मानव विकास और मानव पूंजी आर्थिक विकास के दो अलग-अलग पहलुओं का प्रतिनिधित्व करने वाली दो अलग अलग अवधारणाएं हैं।
मानव पूंजी श्रम की उत्पादकता में बढौतरी का प्रतिनिधित्व करती है। मानव पूंजी की अवधारणा नवाचार को बढ़ावा देने और नई प्रौद्योगिकियों को अवशोषित करने की क्षमता पैदा करने के liyलिए मानव को महत्वपुर्ण मानती है। यह शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को इसलिए अवशयक मानता है क्योंकि ये मानव संसाधनों को अच्छी मानव पूंजी में परिवर्तन करते हैं।
किन्तु मानव विकास का मानना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य मानव कल्याण का अभिन्न अंग हैं। मानव के उत्पादक योगदान से परे, मूल विकासात्मक पहलू शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं समाज में सभी मानवों का अधिकार हैं। इस प्रकार मानव विकास मानव पूंजी की तुलना में एक वृहद अवधारणा है।
भारत में मानव पूंजी निर्माण को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इन में कुछ समस्याएं निम्न हैं:–
1. हम माध्यमिक और उच्च शिक्षा की तुलना में निशुल्क और प्राथमिक शिक्षा पर अधिक जोर देते हैं।
2. भारत में शिक्षा में लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। भारत में शिक्षा की गुणवत्ता बहुत खराब है।
3. कृषि शिक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है।
4. आवश्यक कौशल और जानकारी की मांग और पूर्ति के बीच असंतुलन है। व्यावसायिक शिक्षा का प्रचलन नहीं है|
5. शिक्षा पर सरकारी व्यय सकल घरेलू अनुपात के वांछित स्तर 6% की तुलना में दो प्रतिशत कम है|
6. शहरी जनसंख्या की तुलना में शिक्षा की पहुँच ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत कम है|
7. शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल के निजीकरण ने अमीरों और गरीबों को मिलने वाली सेवाओं की गुणवत्ताओं में काफी अंतर पैदा कर दिया है। एक तरफ अमीरों के लिए पब्लिक स्कूल हैं तो दूसरी तरफ आम लोगों के लीए सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल हैं। ऐसी ही कुछ स्थिति स्वास्थ्य क्षेत्र में भी है।
8. भारतीय मजदूरों में कुपोषण की समस्या पाई जाती है, जिसका कारण है निर्धनता या बड़ी लगते के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं की अगम्यता।
9. स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में धन की कमी के कारण न तो पर्याप्त भवन ही होते हैं और न ही प्रयोगशालाएँ और न ही अन्य सुविधाएं।
10. अस्वस्थ मरीजों का उपचार करने के lलिए अस्पतालों और डिस्पेंसरी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं। सुदूर क्षेत्रों में अस्पतालों एवं चिकित्सा वाहनों की अनुपलब्धता से स्थिति और बिगड़ जाती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती आवश्यकताओं के अनुसार स्वास्थ्य देखभाल और परम्परागत शिक्षा प्रणाली में सुधर लाने की जरुरत है।
भारत में ग्रामीण स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली को निम्न रूप में वर्णित किया जा सकता है:
i) प्रखंड स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ग्रामीण स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करते है। हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 30000 की जनससंख्या की (पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों में 20,000 की जनसंख्या पर) आवश्यकताओं की पूर्ति करता है| यह परिवार नियोजन सलाह के साथ सामान्य चिकित्सा देखभाल भी प्रदान करते हैं।
ii) स्वास्थ्य उप केंद्र मूल रूप से परिवार नियोजन कार्यक्रम के लिए उपलब्ध हैं। यह 5000 की जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है (पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों में 3000 की जनसंख्या की)।
iii) सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र 1,00,000 की जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। इनमे 30 बेड और विशेष चिकित्सा देखभाल सेवाएँ उपलब्ध होती हैं| यहाँ स्त्रीरोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और शल्य चिकित्सा विशेषज्ञ भी मौजूद होते हैं|
iv) ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार और स्थानीय निकायों के द्वारा कई अस्पताल और औषधालयों का संचालन भी किया जा रहा है।
