तड़ितझंझा एक विध्वंसक स्थानीय तूफान हैं, जो अल्प समय के लिए एवं अपेक्षाकृत कम क्षेत्रफल में गरज व बिजली उत्पन्न करते हैं, और बहुत ही आक्रामक होते हैं। तड़ितझंझा उष्णआर्द्र दिनों में प्रबल संवहन के कारण उत्पन्न होती हैं।
दाब-प्रवणता बल वायुमंडलीय दाब भिन्नता एक बल उत्पन्न करता है। दूरी के संदर्भ में दाब परिवर्तन की दर दाब प्रवणता है। समदाब रेखाओं के साथ दाब-प्रवणता बल एक घनिष्ट संपर्क है, जहाँ समदाब रेखाएँ पास-पास हों, वहाँ दाब प्रवणता अधिक व समदाब रेखाओं के दूर-दूर होने से दाब प्रवणता कम होती है।
उर्ध्वाधर दाब प्रवणता क्षैतिज दाब प्रवणता की अपेक्षा अधिक होती है। लेकिन, इसके विपरीत दिशा में कार्यरत गुरुत्वाकर्षण बल से यह संतुलित हो जाती है| इसीलिए, उर्ध्वाधर पवनें अधिक शक्तिशाली नहीं होती है ।
वायुमंडल के निचले भाग में वायुदाब ऊँचाई के साथ तीव्रता से घटता है। यह ह्रास दर प्रत्येक 10 मीटर की ऊँचाई पर 1 मिलीबार होता है। वायुमंडल के कुछ निश्चित ऊँचाई पर वायुमंडलीय औसत वायुदाब निम्नरूप होते हैं:
वायुदाब ऊँचाई के साथ घटता है। ऊँचाई पर वायुदाब भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होता है और यह विभिन्नता ही वायु में गति का मुख्य कारण है| वायु, हमेशा उच्च वायुदाब क्षेत्रों से कम वायुदाब क्षेत्रों की तरफ चलती हैं।
धरातल के निकट वायुदाब अधिक होता है और इसीलिए धरातल के निकट मे वायु सघन होती है | वायुदाब अधिक होने का कारण गुरुत्वाकर्षण बल है| वायुदाब को मापने के लिए पारद वायुदाबमापी अथवा निर्द्रव बैरोमीटर का प्रयोग किया जाता है।
माध्य समुद्रतल से वायुमंडल की अंतिम सीमा तक एक इकाई क्षेत्रफल के वायु स्तंभ के भार को वायुमंडलीय दाब कहते हैं।
वायुदाब को मापने की इकाई मिलीबार तथा पास्कल है। समुद्र तल पर औषत वायुमडंलीय दाब 1,013.2 मिलीबार या 1013.2 किलो पासकल होता है |
दक्षिणी गोलार्द्ध में 40° से 60° डिग्री अक्षांशों के मध्य, समुद्र की मात्रा अधिक और स्थल की मात्रा बहुत कम होते हैं, इसकी कारण, इस क्षेत्र में, पश्चिमी हवा बिना किसी रुकावट के खुले महासागरों पर अधिक बल तथा नियमितता से तीव्र गर्जन के साथ चलती है। इस पेटी में विक्षुब्ध सागर तथा वर्षायुक्त मौसम पाया जाता है। इसलिए, पश्चिमी हवा के इस क्षेत्र को तूफानी चालीसा कहा जाता है|
उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्धों में पछुवा तथा व्यापारिक पवनों की पेटियों के मध्य पायी जाने वाली उपोष्ण कटिबंधीय उच्चदाब पेटी जो सामान्यतः 30° उ. – 35° उ. और 30° द. 35° द. अक्षांशों के मध्य में स्थित होती है। मौसमी परिवर्तन के कारण यह पेटी सूर्य की स्थिति के अनुसार उत्तर और दक्षिण की ओर खिसकती रहती हैं। इस पेटी में प्रतिचक्रवातीय दशायें पायी जाती हैं जिससे वायुमंडल में स्थिरता आ जाती है और पवन संचार अत्यंत मंद हो जाता है। प्राचीनकाल में जब घोड़े से लदे हुए पाल से चलने वाले जलयान इस पेटी में प्रवेश करते थे, शांत तथा अनिश्चित दिशा वाली पवनों के कारण उनके संचालन में कठिनाइयाँ उपस्थित होती थीं और जलयान को हल्का करने के लिए कुछ घोड़ों (अश्वों) को सागर में फेंकना पड़ता था। इसी कारण से इस पेटी को ‘अश्व अक्षांश’ कहा जाने लगा।
विषुवत् वृत्त या उसके पास निम्न वायु दाब तथा आरोही वायु का क्षेत्र। ऊपर उठने वाली वायु धाराएं वैश्विक वायु अभिसरण तथा ताप जनित संवहन द्वारा यह क्षेत्र बनती हैं।
उच्च सूर्यातप व निम्न वायुदाब होने से अंतर-
उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (आईटीसिजेड) पर वायु संवहन धाराओं के रूप में उपर उठती है। उष्णकटिबंधों से आने वाली पवनें इस निम्न दाब क्षेत्र में अभिसरण करती हैं। अभिसरित वायु संवहन कोष्ठों के साथ उपर उठती हैं। यह क्षोभमंडल के उपर 14 कि.मी. की ऊँचाई तक उपर चढ़ती है और फिर ध्रुवों की तरफ प्रवाहित होती हैं। इसके परिणामस्वरूप लगभग 30° उत्तर व 30° दक्षिण अक्षांश पर वायु एकत्रित हो जाती है। इस एकत्रित वायु का अवतलन होता है और यह उपोष्ण उच्चदाब बनाता है। अवतलन का एक कारण यह है कि जब वायु 30° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांश पर पहुंचती है तो यह ठंडी हो जाती है। धरातल के निकट वायु का अपसरण होता है और यह विषुवत् वृत्त की ओर पूर्वी पवनों के रूप में बहती हैं। विषुवत् वृत्त के दोनों तरफ से प्रवाहित होने वाली पूर्वी पवनें अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (आई टी सी जेड) पर मिलती हैं।
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आक्रामक तूफान हैं जिनकी उत्पत्ति उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के महासागरों पर होती है| और ये तटीय क्षेत्रों की तरफ गतिमान होते हैं। ये चक्रवात आक्रामक पवनों के कारण विस्तृत विनाश, अत्यधिक वर्षा और तूफान लाते हैं। उष्ण कटिबंधीय चक्रवात, उष्ण कटिबंधीय महासागरों में उत्पन्न व विकसित होते हैं।
इनकी उत्पत्ति व विकास के लिए अनुवूफल स्थितियाँ हैं:
|
वायुराशि |
पवन |
|
1) तापमान तथा आर्द्रता संबंधी विशिष्ट गुणों वाली वायु को वायुराशि कहलाती है। |
1) पृथ्वी की सतह के समानांतर और क्षैतिज वहने वाली वायु को पवन कहते हैं| |
|
2) यह एक समान तापमान और आर्द्रता को दर्शाते हैं। |
2) यह एक वायु प्रणाली में तापमान और आर्द्रता में भिन्नता पायी जाती हैं। |
|
3) यह कई परतें होती हैं। |
3) यह पर अलग अलग परते नहीं पायी जाती हैं| |
|
4) यह विविध क्षेत्र में उत्पन्न होते है, जैसे की ध्रुवीय या उष्णकटिबंधीय और महाद्वीपीय या समुद्री के रूप में स्रोत क्षेत्र से संबंधित है। |
4) यह दबाव प्रणाली में बदलाव के कारण उत्पन्न होता है। |
A.
