A.
प्राकृतिक संसाधन
B.
वन संसाधन
C.
मानव संसाधन
D.
खनिज संसाधन
यदि उचित समर्थन और निवेश प्रदान किया जाए तो अकुशल मानव संसाधनों को मानव पूंजी में बदला जा सकता है।
A.
12 प्रतिशत
B. 16 प्रतिशत
C. 18 प्रतिशत
D. 17 प्रतिशत
वर्ष 2011-12 में शहरी क्षेत्रों में शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी दर ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं की तुलना में कम थी। ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ यह 19% थी वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह 16% थी।
A.
टीके
B. बीमारी के दौरान चिकित्सीय हस्तक्षेप
C. स्वास्थ्य साक्षरत का विस्तार
D. साफ पेयजल का प्रावधान
उपचारात्मक औषधियां या रोग के दौरान चिकित्सीय हस्तक्षेप स्वास्थ्य व्यय का ही एक प्रकार है। स्वास्थ्य व्यय के कुछ और रूप हैं टीकाकरण, स्वास्थ्य साक्षरता का विस्तार और साफ पेयजल के प्रावधान।
A.
शिक्षित कार्य बल
B.
कार्यरत कार्यबल
C.
भौतिक पूंजी
D.
बड़ी श्रम बल
शिक्षा समाज में होने वाले परिवर्तनों और वैज्ञानिक विकासों को समझने के लिए जानकारी प्रदान करती है। शिक्षित श्रम बल आसानी से कई नई पद्धतियों को अपना सकता है।
A.
30 प्रतिशत
B. 25 प्रतिशत
C. 22 प्रतिशत
D. 34 प्रतिशत
एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार,एन.एस.एस.ओ के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011-12 में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षित युवतियों की बेरोजगारी दर 30% थी। वे सर्वाधिक प्रभावित थीं।
A.
खिसना
B.
आन्दोलन
C.
प्रवासन
D.
पारिवाहन
बेहतर नौकरी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने को प्रवासन कहते हैं।
1964-66 में शिक्षा आयोग ने सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 6% शिक्षा पर व्यय करने की अनुशंसा की जिससे शिक्षा की उपलब्धियों में उल्लेखनीय वृद्धि को हासिल किया जा सके।
विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना 1956 में शिक्षा मंत्रालय के द्वारा की गयी थी। यह शिक्षा क्षेत्र को निगमित करने वाला शैक्षणिक संस्थान है।
A.
सामान्य शिक्षा
B.
कौशल और रोजगार
C.
भौतिक शिक्षा
D.
प्रौढ़ शिक्षा
यह वह शिक्षा है जिसका लक्ष्य किसी विशिष्ट काम के लिए आवश्यक कौशल प्रदान करना होता है।
शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय का वांछित स्तर देश के सकल घरेलू उत्पाद का 6% है। सरकार देश में साक्षरता दर को बेहतर करने के लिए शिक्षा को प्रोत्साहित कर रही है।
लोग श्रम बाज़ार और अन्य बाजारों जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य पर जानकारी हासिल करने के लिए पैसे खर्च करते हैं। यह सूचना मानव पूंजी में निवेश तथा मानव पूंजी भंडार के प्रभावी प्रयोग के संबंध में आवश्यक है।
A.
1-2 प्रतिशत
B. 5-6 प्रतिशत
C. 3-6 प्रतिशत
D. 3-4 प्रतिशत
देश में 3-6 प्रतिशत प्राथमिक स्तर तक पढ़े लिखे लोग बोरोजगार हैं| ये लोग अकुशल श्रमिकों के रूप में कार्य करते हैं चूंकि ऐसे कामों में किसी भी तरह के उच्च प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है| इसलिए उनके बीच बेरोजगारी कम होती है|
A.
शिक्षा क्षेत्र
B.
प्राथमिक क्षेत्र
C.
सार्वजनिक क्षेत्र
D.
निजी क्षेत्र
शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) स्कूल शिक्षा से संबंधित शैक्षणिक मामलों पर केन्द्र और राज्य सरकारों को सलाह देने के लिए तथा उनकी सहायता के लिए एक शीर्ष संसाधन संगठन है।
A.