v) उपरोक्त सुविधाओं के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली संतोषजनक नहीं है। अधिकांश सुविधाएं कागजों पर ही मौजूद हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सक, नर्स और अन्य स्वास्थ्य सेवा प्रदाता उपलब्ध नहीं हैं।
स्वास्थ्य पर किया जाने वाला व्यय उत्पादक श्रम बल का निर्माण करने और रखरखाव करने के लिए महत्वपूर्ण है।
स्वास्थ्य व्यय कई रूपों में हो सकता है। भारत में प्रतिषेधी आयुर्विज्ञान (टीकाकरण), चिकित्सीय आयुर्विज्ञान (बीमारियों के क्रम में उसकी चिकित्सा), सामाजिक आयुर्विज्ञान (साक्षरता का प्रसार), और स्वच्छ पेयजल एवं अच्छे स्वास्थ्य का प्रावधान स्वास्थ्य व्यय के विभिन्न रूप हैं।
अच्छा स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता को बेहतर करता है। बेहतर स्वास्थ्य निम्नलिखित तरीकों से आर्थिक वृद्धि में योगदान करता है:–
i) इससे कार्यकर्ताओं की क्षमता बढ़ जाती है।
ii) यह कार्यकर्ता के रोगों के कारण होने वाली उत्पादन लागत कम कर देता है|
iii) यह प्राकृतिक और अन्य संसाधनों के उपयोग की अनुमति देता है|
iv) यह स्कूलों में बच्चों के नामांकन में वृद्धि करता है और उन्हें बेहतर सीखने के लिए सक्षम बनाता है|
v) इसके कारण वे संसाधन जिनका व्यक्तियों के स्वास्थ्य सुधार के लिए प्रयोग किया जाता, उसका प्रयोग अन्य उपयोगी कार्यों में हो सकता है।
vi) यह नई तकनीकों को अवषोषित करने के लिए क्षमता का निर्माण करता है तथा नवीनता को उत्प्रेरित करता है।
एक बात पर और गौर कि यह जरुरी नहीं कि स्वास्थ्य सुविधाओं के होने से सभी नागरिक स्वस्थ भी होंगे। नागरिकों की स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुच भी होनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति केवल पैसे की कमी के कारण इन्हें पाने में अक्षम नहीं होना चाहिए।
A.
पूँजी आगत
B.
सिंचाई सुविधा
C.
रासायनिक उर्वरक
D.
श्रम आगत
परम्परागत खेतीजिसमें अधिक पूंजी और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है, उसकी तुलना में जैविक खेती मेंअधिक श्रम आगत की आवश्यकता होती है।
A.
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक
B.
भारतीय रिजर्व बैंक
C.
रिलायंस इंडस्ट्रीज
D.
भारती एयरटेल
औपचारिक वित्तीय क्षेत्र सहकारी बैंक, वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, छोटी साख योजनाओं आदि जैसे कई वित्तीय एजेंसियों के माध्यम से संचालित है|
A.
वानिकी
B.
भारतीय गांवों
C.
उद्योग
D. मछली पकड़ना
महात्मा गांधी ने कहा है कि भारत की प्रगति केवल औद्योगिक शहरी केंद्रों के विकास पर निर्भर नही है बल्कि मुख्य रूप से गांवों के विकास पर है।
A.
प्राचीन खेती
B.
आधुनिक खेती
C.
जैविक खेती
D.
प्राकृतिक खेती
जैविक खेती वह तरीका है जिसमे रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों आदि का उपयोग शामिल नहीं है|यह मुख्य रूप से प्राकृतिक जैविक आदानों और जैविक पौध संरक्षण के उपायों के उपयोग पर आधारित है।
A.
गैर-संस्थागत
ग्रामीण साख
B. संस्थागत शहरी वित्त
C.
संस्थागत कृषि वित्त
D.
गैर-संस्थागत शहरी साख
सहकारी समितियाँ, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सरकारी और वाणिज्यिक बैंक के साथ-साथ स्वयं सहायता समूह संस्थागत कृषि वित्त के मुख्य स्रोत हैं।
A.
एसएचजी (SHG)
B.
सार्वजनिक वितरण प्रणाली
C.
एफसीआई (FCI)
D.
नाबार्ड
सुरक्षित भण्डार को पूरे देश में कीमतों को स्थिर बनाए रखने के लिए रखा जाता है। इस भण्डार को पूर्ति में कमी के समय बाजार में बेचा जाता है। भारत में गेहूं और चावल का सुरक्षित भण्डार भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा रखा जाता है।
A.
खाद्य विपणन
B.
ग्रामीण विपणन
C.
कृषि विपणन
D.
उत्पाद विपणन
कृषि विपणन एक प्रक्रिया है जिसमें संयोजन, भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकेजिंग, वर्गीकरण और देश भर में विभिन्न कृषि जिंसों का वितरण शामिल है।
A.
1982
B.
1952
C.
1969
D.
1991
वर्ष 1969 में, भारत ने ग्रामीण साख की जरूरतों को पूरा करने के लिए सामाजिक बैंकिंग और मल्टी एजेंसी दृष्टिकोण को अपनाया| यह एक बड़ा परिवर्तन था जो ग्रामीण क्षेत्रों के ऋण प्रणाली में लाया गया था।
A.
बिहार
B.
थाईलैंड
C.
तमिलनाडु
D.
हरयाणा
कृषि में तमिलनाडु महिलायों द्वारा TANWA नामक एक परियोजना तमिलनाडु में शुरू हुई| इस परियोजना के तहत महिलाओं को नवीनतम कृषि तकनीक में प्रशिक्षित किया जाता है।
A.
