व्यवसायिक दांचे से अभिप्राय है श्रमबल का अर्थव्यवस्था के प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक क्षेत्रकों में वितरण|
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारत में शिशु मृत्यु दर 218 प्रति हज़ार थी|
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारत में साक्षरता दर 16 प्रतिशत से भी कम थी।
ब्रिटिश काल के दौरान, भारत का लगभग 70-75 प्रतिशत श्रमबल कृषि पर निर्भर था।
भारत का पहला आधिकारिक जनगणना कार्यक्रम वर्ष 1881 में चलाया गया था।
टाटा आयरन स्टील कंपनी की स्थापना 1907 में की गई थी|
औपनिवेशक काल के दौरान भारत में जीवन प्रत्याशा 44 वर्ष थी।
किसी देश में बस कर उस पर कुछ या पूर्ण राजनीतिक नियंत्रण प्राप्त करना, और उसका आर्थिक रूप से शोषण करना|
भारत में अंग्रेजों के आगमन से पहले, सोना और चांदी आयात की प्रमुख वस्तुएं थी और वस्त्र, हस्तशिल्प, हाथी दांत के काम, बहुमूल्य मणि रत्न प्रमुख निर्यात वस्तुएं थीं।
ब्रिटिश शासन के दौरान, कच्चे माल के निर्यात भारत को व्यापार अधिशेष प्राप्त होता था।
लेकिन औपनिवेशिक सरकार इस व्यापार अधिशेष का उपयोग भारत की वृद्धि और विकास करने के बजाय, निम्नलिखित तीन प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करती थी:
• युद्ध का खर्च
• अदृश्य वस्तुओं का आयात। तथा
• ब्रिटिश सरकार के भारत में प्रशासनिक व्यय।
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारत में आधुनिक उद्योगों की प्रगति के लिए जिम्मेदार कारक हैं-
1. दो विश्व युद्ध- युद्ध की परिस्थितियों ने भारतीय वस्तुओं के लिए भारी मांग पैदा की और ब्रिटेन से भारत का आयात भी कम हो गया।
2. स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय औद्योगिक क्षेत्र की प्रगति के लिए मदद की।
भारत में व्यवस्थित वि-औद्योगिकरण के कारण थें-
क.औपनिवेशिक सरकार ब्रिटेन में उभरते आधुनिक उद्योगों के निवेश की आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारत के कच्चे माल तथा प्राथमिक उत्पादों का दोहन करना चाहती थी|
ख.औपनिवेशिक सरकार भारत को ब्रिटेन के औद्योगिक उत्पादों के लिए एक संभावित बाज़ार बनाना चाहती थी।
भारत के दूरस्थ क्षेत्रों से सस्ती दरों पर कच्चे माल को खरीदने और उन्हें ब्रिटेन को निर्यात करने के लिए. सेना को लामबंद करें के लिए और कृषि का व्यावसायीकरण सुगम बनने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने रेलवे, सड़कें, बंदरगाह, जल परिवहन आदि के विकास को बढ़ावा दिया।
पहले इन आधारिक संरचनाओं की भारत में कमी थी। आज़ादी के बाद भारत के विकास के लिए ये संरचनाएं काफी महत्वपूर्ण रहीं|
इसके आलावा, औपनिवेशिक सरकर ने एक सशक्त एवं कुशल प्रशानात्मक ढांचा भी भारत को प्रदान किया|
A.
सरकार द्वारा छोटी जोतों का अधिग्रहण
B.
उच्च उत्पादन के लुइ आगतों का प्रावधान
C.
बिखरी हुई जोतों का एक जोत में परिवर्तन
D.
उपरोक्त सभी
विखंडन की समस्या को कम कारने के लिए चकबंदी कार्यक्रम चलाया गया| जिससे वर्ष 2004 तक 630 लाख एकड़ भूमि चकबंदी के अंतर्गत लाई जा चुकी थी|
भारतीय कृषि का सुधार करने की दृष्टि से सर्कार ने तकनिकी, भूमि तथा सामान्य क्षेत्रों के अंतर्गत कई सुधारात्मक उपाय अपनाए|
A. घटा है
B. बढ़ा है
C. समान रहा है
D. इनमें से कोई नहीं
कृषि संबंधित सुधारों से फसल उत्पादकता में वृद्धि, खेती के अंतर्गत कुल क्षेत्र में वृद्धि, किसानों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आदि हुआ|
A. मिश्रित अर्थव्यवस्था
B. समाजवादी अर्थव्यवस्था
C. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था
D. इनमें से कोई नहीं
इस अर्थव्यवस्था का मुख्य गुण यह है कि इसके द्वारा स्वहित का पोषण होता है और उसके अनुसार आर्थिक विकास की गति तीव्र होती है|
A.
राष्ट्रीय आय में वृद्धि
B.
जीवन स्थर में वृद्धि
C.
तीव्र, सतत एवं अधिक सम्मिलित विकास
D.
उपरोक्त सभी
बारहवी पंचवर्षीय योजना का मुख्य उदेश्य तीव्र, सतत एवं अधिक सम्मिलित विकास तथा सकल घरेलू उत्पाद में 9% की वृद्धि था|
A.
1948
B. 1950
C. 1947
D. 1951
योजना आयोग की स्थापना वर्ष 1950 में हुई परन्तु फरवरी 2015 में इसका नाम बदलकर “निति आयोग” कर दिया गया|
A.
राष्ट्रीय
विकास परिषद
B. वित्त मंत्रालय
C. गृह मंत्रालय
D.
योजना आयोग
योजना आयोग भारत का केंद्रीय अधिकारी था जो अन्य कार्यक्रमों के साथ भारत की पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण करता था|
प्रथम पंचवर्षीय योजना का मुख्य उदेश्य कृषि उत्पादन में वृद्धि और उत्पादन, आय तथा धन का समान वितरण था|
A.
प्राथमिक
उत्पादों का
B. निर्मित औघोगिक वस्तुओं का
C. दोनों (1) तथा (2)
D. इनमें से कोई नहीं
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत कच्चे माल तथा प्राथमिक वस्तुओं का निर्यातक था ब्रिटिश उद्योग द्वारा उत्पादित निर्मित वस्तुओं का आयातक था|
A.
