A.
औद्योगिक आधार
B.
आधारिक संरचनाएं
C.
कृषि विकास
D.
व्यापार नीतियों
औपनिवेशिक शासन के दौरान कुछ ही मौलिक आधारिक संरचनाएँ विकसित की गईं जैसे कि बंदरगाह, रेलवे, डाक सेवा और जल परिवहन|
A.
पेट्रोल की कीमतों में गिरावट
B.
इंग्लिश चैनल का उद्घाटन
C.
स्वेज नहर का उद्घाटन
D.
हिंद महासागर का उद्घाटन
ब्रिटेन और भारत के बीच माल की ढुलाई की लागत काफी कम हो जाने का कारण था स्वेज नहर का उद्घाटन|
अंग्रेजों के आने से पहले विश्व के बाज़ारों में भारत की कलाकृतियों तथा हस्तकला उत्पादों की माँग फैली हुई थी|
A. 50-60
B. 20-30
C. 50-60
D. 8-10
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर कार्यशील श्रमिकों का 15 से 20 प्रतिशत सेवा क्षेत्रक में कार्य कर रहा था|
A.
5%
B. 6 %
C. 16 %
D. 12 %
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारत में साक्षरता दर 16 प्रतिशत से भी कम थी।
A.
माणिक
B.
मखमल
C.
डोरी
D.
मलमल
मलमल के कपड़े बंगाल में स्थित सूती वस्त्र उद्योग द्वारा उत्पादित होते थे। यह एक उच्च कोटि का कपड़ा माना जाता है।
बटवारे के बाद, अत्यधिक सिंचित और उपजाऊ भूमि का एक बड़ा भाग पूर्वी पाकिस्तान ( यानि बांग्लादेश) के पास चला गया था जिससे बंगाल में स्थित पटसन उद्योग नष्ट हो गए ।
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारत में शिशु मृत्यु दर 218 प्रति हज़ार थी|
A.
केवल निर्यात
B.
आयात निर्यात की तुलना में अधिक है
C.
निर्यात आयात की तुलना में अधिक है
D.
आयात निर्यात के बराबर है
व्यापार अधिशेष का अर्थ है ऐसी आर्थिक स्तिथि जिसमे एक देश के निर्यात का मूल्य उसके आयात की लागत से अधिक हो।
A.
उत्पादकता का निम्न स्तर
B.
उत्पादकता का उच्च स्तर पर
C.
अच्छी सिंचाई सुविधाए
D.
उन्नत बीजों का उपयोग
अत्यधिक शोषक भू-व्यवस्था, समुचित सिंचाई सुविधाओं की कमी के कारण वर्षा पर अत्यधिक निर्भरता,प्राकृतिक आपदाओं के प्रतिकूल प्रभाव जैसे अकाल और सूखा, और परंपरागत तकनीकों के उपयोग के कारण कृषि क्षेत्रक की उत्पादकता निम्न।
औपनिवेशिक सरकार ने ब्रिटेन में उभरते आधुनिक उद्योगों के निवेश की आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारत के कच्चे माल तथा प्राथमिक उत्पादों का दोहन किया|
A.
कम वर्षा
B.
जमींदारी प्रथा
C.
औद्योगिक विकास की कमी है।
D.
विभाजन
कृषि क्षेत्रक में जमींदार अनुचित शर्तें और अधिक लगान लगाकर किसानों का शोषण करते थे| वे कृषि क्षेत्रक को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाते थे|
A.
बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए
B.
विभिन्न औपनिवेशिक हितों के लिए
C.
भारत के विकास के लिए
D.
भारत की विकास दर को बढ़ाने के लिए
गांवों से कच्चे माल ले जाने के लिए और सेना को लामबंद करने के लिए सड़कें बनाई गई| लंबी दूरी की यात्रा और कृषि के व्यावसायीकरण को सुगम बनाने के लिए रेल सुविधा प्रारंभ की गई।
देशों के बीच व्यापार सीमा शुल्कों और कोटे के माध्यम से प्रतिबंधित होता है। कोटा को मात्रात्मक प्रतिबंध या अप्रशुल्क- अवरोधक भी कहा जाता है। कोटे के अंतर्गत सरकार आयात या निर्यात की जाने वाली किसी वस्तु की मात्रा के लिए एक सीमा निर्धारित करती है। सभी निर्यातक उस सीमा के भीतर अपनी भागीदारी के लिए बोली लगाते हैं। इसी प्रकार एक आयात कोटा होता है। वास्तविक मांग आपूर्ति से अधिक हो सकती है। ये प्रतिबंध घरेलू उपभोक्ता या उत्पादक की रक्षा के लिए लगाये जाते हैं।
प्रत्यक्ष कर- प्रत्यक्ष कर व्यक्तियों की आय के साथ साथ व्यवसायिक उद्यमों के मुनाफे पर लगाये जाने वाले कर हैं। 1991 के बाद से आय पर करों में लगातार कमी हुई है क्योंकि ऐसा महसूस हुआ कि कर चोरी का एक महत्वपूर्ण कारण कर की उच्च दरें हैं। आय कर की सामान्य दरें बचतों और आय के स्वैच्छिक खुलासे को प्रोत्साहित करती हैं। निगम करों को भी कम किया गया है।
अप्रत्यक्ष कर - अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं पर लगाये जाने वाले कर हैं। उत्पाद कर, बिक्री कर, वैट अप्रत्यक्ष कर हैं। इनमें से कुछ को केन्द्र के साथ साथ राज्य प्राधिकरणों द्वारा लगाया जाता है। जितना देश भर में इन करों को एकसमान रूप से बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।