16.2 प्रतिशत
B. 19 प्रतिशत
C. 18.7 प्रतिशत
D. 16 प्रतिशत
ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरी की कमी और शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा ने ग्रामीण भारत में बेरोजगार युवाओं की संख्या में वृद्धि की है|
6 से 10 वर्ष तक की आयु के बच्चों की कुल संख्या जो विद्यालय में आ रहे हैं उनका उसी आयु समूह मे बच्चों की कुल संख्या से अनुपात, फिर उनका 100 से गुणक कुल उपस्थिति अनुपात कहलाता है।
मानव पूंजी किसी देश की आबादी की एक दिए गए समय में आर्थिक मूल्य का उत्पादन करने की क्षमता, जानकारी, योग्यता, शिक्षा तथा कौशल का भंडार होता है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी) भारत में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा के समन्वय तथा प्रचार के लिए स्थापित किया गया था।
सर्वशिक्षा अभियान को वर्ष 2001 में शुरू किया गया था|
व्यावसायिक शिक्षा ऐसी शिक्षा जो किसी विशेष व्यवसाय के लिए कौशल और प्रषिक्षण उपलब्ध कराती है, जिससे प्रषिक्षु किसी विशेष क्षेत्र में रोजगार प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है।
इसमे 14 से 18 वर्ष तक की आयु के कक्षा 8 से कक्षा 12 में पढने वाले बच्चे सम्मिलित होते हैं।
नामांकन अनुपात विभिन्न ग्रेड के स्तर पर स्कूल में नामांकित होने वाले विद्यार्थियों की संख्या को निर्धारित करता है।
शिक्षा के दिए गए स्तर के लिए, नामांकन अनुपात को संबंधित आयु समूह की जनसंख्या के अनुपात के आकार से विभाजित कर हासिल किया जा सकता है।
व्यस्क साक्षरता दर किसी समाज में 15 वर्ष या उससे अधिक उम्र की कुल जनसंख्या में साक्षर व्यक्तियों की संख्या उस उम्र वर्ग के कुल जनसंख्या से विभाजित करके फिर 100 से गुणा करके प्राप्त होती है।
मानव पूंजी निर्माण का उद्देश्य मानव को और उत्पादक बनाना है।
मलेरिया और टी.बी भारत में व्यापक रूप से फैले हुए संक्रामक रोग हैं।
नई शिक्षा नीति की घोषणा 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के द्वारा की गई थी।
प्राथमिक शिक्षा में 6 से 14 वर्ष तक की आयु के कक्षा 1 से कक्षा 8 में पढ़ने वाले बच्चे सम्मिलित होते हैं।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना वर्ष 1956 में हुई थी|
तकनीकी शिक्षा किसी देश की मानव पूंजी की कुशलता और उत्पादकता में वृद्धि करने के लिए महत्वपूर्ण है।
शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय का वांछित स्तर सकल घरेलू अनुपात का 6% है।
शिशु मृत्यु दर (आई.एम.आर) एक वर्ष में पैदा हो कर गुज़र जाने वाले एक साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या की तुलना उस वर्ष के प्रति 1000 जीवित जन्मों की संख्या से करता है| एक वर्ष में एक दिए गए क्षेत्र के लिए यह दर, एक वर्ष से कम उम्र के मरने वाले बच्चों की संख्या को वर्ष के दौरान जीवित जन्मों की संख्या से विभाजित करके, 1000 से गुणा करके प्राप्त होती है।
वर्ष 2011-12 के दौरान यह दर 42 थी| इसका अर्थ है वर्ष 2011-12 में भारत में प्रति 1000 जीवित जन्म होने के साथ ही 42 जन्मे बच्चे बच नहीं पाते थे|
मानव पूंजी ( जिसे मानव संसाधन विकास भी कह सकते हैं) आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हकीकत में, भौतिक पूंजी मानव पूंजी पर निर्भर करती है। भौतिक पूंजी को उत्पादक रूप से केवल तभी प्रयोग किया जा सकता है जब तकनीकी, पेशेवर और प्रशासनिक लोग उपलब्ध होते हैं। हमें अन्य मानव पूंजी का निर्माण करने के लिए भी मानव पूंजी की आवश्यकता होती है, जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक आदि। इसका अर्थ है हमें अधिक प्रगति करने के लिए मानव पूंजी और मानव विकास में निवेश करने की आवश्यकता होती है। अल्पविकसित देश अपने मानव संसाधनों के अल्पविकास रहने के कारण गरीब रहते हैं।
शिक्षा निम्न कारणों से महत्वपूर्ण हैं:
i) इससे धन कमाने की क्षमता में वृद्धि होती है|
ii) यह व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को बेहतर करती है|
iii) यह व्यक्ति को जीवन में विकल्प चुनने में सक्षम करती है|
iv) यह लोगों को समाज में हो रहे परिवर्तन के बारे में जानकारी देती है|
v) यह नवाचार को प्रेरणा देती है|
vi) यह विकास प्रक्रिया को तेज करती है|
शिक्षा
क्षेत्र को
निगमित करने
वाले सरकारी संस्थान
हैं –
क)
राष्ट्रीय शैक्षिक
अनुसंधान और प्रशिक्षण
परिषद (एनसीईआरटी),
ख) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी)।
स्वास्थ्य क्षेत्र को निगमित करने वाले सरकारी संस्थान हैं –
क) राज्य स्तर पर स्वास्थ्य मंत्रालय
ख) भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर)
A.