उत्तुंगता (Altitude)
B.
सामान्य ह्रास दर(Normal lapse rate)
C.
कोष्ण वायु संहतियों (Warm airmasses)
D.
महाद्वीपीयता (Continentality)
महाद्वीपीयतार: यह किसी महाद्वीप की जलवायु स्थिति और प्रभाव से सम्बन्धित होता है। किसी भी महाद्वीप के मध्य भाग का क्षेत्र समुद्री जलवायु से प्रभावित नहीं होता है। ऐसे क्षेत्रों में नमी की कमी होती हैं तथा ग्रीष्म व शीत ऋतु के तापमान में काफी अंतर होता है।
A.
पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमने से सम्बंधित है।
B.
सूर्य की किरणों का नति कोण से सम्बंधित है।
C.
ग्रीन हाऊस प्रभाव से सम्बंधित है।
D.
दिन की अवधि से सम्बंधित है।
पार्थिव विकिरण का निर्गामी अवशोषण ग्रीन हाऊस प्रभाव से सम्बंधित है। शेष कारक सूर्यातप में बदलाव के कारण हैं।
A.
नदी का बहाव
B.
उस स्थान की उत्तुंगता
C.
समुद्र तल से दूरी
D.
उस स्थान की अक्षांश रेखा
किसी भी स्थान पर वायु का तापमान निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रभावित होता हैः उस स्थान की अक्षांश रेखा; समुद्र तल से उस स्थान की उत्तुंगता; समुद्र से उसकी दूरी; वायु संहति का परिसंचरण; कोष्ण तथा ठंडी महासागरीय धाराओं की उपस्थिति; एवं स्थानीय कारक।
A.
किसी वस्तु के द्वारा परिवर्तित दृश्य प्रकाश का प्रतिशत है।
B.
दो क्षेत्रों के बीच तापमान का अंतर है।
C.
आने वाला सौर विकिरण है।
D.
वायुमंडल में जल वाष्प का प्रतिशत है।
एल्बिडो, पृथ्वी या किसी भी खगोलीय पिंड की किसी भी सतह को प्राप्त होने वाली सूर्यातप की मात्रा एवं उसी सतह से परावर्तित की जाने वाली मात्रा के बीच का अनुपात है। सौर विकिरण की इस परावर्तित मात्रा को एल्बिडो कहते हैं।
A.
विषुवत वृत्त
B.
23.50 उत्तर
C.
23.50 दक्षिण
D.
66.50 उत्तर
21 जून को जब सूर्य कर्क रेखा (23.50 उत्तर) के एकदम ऊपर होता है, उत्तरी गोलार्ध में वह दिन सबसे लंबा व रात सबसे छोटी होती है। यहाँ इस दिन सबसे अधिक गर्मी होती है क्योंकि सूर्य की किरणें यहाँ एकदम लम्बवत पड़ती हैं।
दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध में स्थलीय भाग अधिक होने के कारण, तापमान के दो कारक - भूसंहती और समुद्र धारा के प्रभाव उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे ज्यादा तथा स्पस्ट होते है|
सौर विकिरण की जो प्रतिशत किसी वस्तु या माध्यम के द्वारा अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती है, सौर विकिरण की उस मात्रा को पृथ्वी का एल्बिडो कहते हैं। ।
‘उपसौर’ (पेरिहेलियन) स्थिति में 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य से सबसे निकट अर्थात् 14 करोड़, 70 लाख किलोमीटर दूर होती है।
पृथ्वी और सूर्य के बीच दूरी सबसे कम होते हैं, इस स्थित को ‘उपसौर’ (पेरिहेलियन) कहा जाता है|
पृथ्वी और सूर्य के बीच सबसे ज्यादा दूरी की स्थिति को अपसौर(एफेलिओन) कहा जाता है।
सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 4 जुलाई को सूर्य से सबसे दूर अर्थात् 15 करोड़, 20 लाख किलोमीटर दूर होती है।
समताप रेखा एक काल्पनिक रेखा है, जो पृथ्वी के समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ती हैं| तापमान के वितरण को मानचित्रों पर दर्शाने के लिए इसी समताप रेखा का इस्तेमाल किया जाता है |
पृथ्वी एवं सूर्य के बीच की दूरी में अंतर के कारण ही प्रतिवर्ष वायुमंडल की ऊपरी सतह पर प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा में थोड़ा परिवर्तन होता है|
पृथ्वी औसत रूप से वायुमंडल की ऊपरी सतह पर1.94 कैलोरी/प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रतिमिनट ऊर्जा प्राप्त करती है।
पृथ्वी भू-आभ है। जिसके कारण पृथ्वी पर सौर विकिरण अक्षांश के आधार पर जैसे की - भूमध्य रेखा से क्रमश: उत्तर एवं दक्षिण अक्षांश में सौर विकिरण धीरे-धीरे तिरछी हो जाती है, फलत: पृथ्वी सौर ऊर्जा के बहुत कम अंश को ही प्राप्त कर पाती है।
प्लैंक का नियम बताता है कि एक वस्तु जितनी गर्म होगी वह उतनी ही अधिक ऊर्जा का विकिरण करेगी और उसकी तरंग दैर्ध्य उतनी लघु होगी।
ठंडी और गर्म हवायें तापमान की क्षैतिज वितरण को प्रभावित करते हैं। गर्म हवाएँ तापमान को बड़ा देता है जबकि ठंडी हवाएँ तापमान कम कर देता है।
सामान्यत: उच्चाई बढ़ने से तापमान घटते है, जिसे सामान्य ह्रास दर कहा जाता हैं| वायुमंडल की इस घटना की ठीक विपरीत घटना जैसे की उच्चाई बढ़ने से तापमान घटे बिना अगर बढ़ता जाता है अर्थात बढ़ती ऊंचाई के साथ तापमान बढ़ता है, तब उस घटना को तापमान का व्यूत्क्रमण कहा जाता है|
