता है ii) भारी और हलके वाहनों की गतिविधियों, पम्प आदि के चलने से ध्वनि प्रदूषण होता है iii) पटाखों की अप्रिय आवाजें |
i) इससे लोग परेशान होते हैं ii) इससे थकान, कुशलता में कमी, बेचैनी, सिरदर्द, मानसिक असंतुलन, सुनने और सोने की समस्या |
आधुनिक सभ्य समाज में ध्वनि प्रदूषण की सीमा को नियंत्रित करने के लिए उच्चतम न्यायालय से कई दिशानिर्देश हैं। |
वनों के क्षरण का अर्थ है निरंतर काटे जाने के कारण पेड़ों की सघनता में कमी आना। वनों के क्षेरण के निम्नलिखित कारण हैं:
i) ग्रामीण बेरोजगारी और गरीबी: बेरोजगारी और गरीबी के कारण, आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों ने अपने खुद के उपयोग और जीवनयापन के लिए जंगलों का अत्यधिक दोहन शुरु कर दिया है। लोग आय के लिए लकड़ी, तेंदू के पत्ते और जड़ीबूटी आदि इकट्ठे करने लगे हैं।
ii) तेजी से बढ़ती जनसँख्या ने वन उत्पादों की मांग में जबरदस्त वृद्धि की है जैसे टिम्बर, लकड़ी की लुग्दी, जड़ी बूटी आदि। जंगलों को कृषि भूमि, उद्योग और आवास में बदला जा रहा है।
iii) जंगलों को पशुओं को चराने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसका परिणामस्वरूप पेड़ों की अत्यधिक हनी पहुची है।
iv) बड़े जंगल क्षेत्रों को बाँध बनाने के लिए काट दिया गया। बाँध के निर्माण से भूमि की गुणवत्ता को भी खतरा उत्पन्न हुआ है।
वनों के क्षरण के निम्न प्रभाव हैं:
i) वन आवरण के नुकसान से पहाड़ियों और पर्वतों को काफी नुकसान होता है। पेड़ों के गिरने के साथ ही मिट्टी ढीली हो जाती है और उर्वर मिट्टी हवा से उड़ जाती है और पानी के साथ बह जाती है और अंतत: नष्ट हो जाती है।
ii) घने वन बारिश को आकर्षित करते हैं जो मिट्टी के नमी के स्तर में वृद्धि करती है। जहाँ वन आवरण नहीं होता है वहां पर बारिश कम होती है। वनों के क्षरण के परिणामस्वरूप मिट्टी के पानी तत्व कम हो जाते हैं।
iii) विशेषज्ञों के अनुसार, वन आवरण का नुकसान वैश्विक उष्णता लिए उत्तरदायी है। कुछ गैस जैसे कार्बन डाई ओक्साइड, मीथेन और नाइट्रोजन ओक्साइड जो सौर ताप/धूप को आकर्षित करती हैं, वे वातावरण में फैल चुकी हैं और इससे तापमान बढ़ रहा है।अगर यहाँ जंगल होते तो पेड़ ऐसी गैसों को अवशोषित कर सकते थे।
iv) एक जंगल वह स्थान है जहां पर हमें कई प्रकार के पौधे और पशु मिलते हैं। जंगलों के नष्ट होने से कई प्रकार के जीव गायब हो रहे हैं। विविध पौधों और पशुओं का नुकसान जैव विविधता का नुकसान है। आनुवांशिक संसाधनों के नुकसान से प्रकृति को नुकसान होता है और उसके परिणामस्वरुप हमें भी नुकसान होता है।
पर्यावरणीय
समस्याओं को
जांचने के
निम्नलिखित
तरीके हैं:
i)लोगों
को पर्यावरण
के विपरीत
प्रभावों के
बारे में
जागरूक किया जा
रहा है। आज
विद्यार्थियों
को पर्यावरण
के विविध पहलुओं
के बारे में
बताया जा रहा
है। सरकार
नियमित रूप
से
समाचारपत्रों,
टेलीविज़न और
रेडियो में
विज्ञापन
देने के
द्वारा लोगों
को जागरूक कर
रही है।
ii) हमारे पर्यावरण की रक्षा के लिए कई क़ानून पारित किए गए हैं जैसे वन्यजीव अधिनियम और इनके साथ ही उच्चतम न्यायालय के निर्देश भी पारित किए गए हैं, जैसे लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध आदि।
