विदेशी विनिमय दर वह दर है जिसमें किसी भी देश की मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा में बदला जा सकता है।
लोग विदेशी मुद्रा को तीन कारणों से अपने पास रखना चाहते हैं:
1. आयातित वस्तुओं और सेवाओं का भुगतान करने के लिए।
2. उपहार, दान आदि का अंतरण भुगतान करने के लिए|
घरेलू नागरिकों द्वारा निवेश करने के लिए और विदेश में ऋण देने के लिए।
हम निर्यात की गणना इस प्रकार कर सकते हैं:
व्यापार संतुलन: निर्यात का मूल्य – आयात का मूल्य
–5,000 = निर्यात का मूल्य – 9,000
निर्यात का मूल्य = 9,000 – 5,000
= 4,000 करोड़
दृश्य मदें: ये आयात और निर्यात की वे मदें हैं जो प्रकृति में भौतिक रूप से विद्यमान होती हैं| इनमें वस्तुओं का आयात और निर्यात सम्मिलित हैं|
अदृश्य मद: ये आयात और निर्यात की वे मदें हैं जो प्रकृति में भौतिक रूप से विद्यमान नहीं होती हैं| इनमें परिवहन, यात्रा सेवाएं, दान, उपहार आदि सेवाएं सम्मिलित हैं|
भारत तेल का बड़ा आयातक है|तेल कीमतों में गिरावट से विदेशी मुद्रा के रूप में भारत की लागत घट जाएगी| इससे भारत आयात की मात्र कम किए बिना विदेशी विनिमय की बचत करने में सक्षम हो सकेगा| अत: इससे भारत के चालू खाते में सुधार होगा|
अदृश्य मदों में निम्नलिखित सम्मिलित होता है:
(i) बैंकिंग, यात्रा जैसी सेवाओं के लिए प्राप्तियां और भुगतान
(ii) विदेशी निवेश पर आय प्राप्तियां और भुगतान
(iii) उपहार, अनुदान आदि की प्राप्तियां और भुगतान
(iv) विदेशी देशों में सरकार के व्यय जैसे दूतावासों पर व्यय, आदि|
जब भारतीय नागरिक विदेशी उत्पाद खरीदतें हैं, तब आयात पर किया गया व्यय देश में उत्पादित वस्तुओं की समस्त माँग को कम करता है|
उसी प्रकार, विदेशों को घरेलू उत्पादित वस्तुओं के निर्यात से घरेलू समस्त माँग में वृद्धि होती है|
दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापारिक सम्बन्ध हमें तीन तरीकों से लाभ पहुंचाते हैं :
उपभोक्ताओं के लिए विदेशी एवं घरेलू वस्तुओं के बीच चयन करने का अवसर उत्त्पन्न होता है। इसे उत्पाद बाज़ार में सहलग्नता कहते हैं|
निवेशकों को विदेशी एवं घरेलू परिसंपत्तियों के बीच चयन करने का अवसर प्राप्त होता है। इसे वित्तीय बाज़ार सहलग्नता कहते हैं|
फर्मों को उत्पादन के स्थान की एवं श्रमिकों को काम करने के स्थान की स्वतंत्रता प्राप्त होती है| इसे कारक बाज़ार सहलग्नता कहते हैं|
(i) चालू खाते के घटक हैं:
a) वस्तुओं का आयात और निर्यात
b) सेवाओं का निर्यात और आयात
c) एक पक्षीय हस्तान्तरण
(ii) एक पूँजी खाते के घटकों के विभिन्न प्रकार हैं:
(a) निजी लेनदेन
(b) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से विदेशी मुद्रा की खरीद और दोबारा खरीद
(c) विदेशी निवेश
अदायगी संतुलन में असंतुलन के कारण हैं:
(I) बड़े पैमाने पर विकास व्यय के कारण बड़े आयात करने से अदायगी संतुलन में घाटे की स्तिथि उत्पन्न होती है| ऐसा आयात शुल्कों में भरी कमी लाने से भी होता है|
(II) घरेलू बाज़ार में मुद्रा-स्फीति की ऊँची दर के कारण बढ़ी मात्रा में आवश्यक वस्तुओं का आयात करना पड़ता है| इसके कारण भी अदायगी संतुलन में घाटा उत्पन्न होता है|
(III) आयात प्रतिस्तापनों के विकास के कारण आयातों में कमी हो जाती है और इससे अदायगी संतुलन में असंतुलन होता है|
(IV) तकनिकी या प्रबंधकीय परिवर्तनों के कारण लागत ढाँचे में अनुकूल या प्रतिकूल परिवर्तन हो सकते हैं| इससे निर्यातों को बढ़ावा या घटाव का सामना करना पड़ता है| इससे भी अदायगी संतुलन में असंतुलन आता है|
(V) राजनीतिक अस्थिरता के कारण विदेशों से आने वाले प्रत्यक्ष निवेश तथा पोर्टफोलियो निवेश में कमी आती है| इसके कारण अदायगी संतुलन के पूँजी खाते में घाटा होता है|
(VI) स्वाद, फैशन और वरीयताओं में परिवर्तन के कारण विदेशी और देशीय मांग में बदलाव आते है जिसके कारण अदायगी संतुलन में असंतुलन उत्तपन होता है|
लेन-देन के संतुलन को निम्नलिखित चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:
(I) दृश्य लेनदेन
(ii) अदृश्य लेनदेन
(Iii) एक पक्षीय हस्तान्तरण
(Iv) पूंजी हस्तांतरण
पूंजी हस्तांतरण : यह पूंजी प्राप्तियों और पूंजीगत भुगतान से संबंधित है। इनमें परिसंपत्तियों की बिक्री, उधारी, पूंजी भुगतान आदि सम्मिलित है। यह देशों के बीच पूंजी की छोटी और लंबी अवधि की गतिविधियों से संबंधित होते हैं।
|
स्थिर विनिमय दर |
नम्य विनिमय दर |
|
1. स्थिर विनिमय दर प्रणाली विदेशी मुद्रा की मांग और आपूर्ति में बदलाव से अप्रभावित रहती है। 2. यह विनिमय दर सरकार द्वारा नियत राखी जाती है। 3. केन्द्रीय बैंक स्थिर विनिमय दर को बनाए रखने के लिए मुद्राओं को नियत मूल्य पर बेचते और खरीदता है। |