1982
B.
1969
C.
1971
D.
1991
नाबार्ड ग्रामीण वित्तपोषण प्रणाली में शामिल सभी संस्थाओं की गतिविधियों का समन्वय करने के लिए 1982 में स्थापित किया गयाथा|
A.
58%
हिस्सेदारी
B. 35% हिस्सेदारी
C. 40% हिस्सेदारी
D. 45% हिस्सेदारी
वर्ष 2012 में, मुर्गी पालन की कुल पशुधन में 58% की सबसे बड़ी हिस्सेदारी थी|
A.
दूध
उत्पादन
B. बागवानी
C. मछली पालन
D. बाढ़ राहत
'ऑपरेशन
फ्लड'
की शुरूआत 1966
में दूध
सहकारी
समितियों की
व्यवस्था
करने के लिए
संदर्भित की
गई|
भारत
में दूध
सहकारी
समितियों का
केंद्र गुजरात
में है।
A.
उर्वरक
B. कीटनाशक
C. HYV बीज
D. जिवनाशक
HYV या हाई यील्ड वैराइटी बीज का एक प्रकार है जो कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह व्यापक रूप से हरित क्रांति और उसके बाद के दौरान इस्तेमाल किया गया था।
A.
किसानों को फसल की अधिकतम समर्थन कीमत दिलवाना
B.
खुदरा बाज़ार में फसल की न्यूनतम कीमत
C.
कृषि आगतों के लिए अधिकतम कीमत
D.
किसानों को फसल की न्यूनतम समर्थन कीमत दिलवाना
MSP किसानों को आश्वासन देती है कि सरकार उनके उत्पाद को एक विशिष्ट कीमत पर अवश्य खरीदेगी|
A.
नियमित
मंडियां
B. यातायात में सुधार
C. न्यूनतम समर्थन कीमत
D. उपरोक्त सभी
सहकारी संस्थाएं तथा सरकारी एजेंसियां सकल कृषि उत्पादन के मात्र 10 प्रतिशत अंश पर ही अपना नियंत्रण बना पाई है जबकि लगभग 90 प्रतिशत कृषि विपणन व्यवस्था पर निजी व्यापारियों का नियंत्रण बना हुआ है|
A.
रासायनिक
खादों का
प्रयोग
B. भंडारण
C. परिरक्षण
D.
प्रसंस्करण
कृषि विपणन में शामिल होते हैं: फसल काटने के बाद उपज का संग्रह, उत्पाद का प्रसंस्करण, गुणवता के अनुसार उत्पाद का वर्गीकरण, क्रेताओं की पसंद के अनुसार उत्पाद की पैकिंग , भावी बिक्री के लिए उत्पाद का भंडारण|
A.
साख
का प्रावधान
B. जैविक कृषि
C. कृषि विपणन
D. सिंचाई
क्योंकि भारत में श्रम की बहुलता है इसलिए उत्पादन प्रक्रिया में श्रम-गहन पद्धति का प्रयोग किया जाता है जिस कारण जैविक कृषि में भारत को तुलनात्मक लाभ प्राप्त है |
A.
कमीशन
एजेंटों
द्वारा फसल
को बेचना
B. सरकार द्वारा नकदी की सख्त जरुरत के कारण फसल को कटाई के तुरंत बाद बेचना
C. किसानों द्वारा नकदी की सख्त जरूरत के कारण फसल को कटाई के तुरंत बाद बेचना
D. ख़राब फसल को बेचना
जब किसानों को अपना साख चुकाने के लिए नकदी की तुरंत आवश्यकता होती है तथा जब उनके पास भंडारण की कोई सुविधा नहीं होती उस स्थिति में किसान आपात बिक्री करते हैं |
A.
नई
भूमि को
खरीदने के
लिए
B. वर्तमान भूमि के रख-रखाव के लिए
C. बीज या खाद खरीदने के लिए
D. मशीनरी खरीदने के लिए
इस प्रकार के साख की अवधि केवल 6 से 12 महीनों की होती है|
A.