इस घटना के कारण पृथ्वी की सतह बहुत तेजी से ठंडा हो जाते है और इसके फलस्वरूप, वायुमंडल में एक शांत, ठंड और सर्दियों की रात में स्पष्ट आकाश की उपस्थिति पाए जाते हैं।
i. समताप रेखाएँ अक्षांशों के साथ-साथ जा सकते हैं , लेकिन संपूर्ण रूप से अक्षांश के समानांतर नहीं हो सकते।
ii. सतह और जल के किनारों में इसे अचानक विचलित होने की प्रवृत्ति देखा जाती है |
iii. वे निश्चित एवं समान दूरी में दर्शाएँ जाते हैं, जो अक्षांशीय तापीय ढाल को प्रदर्शित करता है।
पृथ्वी के पृष्ठ पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा का अधिकतम अंश लघु तरंगदैध्र्य के रूप में आता है। पृथ्वी को प्राप्त होने वाली ऊर्जा को ‘आगामी सौर विकिरण’ या छोटे रूप में ‘सूर्यातप’(इन्सोलेशन) कहते हैं।.
तापमान के वितरण दो प्रकार के होते हैं|
i. क्षेतिज वितरण (जल का सतह का तापमान)
ii. उर्द्धाधर वितरण (जल का गहराई का तापमान)
वायुमंडलीय ताप उच्चाई के साथ सम्पर्कित होते हैं| सामान्यतः समुद्र तल के पास के स्थानों पर तापमान अधिक तथा समुद्रतल से जितने ऊपर के ओर चलते है, वायु के तापमान उतने ही कम होता जाता है। मुख्यतः प्रति 1000 मीटर उच्चाई से 6.4° सेल्सिअस घटते जाते है| वायु के ह्रास होने की इसी अनुपात को सामान्य ह्रास दर कहा जाता है|
अभिवहन वायु के तापन एवं शीतलन का एक अन्यतम तरीका है|
अभिवहन : वायु के क्षैतिज संचलन से होने वाला ताप का स्थानांतरण अभिवहन कहलाता है। मध्य अक्षांशों में दैनिक मौसम में आने वाली भिन्नताएँ केवल अभिवहन के कारण होती हैं। उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में, विशेषतः उत्तरी भाग में गर्मियों में चलने वाली स्थानीय पवन लू इसी अभिवहन का ही परिणाम है।
वायुसंहति: स्थलीय एवं समुद्री समीरों की तरह वायु संहतियाँ भी तापमान को प्रभावित करती हैं। कोष्ण वायु संहतियों से प्रभावित होने वाले स्थानों का तापमान अधिक एवं शीत वायुसंहतियों से प्रभावित स्थानों का तापमान कम होता है।
जनवरी के महीने में सूर्य किरने अनुलाम्बी या उर्द्धस्थ रहती हैं, जिसे दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन लम्बे और गर्म मौसम की स्थितियाँ हो जाती हैं| इसकी विपरीत उत्तरी गोलार्द्ध में जनवरी में सर्द मौसम, छोटे दिन अनुर निम्न कोणीय सूर्य जैसी परिस्थितिया रहती हैं | समताप रेखा सामान्यत: भूमध्य रेखा के समानांतर पूर्व-पश्चिम की तरफ अभिमुख रहती है, भूमध्य रेखा से दूर आपतन में कमी आने की ओर संकेत करती है|
पृथ्वी की सतह पर प्राप्त विकिरण की मात्रा में भिन्नता पाई जाती है। पृथ्वी के कुछ भागों में विकिरण संतुलन में अधिशेष पाया जाता है, परंतु कुछ भागों में ऋणात्मक संतुलन होता है।
निचे के चित्र में पृथ्वी वायुमंडल-तंत्र के शुद्ध विकिरण में अक्षांशीय भिन्नता को दर्शाया गया है। यह चित्र दर्शाता है कि शुद्ध विकिरण में अधिशेष 40° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों में अधिक है, परंतु ध्रुवों के पास कमी पाई जाती है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों से ताप ऊर्जा ध्रुवों की ओर पुनर्वितरण होता है फलस्वरूप उष्णकटिबंध ताप संचयन के कारण बहुत अधिक गर्म नहीं होता है और न ही उच्च अक्षांश अत्यधिक कमी के कारण पूरी तरह जमे होते हैं।
i. मानचित्र पर दर्शाएँ गयी रेखाओं को समताप रेखा कहते है|
ii. ये समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ती है।
iii. यह मानचित्र जनवरी तथा जुलाई में होने वाले धरातल पर वायु के तापमान के वितरण को दर्शाता है।
किसी भी स्थान पर वायु का तापमान निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रभावित होता हैः
अक्षांश: किसी भी स्थान का तापमान उस स्थान द्वारा प्राप्त सूर्यातप पर निर्भर करता है। सूर्यातप की मात्रा अक्षांश के अनुसार परिवर्तित होती है। भूमध्य रेखा पर सुर्यातप अधिक और इस रेखा के क्रमश उत्तर और दक्षिण में तापमान घटता रहता है |
उच्चाई: वायुमंडल पार्थिव विकिरण द्वारा नीचे की परतों में पहले गर्म होता है। यही कारण है कि समुद्र तल के पास के स्थानों पर तापमान अधिक तथा समुद्रतल से ऊपरी या ऊँचे भाग में स्थित स्थानों पर तापमान कम होता रहता है। साधारण शब्दों में तापमान सामान्यतः उच्चाई बढ़ने के साथ घटता है, जैसे की – प्रति 1000 मीटर उच्चाई से 6.4° सेल्सिअस घटता है|