लोगों
के पास
रोजगार के कम
अवसर और कम
वेतन वाली
नौकरी होती
हैं।
B. लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है।
C. लोग अधिक कार्य करना पसंद करते हैं
D. लोग शैक्षणिक संस्थानों में नामांकित होते हैं
ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिक जनसंख्या अनुपात अधिक होता है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को अधिक वेतन वाली नौकरी नहीं मिलती है| इस प्रकार वे रोजगार बाज़ार में अधिक प्रतिभागिता करते हैं।
बेरोजगारी पर आंकड़ों के तीन स्रोत निम्न हैं:
i) महापंजीयक और जनगणना आयुक्त के कार्यालय
ii) राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन
राष्ट्रीय रोजगार सेवा और रोजगार कार्यालय
बेरोजगारी वह अवस्था है जिसमें लोग काम के अभाव के कारण रोजगार कार्यालयों, मध्यस्थों, मित्रों, संबंधियों आदि के माध्यम से या संभावित रोजगार दाताओं को आवेदन देकर प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य तलाशते हैं।
मौसमी बेरोजगारी वह स्थिति है जिसमे किसी व्यक्ति को वर्ष के एक विशेष सत्र के दौरान ही रोजगार मिलता है और अन्य सत्रों के दौरान वह बेरोजगार रहता है।
छोटे उद्योग में कम पूंजी लगाने की आवश्यकता होती है। इनमें पूंजी की प्रति इकाई के साथ अधिक श्रमिकों को नियुक्त किया जाता है। इस प्रकार छोटे उद्योगों के विकास से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी में कमी लाई जा सकती है।
स्वनियोजित कार्यों या नियमित वेतन कार्यों से हटकर अनियत मजदूरी में कार्यरत होने की प्रवृत्ति को अनियतीकरण कहते हैं। भारत में पिछले चार दशकों से कार्यबल का अनियतीकरण हो रहा है।
सार्वजनिक प्रतिष्ठान और निजी प्रतिष्ठान जिनमें दस से अधिक श्रमिक कार्यरत हों औपचारिक क्षेत्रक कहलाते हैं| इन क्षेत्रों में श्रमिकों को नियमित वेतन और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लाभ मिलते हैं|
अनौपचारिक क्षेत्रक के प्रतिष्ठानों और उनके श्रमिकों की आय नियमित नहीं होती| इन क्षेत्रकों को सरकार से किसी प्रकार का संरक्षण और नियमन नहीं मिलता। इस क्षेत्रक में कार्यरत श्रमिकों को बिना क्षति पूर्ति के ही काम से निकाल दिया जाता है|
महिलाओं के घरेलू कार्य किसी आर्थिक विचार से प्रेरित नहीं होते हैं बल्कि सामाजिक, नैतिक और निजी आधार पर किए जाते हैं। इसलिए महिलाओं के घरेलू कार्य को सकल घरेलू उत्पाद में सम्मिलित नहीं किया जाता है।
ऐसे मजदूर जो अन्य लोगों के खेतों या निर्माण स्थलों पर अनियत रूप से कार्य करके पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं वे अनियत मजदूर कहलाते हैं।
शिक्षित बेरोजगारी मुख्यत: निम्न कारणों से उत्पन्न होती है-
1. देश में सामान्य शिक्षा का तेजी से विस्तार।
2. त्रुटिपूर्ण शिक्षा प्रणाली जो लोगों को व्यावसायिक प्रशिक्षण नहीं देती|
जो लोग दसवीं उत्तीर्ण या उच्च शिक्षित होने के बावजूद रोज़गार नहीं प्राप्त कर पाते वे लोग शिक्षित रूप से बेरोजगार कहलाते हैं।
श्रमिक जनसंख्या अनुपात एक देश के कुल श्रमबल को उसकी कुल जनसंख्या के प्रतिशत के रूप में दर्शाता है।
जब सकल घरेलू उत्पाद संवृद्धि दर बढ़ रही हो लेकिन रोजगार वृद्धि दर उत्पाद संवृद्धि दर से काफी कम हो तो इस परिघटना को रोजगारहीन संम्वृद्धि कहते हैं|
महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 के तेहत सरकार देश के ग्रामीण परिवारों के सदस्यों को अकुशल श्रमिक के रूप में कार्य करने के लिए 100 दिन की दिहाड़ी उपलब्ध कराने की गारंटी देती है।
महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम वर्ष 2005 में लागू हुआ था|
निर्धन लोग इस स्थिति में नहीं होते कि वे अपनी या अपने बच्चों की कुशलता और उत्पादकता में वृद्धि कर सकें। गरीब व्यक्ति के लिए अपनी मानसिक क्षमता में वृद्धि करने के लिए उचित शिक्षा की भी व्यवस्था नहीं होती है। शिक्षा और प्रशिक्षण की कमी के कारण उनको रोजगार नहीं मिल पाता| गरीब लोगों के पास स्वनियोजित काम करने के लिए कोई संसाधन भी नहीं होते| इस प्रकार बेरोजगारी के कारण गरीब लोग मजदूरी या वेतन अर्जित नहीं कर पाते और निर्धन बने रहते हैं|
उदहारण के लिए- गरीबी के कारण छोटे किसान अपने खेत की कार्यकुशलता और उत्पादकता को बनाए रखने में असक्षम होते हैं। उधार पर बीज और उपकरणों को खरीदने वे ऋणग्रस्त हो जाते हैं| अंत में साहूकार या बैंक उनका खेत जप्त कर लेते हैं| परिणामस्वरूप छोटे किसान बेरोजगार हो जाते हैं|
प्रायः नियमित वेतन वाले कार्यों में उच्च कौशल और शिक्षा स्तर की आवश्यकता होती है।
भारत में पुरषों की तुलना में महिलाओं को कम कौशल प्रशिक्षण और शिक्षा मिलती है, संभवतः इसी कारण से नियमित वेतनभोगी रोजगार धारियों में महिलाओं का अनुपात कम है।
अप्रत्यक्ष श्रेणी में सरकार द्वारा रोजगार सृजन इस प्रकार होता हैं –
जब सरकारी उद्यमों में उत्पादन स्तर में वृद्धि होती है, तो उन उद्यमों को सामग्रियों की पूर्ति करने वाले निजी उद्यमों को भी अपना उत्पादन बढ़ाने का अवसर मिलता है।
इससे अर्थव्यवस्था में नए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।
उदाहरण के लिए –
जब सरकार आधारिक संरचना जैसे की विद्यालय, अस्पताल, सड़क आदि में वृद्धि करती है तो इससे निर्माण सामग्री उत्पादित करने वालीं निजी कंपनियों, जैसे सीमेंट कंपनियों, में उत्पादन और रोजगार बढ़ता हैं।
इस प्रकार सरकार, अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसरों का सृजन करती है।
सरकार के रोजगार सृजन कार्यक्रमों को निम्न कारणों से महत्वपूर्ण माना जाता है–
इनके माध्यम से सरकार, प्राथमिक जनस्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, ग्रामीण आवास, ग्रामीण जलापूर्ति और पोषण जैसी सेवाएँ भी उपलब्द करा पाती है|
A.