महाजन
(साहूकार)
B. सहकारी समितियाँ
C. व्यापारिक बैंक
D. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक
गैर संस्थागत स्रोत प्रथम पंचवर्षीय योजना की शुरुवात में किसान के कुल उधार की आवश्यकता का 93 प्रतिशत भाग पूरा करते थे|
हमें भारत की वास्तविक उन्नति के लिएग्रामीण भारत का विकास करना होगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आजीविका का मुख्य स्रोत है।
बहु-एजेंसी प्रणाली बनाने का मुख्य उद्देश्य सस्ती दरों पर पर्याप्त ऋण प्रदान करना है।
ग्रामीण विकास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की दो तिहाई से भी अधिक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है।
महात्मा गांधी के अनुसार भारत की वास्तविक प्रगति का तात्पर्य शहरी औद्योगिक केन्द्रों के विकास से नहीं, बल्कि मुख्यत: गांवों के विकास से है।
कृषि के विविधीकरण की आवश्यकता उत्पन्न होने का तथ्य यह है कि आजीविका के लिए विशेष रूप से कृषि पर निर्भर रहने में बहुत अधिक खतरा है, क्योंकि कृषि एक मौसमी गतिविधि है और किसानों को कई महीनों के लिए बेरोजगार रहना पड़ता है।
ऑपरेशन फ्लडएकयोजना या एक प्रणाली है जिससे सभी किसान सहकारी आधार पर उत्पादित दूध को इकट्ठा कर सकते हैं और वैसे ही सहकारी समितियों के माध्यम से शहरी क्षेत्रों में बेच सकते है।
हस्तशिल्प और मुर्गीपालन दो गैर कृषि गतिविधियां है जो ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित होनी चाहिए।
जैविक कृषि, कृषि की एक ऐसी पद्धति है जिसमें उच्च उपज देने वाले (एचवाईवी) बीज, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों आदि के स्थान पर स्थानीय स्तर पर उत्पादित जैविक आदानों का प्रयोग किया जाता है।
सरकार ने कृषि विकास के एक साधन के रूप में विविधीकरण के लिए कई कदम उठाए हैं। यह इस प्रकार हैं-
1) पूर्वोत्तर क्षेत्रमेंबागवानीकेसमन्वित विकासके लिएएकप्रौद्योगिकीकार्यका प्रारंभ किया- यह कार्यक्रम अनुसंधान, उत्पादन, फसलोत्तरप्रबंधन,प्रसंस्करण, विपणनऔरनिर्यातके बीचप्रभावपूर्णसंयोजन स्थापितकरेगा और क्षेत्र में कृषि का तीव्र विकास लायेगा।
2) राष्ट्रीय कृषि खाद्य बीमा योजना लागू करना- यह फसल और तिलहनों तथा वार्षिक व्यसायिक और बागवानी फसलों को कवर करेगा। छोटे और सीमांत किसान इस योजना के अंतर्गत 50 प्रतिशत सहायिकी के पात्र हैं।
3) कपास पर परिचालन संबंधी प्रौद्योगिकी मिशन- यह मिशन प्रौद्योगिकी निर्माण, उत्पाद समर्थन और विस्तार, बाजार अवसंरचना और पीसने और दबाने वाली इकाइयों के आधुनिकीकरण पर छोटे छोटे मिशनों को अलग-अलग करेंगा।
4) पूंजी सहायिकीका प्रावधान- बागवानी उत्पादों के लिए भंडारगृहों और शीत भंडारगृहों के निर्माण/आधुनिकीकरण/विस्तार के लिए 25 प्रतिशत सहायिकीदी जायेगी।
5) वाटरशेड विकास कोष की स्थापना- इस कोष की स्थापना वर्षां सिंचित भूमि के विकास के लिए राष्ट्रीय स्तर पर की गयी थी।
6) कृषि विपणन को मजबूत बनाना।
7) बीज बैंक योजना- देश में उत्पादित प्रमाणित बीज का लगभग 7-8 प्रतिशत सूखा, बाढ या अन्य किसी रूप में उत्पन्न प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए बफर स्टॉक रखा जायेगा।
A.
द्वितीयक क्षेत्र
B.
प्राथमिक क्षेत्र
C.
तृतीयक क्षेत्र
D.
सरकारी क्षेत्र
लगभग 60% भारतीय श्रमिक सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं। द्वितीयक क्षेत्र में लगभग 30% शहरी कार्यबल कार्यरत है।
A.
दो क्षेत्रकों में
B. तीन क्षेत्रकों में
C. चार क्षेत्रकों में
D.
पांच क्षेत्रकों में
निजी और सार्वजनिक क्षेत्र संगठित क्षेत्र के दो भाग हैं।
A.
बैंकिंग सेवा
B.
परिवहन सेवाएं
C.
स्वनियोजित रोजगार
D. मजदूरी वाला रोजगार
हमारी सरकार ने कई योजनाओं को आरंभ किया है जिनका लक्ष्य है लोगों के बीच उद्यमी क्षमता को विकसित करना और उन्हें व्यापार चलाने में वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करना।
A.
स्वनियोजित रोजगार
B.
नियमित वेतन भोगी
C.
कृषि श्रमिक
D.
अनियत मजदूरी
भारत में पुरुषों और महिलाओं के रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत अनियत मजदूरी कार्य है।
सभी सक्षम-इकाईकृत श्रमिक जो आर्थिक गतिविधियों में संलग्न हैं, वे देश के कार्यबल में गिने जाते हैं।
किसी भी अर्थव्यवस्था के तीन क्षेत्रक हैं- प्राथमिक क्षेत्रक या कृषि क्षेत्रक, द्वितीयक या औद्योगिक क्षेत्रक और तृतीयक या सेवा क्षेत्रक|
A.
