A.
चिट्ठा में।
B.
लाभ एवं हानि खाते में।
C.
आय एवं व्यय खाते में।
D.
केवल प्राप्ति एवं भुगतान खाते में।
इसे सीधे पूँजी कोष में जोड़ दिया जाता है इसलिए, इसे चिट्ठे के दायित्व पक्ष में प्रदर्शित किया जाता है।
A.
गैर-व्यापारिक संस्थाओं।
B.
व्यापारिक संस्थाओं।
C.
साझेदारी फर्मों।
D.
एकल स्वामित्वों।
A.
रोकड़ खाता।
B.
आय एवं व्यय खाता।
C.
लाभ एवं हानि खाता।
D.
व्यापारिक खाता।
A.
व्यक्तिगत खाता।
B.
नाममात्र का खाता।
C.
वास्तविक खाता।
D.
पूँजी खाता।
A.
आय।
B.
पूँजीगत प्राप्ति।
C.
आयगत प्राप्ति।
D.
सम्पत्ति।
A.
दायित्व।
B.
आय।
C.
सम्पत्तियाँ।
D.
व्यय।
A.
आयगत प्रकृति।
B.
पूँजीगत प्रकृति।
C.
पूँजीगत कोष।
D.
विशिष्ट कोष।
A.
रु 2,350.
B.
रु 2,400.
C.
रु 2,600.
D.
रु 2,850.
वर्ष के लिए बीमा = वर्ष के दौरान चुकाया गया + प्रारंभ में पूर्वदत्त - अंत में पूर्वदत्त। (2,400 + 200 - 250 = 2,350)
A.
रु 1,00,000.
B.
रु 90,000.
C.
रु 70,000.
D.
रु 60,000
80,000 - 15,000 + 5,000 = 70,000 क्योंकि 15,000 रु गत वर्ष से सम्बंधित है, इसे घटाया जायेगा।
A.
34,000.
B.
![]()
C.
![]()
D.
![]()
टूर्नामेंट कोष को चिट्ठे के दायित्व पक्ष में (20,000 + 8,000 - 6,000) दर्शाया जायेगा।
A.
रु 4,500.
B.
रु 24,000.
C.
रु 25,000.
D.
रु 28,500.
A.
रु
B.
रु
C.
रु 10,500.
D.
रु
A.
रु 17,500
B.
रु 18,000
C.
रु 19,000
D.
रु 19,500
| Details | Amount |
| Payment made for the purchase of Stationery as per Receipts and Payments AC Less: Payment for 2004-05 Payment made for the yr-2005-06 Add: Payment not yet made (i.e. creditors at the end) Stationery Purchased for the year 2005-06 Add: Stock in the beginning Stationery available for consumption during 2005-06 Less: Stock at the end Stationery consumed during 2005-06 to be taken to the Expenditure side of the Income and Expenditure Account | 25,000 11,000 14,000 3000 17000 5,000 22,000 3,000 19,000 |

|
|
A |
B |
C |
Total |
|
Int. on capital (Cr.) |
2,500 |
2,000 |
1,500 |
6,000 |
|
Less- Int. on Drawing (Dr.) |
150 |
100 |
50 |
300 |
|
|
2,350 |
1,900 |
1,450 |
5,700 |
|
Less- Profit already distributed in 2:1:1 |
2,850 |
1,425 |
1,425 |
5,700 |
|
Net Profit |
Dr. 500 |
Cr. 475 |
Cr. 25 |
- |
भूल के लिए समायोजन प्रविष्टि:-
|
Date |
Particular |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
|
|
A's Capital A/c Dr. To B's Capital A/c To C's Capital A/c (Adjustment for omission) |
|
500 |
475 25 |
कार्यशील टिप्पणी:-
पूँजी पर ब्याज की राशि की गणना :-

साझेदारी फर्म के सभी नियम एवं शर्तों को लिखित में रखा जाने वाले दस्तावेज को साझेदारी संलेख कहा जाता है। साझेदारी संलेख में निम्नलिखित विवरण शामिल होता है:-
1. साझेदारों एवं फर्म का स्पष्टिकरण।
2. व्यवसाय का मुख्य स्थान।
3. व्यवसाय की प्रकृति।
4. साझेदारी का प्रारंभ।
5. पूँजी योगदान।
6. पूँजी पर ब्याज तथा आहरण पर ब्याज।
7. लाभ विभाजन अनुपात।
8. ऋण पर ब्याज।
एक साझेदार के अधिकार:
1. प्रत्येक साझेदार को व्यवसाय के प्रबंधन में भाग लेने का अधिकार होता है।
2. प्रत्येक साझेदार को साझेदारी व्यवसाय के लेनदेनों के बारे में राय देने का अधिकार होता है।
3. सभी साझेदारों को खातों की पुस्तकों की जाँच करने एवं इनकी एक प्रतिलिपी प्राप्त करने का अधिकार होता है।
4. एक साझेदार के पास एक नये साझेदार के प्रवेश की अनुमति देने का अधिकार होता है।
पवन तथा राजू की पूँजी :- 2,00,000 : 3,00,000
पवन 2,00,000 x 12 = 24,00,000
50,000 x 9 = 4,50,000
1,00,000 x 4 = 4,00,000
32,50,000

Profit and Loss Appropriations A/c
For the ending 31st December, 2011
|
Particulars |
₹ |
Particulars |
₹ |
||
|
To Interest on Capital |
|
By Net Profit |
1,00,000 |
||
|
A |
20,000 |
|
By Interest on Drawings |