समुद्र से दूरी: किसी भी स्थान के तापमान को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक समुद्र से उस स्थान की दूरी है। स्थल की अपेक्षा समुद्र धीरे-धीरे गर्म और धीरे-धीरे ठंडा होता है। स्थल जल्दी गर्म और जल्दी ठंडा होता है। इसलिए समुद्र के ऊपर स्थल की अपेक्षा तापमान में भिन्नता कम होती है। समुद्र के निकट स्थित क्षेत्रों पर समुद्र एवं स्थली समीर का सामान्य प्रभाव पड़ता है और तापमान सम रहता है।
महासागरीय धाराएं: महासागरों के सतह का तापमान ठंडी और गर्म महासागरीय धारायों से प्रभावित होते हैं| ठंडी महासागरीय धारा के प्रभाव के अंतर्गत आने वाले समुद्र तटों की अपेक्षा गर्म महासागरीय धारा के प्रभाव में आने वाले तटों का तापमान अधिक होता है।
पृथ्वी एक निश्चित मात्रा मे सूर्य ताप प्राप्त करती है और विकिरण द्वारा ऊष्मा अन्तरिक्ष मे लौटा देती है l सूर्यातप की इस आदान-प्रदान के द्वारा पृथ्वी एक स्थिर तापक्रम बनाये रखती है l यही पृथ्वी का उष्मा बजट अथवा उष्मा संतुलन है। मान लें कि वायुमंडल की ऊपरी सतह पर प्राप्त सूर्यातप 100 प्रतिशत है। l मोटे तौर पर 35 इकाइयाँ अन्तरिक्ष मे परावर्तित कर दी जाती है, यहाँ तक कि पृथ्वी की सतह पर पहुँचने से पूर्व ही 27 इकाइयाँ मेघों के शिखर से परावर्तित कर दी जाती है और 2 इकाईयां पृथ्वी के हिम और बर्फ आच्छादित क्षेत्रों से, जबकि 6 इकाइयाँ पृथ्वी की स्वयं की परतों से परावर्तित कर दी जाती है l परावर्तन की विकरित मात्रा को पृथ्वी का एल्बिडो कहा जाता है l शेष 65 इकाईयां अवशोषित कर ली जाती हैं, 14 इकाईयां वायुमंडल मे ही और 51 इकाईयां पृथ्वी की सतह द्वारा l इनमे से 17 इकाईयां अन्तरिक्ष मे प्रत्यक्ष रूप से विकरित की जाती हैं और शेष 34 इकाईयां वायुमंडल द्वारा अवशोषित होती है l 48 इकाईयां वायुमंडल द्वारा अवशोषित होती है (14 इकाईयां सूर्यताप से+34 इकाईयां पार्थिव विकिरण से) पुनः अन्तरिक्ष मे विकरित कर दी जाती है l इस प्रकार कुल विकिरण, जो पृथ्वी और वायु मंडल से क्रमशः होता है, 17+48=65 इकाईयां है, जो सूर्य से प्राप्त 65 इकाईयों का संतुलन करता हैl इसे पृथ्वी का ऊष्मा बजट कहा जाता है l
वायुमंडल के गर्म और ठंडा होने के प्रमुख तरीकों में शामिल हैं : चालन, संवहन, अभिवहन एवं पार्थिव विकिरण |
चालन: प्रवेशी सौर विकिरण से गर्म होने के बाद पृथ्वी सतह के निकट स्थित वायुमंडलीय परतों में दीर्घ तरंगों के रूप में ताप का संचरण करती है, पृथ्वी के संपर्क में आने वाली वायु धीरे-धीरे गर्म होती है। निचली परतों के संपर्क में आने वाली वायुमंडल की उपरी परतें भी गर्म हो जाती हैं। इस प्रक्रिया को चालन कहा जाता है।
संवहन: पृथ्वी के संपर्क में आई वायु गर्म होकर धाराओं के रूप में लंबवत् उठती है और वायुमंडल में ताप का संचरण करती है। वायुमंडल के लम्बवत् तापन की यह प्रक्रिया संवहन कहलाती है।
अभिवहन: वायु के क्षैतिज संचलन से होने वाला ताप का स्थानांतरण अभिवहन कहलाता है। मध्य अक्षांशों में दैनिक मौसम में आने वाली भिन्नताएँ केवल अभिवहन के कारण होती हैं। उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में, विशेषतः उत्तरी भाग में गर्मियों में चलने वाली स्थानीय पवन लू इसी अभिवहन का ही परिणाम है।
पार्थिव विकिरण: पृथ्वी स्वयं गर्म होने के बाद एक विकिरण पिंड बन जाती है और वायुमंडल में दीर्घ तरंगों के रूप में उर्जा का विकिरण करने लगती है। यह उर्जा वायुमंडल को नीचे से गर्म करती है। इस प्रक्रिया को ‘पार्थिव विकिरण कहा जाता है।
पृथ्वी के पृष्ठ पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा का अधिकतम अंश लघु तरंग दैर्घ्य के रूप में आता है। पृथ्वी को प्राप्त होने वाली ऊर्जा को ‘आगमी सौर विकिरण’ या संक्षेप्त में ‘सूर्यातप’ (ईन्सोलेशान) कहते हैं।
सूर्यातप की तीव्रता की मात्रा प्रतिदिन, हर मौसम और प्रति वर्ष परिवर्तित होता रहता है। सूर्यातप में होने वाली विभिन्नता के कारक हैं:
सूर्यातप की मात्रा को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक - किरणों का नति कोण है। यह किसी स्थान के अक्षांश पर निर्भर करता है। अक्षांश जितना उच्च होगा अर्थात् ध्रुवों की ओर किरणों का नति कोण उतना ही कम होगा। अतएव सूर्य की किरणें तिरछी पड़ेगी। तिरछी किरणों की अपेक्षा सीधी किरणें कम स्थान पर पड़ती हैं। किरणों के अधिक क्षेत्र पर पड़ने के कारण ऊर्जा वितरण बड़े क्षेत्र पर होता है तथा प्रति इकाई क्षेत्र को कम ऊर्जा मिलती है। इसके अतिरिक्त तिरछी किरणों को वायुमंडल की अधिक गहराई से गुज़रना पड़ता है। अतः अधिक अवशोषण, प्रकीर्णन एवं विसरण के द्वारा ऊर्जा का अधिक ह्रास होता है।
A.
