कीमत
और मांग में
विपरीत
संबंध होने
के कारण मांग
वक्र नीचे की
ओर ढालू होता
है। इसे निम्न
चित्र में
दिखाया गया
है:

उपरोक्त चित्र मेंOP2पर मांग की मात्राOQ2है। OP1कीमत पर, वस्तुओं के लिए मांग OQ2से बढ़करOQ1 हो जाती है। जब कीमतOP1 सेकम होकरOP हो जाती है तो मांग की मात्राOQ1सेबढ़करOQहो जाती है।
इस प्रकार, हम देखते है कि कीमत कम होते ही मांग बढ़ती जाती है। इस आधार पर हमें नीचे की ओर ढालू मांग वक्रDDप्राप्त होता है।
कीमत और मांग के बीच एक विपरीत संबंध होता है क्योंकि जैसे ही कीमत बढ़ती है, वैसे ही उपभोक्ता अपनी सीमित आय से वस्तु की कम इकाइयां खरीद पाने में सक्षम होंगे। उसी तरह से, जैसे ही कीमत कम होती है वैसे ही उपभोक्ता अपनी सीमित आय से वस्तु की अधिक इकाइयां खरीद पाने में सक्षम होंगे। इसलिए, मांग वक्र हमेशा प्रतिकूल रूप से ढालू होता है।
अतिरिक्त पूर्ति एक ऐसी स्थिति है जहां पूर्ति मांग की तुलना में अधिक है जिसे नीचे स्पष्ट किया गया है:

जब कीमत
बाजार
संतुलन में
उस बिंदु पर
होता है जहां
मांग पूर्ति
के बराबर
होती है। इसे
निम्न
चित्र की
सहायता से
दिखाया गया
है:

चित्र
में, कीमत कोX- अक्ष पर
दिखाया गया
है और मात्रा
कोY- अक्ष
पर दिखाया
गया है। DDमांग
वक्र है।SS पूर्ति
वक्र है। जब
मांग वक्रDD पूर्ति
वक्रSSको
काटता है, तब
परस्पर
कटान बिंदु
को संतुलन
बिंदु के रूप
में जाना
जाता है। जहां
उपभोक्ता
द्वारा
मांगी गयी
मात्रा
बाजार में
पूर्ति की
गयी मात्रा
के बराबर
होती है वहां
परE संतुलन
बिंदु होता
है।
संतुलन कीमत तथा मात्रा पर मांग में वृद्धि की अपेक्षा पूर्ति में वृद्धि का प्रभाव अधिक इस प्रकार पड़ेगा:

उपरोक्त आरेख में
बाजार मात्रा
संतुलन कीमत और मात्रा पर मांग और पूर्ति दोनों में हुई एक समान वृद्धि का प्रभाव इस प्रकार होगा:

उपरोक्त आरेख में
जब मांग वक्र
मांग और पूर्ति दोनों में एक समान वृद्धि की दशा में
इसलिए हम ऊपर से कह सकते हैं कि जब वस्तु की मांग और पूर्ति में एक साथ समान वृद्धि होती है
(1) संतुलन कीमत से अधिक किसी भी कीमत पर, एक वस्तु की पूर्ति मात्रा मांग की मात्रा से अधिक होती है। इसे अतिरिक्त पूर्ति की स्थिति कहा जाता है। विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होने से कीमत में गिरावट के कारण अतिरिक्त पूर्ति होती है। कीमत में गिरावट के कारण मांग का विस्तार और पूर्ति का संकुचन होता है। कीमत में गिरावट तब तक जारी रहती है जब तक कि यह संतुलन कीमत पर नहीं पहुंचता है जिस पर मांग की मात्रा पूर्ति की मात्रा के बराबर होती है।
(2) संतुलन कीमत सेकमकिसी भी कीमत पर, एकवस्तुकी मांग की मात्रापूर्ति की मात्रासे अधिक होती है।इसे अतिरिक्त मांग की एक स्थिति कहा जाता है। क्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होने से बाजार कीमत ऊपर उठने के कारण अतिरिक्त मांग होती है। कीमत में वृद्धि के कारण मांग का विस्तार और पूर्ति का संकुचन होता है। कीमत में वृद्धि तब तक जारी रहती है जब तक कि यह संतुलन कीमत पर नहीं पहुंचती है जिस पर मांग की मात्रा पूर्ति की मात्रा के बराबर होती है।
बाजार में उपभोक्ताओं द्वारा वस्तुओं की मांग की जाती है। ऊंची कीमत पर मांग कम होती है और कम कीमत पर मांग अधिक होती है। उसी तरह से
अतिरिक्त मांग की स्थिति तब होती है जब मांग पूर्ति से अधिक होती है। पूर्ति के संबंध में अतिरिक्त मांग होने के कारण

जब कीमत
इसे अतिरिक्त मांग के रूप में जाना जाता है और त्रिभुज
A.
नई फर्मों का कठिन प्रवेश
B.
बहुत सारे विक्रेता
C.
निकट स्थानापन्न वस्तुएं
D.
इनमें से कोई नहीं
एकाधिकार एक ऐसी बाजार स्थिति होती है, जिसमें एक अकेली फर्म, बड़ी संख्या में खरीदारों को वस्तुओं या सेवाओं का विक्रय करती है, क्योंकि उनके द्वारा उत्पादित वस्तु का कोई नजदीकी स्थानापन्न उलपब्ध नहीं होता है।
अल्पाधिकारएक ऐसी बाजार संरचना है जिसमें एक उद्योग में कुछ ही फर्में होती हैं, जो कि सजातीय अथवा बहुत निकट भिन्नता वाले उत्पादों का उत्पादन करती हैं।यहाँ उत्पाद का मूल्य निर्धारण करते समय अथवा फर्म द्वारा कोई प्रस्ताव किये जाते समय, अन्य विरोधी फर्मों की अपेक्षित प्रतिक्रिया को ध्यान में रखा जाता है।
A.