|
|
|
B |
10,000 |
|
A |
500 |
|
|
C |
10,000 |
40,000 |
B |
500 |
|
|
To B’s Salary |
15,000 |
C |
500 |
1,500 |
|
|
To Profit t/fd to Capitals |
|
|
|
||
|
A |
23,250 |
|
|
|
|
|
B |
15,500 |
|
|
|
|
|
C |
7,750 |
46,500 |
|
|
|
|
|
|
|
|
||
|
|
1,01,500 |
|
1,01,500 |
||
|
अंतर का आधार |
स्थायी खाते |
परिवर्तनशील खाते |
|
शेष |
इनका शेष प्रतिवर्ष सामान रहता है। |
इनका शेष प्रतिवर्ष परिवर्तित होता है।
|
|
चालू खाते |
इसमें चालू खाते खोले जाते हैं । |
इसमें चालू खाते खोलने की आवश्यकता नहीं होती ।
|
|
लेखे की मदें |
इस विधि में पूँजी पर ब्याज साझेदार का वेतन आहरण पर ब्याज आदि का लेखा चालू खातों में किया जाता है। |
इसमें पूँजी खाते से सम्बंधित सभी लेखे पूँजी खाते में ही किये जाते हैं ।
|
|
पूँजी की स्थिरता
|
इस खाते में पूँजी हमेशा स्थिर रहती है। |
इस खाते में पूँजी हमेशा परिवर्तित होती रहती है । |
|
|
Date |
Particulars |
L.F. |
Dr. |
Cr. |
|
1) |
2001 Dec. 31 |
Interest on capital A/c………Dr. |
|
16,800 |
|
|
To Kaku’s Capital A/c |
|
|
9,600 |
||
|
To Polu’s Capital A/c |
|
|
7,200 |
||
|
(Being interest on Capital allowed to Kaku & Polu) |
|
|
|
||
|
2) |
|
P & L Appropriation A/c……Dr. |
|
16,800 |
|
|
To Interest on Capital A/c |
|
|
16,800 |
||
|
(Being interest on capital transferred to P & L appropriation A/c) |
|
|
|
||
|
3) |
|
Salaries A/c Dr. |
|
60,000 |
|
|
To Kaku’s Capital A/c |
|
|
24,000 |
||
|
To Polu’s Capital A/c |
|
|
36,000 |
||
|
(Being salaries due to Kaku and Polu) |
|
|
|
||
|
4) |
|
P & L Appr. A/c Dr. |
|
60,000 |
|
|
To Salaries A/c |
|
|
60,000 |
||
|
(Being salaries transferred to P & L Appropriation A/c) |
|
|
|
||
|
5) |
|
Kaku’s Capital A/c Dr. |
|
2,500 |
|
|
Polu’s Capital A/c Dr. |
|
2,500 |
|
||
|
To Int. on Drawings A/c |
|
|
4,500 |
||
|
(Being interest on drawings charged) |
|
|
|
||
|
6) |
|
Int. on Drawings A/c Dr. |
|
4,500 |
|
|
To P & L Appr. A/c |
|
|
4,500 |
||
|
(Being interest on drawings transferred to P & L appropriation A/c) |
|
|
|
||
|
7) |
|
P & L Appropriation A/c Dr. |
|
28,000 |
|
|
To Kaku’s capital A/c |
|
|
16,000 |
||
|
To Polu’s capital A/c |
|
|
12,000 |
||
|
(Being profit transferred to Kaku’s and Polu’s capital accounts) |
|
|
|
P & L Appropriation A/c
|
Particulars |
Amount |
Particulars |
Amount |
||
|
To Interest on capital |
|
By profit |
1,00,300 |
||
|
Kaku |
9,600 |
|
By Interest on Drawing |
|
|
|
Polu |
7,200 |
16,800 |
Kaku |
2,000 |
|
|
To salaries |
|
Polu |
2,500 |
4,500 |
|
|
Kaku |
24,000 |
|
|
|
|
|
Polu |
36,000 |
60,000 |
|
|
|
|
To Profit Transferred |
|
|
|
||
|
Kaku |
16,000 |
|
|
|
|
|
Polu |
12,000 |
28,000 |
|
|
|
|
|
1,04,800 |
|
1,04,800 |
||
Kaku’s Capital A/c
|
Date |
Particulars |
Amount |
Date |
Particulars |
Amount |
|
2001 |
|
|
|
|
|
|
Dec. 31 |
To Drawings A/c |
40,000 |
Jan.31 |
By balance b/d |
80,000 |
|
Dec. 31 |
To Int. on Drawings A/c |
2,000 |
Dec.31 |
By Interest on capital |
9,600 |
|
|
To balance c/d |
87,600 |
Dec.31 |
By Salaries A/c |
24,000 |
|
|
|
|
Dec.31
|
By P&L Appropriation
|
16,000 |
|
1,29,600 |
1,29,600 |
Polu’s Capital A/c
|
Date |
Particulars |
Amount |
Date |
Particulars |
Amount |
|
Dec. 31 |
To Drawings A/c |
50,000 |
Jan.31 |
By balance b/d |
60,000 |
|
Dec.31 |
To Int. On Drawings A/c |
2,500 |
Dec.31 |
By Interest on capital |
7,200 |
|
Dec.31 |
To balance c/d |
62,700 |
Dec.31 |
By Salaries A/c |
36,000 |
|
|
|
|
Dec.31
|
By P&L Appropriation |
12,000 |
|
1,15,200 |
1,15,200 |
A.