उष्ण वाताग्र
B.
अचर वाताग्र
C.
शीत वाताग्र
D.
अधिविष्ट वाताग्र
जब शीतल वायु उष्ण वायुराशियों की ओर विस्थापित होती है तो इस संपर्क क्षेत्र को को शीत वाताग्र कहते हैं।
A.
ऊष्णकटिबंधी चक्रवात
B.
बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात
C.
वाताग्र
D.
स्थानीय पवनें
वे प्रणालियाँ, जो उष्ण कटिबंध से दूर, मध्य व उच्च अक्षांशों में विकसित होती हैं, उन्हें बहिरूष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहते हैं।
A.
उष्ण वाताग्र
B.
शीत वाताग्र
C.
अधिविष्ट वाताग्र
D.
प्रतिचक्रवात
यदि एक वायुराशि पूर्णतः धरातल के ऊपर उठ जाए तो ऐसे वाताग्र को अधिविष्ट वाताग्र कहते हैं।
A.
शीत वाताग्र
B.
अचर वाताग्र
C.
उष्ण वाताग्र
D.
अधिविष्ट वाताग्र
जब वाताग्र स्थिर हो जाता है तो इन्हें अचर वाताग्र कहा जाता है।
A.
चक्रवात
B.
वायुराशि
C.
प्रतिचक्रवात
D.
मानसून
तापमान, आर्द्रता, दाब संबंधी विशिष्ट गुणों वाली वायु, वायुराशि कहलाती है।
A.
वाताग्र
B.
स्थानीय पवनें
C.
मौसमी पवनें
D.
चक्रवात
जब दो भिन्न प्रकार की वायुराशियाँ मिलती हैं तो उनके मध्य सीमा क्षेत्र को वाताग्र कहते हैं। वाताग्रों के बनने की प्रक्रिया को वाताग्र-जनन कहते हैं।
A.
स्थानीय पवनें
B.
मौसमी पवनें
C.
भूमंडलीय पवनें
D.
आवर्ती पवनें
मानसून स्थानीय पवनें होती हैं जिनकी उत्पत्ति विषुवतीय क्षेत्रों में होती है और यहाँ से दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर विस्थापित हो जाती हैं।
A.
एक शक्तिशाली पवन
B.
पीरू के तट पर गर्म धाराएं
C.
प्रशांत महासागर का जल
D.
अटलांटिक महासागर में गर्म जल
एल-निनो घटना का प्रशांत महासागर और आस्ट्रेलिया के वायुदाब परिवर्तन से गहरा संबंध है।
A.
चक्रवाती परिसंचरण
B.
प्रतिचक्रवात
C.
चिनूक
D.
व्यापारिक पवनें
निम्न दाब क्षेत्र के चारों तरफ पवनों का परिक्रमण चक्रवाती परिसंचरण कहलाता है।
A.
पवन की दिशा
B.
पवन की गति
C.
पवन का दाब
D.
पवन का वेग
घर्षण बल पवनों की गति को प्रभावित करता है। यह धरातल पर सर्वाधिक होता है और इसका प्रभाव प्रायः धरातल से 1 से 3 कि॰मी॰ ऊँचाई तक होता है।
A.
दाब प्रवणता बल
B.
घर्षण बल
C.
कोरिऑलिस बल
D.
घर्षण एवं दाब प्रवणता बल
वह बल जिसके प्रभाव से पवनें उत्तरी गोलार्ध में अपनी मूल दिशा से दाहिने तरफ व दक्षिण गोलार्ध में बाईं तरफ विक्षेपित हो जाती हैं, कोरिऑलिस बल होता है।
A.
वायु स्तंभ
B.
जलस्तंभ (Water spouts)
C.
लौह स्तंभ
D.
हरिकेन
समुद्र पर टोरनेडो को जलस्तंभ (Water spouts) कहते हैं। टोरनेडो सामान्यतः मध्य अक्षांशों में उत्पन्न होते हैं।
A.
समान तापमान वाली रेखाएँ
B.
समान वायुदाब वाली रेखाएँ
C.
समान ऊँचाई वाली रेखाएँ
D.
समान वर्षा वाली रेखाएँ
समदाब रेखाएँ वे रेखाएँ हैं जो समुद्र तल से एक समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती हैं।
A.
ताप-मापक यंत्र
B.
आर्द्रतामापी
C.
वायुदाबमापी
D.
आइसोबार
वायुदाब
को मापने के
लिए
वायुदाबमापी
का प्रयोग
किया जाता
है। इसके दो
प्रकार पारद
और निर्द्रव
हैं।
A.
वायु के भार के रूप में
B.
समुद्रतल से वायुमंडल की अंतिम सीमा तक एक इकाई क्षेत्रफल के वायु स्तंभ के भार के रूप में
C.
वायुमंडलीय गैसों के रूप में
D.
जल के भार के रूप में
समुद्रतल से वायुमंडल की अंतिम सीमा तक एक इकाई क्षेत्रफल के वायु स्तंभ के भार को वायुमंडलीय दाब कहते हैं। वायुमंडलीय दाब को मिलीबार और पास्कल की इकाइयों में व्यक्त किया जाता है।
A.
विस्तार के कोण
B.
अक्षांश के कोण
C.
देशांतर के कोण
D.
झुकाव के कोण
कोरिऑलिस बल के प्रभाव से पवनें उत्तरी गोलार्ध में अपनी मूल दिशा से दाहिने तरफ व दक्षिण गोलार्ध में बाईं तरफ विक्षेपित हो जाती हैं। जब पवनों का वेग अधिक होता है, तब विक्षेपण भी अधिक होता है। कोरिऑलिस बल अक्षांशों के कोण के सीधा समानुपात में बढ़ता है।
A.
हरीकेन
B.