1. नम्य विनिमय दर प्रणाली विदेशी मुद्रा की मांग और आपूर्ति से निर्धारित होती है। 2. यह विनिमय दर हर समय बदलती रहती है। 3. यह केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र रूप से निर्धारित की जाती है। |
तीन विनिमय दर प्रणाली है जिनका पालन विदेशी विनिमय बाज़ार में किया जाता है:
(I) स्थिर विनिमय दर प्रणाली
(II) नम्य विनिमय दर प्रणाली
(III) प्रबंधित तिरती
प्रबंधित तिरती : प्रबंधित तिरती, नम्य विनिमय प्रणाली तथा स्थिर विनिमय प्रणाली का मिश्रण है| इस प्रणाली में केंद्रीय बैंक विनिमय दर को उदार बनाने के लिए विदेशी मुद्रा के क्रय-विक्रय करके हस्तक्षेप करता है|
स्थिर विनिमय दर प्रणाली के अंतर्गत देश की सरकार या मौद्रिक प्राधिकरण मुद्रा की विनिमय दर को किसी स्तर पर “अधिकीलित” व स्थिर घोषित कर देती है|
स्थिर विनिमय दर प्रणाली के गुण:
(i) यह भविष्य की विनियम दर के बारे में निश्चिंतता प्रदान करती है और इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहित करने में सहायता करती है।
(ii) इस प्रणाली में अफवाह संबंधी गतिविधियों का नियंत्रण मौद्रिक अधिकारियों के द्वारा होता हैl
(iii)यह अंतर्राष्ट्रीय निवेशों को प्रोत्साहित करती है। यह लम्बी अवधि के पूँजी निवेश को प्रोत्साहित करती है।
स्थिर विनिमय दर प्रणाली के दोष:
(i) इस प्रणाली में देश में भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखने की आवश्यकता होती है।
(ii) अंतर्राष्ट्रीय वस्तु मूल्यों में उतार चढ़ाव से अक्सर देश विनिमय दरों में बदलाव के लिए बाध्य हो जाते हैं। इस प्रकार स्थिर विनिमय दर बनाए रखना कठिन होता है और यह विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दवाब डालता है।
(iii) यह विश्व के विभिन्न हिस्सों में पूँजी के आवागमन को प्रतिबंधित कर देता है। तदनुसार, अंतर्राष्ट्रीय वृद्धि की प्रक्रिया में समस्या आती है।
लेखांकन भाव में, किसी भी देश का भुगतान शेष हमेशा संतुलित में होता है। इस प्रणाली में, प्राप्य और भुगतान हमेशा एक समान रहते हैं क्योंकि अदायगी संतुलन को चालू खाते और पूंजी खाते के हस्तांतरण के माध्यम पुनर्स्थापित किया जाता है। इसलिए, इस दृष्टिकोण से भुगतान का संतुलन हमेशा संतुलित करता है।
व्यावहारिक रूप से यह रूप से सत्य नहीं है। व्यावहारिक रूप से अदायगी संतुलन असंतुलित हो सकता है। चालू खातों के ऋणात्मक शेष को पूँजी खाते के धनात्मक शेष द्वारा पूरा किया जा सकता है| परन्तु क्योंकि इस प्रकार की संतुलन प्राप्ति पूँजी खाते में विदेशों से ऋण ले कर की जाती है इसलिए ऐसा करना आर्थिक तौर पर एक अच्छी स्तिथि नहीं हैइससे देश की विदेशों के साथ उधार पैदा होते हैं। अधिक उधार घरेलू तथा वैश्विक दोनों बाज़ारों में अर्थव्यवस्था के बुरे निष्पादन को प्रकट करता है|
इस प्रकार, सभी परिस्थितियों में अदायगी संतुलन संतोषजनक हो ऐसा हमेशा जरुरी नहीं।
सरकार के
बैंकर के रूप
में केन्द्रीय
बैंक निम्नलिखित
कार्य करता
है:
1) यह सरकार की
ओर से जमाएं
प्राप्त
करता है और
सरकारी खाते
में जमा
चैकों और
ड्राफ्टों
को संग्रहित
करता है।
2) यह सरकार की
ओर से भुगतान
करता है।
3) यह सरकार को
अल्पकालीन
ऋण उपलब्ध करता
है।
4) यह सरकार की
ओर से विदेशी
मुद्राओं को
खरीदता और
बेचता है।
एक समय था जब मुद्रा का उपयोग नहीं होता था और तब वस्तुओं की दूसरी वस्तुओं के साथ प्रत्यक्ष अदला बदली होती थी। इस प्रकार की प्रणाली को विनिमय की वस्तु विनियम प्रणाली कहा जाता था। वस्तु विनियम प्रणाली में आवश्यकताओं के दोहरे संयोग, मूल्य के मापन और विभाज्यता जैसी कई कठिनाइयां थी। वस्तु विनियम प्रणाली की बाधाओं और कमियों के कारण विनियम के सामान्य माध्यम और मूल्य मापक के रूप में मुद्रा का आविर्भाव हुआ। वस्तुओं का अब मुद्रा के प्रयोग की मदद से विनियम होता है।
वाणिज्यिक बैंकों को नकद आरक्षित के रूप में अपनी जमाओं के एक निश्चित प्रतिशत केन्द्रीय बैंक में रखना पड़ता है। इसे वैधानिक न्यूनतम आरक्षित कहा जाता है। इस नकद आरक्षित से अधिक राशि को अतिरिक्त आरक्षित कहा जाता है। अतिरिक्त आरक्षित के आधार पर साख सृजन किया जाता है।
यदि केन्द्रीय बैंक परिवर्तनीय आरक्षित अनुपात को बढ़ाता है, तो वाणिज्यिक बैंकों को केन्द्रीय बैंक में अधिक धन रखना पड़ता है। इसलिए, अतिरिक्त आरक्षित की राशि कम हो जायेगी और वाणिज्यिक बैंकों का साख सृजन घट जायेगा।