उच्च
जन्म दर
B. उच्च मृत्यु दर
C. उच्च शिशु मृत्यु दर
D. उपरोक्त्त सभी
औनिवेशिक शासन के दौरान, उच्च जन्म, मृत्यु तथा शिशु मृत्यु दर का प्रमुख कारण दुर्भ्रिक्ष तथा महामारियों का बार- बार घटना था|
स्वतंत्राता प्राप्ति के समय लगभग 70% कार्यकारी जनसंख्या कृषि में कार्यरत थी जिससे स्पष्ट होता है कि उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था एक पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था थी|
योजना, निर्धारित अवधि के अंतर्गत विशिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संसाधनों का उपयोग कैसे करना चाहिए, इसकी रूपरेखा प्रस्तुत करती है।
आर्थिक योजनाओं की जरूरत निम्न समस्याओं को हल करने के लिए होती है:
छोटे पैमाने के उद्योग वह उद्योग हैं जिनमें 1करोड़ रुपये से अधिक की पूँजी निवेश नही की जा सकती|
भूमि की उच्चतम सीमा से अभिप्राय कानून द्वारा निधार्रित जोत के उस अधिकतम आकार से है जो कोई एक किसान रख सकता है|
देश की घरेलू सीमा के अंदर उत्पादित वस्तुओं, विशेषकर खाद्यान्न पर निर्भर होने को आत्म-निर्भरता कहते हैं|
समय की दीर्धकालीन अवधि में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में निरंतर वृद्धि को आर्थिक संवृद्धि कहा जाता है|
ग्रामीण और लघु उद्योग समिति 1955 में स्थापित की गयी थी।
पूंजीवादी प्रणाली मांग और पूर्ति की बाजार शक्तियों पर निर्भर करती है। पूंजीवाद के अंतर्गत, कीमतें मूल्य तंत्र से संचालित होती है।
प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस को भारतीय नियोजन का वास्तुकार माना जाता है।
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय कृषि की मुख्य विशेषताएं निम्न थीं-
1. आजीविका का मुख्य साधन
2. कम कृषि उत्पादकता
3. संगठित बाजार का अभाव
4. वर्षा पर अत्यधिक निर्भरता
5. उत्पादन की श्रम गहन तकनीकियां
औपनिवेशिक सरकार ने भारत की राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय का अनुमान लगाने का कभी भी प्रयास नहीं किया। क्योंकि उनकी विकास का आंकलन करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। कुछ लोगों ने निजी स्तर पर आंकलन किए, पर आयों पर उनके आंकलन अलग अलग थे। कुछ प्रसिद्ध आंकलनकर्ताओं में दादा भाई नौरोजी, विलियम डिग्बी और फिंडले शिराज थे। डॉ. वी.के.आर.वी.राव तथा आर.सी. देसाई प्रमुख थे।
आज़ादी की समय भारत के समक्ष निम्नलिखित चुनौतियाँ थी-
1. आधारिक संरचना और जनोन्मुखी विकास में उन्नयन और विस्तार करना, जैसे स्कूल, अस्पताल, सड़कें, बिजली और स्वच्छ पानी की सुविधा|
2. आधुनिकरण, विविधिकरण और श्रमता निर्मित करना और औद्योगिक क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना|
3. कृषि क्षेत्र में सिंचाई की अधिक सुविधाएं उपलब्ध कराना जिससे की कृषि उत्पादकता बढ़े, जमींदारी जैसी शोषक प्रथा को ख़तम करना और भूमि को बड़े किसानों से लेकर भूमिहीन किसानों में पुनर्वितरण।
औपनिवेशिक सरकार ने मुख्य तोर पर तीन आर्थिक क्षेत्रों में भारत का शोषण किया| वे थे -
1. कृषि क्षेत्र का शोषण- इसका शोषण भू-राजस्व की ज़मींदारी प्रथा द्वारा किया गया| जमींदार अनुचित शर्तें और अधिक लगान लगाकर किसानों का शोषण करते थे| वे कृषि क्षेत्रक को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाते थे|
2. औद्योगिक क्षेत्रक का शोषण- अंग्रेजों के आने से पहले विश्व के बाज़ारों में भारत की कलाकृतियों तथा हस्तकला उत्पादों की माँग फैली हुई थी| लेकिन औपनिवेशिक सरकार ने इनके निर्यात पर भारी शुल्क लगाकर और अपनी विनिर्मित वस्तुओं का भारत में शुल्क-मुक्त आयत करके पारंपरिक उद्योगों को नष्ट कर दिया|
3. अन्तराष्ट्रीय व्यापार का शोषण- ब्रिटेन के लिए माल का परिवहन करने वाले भारतीय जहाजों पर भारी शुलक लगाये जाते थे। इसके अलावा भारत का विदेश व्यापार कुछ गिने चुने देशों के साथ प्रतिबंधित रखा गया|
भारत
में किसान
(गेहूं, चावल
आदि जैसी)
पारंपरिक
निर्वाह
फसलों से व्यवसायिक
फसलों (विशेष
रूप से नील) की
ओर बढ़ने पर
मजबूर किए
गये क्योंकि
ब्रिटेन को
अपने वस्त्र
उद्योग के
लिए कपडों को
रंगने/निखारने
के लिए कच्चे
माल के रूप
में नील की
आवश्यकता
थी।
अब किसान
अपने
निर्वाह के
लिए
खाद्यान्न
की फसलों के
स्थान पर,
नकदी फसलों
पर निर्भर थे|
इससे किसान
बाजार की
अनिश्चितताओं
की चपेट में
आने लगे| वे
नकदी फसलों
को बाज़ार में
बेचते थे और
उन पैसों से
खाद्य
प्रदार्थ और
अन्य जरुरत
की वस्तुए
जैसे कपड़ा,
दवाइयाँ, आदि|
अब हर बोवाई के लिए उन्हें खाद्यान्नों को खरीदने के लिए भी नकदी की जरूरत पड़ती थी जिसके कारण किसानों में ऋणग्रस्तता बढ़ी।
भारतीय कृषि और उद्योगों पर पड़े विभाजन के प्रभाव इस प्रकार है-
1. विभाजन के समय भारतीय कृषि की क्षति हुयी क्योंकि पंजाब की भूमि का एक बहुत बड़ा उपजाऊ और सिंचित भाग पाकिस्तान के पास चला गया था।
2. लगभग पूरा जूट उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्ला देश) को चला गया जिससे भारत का जूट उद्योग विशेष रूप से प्रभावित हुआ।
3. भारत के जूट उद्योग को विश्व में एकाधिकार का लाभ मिल रहा था| विभाजन के कारण कच्चे माल के अभाव के कारण भारत के जूट उद्योग का पतन हो गया।
औपनिवेशक काल के दौरान भारतीय अर्थ्व्यवस्था की व्यवसायिक संरचना में बहुत थोड़ा परिवर्तन दिखाई देता है और ये परिवर्तन हैं-
1. कृषि सबसे बड़ा व्यवसाय था जिसमें 70-75 प्रतिशत जनसंख्या लगी थी।
2. जबकि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र क्रमश: केवल 10 प्रतिशत और 15 प्रतिशत था।
3. क्षेत्रीय विषमताओं में वृद्धि दूसरा पहलू था। दक्षिण और पश्चिम के प्रांतों और बंगाल में कार्यबल की कृषि पर निर्भरता में कमी दिखाई दी और उद्योग और सेवा क्षेत्र में वृद्धि हो रही थी। दूसरी ओर उत्तरी प्रांतों में कृषि में श्रमशक्ति की संख्या में वृद्धि देखी गयी।