टाइफून
C.
विली-विलीज
D.
मानसून
ये चक्रवात हिंद महासागर में ‘चक्रवात’ अटलांटिक महासागर में ‘हरीकेन’ के नाम से, पश्चिम प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में ‘टाइफून’ और पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ‘विली-विलीज’ के नाम से जाने जाते हैं।
A.
घर्षण बल
B.
गुरुत्वाकर्षण बल
C.
कोरिआलिस बल
D.
दाब प्रवणता प्रभाव
पृथ्वी के धरातल पर क्षैतिज पवनें तीन संयुक्त प्रभावों का परिणाम है: दाब प्रवणता प्रभाव, घर्षण बल, तथा कोरिआलिस बल। गुरुत्वाकर्षण बल पवनों को नीचे की और प्रवाहित करता है।
A.
गर्म वाताग्र
B.
ठंडा वाताग्र
C.
उष्ण वाताग्र
D.
प्रतिचक्रवात
जब गर्म वायुराशियाँ आक्रामक रूप में ठंडी वायुराशियों के ऊपर चढ़ती हैं तब उष्ण वाताग्र का निर्माण होता है।
A.
संवहन धाराओं के रूप में निचे आती है।
B.
संवहन धाराओं के रूप में धुर्वों की और बहती है।
C.
संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती है।
D.
तट के समानान्तर बहती हैं।
उच्च सूर्यातप व निम्न वायुदाब होने से अंतर- उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) पर वायु संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती है।
चिनूक एक गर्म हवा हैं, जोकि सयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में रॉकी पर्वत के पूर्वी ढलान की ओर बहती है| इस हवा के आगमन से तापक्रम मे अचानक बढ़ने लगती है, जिसके फलस्वरुप धरातल पर बर्फ अचानक पिघलने लगती है। इस कारण इस पवन को हिमभक्षी भी कहते हैं।
उत्तरी भारत के मैदानों में बहनेवाले गर्म और शुष्क हवा को लू के नाम से जाना जाता है।
वाताग्र चार प्रकार के होते हैं:
i. शीत वाताग्र
ii. उष्ण वाताग्र
iii. अचर वाताग्र
iv. अधिविष्ट वाताग्र
कोरिआँलिस बल अक्षांशों के कोण के सीधा समानुपात में बढ़ता है। यह ध्रुवों पर सर्वाधिक और विषुवत् वृत्त पर अनपुस्थित होता है |
पृथ्वी की सतह से ऊपर की दिशा में होने वाले परिसंचरण और इसके विपरीत दिशा में होने वाले परिसंचरण को कोष्ठ कहते हैं। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में ऐसे कोष्ठ को हेडले कोष्ठ कहा जाता है।
जब दो भिन्न प्रकार की वायुराशियाँ मिलती हैं तो उनके मध्य सीमा क्षेत्र को वाताग्र कहते हैं। वाताग्रों के बनने की प्रक्रिया को वाताग्र-जनन कहते हैं।
जब अवरोही पवन पवनविमुख ढालों पर नीचे उतरती हैं, तब यह शुष्क पवनें रूद्धोष्म प्रक्रिया से गर्म हो जाती हैं। और इसी शुष्क एवं उष्ण हवा को रूद्धोष्म वायु कहते हैं| ये शुष्क हवाएँ कम समय में बर्फ पिघला सकती हैं।
ओजोन परत रिक्तीकरण के लिए मुख्य कारण हैं:
1. क्लोरो फ्लोरो कार्बन (सीएफसी) की खपत में वृद्धि हुई है।
2. उद्योगों की रासायनिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से प्रवाहित रासायनिक प्रदूषण या उत्पादन।
3. नाइट्रोजन के आक्साइड की उपस्थिति जैसे सुपरसोनिक विमान से प्रसारित नाइट्रिक ऑक्साइड और उर्वरकों से नाइट्रेट का कृषि के क्षेत्र में इस्तेमाल किया।
वायुमंडल पृथ्वी की सतह के लिए एक कंबल के रूप में कार्य करता है। यह सूर्य से आने वाले लघु तरंग विकिरण के लिए पारदर्शी है और इस तरह उन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुँचने की अनुमति देता है। तथापि यह पृथ्वी की सतह से परिलक्षित लंबी लहर विकिरणों से अपारदर्शी है। इस प्रकार इस ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण से पृथ्वी की गर्मी संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
ओजोन छिद्र कम या बिलकुल न के बराबर ओजोन के साथ ओजोन परत के एक भाग से संदर्भित है। पहले ओजोन परत के पतले होने पर संदेह 1970 में हुआ था। जब यह पाया गया था कि 1987 में अंटार्कटिक महाद्वीप के ऊपर ओजोन में 50-100% की कमी आई थी। वर्तमान में ओजोन छिद्र अंटार्कटिका के पूरे महाद्वीप से भी बड़ा है और लगातार आकार में बढ़ रहा है। एक और ओजोन छिद्र आर्कटिक क्षेत्र और तिब्बत के पठार में अधिक पाया गया है। ओजोन परत की कमी दक्षिणी ध्रुव पर मोटी है, जबकि यह उत्तरी ध्रुव पर गंभीर है।
यह ध्रुवो पर 9 से 10 किमी है और भूमध्य रेखा पर 16 से 18 किलोमीटर है। इसकी वजह भूमध्य रेखा और ध्रुवो पर प्राप्त आतपन की राशि का अंतर है। जब भूमध्य रेखा अधिक आतपन होता है तब तापमान बढ़ जाता है और हवा ऊपरकी ओर बढ़ जाती है और धाराऍ विशाल ऊंचाईयो तक परतों को धकेलती है। ध्रुव आतपन की कम राशि प्राप्त करते है, जिससे तापमान कम रहता है और यह उतरती हुई हवा है इसीलिए ऊंचाई ध्रुवो में कम है।
हमारा वातावरण पानी वाष्प और धूल के कणों के साथ-साथ कई गैसों का मिश्रण है। हमारे वातावरण में मौजूद तीन प्रमुख गैसें हैं:
1. नाइट्रोजन: इसने वातावरण के सबसे बड़े अनुपात का गठन किया है, वातावरण की कुल मात्रा का 78.03% इसमे शामिल है और 128 किलोमीटर की ऊंचाई तक फैली हुई है।
2. ऑक्सीजन: इसे "जीवन दाता गैस" के रूप में जाना जाता है, गैसों की कुल मात्रा का 20.99% शामिल है। यह अनिवार्य रूप से सांस लेने और ईंधन के जलने के लिए आवश्यक है। यह 16 किमी की तक ऊंचाई तक वातावरण में ही सीमित है।
3. कार्बन डाइऑक्साइड: यह भारी गैस 32 किलोमीटर की ऊंचाई तक वायुमंडल की निचली परतों तक ही सीमित है और गैसों की कुल मात्रा का केवल 0.03% शामिल है। यह सबसे जरूरी गैस वनस्पति के विकास और ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करने के लिए आवश्यक है।
A.