केन्द्रीय बैंक का एक महत्वपूर्ण कार्य अपनी मौद्रिक नीति के माध्यम से साख और मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करना है। केन्द्रीय बैंक के पास नोटों को जारी करने का और अरक्षित जमा अनुपात निर्धारित करने का काधिकार है| इस प्रकार यह अर्थव्यवस्था में मुद्रा की मात्रा को नियंत्रित कर सकता है। यह मुद्रा की आपूर्ति और साख को जमाओं और ऋणों पर ब्याज दर के नियंत्रण, वैधानिक तरलता अनुपात के नियंत्रण, प्रतिभूतियों के क्रय और विक्रय आदि जैसे मात्रात्मक उपायों और गुणात्मक उपायों को अपनाकर नियंत्रित करता है।
मुद्रा के कार्य निम्नलिखित हैं -
केन्द्रीय बैंक को व्यावसायिक बैंकों का अंतिम ऋणदाता माना जाता है क्योंकि -
व्यावायिक बैंकों को अपनी चालू जमाओं तथा मुद्दती जमाओं का क्रमश:
केन्द्रीय बैंक बैंकों को लाइसेंस देता है, बैंकों की संख्याओं पर नियंत्रण रखता है और व्यावसायिक बैंकों की ऋण नीति की जांच करता है।
केन्द्रीय बैंक व्यावसायिक बैंकों को सलाह व सुझाव भी देता है तथा उनका निरीक्षण भी करता है।
केन्द्रीय बैंक देश के व्यावसायिक बैंकों के आपसी लेन-देन संबंधी हिसाबों का निपटारा करने के लिए समाशोधन गृह का कार्य करता है।
केन्द्रीय बैंक व्यावसायिक बैंकों को आवश्यकता पड़ने पर आर्थिक सहायता प्रदान करता है।
केन्द्रीय बैंक अन्य बैंकों को बिलों की पुन: कटौती द्वारा तथा स्वीकृत प्रतिभूतियों की जमानत पर ऋण प्रदान करता है।
आधुनिक युग में बैंकों के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-
1. पूंजी निर्माण- बैंक लोगों में बचत की आदत को प्रोत्साहित करता है। बैंक जनता की छोटी-छोटी बचतों को जमा करके पूंजी निर्माण करता है।
2. उद्योगों के विकास में सहायक- बैंक उद्योगों को कच्चा माल व मशीनरी खरीदने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
3. साख पत्रों का संग्रह करना- बैंक अपने ग्राहकों के चैक
4. धन का हस्तांतरण- बैंक अपने ग्राहकों का धन जहाँ वे चाहे वहां बिना जोखिम के भेज देता है। बैंक धन के हस्तांतरण को सरल और सुविधाजनक बनता है।
5. वित्तीय सलाहकार- बैंक अपने ग्राहकों को वित्तीय सम्बन्धी सलाह देकर उन्हें होने वाले जोखिमों का प्रति सर्तक करता है।
6. बहुमूल्य संपत्ति की सुरक्षा- बैंक अपने ग्राहकों को लाकर्स की सुविधा प्रदान करता है, जहाँ बहुमूल्य संपत्ति की सुरक्षा होती है।
7. मध्यस्थ का कार्य- बैंक अपने ग्राहकों की ओर से विदेशी व्यापारियों के विनिमय बिलों को स्वीकार करके उनका भुगतान करता है। बैंक अपने ग्राहक और विदेशी व्यापारियों के बीच मध्यस्थ का कार्य करता है। बैंक अपने ग्राहकों की ओर से बीमा किश्त
8. बचतकोप्रोत्साहन- बैंक बचत को प्रोत्साहित करने के लिए नई-नई आकर्षक योजनायें प्रस्तुत करता है। बैंक ग्राहकों की जमाओं की सुरक्षा करता है तथा जमाओं पर ब्याज भी देता है।
केन्द्रीय बैंक के कार्य हैं:
9. आर्थिक और सांख्यिकीय सूचनाओं का प्रकाशन - केन्द्रीय बैंक बैंकों और वित्तीय संस्थानों से समय समय पर आर्थिक और सांख्यिकीय सूचनाओं को एकत्रित एवं प्रकाशित करता है।
A.
सरकारी
व्यय में वृद्धि
B. सार्वजनिक ऋण में कटोती
C. करों में वृद्धि
D. घाटा वित्तीयन में वृद्धि
अधि मांग को ठीक करने के राजकोषीय नीति उपाय हैं : • करों में वृद्धि • सरकारी व्यय में कटोती • घाटा वित्तीयन में कटोती • सार्वजनिक ऋण में बढ़ोतरी
A.
नकद आरक्षित
अनुपात (CRR) में कटोती
B. खुले बाज़ार में सरकारी प्रतिभूतियों का विक्रय
C. ऋण की सीमांत आवश्यकता में वृद्धि
D. बैंक दरों में वृद्धि
न्यून मांग को सही करने के मौद्रिक नीति उपाय हैं : · बैंक दरों में कटोती · खुले बाज़ार में सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय · नकद आरक्षित अनुपात (CRR) में कटोती · वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) में कटोती · ऋण की सीमांत आवश्यकता में कटोती · साख राशनिंग का निष्कासन
A.
स्वायत्त
निवेश
B. नियोजित निवेश
C. प्रेरित निवेश
D. वास्तिविक निवेश
निवेश दो प्रकार के होते हैं: · प्रेरित निवेश तथा · स्वायत्त निवेश प्रेरित निवेश वे निवेश होते हैं जो आय में परिवर्तन के अनुसार होते हैं। स्वायत्त निवेश से अर्थ उस निवेश से होता है जो आय या उत्पादन के स्तर से परिवर्तित नहीं होता है।
A.
आयातों में कमी
B.
निर्यातों में कमी
C.
निजी उपभोग व्यय में कमी
D.
सरकारी व्यय में कमी
समग्र मांग के चार घटक हैं: 1) घरेलू उपभोग व्यय (C) 2) निजी निवेश व्यय (I) 3) सरकारी व्यय (G) तथा 4) शुद्ध निर्यात (X-M) आयातों में कमी से समग्र माँग (AD) में वृद्धि होती है|
A.
AD>AS (पूर्ण
रोजगार के
अनुरूप)
B.