भारत में ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनाई गई भेदभावपूर्ण नीतियों के कुछ उदाहरण हैं-
· ब्रिटेन में आयात होने वाली भारतीय वस्तुओं पर 40 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक भारी आयात शुल्क लगाया गया; इसका प्रभाव यह था कि भारतीय उत्पादों के लिए ब्रिटिश बाजार में मांग कम रहती थी।
· भारत में आयतित ब्रिटिश कपड़ों को या तो शुल्क मुक्त रखा जाता था या उन पर बहुत कम आयात शुल्क का भुगतान किया जाता था।
· ब्रिटेन के लिए माल का परिवहन करने वाले भारतीय जहाजों पर कुछ प्रतिबंध लगाये जाते थे लेकिन ब्रिटिश जहाजों को इन प्रतिबंधों से छूट दी जाती थी।
परंपरागत उद्योगों के उद्देश्यपूर्ण और व्यवस्थित विनाश की इस तरह की प्रक्रिया को वि-औद्योगीकरण कहते हैं।
भारतीय हस्तकला उद्योग, ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनाई गई व्यवस्थित शोषणकारी नीतियों के नष्ट हुआ।
औपनिवेशिक सरकार द्वारा भारतीय पारंपरिक उद्योग के व्यवस्थित वि-औद्योगीकरण के पीछे दो मुख्य कारण थे।
ग. औपनिवेशिक सरकार ब्रिटेन में उभरते आधुनिक उद्योगों के निवेश की आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारत के कच्चे माल तथा प्राथमिक उत्पादों का दोहन करना चाहती थी|
घ. औपनिवेशिक सरकार भारत को ब्रिटेन के औद्योगिक उत्पादों के लिए एक संभावित बाज़ार बनाना चाहती थी।
औपनिवेशिक सरकार ने भारत का वि-औद्योगीकरण इस प्रकार किया-
· ब्रिटेन की औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत के कच्चे माल का ब्रिटेन में शुल्क मुक्त निर्यात प्रोत्साहित किया जाता था।
· तथा भारतीय बाजारों तक पहुंच बढ़ाने के लिए ब्रिटेन विनिर्मित वस्तुओं का भारत में शुल्क मुक्त आयात प्रोत्साहित किया जाता था| औपनिवेशिक सरकार विदेशी व्यापार की दिशा अपने पक्ष में नियंत्रित रखती थी|
· 50 प्रतिशत से अधिक भारतीय विदेशी व्यापार ब्रिटेन के साथ ही प्रतिबंधित रखा जाता था| शेष व्यापार केवल कुछ ही देशों के साथ किया जाता था जैसे इरान,चीन तथा श्रीलंका|
आजादी की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं-
1. कम प्रति व्यक्ति आय- आजादी के समय प्रति व्यक्ति आय बहुत कम थी (लगभग 1100 रूपये प्रति व्यक्ति) ।
2. व्यापक गरीबी- अपर्याप्त और असंतुलित आहार, प्राचीन आवास, खराब स्वास्थ्य, अशिक्षा, बेरोजगारी, वर्ग और जाति उत्पीड़न आदि ख़राब अर्थव्यवस्था के मुख्य कारण थें।
3. जन निरक्षरता- 1941 में, 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों को छोड़कर, साक्षरों की कुल जनसंख्या केवल 17 प्रतिशत थी।
4. जनांकिकीय परिस्थिति- आज़ादी की पूर्व संध्या पर, भारत की जनांकिकीय परिस्थिति की विशेषता इस प्रकार थी- उच्च जन्म तथा उच्च मृत्यु दर, उच्च शिशु मृत्यु दर और जन्म के समय कम जीवन प्रत्याशा।
5. व्यवसायिक संरचना - कृषि सबसे बड़ा व्यवसाय था जिसमें लगभग 70 प्रतिशत श्रम शक्ति लगी हुयी थी, जबकि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में क्रमश केवल 10 प्रतिशत और 20 प्रतिशत लगी हुयी थी, ऐसे औपनिवेशिक सरकार द्वारा भारत के व्यवस्थित वि-औद्योगीकरण के कारण हुआ। इसके कारण भारत पूंजीगत वस्तुओं के लिए दूसरे देशों पर निर्भर भी हो गया।
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय कृषि के पिछड़ेपन और गतिहीनता के कारक थें-
1. दोषपूर्ण भू-व्यवस्था प्रणाली (जमीदारी प्रणाली) ब्रिटिश सरकार ज़मींदारी व्यवस्था में ज़मींदार औपनिवेशिक सरकार के प्रतिनिधियों के रूप में कार्य करते थे| वे किसानों से किराए के रूप में भू-राजस्व एकत्र करते थे। वे औपनिवेशिक सरकार को एक निश्चित राशि देते थे और बाकी खुद रख लेते थे। उनके पास लगान तय करने का अधिकार था जिससे वे राजस्व व्यवस्था की अनुचित शर्तें और अधिक लगान लगाकर किसानों का शोषण करते थे|
2. किसानों को चावल और गेहूं जैसी खाद्यान्न की फसलों के स्थान पर नकदी फसलों की खेती जैसे नील की खेती करने पर विवश किया गया| इससे किसान बाजार की अनिश्चितताओं और ऋणग्रस्तता की चपेट में आ जाते थे|
3. कृषि में पुरानी कृषि तकनीकों/विधियों का ही प्रयोग होता रहा।
4. भूमि पर बढ़ते जनसंख्या के दबाव ने भूमि के विखंडन और उपजाऊ भूमि के अति दोहन को बढ़ाया।
5. कृषि सुधार की दशा में सरकार की उपेक्षा ने भी भारतीय कृषि की गतिहीनता को बढ़ाने में योगदान दिया।
बाजार की शक्तियाँ पूर्ति और माँग की शक्तियाँ है जो बाजार अर्थव्यवस्था को आकार देती हैं और वस्तुओं के उत्पादन तथा वितरण को विनियमित करती हैं।
आर्थिक संवृद्धि देश में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की क्षमता में वृद्धि को दर्शाता है। अन्य कारकों में वृद्धि के साथ आय और उत्पादन में वृद्धि को विकास कहा जाता है।
आयात प्रतिस्थापन एक नीति है, जहां घरेलू उद्योगों को विदेशों से आयात करने के बजाय घरेलू देश में माल का उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
A.
बाजरे के बीजों को
B.
अधिक उपज देने वाले बीजों को
C.
तिलहन को
D.
कम उपज देने वाले बीजों को
चमत्कारी बीज चावल और गेहूं की अधिक उपज देने वाली किस्म के बीज हैं। इनका इस्तेमाल हरित क्रांति की अवधि के दौरान किया गया।
छोटे पैमाने के उद्योग या (एसएसआई) वह श्रम प्रधान इकाई हैं जिसमे अधिकतम 1करोड़ रुपये तक निवेश की अनुमति दी गई है। इनको बढ़ावा देने के लिए कम ब्याज दर पर बैंक ऋण और उत्पाद शुल्क में कमी जैसे रियायतें दी गई हैं ।
उपरोक्त विशेषताओं के कारण छोटे पैमाने के उद्योग अर्थव्यवस्था में अधिक रोज़गार अवसर पैदा करने के लिए आयोजक लघु उद्योगों पर निर्भर हुए तथा यह अंतरक्षेत्रीय समानता प्राप्त करने में अधिक उपयुक्त हुए|
A.
निजी क्षेत्र
B.
संयुक्त क्षेत्र
C.
सार्वजनिक क्षेत्र
D.