निकट स्थानापन्न वस्तु का होना
B.
भारी विक्रय लगत
C.
कीमत नेता का होना
D.
इनमें से कोई नहीं
एकाधिकार की तुलना मैं पूर्ण प्रतिस्पर्धा मैं माँग वक्र के अधिक लोचदार होनी का क्या कारण है निकट स्थानापन्न वस्तु का होना ।
यहाँ उत्पाद का मूल्य निर्धारण करते समय अथवा फर्म द्वारा कोई प्रस्ताव किये जाते समय, अन्य विरोधी फर्मों की अपेक्षित प्रतिक्रिया को ध्यान में रखा जाता है।
A.
बड़ी फर्मों की छोटी संख्या
B.
क्रेताओं के मध्य पूर्ण ज्ञान
C.
फर्मों का अनिर्धारणीय माँग वक्र
D.
गैर-कीमत प्रतियोगिता
अल्पाधिकारएक ऐसी बाजार संरचना है जिसमें एक उद्योग में कुछ ही फर्में होती हैं, जो कि सजातीय अथवा बहुत निकट भिन्नता वाले उत्पादों का उत्पादन करती हैं। यहाँ उत्पाद का मूल्य निर्धारण करते समय अथवा फर्म द्वारा कोई प्रस्ताव किये जाते समय, अन्य विरोधी फर्मों की अपेक्षित प्रतिक्रिया को ध्यान में रखा जाता है।
A.
इकाई
लोचदार होती
है
B. लोचदार होती है
C. बेलोचदार होती है
D. इनमें से कोई नहीं
जब एक एकाधिकार कीमत विभेद को अपनाता है तो उस बाज़ार में कीमत अधिक होगी जहाँ माँग बेलोचदार होती है|
A.
एकाधिकार की स्थिति में
B.
अल्पाधिकार की स्थिति में
C.
पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में
D.
इनमें से कोई नहीं
पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में AR= MR होता है|
A.
केवल
समरूपी होते
हैं
B. विज्ञापन आधारित समरूपी होते हैं
C. केवल विभेदी होते हैं
D. विज्ञापन आधारित विभेद होते हैं
एकाधिकार एक ऐसी बाजार स्थिति होती है, जिसमें एक अकेली फर्म, बड़ी संख्या में खरीदारों को वस्तुओं या सेवाओं का विक्रय करती है, क्योंकि उनके द्वारा उत्पादित वस्तु का कोई नजदीकी स्थानापन्न उलपब्ध नहीं होता है। एकाधिकार के अंतर्गत फर्म का कीमत पर पूर्ण नियंत्रण होता है|
A.
एकाधिकार
B.
द्वैदाधिकार
C.
अल्पाधिकार
D.
इनमें से कोई नहीं
अल्पाधिकारएक ऐसी बाजार संरचना है जिसमें एक उद्योग में कुछ ही फर्में होती हैं, जो कि सजातीय अथवा बहुत निकट भिन्नता वाले उत्पादों का उत्पादन करती हैं।
A.
लोचदार होगा
B.
इकाई से कम लोचदार होगा
C.
इकाई से अधिक लोचदार होगा
D.
अनंत लोचदार होगा
एक एकाधिकारी प्रतिस्पर्धाफर्म का मांग वक्र, नजदीकी स्थानापन्न की उपलब्धता के कारण एकाधिकार फर्म की तुलना में अधिक लोचदार होता है।
एकाधिकार के अंतर्गत एक फर्म दीर्घकाल में भी, असामान्य लाभ अर्जित कर सकती है|
A.
फर्म प्रचलित कीमत पर कितनी भी मात्रा बेच सकती है
B.
फर्म प्रचलित कीमत पर एक निर्धारित मात्रा बेच सकती है
C. सभी फर्में एक वस्तु की समान मात्रा बेचेंगे
D.
फर्में अपने उत्पाद में विभिन्नता ला सकती है
यदि एक फर्म का माँग वक्र क्षैतिज सरल रेखा है तो फर्म प्रचलित कीमत पर कितनी भी मात्रा बेच सकती है|
A.
एक विक्रेता तथा क्रेताओं की बड़ी संख्या
B.
कीमत पर पूर्ण नियंत्रण
C.
प्रवेश और निकासी की स्वतंत्रता
D.
माँग वक्र का ढलान नीचे की ओर होना
एकाधिकारी प्रतियोगिता बाज़ार और एकाधिकार बाज़ार दोनों में माँग वक्र का ढलान नीचे की ओर होती है |
A.
कीमत पर
पूर्ण
नियंत्रण
होना
B. माँग वक्र क्षैतिज सरल रेखा होना
C. प्रवेश तथा निकासी की स्वतंत्रता
D. विक्रय लागतों का अधिक होना
एकाधिकार प्रतियोगिता में उत्पादक बिना किसी बाधा के बाजार में प्रवेश कर सकते हैं व बाहर जा सकते हैं।
A.
पूर्ण प्रतियोगिता
B.
एकाधिकार
C.
अल्पाधिकार
D.
इनमें से कोई नहीं
अल्पाधिकार बाज़ार व्यापार-गुट के लिए अनुकूल है| अल्पाधिकारएक ऐसी बाजार संरचना है जिसमें एक उद्योग में कुछ ही फर्में होती हैं, जो कि सजातीय अथवा बहुत निकट भिन्नता वाले उत्पादों का उत्पादन करती हैं।
A.
कीमत
पर आंशिक
नियंत्रण
होता है
B.
कीमत पर पूर्ण नियंत्रण होता है
C.