विश्व व्यापार संगठन, अपने प्राथमिक सदस्यों के रूप में 23 देशों के साथ सात वर्ष की लंबी बातचीत के बाद 1995 में अस्तित्व में आया। इसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में सभी देशों को समान अवसर देने और भेदभावपूर्ण व्यवहार का उन्मूलन करने तथा प्रशुल्क और व्यापार की अन्य बांधाओं को कम करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। यह सभी सदस्य देशों को अधिक से अधिक बाजार उपलब्ध कराने की कोशिश करता है। यह एक नियम आधारित व्यापार व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश करता है जिससे कि कोई राष्ट्र व्यापार पर एकपक्षीय प्रतिबंध नहीं लगा सके। इसका प्रमुख उद्देश्य विश्व के संसाधनों का अधिकतम उपयोग और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
अब विश्व व्यापार संगठन ने सेवाओं के व्यापार, बौद्धिक संपदा अधिकारों और व्यापार संबंधी निवेश उपायों को शामिल करके अपने क्षेत्र में वृद्धि की है।
वैश्वीकरण के सकारात्मक प्रभाव हैं-
1) बहुर्राष्ट्रीय कंपनियों ने भारतीय उद्योगों में विदेशी निवेश की बहुत अधिक राशि लगायी है।
2) आई.टी और बी.पी.ओ क्षेत्र दूसरे
देशों
में ग्राहकों
को बाह्य
प्रापण
की सेवा प्रदान
कर रहे हैं जिससे
भारत
में यह क्षेत्रक
उन्नति
कर रहा है।
3) बहुर्राष्ट्रीय कंपनियों ने भारतीय उद्योग जगत को तकनीकी रूप से उन्नत बनाने में मदद की है।
4) विदेशी कंपनियां बहुत से लोगों (विशेष रूप से कुशल अनुभवी व्यक्तियों) को रोजगार के अवसर प्रदान कर रही है।
5) विशेष आर्थिक क्षेत्र को रोजगार अवसरों के सृजन, विश्व स्तरीय अवसंरचना और निवेश सृजन करने में मदद मिली है।
6) अग्रणी भारतीय उद्योग जैसे कि टाटा, रिलायंस, बजाज आदि विदेशों में निवेश करके और कुछ प्रमुख विदेशी कंपनियों को अधिगृहीत करके वैश्विक स्तर पर उन्नति कर रहे हैं।
सरकार का काम व्यापार करना नहीं बल्कि नियंत्रण करना है। इसलिए केवल घाटे में चलने वाले उद्यमों का ही नहीं बल्कि दूसरों का भी जिन्हें निजी क्षेत्र द्वारा संचालित किया जा सकता है का निजीकरण होना चाहिए।
राज्य को उन क्षेत्रों को छोड़ देना चाहिए जिसका प्रबंधन निजी क्षेत्र कर सकता है ताकि सरकार महत्वपूर्ण सामाजिक कल्याण सेवाओं पर अपने संसाधन लगा सके जिन्हें निजी क्षेत्र उपलब्ध नहीं करा सकता।
केवल बहुत ही सामरिक महत्व के उद्योगों जैसे रक्षा उपकरण, या खतरनाक उद्योगों या रेलवे जैसे उद्योगों जिसमें विशाल निवेश होता है को सार्वजनिक क्षेत्र में रखा जाना चाहिए।
किसी निजी खरीदार को आकर्षित करने के लिए सरकार लाभ कमाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को घाटे में होने वाले उद्यमों के साथ जोड़कर विनिवेश कर सकती है।
बैंकिंग- सुधार प्रक्रिया ने निजी क्षेत्र के बैंकों की स्थापना को बढ़ाया है। बैंकों में 50% तक विदेशी निवेश की सीमा बढा दी गई थी। इन बैंकों की उपस्थिति ने न केवल कार्य में अधिक दक्षता बढ़ाया बल्कि क्रेडिट कार्ड जैसी कई नई सेवाएं भी उपभोक्ता को उपलब्ध कराई।
बीमा- एक समय बीमा क्षेत्र में विदेशी स्तर की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। इस क्षेत्र को भी खोला गया और धीरे-धीरे इस क्षेत्र को और भी खोला जा रहा है।
संचार क्षेत्र- इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने बड़े पैमाने पर भारतीय घरों में प्रवेश किया है। 90 के दशक तक भारतीय दर्शकों के पास दूरदर्शन के अलावा कोई विकल्प नहीं था। केबल टी.वी. के आगमन से है। प्रसारण सेवाओं में विदेशी निवेश के आने से भारतीय दर्शकों के पास सैकड़ों चैनलों के विकल्प आ गए हैं|
संचार- दूरसंचार सेवा प्रदाताओं में विदेसी निवेश के कारण लैंडलाइन और मोबाइल फोन के सेवा में सकरात्मक्त परिवर्तन आया है| कॉल और इंटरनेट की सेवाओं की गुणवत्ता में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है|
अधिकांश बहुराष्ट्रीय निगम और यहां तक कि छोटी कंपनियां भी अपनी सेवाओं का बाहृय प्रापण भारत से करा रही है| यहां वे इस तरह के कार्य बहुत कम लागत में प्राप्त कर सकते हैं।