साक्षरता की कम दर
B.
अधिक जनसंख्या
C.
त्रुटिपूर्ण शिक्षा प्रणाली
D.
जीवनयापन का निम्न स्तर
भारत में वर्तमान शैक्षणिक प्रणाली काम पर आधारित नहीं है। यह केवल डिग्री लेने पर आधारित है और इस प्रकार इससे बेरोजगारी बढ़ती है।
A.
छोटे प्रतिष्ठानों के स्वामी
B.
लाखों किसान
C.
वे फर्म जिनमें दस या अधिक श्रमिक नियुक्त हैं
D.
कृषि श्रमिक
वे संस्थान जिनमें 10 या अधिक श्रमिक कार्य करते हैं, उन्हें औपचारिक क्षेत्रक संस्थान कहा जाता है और बाकि सभी प्रतिष्ठानों को अनौपचारिक क्षेत्रक कहा जाता है।
A.
अल्पबेरोजगारी
B.
संघर्षात्मक बेरोजगारी
C.
खुली बेरोजगारी
D.
मौसमी बेरोजगारी
खुली बेरोजगारी एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति जो काम करने में सक्षम और तैयार है, उसे एक प्रचलित मजदूरी दर पर काम करने का अवसर नहीं मिलता है।
A.
उत्पादन में वृद्धि होती है मगर रोजगार में नहीं
B.
उत्पादन में रोजगार के साथ वृद्धि होती है।
C.
उत्पादन में वृद्धि होती है मगर रोजगार में कमी आती है
D.
रोजगार में वृद्धि के साथ उत्पादन में कमी आती है
रोजगारहीन संवृद्धि से अर्थ ऐसी अर्थिक प्रगति से है जिसमें उत्पादन तो बढ़ता है मगर रोजगार में वृद्धि नहीं होती है। इस प्रकार हमें सकल घरेलू उत्पाद और रोजगार के बीच में अत्यधिक अंतर परिलक्षित होता है।
स्वनियोजित और नियमित वेतन कामों से अनियत मजदूरी कार्य में आने की प्रक्रिया को कार्यबल का अनियतिकरण होना कहा जाता है। यह कार्यबल को नियोक्ताओं के साथ मोलभाव के मामले में कमजोर बना देता है।
A.
श्रम
क़ानून
B. व्यापार संघ
C. वेतनभोगी रोजगार
D. कार्यबल का अनियतिकरण
श्रमिक नियोक्ताओं के साथ मोलभाव करने के लिए व्यापार संघ और अन्य सुरक्षा उपायों का गठन कर सकते हैं। सरकार मजदूरों की रक्षा श्रम कानूनों के माध्यम से करती है।
एक निर्माण मजदूर वह मजदूर है जो अनियत रूप से किसी और के उपक्रम में कार्यरत है और इसे दैनिक या आवधिक कार्य अनुबंध के अनुसार ही मजदूरी मिलती है।
A.
गिना जाता है
B.
नहीं गिना जाता है
C.
बहुत अधिक पहचाना गया है
D.
सराहा जाता है
महिला के घरेलू कार्य को राष्ट्रीय आय की गणना करते समय नहीं गिना जाता है क्योंकि इसे मापा नहीं जा सकता है।
A.
औपचारिक
क्षेत्र
B. अनौपचारिक क्षेत्र
C. प्राथमिक क्षेत्र
D. द्वितीयक क्षेत्र
केवल 6% भारतीय कार्यबल औपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है। शेष 94% अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है।
A.
प्राथमिक
क्षेत्र
B. द्वितीयक क्षेत्र
C. तृतीयक क्षेत्र
D.
सेवा क्षेत्र
महिला श्रमिक सर्वाधिक प्राथमिक क्षेत्र में हैं। तीन चौथाई से अधिक महिला श्रमिक प्राथमिक क्षेत्र में कार्यरत हैं।
A.
प्राथमिक
क्षेत्र
B. द्वितीयक क्षेत्र
C. तृतीयक क्षेत्र
D. औद्योगिक क्षेत्र
आर्थिक गतिविधियों के आधार पर, किसी भी अर्थव्यवस्था का तीन क्षेत्रों में वर्गीकरण किया जा सकता है: प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक। द्वितीयक क्षेत्र में विनिर्माण और निर्माण गतिविधियाँ सम्मिलित हैं।
भारत में, ग्रामीण श्रमिकों का कुल कार्यबल तीन चौथाई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अधिकतर भारतीय अभी भी गांवों में निवास करते हैं।
A.
विश्व
बैंक
B. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
C. एशियाई विकास बैंक
D. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रयासों के कारण, भारत सरकार ने, अनौपचारिक क्षेत्र का आधुनिकीकरण आरम्भ किया है और अनौपचारिक क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा के प्रावधान आरम्भ किए हैं।
A.