कीमत पर कोई नियंत्रण नहीं होता है
D.
इनमें से कोई नहीं
एकाधिकार एक ऐसी बाजार स्थिति होती है, जिसमें एक अकेली फर्म, बड़ी संख्या में खरीदारों को वस्तुओं या सेवाओं का विक्रय करती है, क्योंकि उनके द्वारा उत्पादित वस्तु का कोई नजदीकी स्थानापन्न उलपब्ध नहीं होता है। एकाधिकार के अंतर्गत फर्म का कीमत पर पूर्ण नियंत्रण होता है|
एक ही वस्तु के लिए विभिन्न क्रेताओं से भिन्न-भिन्न कीमतें वसूल करना कीमत विभेद कहलाता है|
A.
कीमत
तथा माँग में
कोई संबंध
नहीं
B. कीमत तथा माँग के बीच में धनात्मक संबंध
C. कीमत तथा माँग के बीच विपरीत संबंध
D. इनमें से कोई नहीं
एक एकाधिकारी फर्म का मांग वक्र नीचे की ओर ढालू होता है, जो संकेत देता है कि मूल्य कम करके अधिक मात्रा का विक्रय किया जा सकता है।
एक एकाधिकारी फर्म का मांग वक्र नीचे की ओर ढालू होता है, जो संकेत देता है कि मूल्य कम करके अधिक मात्रा का विक्रय किया जा सकता है।
A.
एकाधिकार
B.
पूर्ण प्रतियोगिता
C.
एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता
D.
अल्पाधिकार
पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में, बाज़ार में किसी वस्तु के क्रेता और विक्रेता काफ़ी अधिक मात्रा में होते हैं और वह समांगी या समरूप वस्तुएँ बनाते हैं| उद्योग कीमत निर्माता तथा फर्म कीमत प्राप्तकर्ता या स्वीकार होते हैं|
दोनों प्रकार के बाजार के ऋणात्मक प्रवणता वाले मांग वक्र होते हैं लेकिन एकाधिकार की तुलना में क्रेताओं और विक्रेताओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति के कारण एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा का मांग वक्र अधिक लोचदार होता है।
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा के अंतर्गत, फर्में अलग अलग उत्पादों को बेचती हैं और प्रत्येक फर्म अपने उत्पाद के ब्रांड पर एकाधिकार शक्तियों का लाभ उठाती है।
'Oligo' का अर्थ है कुछ और 'poly' का अर्थ है विक्रेता।अल्पाधिकार एक ऐसे बाजार स्वरूप को दर्शाता है जिसमें कुछ बड़े विक्रेता बहुत सारे क्रेताओं को नजदीकी स्थानापन्न वस्तुएं बेच रहे हैं।
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा के अंतर्गत, बहुत सी फर्में नजदीकी स्थानापन्न वस्तुओं को बेचती है। ट्रेड मार्क या ब्रांड नामों के द्वारा वस्तुओं में अंतर किया जाता है।
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में एकाधिकार और पूर्ण प्रतिस्पर्धा दोनों की विशेषता होती है।
कार्टेल प्रतिस्पर्धा से बचने के लिए अल्पाधिकार जैसे बाजार के अंतर्गत फर्मों के बीच एक औपचारिक कपटपूर्ण समझौता होता है।
A.
उधार सम्पत्ति खरीदना
B.
नकद सम्पत्ति खरीदना
C.
स्वामी द्वारा व्यवसाय से रू निकालना
D.
कर्मचारियों द्वारा हड़ताल कर देना
कर्मचारियों द्वारा हड़ताल कर देना लेखा की पुस्तकों में रिकार्ड नहीं होगा क्योंकि इसको मुद्रा में नहीं मापा जा सकता है।
A.
अंशधारी
B.
सरकार,
C.
लेनदार
D.
ये सभी।
लेखांकन सूचनाऐं ऐसे बहुत से पक्षकारों द्वारा उपयोग की जाती है। जिनका व्यावसायिक संस्था से संबंध है। वह इन सूचनाओं का उपयोग अपनी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए करते हे। इन उपयोगकर्ताओं को दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है (i) आतंरिक उपयोगकर्ता, एवं (ii) बाह्य उपयोगकर्ता
A.
रू 10,000 की लकडी खरीदना
B.
रू 20,000 का सोफा सैट अपने घर ले जाना
C.
रू 2,000 का घरेलू फर्नीचर बेचना
D.
रू 15,000 की डाइनिंग टेबल मित्र को उपहार में देना
क्योंकि घनश्याम ने घरेलू फर्नीचर बेचा है इसका व्यवसाय से कोई लेना-देना नहीं है।
A. देय विपत्र
B.
लेनदार
C.
अदत्त व्यय
D.