इनमें से कोई नहीं
औद्योगिक नीति प्रस्ताव या आईपीआर,1956 का उद्देश्य क्षेत्रीय समानता को बढ़ावा देना, विकास के लिए अच्छा औद्योगिक आधार तैयार करना, दूसरी पंचवर्षीय योजना में औद्योगिक विकास पर जोर देना और तकनीकी शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान करना था।
समाजवादी अर्थव्यवस्था में सरकार क्या और कितनी मात्रा में उत्पादन करना है इसका निर्णय लिती है और वस्तुओं की कीमत और पूर्ति को नियंत्रित करती है।
कृषि की उत्पादकता को बढाने के लिए रासायनिक खाद का अधिक प्रयोग किया जा रहा है तथा गावों में कम्पोस्ट खाद के प्रयोग को भी बढ़ावा दिया गया है|
राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) भारत में निर्धनता पर आंकड़े एकत्रित करता है।
भारत में, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी लोगों के लिए पोषण जरूरी होता है।
भारत में गरीबी रेखा की अवधारणा पर विचार करने वाले पहले व्यक्ति दादा भाई नौरोजी थे।
पीडीएस या सार्वजनिक वितरण प्रणाली एक भारतीय खाद्य सुरक्षा प्रणाली है जो राशन की दुकानों के माध्यम से गरीबों को रियायती दर पर खाद्य और गैर खाद्य वस्तुएं वितरित करती है।
निर्धनता एक ऐसी स्थिति है जिसमें लोगों का एक वर्ग जीवन निर्वाह के अल्प साधनों को खरीदने के लिए पर्याप्त आय अर्जित करने में विफल रहते हैं।
भूमि सुधार के अंतर्गत भूमि के स्वामित्व के संबंध में कानूनों, नियमों तथा परंपराओं में बदलाव सम्मिलित होते हैं। इसमें भूमि का हस्तांतरण व्यक्तिगत स्वामित्व से सरकारी स्वामित्व वाले सामूहिक फर्मों में और उन फर्मों का विभाजन सामूहिक जोतों में भी हो सकता है।
हाल ही के वर्षों में, गरीबों को विकास रणनीति की विकास प्रक्रिया से बाहर रखा गया है क्योंकि इसने पूंजीगत वस्तुओं के विकास पर ध्यान केन्द्रित किया है। कृषि की विकास रणनीति अमीर किसानों के पक्ष में रही है। इस रणनीति के प्रभाव के कारण अमीर और भी अमीर तथा गरीब और भी गरीब हुए हैं। विकास का लाभ गरीबों को नहीं मिला हैं।
निर्धनता रेखा उस आय स्तर को दर्शाती हैं जो भोजन की आवश्यक बुनियादी न्यूनतम मात्रा को खरीदने के लिए मुश्किल से ही पर्याप्त है।
भारत का योजना (नीति) आयोग कैलोरी उपभोग के अनुसार निर्धनता रेखा को निर्धारित करता है जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2400 कैलोरी तथा शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2100 कैलोरी से कम का उपभोग गरीबी रेखा से नीचे है।
लोगों को छोटे समूहों का गठन करने, पैसा बचाने तथा आपस में उधार देने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। ये समूह स्वयं -सहायता समूह के रूप में जाने जाते हैं। इन समूहों को सरकार की ओर से वित्तीय सहायता मिलती है और ये आपस में ही तय करते हैं कि किसे ऋण प्रदान किया जाए ।
मनरेगा से अभिप्राय महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम से है। इसका मुख्य उद्देश्य एक वित्तीय वर्ष में प्रतिदिन निर्धारित न्यूनतम मजदूरी पर प्रत्येक ग्रामीण परिवार के एक इच्छुक व्यस्क को 100 दिनों तक के लिए अकुशल शारीरिक श्रम का कार्य उपलब्ध कराने की गारंटी देना है। इस अधिनियम के तहत करोड़ों परिवारों को रोज़गार के अवसर प्रदान किये गए है |
निर्धनता एक ऐसी सामाजिक स्थिति है जिसमें समाज का एक वर्ग अपने न्यूनतम बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ होता है।
•निर्धन निरंतर कुपोषण, खराब स्वास्थ्य, विकलांगता आदि के कारण शारीरिक रूप से कमजोर होते हैं
•वे साहूकार से उच्च ब्याज दर पर रुपये उधार लेते हैं जिसके कारण वे ऋणग्रस्तता का शिकार हो जाते हैं।
•वेतन के लिए मोल भाव करने की असमर्थता के कारण उनका नियोक्ताओं द्वारा शोषण किया जाता है।
•बिजली और पानी तक उनकी पहुँच नहीं होती है।
•वे लकड़ी या उपलों पर खाना पकाते हैं।
•उन्हें लाभप्रद रोजगार प्राप्त करने में लिंग असमानता का सामना करना पड़ता है।
•महिलाओं और बच्चों पर कम ध्यान दिया जाता है।
हालांकि निर्धनता उन्मूलन की दशा में नीति को एक प्रगतिशील तरीके से विकसित किया गया है लेकिन इन कार्यक्रमों का लाभ अभी निर्धनों तक नहीं पहुंचा है। इन कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार सरकार और बैंक अधिकारी जो अधिकतर बुराईयों से प्रेरित, अपर्याप्त रूप से प्रशिक्षित और भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं। नजरिया बदला जाना चाहिए और अधिकारी निर्धन लोगों के प्रति सहानुभूति रखने वाले होने चाहिए, जिससे इन नीतियों का लाभ उन्हें मिले जिनकी इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है |
'काम के बदले अनाज' एक निर्धनता निवारण कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य निर्धन लोगों को एक विशिष्ट प्रकार का रोजगार उपलब्ध कराना है। यदि निर्धन तरल नगद कमाते है, तो नीति निर्माता निर्धन लोगों के जीवन में बुराईयों की उत्पत्ति या आय के दुरूपयोग का पुर्वानुमान लगा सकते है। इसलिए, नीतियां इस तरह से बनायी गयी जिसमें निर्धन परिवारों को मौद्रिक मजदूरी के बजाय जीवित रहने और खाने के लिए न्यूनतम भोजन का आश्वासन दिया गया है।
हाल ही के वर्षों में इसे मनरेगा के साथ सम्मलित कर दिया गया है |
भारत विशाल प्राकृतिक और मानव संसाधनों से समृद्ध है। यहाँ पर संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है | परन्तु यह दुभाग्य की बात है कि यहाँ संसाधनों का कम उपयोग हुआ है या वे अप्रयुक्त हैं|
हमारे जंगल, बिजली और खनिज संसाधन अभी भी बड़े परिमाण में अप्रयुक्त हैं, जिसके कारण विकास की दर धीमी रही और निर्धनता में गिरावट कम हुई |साथ ही अपने अकुशल संसाधन प्रबंधन तंत्र के कारण हम निम्न उत्पादता, बहुत कम उत्पादन, निम्न आय और निम्न जीवन स्तर जैसी समस्याओं का सामना करते है, जो हमें निर्धनता के दुष्चक्र में ले जाती हैं।
संसाधनों में कम उपयोग के कारण निम्न आय और कम बचत होती है , जिसके कारण पुनः
कम निवेश होता है , इसके कारण
कम उत्पादन, और परिणामस्वरूप
कम उपभोग होता है । अतः, निर्धन निर्धनता के दुष्चक्र में फंसा रहता है।
निर्धनता निवारण के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीन उपाय हैं-