उत्तर
प्रदेश
B. केरल
C. तमिलनाडु
D. पंजाब
उत्तरप्रदेश, बिहार और राजस्थान ऐसे राज्य हैं जो स्वास्थ्य देखभाल में पिछड़े हुए हैं।
ऊर्जा के अव्यावसायिक स्रोत वे स्रोत होते हैं जिनका सामान्यत कोई मूल्य नहीं होता है। इनमें लकड़ी, कृषि अपशिष्ट और पशुओं का गोबर सम्मिलित होता है । समय के साथ ऊर्जा के इन स्रोतों का भी मूल्यांकन किया जाने लगा है, ख़ास तौर से शहरी क्षेत्रों में।
A.
914
B. 924
C. 927
D. 972
जनगणना 2011 के अनुसार भारत में लिंगानुपात 927 से घटकर 914 हो गया है।
A.
कृषि
क्षेत्र
B. आधारिक संरचना
C. उद्योग
D. परिवहन
आधारिक संरचना अर्थव्यवस्था में उत्पादन की गतिविधियों में सहयोग करती है। आधारिक संरचना की वृद्धि का अर्थ है उत्पादन गतिविधियों में बहुआयामी वृद्धि और मानव के विकास में समृद्धि।
बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश ऐसे राज्य है जो अपेक्षाकृत रूप से स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में काफी पिछड़े हुए हैं।
ऊर्जा के मूल स्रोतों में से एक है ऊष्मीय ऊर्जा। अन्य स्रोत हैं जल विद्युत् ऊर्जा और नाभिकीय ऊर्जा।
A.
भारत
में विदेशों
से उपचार के
लिए रोगियों
का आना
B. प्रवासी भारतीयों का अपने रिश्तेदारों से मिलने आना
C. विदेशी चिकित्सकों की एक टीम का भारत आना
D. भारतीय चिकित्सकों की एक टीम का दूसरे देशों में जाना
भारत में प्रमाणित पेशेवर चिकित्सक और उच्च मानकों की चिकित्सीय सुविधाएं अन्य देशों की तुलना में बहुत ही कम मूल्यों पर उपलब्ध हैं। यह कई विदेशियों को भारत में सर्जरी, लिवर प्रत्यारोपण, दंत चिकित्सा और कोस्मेटिक सर्जरी कराने के लिए भी आकर्षित कर रहा है।
A.
उत्तरी
क्षेत्र
B. दक्षिणी क्षेत्र
C. पूर्वी क्षेत्र
D. पश्चिमी क्षेत्र
किसी भी ऊष्मीय संयंत्र की कुशलता को संयंत्र लोड कारक मापता है। यह दक्षिणी क्षेत्र में सर्वाधिक है।
ज्वारीय ऊर्जा कभी न ख़त्म होने वाला स्रोत है। इसकी पूंजीगत लागत अधिक और सञ्चालन लागत कम है।
काश्तकारी संगठन एक ऐसा ग्रामीण संगठन है जहां महिला स्वास्थ्य कर्मियों को न्यूनतम लागत पर छोटी-मोटी बीमारियों का उपचार करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
A.