सभी साझेदारों के पूँजी खातों में।
B.
पुराने साझेदारों के पूँजी खातों में।
C.
लाभ-हानि समायोजन खाते में।
D.
पुनर्मूल्यांकन खाते में।
क्योंकि प्रवेश के समय वाले लाभ पर नये साझेदार का कोई भी अधिकार नहीं होता है।
A.
पुनर्मूल्यांकन खाते में डेबिट किया जायेगा
B.
पुनर्मूल्यांकन खाते में क्रेडिट किया जायेगा
C.
ख्याति खाते में डेबिट किया जायेगा
D.
ख्याति खाते में क्रेडिट किया जायेगा
क्योंकि इसकी रोजनामचा प्रविष्टी स्पष्ट दर्शाती है सम्पत्ति खाता Dr. और पुनर्मूल्यांकन खाता Cr.
A.
पुराने साझेदारों के पूँजी खातों में उनके नये लाभ-विभाजन अनुपात में।
B.
सभी साझेदारों के पूँजी खातों में उनके नये लाभ-विभाजन अनुपात में।
C.
पुराने साझेदारों के पूँजी खातों में उनके पुराने लाभ-विभाजन अनुपात में।
D.
पुराने साझेदारों के पूँजी खातों में उनके त्याग अनुपात में।
क्योंकि प्रवेश के समय पुनर्मूल्यांकन पर होने वाले लाभ पर नये साझेदार का कोई भी अधिकार नहीं होता है ।
A.
पुराने साझेदारों के पूँजी खाते डेबिट किये जायेंगे
B.
पुराने साझेदारों के पूँजी खाते क्रेडिट और नए साझेदार का पूँजी खाता डेबिट किया जायेंगे
C.
सभी साझेदारों के पूँजी खाते डेबिट किये जायेंगे
D.
सभी साझेदारों के पूँजी खाते क्रेडिट किये जायेंगे
क्योकि पुराने साझेदारों द्वारा किये गए त्याग के प्रतिफल में उनको ख्याति मिलती है,
A.
लाभ-हानि के पुराने अनुपात में
B.
लाभ-हानि के नए अनुपात में
C.
पूँजी के अनुपात में
D.
पुराने साझेदारों द्वारा त्याग किये गए अनुपात में
क्योकि पुराने साझेदारों द्वारा किये गए त्याग के प्रतिफल में उनको ख्याति मिलती है,जिसको वो त्याग के अनुपात में ही बाँटेंगे ।
A.
रु 40,000 , रु 20,000 क्रमशः
B.
रु 32,000, तथा रु 16,000 क्रमशः
C.
रु 60,000 तथा रु0 30,000 क्रमशः
D.
रु 12,000 तथा रु 17,000 क्रमशः
कभी-कभी साझेदारों में यह समझौता हो जाता है कि उनकी पूँजी का वही अनुपात होगा, जिस अनुपात में वे लाभ-हानि बाँटते हैं। यदि एक्स तथा वाई 3:2 अनुपात में लाभ-हानि बाँटते हैं तो एक्स और वाई की पूँजी का अनुपात भी 3:2 होना चाहिए। यदि एक्स की पूँजी रु 30,000 है तो वाई की पूँजी रु 20,000 होनी चाहिए।
A.
स्मरणार्थ पुनर्मूल्यांकन खाता
B.
पुनर्मूल्यांकन खाता
C.
वसूली खाता
D.
रोकड़ खाता
नया साझेदार फर्म में प्रवेश करने की तिथि से पूर्व की सम्पत्तियों एवं दायित्वों के मूल्य में परिवर्तन के कारण हानि के लिए न तो उत्तरदायी होता है और न ही उनमें उत्पन्न लाभों में भागीदार हो सकता है। ऐसी स्थिति में नये साझेदार के प्रवेश करने की तिथि पर सम्पत्तियों का पुनर्मूल्यांकन एवं दायित्वों का पुनर्निर्धारण करना तथा उन्हें पुस्तकों में वास्तविक मूल्य पर दिखलाना पुराने तथा नये साझेदारों के हित में होता है।
A.
नए लाभ-हानि विभाजन अनुपात में
B.
पुराने लाभ-हानि विभाजन अनुपात में
C.
त्याग के अनुपात में
D.
ख्याति के अनुपात में
Reserves and accumulated Profits/Loss पुराने साझेदारों में लाभ-विभाजन के अनुपात में अवश्य बाँटे जाएँगे, चाहे प्रश्न में कोई संकेत न हो।
A.
ए 1/2, बी 1/ 4, सी 1/4
B.