भारत बाह्य प्रापण का पसंदीदा गंतव्य है क्योंकि भारत अपेक्षाकृत कम कीमत पर कुशल और अंग्रजी बोलने वाले श्रम की आपूर्ति कर सकता है। बहुत सी सेवाएं जैसे कि ध्वनि आधारित व्यवसायिक प्रक्रियाएं, अभिलेखांकन, लेखांकन, बैंक सेवाएं, संगीत की रिकॉर्डिंग, फिल्म संपादन, पुस्तक शब्दांकन, चिकित्सा संबंधी परामर्श और यहां तक कि शिक्षण कार्य का भी बाह्य प्रापण भारत करता है। भारत को समय में अंतर का लाभ भी मिलता है क्योंकि यह विकसित देशों से विपरीत गोलार्द्ध में स्थित है।
अत: हाल ही में, वे देश जहां ये कंपनियां स्थापित है उनके देशों से नौकरियां भारत में आ रही है।
नई आर्थिक नीति के आलोचकों का कहना है कि वैश्वीकरण अन्य देशों में अपने बाजार का विस्तार करने के लिए विकसित देशों की एक रणनीति है।
उनका यह मानना है कि वैश्वीकरण गरीब देशों से संबंधित लोगों के कल्याण और अभिज्ञान के साथ एक समझौता है। बाजार संचालित वैश्वीकरण ने राष्ट्रों के बीच असमानता बढ़ा दी है।
लेकिन इस मामलें में सच्चाई यह है कि आज के समय में कोई भी राष्ट्र अपने आप में नहीं रह सकता है। वैश्वीकरण को वैश्विक बाजार, उच्च प्रौद्योगिकी और विकासशील देशों को अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनने के लिए बड़े उद्योगों की वृद्धि की संभावना के रूप में देखा जाना चाहिए।
अत: इस निति के दोनों ही, सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं। देश की सरकार को देखना होगा कि वह अपने हितों के साथ समझौता किए बिना वैश्वीकरण को अपनाए।
नई आर्थिक नीति में उदारीकरण की दिशा में किए गये प्रमुख उपाय हैं-
1) लाइसेंस की समाप्ति- 1991 की औद्योगिक नीति ने लाइसेंस नीति को बहुत उदार बना दिया है। कुछ उद्योगों को छोड़कर अधिकांश उद्योगों के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है।
2) एकाधिकारों पर नियंत्रण- अविनियमन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए, एकाधिकार के कार्य पर प्रतिबंधों को कम किया गया है। नये उद्योगों के विस्तार और स्थापना के लिए किसी सरकारी स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।
3) उदार औद्योगिक स्थापन नीति- एक लाख से अधिक की आबादी वाले शहरों के अलावा अन्य सभी स्थानों पर स्थित होने के लिए उद्योगों को स्वतंत्रता दी गई है।
4) प्रतिबंधों को हटाना- विलय, अधिग्रहण, विभाजन, आदि पर लगे सभी प्रतिबंध हटाये गये है।
5) पूंजी बाजार- एक कंपनी सरकार से अनुमति लिये बिना ही नये शेयर और डिबेचर जारी कर सकती है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) को पूंजी बाजार के कामकाज को विनियमित करने के लिए स्थापित किया गया है।
6) विदेशी मुद्रा बाजार- लचीली विनिमय दर को शुरू किया गया था जिसके अंतर्गत विनिमय दर बाजार शक्तियों द्वारा निर्धारित की जाती है। रूपये को विदेशी मुद्रा के संबंध में पूरी तरह से परिवर्तनीय बनाया गया है।
7) अवसंरचना का विकास- निजी क्षेत्र को प्रवेश और अवसंरचना विकास के लिए अनुमति प्रदान की गई है।
सामाजिक न्याय और कल्याण के संदर्भ से देखने पर यह कहा जाता है कि 90 के दशक में भारतीय समाज में असमानताओं के कारण जो संकट आया था और उससे आगे आने वाली भयंकर असमानताओं के एक उपचार के रूप में आर्थिक सुधार की नीतियां शुरू की गयी थी।
1. इससे केवल उच्च आय वर्गों के उपभोग की गुणवत्ता और आय में वृद्धि हुई। इसने आराम और विलासिता की वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहित किया। आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में कमी हुयी और दिखावे के प्रभाव से विलासिता वस्तुओं की मांग गुणोत्तर हुयी।
2. रोजगार केवल कुछ क्षेत्रों जैसे आईटी, वित्त, मनोरंजन यात्रा और आतिथि सत्कार, व्यापार, रियल स्टेट आदि में बढ़ा। लाखों लोगों को आजीविका प्रदान करने वाले कृषि और उद्योग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रोजगार अपेक्षाकृत कम बढ़ा।
3. जीवन स्तरों में असमानताएं इतनी अधिक बढ गयी कि एक तरफ तो हम करोडों कीमत की कारें आयात कर रहे हैं जबकि दूसरी तरह कुछ लोग अभी भी पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं तक नहीं पहुंचे हैं।