शहरी
क्षेत्र
B. ग्रामीण क्षेत्र
C. अर्द्ध शहरी क्षेत्र
D. नगर
लगभग 90% ग्रामीण परिवार खाना पकाने के लिए जैव ईंधन का प्रयोग करते हैं|
जैव ऊर्जा से अर्थ उस ऊर्जा से है जो जैव ईंधनों जैसे गोबर, कृषि अपशिष्टों से निर्मित होती है।
आधारिक संरचना का अर्थ अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक संरचना के मूल तत्चों से है जो अर्थव्यवस्था में सभी उत्पादन सुविधाओं के लिए एक सहायक प्रणाली के रूप में कार्य करते हैं।
भारत में कोयले के दो मुख्य उत्पादक हैः
· सिंगरेनी कोलिरीज कंपनी लिमिटेड तथा
· कोल इंडिया लिमिटेड |
आर्थिक आधारिक संरचना से अर्थ वर्तमान आर्थिक प्रणाली और स्थितियों से है जो किसी देश की विकास प्रक्रियाओं में सहयोग करती हैं। उदाहरण के लिए सड़कें, हवाई अड्डे आदि |
आधारिक संरचना की दो श्रेणियां हैं :
क- आर्थिक आधारिक संरचना और
ख- सामाजिक आधारिक संरचना
ऊर्जा के प्राथमिक स्रोतों में वे स्रोत हैं जिन्हें निर्माण प्रक्रिया के लिए ऊर्जा देने के लिए और साथ ही विद्युत उत्पादन के लिए ऊर्जा देने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिए पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा आदि।
सामाजिक आधारिक संरचना से अर्थ उन सामाजिक प्रणाली और परिस्थितियों से है जो एक अर्थव्यवस्था को सहयोग करती हैं। उदाहरण के लिए, स्कूल, अस्पताल आदि।
संयंत्र लोड कारक विद्युत् उत्पादन की कुल क्षमता के लिए वास्तविक उत्पन्न विद्युत का अनुपात है।
गैस ऊर्जा का एक व्यावसायिक स्रोत है। तरलीकृत गैस को रसोई गैस के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसे ईंधन के रूप में कुछ थर्मल संयंत्रों में भी प्रयोग किया जाता है। भविष्य में मांग और तरल हाइड्रोकार्बन की पूर्ति के बीच अंतर को पूरा करने में प्राकृतिक गैस एक मुख्य भूमिका निभा सकती है। वर्तमान में, इसे उर्वरक जैसे मूल सेक्टर के उद्योगों के लिए एक फीड स्टॉक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
राज्य
विद्युत
बोर्ड निम्न
कारणों से
अत्यधिक
नुकसान होता
है:
i) अत्यधिक
प्रसारण और
वितरण
नुकसान
ii) बिजली
के कम दाम, ख़ास
तौर पर
किसानों के
लिए
iii) बिजली
की चोरी
विद्युत उत्पादन तीन मुख्य स्रोतों से होता है:
i) तापीय ऊर्जा: जब कोयले के प्रयोग से ऊर्जा उत्पन्न होती है तो उसे तापीय ऊर्जा कहते हैं।
ii) जल ऊर्जा: नदी या ऊंचे बांधों के जल की गातिज ऊर्जा से बिजली उत्पन्न करते हैं, तो इसे जल-ऊर्जा कहते हैं।
iii) नाभिकीय ऊर्जा: जब ऊर्जा का उत्पादन विकिरण तत्वों जैसे यूरेनियम, थोरियम और प्लूटोनियम से होता है तो इसे नाभिकीय या आणविक ऊर्जा कहते हैं।
ऊर्जा के व्यावसायिक स्रोत वे स्रोत हैं, जिनके लिए उपभोक्ताओं मूल्य चुकाना पड़ता हैं। इसे अधिकतर व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया जाता है जैसे कारखाने में, खेतों में और व्यावसायिक स्थापनाओं में। कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और जल ऊर्जा इस श्रेणी में आते हैं।
विश्व रोग भार वह सूचक है जिसे किसी बीमारी के कारण असमय मरने वाले लोगों की संख्या को जानने लिए और उनके द्वारा बीमारी के कारण असमर्थता में बिताए गए सालों की संख्या जानने के लिए प्रयोग किया जाता है।
ऊर्जा के गैर परम्परागत स्रोत वे स्रोत हैं, जिनमें आम तौर से कोई मूल्य नहीं होता है। इनमें लकड़ी, कृषि अपशिष्ट और पशुओं का गोबर सम्मिलित होता है।
भारत में चिकित्सा की छ प्रणालियाँ हैं: :
i) आयुर्वेद
ii) योग
iii) यूनानी
iv) सिद्धा
v) प्राकृतिक
vi) होम्योपैथी
हाल ही में, भारत सरकार ने गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों, जिनमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा शामिल हैं, के विकास के प्रति उच्च प्राथमिकता प्रदर्शित की है; गैर-परंपरागत ऊर्जा का उपयोग करने के लिए प्रौद्योगिकी विकसित करने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। लगभग 210 स्थान ऐसे हैं, जहां पर हवा को बिजली पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। सौर फोटोवोल्टिक भी एक बड़ी उम्मीद है।
जो भी बिजली उत्पन्न होती है उसका संप्रेषण और वितरण किया जाना चाहिए। अगर संप्रेषित और वितरित बिजली उत्पन्न बिजली से कम है तो इसे संप्रेषण और वितरण नुकसान के रूप में जाना जाता है। संप्रेषण और वितरण नुकसान को कम करने के लिए निम्न उपायों को किया जा सकता है:
i) बिजली के संप्रेषण और वितरण की तकनीकों को बेहतर करने के द्वारा।
ii) बिजली की हेराफेरी को कम करने के द्वारा