ए 1/3, बी 1/3, सी 1/3
C.
ए 3/8, बी 3/8, सी 3/8
D.
ए 2/1, बी 2/2, सी 2/3
जब नया साझेदार अपने भाग को पुराने साझेदारों से पुराने लाभ-विभाजन के अनुपात में प्राप्त करता है, इस स्थिति में नये साझेदार के लाभ का भाग दिया होता है तथा यह माना जाता है कि पुराने साझेदार शेष लाभ को अपने पुराने लाभ-विभाजन अनुपात में बाँटेगे। पुराने साझेदारों को आपस के अनुपात में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
A.
ख्याति खाते में
B.
नए हिस्सेदार के पूँजी खाते में
C.
उपर्युक्त में से कोई नहीं
D.
रोकड़ खाते में
इस स्थिति में ख्याति की राशि पुराने साझेदारों के पूँजी अथवा चालू खातों में त्याग अनुपात में बाँट दी जाएगी।
A.
ए और बी बराबर-बराबर देंगे।
B.
ए और बी अपने लाभ-विभाजन अनुपात में देंगे।
C.
ए और बी अपनी पूँजी के अनुपात में देंगे।
D.
उपर्युक्त में कोई नहीं।
जब नया साझेदार अपने भाग को पुराने साझेदारों से पुराने लाभ-विभाजन के अनुपात में प्राप्त करता है, इस स्थिति में नये साझेदार के लाभ का भाग दिया होता है तथा यह माना जाता है कि पुराने साझेदार शेष लाभ को अपने पुराने लाभ-विभाजन अनुपात में बाँटेगे। पुराने साझेदारों को आपस के अनुपात में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
A.
अधिलाभ को लाभ दर से गुणा
B.
औसत लाभ को लाभ दर से गुणा
C.
अधिलाभ को लाभ दर से भाग
D.
औसत लाभ को लाभ दर से भाग
इस विधि में सर्वप्रथम हम औसत लाभ ज्ञात करते हैं और फिर यह ज्ञात करते हैं कि सामान्य प्रतिफल की दर से इन औसत लाभों को अर्जित करने के लिए कितनी पूँजी की आवश्यकता होगी। ऐसी पूँजीं को औसत लाभों का पूँजीकृत मूल्य भी कहा जाता है।
समापन के समय दर्शाए गए रोकड़ और बैंक शेषों को, खोले गए नए रोकड़ या बैंक खाते लिखा में जाता है।
वसूली खाता एक नाममात्र(प्रकृति) का खाता है । तथा फर्म के समापन पर बनाया जाता है ।
संचय और संचित लाभों को साझेदारों के पूँजी खातों के क्रेडिट में हस्तांतरित करते हैं ।
देनदारों को उनके सकल मूल्य पर (देनदारों पर प्रावधान एवं संचय सहित) वसूली खाते के डेबिट में हस्तांतरित किया जाता है ।

साझेदारी फर्म के समापन से आशय, सभी साझेदारों के आपसी साझेदारी सम्बन्ध का विच्छेद होने के साथ साझेदारी व्यवसाय का बन्द होना है ।
चूँकि बैंक या रोकड़ शेष स्वंय तरल रुप में होते हैं, उनका नकदीकरण नहीं करना होता, अतः उन्हें वसूली खाते में हस्तांतरित नहीं किया जाता।
वसूली खाता एक नाममात्र खाता है।
फर्म के समापन पर सम्पत्तियों के विक्रय तथा दायित्वों के भुगतान से होने वाले लाभ-हानि को ज्ञात करने के लिए वसूली खाता बनाया जाता है।
फर्म के समापन पर साझेदारी का समापन आवश्यक है।
साझेदारी के समापन पर नहीं बल्कि फर्म के समापन पर व्यवसाय बन्द हो जाता है।
जब किसी भी साझेदार की पत्नी फर्म को कोई भी ऋण देती है तो हम इसका लेखा एक बाहरी दायित्व की तरह करते है। साझेदार की पत्नी के ऋण का भुगतान वसूली खाते में हस्तांतरण करके किया जायेगा ।
साझेदार द्वारा फर्म को दिए गए ऋण को वसूली खाते में हस्तांतरित नहीं करते हैं । इसका भुगतान सीधे ही रोकड़ या बैंक खाते के क्रेडिट में लेखा करके कर दिया जाता है ।
विघटन सम्बन्धी लेखे-
1. वसूली खाता
बनाना (संपत्तियों
एवं दायित्वों
के निपटारे
पर होने वाले लाभ-हानि का
निर्धारण करने के
लिए ।
2. पूँजी खाते बनाना (साझेदारों
की पूँजी का
निपटारा करने
के लिए) ।
3. रोकड़ खाता/बैंक खाता बनाना (आने और जाने वाले नकद
व्यवहारों
का लेखा रखने
के लिए)।