iii) सरकार
साफ वातावरण
पर काफी धन
खर्च करती है।
नगर निगम के द्वारा
स्थापित संयंत्र
गंदे पानी को
साफ और शोधित
करते हैं।
शहरी
क्षेत्रों
में कूड़े का संकलन
और सड़कों पर
सफाई नगर
निगमों के
द्वारा ही
किया जाता है।
कई प्रकार की
पुनुरुत्पादक
गतिविधियाँ
जैसे
वृक्षारोपण
और वनीकरण भी
कई नागरिक
इकाइयों के
द्वारा किया
गया वह निवेश
है जिसके लिए
सरकार
प्रतिबद्ध
है।
पर्यावरण की
रक्षा के लिए
सरकार कई और
कदम उठाती है
जैसे
पर्यावरणीय
समस्याओं पर
सूचनाओं का
विस्तार,
पर्यावरण पर
शोध,
बीमारियों
से बचाव और पीने
का सुरक्षित
पानी आदि।
iv) सरकार
कुछ वस्तुओं
और सेवाओं पर
कर लगाती है जो
पर्यावरण को
प्रदूषित
करते हैं। यह कर
लोगों को
पर्यावरण को
प्रदूषित
करने से रोकता
है। जबकि
दूसरी तरफ
सरकार के
द्वारा
प्रदान की गयी
कोई छूट,
लोगों को
पर्यावरण
अनुकूल
उत्पाद का
निर्माण
करने के लिए
प्रेरित
करती है। सौर
चूल्हे पर
सरकार के
द्वारा दी
गयी कोई छूट,
उसकी कीमत को
कम करती है और
उसे गरीब
लोगों के लिए
सस्ता बनाती
है।
v) पुन:चक्रण/पुनर्प्रयोग वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक प्रयुक्त संसाधन को कई बार प्रयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिए कागज़, लोहा, कांच आदि। पुन:चक्रण दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों का पूरा लाभ उठाने में सहायता करता है।
vi) स्थानापन्न का अर्थ उन वैकल्पिक संसाधनों का प्रयोग है जो दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों की तुलना में प्रचुर मात्रा में होते हैं। सीएनजी, एलपीजी और एथेनोल ने पेट्रोल और डीज़ल का स्थान ले लिया है।
A.
भारत
B. पाकिस्तान
C. चीन
D. जापान
पाकिस्तान में बहुत ही कम जनसँख्या है, मगर पाकिस्तान में वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर भारत, चीन और जापान से कहीं अधिक है।
A.
भारत
B.
बांग्लादेश
C.
पाकिस्तान
D.
चीन
एक संतान नीति को वर्ष 1978 में चीनी सरकार ने जनसँख्या नियंत्रण के लिए लागू किया था | यह आधिकारिक रूप से एक विवाहित दंपत्ति को एक बच्चे से अधिक संतान तक सीमित करने से प्रतिबंधित करता है।
निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या मानव विकास सूचकांक के संकेतकों में से एक है। अन्य संकेतक हैं: शिशु मृत्यु दर, प्रौढ़ साक्षरता दर आदि |
मानव विकास सूचकांक के अनुसार भारत की श्रेणी 0.586 मान के साथ 135 वें स्थान पर है|
A.
भारत
B. पाकिस्तान
C. चीन
D. अफगानिस्तान
चीन में बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के कारण जीवन प्रत्याशा 75.2 वर्ष सर्वाधिक है।
भारत में शहरीकरण की दर लगभग 32% है जबकि चीन में यह 53% है और पकिस्तान में यह 38% है।
A.
विदेशी निवेशक
B.
विदेशी पर्यटक
C.
घरेलू निवेशक
D.
बड़ी जनसँख्या
विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना की गयी। विशेष आर्थिक क्षेत्र ऐसे भौगोलिक क्षेत्र हैं जहाँ देश के आर्थिक कानूनों से कुछ अलग आर्थिक कानूनों का पालन अनुसरण होता हैं।
A.
1945
B. 1947
C. 1957
D. 1967
भारत और पाकिस्तान दोनों ही देश वर्ष 1947 में आजाद हुए थे। चीन गणराज्य की स्थापना वर्ष 1949 में हुई थी।
A.