iii) लाइन कर्मी के सहयोग के साथ बिजली की चोरी को कम करने के द्वारा
iv) बिजली के वितरण का निजीकरण करने के द्वारा
हालांकि कोयले के दहन से कई प्रकार का प्रदूषण होता है, फिर भी हम प्रयोग के लिए तापीय ऊर्जा को चुनते हैं क्योंकि अधिकतर संभावित जल ऊर्जा को ग्रहण कर पाना भौगोलिक कारणों के कारण बहुत ही कठिन है और उत्तर के क्षेत्रों के साथ साथ पूर्वोत्तर में भी बहुत ही कठिन है| इसके साथ ही जल-ऊर्जा परियोजनाओं के निर्माण में भी काफी समय लगता है।
भारत में महिलाओं का स्वास्थ्य निम्न कारणों से, चिंता का विषय बना हुआ है:
i) महिला भ्रूणह्त्या के मामलों में वृद्धि हो रही है।
ii) भारत में अभी भी मातृमृत्यु दर बहुत अधिक है।
iii) हर वर्ष 15 वर्ष से कम आयु की लगभग 3 लाख लडकियां माँ बन जाती हैं।
iv) लगातार गर्भाधान से महिलाओं में रक्तहीनता हो जाती है जिससे 19% तक मातृमृत्यु होती हैं।
v) भारत में गर्भपात भी मातृमृत्यु का बहुत बड़ा कारण है।
हमारे देश में लोगों के स्वास्थ्य के संबंध में निम्न विशेषताएँ हैं:
i) स्वतंत्रता के बाद से ही स्वास्थ्य सेवाओं के प्रावधानों में महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है।
ii) स्वास्थ्य सेवाओं में विस्तार के परिणामस्वरूप, स्वास्थ्य संकेतकों में भी सुधार हुआ है। उदाहरण के लिए, मातृ मृत्युदर में गिरावट आई है और जीवन की प्रत्याशा में वृद्धि हुई है।
iii) सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं अधिकतर जनसँख्या के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके परिणामस्वरूप निजी क्षेत्र की भूमिका में विस्तार हो रहा है।
iv) ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों और गरीब और अमीर के बीच स्वास्थ्य सेवाओं के प्रयोग को लेकर बहुत ही अंतर है।
v) पूरे ही देश में महिलाओं का स्वास्थ्य एक चिंता का विषय है। महिला भ्रूण ह्त्या के मामलों में भी वृद्धि हुई है।
निम्नलिखित सुधार को हाल ही में भारत में ऊर्जा संकट की पूर्ति करने के लिए आरम्भ किया गया है:
i) सरकार ने ऊर्जा के दो स्रोतों जल और वायु को प्रोत्साहित किया है ।
ii) सरकार आणविक और नाभिकीय ऊर्जा को भी प्रोत्साहित कर रही है।
iii) सरकार ने सुनिश्चित किया है संयंत्रों को उचित तरीके से संचालित किया जाए जिससे स्थापित क्षमता का पूर्ण उपयोग हो सके।
iv) राज्य विद्युत् बोर्ड को संप्रेषण और वितरण नुकसान को कम करने के लिए निर्देश दिया गया है।
v) निजी क्षेत्रों और विदेशी निवेश को ऊर्जा क्षेत्र में कार्य करने की अनुमति प्रदान कर दी गयी है।
आधारिक संरचना सुविधाएं, निम्नलिखित तरीकों से उत्पादन में वृद्धि करती हैं:
1. आधारिक संरचना के निर्गत जैसे ऊर्जा, पानी आदि को उत्पादन में आगत के रूप में प्रयोग किया जाता है।
2. परिवहन लोगों को उत्पादन और निवेश के लिए व्यक्तियों और सामग्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है।
3. ऊर्जा आर्थिक गतिविधियों के संचालन में सहयोग करता है जैसे कारखानों में रोशनी, मशीनों को चलाना आदि।
4. आधारिक संरचना समाज के पूंजीगत स्टॉक का एक घटक है। सीमेंट, स्टील आदि उत्पादन गतिविधियों को तेज करते हैं।
5. जितनी बड़ी आधारिक संरचना की सुविधाएं होंगी, उत्पादकों के लिए अधिक उत्पादन के उतने ही अधिक अवसर और निवेश के लिए होंगे।
संयंत्र लोड कारक तापीय ऊर्जा संयंत्रों की परिचालनात्मक कुशलता का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। संयंत्र लोड कारक या पी एल एफ कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता के लिए बिजली उत्पादन का अनुपात है। इस प्रकार
संयंत्र लोड कारक = वास्तविक सृजित ऊर्जा/ऊर्जा सृजन की कुल क्षमता।
संयंत्र लोड कारक को निम्न उपायों से बेहतर किया जा सकता है:
i) प्रबंधन और परिचालन को बेहतर करना
ii) उचित रखरखाव
iii) उचित गुणवत्ता के कोयले की नियमित उपलब्धता को सुनिश्चित करना
आधारिक संरचना का अर्थ उन भौतिक सुविधाओं और सार्वजनिक सेवाओं से है जो एक आर्थिक प्रणाली को कुशलता से और प्रभावी रूप से कार्य करने के लिए सहयोग प्रदान करता है| आधारिक संरचना से अर्थ है मूल संरचना अर्थात नींव से है । अर्थशास्त्र के संबंध में, आधारिक संरचना का अर्थ है उन सहायक सेवाओं से है जो कृषि और उद्योग की वृद्धि में सहायता करती हैं, जो प्रत्यक्ष उत्पादक गतिविधियाँ होती हैं। आधारिक संरचना में सड़क, रेलवे, पत्तन, हवाई अड्डे, बाँध, विद्युत् केंद्र, तेल और गैस पाइपलाइन, दूरसंचार सुविधाएं, शैक्षणिक प्रणाली, स्वास्थ्य प्रणाली और मौद्रिक प्रणाली आदि सम्मिलित है। ऊर्जा, बिजली, परिवहन, संचार आदि सम्मिलित हैं।