उपरोक्त सभी
चालू दायित्व – ऐसे दायित्व जिनका भुगतान निकट भविष्य में (सामान्यतः एक वर्ष के अन्दर) ही करना है उन्हें चालू दायित्व कहते हैं जैसे बैंक अधिविकर्ष, देय विपत्र, लेनदार, न चुकाये गए व्यय, अल्पकालीन ऋण आदि।
दोहरा लेखा प्रणाली में प्रत्येक लेन-देन को दो पक्षों में लिखा जाता है- पहला ऋणी दूसरा धनी l
वह व्यक्ति अथवा संस्था जिसे दूसरों से धन लेना होता है लेनदार कहलाता है l
लागत लेखांकन, वित्तीय लेखांकन, प्रबंधकीय लेखांकन,कर लेखांकन
संपत्ति के दो उदाहरण- स्टॉक, मशीनरी l
वित्तीय लेखांकन की दो विशेषताएं-
व्यवसाय की आर्थिक स्थिति का ज्ञान करवाना
भावी योजनाओं के निर्माण में सहायक होना
वित्तीय वर्ष की अवधि १ अप्रैल से ३१ मार्च की होती है l
वह अवधि जिसमें व्यवसायी व्यवसाय के सम्बन्ध में लाभ, हानि तथा वित्तीय स्थिति ज्ञात कर सके l यह अवधि एक वर्ष की होती है l
लेखा पुस्तकों में केवल व्यावसायिक लेनदेनों को अभिलेखित किया जाता है।
(1) वित्तीय व्यवहारों को प्रारम्भिक लेख-पुस्तकों में लिखना, तथा
(2) प्रारम्भिक लेखा-पुस्तकों से खाता बही में पोस्टिंग करना एवं खातों का शेष ज्ञात करना।
दायित्व
फर्म द्वारा
बाह्य
पक्षों
उदाहरण के
लिए लेनदारों, बैंक
अधिविकर्ष, देय विपत्र
आदि से उधार
ली गयी राशि
होती है।
जबकि
पूँजी वह धन
या धन की कीमत
(कच्चा माल, भूमि, भवन
आदि) होती है
जो व्यवसाय
में स्वामी
द्वारा
विनियोजित
की जाती है।
इसकी गणना
सम्पत्तियों
के उपर बाह्य
दायित्वों
के रूप में की
जा सकती है।
दायित्व
फर्म द्वारा
बाह्य
पक्षों
उदाहरण के
लिए
लेनदारों, बैंक
अधिविकर्ष, देय विपत्र
आदि से उधार
ली गयी राशि
होती है।
जबकि
पूँजी वह धन
या धन की कीमत
(कच्चा माल, भूमि, भवन
आदि) होती है
जो व्यवसाय
में स्वामी
द्वारा
विनियोजित
की जाती है।
इसकी गणना
सम्पत्तियों
के उपर बाह्य
दायित्वों
के रूप में की
जा सकती है।
बिक्री बढाने या धन वसूल करने के उद्देश्य से ग्राहकों को वास्तविक मूल्य से कम मूल्य पर वस्तुओं का विक्रय करना कटौती या छूट कहलाता है l
दोहरा लेखा प्रणाली के अंतर्गत व्यापारिक लाभ हानि तथा आर्थिक स्थिति की जानकारी के लिए एक लम्बी प्रक्रिया का अनुपालन करना पड़ता है केवल प्रारम्भिक लेखों से यह संभव नहीं होता प्रारम्भिक लेखों की खतौनी तथा लाभ-हानि खाता और आर्थिक चिट्ठा तैयार करने के बाद ही लाभ हानि का निर्धारण हो पाता है इसलिए यह एक जटिल प्रक्रिया है l
लागत लेखांकन से उपभोक्ताओं को लाभ -
· सस्ती वस्तुओं की प्राप्ति
· मूल्यों में स्थिरता
· नवीनतम वस्तुओं की प्राप्ति
प्रबंधकीय
लेखाविधि की
सीमाएं
· अत्यधिक
व्ययशील
प्रणाली है
· ऐसे
व्यक्तियों
पर आधारित है
जो आंकड़ों को
विश्लेषित
कर तथा
प्रबंधकों
के लिए
सम्प्रेषित
करते हैं
· वित्तीय
तथा लागत
लेखंकानो पर
आधारित होती
है इसलिए
उनकी सीमाओं से
वंचित नहीं
है
वित्तीय
लेखांकन के
कार्य
· व्यवसाय
के
स्वामियों तथा
कर्मचारियों
के लिए
महत्वपूर्ण
सूचनाएँ
प्रदान करना
· विभिन्न
व्यावसायिक कानूनों के
लिए आवश्यक
विवरण तैयार करना
· कर
दायित्व का
निर्धारण
करना
· व्यापार
की समस्त
संपत्तियों एवं दायित्वों
की सूचना प्रदान करना
फर्मों के बीच परस्पर निर्भरता का स्तर बहुत अधिक होती है। एक फर्म की कीमत और उत्पादन नीति प्रतिस्पर्धी फर्मों की कीमत और उत्पादन नीति को प्रभावित करती है।
एकाधिकारी प्रतियोगिता के अंतर्गत AR और MRदोनों वक्र बायें से दायें नीचे की ओर ढालू होते हैं।MR वक्रAR वक्र के नीचे होता है।
'निर्बाध प्रवेश और बहिर्गमन' का अर्थ है कि एक व्यक्ति स्वतंत्र रूप से बाजार में प्रवेश कर सकता है और बाजार से बाहर जा सकता है। यह पूर्णत: प्रतिस्पर्धी बाजार की महत्वपूर्ण विशेषता है।
एकाधिकार, एकाधिकारी, अल्पाधिकार आदि गैर-प्रतिस्पर्धी बाजार हैं।
एक विक्रेता और बहुत सारे क्रेता एकाधिकार बाजार संरचना का लक्षण है।
बाजार संरचना दो प्रकार की हो सकती है- प्रतिस्पर्धी बाजार और गैर प्रतिस्पर्धी या प्रतिस्पर्धारहित बाजार।
पूर्ण प्रतिस्पर्धा के अंतर्गत फर्म का मांग वक्र X- अक्ष के समानांतर अर्थात् पूर्णत: लोचदार होता है।
बाजार वर्गीकरण के लिए दो आधार हैं:
अ) क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या
ब) वस्तु की प्रकृति
पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत कोई विक्रय लागत नहीं होती है क्योंकि सभी फर्में उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत पर समरूप वस्तुओं को बेचती है। उद्योग कीमत निर्धारक है और फर्म कीमत स्वीकारक है।
पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत, प्रत्येक और हर इकाई एक ही कीमत पर बेची जाती है। इसलिए, इस प्रकार के बाजार में:
AR = MR = कीमत।
भारत में रेलवे पर सरकार का एकाधिकार है। टूथपेस्ट, जूतों आदि के लिए बाजार एकाधिकारात्मक बाजार का एक उदाहरण है।
अल्पाधिकार बाजार की विशेषताएं-
1. अल्पाधिकार बाजार में विक्रेताओं की संख्या बहुत कम होती है।
2. अल्पाधिकार बाजार में प्रत्येक उत्पादक कुल उत्पादन का एक बड़ा भाग उत्पादित करता है और वह अपने उत्पादन अथवा मूल्य में परिवर्तन करके अन्य उत्पादकों के मूल्य व उत्पादनको काफी बड़ी सीमा तक प्रभावित कर सकता है।
एकाधिकार की विशेषताएं-
1. एक उत्पाद का केवल एक ही विक्रता (फर्म) होता है।
2. कोई नजदीकी स्थानापन्न उपलब्ध नहीं होता है।
एकाधिकार और एकाधिकारी फर्मों के बीच दो अंतर हैं:
* एकाधिकार बाजार में, केवल एक ही विक्रेता होता है लेकिन एकाधिकारी बाजार में, कई विक्रेता होते हैं।
* एकाधिकार में, फर्मों के लिए बाजार में प्रवेश और निकास की बाधाए होती हैं जबकि एकाधिकारी बाजार में, फर्मों के प्रवेश और निकास के लिए कोई अवरोध मौजूद नहीं होता है।
पेटेंट उन अधिकारों को दर्शाता है जिन्हें विशेष रूप से उस आविष्कारक या व्यक्ति के लिए के सुरक्षित किया जाता है जिनके लिए कानून के अनुसार पेटेंट जारी किये गये हैं। यह अधिकार बाजार में गला काट प्रतिस्पर्धा से विशेष फर्म की रक्षा करता है और बाजार में एक प्रमुख फर्म के रूप में विकसित करने के लिए इसकी मदद करता है।
एकाधिकार एक ऐसी बाजार स्थिति है जहां बेची जाने वाली वस्तु की केवल एक ही फर्म होती है। एकाधिकारी द्वारा बेची जानी वाली वस्तु का कोई नजदीकी स्थानापन्न उपलब्ध नहीं होता है। एक एकाधिकार फर्म कीमत निर्धारक होती है क्योंकि यह एक वस्तु की कीमत के साथ साथ उत्पादन को प्रभावित करने की शक्ति रखती है। एकाधिकारी का मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक लाभ कमाना होता है।
एक एकाधिकार (ग्रीक भाषा के मोनोस, one + polein, बेचने के लिए से लिया गया है) को एक स्थायी बाजार स्थिति के रूप में परिभाषित किया गया है जहां एक उत्पाद या सेवा का केवल एक ही प्रदाता होता है।दूसरे शब्दों में, एक फर्म जिसका अपने उद्योग में कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है को एकाधिकारी फर्म कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी बाजार संरचना है जिसमें एक वस्तु का केवल ही विक्रेता और बहुत सारे क्रेता होते हैं। एकाधिकारी अपने उत्पाद के लिए किसी भी कीमत को बदलने के लिए स्वतंत्र होता है।
एकाधिकारी बाजार की विशेषताएं हैं:
1. एक वस्तु विशेष का केवल एक ही उत्पादक होता है।
2. वस्तु के लिए कोई स्थानापन्न उपलब्ध नहीं होता है।
3. फर्मों के प्रवेश और निकास पर प्रतिबंध होता है।
4. सामान्यता फर्म असामान्य लाभ कमाती है।
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धी बाजारों के निम्नलिखित लक्षण होते हैं:
1. एक निर्धारित बाजार में बहुत से उत्पादक और बहुत से विक्रेता होते हैं।
2. उपभोक्ताओं की स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट वरीयताएं होती है और विक्रेता अपने उन प्रतिस्पर्धीयों से अपने उत्पादों को अलग करने का प्रयास करते हैं। वस्तुएं एवं सेवाएं विजातीय होती हैं।
3. प्रवेश या निकास की स्वतंत्रता होती है।
4. उत्पादकों का एक सीमा तक कीमत पर नियंत्रण होता है।
''एकाधिकारी से आशय उस एकाकी फर्म/उद्योग से है, जहां पर फर्म की वस्तु एवं बाजार में बेची जाने वाली वस्तुओं के बीच मांग की लोच शून्य होती है।''
एकाधिकार की शर्तें-
1. एकाधिकार में केवल एक ही उत्पादक/विक्रता होता है।
2. नई फर्में उद्योग में प्रवेश नहीं कर सकती है।
3. वस्तु की कोई निकट प्रतिस्थापन वस्तु नहीं होती है।
A.
सभी व्यवहारों तथा घटनाओं का लेखा कीजिए।
B.
उन व्यवहारों तथा घटनाओं का लेखा कीजिए जिसे मुद्रा में अनुमानित किया जा सकता है।
C.
उन व्यवहारों तथा घटनाओं का लेखा कीजिए जिसे मुद्रा में मापा जा सकता है।
D.
उपरोक्त में कोई भी नहीं।
इस सिद्धान्त के अनुसार लेखांकन में केवल उन्हीं लेन-देनों एवं घटनाओं का लेखा किया जाता है जिन्हें मुद्रा में व्यक्त किया जा सकता है, अन्य घटनाएँ नहीं, चाहे वे कितनी ही महत्वपूर्ण क्यों न हों। उदाहरणतया, विक्रय प्रबन्धक और उत्पादन प्रबन्धक के बीच झगडा हो जाता है। इससे व्यवसाय को अवश्य ही हानि होगी, किन्तु कोई भी व्यक्ति मौद्रिक अंकों में यह नहीं बता सकता है कि फर्म को इससे कितनी हानि होगी और कब होगी। अतः इसे लेखा-पुस्तकों में नहीं लिखा जाएगा।
A.