भारत
B. चीन
C. पाकिस्तान
D. बांग्लादेश
सुधार प्रक्रिया के रूप में दोहरी मूल्य प्रणाली की शुरुआत की गयी। इसका अर्थ था मूल्य का निर्धारण दो प्रकार से करना। किसानों और औद्योगिक इकाइयों अपने उत्पादन का कुछ हिस्सा सरकार के द्वारा नियत मूल्यों पर बेचना होता था और कुछ हिस्सा बाज़ार के मूल्य पर।
सामाजिक आधारिक संरचना से अर्थ उन सेवाओं से है जो समाज की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं और जो बदले में उत्पादों एवं सेवाओं के उत्पादन में अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करती है| सामाजिक आधारिक संरचना में शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास सम्मिलित हैं। सामाजिक आधारिक संरचना कुशल मानव संसाधन का निर्माण करती हैं और साथ ही लोगों के कल्याण में यह प्रत्यक्ष योगदान करती है। आर्थिक आधारिक संरचना का अर्थ उन आर्थिक गतिविधियों और सेवाओं से हैं, जो कुशलता से कार्य करने के लिए एक आर्थिक प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से समर्थन करती है। आर्थिक आधारिक संरचना प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सहायता करती है। आर्थिक आधारिक संरचना में संचार और परिवहन आदि सम्मिलित हैं।
|
आर्थिक आधारिक संरचना |
सामाजिक आधारिक संरचना |
|
1) आर्थिक आधारिक संरचना आर्थिक प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से समर्थन करती है। |
1) सामाजिक आधारिक संरचना अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक प्रणाली को समर्थन करती है। |
|
2) यह आर्थिक संसाधनों की गुणवत्ता को बेहतर करती है और इस प्रकार उत्पादकता में वृद्धि होती है और उत्पादन की लागत कम करती है। |
2) यह मानव संसाधन की गुणवत्ता को बेहतर करती है और इस प्रकार मानव श्रम की कुशलता में वृद्धि करती है। |
|
3) आर्थिक आधारिक संरचना के निर्माण पर किए गए व्यय भौतिक पूंजी के भंडार में वृद्धि करते हैं। |
3) सामाजिक आधारिक संरचना पर व्यय अर्थव्यवस्था में मानव पूंजी के भंडार में वृद्धि करते हैं| |
आर्थिक और सामाजिक दोनों ही आधारिक संरचनाएं परस्पर एक दुसरे निर्भर होती हैं। दोनों ही देश के आर्थिक विकास में योगदान करती हैं।
A.
अपिको आंदोलन
B.
चिपको आंदोलन
C.
वनीकरण आंदोलन
D.
वनों की रक्षा आंदोलन
वनों की कटाई के खिलाफ के दो प्रमुख आंदोलन है: चिपकों आंदोलन और अप्पिको आंदोलन चिपकों आंदोलन की अंतर्गत 80 के दशक के आरंभ में उत्तरी हिमालय के ग्रामीणों ने ठेकेदारों की कुल्हाडियों से पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले लगाया।
A.
1972.
B.
1974.
C.
1975.
D.
1979.
भारत के वन्य एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 1974 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एक स्वायत्त निकाय के रूप में स्थापित किया था। जल, भूमि और वायु प्रदूषण की जांच करना इसका मुख्य कार्य है।
ओजोन अपक्षय को कम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों द्वारा बनाए गये एक एतिहासिक समझौते मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को अपनाया गया। इस समझौते का उद्देश्य थाः ओजोन परत को बचाने के लिए सीएफसी पर रोक लगाना और हस्ताक्षर करने वाले सदस्यों द्वारा वर्ष 2013 तक सीएफसी के उपभोग और उत्पादन को बंद करना।
A.
वृक्ष
B.
जीवाश्म ईंधन
C.
पानी.
D.
भूतापीय ऊर्जा
जीवाश्म ईंधन एक गैर-नवीनीकरण योग्य संसाधन है| गैर-नवीनीकरण योग्य संसाधन वे हैं जो कि निष्कर्षण और उपयोग से समाप्त हो जाते हैं ।
पेट्रोलियम, कोयला, प्राकृतिक गैस, बिजली ऊर्जा के परंपरागत स्रोत हैं। ऊर्जा के परंपरागत स्रोत में जीवाश्म ईंधन, तापीय ऊर्जा और पनबिजली ऊर्जा शामिल हैं।
A.
खेती
B. नौचालन
C. भारी बारिश
D. औद्योगिक अपशिष्ट
औद्योगिक अपशिष्ट एक मुख्य कारक है जो जल प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है। अन्य कारक हैं अशोधित सीवेज, कृषि अपशिष्ट, आदि |
A.
जैविक तत्व या जीवित तत्व
B.
जैविक तत्व या गैर-जीवित तत्व
C.
जैविक तत्व और अजैविक तत्व
D.