आधारिक संरचना की निम्न विशेषताएं हैं:
i) आधारिक संरचना सभी गतिविधियों का आधार है।
ii) आधारिक संरचना एक स्थाई प्रवृत्ति की होती है। आधारिक संरचना को काफी लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है।
iii) आधारिक संरचना कच्चे माल की पूर्ति का एक माध्यम है।
हमारे स्वास्थ्य क्षेत्रक की कुछ कमजोरियां निम्नलिखित हैं:
i) हमारी वर्तमान स्वास्थ्य आधारिक संरचना का वितरण अपर्याप्त है। अधिकतर आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं शहरी क्षेत्रों में ही उपलब्ध हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं अपर्याप्त हैं। भारत की लगभग 70% जनसँख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, मगर केवल हर पांच में से एक अस्पताल ही ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित है।
ii) कर्मियों का अभाव: हमारे पास पर्याप्त संख्या में चिकित्सक (चिकित्सा कर्मी) और उपचार में उनकी सहायता करने वाले कर्मियों (अर्द्ध चिकित्साकर्मी) का अभाव है।
iii) निर्धनों के लिए चिकित्सा: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में निर्धन अपनी आय का 12% चिकित्सा में व्यय कर देते हैं जबकि अमीर केवल 2% ही व्यय करते हैं।
iv) निर्धन स्त्रियों का स्वास्थ्य: भारत में लिंगानुपात में लगातार गिरावट आ रही है। महिला भ्रूण हत्या के मामलों में निरंतर वृद्धि हो रही है। भारत में महिलाओं में मृत्यु की दर अभी भी बहुत अधिक है। मातृ मृत्यु
इसका सबसे प्रमुख कारण है।
भारत के सामने ऊर्जा क्षेत्र में कुछ मुख्य चुनौतियां निम्नलिखित हैं:
भारत में, ऊर्जा के कुल उपभोग का 74% व्यावसायिक ऊर्जा का उपभोग है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा 54% के साथ कोयले का है, उसके बाद तेल 32% के साथ है, प्राकृतिक गैस 10% और उसके बाद 2% जल ऊर्जा है।
कुल ऊर्जा उपभोग का 26% गैर व्यावसायिक उपयोग है। ऊर्जा के गैर व्यावसायिक स्रोत में लकड़ी, गोबर, और कृषि अपशिष्ट सम्मिलित हैं। तेल और पेट्रोलियम का आयात बहुत अधिक होता है। भविष्य में इनकी मांग में वृद्धि होने की संभावना है।
विश्व रोग भार वह सूचक है जिसे किसी बीमारी के कारण असमय मरने वाले लोगों की संख्या को जानने लिए और उनके द्वारा बीमारी के कारण असमर्थता में बिताए गए सालों की संख्या जानने के लिए प्रयोग किया जाता है। एक अध्ययन से पता चला है कि हालांकि भारत में दुनिया की 17% जनसँख्या है मगर इस पर 20% विश्व रोग भार है।
संक्रामक रोग जैसे डायरिया, मलेरिया, और तपेदिक भी आधे से अधिक विश्व रोग भाग का निर्माण करते हैं। हर साल 5 लाख से अधिक बच्चे जल संक्रमित रोगों से मर जाते हैं। एड्स का खतरा भी बहुत है। कुपोषण के भी बुरे प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य पर होते हैं। टीके की दवा की अपर्याप्त आपूर्ति से भी बच्चे मौत का शिकार होते हैं, जिनसे सरलता से बचा जा सकता है।
इस प्रकार भारत में उच्च विश्व रोग भार को देखते हुए, कई उपायों को उठाया जाना आवश्यक है जैसे जागरूकता में वृद्धि, सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र की कुशलता आदि।
भारत में स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की तीन स्तरीय प्रणाली है, जैसा नीचे दिखाया गया है:
1. प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल: प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में शिक्षा, जागरूकता पैदा करना, मातृत्व और शिशु देखभाल, टीकाकरण जैसी सेवाएं सम्मिलित होती हैं। ऑक्सीलियरी नर्सिंग मिडवाइफ ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने वाला प्रथम व्यक्ति होती है। प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना गाँवों और छोटे कस्बों में की गयी है। इनमें अक्सर एक डॉक्टर, एक नर्स और सीमित दवाइयां होती हैं।
2. द्वितीयक स्वास्थ्य केंद्र: जब किसी रोगी का उपचार प्राथमिक चिकित्सा केंद्र में नहीं हो पाता है तो उन्हें द्वितीयक या माध्यमिक चिकित्सा संस्थानों में भेजा जाता है। इनमें बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं होती हैं जैसे ईसीजी मशीनें, एक्सरे, सर्जिकल उपकरण आदि | ये जिला मुख्यालयों और बड़े कस्बों में स्थित होते हैं|
3. तृतीयक स्वास्थ्य केंद्र: इनमें वे संस्थान सम्मिलित होते हैं जो मेडिकल शिक्षा और विशिष्ट स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली, पोस्ट ग्रेज्युएट संस्थान, चंडीगढ़ आदि।
A.