भूमि सुधार- सरकार ने भूमि सुधार के माध्यम से कृषि क्षेत्र में संपत्तियों के पुनर्वितरण की नीति अपनाई है। यह सभी किसानों के लिए भूमि क्षेत्र के समान रूप से वितरण में मदद करती है।
जनसंख्या नियंत्रण- सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम अपनाया है। जनसंख्या के नियंत्रण से प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होगी और इससे निर्धनता का स्तर कम हो जायेगा।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली- समाज के निर्धन वर्गों के बीच सरकारी विनियमित उचित मूल्यों की दुकानों के माध्यम से कम या रियायती मूल्यों पर अनाज और कुछ अन्य आवश्यक वस्तुओं के वितरण को सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहा जाता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली निर्धनों को सस्ते और रियायती खाद्यान्न प्रदान करने में मदद करती है।
निर्धनता निवारण कार्यक्रम की मुख्य उपलब्धियां हैं-
* 1993-94 से 2004-05 तक की 11 वर्ष की अवधि के दौरान 0.74 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से गिरावट आई है | 2004-05 से 2011-12 के दौरान गिरावट की दर में वृद्धि होकर 2.18 प्रतिशत हो गई है |
* 2011-12 में निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में 25.7 प्रतिशत, शहरी क्षेत्रों में 13.7 प्रतिशत और पुरे भारत में 21.9 प्रतिशत था | 2004-05 में निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में, शहरी क्षेत्रों में और पुरे भारत में क्रमशः 41.8 प्रतिशत और 25.7 प्रतिशत और 37.2 प्रतिशत था |
* निर्धनों के बीच पोषण स्तर बढ़ गया है और संसाधनों की उपलब्धता भी बढ़ गयी है।
भारत में बड़े पैमाने पर निर्धनता के लिए जिम्मेदार तीन महत्वपूर्ण कारक निम्नानुसार हैं-
1) सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अर्थात् 1951 से 1998 तक भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर में हुयी प्रतिशत वृद्धि को लोगों की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपर्याप्त रही है।
2) अपर्याप्त आय- देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद का एक बडा भाग कुछ अमीर हाथों में जमा होता है। शेष जनसंख्या अर्थात् गरीब और मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए आय की बहुत कम राशि बचती है। परिणामस्वरूप गरीब लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे है।
3) बढ़ती बेरोजगारी- भारत में रोजगार सृजन बढ़ती जनंसख्या की मांग को पूरा करने के लिए अच्छी हालत में नहीं है ऐसा इसलिए है क्योंकि आर्थिक विकास के उपाय अनियोजित और अस्त -व्यस्त है। इसके कारण ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में दिन पर दिन बेरोजगारी बढ़ती जा रही है।
मासिक प्रति व्यक्ति व्यय के माध्यम से निर्धन की पहचान करने की विधियों की कमियां इस प्रकार है :
• यह अति निर्धन और अन्य निर्धनों में कोई अंतर नहीं करता है।
• इसका प्रयोग करने पर इस तथ्य की पहचान करना मुश्किल है कि गरीबों में किसे मदद की ज्यादा ज़रूरत है।
• सरकार निर्धनता स्तर में गिरावट की काल्पनिक तस्वीर पेश कर सकती है।
• आय के अतिरिक्त भी कई और कारक हैं, जैसे बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पेय जल और स्वच्छता आदि का निर्धनता रेखा का निर्धारण करते समय विचार करने की जरूरत है।
• मौजूदा निर्धनता रेखा, सामाजिक कारकों जैसे कि, अशिक्षा, संसाधनों के उपयोग में कमी और नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रता पर विचार नहीं करती है जिसके कारण निर्धनता में गिरावट परिलक्षित हो रही है।
स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (एसजीएसवाई) - इस कार्यक्रम को आईआरडीपी, ट्राईसम आदि जैसे कार्यक्रमों का पुनर्गठन और संयुक्तीकरण करके 1 अप्रैल 1999 को शुरू किया गया था। यह स्वयं रोजगार के सभी प्रकारों जैसे स्वयं सहायता समूहों में निर्धन ग्रामीणों का संगठन, बुनियादी ढांचे का विकास, विपणन सहायता आदि को शामिल किया गया है।
काम के बदले अनाज कार्यक्रम (एफडब्ल्यूपी) - इसे 2001 में आरंभ किया गया था और देश के 150 सबसे पिछडे जिलों में शुरू किया गया था। यह सूखा प्रभावित क्षेत्रों में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को नि:शुल्क खाद्यान्न की उचित मात्रा प्रदान करता है।
इंदिरा आवास योजना (आईएवाई) - यह योजना ग्रामीण निर्धनों के मकानों के निर्माण के लिए है। इस योजना के दौरान 2008-2009 तक लगभग 21 लाख घरों का निर्माण हो चुका है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनेरगा) - नरेगा को मनेरगा के नाम से भी जाता है और यह 2 अक्टूबर 2009 को प्रभाव में आया। इसका उद्देश्य 120 रूपये प्रतिदिन की मजदूरी पर प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में 100 दिनों के रोजगार की वैधानिक गारंटी प्रदान करना है। इसे देश के सभी पिछडे जिलों में लागू किया गया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में निर्धनता बढने के कई कारण हैं। ये इस प्रकार हैं-
ब्रिटिश शासन के अंतर्गत शोषण: ब्रिटेन ने कुटीर और लघु उद्योगों का शोषण करके, भारत को एक औपनिवेशिक राष्ट्र बना दिया, जिसके कारण निर्धनता व्याप्त हो गई |
जनसंख्या वृद्धि- अशिक्षा, पारंपरिक दृष्टि कोण, परिवार नियोजन के उपायों में कमी, पुरूष बच्चे के लिए वरीयता आदि के कारण गरीबों के बीच जनसंख्या वृद्धि अधिक बढती है।
बेरोजगारी- नौकरी खोजने वाले रोजगार के अवसरों में वृद्धि की तुलना में अधिक दर से बढ रहे हैं, परिणामस्वरूप बेरोजगारी में वृद्धि हो जाती है।
विकास रणनीति- हाल ही के वर्षों में, गरीबों को विकास रणनीति की विकास प्रक्रिया के बाहर रखा गया है क्योंकि पूंजीगत वस्तुओं के विकास पर ध्यान केन्द्रित था और कृषि की विकास रणनीति अमीर किसानों के पक्ष में कर दी गयी।
आय की असमानताएं- ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में, संपत्ति और आय के स्वामित्व में असमान वितरण के कारण असमानताएं होती है।
कीमतों में बढती मुद्रास्फीति- निर्धारित वास्तविक आय में कमी और कम कमाने वाले वर्ग तथा उनकी क्रय शक्ति और जीवन स्तर में गिरावट के कारण कीमतों में तेजी से निरंतर वृद्धि हुयी है।