i. रोकड़
एवं बैंक शेष
ii. कृत्रिम
सम्पत्तियाँ
iii. लाभ-हानि
खाते का
डेबिट शेष
iv. साझेदारों
के ऋण और
पूँजी
v. संचय
vi. ऐसे
आयोजन जिनके
सम्बन्ध में
कोई दायित्व
नहीं है

|
साझेदारी का समापन |
फर्म का समापन |
|
|
1. सभी साझेदारों के बीच साझेदारी का टूटना । |
|
|
|
|
|
|
|
पुनर्मूल्यांकन खाता |
वसूली खाता |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
वसूली खाता
|
विवरण |
रु |
विवरण |
रु |
|
सभी परिसम्पत्तियां खाता |
|
सभी बाह्य दायित्व खाता |
|
|
(पुस्तक मूल्य) |
|
(पुस्तक मूल्य) |
|
|
(रोकड़ एवं बैंक के अतिरिक्त) |
|
रोकड़/बैंक खाता |
|
|
रोकड़/बैंक खाता |
|
(विभिन्न परिसम्पत्तियों के विक्रय |
|
|
(बाह्य दायित्वों के भुगतान पर) |
|
से वसूल राशि)। |
|
|
साझेदार का पूंजी खाता |
|
साझेदार का पूंजी खाता |
|
|
(साझेदार द्वारा दायित्व का |
|
(यदि परिसम्पत्ति साझेदार द्वारा |
|
|
भुगतान करने पर) |
|
ली गई) |
|
|
रोकड़/बैंक खाता |
|
साझेदार का पूंजी खाता |
|
|
(वसूली पर व्यय) |
|
(वसूली पर हानि का हस्तांतरण) |
|
|
साझेदार का पूंजी खाता |
|
|
|
|
(वसूली व्यय का भुगतान साझेदार |
|
|
|
|
द्वारा करने पर) |
|
|
|
|
साझेदार का पूंजी खाता |
|
|
|
|
(वसूली पर लाभ का हस्तांतरण) |
|
|
|
कभी-कभी कुछ परिसम्पत्तियां एसी भी होती हैं जिनका पूर्णतया पिछले वर्षो में अपलिखित किया जा चुका है अतः उनको स्थिति विवरण में नहीं दिखाया जाता है लेकिन प्रत्यक्ष मे वे परिचालन के लिए विद्यमान हैं। उदाहरण के लिए, एक पुराना कम्प्यूटर है जो कि अभी भी कार्य करने की स्थिति में है लेकन इसका बहियों में मूल्य शून्य है। इसी प्रकार कुछ दायित्व ऐसे होते हैं जिनको स्थिति विवरण में नहीं दिखाया गया है लेकिन ये अभी तक विद्यमान हैं। उदाहरण के लिए बैंक से भुनाए गए विपत्र, जिनका निरादरण हो जाता है लेकिन समापन पर फर्म द्वारा भुगतान के उद्देश्य से ले लिए जाते हैं।
A.
अभी अचुकता बकाया।
B.
अंशधारियों को देय राशि की एक मांग करना।
C.
अभी तक न मांगी गई राशि का अंशधारी द्वारा भुगतान।
D.
कम्पनी द्वारा पहले से मांगी गई राशि का अंशधारी द्वारा भुगतान।
अग्रिम याचना अर्थात अंशधारी द्वारा अग्रिम में चुकता ऐसी मांग जिसे कम्पनी द्वारा अभी तक नहीं मांगा गया है।
A.
3 वर्षों के भीतर।
B.
1 वर्ष के भीतर।
C.
6 माह के भीतर।
D.
120 दिनों के भीतर।
सेबी के दिशानिर्देशों के अनुसार, एक कम्पनी को आवेदन की तिथि से 12 माह के भीतर सम्पूर्ण राशि मांग लेनी होती है।
A.
अंशों की पुनर्खरीद।
B.
मांग राशि के गैर-भुगतान के कारण कम्पनी अंशों को वापस ले लेती है।
C.
अंशों को आवेदनों के अनुसार आवंटित नहीं किया गया।
D.
अंशधारियों के गलत व्यवहार के कारण कम्पनी अंशों को वापस ले लेती है।
अंशों का हरण अर्थात अंशों पर बकाया राशि के भुगतान नहीं होने पर कम्पनी द्वारा उन्हें वापस ले लेना।
A.
स्थायी सम्पत्तियों के विक्रय पर किसी भी प्रकार की हानि को समाप्त करने के लिए।
B.
ऋणपत्रों पर ब्याज के भुगतान के लिए।
C.
पूँजीगत व्ययों को समाप्त करने के लिए।
D.
लाभांश के भुगतान के लिए।
कम्पनी द्वारा प्रतिभूति संचय प्रीमियम खाते का उपयोग ऋणपत्रों के निर्गमन पर बट्टे तथा अंशों या ऋणपत्रों के शोधन पर प्रतिभूति प्रीमियम आदि जैसे पूँजीगत व्ययों को समाप्त करने के लिए किया जाता है।
A.
सम्पत्ति -- चालू सम्पत्तियाँ -- बैक रोकड़
B.
सम्पत्ति -- चालू सम्पत्तियाँ -- रोकड़ एवं रोकड़ समतुल्य
C.
सम्पत्ति -- रोकड़ एवं रोकड़ समतुल्यँ -- बैक रोकड़
D.