प्राकृतिक संसाधन या मानव निर्मित संसाधन
पर्यावरण को समस्त भूमंडलीय विरासत और सभी संसाधनों की समग्रता के रूप में परिभाषित किया जाता है। पर्यावरण के घटकों को दो वर्गा में वर्गीकृत किया जा सकता है: • जैविक तत्व • अजैविक तत्व सभी सजीव तत्व जैसे चिडियां, जानवर एवं पौधे, वन, मत्स्य आदि जैविक तत्वों में शामिल है। सभी निर्जीव तत्व जैसे हवा, पानी, भूमि आदि अजैविक तत्वों में शामिल हैं।
A.
संसाधनों
की आपूर्ति
B. अपशिष्ट को आत्मसात करना
C. रुग्णता कम करना
D. आधारिक संरचना प्रदान करना
पर्यावरण के विभिन्न कार्य हैं : संसाधनों की आपूर्ति, जीवन धारण में सहायता करना, सौंदर्य विषयक सेवाएं प्रदान करना, अवशेषों को समाहित करना|
A.
नियमों का उल्लंघन
B.
वैश्विक उष्णता
C.
अवशोषी क्षमता
D.
धारण क्षमता
पर्यावरण उत्पादन और उपभोग के बाद छोड़ दिये गये अवशेषों को समाहित कर लेता है। पर्यावरण की पर्यावरणीय प्रदूषण को अवशोषित करने की क्षमता को अवशोषी क्षमता कहते है।
ओजोन अपक्षय के मुख्य कारण हैं एसी और फ्रिज में प्रयोग की जाने वाली सीएफसी (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) और अग्निशामकों में प्रयुक्त बीएफसी (ब्रोमोफ्लोरोकार्बन्स) द्वारा फ्लोरीन, क्लोरीन एवं ब्रोमीन यौगिकों का उच्च स्तर पर उत्सर्जन होना।
धारणीय विकास ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति क्षमता का समझोता किये बिना पूरा करें|
कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि के कारण महासागरों और पृथ्वी के निचले वायुमंडल के औसत तापमान में वृद्धि देखी गयी है। इसे वैश्विक उष्णता कहते हैं |
A.
एल पी जी
B.
सी एन जी
C.
गोबर गैस
D.
सौर ऊर्जा
उच्चदाब प्राकृतिक गैस (CNG) के उपयोग ने वायु प्रदूषण को काफी कम कर दिया है | इसका बसों, कारों आदि जैसे सार्वजनिक परिवहनों में और घरेलू गैस पाइपलाइनों में ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है ।
A.
चूहे
B. केंचुए
C. फीता कृमि
D. गोलकृमि
केंचुए सामान्यतः कंपोस्ट खाद प्रक्रिया की अपेक्षा तीव्रता से जैविक वस्तुओं को कंपोस्ट में बदल सकते हैं| इस पद्धति का अब बहुत ही अधिक प्रयोग किया जा रहा है|
A.
वायु शक्ति
B.
जल शक्ति
C.
सौर शक्ति
D.
ज्वारीय ऊर्जा
फोटोवोल्टिक सेलों के माध्यम से सौर ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित किया जाता है| यह बिजली उत्पादन का एक सस्ता तरीका है| और यह प्रदूषण से मुक्त है|
A.
अंडमान
और निकोबार
द्वीप समूह
B.
तिब्बत पठार
C.
हिमालय पर्वत श्रृंखला
D.
गंगा का मैदान
गंगा के मैदान - बंगाल की खाड़ी से लेकर अरब सागर में फैले हैं और यह विश्व अत्यधिक उर्वर क्षेत्रों में से है और विशव में सबसे गहन खाती और घनत्व जनसँख्या वाला क्षेत्र है|
A.
आर्थिक संसाधन
B.
नवीकरण योग्य संसाधन
C.
गैर नवीकरण योग्य संसाधन
D.
मानव संसाधन
गैर-नवीनीकरण योग्य संसाधन वे हैं जो कि निष्कर्षण और उपयोग से समाप्त हो जाते हैं । उदाहरण के लिए: कोयला, पेट्रोल, आदि जैसे जीवाश्म ईंधन|
सौंदर्य विषयक सेवाएं प्रदान करना पर्यावरण के विभिन्न कार्यों में से एक है| इसके अतिरिक्त यह अपशिष्टों को एकत्र करता है, आनुवांशिकी और जैव विविधता प्रदान करने के द्वारा जीवन धारण में सहायता करता है और नवीकरणीय और गैर नवीकरणीय संसाधनों की भी आपूर्ति करता है|
A.