भारतीय खाद्य निगम बफर स्टॉक को बनाए रखता है।
समर्थित मूल्य न्यूनतम मूल्य की एक गारंटी है जिस पर सरकार किसानों से निर्दिष्ट वस्तुएं खरीदती है।
ग्रामीण साख के दों सोत्र हैं:
· संस्थागत सोत्र
· गैर-संस्थागत सोत्र
कृषि के विविधीकरण की आवश्यकता इसलिए उत्पन्न हो रही है क्योंकि आजीविका के लिए सिर्फ खेती पर निर्भर रहने में जोखिम बहुत अधिक है।
नाबार्ड की स्थापना सन 1982 में की गयी थी।
एक बहु एजेंसी संस्थानों का समूह ग्रामीण बैंकिंग की वर्तमान संस्थागत संरचना है।
ग्रामीण विकास के लिए हमारे दो उपाय-
स्वर्णिम क्रांति 1991-2003 की अवधि को दर्शाती है इसी दौरान बागवानी में सुनियोजित निवेश बहुत ही उत्पादक सिद्ध हुआ और यह क्षेत्र स्थायी आजीविका के विकल्प के रूप में उभरा। भारत आम, केला, नारियल, काजू जैसे फलों की किस्मों और अनेक मसालों के उत्पादन में विश्व के अग्रणी देश के रूप में उभरा है।
भारत सरकार ने खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढाव को कम करने के लिए बफर स्टॉक की नीति अपनाई है। बफर स्टॉक अर्थव्यवस्था की झटकों को सहने में सहायता करता है और कीमत स्तरों में व्यापक उतार-चढावों के विरूद्ध एक सुरक्षा तंत्र प्रदान करता है। बफर स्टॉक नीति के तहत, सरकार किसानों से प्रत्यक्ष खरीद के माध्यम से खाद्य का भंडारण करती है और जब कीमतों में वृद्धि होती है तब इन भंडारों को घरेलू बाज़ार में बिक्री के लिए निकालती है। बफर स्टॉक का मुख्य उद्देश्य बहुत अधिक फसलों के परिणामस्वरूप अनावश्यक रूप से कम हुयी कीमतों का निर्मूलन करना है।
भारत सरकार नेबाज़ार में कृषि जिंसों की कीमतों में होने वाले अनुचित उतार-चढ़ावसेकिसानोंकी रक्षा के लिएन्यूनतमसमर्थन कीमतकीनीतिअपनाई है। इस नीति के अंतर्गत, सरकार बुआई के मौसम से पहले ही किसानों के लिए उचित प्रतिफल सुनिश्चित करने हेतु एक निविदा में 24 कृषि जिंसों के लिए एक न्यूनतम समर्थन कीमतया एमएसपी की घोषणा करती है। ये कीमतें कृषि लागतों और कीमतों (सीएसीपी) के लिए आयोग की सिफारिशों के अनुसार निर्धारित की जाती है। इसका यह मतलब है कि यदि बाजार कीमतें इन न्यूनतम समर्थन कीमतों से कम रहती है तो किसानों के पास सरकार को अपना उत्पादन बेचने का एक विकल्प है।फिर भी, यदि बाजार कीमतें अधिक रहती है, तो किसान अपने उत्पादन को बाज़ार में बेचने के लिए स्वतंत्र हैं।
स्वयं सहायता समूह अपने प्रत्येक सदस्य में एक न्यूनतम अंशदान द्वारा कम अनुपात में मितव्ययिता को बढाता है। एकत्रित धनराशि से, जरूरतमंद सदस्यों को उचित ब्याज दरों पर छोटी-छोटी किश्तों में चुकाये जाने के लिए ऋण दिये जाते हैं। मार्च 2003 तक, सात लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों कथित तौर पर ऋणों को प्रदान कर रहे थे। इस प्रकार की साख उपलब्धता को अति लघु साख कार्यक्रम भी कहा जाता है। स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं के सशक्तिकरण में सहायता की है लेकिन ऋणों का उपयोग मुख्य रूप से उपभोग के लिए हो रहा है और कृषि उद्देश्य के लिए बहुत कम मात्रा में ऋण लिया जाता है।
भारत
में मत्स्य
पालन
क्षेत्र को
एक महत्वपूर्ण
आय और रोजगार
सृजक के रूप
में जाना जाता
है। यह विशेष
रूप से तटीय
क्षेत्रों
में देश की
आर्थिक रूप
से पिछडी
आबादी के एक
बहुत बड़े भाग
के लिए
आजीविका का
एक मुख्य
स्रोत है।
मत्स्य
(समुद्री + अंतर्वर्ती)
का कुल उत्पादन
1950-51 में 0.7 मिलियन
टन से बढ़कर
1980-81 में 2.4 मिलियन
टन,
फिर 1990-91 में 3.8
मिलियन टन और
अंत में 2005-06 में 6.5
मिलियन टन हो
गया।
कुल
मत्स्य
उत्पादन के
लगभग 49
प्रतिशत तक
अंतर्वर्तीं
स्रोतों का
योगदान है।
शेष 51
प्रतिशत
समुद्री
क्षेत्रों
(समुद्र और
महासागरों) से
आता है। आज
भारत में कुल
मत्स्य
उत्पादन
देश के घरेलू
सकल उत्पाद
का 1.0
प्रतिशत है
और कृषि से
सकल घरेलू
उत्पाद का 5.3
प्रतिशत है।
सागरीय उत्पादकों
में प्रमुख
राज्य केरल, गुजरात, महाराष्ट्र
और तमिलनाडु
हैं। यह 14
मिलियन
लोगों की
आजीविका का
स्रोत है।
ग्रामीण विकास एक व्यापक शब्द है। यह उन क्षेत्रों के विकास के कार्यों पर ध्यान केन्द्रित करता है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सर्वांगीण विकास में पिछड़ गए हैं। ग्रामीण पिछड़ेपन के निम्न कारण हैं-
i) भूमिपर जनसंख्या काभारीदबाव।
ii) सार्वजनिक निवेश में गिरावट।
iii) दोषपूर्ण सामाजिक परिवेश और
iv) भूमि सुधार की विफलता।
ग्रामीण विकास परियोजनाओं का लक्ष्य पहले इन समस्याओं को हल करने का रखना चाहिए।ग्रामीणविकासकोएकप्रक्रिया के रूप मेंपरिभाषित किया जा सकताहै जिसमें सामान्य लोगों और सरकार के सामूहिक प्रयासों के साथ लगातार ग्रामीण लोगों का विशेष रूप से ग्रामीण निर्धनों का जीवन स्तर उठता है।
ग्रामीण विकास की मुख्य समस्याएं निम्नलिखित हैं-
i) निम्न सार्वजनिक निवेश के कारण कृषि की विकास दर में गिरावट।
ii) विद्युत, सिंचाई, ऋण, विपणन, परिवहन सुविधाएं, कृषि अनुसंधान आदि जैसा अपर्याप्त आर्थिक बुनियादी ढांचा।
iii) स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षण सुविधाओं जैसा अपर्याप्त सामाजिक बुनियादी ढांचा।
iv) कृषि की सहायता के लिए बहुत कम गैर कृषि गतिविधियां।
ग्रामीण विकास से जुडे़ प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित हैं-
i) ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य की अधिक से अधिक सुविधाएं और सेवाएं उपलब्ध कराकर मानव संसाधनों का विकास।
ii) भूमि सुधार
iii) स्थानीय उत्पादक संसाधनों का विकास
iv) आधारिक संरचना का विकास अर्थात् सिंचाई, परिवहन, बिजली, ऋण सुविधाओं आदि का विकास।
v) ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और गैर-कृषि दोनों में रोजगार के अधिक अवसर।
ग्रामीण साख से संबंधित नीतियों का भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा और बाद में नाबार्ड द्वारा सख्ती से अनुपालन करने ने भारत में ग्रामीण साख बाजार को परिवर्तित करने में मदद की। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग प्रणाली के तीव्र विस्तार ने 1960 के मध्य के दशक के बाद विशेष रूप से ग्रामीण कृषि और गैर कृषि उत्पादन, आय और रोजगार के स्तर को उठाया है। हमने खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है। ग्रामीण निर्धनों को काफी हद तक ग्रामीण साहूकारों के चंगुल से सुरक्षित किया जा सका है। बैंकिंग की प्रवृत्ति ग्रामीण लोगों में बहुत प्रचलित हो रही है। हालांकि, हमारी बैंकिंग प्रणाली में कुछ कमियां हैं-