4. आंध्र और विदर्भ में किसानों द्वारा आत्महत्याएं कुछ हद तक इन नीतियों की विफलता के प्रमाण है। कृषि उत्पादों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि उत्पादों के आयात पर प्रशुल्क और अप्रशुल्क प्रतिबंधों के हटाए जाने से छोटे किसान अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में वृद्धि से नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए।
उदारीकरण से अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जिसके अंतर्गत नियंत्रणों एवं प्रतिबंधों में ढील देकर उदार नीतियों का पालन किया जाता है।
भारत में उदारीकरण से प्राप्त होने वाले लाभ-
(1) आर्थिक संवृद्धि- वर्ष 1990-1991 से भारतीय अर्थव्यवस्था में गतिशीलता का नितान्त अभाव था। लेकिन उदारीकरण के बाद व्यापार से अनेक प्रतिबंधों को हटाने से भारतीय अर्थव्यवस्था एक सक्रिय अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गयी। उदारीकरण के कारण सकल राष्ट्रीय उत्पाद में 6 से 8 प्रतिशत की प्रभावपूर्ण वृद्धि हुई।
(2) राजकोषीय घाटे में सुधार- उदारीकरण के परिणामस्वरूप केन्द्र सरकार का राजकोषीय घाटा निरंतर कम होता गया। यह सकल घरेलू उत्पाद के 5 प्रतिशत के आस - पास बना रहा है। दूसरे शब्दों में उदारीकरण के बाद सरकार के राजस्व में निरंतर वृद्धि हुई है।
(3) कीमतों पर नियंत्रण- उदारीकरण के आर्थिक सुधारों के परिणामस्वरूप मुद्रा की आपूर्ति में कमी तथा वस्तुओं एवं सेवाओं की मात्रा में वृद्धि से कीमतों में निरंतर कमी आयी है। वर्तमान में मुद्रा स्फीति की दर स्थिर तथा लगभग 6 प्रतिशत बनी हुई है।
(4) विदेशी निवेश में वृद्धि- अर्थव्यवस्था में औद्योगिक उत्पादों और विदेशी निवेश तथा प्रौद्योगिकी की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की क्षमता को प्रोत्साहित करने के लिए व्यापार और निवेश व्यवस्थाओं का उदारीकरण प्रारंभ किया गया। इससे स्थानीय उद्योगों की कार्यकुशलता में भी सुधार हुआ। सुधारों के परिणामस्वरूप देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मात्रा में अत्यधिक वृद्धि हुई। देश में उत्पादन एवं प्रौद्योगिकी का विकास हुआ।
(5) विदेशी विनिमय कोषों में वृद्धि एवं सुधार- वर्ष 1990-91 में भारत के विदेशी विनियम कोषों में अत्यधिक कमी हो गयी थीं तथा देश का सोना गिरवी रखना पड़ा। उदारीकरण के आर्थिक सुधारों के परिणामस्वरूप देश के विदेशी विनिमय कोष अप्रत्याशित रूप से बढ़ गये। अब तो बाजार ही विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति के आधार पर विनिमय दरों को निर्धारित कर रहा है। पहले मूल्य का निर्धारण सरकारी नियंत्रण में था।
(6) उपभोक्ता की प्रभुसत्ता- उदारीकरण के फलस्वरूप प्रतियोगिता बढ़ने से उपभोक्ताओं को श्रेष्ठ वस्तुएं नीची कीमतों पर उपलब्ध होने लगी हैं। उत्पादक उपभोक्ताओं की पसंद को ध्यान में रखकर वस्तुओं में निरंतर सुधार कर रहे हैं।
A.
अमर्त्य
सेन
B. दादा भाई नैरोजी
C. मार्शल
D. एडम स्मिथ
निर्धन लोगों की पहचान करने के लिए निर्धारित की गयी रेखा की खामियों के कारण विद्वानों ने वैकल्पिक विधियों का प्रयोग करने के प्रयास किए हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं: · सेन-सूचकांक: नॉबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्मत्य सेन द्वारा विकसित · निर्धनता सूचकांक · वर्गित निर्धनता सूचकांक
1979 में “प्रभावी उपभोग माँग और न्यूनतम आवश्यकता अनुमानन कार्य-बल”का गठन निर्धनता रेखा निर्धारित करने के लिए हुआ।
A.
स्वयं-सहायता समूह
B.
बचत समूह
C.
निर्धन समूह
D.
वित्त समूह
लोगों को छोटे समूहों का गठन करने, पैसा बचाने तथा आपस में उधार देने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। ये समूह स्वयं -सहायता समूह के रूप में जाने जाते हैं। इन समूहों को सरकार की ओर से वित्तीय सहायता मिलती है और ये आपस में ही तय करते हैं कि किसे ऋण प्रदान किया जाए ।
संसद द्वारा 2005 अगस्त में नरेगा पारित किया गया था, जिसे अब मनरेगा के नाम से भी जाना जाता है |
मजदूरी पर आधारित रोजगार योजना में शामिल हैं: • काम के बदले अनाज का राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनएफडब्ल्यूपी)। • संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (एसजीआरवाई)। • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा)।
A.