870
B.
460
C.
860
D.
864
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में
673 एवं शहरों में
860 से कम प्रति माह उपभोग पर व्यय करने वालें लोगों को निर्धनता रेखा से नीचे माना जाता है।
A.
673
B.
860
C.
840
D.
760
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में
673 रूपए एवं शहरों में
860 से कम प्रति माह उपभोग पर व्यय करने वालें लोगों को निर्धनता रेखा से नीचे माना जाता है।
स्वतंत्रता से पूर्व भारत में सबसे पहले दादा भाई नौरोजी ने निर्धनता-रेखा की अवधारणा पर विचार किया था। उन्होंने जेल में कैदियों को दिए जा रहे भोजन का बाजार कीमतों पर मूल्यांकन कर ‘जेल की निर्वाह लागत’ का आकलन किया था।
स्वतंत्रता से पूर्व भारत में सबसे पहले दादा भाई नौरोजी ने निर्धनता-रेखा की अवधारणा पर विचार किया था। उन्होंने जेल में कैदियों को दिए जा रहे भोजन का बाजार कीमतों पर मूल्यांकन कर ‘जेल की निर्वाह लागत’ का आकलन किया था।
A.
बीमारी
B. निर्धनता
C. अमीरी
D. अशिक्षित
निर्धनता एक ऐसी सामाजिक स्थिति है जिसमें समाज का एक वर्ग अपने न्यूनतम बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ होता है। न्यूनतम आवश्यकताओं में— भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ शामिल हैं।
चिरकालिक निर्धन वह है जो हमेशा से निर्धन रहते हैं और जो सामान्यतः निर्धन हैं। भूमिहीन मजदूर और अनियत मजदूर चिरकालिक निर्धन हैं।
ब्रिटेन ने कुटीर और लघु उद्योगों का शोषण करके, भारत को एक औपनिवेशिक राष्ट्र बना दिया, जिसके कारण निर्धनता व्याप्त हो गई |
A.
दिल्ली
B. गोवा
C. केरला
D. बिहार
2012 तक कई राज्यों ने निर्धनता को काफी हद तक कम कर दिया था, लेकिन ओडिशा, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश अभी भी निर्धन राज्य हैं।
A.
2100 कैलोरी
B. 2200 कैलोरी
C. 2300 कैलोरी
D. 2400 कैलोरी
निर्धनता रेखा न्यूनतम कैलोरी की उपभोग के मौद्रिक मूल्य (या प्रति व्यक्ति व्यय) द्वारा निर्धारित किया जाता है| यह इस प्रकार है : एक ग्रामीण व्यक्ति के लिए 2400 कैलोरी की खपत, अर्थात 673 रुपये का प्रति व्यक्ति, प्रति माह व्यय । एक शहरी व्यक्ति के लिए 2100 कैलोरी की खपत, अर्थात 860 रुपये का प्रति व्यक्ति, प्रति माह व्यय ।
निर्धनता से सम्बन्धित आंकड़े राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (एन एस एस ओ) द्वारा उपभोग व्यय के आधार पर आकलित किए जाते हैं।
A.
गरीबी
रेखा
B. काल्पनिक रेखा
C. अमीरी रेखा
D. निर्धनता रेखा
निर्धनता रेखा वह काल्पनिक रेखा है जो लोगों को निर्धनों और गैर निर्धनों में विभाजित करती है। निर्धनता को पूर्णतः निर्धन, बहुत निर्धन, निर्धन, मध्यम वर्ग, उच्च मध्यम वर्ग, अमीर, बहुत अमीर, करोड़पति और अरबपति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
सरकार जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम का प्रसार कर रही है और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करने का प्रयास कर रही है।
संयुक्त राष्ट्रसंघ के अनुसार वह देश जहाँ प्रति दिन, प्रति व्यक्ति आय 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम है, उनको निर्धन माना जाता है।
चिरकालिक निर्धन वह है जो हमेशा से निर्धन रहते हैं और जो सामान्यतः निर्धन हैं। भूमिहीन मजदूर और अनियत मजदूर चिरकालिक निर्धन हैं।
मुद्रास्फीति से वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती है।
क्रय शक्ति में गिरावट गरीब और मध्यम आय वर्ग को बुरी तरह से प्रभावित करता है और निर्धनता में वृद्धि होती है |
अपनी स्वयं की दुकान में काम कर रहे एक दर्जी को स्वनियोजित व्यक्ति माना जाता है।
भारत के कुछ राज्यों में निर्धनता एक गंभीर समस्या बनी हुयी है। वे राज्य उडीसा, असम, बिहार और उत्तर प्रदेश राज्य हैं।
भारत में प्रथम पंचवर्षीय योजना 1951 में शुरू की गयी थी।
भारतीय सरकार के तीन कार्यक्रमों में से एक मध्याह्न भोजन योजना कार्यक्रम का उद्देश्य गरीबों के खाद्य और पोषण स्तर में सुधार करना है।