लागत अवधारणा के अनुसार
B.
पृथक अस्तित्व अवधारणा के अनुसार
C.
द्विपक्षीय अवधारणा के अनुसार
D.
मुदा मापन अवधारणा के अनुसार
यदि सिद्धान्त व्यावसायिक संगठन के सभी स्वरूपों ( अर्थात एकाकी व्यापार, साझेदार तथा कम्पनी) में लागू होता है। इस सिद्धान्त को अपनाने का कुल प्रभाव इस प्रकार हैः · लेखों में केवल व्यवसाय के लेन-देनों को लिखा एवं प्रस्तुत किया जाता है, न कि स्वामी के व्यक्तिगत लेन-देनों को। · आय तथा लाभ व्यवसाय का होता है जब तक कि उसे बॉटा न जाए। व्यवसाय की सम्पतियों की सूची में स्वामियों अथवा अंशधारियों की निजी सम्पत्तियों पर विचार नहीं किया जाता।
A.
लागत मूल्य पर
B.
बाजार मूल्य पर
C.
लागत एवं बाजार मूल्य दोनों में जो कम हो
D.
उपर्युक्त में से कोई नहीं
इस परम्परा के अनुसार भविष्य में होने वाले लाभों की आशा नहीं करनी चाहिए किन्तु समस्त सम्भावित हानियों के लिए व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए, अतः देनदार के दिवालिया होने पर डूबत ऋणों का प्रावधान अवश्य किया जाना चाहिए।
A.
विनिमय
B.
अवधि
C.
माप की इकाई
D.
ये सभी
सामान्यतया स्वीकृत लेखांकन सिद्धान्तों का आशय लेखांकन के उन नियमों व प्रथाओं से है। जिन्हें सर्वसाधारण द्वारा लेखांकन पेशे में मार्गदर्शन हेतु तथा व्यवहार के आधार के रूप में स्वीकृत कर लिया गया है।
A.
लागत
B.
वसूली
C.
सतत व्यवसाय
D.
मिलान
लागत ज्ञात करते समय केवल उन्हीं व्ययों को ही नहीं जोडा जाता है जो उस अवधि विशेष में आगम को अर्जित करने हेतु किए गए हैं। वास्तव में लेखांकन अवधि से सम्बन्धित सभी व्ययों को जोडा जाता है।
A.
वह वित्तीय विवरणों में शामिल नहीं की गई है
B.
वह वित्तीय विवरणों में शामिल की गई है
C.
वह कुछ सीमा तक वित्तीय विवरणों में शामिल की गई है
D.
इनमें से कोई नहीं
वित्तीय विवरणों को तैयार करते समय कुछ लेखांकन सम्बन्धी मूलभूत मान्यताएँ काम करती हैं। सामान्यतया उनका विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया जाता क्योंकि उनके लिए स्वीकृति और उनका उपयोग मानकर चला जाता है। इन मान्यताओं को अवधारणाएँ भी कहते हैं।
A.
रू 1,50,000
B.
रू 1,20,000
C.
रू 30,000
D.
रू 1,70,000
कोई भी लेन-देन लेखा समीकरण में परिवर्तन तो कर सकता है परन्तु लेखा समीकरण को तोड़ नहीं सकता अर्थात चिटठे के दोनों पक्षों-सम्पत्ति पक्ष तथा दायित्व पक्ष का योग सदैव समान रहता है अथा्र्रत् एक व्यवसाय की कुल सम्पत्तियॉं सदैव ही उस व्यवसाय के कुल दायित्वों के बराबर होगी और यह समानता किसी भी नए व्यवहार के कारण समाप्त नहीं होती।
A.
मुद्रा मापांकन
B.
अवधिगत
C.
लागत
D.
रूढिवादिता
लाभों का लेखा तब तक नहीं करना चाहिए जब तक कि वे वास्तव में अर्जित न हो जाएॅ और सम्भावित हानियों के लिए पहले से ही पर्याप्त प्रावधान कर लिया जाना चाहिए। इस सिद्धान्त का उद्देश्य पूर्ण सुरक्षा के साथ व्यवसाय का संचालन करना होता है। इसके द्वारा व्यवसाय में जोखिमों के प्रति सावधानी तथा सतर्कता का प्रयोग किया जाता है, ताकि भविष्य में व्यवसाय को कभी बुरे दिन न देखने पडें। शेष माल का मूल्यांकन बाजार मूल्य अथवा लागत मूल्य में जो भी कम हो सिद्धान्त के अनुसार करना तथा अप्राप्य ऋण तथा बट्टे से सम्बन्धित हानि होने के पूर्व ही देनदारों की राशि पर संदिग्ध ऋण तथा बट्टे की व्यवस्था करना, इस सिद्धान्त के प्रमुख उदाहरण है।
A.
मुद्रा मापांकन अवधारणा
B.
सतत संस्थान अवधरणा
C.
वसूली अवधरणा
D.
उपार्जन अवधारणा
इस अवधारणा के अनुसार आय व व्यय की मदों को लेखा-पुस्तकों में उस समय लिखते हैं जबकि वे देय हो जाती है। आय/व्यय की वास्तविक प्राप्ति/भुगतान का महत्व नहीं है। कारखाने का किराया अदत्त है, अतः इसका लेखा किया जाएगा।
A.
सारता
B.
सततता
C.
रूढिवादिता
D.