स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना
B.
प्रधानमंत्री रोजगार योजना
C.
मनरेगा
D.
ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम
स्व-रोजगार कार्यक्रम में निम्न शामिल हैं: • ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम (REGP) • प्रधानमंत्री रोजगार योजना (PMRY) • स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना (SJSRY)
A.
न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम
B.
जनसंख्या में कमी
C.
लक्षित निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम
D.
संवृद्धि आधारित रण-नीति
ग्रामीण निर्धन में— भूमिहीन किसान, दिहाड़ी, अकुशल श्रमिक, आदि शामिल हैं| इनमे से यदि किसी के पास भूमि है तो वह भी सूखी और बंजर है। भूख और भुखमरी उनकी मुख्य समस्याएँ हैं।
A.
1
अमेरिकी
डॉलर
B. 1.25 अमेरिकी डॉलर
C. 1.23 अमेरिकी डॉलर
D. 2.25 अमेरिकी डॉलर
संयुक्त राष्ट्रसंघ के अनुसार वह देश जहाँ प्रति दिन, प्रति व्यक्ति आय 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम है उनको निर्धन माना जाता है।
60 के मध्य के दशक में भारत में शुरू हुई हरित क्रांति खाद्य अनाजों के उत्पादन में भारी वृद्धि को दर्शाती है। यह सिंचाई सुविधाओं के साथ उच्च उपज किस्म (एचवाईवी) बीजों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों सहित आधुनिक कृषि तकनीकों के उपयोग पर आधारित थी।
इसने मुख्य रूप से गेहूं और चावल खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में भारत की मदद की। लेकिन इसने पूरी तरह से क्षेत्रीय असमानताओं को उत्पन्न किया क्योंकि इसमें उच्च निवेश की आवश्यकता थी।
प्रथम चरण (1960 के मध्य से 1970 के मध्य तक) में, केवल उचित सिंचाई सुविधाओं से संपन्न राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु सबसे अधिक लाभांवित हुए।
द्वितीय चरण (1970 के मध्य से 1980 के मध्य तक) में, क्रांति का राज्यों तथा अन्य फसलों के लिए भी प्रसार हो गया था। 1980 तक, कुल फसली क्षेत्र का गेहूं के लिए लगभग 75 प्रतिशत और चावल के लिए 45 प्रतिशत तक उच्च उपज किस्मों के साथ बोया गया था।
A.
विदेशी मुद्रा भंडार
B.
सस्ता कुशल श्रम
C.
नवीनतम प्रौद्योगिकी
D.
अच्छी आधारभूत संरचना
भारत बाह्य प्रापण का पसंदीदा गंतव्य है क्योंकि भारत अपेक्षाकृत कम कीमत पर कुशल लोगों की आपूर्ति कर सकता है।
NEP के अंतर्गत बेकिंग क्षेत्रक में विदेशी निवेश को आने की अनुमति देने से बैंकिंग सेवाओं में तीव्रता से वृद्धि हुई|
A.
वित्तीय संकट
B.
राजकोषीय व्यय
C.
मौद्रिक स्वतंत्रता
D.
सेवाओं को बाह्य प्रापण
भारत को आर्थिक और वित्तीय संकट से बाहर निकालने के लिए नयी आर्थिक नीति अपनाई गई थी|
सार्वजनिक क्षेत्रक के उद्यमों में सरकार की इक्विटी धारिता को निजी निवेशकों को बेचा जाना विनिवेश कहलाता है। सरकार दो प्रकार के विनिवेश करती है: शेयरों का अल्पांश विक्रय और शेयरों का युक्तियुक्त विक्रय|
A.
इंडिया लिमिटेड जहाजरानी निगम
B.
ग्रामीण विद्युतीकरण निगम लिमिटेड
C.
राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड
D.
कोल इंडिया लिमिटेड
वर्ष 2010-2011 में सरकार ने महारत्न योजना का आरंभ किया, जिसके अंतर्गत प्रतिभाशाली सार्वजानिक उद्यमों को अपने कार्य को फैलाने के लिए घरेलू एवं विदेशी बाज़ार में कार्य करने की छूटदी गई। वर्तमान में, 7 महारत्न हैं।
A.
तृतीय क्षेत्रक के उद्योग
B.
सेवा क्षेत्रक
C.
कृषि क्षेत्रक
D.
सार्वजनिक क्षेत्रक
कृषि उत्पादों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि उत्पादों के आयात पर प्रशुल्क और अप्रशुल्क प्रतिबंधों के हटाए जाने से छोटे किसान अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में वृद्धि से भारतीय नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए।
A.
नागर विमानन
B.
पैट्रोलियम उद्योग
C.
रक्षा क्षेत्र
D.
कोयला उद्योग
खतरनाक और पर्यावरण या देश की सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील उद्योगों में निजी कंपनियों को आने की इजाजत नहीं प्रदान की गई थी।
A.
56
B. 46
C. 78
D. 73
वे 73 सरकारी कंपनियां जो लगातार लाभ कमा रही हैं उन्हें लघुरात्न उद्यम होने का दर्जा दिया गया है।
A.