AD
C. अर्थव्यस्था में उत्पादन का स्तर स्थिर रहता है
D. इनमें से कोई नहीं
न्यून मांग से अभिप्राय उस स्तिथि से है जिसमें अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोज़गार स्तर के अनुरूप समग्र मांग (AD) समग्र पूर्ति (AS) से कम होती है |
अवस्फीतिक अन्तराल को पूर्ण रोजगार के अनुरूप समग्र मांग और अल्परोज़गार के अनुरूप समग्र मांगके बीच अंतर के रूप में परिभाषित किया गया है। न्यून मांग की परिस्थिति में अर्थव्यस्था में कम उत्पादन, कम आय और कम रोज़गार की अवस्था होती है | इस स्थिति को समष्टि अर्थशास्त्र में "अवस्फीति" कहा जाता है। अर्थव्यवस्था में जितनी अधिक न्यून मांग होती है उतना ही अधिक अवस्फीतिकर दबाव होता है |
1929-1933 में महामंदी के दौरान, एसी स्थिति उत्पन हुई , जहां समग्र मांग समग्र पूर्ति की तुलना में बहुत कम थी । वह प्रोफेस्सर जॉन मेनार्ड किन्स थे जिन्होंने “न्यून माँग” और “अधि माँग” की अवधारणाओं को प्रस्तावित किया था ।
मौद्रिक नीति वह नीति है जिसके द्वारा केन्द्रीय बैंक मुद्रा का प्रवाह, साख की उपलब्धता और ब्याज दर को नियंत्रित करके अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता को हासिल करता है | यह समग्र मांग स्तर और संरचना को प्रभावित करती है।
K= 2000/200=10
K=1/MPS
10=1/MPS
MPS=1/10=0.1
है, तो
गुणक का
मूल्य होगा :
A.
4
B.
2
C.
8
D.
6
गुणक K=1/MPS MPS=0.5 K= 1/0.5= 2
A.
![]()
B.
C.
![]()
D.
![]()
निवेश
में किये गये
परिवर्तन के
कारण आय में हुये
परिवर्तन की
दर निवेश
गुणक होता
है। इससे निवेश
में हुये
परिवर्तन के
परिणामस्वरूप
राष्ट्रीय
आय में हुये
परिवर्तन को
मापा जाता
है। गुणक का
मान एक से
अनंत तक
परिवर्तित
होता है।
इसे K द्वारा
दर्शाया
जाता है।
प्रतीकात्मक
रूप में,
सीमांत बचत प्रवृत्ति आय में परिवर्तन के फलस्वरूप बचत में परिवर्तन के अनुपात को व्यक्त करती है। बचत वक्र की ढलान है 1-b =MPS
औसत बचत प्रवृत्ति आय के अनुपात में बचत की औसत दर अर्थात् कुल आय और कुल बचत का अनुपात है।
प्रतीकात्मक रूप में, APS = S/Y.
अनैच्छिक बेरोजगारी एक ऐसी स्थिति को दर्शाती है जहां लोग काम करने के लिए तैयार है और वर्तमान मजदूरी दर पर काम करने के लिए सक्षम है लेकिन काम खोजने में असमर्थ है।
समग्र मांग एक वित्तीय वर्ष के दौरान आय के दिए गए स्तर पर देश में उत्पादित वस्तुओं तथा सेवाओं की खरीद पर वांछित व्यय या नियोजित व्यय है।
यह वह कुल राशि है जो लोग एक वित्तीय वर्ष के दौरान वस्तुओं तथा सेवाओं की खरीद पर व्यय करने के लिए तैयार रहते हैं।
अधि मांग को ठीक करने के लिए राजकोषीय नीति के अंतर्गत सरकार द्वारा निम्नलिखित उपायों को अपनाया जाता है:
· करों में वृद्धि
· सरकारी व्यय में कटोती
· घाटा वित्तीयन (डेफिसिट फाइनेन्सिंग) में कटोती
· सार्वजनिक ऋण में बढ़ोतरी
मांग
में कमी या
न्यून मांग के
कारण हैं:
· निजी
उपभोग व्यय
में कमी
· निवेश
व्यय में
कमी
· निर्यातों
में कमी/ आयात
में वृद्धि
· कर की
दरों में
वृद्धि
जब AS>AD होता है तब उत्पादक अवांछित जमा स्टॉक से बचने के लिए अपने उत्पादन में कटौती कर देगे। इसके कारण अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी होगी और अंतत: अर्थव्यवस्था में संतुलन को वापिस लाना होगा।
समग्र पूर्ति एक अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के कुल उत्पादन के सम्पूर्ण मूल्य को दर्शाती है। दूसरे शब्दों में, यह राष्ट्रीय उत्पाद के मूल्य अर्थात् राष्ट्रीय आय के बराबर होती है।
स्वायत्त निवेश की प्रक्रिया:
स्वायत्त निवेश आय या उत्पादन मे किसी भी स्तर के लिए अपरिवर्तित रहता है।
निवेष की राश आय के सभी स्तरों पर एक समान रहती है।
यह नई तकनीक के आने से और जनसंख्या में वृद्धि के कारण परिवर्तित हो सकती है।
कीन्स के साधारण मॉडल में स्वायत्त निवेष को सरलता के लिए प्रयोग किया जाता है।
अब, MPC = ∆C/∆Y
MPS = ∆S/ /∆Y
चूंकि, Y = C + S
∆Y /∆Y =∆C/∆Y +∆S/ /∆Y
MPC + MPS =1
MPS = ΔS/ΔY
ΔS = 60 - 30 = 30
ΔY = 300 – 200 = 100
MPS = 30/100
= 0.3
| राष्ट्रीय आय (रू0) | उपभोग (रू0) | सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPc) | सीमांत बचत प्रवृत्ति (MPS) |
| 400 500 600 700 | 240 320 395 465 |
|
राष्ट्रीय आय (रू0) |
उपभोग (रू0) |
सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) |
सीमांत बचत प्रवृत्ति (MPS) |
|
400 |
240 |
- |
- |
|
500 |
320 |
.8 |
.2 |
|
600 |
395 |
.75 |
.25 |
|
700 |
465 |
.7 |
.3 |
ध्यान दीजिए: MPC = ΔC/ΔY और MPC + MPS = 1
या 1 – MPC = MPS

दिया
हुआ है,
आय
का वास्तविक
स्तर = 400
करोड़
रूपये
आय
का पूर्ण
रोजगार स्तर
= 800 करोड़
रूपये
MPC = .75