शिमला का उत्तर में दूर स्थित होना है।
B.
शिमला की समुद्र तल से ऊँचाई अमृतसर की तुलना में अधिक होना है।
C.
शिमला का विषुवत वृत्त से दूर होना है।
D.
इनके देशांतर का भिन्न होना है।
शिमला अमृतसर की तुलना में अधिक ठंडा है क्योंकि अधिक ऊँचाई पर होने के कारण यह तापमान कम हो जाता है। सामान्य ह्रास दर प्रति 1,000 मीटर की ऊँचाई बढ़ने पर 6.5° सेल्सियस है।
A.
पार्श्व तापन है।
B.
लंबवत् तापन है।
C.
सूर्यातप के द्वारा वायुमंडल का तापन है।
D.
इसमें से कोई नहीं है।
पृथ्वी के संपर्क में आई वायु गर्म होकर धाराओं के रूप में लंबवत् उठती है और वायुमंडल में ताप का संचरण करती है। वायुमंडल के लम्बवत् तापन की यह प्रक्रिया संवहन कहलाती है।
A.
वायुमंडल के क्षैतिज तापन
B.
वायुमंडल के लम्बवत तापन
C.
पृथ्वी के संपर्क में आने वाली वायु धीरे-धीरे गर्म होने
D.
तापन प्रक्रिया
चालन तभी होता है जब असमान ताप वाले दो पिंड एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं। गर्म पिंड से ठंडे पिंड की ओर ऊर्जा का प्रवाह चलता है।
A.
अधिक
गर्म होता है
कोष्ण
महासागरीय
धाराएं गल्फ
स्ट्रीम तथा
उत्तरी
अटलांटिक
महासागरीय
ड्रिफ्ट की
उपस्थिति से
उत्तरी
अटलांटिक
महासागर
अधिक गर्म
होता है तथा
समताप
रेखायें
उत्तर की तरफ
मुड़ जाती हैं।
विषुवत
वृत्त पर
प्राप्त
होता है। B.
उष्णकटिबंधी
क्षेत्रों
में प्राप्त
होता है। C.
उपोष्ण
कटिबंधीय
मरुस्थलों में
प्राप्त
होता है। D.
ध्रुवों
पर प्राप्त
होता है।
सबसे
अधिक
सूर्यातप
उपोष्ण
कटिबंधीय
मरुस्थलों
पर प्राप्त
होता है, क्योंकि
यहाँ
मेघाच्छादन
बहुत कम पाया
जाता है।
पृथ्वी
पर जनवरी एवं
जुलाई के बीच
सर्वाधिक तापांतर
यूरेशिया
महाद्वीप के
उत्तरी
पूर्वी क्षेत्र
में पाया
जाता है, जो लगभग
60° से॰
है।
पृथ्वी
का अपने अक्ष
पर घूमना B.
सूर्य
की किरणों का
नति कोण C.
ग्रीन
हाऊस प्रभाव D.
दिन
की अवधि
पार्थिव
विकिरण का
निर्गामी
अवशोषण
ग्रीन हाऊस
प्रभाव से
सम्बंधित
है।
जब
पृथ्वी
सूर्य के
सबसे निकट
होती है। B.
जब
पृथ्वी
सूर्य से
सबसे दूर
होती है। C.
ग्रीन
हाऊस प्रभाव D.
उपरोक्त
में से कोई
नहीं।
प्रत्येक
वर्ष 4 जुलाई
को पृथ्वी
सूर्य से 15.2 करोड़
किलोमीटर
दूर होती है।
पवनें
होती हैं। B.
वर्षण
होता है। C.
शिलावृष्टि
होता है। D.
ऋतुएँ
होती हैं।
भूतल
पर दबाव में
भिन्नता का
कारण पवनें
होती हैं।
पवन
की दिशा से
होता है। B.
सौर
विकिरण से
होता है। C.
वर्षण
से होता है। D.
निरपेक्ष
आर्द्रता से
होता है।
पृथ्वी
को प्राप्त
होने वाली
ऊर्जा को ‘आगमी
सौर विकिरण’ या
छोटे रूप में ‘सूर्यातप’
कहते
हैं।
वायुमंडल
कहलाता है। B.
क्षोभमंडल
कहलाता है। C.
समतापमंडल
कहलाता है। D.
अंतरिक्ष
कहलाता है।
पृथ्वी
चारों ओर से
वायु से घिरी
हुई है। वायु
का यह आवरण ही
वायुमंडल है,
जो
बहुत-सी
गैसों से बना
है। इन गैसों
में
मानव
एवं जंतुओं
के लिए
ऑक्सीजन और
पादपों के लिए
कार्बन डाई
ऑक्साइड
जैसी
जीवनदायिनी
गैसें शामिल
हैं।
पृथ्वी
एवं सूर्य के
बीच की दूरी
में अंतर के कारण
होती है। B.
पृथ्वी
से निकलने
वाली अधिक
ऊष्मा के
कारण होती
है। C.
वायुमंडल
में अधिक
तापन के कारण
होती है। D.
क्षोभमंडल
की पतली परत
के कारण होती
है।
सूर्य
की किरणें
वायुमंडल के
ऊपरी भाग पर
तिरछी पड़ती
है, जिसके
कारण पृथ्वी
सौर ऊर्जा के
बहुत कम अंश को
ही प्राप्त
कर पाती है।
अक्षांशों
के समानांतर
होती हैं। B.
अक्षांशों
के समानांतर
नहीं होती
हैं। C.
अक्षांशों
के लम्बवत
होती हैं। D.