1) बैंक कार्य निष्पादन और उच्च देय राशियों के भार के कारण पुरानी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
2) वाणिज्य बैंकों को छोडकर, अन्य औपचारिक संस्थान अच्छे कर्जदारों को उधार देने में नाकाम रहे हैं।
3) बकाया दरें दीर्घकाल से उच्च रही है।
4) 50 प्रतिशत बकायदारों को 'इरादतन बकायदारों' के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
कृषि
विविधीकरण
के दो पहलू
हैं। एक पहलू फसलों
के
विविधीकरण
से संबंधित
है और दूसरा श्रम
शक्ति को
खेती से
हटाकर अन्य
संबंधित
कार्यों
जैसे
पशुपालन, मुर्गी
पालन, मत्स्य
पालन, आदि
तथा गैर कृषि
क्षेत्रों
से संबंधित
है। भारत में
कृषि एक
मौसमी व्यवसाय
है। मौसम के
समाप्त
होने के
दौरान, यह
ग्रामीण
लोगों के लिए
वैकल्पिक
रोजगार के अवसरों
को प्रदान
करने के लिए
आवश्यक हो
जाता है।
आजीविका के
लिए विशेष
रूप से कृषि
पर निर्भर
रहना हमेशा
जोखिम भरा
होता है। ग्रामीण
लोगों को
गरीबी से
उभारने, आय
के उच्च स्तर
को प्राप्त
करने के लिए
विविधीकरण
आवश्यक है।
फसल
विविधीकरण
उच्च विकास
को
सुनिश्चित
करता है। यह
आय में स्थिरता
लाता है क्योंकि
उत्पादन और
बाजार कीमतों
में
उतार-चढाव के
कारण होने
वाले जोखिम
न्यूनतम हो
जायेगें।
इसके अलावा
यह राष्ट्रीय
खाद्य
सुरक्षा भी
सुनिश्चित
करता है। इस प्रकार
इससे यह निष्कर्ष
निकाला जा
सकता है कि
कृषि
विविधीकरण
ग्रामीण
लोगों को
संवहनीय उत्पादक
आजीविका के
विकल्प
प्रदान करता
है।
निम्नलिखित कथन ग्रामीण विकास में साख के महत्व को उजागर करते हैं-
1) फसल बुवाई और उत्पादन के बाद आय प्राप्ति के बीच की अवधि का फासला बहुत लंबा होता है इसलिए किसानों को अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऋण की आवश्यकता होती है।
2) किसानों को बीजों, उर्वरकों, उपकरणों आदि पर निवेश करने के लिए ऋण की आवश्यकता होती है। चूंकि अधिकतर किसान गरीब हैं, ऐसा निवेश करने के लिए उनके पास पर्याप्त व्यक्तिगत संसाधन नहीं हैं।
3) गैर कृषि क्षेत्रों जैसे लघु और कुटीर उद्योगों को भी ऋण की आवश्यकता होती है।
4)ग्रामीण लोगों को स्वरोजगार के लिए ऋण आवश्यक होता है।
जैविक खेती कृषि का तरीका है जोपोषक तत्वों की पूर्ति तथा कीट और रोगों के प्रबंधन के लिए जैविक आदानों का उपयोग करता है।यह विविधिकृत कृषि का एक विशेष प्रकार है जिसमें केवल स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके खेती की समस्याओं का प्रबन्ध किया जाता है।
जैविककृषिके लाभ:
i) जैविक कृषि आधुनिक कृषि की तुलना में सस्ती है क्योंकि इसमें स्थानीय स्तर पर उत्पादित आगतों की आवश्यकता होती है जो कम कीमत पर आसानी से उपल्बध होते हैं।
ii) जैविक कृषि विशेष रूप से निर्यातों के माध्यम से अच्छा प्रतिफल उत्पन्न करती है।
iii) रासायनिक आगतों से उत्पादित खाद्य की तुलना में जैविक विधि से उत्पादित खाद्य में पोषक तत्व अधिक होते है।
iv) जैविक कृषि श्रम-गहन है और काफी लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करती हैं।
v) जैविक कृषि पर्यावरण के अनुकूल है।
vi) जैविक कृषि धारणीय कृषि विधि है जो कृषि संसाधनों के उपयोग के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता को लंबे समय तक बनाए रखती है।
vii) यह शुद्धता और सावधानी बनाए रखने का संकेत है।
जैविककृषिकी सीमाएं:
i)जैविककृषि को बुनियादीसुविधाओंके अच्छेनेटवर्ककी आवश्यकता है।
ii)इन उत्पादों के विपणनकीसमस्या है।
iii) जैविककृषि कम प्रतिफल के कारणप्रारंभिकवर्षों मेंमहंगी पड़तीहै।
iv) बेमौसमीफसलों के उत्पादन के विकल्पजैविककृषिमेंअत्यन्तसीमित है।
भारत में कृषि विपणन के र्निविध्न रूप से कार्य करने के लिए मुख्य बाधाएं या रूकावटें निम्न हैं-
1) गांवों में किसानों के लिए कोई उचित भंडारण या भंडारगृहों की व्यवस्था नहीं है जहां वे अपने शीघ्र खराब होने वाले कृषि उत्पादों का भंडारण कर सकें। किसान अपने उपज को गड्डों, गंदें पात्रों, कच्चे भंडार गृहों में भंडारित करने के लिए मजबूर होते हैं। भंडारण की इन अवैज्ञानिक विधियों के कारण काफी क्षति होती है।
2) गरीब किसानों के पास उचित ऋण सुविधाओं के अभाव में अपनी उपज के हेतु बेहतर बाज़ार के लिए प्रतीक्षा करने की कोई क्षमता नहीं होती है। किसानों को अक्सर निम्न कीमत पर गांव के साहूकार व्यापारियों को अपने उत्पाद बेचने के लिए मजबूर होना पड़ताहै।
3) परिवहन सुविधाएं अत्यधिक अपर्याप्त हैं। किसानों के पास नजदीक की मंडियों में जाने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं होता है इसलिए वे कम कीमत पर गांव के बाजार में अपने उत्पादों को बेच देते हैं।
4) कृषक और उपभोक्ता के बीच बिचौलियों की एक बहुत बडी संख्या होती है। ये सभी बिचौलियें लाभ की एक अच्छी खासी रकम ले लेते है और इस प्रकार वास्तविक कृषकों को कम प्रतिफल मिलता है।
5) किसानों को बड़े बाज़ारों की प्रचलित कीमतों के बारे में कम जानकारी होती है।परिणामस्वरूप उनका आसानी से बिचौलियों द्वारा शोषण होता है।
6) भारतीय किसान अपने उत्पादों की श्रेणी को महत्व नहीं देते हैं और परिणामस्वरूप बेहतर गुणवत्ता वाले अपने उत्पादों के लिए अच्छी कीमतें मिलने के सुनहरे अवसर को गंवा देते हैं।
7) संस्थागत वित्त के अभाव में, भारतीय किसान को ऋणों के लिए व्यापारियों और गांव के साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता है। फसल कटाई के तुरंत बाद, ये किसान प्रतिकूल कीमतों पर उधारकर्ताओं को अपनी पूरी उपज दे देते हैं।
भारत में वर्तमान शिक्षा प्रणाली में विद्यार्थी केवल शैक्षणिक डिग्री हासिल करने के लिए ही पढाई करते हैं। जबकि डिग्री के पाठ्यक्रम का कोई संपर्क रोजगार अवसर से नहीं होता है। स्कूल और कॉलेज में काफी वर्ष अधयन्न करने के बाद भी भारतीय युवा बेरोजगार रहते हैं क्योंकि उनके पास व्यावहारिक जानकारी या प्रशिक्षण का अभाव होता है। भारतीय विद्यार्थियों के बीच पेशेवर या वाणिज्यिक शिक्षा लोकप्रिय नहीं है। हालांकि अब इस परिद्रश्य में बदलाव आ रहा है, मगर भारतीय शिक्षा प्रणाली में अभी भी काफी सुधर आने बाकी हैं।