MPS = .25 ( क्योंकि MPC + MPS = 1)
K = 1/MPS =1/.25 =4
K = ΔY / ΔI = 400/ ΔI
4 = 400/ ΔI = ΔI = 400/4 =100
इस प्रकार आय का पूर्ण रोजगार स्तर प्राप्त करने के लिए 100 करोड़ रूपये की निवेश वृद्धि आवश्यक है।
जब एक विशिष्ट कीमत स्तर पर कुल मांग कुल पूर्ति के बराबर होती है तब कुल मांग और कुल पूर्ति के बीच संतुलन होता है। संतुलन पर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का कुल उत्पादन उन वस्तुओं और सेवाओं की कुल मांग के बराबर होता है। जिस कीमत पर कुल मांग कुल पूर्ति के बराबर होती है उसे संतुलन कीमत के रूप में जाना जाता है। संतुलन दो स्थितियों में हो सकता है:
1) पूर्ण
रोजगार
संतुलन: पूर्ण
रोजगार
संतुलन वह
संतुलन होता
है जहां सभी
संसाधन
पूर्ण रूप
नियोजित
होते हैं।
2) अल्प
रोजगार
संतुलन: अल्प
रोजगार
संतुलन वह
संतुलन होता
है जहां सभी संसाधन
पूर्ण रूप से
नियोजित
नहीं होते
है। कुछ
संसाधन
अनियोजित
होते हैं।
समग्र मांग किसी विशेष वर्ष के दौरान अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कुल मांग को दर्शाती है। समग्र मांग के चार संघटक निजी उपभोग मांग, निजी निवेश मांग, वस्तुओं और सेवाओं के लिए सरकार की मांग और निवल निर्यात हैं। लेकिन सरलता के लिए, समग्र मांग को उपभोग मांग और निवेश मांग के संदर्भ में बताया जाता है। प्रतीकात्मक रूप में,
AD = C + I
समग्र
मांग की निम्नलिखित
विशेषताएं
हैं:
1) समग्र मांग आय के स्तर पर निर्भर करती है। जितनी अधिक आय होगी, उतनी अधिक समग्र मांग हो जायेगी।
2) आय के शून्य स्तर पर, समग्र मांग का कुछ न्यूनतम स्तर हमेशा रहता है क्योंकि उपभोग कभी भी शून्य नहीं होता है।
3) जैसे आय बढ़ती है, मांग भी बढ़ जाती है लेकिन आय के एक विशिष्ट स्तर के बाद, लोग अपनी आय का एक हिस्सा बचाना शुरू कर देते हैं। आय वृद्धि के पीछे व्यय होता है।
अधि माँग से अभिप्राय उस स्तिथि से है जिसमें अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोज़गार स्तर के अनुरूप समग्र मांग (AD) समग्र पूर्ति (AS) से अधिक होती है |
दिया गया चित्र अधि माँग की व्याख्या करता है|

· OX अक्ष उत्पादन, आय और रोजगार को दर्शाता है |
· OY अक्ष समग्र मांग को दर्शाता है |
· AS समग्र पूर्ति वक्र है |
· ADF वक्र पूर्ण रोज़गार के अनुरूप समग्र मांग को प्रकट करता है |
· ADE वक्र अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोज़गार स्तर से अधिक समग्र मांग को प्रकट करता है|
· अधि माँग को ‘पूर्ण रोजगार स्तर के अतिरिक्त इच्छित समग्र मांग’ तथा ‘पूर्ण रोज़गार के अनुरूप इच्छित समग्र मांग के अंतर के द्वारा मापा जाता है |
· चित्र में यह GF के बराबर है |
· ADF समग्र मांग के पूर्ण रोजगार स्तर का संकेत देता है। यह MF के बराबर है।
· ADE अपने पूर्ण रोजगार स्तर के अतिरिक्त इच्छित समग्र मांग’ है। यह MG के बराबर है।
मांग
की कमी (न्यून
मांग) को ठीक
करने के लिए
सरकार
द्वारा उठाए
गये मौद्रिक
नीति के उपाय
निम्नलिखित
हैं:
1. बैंक
दर में कमी-
न्यून
मांग की
स्थिति में
केंद्रीय
बैंक, बैंक दरों
में कटोती
करता है| इससे
वाणिज्यिक
बैंकों से ऋण
लेना सस्ता हो
जाता है
क्योंकि तब वाणिज्यिक
बैंक अपनी ब्याज
दर जिस पर वे
उधार देते
हैं को कम देते
हैं| यह लोगों
को बैंकों से
पैसे उधार
लेने के लिए प्रोत्साहित
करता है।
इससे
अर्थव्यवस्था
में मुद्रा
के प्रवाह में
वृद्धि होती
है | इस के कारण
उपभोक्ताओं
की क्रय
शक्ति में भी वृद्धि
होती है।
फलस्वरूप
समग्र मांग
में वृद्धि
होती है |
2. खुले बाज़ार में सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय- जब केंद्रीय बैंक खुले बाज़ार में सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय करता है, वाणिज्यिक बैंकों के पास रखें धर में वृद्धि होती है, उनकी ऋण एने की शमता में वृद्धि होती है , वे ब्याज़ दर कम कर देते हैं इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रवाह बढ़ जाता है फलस्वरूप समग्र मांग में वृद्धि होती है |
3. नकद आरक्षित अनुपात (CRR) में कटोती - जब केंद्रीय बैंक नकद आरक्षित अनुपात (CRR) में कटोती करता है तब वाणिज्यिक बैंकों की ऋण देने की क्षमता बढ़ जाती हैं | इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रवाह और निवश बढ़ जाता है | फलस्वरूप समग्र मांग में वृद्धि होती है |
4. वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) में कटोती - जब केंद्रीय बैंक वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) में कटोती करता है तब वाणिज्यिक बैंकों की ऋण देने की क्षमता बढ़ जाती हैं | इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रवाह और निवश बढ़ जाता है फलस्वरूप समग्र मांग में वृद्धि होती है |