भारत गैस अथॉरिटी लिमिटेड
B.
भारत की हरित प्राधिकरण लिमिटेड
C.
भारत के वैश्विक अधिकार लिमिटेड
D.
गैस अथॉरिटी इंडोनेशिया लिमिटेड
GAIL से अभिप्राय है भारत गैस अथॉरिटी लिमिटेड| GAIL एक महारत्न सार्वजनिक कंपनी है|
A.
व्यापार नीति
B.
मौद्रिक नीति
C.
राजकोषीय नीति
D.
सार्वजनिक नीति
ये नीतियाँ बताती है कि सरकार राजकोष कोष किस प्रकार समाज कल्याण के लिए प्रयोग कर रही है|
आर्थिक सुधार के बाद विदेशी निवेश के कारण विदेशी विनिमय भंडार संभल गया|
भारत इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड एक सार्वजनिक उद्यम है जिसे सरकार ने महारत्न का दर्जा दिया हुआ है|
A.
विश्व व्यापार संगठन
B.
विश्व पर्यटन संगठन
C.
विश्व यात्रा संगठन
D.
दुनिया आतंकवादी संगठन
WTO एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है| इसकी स्थापना 1 जनवरी 1995 में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाने के लिए की गई थी।
संरचनात्मक सुधार के उपाय, दीर्घकालिक उपाय होते हैं जो अर्थव्यवस्था की क्षमता को बढ़ाते हैं तथा कठोरता को दूर करके अन्तर्रष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ाते हैं।
A.
निर्यात में वृद्धि
B.
विदेशी रिजर्व में वृद्धि
C.
स्थानीय उत्पादकों की तबाही
D.
रोजगार में वृद्धि
चूंकि स्थानीय उत्पादक सस्ते आयात के साथ प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ थे, इसलिए वैश्वीकरण के कारण वे काफी संकट में आ गए।
निजीकरण सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में दक्षता और लाभप्रदता को लागू करता है।
A.
भारतीय हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड
B.
भारत हिंदुस्तानी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड
C.
भारत हैवी इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड
D.
भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड
BHEL से अभिप्राय है भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड| इसे महारत्न की उपाधी नई आर्थिक नीती के तहत दी गई|
क्योंकि सार्वजनिक कंपनियाँ कुशलता पूर्वक कार्य करने में असमर्थ थी, इसलिए नई आर्थिक निति के अंतर्गत सरकार ने निजीकरण पर जोर दिया|
वैश्वीकरण का अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण।
भारत में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनों के नियंत्रण वाली अर्थात् मिश्रित अर्थव्यवस्था वाली प्रणाली का अनुपालन किया जा रहा है।
सांख्यिकीविद् प्रशांत चंद्र महालनोबिस ने कोलकाता में भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना की।
एक समाजवादी देश की सरकार वस्तुओं के उत्पादन और वितरण के संबंध में सभी निर्णय लेती है।
प्रधानमंत्री योजना अयोग के मुखिया के रूप में इसके अध्यक्ष होते है।
भारत में योजना आयोग को 1950 में स्थापित किया गया था।
पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्य इस प्रकारथे:
मिश्रित अर्थव्यवस्था के अंतर्गत:
1951 के बाद भारत की व्यवसायिक संरचना में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया।
1951 में लगभग 72 प्रतिशत लोग कृषि क्षेत्र में काम करते थे। सन् 2000 में यह 60 प्रतिशत हो गया।
विनिर्माण क्षेत्र में यह 11 प्रतिशत से बढकर 17 प्रतिशत हो गया। और सेवा क्षेत्र में यह 17 प्रतिशत से बढकर 23प्रतिशत हो गया।
आत्मनिर्भरता:
घरेलूस्तरपरउत्पादितवस्तुओंपरनिर्भरताबढ़ानेऔरउनवस्तुओंकेआयातकोरोकने, जिन्हेंभारतमेंहीउत्पादितकियाजासकताहैकोदर्शाताहै।
आत्मनिर्भरता की आवश्यकता निम्न कारणों के लिए होती हैं :
विकास प्रक्रिया में (एसएसआई) का महत्व निम्न था :
आईपीआर1956 केनकारात्मक प्रभाव निम्न थे:
भारतमेंसहायिकीकेनकारात्मकपहलुनिम्नलिखितरहेहैं:
व्यापार नीति के संदर्भ में पंचवर्षीय योजनाओं(1951-1990) के लक्ष्यों को निम्न प्रकार प्राप्त किया गया है:
आधुनिकीकरण को अपनानेके पीछे मुख्य उद्देश्यहै:
नई प्रौद्योगिकियों को अपनानेके पीछे मुख्य उद्देश्यहै:
सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन के पीछे मुख्य उद्देश्यहै:
एक राष्ट्र अपने संसाधनों का उपयोग करके या अन्य विकसित राष्ट्रों से आयतित संसाधनों तथा प्रौद्योगिकीयों का उपयोग करके आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण को प्रोत्साहित कर सकता है। भारत की पहली सात पंचवर्षीय योजनाएं में आत्म-निर्भरता को महत्व दिया गया, जिसका अर्थ है उन वस्तुओं के आयात से बचना, जिन्हें स्वयं भारत में उत्पादित किया जा सकता है। इससे विकास की प्रक्रिया थोडी धीमी हो सकती है। लेकिन इसे जरूरी माना जाता है। इसके कई कारण है।