सम्पत्ति -- अन्य चालू सम्पत्तियाँ -- रोकड़ एवं रोकड़ समतुल्य
चिट्ठे में इस राशि को सम्पत्ति -- चालू सम्पत्तियाँ -- रोकड़ एवं रोकड़ समतुल्य के रूप में दिखाया जाता है। हालांकि लेखा नोट में रोकड़ एवं रोकड़ समतुल्य का विवरण दिया जाता है।
A.
हरण किये गये अंशों पर मांगी गई पूँजी से।
B.
हरण किये गये अंशों पर बकाया याचना से।
C.
हरण किये गये अंशों पर प्राप्त राशि से।
D.
दिये गये बट्टे से।
अंशों के हरण के समय अंश हरण खाते को हरण किये गये अंशों पर प्राप्त राशि से क्रेडिट किया जाता है।
A.
ब्याज।
B.
लाभांश।
C.
लाभ।
D.
कमीशन।
अंशधारी कम्पनी से लाभांश प्राप्त करते हैं। लाभांश की दर कम्पनी के लाभों पर निर्भर करती है।
A.
अंश हरण खाते में।
B.
प्रतिभूति प्रीमियम संचय खाते में।
C.
पूँजी संचय खाते में।
D.
अंशों के निर्गमन पर बट्टे खाते में।
हरण किये गये अंशों का पूनर्निगमन प्रीमियम पर किया गया, प्रीमियम की राशि को प्रतिभूति प्रीमियम संचय खाते में क्रेडिट किया जायेगा।
A.
नकद प्राप्तियों के लिए।
B.
सम्पत्तियों की खरीद के लिए।
C.
ऋणपत्रों के शोधन के लिए।
D.
लाभांश वितरण के लिए।
अंशों के निर्गमन से प्राप्तियाँ पूँजीगत प्राप्तियाँ होती हैं तथा इसे लाभांश के भुगतान के लिए उपयोग में नहीं लिया जा सकता है।
A.
अंशों के निर्गमन खाते में।
B.
निगमन व्यय खाते में।
C.
प्रवर्तकों के खाते में।
D.
समता अंश पूँजी खाते में।
कम्पनी के प्रवर्तन के लिए किये गये व्ययों को कंही भी नहीं दिखाया जाता है इसे निगमन लागत या निगमन व्यय खाते में दिखाया जा सकता है।
A.
चुकता मूल्य
B.
याचित मूल्य
C.
अंकित मूल्य
D.
सुरक्षित मूल्य
कम्पनी के अंशधारी का दायित्व उसके अंशों के अदत्त मूल्य तक ही सीमित होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी कम्पनी के एस अंश का अंकित मूल्य 10 रु है और यदि किसी अंशधारी ने पहले ही 8 रु चुका दिए हैं तो उससे 2 रु प्रति अंश से अधिक नहीं मँगाए जा सकते।
अंशों के हरण से आशय है कि आबंटन को रद्द करना तथा ऐसे अंशों पर प्राप्त राशि को जब्त किया हुआ समझना।
अंशो या ऋणपत्रों के अंकित मूल्य से निर्गमन मूल्य का आधिक्य, प्रतिभूति प्रीमियम कहलाता है।
जब अंशों का निर्गमन उनके अंकित मूल्य पर ही किया जाए जैसे रु 10 वाला अंश रु 10 में ही निर्गमित किया जाए तो यह अंशों का सम-मूल्य पर निर्गमन है।
सम्पत्ति के विक्रेता को क्रय प्रतिफल का भुगतान करने के लिए अथवा कम्पनी के प्रवर्तकों को उनकी सेवाओं के लिए कम्पनी द्वारा अंशों का सम-मूल्य पर निर्गमन है।
आबंटित अंशो पर आबंटन, प्रथम याचना, द्वितीय याचना आदि किस्तों की राशि को माँगा जाता है। जिन किस्तों पर कुछ अंशों की राशि प्राप्त नहीं होती है उन्हें बकाया याचना या अदत्त माँग कहते हैं।
कम्पनी द्वारा अंशधारियों से निर्गमित अंशो पर जितनी राशि माँगी जाती है उसे माँगी गई पूँजी कहते हैं।
प्रायः लोकप्रिय कम्पनियों में जितने अंशों के लिए आवेदन-पत्र आमंत्रित किए जाते हैं उनसे अधिक के लिए आवेदन पत्र आ जाते हैं। इस स्थिति को अधि-अभिदान कहते हैं।
अधिकृत पूँजी- यह कम्पनी की अधिकतम पूँजी होती है, जिससे अधिक अंश कम्पनी अपने जीवन में निर्गमित नहीं कर सकती। इस पूँजी का उल्लेख पार्षद-सीमा नियम में होता है।
कम्पनी के समामेलन के सम्बन्ध में किए गए व्यय, प्रारम्भिक व्यय कहलाते हैं।
A.
किसी साझेदार द्वारा लिखित सूचना देने पर
B.
किसी साझेदार की मृत्यु या दिवालिया हो जाने पर
C.
फर्म का व्यापार अवैध हो जाने पर
D.
उपर्युक्त में से कोई भी एक
निम्नलिखित परिस्थितियों में साझेदारी फर्म का समापन या अन्त हो सकता हैः (1) समझौते द्वारा समापन (2) अनिवार्य समापन (3) आकस्मिक घटनाओं के घटने पर समापन (4) सूचना द्वारा समापन (5) न्यायालय द्वारा समापन
A.