5. ऋण की सीमांत आवश्यकता में कटोती- जब केंद्रीय बैंक ऋण की सीमांत आवश्यकता में कटोती करता है , तब ऋण लेने वालों को उनकी प्रतिभूतियों के आधार पर और अधिक ऋण उपलब्ध होता है, इसके कारण उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति में भी वृद्धि होती है। फलस्वरूप समग्र मांग में वृद्धि होती है |
6. साख राशनिंग का निष्कासन- न्यून मांग की स्थिति में केंद्रीय बैंक साख राशनिंग को निश्तासित कर देता है , जिससे वाणिज्यिक बैंकों की ऋण देने की क्षमता बढ़ जाती हैं | इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रवाह और लोगों की क्रय शक्ति बढ़ जाती है | फलस्वरूप समग्र मांग में वृद्धि होती है |
निवेश
गुणक की
अवधारणा को प्रोफेस्सर
जॉन मेनार्ड किन्स
द्वारा
प्रतिपादित
किया गया था।
निवेश में किये
गये
परिवर्तन के
कारण आय में
हुये परिवर्तन
की दर निवेश
गुणक होता
है। इससे
निवेश में हुये
परिवर्तन के
परिणामस्वरूप
राष्ट्रीय
आय में हुये
परिवर्तन को
मापा जाता
है। गुणक का
मान एक से
अनंत तक
परिवर्तित
होता है।
इसे K द्वारा
दर्शाया
जाता है।
प्रतीकात्मक
रूप में,
DY = आय में परिवर्तन और
DI = निवेश में परिवर्तन
उदाहरण:
मान लो DI = 50 करोड़ रूपये है और DY = 200 करोड़ रूपये है
इसलिए,
K= 200/50
K= 4
इस प्रकार, गुणक का मान 4 है।
(1) हम जानते हैं कि,

उपरोक्त सूत्र में k का मान रखने पर, हमें प्राप्त होता है

4 MPS = 1

(2) हम
जानते हैं कि,
APC + APS = 1
उपरोक्त
सूत्र में APS का मान
रखने पर, हमें
प्राप्त
होता है
APC + .75 = 1
APC = 1 -
.75
= .25
(3) हम जानते हैं कि,

उपरोक्त सूत्र में MPS का मान रखने पर, हमें प्राप्त होता है

आय
में
परिवर्तन के
कारण उपभोग
में
परिवर्तन की
दर सीमांत
उपभोग
प्रवृत्ति
होती है।
प्रतीकात्मक
रूप में,
.
MPC का मूल्य हमेशा 0 और 1 के बीच होता है।
आय में परिवर्तन के कारण बचत में परिवर्तन की दर सीमांत बचत प्रवृत्ति होती है।
प्रतीकात्मक रूप में,
. 
MPS का मूल्य भी 0 और 1 के बीच रहता है। MPS का मूल्य MPC के मूल्य पर निर्भर करता है।
संबंध:
MPC और MPS के बीच
संबंध होता
है जिसमें इन
दोनों का योग हमेशा
एक के बराबर
होता है।
प्रतीकात्मक
रूप में, MPC
+ MPS = 1.
समीकरण बताता है कि MPC = 1 – MPS और MPS = 1 - MPC
कुल
आय के कुल
उपभोग व्यय
के अनुपात को
औसत उपभोग
प्रवृत्ति
कहा जाता है।
APC=C/Y
जहां, C = समग्र
उपभोग
Y = समग्र
आय
आय
में
परिवर्तन के कारण
उपभोग में
परिवर्तन की
दर को सीमांत
उपभोग
प्रवृत्ति के
रूप में
परिभाषित
किया जाता
है। यह
अतिरिक्त
आय के उस भाग
को दर्शाता
है जिसे
अतिरिक्त
उपभोग पर व्यय
किया गया है।
MPC = ∆C/∆Y
∆C = उपभोग में परिवर्तन
∆Y = आय में परिवर्तन
MPC = सीमांत उपभोग प्रवृत्ति
यदि पहले की बचतों को चालू वर्ष में उपभोग कर लिया जाता है या चालू वर्ष में उपभोग करने के लिए ली गयी उधार राशियों का उपयोग किया जाता है तो औसत उपभोग प्रवृत्ति का मान एक से अधिक हो सकता है। ऐसी स्थिति में उपभोग आय से अधिक हो सकता है और APC का मान एक से अधिक होगा।
MPC हमेशा एक से कम और शून्य से अधिक होता है।
A.
आय
और संपत्ति
का पुनः
वितरण
B. आर्थिक स्थिरता
C. सकल घरेलू उत्पाद संवृद्धि
D. सामाजिक अस्थिरता
सरकारी बजट का प्रयोग समाज के कल्याण के लिए किया जाता है |
A.
उपहार
के द्वारा
प्राप्त
धनराशी
B. बिक्री के द्वारा प्राप्त धनराशी
C. दान में प्राप्त धनराशी
D. उत्पाद के द्वारा प्राप्त धनराशी
विभिन्न देशों या अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों के द्वारा उपहार और दान दिए जाते जो किसी देश के लिए गैर कर प्राप्ति होती है |
भारत में आय कर एक प्रगतिशील कर है |
बिक्री कर एक प्रतिगामी कर है |
प्रत्यक्ष कर का एक उदाहरण है आय कर|
प्रत्यक्ष कर का एक उदाहरण है आय कर|
अप्रत्यक्ष कर वह कर हैं जिसमे कर का भार और भुगतान का दायित्व अलग अलग व्यक्तियों पर पड़ता है।
प्रत्यक्ष कर वह कर हैं जिसमे कर का भार और भुगतान का दायित्व एक ही व्यक्ति पर पड़ता है।
मूल्य वृद्धि कर अप्रत्यक्ष कर का एक उदाहरण है |
A.
कुल व्यय – उधार को छोड़कर कुल प्राप्तियाँ
B.
राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ
C.
पूँजीगत व्यय पूँजीगत प्राप्तियाँ
D.
राजस्व व्यय – पूँजीगत व्यय - राजस्व प्राप्तियाँ
राजकोषीय घाटा सरकार की उधार संबंधी आवश्यकताओं को दर्शाता है |
A.
ब्याज
का भुगतान
B. सुरक्षा के लिए खरीदी गई वस्तुएँ
C. सरकार का वेतन बिल
D. निजी कर्मचारियों की आय
सरकार का बजट सरकार के अनुमानित आय और व्यय का विवरण होता है |
A.
केवल देयता उत्पन्न होती है
B.
केवल परिसंम्पत्तियाँ कम होती हैं
C.
या तो देयता उत्पन्न होती है या तो परिसंम्पत्तियाँ कम होती हैं
D.