मत्स्य
B.
चट्टान
C.
हवा
D.
भूमि
जैविक तत्वों में पर्यावरण के सभी सजीव तत्व सम्मिलित होतें हैं| जैसे पक्षी, पशु, वन, पौधे और मत्स्य आदि |
ब्रिक्स पांच देशों की संस्था का नाम है जिसके देश हैं ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका। इसमें वर्ष 2010 में दक्षिण आफ्रिका भी इसका अभिन्न अंग है |
1970 के दशक में चीन ने जनसँख्या की वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए एक संतान नीति को शुरु किया था।
महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति चीन की वह प्रणाली थी, जिसके अंतर्गत विद्यार्थियों और पेशेवरों को गाँव में कार्य करने के लिए और सीखने के लिए शहरों में भेजा गया था। इसे चीन में वर्ष 1966-1976 के मध्य लागू थी।
कम्यून से अर्थ उस प्रणाली से है जिसमें लोग सामूहिक रूप से भूमि जोतते हैं। यह प्रणाली चीन में अधिक प्रचलित है |
भारत एक लोकत्रांतिक देश है, पाकिस्तान में सैन्य शक्ति का अधिक प्रभाव है तो वहीं चीन में एक नियंत्रित अर्थव्यवस्था है।
SEZ का पूरा नाम है विशेष आर्थिक क्षेत्र।
वर्ष 2013 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 6.6 ट्रिलियन डॉलर था और पाकिस्तान का सकल घरेलू उत्पाद 0.83 ट्रिलियन डॉलर था। पाकिस्तान का सकल घरेलू उत्पाद भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 13 प्रतिशत है।
चीन का सकल घरेलू उत्पाद 15.6 ट्रिलियन डॉलर था। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सकल घरेलू उत्पाद है।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम 2012 के अनुसार मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) मानव विकास के चार उपागमों आय उपागम, कल्याण उपागम, न्यूनतम आवश्यकता उपागम और क्षमता उपागम का सम्मिलित सूचकांक है ।
पाकिस्तान की वार्षिक योजना 2011-12, कई कारकों को बताती है जो अर्थव्यवस्था की धीमी वृद्धि के लिए जिम्मेदार हैं। वे हैं
· कमजोर होती सुरक्षा स्थितियां
· कम विदेशी प्रत्यक्ष निवेश
· बाढ़ जो कृषि व आधारिक संरचना को प्रभावित करती है
· उर्जा संकट
आसियान या दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन, 10 दक्षिण एशियाई देशों का एक आर्थिक संगठन है। इसका गठन 1967 में हुआ था, जिसका लक्ष्य था क्षेत्र में आर्थिक वृद्धि, सामाजिक प्रगति, सांस्कृतिक विकास का विस्तार करना और शान्ति और स्थिरता की रक्षा करना। इसके सदस्य देशों में हैं इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपिन्स, सिंगापुर, थाईलैंड, ब्रुनेई, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस और वियतनाम।
पाकिस्तान की उच्च वृद्धि दर बनाए रखने का मुख्य कारण उसकी विकासात्मक नीतियाँ हैं, जो उसने 1950 में आरम्भ की थी।
निम्नलिखित तालिका सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर प्रदर्शित करती है:
|
देश |
1980-90 |
2005-2013 |
|
भारत |
5.7 |
7.6 |
|
चीन |
10.3 |
10.2 |
|
पाकिस्तान |
6.3 |
4.4 |
उपरोक्त तालिका से, हम पाते हैं कि चीन में वृद्धि दर दो अंकों में बनी हुई है जो भारत से लगभग दोहरी है। 1980-90 में पकिस्तान भारत से आगे था, मगर 2005-13 में पाकिस्तान की वृद्धि दर में गिरावट आई है।
निम्नलिखित तालिका 2013 में सकल घरेलू उत्पाद के प्रति भारत और पाकिस्तान के क्षेत्रीय योगदान की तुलना प्रदर्शित करती है:
|
क्षेत्र |
भारत |
पाकिस्तान |
|
कृषि |
18 |
25 |
|
उद्योग |
25 |
21 |
|