प्रवासन के प्रेरक कारक हैं-
i) औद्योगीकरण के कारण अधिक रोजगार अवसर
ii) शहरी क्षेत्रों में अधिक शैक्षणिक सुविधाएं
प्रवासन के उत्प्रेरक कारक हैं –
i) कृषि की खराब अवस्था के करण आर्थिक असुरक्षा|
ii) अन्य आर्थिक अवसरों का अभाव|
iii) ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव|
वे संकेत निम्नलिखित हैं:
· विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘भारत तथा ज्ञान अर्थव्यवस्था’ के अनुसार अगर भारत सफलता पूर्वक अपने ज्ञान का प्रयोग करे तो वह ज्ञान अर्थव्यवस्था में परिवर्तन ला सकता है।
· यह भी अनुमानित किया गया है कि भारत की प्रतिव्यक्ति आय जो 2002 में लगभग 1000 अमेरिकी डॉलर थी 2020 में 3000 अमेरिकी डॉलर से अधिक हो जाएगी।
· ड्युश बैंक के द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 तक भारत विश्व में चार प्रमुख प्रगति केन्द्रों में से एक के रूप में उभरेगा।
· यह भी अनुमानित है कि भारत में 2005 तथा 2020 के बीच शिक्षा के औसत वर्षों में 40 प्रतिशत की वृद्धि होगी।
· पिछले दो दषकों में, भारतीय साॅफ्टवेयर उद्योग अत्यधिक प्रगतिशील रहा।
उद्यमियों, प्रषासनिक अधिकारियों तथा राजनेताओं ने भारत को एक ज्ञान पर आधारित अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए सूचना तकनीक का प्रयोग प्रस्तावित किया है। उदारहण के लिए, भविष्य में ई-प्रशासन को अपनाने का प्रस्ताव दिया गया है।
कार्य स्थान पर प्रशिक्षण आवश्यक होता है क्योंकि:
i) यह श्रमिक के आत्मविश्वास और नैतिक बल में सुधार करता है।
ii) प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षक नौसिखियों के साथ ही रहता है जिससे वो उनकी त्रुटियों को उसी समय पहचान कर सही दिशा में मार्गदर्शन कर सकता है|
iii) यह श्रमिक का आधुनिकीकरण और नवाचार से परिचय कराने में सहायता होता है।
iv) यह कच्चे माल को एक सस्ते और प्रभावी तरीके से प्रयोग करना सुगम करता है।
v) यह श्रमिक की विचार प्रक्रिया को विस्तारित करने में सहायता करता है और जिससे वे हमेशा कार्य संस्थान के विकास के लिए नई और बेहतर चीज़ें अपनाने के लिए तैयार रह सकें।
यह दुर्घटना होने से भी बचाव करता है और प्रशिक्षण लागत को किफायती बनाने में मदद करता है|
भारत में खराब स्वास्थ्य लक्षण इस प्रकार हैं:
i. उच्च जन्मदर और जनसंख्या की तेज वृद्धि: तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण समुदाय को स्वच्छ जलापूर्ति, सफाई और कचरा निस्तारण सुविधाएं प्रदान करना बहुत कठिन हो गया है। जिसकी वजह से मलेरिया और टी.बी जैसे संक्रामक रोग फैलते हैं।
ii. कुपोषण: चौतरफा फैला कुपोषण बच्चों के बीच संक्रामक रोगों का मुख्य कारण होता है। इससे उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास में बाधा आती है| कुपोषण की वजह से श्रम्बल भी कमज़ोर और कम उत्पादक हो जाता है|
iii. खराब स्वास्थ्य एवं आवास स्थितियां: काफी बड़ी जनसंख्या उप-मानक स्थितियों में निवास करती हैं और उनके पास पर्याप्त स्थान, वायु संचार और मलप्रवाह की व्यवस्था नहीं होती। लोगों को संदूषित भोजन, संदूषित पानी और अपर्याप्त व्यक्तिगत सुरक्षा जैसी समस्याएं होती हैं।
इन परशानियों के कारण भारत में शिशु मृतु दर, अशोधित मृत्यु दर अधिक है तथा जन्म के समय जीवन प्रत्याशा कम है|
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भौतिक पूंजी |
मानव पूंजी |
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1. भौतिक पूंजी वे मूर्त परिसम्पत्तियाँ होती हैं जो मानव के द्वारा बनाई जाती हैं और जिन्हें उत्पादन में प्रयोग किया जाता है। |
1. मानव पूंजी वे अमूर्त विशेषताएँ होती हैं जो मानव, उत्पादन करने के लिए स्वयं में उत्तपन करता है, जैसे ज्ञान, कौशल आदि। |
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2. भौतिक पूंजी को आसानी से बाजार मे बेचा जा सकता है। |
2. मानव पूंजी की सेवाओं को बेचा जाता है। |
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3. भौतिक पूंजी को इसके निर्माता से अलग किया जा सकता है। |
3. मानव पूंजी को इसके निर्माता या स्वामी से अलग नहीं किया जा सकता है। |
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4. भौतिक पूंजी देशों के बीच गतिशील होती है। |
4. मानव पूंजी की गतिशीलता राष्ट्रीयता तथा संस्कृति के द्वारा प्रतिबंधित होती है। |
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5. भौतिक पूंजी निरंतर प्रयोग के कारण या तकनीक में परिवर्तन के कारण समय के साथ बेकार हो जाती है। |
5. हालांकि मानव पूंजी में भी आयु के बढ़ने के साथ क्षरण होता है मगर इसे षिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं की सहायता से बेहतर किया जा सकता है। |
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6. उदाहरण: मशीनरी, कंप्युटर, इमारतें, आदि। |
6. उदाहरणः शिक्षक, डॉक्टर, आदि। |
भारत में प्राथमिक शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम इस प्रकार हैं -
प्राथमिक शिक्षा में बालिकाओं की शिक्षा के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम -
इस कार्यक्रम का लक्ष्य है शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में बालिकाओं के लिए मानक विद्यालयों का विकास करना। अब तक 25 राज्यों में 3286 पिछड़े प्रखंडों को इस योजना में सम्मिलित कर लिया गया है।
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय या के.जी.बी.वी -
इस कार्यक्रम की शुरूआत अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्ग से संबंधित बालिकाओं के लिए उच्च प्राथमिक स्तर में आवासीय विद्यालयों की स्थापना करने के लिए की गई थी।वर्ष 2007 के बाद इस योजना को सर्व षिक्षा अभियान में सम्मिलित कर दिया गया।
जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम -
प्राथमिक शिक्षा प्रणाली को पुर्नजीवित करने के लिए वर्ष 1994 में जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम आरंभ की गया। इससे नामांकनों में वृद्धि हुई, बच्चों का विद्यालय छोड़ना कम हुआ तथा शिक्षण परिवेश में सुधार हुआ।