सतत संस्थान
इस परम्परा के अनुसार एक व्यावसायिक संस्था के तुलनात्मक अध्ययन हेतु वर्ष-प्रतिवर्ष एक सी लेखांकन पद्धतियों, विधियों एवं कार्य-प्रणालियों को अपनाना चाहिए, और उनमें बार-बार परिवर्तन नहीं करना चाहिए। कम्पनी Inventory Valuation की पद्धति में परिवर्तन कर सकती है परन्तु इस परिवर्तन का लाभ-हानि पर प्रभाव स्पष्ट करना होगा।
A.
सारता की,
B.
रूढिवादिता की
C.
सतत संस्थान की
D.
पृथक सत्ता की
यदि लेखांकन में यह मान्यता नहीं होती तो व्यवसाय के स्वामी के निजी व्यय व आय व्यवसाय के व्यय व आय में सम्मिलित हो जाते तथा व्यावसायिक आय का सही निर्धारण नहीं हो पाता। इसी प्रकार यदि व्यवसाय की सम्पत्तियों में निजी सम्पतितयों को मिलाकर लिखा जाता तथा व्यवसाय के दायित्वों में निजी दायित्वों को मिला दिया जाता तो व्यवसाय की सही आर्थिक स्थिति का निर्धारण नहीं हो पाता।
A.
लागत, सतत व्यवसाय और वसूली
B.
लागत, उर्पाजन और मिलान
C.
उपर्जान, मिलान और अवधिगत
D.
सतत व्यवसाय, अवधिगत और वसूली
इस मान्यता कर करप तह है आय व व्यय की मदें लेखा-पुस्तकों में उस समय लिखी जाती हैं जबकि वे देय हो जाती हैं।
A.
लागत सिद्धान्त
B.
सतकर्ता
C.
पूर्ण प्रकटीकरण
D.
अस्तित्व सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार व्यावसायिक संस्था को एक पृथक और स्वतन्त्र इकाई माना जाता है जिसका अस्तित्व इसके स्वामियों, लेनदारों, प्रबन्धकों एवं अन्य व्यक्तियों से पृथक है। दूसरे शब्दों में, व्यवसाय के स्वामी को उस व्यवसाय से बिल्कुल पृथक माना जाता है जिसका वह स्वामी है।
A.
मुद्रा मापांकन
B.
उपार्जन
C.
पृथक इकाई
D.
रूढिवादिता
इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक व्यावसायिक संस्था अपने स्वामी, लेनदार तथा अन्य पक्षों से पृथक इकाई मानी जाती है। लेखांकन के लिए व्यवसाय अपने स्वामी से एक अलग इकाई है। व्यवसाय में लेखांकन व्यापारिक व्यवहारों का किया जाता है। मालिक भी व्यवसाय में लगाई पूँजी के लिए व्यवसाय का लेनदार है। इसलिए मालिक द्वारा लगाई गई पूँजी के लिए व्यापार में रोकड खाते को डेबिट करके मालिका खाता पूँजी खाता क्रेडिट किया जाता है। तथा मालिक द्वारा व्यवसाय से आहरण करने पर मालिक का आहरण खाता डेबिट करके रोकड या माल खाता क्रेडिट किया जाता है। इस पूँजी को चिट्ठे के दायित्व पक्ष में दर्शाया जाता है।
A.
मुद्रा मापांकन
B.
उर्पाजन
C.
सततता
D.
रूढिवादिता
इस सिद्धान्त के अनुसार भविष्य में होने वाले लाभों की आशा नहीं करनी चाहिए किन्तु समस्त सम्भावित हानियों के लिस व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए।
A.
सतत संस्थान,
B.
विवेकशीलता
C.
सततता
D.
सारता
इस मान्यता के अनुसार, एक व्यावसायिक संस्था में वर्ष-प्रतिवर्ष एकसी ही लेखांकन पद्धतियों, विधियों एवं कार्य-प्रणालियों को अपनाना चाहिए और उनमें बार-बार परिवर्तन नहीं करना चाहिए। जब विभिन्न अवधियों में एक ही प्रकार की लेखा विधियों एवं सिद्धान्तों को अपनाया जाता है तो एक अवधि के लेखों का दूसरी अवधि के लेखों से तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। तुलनात्मक अध्ययन व्यवसाय के विकास की प्रगति को मापने में सहायक होता है।
A.
सम्पत्तियॉं दायित्व पूँजी
B.
लेन-देन को वास्तविक लागत पर दर्ज करना
C.
एक निश्चित अवधि के व्यय का अन्य आय से मिलान
D.
एक निश्चित अवधि की आय का व्यय से मिलान
किसी भी व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य समय-समय पर लाभ ज्ञात करना है, अतः किसी लेखावधि के लाभ का निर्धारण करने के लिए उस अवधि के आगम एवं उस आगम से सम्बन्धित लागतों का मिलान आवश्यक है। अनुरूपता अवधारणा के अनुसार लाभ ज्ञात करने के लिए आगम एवं लागत में अनुरूपता के आधर पर तुलना की जाती है।
A.
मिलान की अवधारण
B.
लागत की अवधारणा
C.
मुद्रा मापांकन अवधारणा
D.
द्वि-पहलू अवधारणा।
द्वि-पक्षीय अवधारणा के अनुसार, प्रत्येक लेन-देन के दो पहलू होते हैं, अतः यदि कोई लेन-देन या घटना घटित होती है तो उसके भी दो प्रभाव होंगे।
A.
रू 7,00,000 = रू 5,5,0,000 + रू 1,50,000
B.
रू 7,00,000 = रू 6,5,0,000 - रू 50,000
C.
रू 5,50,000 = रू 5,00,000 + रू 50,000
D.