सेवा |
57 |
54 |
|
कुल |
100 |
100 |
उपरोक्त तालिका प्रदर्शित करती है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में सकल घरेलू उत्पाद में सर्वाधिक योगदान देने वाला क्षेत्र सेवा क्षेत्र है। हालांकि औद्योगिक क्षेत्र में भारत पकिस्तान से कही आगे है। जहां तक कृषि क्षेत्र की बात है तो भारत का योगदान पाकिस्तान से कम है।
स्वतंत्रता संकेतक सामाजिक और राजनीतिक निर्णय- प्रक्रिया में लोकतांत्रिक भागीदारी को मापने का संकेतक है।।
स्वतंत्रता संकेतकों को विकास के संकेतकों के घटक के रूप सम्मलित किया जाना चाहिए, क्योंकि विकास एक बहु-आयामी अवधारणा है। विकास को मापने के लिए व्यक्तिगत आय या मानव विकास सूचकांक का प्रयोग किया जाता है ये सभी महत्वपूर्ण है परंतु ये पर्याप्त नहीं हैं। स्वतंत्रता संकेतक जीवन की गुणवत्ता के बहुत ही महत्वपूर्ण घटक हैं, जो किसी भी देश के कामकाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस संकेतक को सम्मिलित किए बिना मानव विकास सूचकांक का निर्माण अधूरा है।
चीन में हालिया वृद्धि को 1978 में आरम्भ हुए आर्थिक सुधारों की दृष्टि में देखा जा सकता है। सुधारों के पहले चरण की शुरुआत कृषि, विदेशी व्यापार और निवेश क्षेत्रकों में हुई।
· हर परिवार को कम्यून भूमि का आवंटन कर एक छोटा टुकड़ा जुताई के लिए दिया गया। मगर उसका स्वामित्व सरकार के पास ही रहा।
· करों का भुगतान करने के बाद, इस भूमि से होने वाली आय को किसानों को अपने पास रखने की अनुमति दी गयी।
बाद के चरणों के सुधारों को औद्योगिक क्षेत्रों में आरम्भ किया गया:
· इस चरण में, उन निजी क्षेत्र की फर्म को सामानों का उत्पादन करने की अनुमति दी गयी जो स्थानीय संगठन के द्वारा परिचालित की जा रही थीं।
· इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार के स्वामित्व वाले उपक्रमों को निजी क्षेत्रों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
सुधार प्रक्रिया दोहरी मूल्य प्रणाली से भी सम्बन्धित थी, जो है:
मूल्य को दो तरीकों से तय करना:
· किसानों और उद्योग के द्वारा उत्पादित आगत और निर्गत के एक नियत हिस्से को सरकार के द्वारा निर्धारित किए गए मूल्यों पर खरीदा और बेचा जाता था।
· बाकी को बाज़ार के मूल्यों पर खरीदा और बेचा जाता था।
विदेशी निवेशों को आकर्षित करने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित किए गए।
भारत,
पाकिस्तान
और चीन की
विकासात्मक
रणनीतियों
में
निम्नलिखित
समानताएं
हैं:
i) तीनों ही देशों ने विकास के पथ पर एक साथ ही कदम बढाए हैं|
ii) तीनों ही देशों ने एक समान विकास की रणनीतियों का पालन किया है। सभी तीनों देशों ने अपने विकास को पंचवर्षीय योजना के माध्यम से आरम्भ किया और सार्वजनिक क्षेत्र पर जोर दिया है।
iii) 1980 तक तीनों ही देशों में एक समान आर्थिक वृद्धि दर और प्रति व्यक्ति आय थी।
iv) सभी तीनों देशों ने एक साथ ही आर्थिक सुधार आरम्भ किए।
हां, यह सत्य है कि जनांकिक मानक देशों की वृद्धि का निर्धारण करने के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारक होता है। अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य स्थितियों वाली जनसँख्या मानव पूंजी में बदल जाती है और इस प्रकार देश की आर्थिक वृद्धि दर बढ़ती है। वहीं ऐसी जनसँख्या देश पर बोझ बन जाती है अगर पर्याप्त स्वास्थ्य और शिक्षा नहीं है।
भारत, चीन और पाकिस्तान के जनांकिक मानकों की तुलना निम्नलिखित है:
• जनसंख्या: विश्व में सबसे अधिक जनसँख्या चीन में है और भारत दूसरे पायदान पर है। पाकिस्तान की जनसंख्या बहुत कम है और चीन या भारत से लगभग एक दसवां हिस्सा है।
• घनत्व: चूंकि इन तीनों देशों में भौगोलिक दृष्टि से चीन सबसे बड़ा देश है, इसका जनसँख्या घनत्व इन तीनों में सबसे कम है।
• जनसंख्या वृद्धि दर: जनसंख्या की वृद्धि दर पाकिस्तान में सबसे ज्यादा है उसके बाद भारत और चीन में सबसे कम है। चीन ने 1970 में अपनी जनसंख्या वृद्धि दर कम करने के लिए एक संतान नीति का नियम लागू किया।
• प्रजनन दर: प्रजनन दर चीन की तुलना में पाकिस्तान में बहुत अधिक है।
यह सच है कि भारत के वृद्धि पथ की तुलना हमेशा ही चीन और पाकिस्तान से की जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि इन देशों में लगभग एक समान ही विकास रणनीतियां अपनाई गयी हैं। उनमें से कुछ निम्न हैं:
मानव विकास सूचकांक को किसी देश के कुल विकास के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण संकेतक के रूप में माना जाता है। मानव विकास सूचकांक सकल घरेलू विकास को प्रतिस्थापित नहीं करता है बल्कि देश के वास्तविक विकास की समझ के लिए जोड़ता है। इसका अर्थ हुआ कि मानव विकास के तीन मुख्य आयामों में औसत उपलब्धियां हैं:
a) जन्म पर जीवन प्रत्याशा के द्वारा मापा गया स्वस्थ और लंबा जीवन
b) व्यस्क साक्षरता दर के द्वारा मापा गया ज्ञान
c) प्रति व्यक्ति सकल घरेलू अनुपात के द्वारा मापे गए जीवन के मानक
मानव विकास सूचकांक 0 के पैमाने (जो सबसे न्यूनतम मानव विकास को दिखाता है) और 1 के पैमाने पर (जो सबसे उच्च मानव विकास को परिलक्षित करता है) पर कई देशों की श्रेणी बनाता है।
निम्न तालिका भारत, पाकिस्तान और चीन के मानव विकास सूचकांक मूल्य को प्रदर्शित करती है:
|
देश |
मूल्य |
श्रेणी |
|
चीन भारत पाकिस्तान |
.719 .586 .537 |
91 135 146 |
तालिका प्रदर्शित करती है कि चीन मानव विकास सूचकांक के मामले में भारत और पाकिस्तान दोनों से बहुत आगे है। (मानव विकास रिपोर्ट 2014) |
अगर हम मानव विकास के अन्य संकेतकों जैसे गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का अनुपात, मृत्यु दर, सफाई तक पहुँच की तुलना करते हैं तो हम पाते हैं कि पाकिस्तान भारत से कहीं आगे हैं। पाकिस्तान भारत और चीन दोनों से ही अच्छी सफाई सुविधा देने के मामले में बहुत आगे हैं। भारत में मातृत्व मृत्यु दर पाकिस्तान की तुलना में बहुत अधिक है। मगर यह चीन में बहुत कम है। हालांकि मानव विकास के उपरोक्त बताए हुए संकेतक बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, मगर ये पर्याप्त नहीं हैं। इनके अलावा स्वतंत्रता संकेतक, नागरिकों के अधिकारों की संवैधानिक रक्षा और क़ानून के राज को भी सम्मिलित किया जाता है। इनके अभाव में मानव विकास सूचकांक की उपयोगिता सीमित हो जाएगी।
भारत,
चीन और
पाकिस्तान
में
जनांककीय
विशेषताएं
हैं:
(क)
जनसंख्या का आकार:
चीन 2013
में 1357
मिलियन की जनसँख्या
के साथ दुनिया
में सबसे अधिक
आबादी वाला देश
है। भारत 2013 में 1252 मिलियन
जनसँख्या के साथ
दूसरे स्थान पर
आता है। पाकिस्तान
जनसंख्या के मामले
में चीन और भारत
का दसवां हिस्सा
है। इसकी जनसँख्या
182 मिलियन
है(2013
में) है।
(ख)
वृद्धि दर: 2013 में 1.65% की जनसंख्या
की वृद्धि दर के
साथ जहां पाकिस्तान
सबसे ऊपर है तो
वहीं 1.24%
के साथ
भारत उसके पीछे
है। चीन में यह
0.49% के
साथ सबसे कम है।
जनसँख्या के नियंत्रण
के लिए 1970 के दशक में