वसूली खाते के डेबिट पक्ष को हस्तांतरित किया जाएगा
B.
वसूली खाते के क्रेडिट पक्ष को हस्तांतरित किया जाएगा
C.
बीना के पूँजी खाते के डेबिट पक्ष को हस्तांतरित किया जाएगा
D.
बीना अनु और चरण को घ्यक्तिगत भुगतान कर रही है
फर्म बीना के ऋण का भुगतान उसके पूँजी खाते के डेबिट पक्ष में हस्तांतरित करके करेगी
A.
रु 81,000
B.
रु 71,000
C.
रु 64,700
D.
रु 62,900
(63,000 + 12,000) – 6000 + 7,800 = 64,700
A.
रु 69,200
B.
रु 71,000
C.
रु 64,700
D.
रु 62,900
77,000 – 2,000 – 4,000 – 6,300 = 64,700
A.
क्रेडिट रु 1,800
B.
क्रेडिट रु 2,700
C.
डेबिट रु 2,700
D.
डेबिट रु 2,400
10,500 – 300 – 2100 = 8,100 x 3/9 = 2,700
A.
रु 5,100
B.
रु 1,500
C.
रु 3,500
D.
रु 2,000
5000 x 70% = 3,500
A.
रु 38,000
B.
रु 36,500
C.
रु 36,575
D.
रु 39,500
50,000 – 10,000 = 40,000 40,000 – 2,000 (40,000 का 5%) = 38,000
A.
वसूली खाता
B.
साझेदारों का पूंजी खाता
C.
रोकड़ खाता
D.
उपरोक्त सभी
साझेदार के पूंजी खाते को क्रेडिट किया जाएगा क्योकि वह अपनी निजी सम्पत्ति फर्म के लेनदार को भुगतान स्वरुप देता है
A.
फर्म का समापन
B.
साझेदारी का समापन
C.
व्यवसाय का समापन
D.
उपरोक्त सभी
इससे आशय साझेदारों के मध्य वर्तमान ठहराव में परिवर्तन से है।
A.
साझेदारों के पूँजी खाते में
B.
वसूली खाते में
C.
रोकड़ खाते में
D.
साझेदारों के ऋण खाते में
वेवल वास्तविक सम्पत्तियाँ, जो बिक सकती है, वसूली खाते में हस्तांतरित की जाती हैं। यदि सम्पत्ति पक्ष में कृत्रिम सम्पत्तियाँ जैसे कि लाभ-हानि खाते का डेबिट शेष, स्थगित खर्चे जैसे, Advertisement Suspense A/c आदि हैं तो इन्हें हस्तांतरित नहीं किया जाता है क्योंकि इनके बदले नकद धनराशि प्राप्त नहीं हो सकती अर्थात ये बिक नहीं सकते।
A.
साझेदारों के पूँजी खाते में
B.
रोकड़ खाते के क्रेडिट में
C.
वसूली खाते के डेबिट में
D.
वसूली खाते के क्रेडिट में
ख्याति यदि सम्पत्तियों में दी हूई हो तो इसे भी अन्य सम्पत्तियों की तरह वसूली खाते के डेबिट में हस्तांतरित कर दिया जाता है।
A.
जबकि फर्म का व्यवसाय अवैध घोषित हो जाता है
B.
जब फर्म का एक साझेदार मर जाता है
C.
जम फर्म का एक साझेदार दिवालिया हो जाता है
D.
जम एक साझेदार अन्य साझेदारों की सहमति के बिना अपना अंश किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित कर देता है
निम्न दशाओं में एक फर्म का अनिवार्य समापन हो जाता हैः (1) जब फर्म के सभी साझेदार या एक साझेदार को छोड़कर शेष सभी साझेदार दिवालिया हो जाते हैं। (2) जब फर्म का व्यवसाय अवैधानिक हो जाता है।
A.
साझेदारों के पूँजी खाते
B.
वसूली खाता
C.
दायित्व खाता
D.
सम्पत्ति खाता
केवल तीसरे पक्ष को देय दायित्व ही वसूली खाते में हस्तांतरित किए जाते हैं। जैसे लेनदार, देय बिल, बाह्य ऋण, भविष्य निधि, अदत्त व्यय, साझेदार की पत्नी का ऋण आदि।
A.
लाभ-हानि खाता
B.
वसूली खाता
C.
साझेदार का पूँजी खाता
D.
रोकड़ खाता
यदि कोई साझेदार फर्म के समापन पर फर्म की किसु सम्पत्ति को लेता है तो इसके लिए उस साझेदार के पूँजी खाते को डेबिट तथा वसूली खाते को क्रेडिट किया जाता है।
A.
साझेदार का प्रवेश होने पर
B.
किसी साझेदार के अवकाश ग्रहण करने पर
C.
साझेदारी की अवधि समाप्त होने पर
D.
साझेदारी में हानि होने पर
साझेदारी फर्म के समापन का अर्थ है कि फर्म अपना व्यवसाय बन्द कर देती है और फर्म की समाप्ती हो जाती है। फर्म के समापन की दशा में लेखा पुस्तकें बन्द करनी पड़ती हैं। अतः फर्म के समापन पर साझेदारी का समापन भी अनिवार्य है।
A.