भारत के शहरी निर्धन में अनियत मजदूर सबसे दयनीय है।
द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) में समाज के निर्धन वर्गों को अधिक से अधिक आर्थिक विकास के लाभ प्रदान करने पर बल दिया गया।
सरकार ने एक त्रि आयामी निर्धनता निवारण दृष्टिकोण को अपनाया-
क) विकास उन्मुख दृष्टिकोण- सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में वार्षिक वृद्धि को, विशेष रूप से निम्न आय वर्ग को लाभ पहुंचाने हेतु, देश की कुल आबादी के बीच समान रूप से वितरित किया जाना अपेक्षित था। अल्पविकसित क्षेत्रों और समाज के कमजोर वर्गों को हरित क्रांति के माध्यम से तीव्र औद्योगिक विकास और कृषि में बदलाव से लाभ पहुचाने का कार्य किया गया |
ख) काम के बदले अनाज- 'काम के बदले अनाज' एक निर्धनता निवारण कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य निर्धन लोगों को एक विशिष्ट प्रकार का रोजगार उपलब्ध कराना है। यदि निर्धन नगद कमाते है, तो नीति निर्माता निर्धन लोगों के जीवन में बुराईयों की उत्पत्ति या आय के दुरूपयोग का पुर्वानुमान होता है। इसलिए, नीतियां इस तरह से बनायी गयी जिसमें निर्धन परिवारों को मौद्रिक मजदूरी के बजाय जीवित रहने और खाने के लिए न्यूनतम भोजन का आश्वासन दिया गया है। 'काम के बदले अनाज' कार्यक्रम 1970 में शुरू किया गया था। स्वरोजगार कार्यक्रमों के अंतर्गत, व्यक्तियों और परिवारों को वित्तीय सहायता दी जाती है।
ग) न्यूनतम बुनियादी सुविधाओं का प्रावधान- शिक्षा, स्वास्थ्य, जल आपूर्ति और स्वच्छता, लोगों के जीवन स्तर जैसी सामाजिक उपभोग की जरूरतों पर सावर्जनिक व्यय के माध्यम से सुधार किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण के तहत कार्यक्रमों से निर्धनों के उपभोग की पूर्ति, रोजगार अवसरों के सृजन तथा शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार की अपेक्षा की जाती है। इसी उद्देश्य के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सडक योजना, अम्बेडकर आवास योजना और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम शुरू किये गये थे।
A.
सरकारी राजस्व
B.
सकल घरेलू उत्पाद
C.
शुद्ध घरेलू उत्पाद
D.
शुद्ध राष्ट्रीय आय
सरकार द्वारा शिक्षा पर किया जाने वाला व्यय सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। सकल घरेलू उत्पाद किसी देश में एक वर्ष के दौरान उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का कुल धन मूल्य है।
कुल
सरकारी व्यय
का शिक्षा
व्यय का
प्रतिशत यह
प्रदर्शित
करता है कि सरकार
द्वारा शिक्षा
को कितनी
महत्ता दी
जाती है। इसी
महत्ता के अनुसार
धन का आवंटन
इस क्षेत्र
में किया जाता
है।
B.
78 वें संशोधन
के द्वारा C.
86 वें संशोधन
के द्वारा D.
26 वें संशोधन
के द्वारा
दिसंबर
2002 में भारत
सरकार ने
भारत सरकार
के संविधान
में 86 वें
संशोधन के
द्वारा
निशुल्क और आवश्यक
शिक्षा को 6 से 14
वर्ष के सभी
बच्चों के लिए
एक मूलभूत
अधिकार बना
दिया।
बच्चों
के लिए B.
वरिष्ठ
नागरिकों के
लिए C.
महिलाओं
के लिए D.
सामाजिक
रूप से दबे
कुचलों के
लिए
श्रम
उत्पादकता
में उनके
योगदान से
परे यह हर
व्यक्ति का
अधिकार है कि
उसे शिक्षा
और स्वास्थ्य
की मूलभूत
सुविधाएं
मिलें।
सरकार को यह
ध्यान देना
चाहिए कि समाज
के गरीब और
जरूरतमंद
तबकों को ये
मूल
सुविधाएं
बिना किसी
अतिरिक्त शुल्क
के मिलें।
B.
खुली
अर्थव्यवस्था
C.
बंद
अर्थव्यवस्था
D.
जटिल
अर्थव्यवस्था
अगर
भारत भी
आयरलैंड की तरह
अपनी मानव
पूंजी का
प्रयोग करे
तो भारत की
प्रति
व्यक्ति आय
में
आश्चर्यजनक रूप
से वृद्धि
होगी।
B.
कम
वेतन के कारण C.
अधिक
वेतन के कारण D.
बड़े
घरों के कारण
A.
विकास
नीतियों में
शिक्षा की
महत्ता कोSOLUTION
A.
96 वें संशोधन
के द्वारा SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
ज्ञान
आधारित
अर्थव्यवस्था
SOLUTION
A.
बड़े
बगीचों के
कारण