पर्यावरण पर नियंत्रक राष्ट्रीय सम्मलेन
B.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मलेन
C.
पर्यावरण क्षरण के लिए संयुक्त राष्ट्र सभा
D.
संयुक्त राष्ट्र विकसित देश
धारणीय विकास की अवधारणा पर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मलेन (UNCED) ने बल दिया, और इसे इस प्रकार परिभाषित किया - “ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति क्षमता का समझोता किये बिना पूरा करें”|
अप्पिको आन्दोलन वर्ष 1983 में कर्नाटक में वन्यकटाव के विरोध में आरंभ हुआ था। लगभग 160 पुरुष, स्त्री और बच्चे वृक्षों से चिपक कर खड़े हो गए और इससे लकड़हारों/वृक्ष काटने वालों को वापस जाने पर विवश होना पड़ा था।
कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि के कारण महासागरों और पृथ्वी के निचले वायुमंडल के औसत तापमान में वृद्धि देखी गयी है। इसे वैश्विक उष्णता कहते हैं |
पर्यावरण की पर्यावरणीय प्रदूषण को अवशोषित करने की क्षमता को अवशोषी क्षमता कहते है।
गैर-नवीकरणीय संसाधन वे संसाधन होते हैं जो हमारे पास एक स्थिर या नियत भण्डार में उपलब्ध होते हैं जो कि निष्कर्षण और उपयोग से समाप्त हो जाते हैं। अर्थात जिन्हें पुनर्सृजित नहीं किया जा सकता है जैसे कोयला, गैस, भूमि आदि।
नवीनीकरण-योग्य संसाधन वे हैं जिनका उपयोग संसाधन के क्षय या समाप्त होने की आशंका के बिना किया जा सकता है, अर्थात् संसाधनों की पूर्ति निरंतर बनी रहती है।
उदाहरण के लिए: पेड़, हवा, सूरज की रोशनी, आदि |
संसाधनों का एकमात्र स्रोत प्रकृति या पर्यावरण है।
संसाधनों के क्षरण से अर्थ है संसाधनों की उत्पादक क्षमता में कमी जिससे उपज स्तर में स्थाई कमी आ जाती है।
पर्यावरण से संबंधित दो समस्याएं हैं, जिन पर तुरंत ही हमें ध्यान देने की आवश्यकता है:
i) प्रदूषण की समस्याएँ
ii) संसाधनों के क्षरण की समस्याएं
'धारण क्षमता' और ' अवशोषी क्षमता' की सीमाओं का उल्लंखन जीवन के अत्यावश्यक कार्यों को करने के लिए पर्यावरण की विफलता को दर्शता है।
इसके परिणामस्वरूपः पर्यावरण संकट और बड़े पैमाने पर संसाधनों का क्षय जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती है|
अजैविक तत्वों से अर्थ है पर्यावरण के सभी निर्जीव तत्व जैसे चट्टान, धूप आदि।
संसाधन से अर्थ उन वस्तुओं, सामग्रियों एवं पदार्थों से हैं जो मानव समाज के उत्पादक प्रयोग के लिए होते हैं।
जैविक तत्व पर्यावरण के सभी जीवित तत्व हैं जैसे पक्षी, पशु, पौधे, मछलियाँ आदि।
इसका का तात्पर्य है कि संसाधनों का निष्कर्षण इनके पुनर्जनन की दर से अधिक नहीं है और उत्पन्न अवशेष पर्यावरण की समावेशन क्षमता के भीतर है।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोड़ऱ्; सी पी सी बी का मुख्य कार्य है जल, भूमि और वायु प्रदूषण की जांच करना |
भारत के वन्य एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 1974 में इसे एक स्वायत्त निकाय के रूप में स्थापित किया था।
वायु प्रदूषण का तात्पर्य हवा में उपस्थित ऐसे तत्वों की सान्द्रता में वृद्धि है, जो मनुष्य और पर्यावरण के लिए हानिकारक है।
वायु प्रदूषण औद्योगीकरण का सर्वाधिक अवांछित उपहार है।
धारणीय
विकास को