वसूली खाते में।
B. साझेदारों के पूँजी खाते में।
C. बैंक खाते में।
D. लाभ-हानि खाते में ।
क्योंकि लाभ-हानि का डेबिट शेष एक कृत्रिम सम्पत्ति है । तथा सभी कृत्रिम सम्पत्तियों को साझेदारों के पूँजी खातों के डेबिट में सीधा हस्तांतरित किया जाता है ।
A.
पुनर्मूल्यांकन खाता
B. वसूली खाता
C. बैंक खाता
D. पूँजी खाता
क्योंकि सबसे पहले सम्पत्तियों और दायित्वों खातों को हम बंद करते हैं , जो की वसूली खाते के द्वारा किया जाता है ।
A.
साझेदारों के पूँजी खाते में
B. देनदारों के खाते में
C. वसूली खाते में
D. डूबत ऋण खाते में
क्योंकि सभी सम्पत्तियों को पुस्तक मूल्य पर वसूली खाते में हस्तांतरित किया जाता है । इसलिए उन सम्पत्तियों से सम्बंधित आयोजनों को भी हम वसूली खाते में हस्तांतरित करते हैं ।
A.
लेनदारों के भुगतान के लिए ।
B. साझेदारों के ऋण भुगतान के लिए।
C. साझेदारों की पूँजी भुगतान के लिए।
D. साझेदारों के वेतन भुगतान के लिए।
क्योंकि नियमानुसार, वसूल हुई राशि से सबसे पहले भुगतान बाहरी लेनदारों को किया जाता है ।
A.
प्रतिनिधि व्यक्तिगत खाता।
B. व्यक्तिगत खाता।
C. वास्तविक खाता।
D. नाममात्र खाता ।
क्योंकि यह समापन पर हुई लाभ-हानि को जानने के लिए बनाया जाता है ।
सेवानिवृत/मृत साझेदार के उत्तराधिकारी फर्म की ख्याति में हिस्सा पाने के अधिकारी इसलिए हैं क्योंकि फर्म द्वारा अर्जित ख्याति सभी साझेदारों के भूत में किये प्रयासों का प्रतिफल है। सेवानिवत/मृत साझेदार फर्म को छोडकर जा रहा है, अतः उन्हें फर्म की ख्याति में हिस्सा पाने का अधिकार है।
किसी साझेदार के फर्म से अवकाश ग्रहण करने पर उसे देय ख्याति की राशि शेष बचे साझेदारों में लाभ-प्राप्ति अनुपात में वहन करेंगे। अतः ख्याति का समायोजन करने के लिए साझेदार के अवकाश ग्रहण करने पर फर्म की पुस्तकों में ख्याति का लेखा आवश्यक है।
जब शेष साझेदार उसी अनुपात में भविष्य में लाभ-हानि को बॉटने के लिए सहमत हो जाते हैं जो उनके मध्य अवकाश-ग्रहण से पूर्व था। इस स्थिति में लाभ-प्राप्ति अनुपात ज्ञात करने की आवश्यकता नहीं होती।
वह अनुपात जो किसी साझेदार के अवकाश ग्रहण करने या मृत्यु पर बचे हुए साझेदारों को प्राप्त होता है। लाभ-प्राप्ति अनुपात कहलाता है।
माना पिछले वर्ष कुल लाभ रु 1,25,000 है एवं साझेदार की पिछले वर्ष की समाप्ति के तीन महीने बाद मृत्यु हुई है तो तीन महीने का लाभ रु 31,250 होगा (रु 1,25,000 x 3/12) यदि मृतक साझेदार का लाभ में 2/10 भाग है तो मृत्यु की तिथि तक उसका भाग रु 6,250 होगा (रु 31,250 x 2/10)
यदि साझेदार की मृत्यु वर्ष के दौरान होती है तब मृतक साझेदार का उत्तराधिकारी, मृत्यु की तिथि तक अर्जित किए गए लाभ में उसके भाग का अधिकारी होगा। इस लाभ का निर्धारण निम्न में से किसी विधि द्वारा किया जाएगाः
(1) समय का आधार
(2) विक्रय या आवर्त आधार
हल
देय राशि = रु 1,52,000
राशि का तुरंत भुगतान = 1,52,000 x 40/100 = रु 60,800
तीन बराबर किश्तों की राशि = 1,52,000 – 60,800/3
= 91,200/3 = रु 30,400
पहली किश्त प्रथम वर्ष के समाप्त होने पर = 30,400 + 10,944
= रु 41,344
ब्याज 12 वार्षिक की दर से = 91,200 x 12/100
= रु 10,944
दूसरी किस्त, द्वितीय वर्ष के समाप्त होने पर = 30,400 + 7,296
= रु 37,696
ब्याज 12 वार्षिक की दर से = 60,800 x 12/100
= रु 7,296
तीसरी किस्त, तृतीय वर्ष के समाप्त होने पर = 30,400 + 3,648
= रु 34,048
12 वार्षिक की दर से ब्याज = 30,400 x 12/100
= रु 3,648