चीन में अपनाई
गयी एक संतान नीति
इसका सबसे बड़ा
कारण है | इसका मतलब
यह हुआ कि कुछ समय
के बाद चीन में
एक बहुत बड़ी वृद्ध
जनसँख्या की देखभाल
के लिए बहुत ही
कम युवा लोग रह
जाएंगे। चीन में
प्रजनन दर बहुत
कम है जबकि यह पाकिस्तान
में बहुत अधिक
है।
ग) लिंगानुपात:
जनसंख्या में
स्त्रियों और
पुरुषों की संख्या
के बीच के अनुपात
को लिंग अनुपात
कहा जाता है। तीनों
ही देषों में महिलाओं
के प्रति भेदभाव
देखा गया है। वर्ष
2013 में भारत में
प्रति हजार पुरूषों
पर 934 महिलाएं थीं।
पाकिस्तान में
यह आंकड़ा प्रति
हजार पुरूषों
पर 947 महिलाओं का
था। चीन में यह
प्रति एक हजार
पुरूषों पर 929 महिलाओं
का था।
(घ) जनसँख्या का घनत्व: जनसंख्या के घनत्व का अर्थ है प्रति वर्ग किलोमीटर में रहने वाले व्यक्तियों की औसत संख्या। यह 2013 में चीन में सबसे कम अर्थात 145 थी, 2013 पाकिस्तान में 236 था तो वहीं भारत में 2013 में 421 रही, जो इन तीनों देशों में सबसे आधिक थी। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जनसँख्या के घनत्व और आर्थिक विकास के स्तर के बीच इन तीनों देशों में कोई संबंध नहीं है।
जनांकीय संकेतक चुनें
|
देश |
अनुमानित जनसँख्या (मिलियन में) |
जनसँख्या की वार्षिक वृद्धि (2001-2010) |
घनत्व (प्रति वर्ग किलोमीटर) |
लिंगानुपात |
प्रजनन दर |
शहरीकरण (%) |
|
भारत चीन पाकिस्तान |
1252 1357 182 |
1.24 0.49 1.65 |
421 145 236 |
934 929 947 |
2.6 1.6 3.3 |
32 53 38 |


आय एवं व्यय खाता एवं लाभ-हानि खाते में निम्नलिखित अंतर है
|
अन्तर का आधार |
आय-व्यय खाता |
लाभ-हानि खाता |
|
बनाया जाना |
यह गैर-व्यवसायिक संस्थाओं द्वारा बनाया जाता है। |
यह व्यवसायिक संस्थाओं द्वारा बनाया जाता है। |
|
बनाना का उद्देश्य |
इसके द्वारा यह ज्ञात किया जाता है कि आय का व्यय पर आधिक्य है अथवा व्यय का आय पर आधिक्य है। |
इसके द्वारा यह ज्ञात किया जाता है कि व्यापार में लाभ हो रहा है अथवा हानि हो रही है। |
|
शुद्धता की जाँच |
इसमें शुद्धता की जॉच के लिए पहले आगम-शेधन खाता बनाया जाता है। |
इसमें शुद्धता की जॉच के लिए पहले तलपट बनाया जाता है। |
|
बनाने का आधार |
यह खाता प्रायः रोकड़ पुस्तक एवं अन्य सम्बन्धित सूचनाओं के आधार पर बनाया जाता है। |
यह खाता प्रायः तलपट के आधार पर बनाया जाता है। |
|
पक्ष-शीर्षक |
इस खाते में बायीं ओर व्यय तथा दायीं ओर आय शीर्षक लिखा जाता है। |
इस खाते में इस प्रकार के शीर्ष नहीं डाले जाते हैं। |




|
मदें |
प्राप्ति एवं भुगतान खाता |
आय-व्यय खाता |
आर्थिक चिट्ठा |
|
चन्दा |
प्राप्ति और भुगतान खाते के प्राप्ति पक्ष में वर्ष के दौरान प्राप्त चन्दा (भूत, वर्तमान या भविष्य का) लिखा जाता है। |
आय-व्यय खाते के केडिट पक्ष में वर्तमान वर्ष का कुल चन्दा (प्राप्त हो चुका + अदत्त चन्दा) लिखा जाता है। |
आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में वर्तमान वर्ष का अदत्त चन्दा तथा दायित्व पक्ष में अग्रिम चन्दा लिखा जाता है। विशेष कार्य हेतु प्राप्त चन्दा तथा सामान्य चन्दे के पूँजीगत भाग को दायित्व पक्ष में लिखा जाता है। |
|
दान |
प्राप्ति और भुगतान खाते के प्राप्ति पक्ष में वर्ष के दौरान प्राप्त सामान्य दान तथा विशिष्ट दान को लिखा जाता है। |
आय-व्यय खाते के क्रेडिट पक्ष में सामान्य दान को लिखा जाता है। |
आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष में विशिष्ट दान को लिखा जाता है। |