अक्षांशों
के तिरछे
होती हैं।
20°
सेल्सियस, 10°
सेल्सियस
एवं 0°
सेल्सियस की
समताप
रेखायें
क्रमशः 35°
दक्षिण 45°
दक्षिण तथा 60°
दक्षिण के
समानांतर
पाई जाती
हैं।
जुलाई
में समताप
रेखायें
प्रायः
अक्षांशों के
समानांतर
चलती हैं।
4.7
करोड़
किलोमीटर
होती है। B.
14.7
करोड़
किलोमीटर
होती है। C.
44.7
करोड़
किलोमीटर
होती है। D.
9.47
करोड़
किलोमीटर
होती है।
3 जनवरी
को पृथ्वी
सूर्य से
सबसे निकट (14 करोड़,
70 लाख
किलोमीटर
दूर) होती है।
इस स्थिति को ‘उपसौर’
कहा
जाता है।
4
अगस्त B.
4
जनवरी C.
4
जुलाई D.
4 मार्च
सूर्य
के चारों ओर
परिक्रमण के
दौरान
पृथ्वी 4 जुलाई
को सूर्य से
सबसे दूर (15 करोड़, 20 लाख
किलोमीटर
दूर) होती है।
पृथ्वी की इस
स्थिति को
अपसौर कहा
जाता है।
पृथ्वी की सतह के छोटे से मध्यम इलाकों या भू-खंडो को भू-आकृतियां कहा जाता है। कई संबंधित भू-आकृतियाँ एक साथ परिदृश्य और पृथ्वी की सतह के बड़े इलाकों का निर्माण करती है। भू-आकृतियां एक बार गठित होने के बाद धीरे-धीरे या तेजी से अपने आकृति, आकार और प्रकृति में परिवर्तन भू-आकृतिक प्रक्रियाओं और कारको की निरंतर कार्रवाई के कारण कर सकती हैं। भू-आकृतियों के विकास के परिवर्तन के चरणों में या तो पृथ्वी की सतह का एक हिस्सा एक स्थालाकृति से दूसरी में या अलग-अलग आकृतियों में उनका परिवर्तन जब वे एक बार गठित हो चुके हो शामिल हैं। प्रत्येक और हर भूभाग कुछ परिवर्तन और समय गुजरने के साथ विकास का अनुभव करता है। उनके भी अपने जीवन काल में विकास के चरण होते है - जैसे युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था और उनके आकृति, आकार और प्रकृति धीरे धीरे या तेजी परिवर्तित भू-आकृतिक प्रक्रियाओं और कारको के निरंतर कार्रवाई करने के कारण हो। उच्च ऊंचाई के क्षेत्रों में पहाड़ों पर और ध्रुवीय क्षेत्रों में उच्च अक्षांशों पर तापमान आमतौर पर शून्य से नीचे रहता है। यहां वर्षा बर्फ के रूप में वर्षा के बजाय होती है। जब बर्फबारी की दर बर्फ पिघलने की दर से भी अधिक होती है, तब बर्फ का एक बड़ा हिस्सा जम जाता है। ताजा नरम बर्फ ठोस हो जाती है जब यह लंबे समय तक वही रहती है तो संकुचित और बारीक बर्फ हो जाती है। यह बर्फ दबाव और गुरुत्वाकर्षण से ढलान पर नीचे धीरे धीरे चलती है और इसे ग्लेशियर के रूप में जाना जाता है। इन दिनो अतीत के ग्लेशियरों की तुलना में महाद्वीपीय ग्लेशियर या भारी बर्फ की चादर में छोटी होती हैं। ग्लेशियर पहले उत्तरी यूरोप के बड़े क्षेत्रों, एशिया और उत्तरी अमेरिका के उत्तरी आधे भाग में फैले थे। आज ये अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में पाए जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार, वर्तमान में बर्फ का आवरण केवल शायद ही एक-तिहाई है जो 10,000 साल पहले था। दुनिया की सबसे बड़ी महाद्वीपीय बर्फ की चादर अंटार्कटिका है जो 13 लाख वर्ग किमी और 4267 मीटर की अधिकतम मोटाई का क्षेत्र है। यह देखा गया है कि एक ग्लेशियर में बर्फ की आवाजाही असमान है। बर्फ के ऊपरी हिस्सा उसके नीचे की तुलना में तेजी से चलता है और केंद्र में बर्फ भी ग्लेशियर के साथ नीचे की तुलना में तेजी से चलती है। ग्लेशियर की असमान गति के एक परिणाम के रूप में बर्फ का टूटना दरारो का कारण बनता है जो 'दरारों' के रूप में जाना जाता है। दरारे यात्रियों के लिए खतरनाक हैं जब ये ताजा बर्फ से छिपी हो क्योकि वे बहुत गहरी हो सकती है। ड्रमलिन कम चौड़ी पहाड़ी का एक असामान्य प्रकार हैं जो एक औंधा नाव या लंबाई में एक आधा अंडे के विभाजन के आकार जैसा दिखता है। वे अक्सर समूहों में पाए जाते हैं और 'अंडे स्थलाकृति की टोकरी' के रूप में जाना जाता है। ड्रमलिन गोलाकार चिकनी मिट्टी की और लम्बी छोटी पहाड़ियाँ हैं जिनके लंबे भाग हिमनद के प्रवाह की दिशा के समानांतर होते हैं। जहाँ ये जमा होते है ड्रमलिन एक छोटे टीले से एक पहाड़ी के रूप में 2 किलोमीटर में लंबे और 90 मीटर तक ऊँचे होते हैं। वे अक्सर उत्तरी आयरलैंड, विस्कॉन्सिन (यूएसए) और फिनलैंड में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। अंतस्थ हिमोढ़ - हिमनद के अंतिम भाग में मलबे के निक्षेप से बनी लंबी कटके हैं। पाशर्विक हिमोढ़ - यह घाटी की दीवार वेफ समानांतर निर्मित होते हैं। तलस्थ हिमोढ़ - यह अव्यवस्थित रूप से छोड़े गए परत के रूप में घाटी हिमनद है। मध्यस्थ हिमोढ़ - यह हिमनद घाटी के केंद्र में पाये जाते है।SOLUTION
A.
SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: ASOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
PreviousNext