हासिल करने
के लिए, निम्न
आवश्यकताएं
हैं:
i) मानव जनसँख्या पर्यावरण की धारण क्षमता के अनुसार ही सीमित होनी चाहिए।
ii) प्रोद्योगिक प्रगति आगत प्रभावी होनी चाहिए न कि आगत उपभोगी।
iii) नवीकरण संसाधनों की निष्कर्षण दर पुनर्सृजन की दर से अधिक नहीं होनी चाहिए।
जनसँख्या वृद्धि प्राकृतिक संसाधनों के अपक्षय का कारण है। जितने अधिक लोग होंगे उतनी ही अधिक सेवाओं और वस्तुओं की मांग होगी। जनसँख्या में वृद्धि के कारण भूमि पर जनसँख्या का दबाव अधिक हो गया है और भूमि का अधिक शोषण हो रहा है| वनों का बहुत अधिक कटाव किया जा रहा है, ताकि वन भूमि का प्रयोग उद्योगों और निर्माण कियों में किया जा सके| जनसँख्या की अत्यधिक वृद्धि से पर्यावरण से अधिक संसाधनों का निष्कर्षण होता है जिससे संसाधनों का क्षरण होता है।
प्राकृतिक संसाधन वे संसाधन हैं जिन्हें प्रकृति के द्वारा भूमि, जल, वन, पशु, धूप आदि के रूप में प्रदान किया गया है। प्राकृतिक संसाधन प्रकृति से मिला हुआ निशुल्क उपहार है। ये देश की समृद्धि का आधार स्तम्भ होते हैं। प्राकृतिक संसाधन दो प्रकार के होते हैं:
i) नवीनीकरण योग्य संसाधन और
ii) गैर-नवीनीकरण योग्य संसाधन
नवीकरणीय संसाधन वे हैं जिनका उपयोग संसाधन के क्षय या समाप्त होने की आशंका के बिना किया जा सकता है, अर्थात् संसाधनों की पूर्ति निरंतर बनी रहती है।
उदाहरण के लिए: पेड़, हवा, सूरज की रोशनी, आदि|
गैर नवीकरणीय संसाधन वे हैं जो कि निष्कर्षण और उपयोग से समाप्त हो जाते हैं ।
उदाहरण के लिए: कोयला, पेट्रोल, तांबा आदि|
A.
कृषि में सुधार
B.
सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि
C.
औद्योगीकरण में सुधार
D.
जनसंख्या नियंत्रण
चीन में द ग्रेट लीप फॉरवार्ड अभियान की शुरुआत देश में वृहद पैमाने पर औद्योगीकरण को आरंभ करने के लिए हुई थी। औद्योगीकरण ने वहां के नागरिकों की जीवन शैली में बदलाव किया और समाज की कुल वृद्धि में योगदान दिया।
A.
प्राथमिक क्षेत्र
B.
द्वितीयक क्षेत्र
C.
तृतीयक क्षेत्र
D.
औद्योगिक क्षेत्र
भारत की आर्थिक वृद्धि में मूलत: तृतीयक या सेवा क्षेत्र का सबसे अधिक योगदान है। इसमें सभी प्रकार की सेवाएं जैसे बैंकिंग, परिवहन, संचार आदि सम्मिलित हैं।
A.
एक संतान
नीति
B. दो संतान नीति
C. निम्न नवजात मृत्यु दर
D. उच्च जन्म दर
1970 के दशक में लागू की गयी एक संतान नीति ने, चीन में निम्न जनसंख्या वृद्धि का सबसे बड़ा कारण है|
A.
निजी
क्षेत्र
B. औद्योगिक क्षेत्र
C. प्राथमिक क्षेत्र
D. सार्वंजनिक क्षेत्र
यह एक तथ्य है कि विकास के कारण कई देश अपने रोजगार और निर्गत को कृषि क्षेत्र से निर्माण और फिर सेवा क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं।
A.
भारत
B.
चीन
C.
पाकिस्तान
D.
बर्मा
भारत को वर्ष 1947 में स्वतंत्रता मिली । भारत में आर्थिक विकास के उद्देश्य के साथ वर्ष 1951 में पंचवर्षीय योजनाओं का आरंभ हुआ।
A.
ब्रिटेन
B.
भारत
C.
चीन
D.
पाकिस्तान
किसी भी साम्यवादी अर्थव्यवस्था में, साम्यवादी अर्थव्यवस्था में अर्थव्यवस्था के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों का नियंत्रण सरकार के द्वारा होता है।
A.
भारत
B.
चीन
C.
पाकिस्तान
D.
नेपाल