1. विशेष रूप से भोजन के लिए अन्य देशों पर निर्भरता को कम करना।
2. खाद्य और तकनीकी के लिए अन्य देशों पर निर्भरता के कारण फिर से विदेशी शक्तियों का प्रभुत्व हो सकता है।
हाँ प्रारंभ में आधुनिक तकनीक को शुरू करने के लक्ष्य का रोजगार के बढते लक्ष्य के साथ में संघर्ष हो सकता है क्योंकि प्रौद्योगिकी श्रम की आवश्यकता को कम कर देती है। उदाहरण के लिए कम्प्यूटर का उपयोग एक बैंक में कर्मचारियों की संख्या कम कर सकता है या टैक्ट्रर का उपयोग कृषि श्रमिक की आवश्यकता को कम कर सकता है।लेकिन कुछ समय पश्चात् हमेशा और अधिक एवं नई प्रकार की नौकरियां जैसे कम्प्यूटर ऑपरेटर, सॉफ्टवेयरडवलेपर्स, कम्प्यूटर शिक्षक आदि की मांगउन्नत एवं आधुनिक तकनीकी के परिणामस्वरूप होगी या टैक्ट्रर की मांग के परिणामस्वरूप टैक्ट्ररों और अन्य मशीनों के उपकरणों का निर्माण होगा।
सकल घरेलू उत्पाद एक वर्ष के दौरान देश में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का बाजार मूल्य है। सकल घरेलू उत्पाद एक केक की तरह है: विकास केक के आकार में बढता है। यदि केक बडा है, तो अधिक लोग इसका आनंद ले सकते हैं। यदि भारत के लोगों को जीवन की समृद्धि और विविधता का आनंद लेना है, तो वस्तुओं और सेवाओं का अधिक उत्पादन करना जरूरी है। लेकिन सकल घरेलू उत्पादन विकास का अकेला मापदंड नहीं होना चाहिए। यदि एक देश की जनसंख्या बढती है तो वास्तविक प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होनी चाहिए। प्रतिव्यक्ति आय में केवल तब वृद्धि होगी जब
RY> RP
जहां,
RY = राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर है
RP = जनसंख्या की वृद्धि दर है
कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत में किसान बहुत गरीब है इसलिए सहायिकीजारी रहनी चाहिए। वे महंगी आगतों को नहीं खरीद सकते हैं। सहायिकीको खत्म करने से अमीर और गरीब किसानों के बीच असमानता बढ जायेगी तथा समानता के लक्ष्य का उल्लंखन होगा। खेती अब तक एक जोखिम भरी समस्या बनी हुयी है। बहुत हद तक यह मानसून पर निर्भर है यहां तक कि दुनिया के अमीर देशों में कृषि को सहायिकीदी जाती है।
यदि भारतीय किसानों को सहायिकीनहीं दी जाती है तो सस्ते आयतित उत्पादों से उनका सफाया हो जायेगा।
इसी प्रकार लघु और कुटीर उद्योग की कम कर दरों और बैंक ऋणों से मदद की जातीहै अन्यथा वे बडे उद्योगों से प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पायेंगे।
इसके अलावा हमें विदेशी प्रतिस्पर्धा से अपने उत्पादकों की रक्षा करनी चाहिए यहां तक कि अमीर राष्ट्र भी ऐसा करते है।
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आईपीआर 1956 की मुख्य कमियां निम्न थी:
1. बहुत अधिक सरकारी नियंत्रण: इससे प्रोत्साहन खत्म हो गया। 2. आत्मनिर्भरता के नाम पर बहुत ज्यादा सुरक्षा: विदेशी प्रतिस्पर्धा के विरूद्ध संरक्षण के परिणामस्वरूप गुणवत्ता में सुधार करने के लिए प्रोत्साहन नहीं रहा। उत्पादक जान गये कि उनके पास सीमित बाजार है जहां वे उच्च कीमतों पर निम्न गुणवत्ता की वस्तुएं बेच सकते हैं। 3. अपनी आयात प्रतिस्थापन नीतियों के परिणामस्वरूप एक मजबूत निर्यात क्षेत्र विकसित करने में विफल हुए। 4. निम्न के बीच कोई अंतर नहीं बनाया गया: (क) अकेला सार्वजनिक क्षेत्र क्या कर सकता है उदाहरण के लिए, यहां तक कि सार्वजनिक क्षेत्र अब केवल राष्ट्रीय सुरक्षा और नि: शुल्कचिकित्सा उपचारकी पूर्तिकर सकता है। |
ख) निजी क्षेत्र भी क्या कर सकता है। हालांकि निजी क्षेत्र होटलों का संचालन करता है, सार्वजनिक क्षेत्र भी होटलों को चलाता है।
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की निम्न विशेषताएँ हैं:
निजी संपत्ति:
लाभ उद्देश्य:
अहस्तक्षेप-नीति:
उपभोक्ताओं की संप्रभुता:
निर्यात शुल्क हटाने से निर्यात अन्य देशों में सस्ते दामों पर माल निर्यात कर सकते हैं।
यह सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का स्वामित्व सरकार से निजी क्षेत्र को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया है।
भारत में नई आर्थिक नीति (एनईपी) की घोषणा 1991 में की गई थी।
जब सरकार का व्यय उसके राजस्व से अधिक होता है तब राजस्व घाटा उत्पन्न होता है।