नाहीं देयता उत्पन्न होती है और नाहीं परिसंम्पत्तियाँ कम होती हैं
सार्वजनिक उपक्रम की बिक्री के उपरांत प्राप्त धनराशी पूंजीगत प्राप्ति का एक उदाहरण है |
पूँजीगत प्राप्ति सरकार की वह प्राप्ति है जिनसे या तो देयता उत्पन्न होती है या तो परिसंम्पत्तियाँ कम होती हैं |
A.
परिसंपति में वृद्धि करते हैं
B.
देयता को कम करते हैं
C.
या तो परिसंपति में वृद्धि करता हैं या देयता को कम करता है
विदेशों
को दिया गया
ऋण पूँजीगत व्यय
होता है |।
बजट प्राप्तियों से कम होता है B.
बजट प्राप्तियों से अधिक होता है C.
बजट प्राप्तियों से बराबर होता है D.
विदेशी ऋण से कम होता है
वह
बजट जिसमें
सरकार की
अनुमानित
प्राप्तियां
उसके
अनुमानित
व्यय के कम
होती हैं, घाटे
का बजट
कहलाता है ।
सरकारी
ऋण एक बोझ हैं
क्योंकि
इसका प्रभाव
दो स्तरों पर
होता हैं :
·
कर
का भार अगली
पीढ़ी को
हस्तांतरित
हो जाता हैं
·
पूँजी
निर्माण और
देश की
वृद्धि दर
में कमी हो
जाती हैं|
सरकारी
ऋण एक बोझ हैं
क्योंकि
इसका प्रभाव
दो स्तरों पर
होता हैं :
·
कर
का भार अगली
पीढ़ी को
हस्तांतरित
हो जाता हैं
·
पूँजी
निर्माण और
देश की
वृद्धि दर
में कमी हो
जाती हैं|
कुल व्यय = कुल प्राप्तियाँ B.
कुल व्यय < कुल प्राप्तियाँ C.
कुल व्यय > कुल प्राप्तियाँ D.
कुल व्यय = 0
संतुलित
बजट वह बजट है जिसमें
सरकार की
अनुमानित
प्राप्तियां
उसके
अनुमानित
व्यय के
बराबर होती
है, संतुलित
बजट कहलाती
है।
सरकार की अनुमानित आय < सरकार का अनुमानित व्यय B.
सरकार की अनुमानित आय > सरकार का अनुमानित व्यय C.
सरकार की अनुमानित आय = सरकार का अनुमानित व्यय D.
सरकार का अनुमानित व्यय= 0
संतुलित
बजट वह बजट है जिसमें
सरकार की
अनुमानित
प्राप्तियां
उसके
अनुमानित
व्यय के
बराबर होती
है, संतुलित
बजट कहलाती
है।
जब
निवल
निर्यात
धनात्मक
होता है तो
देश में अंतर्राष्ट्रीय
लेनदेन से व्यापार
अधिक्य होता है
और जब यह ऋणात्मक
है तो इसका
अर्थ है देश
को विदेशी व्यापार
में घाटा हो
रहा है।
देशों
के बीच सामान B.
देशों
के बीच सेवाएं
C.
देशों
के बीच क्रय
शक्ति D.
देशों
के बीच सोना
विदेशी
विनिमय का
अर्थ है
देशों के बीच
मुद्रा या
क्रय शक्ति
का
हस्तांतरण। वह दर
जिस पर एक देश
दूसरे देश
में मुद्रा
का विनिमय
करता है उसे
विदेशी
विनिमय की दर
कहते हैं।
चालू
खाता B.
पूंजी
खाता C.
व्यापारिक
खाता D.
लाभ
और हानि खाता
पूंजी
खाता विदेशी
निवेश, ऋण,
बैंकिंग, ऋण सेवाओं
आदि में
पूंजी के अंतर्राष्ट्रीय
लेनदेन को
अभिलेखित
करता है| यह
पूंजी के
अंतर्वाह और
बहिर्वाह का
अभिलेख होता
है जो देश की
विदेशी
परिसंपत्तियों
और दायित्वों
में
परिवर्तन
लाता है|
जब
भी कोई
मुद्रा वर्त्तमान
मूल्यों पर
बदली जाती है
तो इसे स्पॉट
बाज़ार कहते
हैं| यह बाज़ार
दैनिक
प्रवृत्ति
का होता है और इसमें
विदेशी
मुद्रा के
भविष्य के
लेनदेन नहीं
होते हैं|
B.
जोखिम
पूर्वोपाय
कार्य C.
समतामूल्य
D.
स्थिर
विनिमय
प्रणाली
अधिकीलित
प्रणाली स्थिर
विनिमय दर
प्रणाली के
समरूप होती
है| यह वह दर है
जिसे सोने या
किसी अन्य
मुद्रा के आधार
पर स्थिर
किया जाता है|
समायोजित
संव्यवहार B.
स्वायत्त
मद C.
आर्थिक
मद D.
पूंजी
मद
वे
मद जो अंतर्राष्ट्रीय
लेनदेन को
परिलक्षित
करते हैं
जिनका एक
आर्थिक
उद्देश्य
होता है वे
स्वायत्त मद
होते हैं।
मूल्यह्रास
B.
मूल्यवृद्धि
C.
अधिमूल्यन
D.
अल्पमूल्यन
किसी
भी मुद्रा का
मूल्यह्रास
विदेशी
मुद्रा के
आधार पर देश
की मुद्रा के
मूल्य में
कमी होता है।
यह बताता है
कि देश की
मुद्रा का
मूल्य पहले
की तुलना में
कम हो गया है।
मूल्य ह्रास
नम्य विनिमय
दर प्रणाली
में होता है।
मूल्यह्रास
B.
मूल्यवृद्धि
C.
अधिमूल्यन
D.
अल्पमूल्यन
जब किसी
देश की सरकार
स्थिर
विनिमय दर
प्रणाली के
अंतर्गत विदेशी
मुद्रा की
तुलना में
घरेलू
मुद्रा के
मूल्य में
वृद्धि करती
है तो इसे
मुद्रा का अल्पमूल्यन
कहते हैं|
मूल्यह्रास
B.
मूल्यवृद्धि
C.
अधिमूल्यन
D.