रू 5,50,000 = रू 7,00,000 - रू 1,50,000
लेखा समीकरण द्वि-पक्ष अवधारणा पर आधारित है, जिसके अनुसार प्रत्येक व्यावसायिक लेन-देन के दो पक्ष होते हैं- डेबिट पक्ष तथा क्रेडिट पक्ष। प्रत्येक लेन-देन का इन दोनों पक्षों पर समान प्रभाव पडता है, इसलिए इन दोनों पखों का योग सदैव समान होता है। इस समानता को दर्शाने के लिए लेखांकन में समीकरणों का प्रयोग किया जाता है। व्यवसाय के पास जितनी सम्पत्तियॉं होती हैं, उसकी कुल देनदारी या समता भी उतनी ही होती है।
भारतीय लेखा मानक 27- पृथक वित्तीय विवरण

अ-
गैर-व्यावसायिक
लेनदेन।
ब-
व्यावसायिक
लेनदेन।
स-
व्यावसायिक
लेनदेन।
द-
गैर-व्यावसायिक
लेनदेन।
य-
गैर-व्यावसायिक
लेनदेन।
र- गैर-व्यावसायिक
लेनदेन।
दोहरा
लेखा
प्रणाली की
विशेषताएं :-
· यह एक
न्यायपूर्ण
प्रणाली है-
प्रत्येक सौदे दो खातों को प्रभावित करते हैं
इसलिए ये
न्यायपूर्ण
प्रणाली है l
· इसमें
दो खाते
प्रभावित
होते हैं-
प्रत्येक
माल या धन का
लेन देन कम से
कम दो खातों
को प्रभावित
करता हैl
· इसमें
निश्चित
नियमों के
आधार पर लेखा
होता है-
दोहरा लेखा
प्रणाली के
अंतर्गत
प्रत्येक खाते
को ऋणी तथा
धनी निश्चित
नियमो के
आधार पर किया
जाता है l
नियंत्रण :-
वित्तीय लेखांकन -यह रोकड़ पर नियंत्रण रखता है
लागत लेखांकन -यह सामग्री तथा स्टोर के निर्गमन पर विशेष नियंत्रण रखता है
प्रति इकाई लागत ज्ञात करना:-
वित्तीय लेखांकन- इन लेखों की सहायता से उत्पादन की प्रति इकाई की लागत आसानी से ज्ञात नहीं की जा सकती
लागत लेखांकन -इन लेखों की सहायता से उत्पादन की प्रति इकाई की लागत आसानी से ज्ञात की जा सकती
तुलनात्मक अध्ययन:-
वित्तीय लेखांकन -इसमें प्रत्येक किस्म की उत्पादित इकाई की लागत का तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया जाता
लागत लेखांकन -इसमें पिछले वर्षों की उत्पादन लागतों का तुलनात्मक अध्ययन करके कारणों की जाँच की जाती है
प्रबंधकीय लेखांकन
की
विशेषताएं
· नीति
निर्धारण
में सहायक
· नियोजन,
निर्णयन तथा
नियंत्रण के
कार्यों के निष्पादन में
सरलता
· समस्या
के कारण व
उसके प्रभाव
के बारे में
अध्ययन
· पूर्वानुमान
में सहायक
· कर्मचारियों
को
अभिप्रेरित
करने में
सहायक
· प्रबंधकीय
लेखांकन की
सीमायें-
· अत्यधिक
व्ययशील
प्रणाली है
· ऐसे
व्यक्तियों
पर आधारित है
जो आंकड़ों को
विश्लेषित
कर तथा
प्रबंधकों
के लिए
सम्प्रेषित
करते हैं
· वित्तीय
तथा लागत
लेखंकानो पर
आधारित होती
है इसलिए उनकी सीमाओं से
वंचित नहीं
है
लेखांकन
के लाभ हैं:
1. यह
व्यवसाय के
नियंत्रण
एवं प्रबंधन
में सहायक
होता है।
2. यह पूर्ण
तथा
व्यवस्थित
रिकाॅर्ड
उपलब्ध कराता
है।
3. यह लाभ
एवं हानि तथा
सम्पत्तियों
एवं दायित्वों
की वित्तीय
स्थिति के
संबंध में
सूचनाऐं प्रदान
करता है।
4. यह
तुलनात्मक
अध्ययन को
संभव बनाता
है।
5. यह एक
व्यवसाय के
बेचान की
स्थिति में, इसके
मूल्यांकन
में सहायक
होता है।
6. यह
व्यवसाय में
त्रुटियों
का पता लगाता
है तथा इनकी
रोकथाम करता
है।
लेखांकन
की तीन
शाखाऐं
निम्नलिखित
हैं:
1. वित्तीय
लेखांकन -
इसमें
वित्तीय
लेनदेनों का
अभिलेखन, सारांशिकरण
एवं उनकी
व्याख्या
तथा इसके परिणामों
को रूचिकर
उपयोगकर्ताओं
को संप्रेषित
करना शामिल
होता है।
इसलिए इसमें
अंतिम खातों
अर्थात लाभ एवं
हानि खाते
तथा चिट्ठे
को तैयार
करना शामिल
किया जाता
है।
2. लागत
लेखांकन -
इसमें
उत्पादों
तथा सेवाओं
के उत्पादन
की लागत के
निर्धारण को
शामिल किया जाता
है जिससे यह
उत्पाद का
मूल्य
निर्धारण करने
तथा कमीं की
लागत को
सुनिश्चित
करने के लिए
प्रबंधन को
सक्षम बनाता
है।
3. प्रबंधन
लेखांकन - यह
संभी ऐसी
प्रासंगिक
लेखांकन
सूचनाऐं
प्राप्त
करने से
संबंधित
होता है जो
व्यवसाय के
सुलभ संचालन
के लिए
प्रभावी निर्णयन
के लिए
प्रबंधन को
सक्षम बनाती
हैं।