आय कर और संपत्ति कर प्रत्यक्ष कर हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक (हमारे देश का केन्द्रीय बैंक) बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों को नियमित और नियंत्रित करता है।
मिश्रित अर्थव्यवस्था एक ऐसी आर्थिक प्रणाली है जिसे राज्य और निजी दोनों क्षेत्र संचालित करते है जिसमें बाजार अर्थव्यवस्था और नियोजित अर्थव्यवस्था दोनों के लक्षण दिखते हैं।
यह उद्योगों और अन्य गतिविधियों पर से सरकारी नियंत्रणों को कम करने या दूर करने की नीति है।
किसी देश की प्रति व्यक्ति आय से अभिप्राय एक निश्चित समय में वहां के निवासियों द्वारा प्राप्त औसत आय से होता है।
बहुपक्षीय व्यापार एक समय में कई देशों के बीच व्यापार को दर्शाता है।
द्विपक्षीय व्यापार दो देशों के बीच व्यापार को दर्शाता है।
व्यापार और सीमा शुल्क महासंधी (गैट) के परवर्ती के रूप में 1995 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का गठन किया गया था।
अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निमाण और विकास बैंक (आईबीआरडी) को आमतौर पर विश्व बैंक के रूप में जाना जाता है।
बाह्य प्रापण का अर्थ है किसी अनुबंध के अनुसार बाह्य स्रोतों से वस्तुओं और सेवाओं को व्यवसायिक रूप से प्राप्त करना।
यह देश की अर्थव्यवस्था को व्यापार, पूंजी प्रवाह, और प्रौद्योगिकी के माध्यम से विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ एकीकृत करने की प्रक्रिया है।
आर्थिक संकट के दौरान भारत ने अंतर्राष्ट्रीय विपणन महासंघ (IMF) से ऋण लिया था|
विनिवेश की विभिन्न विधि इस प्रकार हैं-
1) घरेलू सार्वजनिक निर्गम के माध्यम से खुदरा निवेशकों के लिए इक्विटी जारी करना।
2) वैश्विक निक्षेप के माध्यम से विदेशी बाजार से धन सृजित करना।
3) सरकार अपने वित्तीय संस्थाओं इक्विटी शेयरों को भी बेच देती है।
4) सरकार सामरिक महत्व के खरीदारों को बाजार मूल्य पर अपने हिस्से के बहुत बड़े भाग को बेचती है और प्रबंधन पर नियंत्रण देती है।
वैश्वीकरण के माध्यम हैं-
1) व्यापार में उदारीकरण- देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के मुक्त प्रवाह की अनुमति के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से बाधाओं को हटाया जाना।
2) निवेश में उदारीकरण- प्रत्यक्ष विदेश निवेश के लिए खुली अर्थव्यवस्था लाना।
3) प्रौद्योगिकी का प्रवाह- आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए विकसित देशों से प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण करना।
सार्वजनिक उद्यमों के संदर्भ में, विनिवेश नीति बाजार में सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में सरकार के शेयर की बिक्री को दर्शाती है। इस नीति का उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के स्वामित्व में आम जनता और कर्मचारियों की भागीदारी को प्रोत्साहित करना, आधुनिकीकरण के लिए धन उपलब्ध कराना तथा सार्वजनिक ऋण के बोझ को कम करने के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना था।
इसकी तीन मुख्य विशेषताएं थीं-
1. उदारीकरण- उदारीकरण का उद्देश्य उद्योगों को अतिरिक्त लाइसेंस प्रणाली और प्रतिबंधों से स्वतंत्र करना और उन्हें अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना था।
2. निजीकरण- सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को कम करना और उन क्षेत्रों में काम करने के लिए निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करना था जो पहले सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित थे।
3. वैश्वीकरण- इसका अर्थ विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोलना और विदेश में निवेश करने के लिए भारतीय निवेशकों को अनुमति प्रदान करना था। इसका मतलब है कि आयात और निर्यात का कम से कम प्रतिबंधित प्रवाह हो।
औपनिवेशिक सरकार ने भारत की परंपरागत उद्योगों का वि-औद्योगीकरण करके भारत को ब्रिटेन के औद्योगिक उत्पादों के लिए एक बाज़ार बना दिया।
कृषि के व्यवसायीकरण के अंतर्गत नकदी फसलें उगाई जाती हैं|
पूँजीगत अद्योगों के कारण भारत में औद्योगिकीकरण पिछड़ा रहा|
ज़मींदारी प्रथा
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर कार्यशील श्रमिकों का 15 से 20 प्रतिशत सेवा क्षेत्रक में कार्य कर रहा था|
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर कार्यशील श्रमिकों का 10 प्रतिशत औद्योगिक क्षेत्रक में कार्य कर रहा था|