अल्पमूल्यन
जब किसी
देश में
स्थिर
विनिमय दर
प्रणाली के
अंतर्गत विदेशी
मुद्रा की
तुलना में
घरेलू
मुद्रा के
मूल्य में
वृद्धि करती
है तो इसे
मुद्रा का अधिमूल्यन
कहते हैं।
इसे उस देश की
सरकार के
द्वारा किया
जाता है।
मूल्यह्रास
B.
मूल्यवृद्धि
C.
अधिमूल्यन
D.
अल्पमूल्यन
मुद्रा
की
मूल्यवृद्धि
का अर्थ है एक
नम्य विनिमय
दर प्रणाली
में विदेशी
मुद्रा की
तुलना में
देश की
मुद्रा में
वृद्धि
होना। यह
इंगित करता
है कि घरेलू
मुद्रा का
मूल्य पहले
की तुलना में कहीं
अधिक है।
आंतरिक
भुगतान के
लिए B.
प्रत्यक्ष
भुगतान के
लिए C.
विदेशी
भुगतान के
लिए D.
अप्रत्यक्ष
भुगतान के
लिए
अंतर्राष्ट्रीय
भुगतान के
लिए प्रयोग
की गई मुद्रा
को विदेशी मुद्रा
कहा जाता है।
भारत के लिए, अमरीकी
डॉलर,
ब्रिटिश
पाउंड और जापानी
येन कुछ
विदेशी मुद्राएँ
हैं।
व्यापार
संतुलन =
वस्तुओं का
निर्यात –
वस्तुओं का
आयात
अंतरण
अदायगी को
आदायगी
संतुलन के
चालू खाते के
क्रेडिट में
दर्ज करते
हैं|
अंतरण-अदायगी
ऐसी प्राप्तियाँ
होती हैं, जो किसी
देश के निवासियों
को ‘निःशुल्क’प्राप्त
होती है और उनके
बदले में उन्हें
वर्तमान में या
भविष्य में कोई
अदायगी नहीं करनी
पड़ती है। उनमें
प्रेषित धन, उपहार
और अनुदान शामिल
हैं।
विदेशी
स्टॉक्स और
बंधपत्र की
खरीद विदेशी
परिसंपत्तियों
की खरीद है
इसलिए इसे
अदायगी संतुलन
के पूंजी
खाते में लेखांकित
किया जाता है|
$10 = रु 500 $1 = रु 500/$10 = रु 50 इस
प्रकार
विनिमय दर है:
$1 = रु
50
एक
ऐसा बाज़ार जो
विभिन्न
देशों की
मुद्राओं के
व्यापार को
सुगम बनाता
है उसे विदेशी
विनिमय
बाज़ार कहते
हैं।
अंतर्राष्ट्रीय
मौद्रिक
प्रणाली की
स्थापना
अंतर्राष्ट्रीय
लेनदेन में
स्थिरता और प्रबंधन
सुनिश्चित
करने के लिए
की गई थी।
चालू
खाते की एक मद
है वस्तुओं
का निर्यात
और आयात|
पूंजी खातों
की एक मद है
विदेशी
प्रत्यक्ष
निवेश|
विदेशी
विनिमय की कीमत
में वृद्धि से
निर्यात की जाने
वाली घरेलू वस्तुओं
की विदेशी
मुद्रा के रूप
में लागत घट जाती
है|इससे
निर्यात बढ़ जाता
है और विदेशी मुद्रा
की पूर्ति में
वृद्धि होती है|
व्यापर
संतुलन और
अदायगी संतुलन
के बीच अंतर
नीचे दिया
गया है: व्यापर
संतुलन अदायगी
संतुलन 1.यह वस्तुओं के
लेन-देन अभिलिखित
करता है। 1.यह वस्तुओं और
सेवाओं के लेन-देन
अभिलिखित करता
है। 2.यह पूँजी के लेन-देन
का अभिलेखन नहीं
करता। 2.यह पूँजी के लेन-देन
अभिलिखित करता
है। 3.यह चालू खाते
के अंतर्गत आता
है। 3.चालू खाता तथा
पूँजी खाता, दोनों ही इसके
अंतर्गत आते हैं। 4.व्यापर संतुलन
में घाटा व अधिक्य,
दोनों हो सकते
हैं। 4.अदायगी संतुलन
सदेव संतुलन में
रहता है।
वि-औद्योगीकरण
के कारण भारत
ब्रिटिश
उद्योगों के
उत्पादों के
लिए एक विशाल
बाजार बन
गया।
सकारात्मक B.
एकाधिकार C.
सहायक D.
चयनात्मक
ब्रिटिश
सरकार ने
भारत पर अपना
एकाधिकार
बनाकर ऐसी
मौलिक
आधारिक
संरचनाओं का
निर्माण करा
तथा ऐसी
विदेश
व्यापार
नीतियों का
पालन किया जो
उनका
औपनिवेशिक
हित पूरा
करती थीं और
भारतीय अर्थव्यवस्था
के लिए
हानिकारक
होंती थी।
जो
उद्योग मशीन
और उपकरणों
का उत्पादन
करते हैं
उनको
पूंजीगत
उद्योग कहा
जाता है।
TISCO, टाटा
एंड स्टील
कंपनी वर्ष 1907 में
निगमित हुई|
B.
डायमंड,
मसाले,
चीनी C.
कपास,
गेहूं,
चावल D.
ऊन,
हीरा,
दालों
औपनिवेशिकरण
के कारण
निर्यात की मुख्य
वस्तुएँ
थीं-भोजन, पेय
पदार्थ, तम्बाकू
और कच्चा
माल। सन 1913 में ये
वस्तुएँ
भारतीय
निर्यात का 77
प्रतिशत थीं|
B.
54 वर्ष C.
67 वर्ष D.
32 वर्षSOLUTION
A.
SOLUTION
A.
B.
C.
D.
Right Answer is: ASOLUTION
A.
B.
C.
D.
Right Answer is: CSOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: CSOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: ASOLUTION
A.
रेंगती
हुई
अधिकीलित
प्रणाली SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: CSOLUTION
A.
SOLUTION
A.
B.
C.
D.
Right Answer is: ASOLUTION
A.
B.
C.
D.
Right Answer is: CSOLUTION
A.
भोजन,
पेय
पदार्थ, तम्बाकू
और कच्चा मालSOLUTION
A.
45 वर्ष