(1) जब एक फर्म
एक समान कीमत
पर अधिक
मात्रा
बेचने में
सक्षम है, तो
यह पूर्ण
प्रतिस्पर्धात्मक
बाजार
स्थिति को
दर्शाती है।
तब MR
और
AR उत्पादन
के सभी स्तरों
पर बराबर
होंगे।
(2) जब एक फर्म
एक वस्तु की
कीमत को कम
करके उत्पादन
की अधिक
मात्रा
बेचने में
सक्षम है, तो
यह
एकाधिकारात्मक
बाजार या
एकाधिकारी
बाजार की
स्थिति को दर्शाती
है। ऐसी
स्थिति में, MR उत्पादन
के सभी स्तरों
परARसे
कम होगा।
TR
वक्र निम्नलिखित
स्थितियों
में बदल
जायेगा:
(1) जब MR
घटता
जाता है
लेकिन सकारात्मक
रहता है, तब
TR एक
गिरती हुयी
दर से वृद्धि
करता है।
(2) जब MR
शून्य
होता है, तब
TR
अधिकतम होता
है।
(3) जब MR
नकारात्मक
हो जाता है, तब TR घटता
है।
दीर्घ
काल में एक
फर्म की
संतुलन अवस्था:
MC = MR = AR = LAC
नीचे
दिये गये
चित्र में:-
LAC कीमत
अर्थात् 'P' को
स्पर्श
करती है।
E बिंदु
पर, MC = MR= AR = LAC
फर्म
सामान्य
लाभों को
अर्जित करती
है।

पूर्ति
नियम की मान्यताएं
हैं:-
(1) अन्य
संबंधित वस्तुओं
की कीमत में
परिवर्तन
नहीं होना
चाहिए।
(2) उत्पादन
की तकनीक में
परिवर्तन
नहीं होनी
चाहिए।
(3) उत्पादन
के कारकों की
लागत एक समान
रहनी चाहिए।
(4) फर्म
के लक्ष्य
(उद्देश्य)
परिवर्तित
नहीं होने
चाहिए।
(5) सरकार
की करारोपण
की नीति
परिवर्तित
नहीं होनी
चाहिए।
यदि वर्तमान फर्में अल्प काल में असाधारण मुनाफा कमा रही हैं, तो वर्तमान फर्में अपने उत्पादन में वृद्धि करेगी और एक नई फर्म उद्योग में प्रवेश करेगी।इस प्रकार, उद्योग की कुल आपूर्ति बढ़ेगी भले ही मांग अपरिवर्तित बनी रहे। परिणामस्वरूप, कीमतें नीचे गिर जायेगी और फर्में सामान्य लाभ अर्जित करेगी।
(1)इकाई
लोचदार
पूर्ति: जब
कीमत में
प्रतिशत
परिवर्तन
पूर्ति में
प्रतिशत
परिवर्तन के
बराबर होता
है,
तब एक वस्तु
की पूर्ति को
इकाई लोचदार
होना कहा
जाता है। ऐसी
स्थिति में
पूर्ति की
लोच 1 के
बराबर होती
है।
(1)पूर्णत:
बेलोचदार
पूर्ति: जब
वस्तु की
कीमत में
परिवर्तन के
फलस्वरूप
पूर्ति की
मात्रा बिल्कुल
भी परिवर्तन
नहीं होती है, तो
इसकी पूर्ति
को पूर्णत:
बेलोचदार
होना कहा जाता
है। ऐसी
स्थिति में
पूर्ति की
लोच 0 के
बराबर होती
है।
AR बेचे गये उत्पाद की प्रति इकाई संप्राप्ति है। बेची गयी इकाइयों की संख्या से कुल संप्राप्ति को विभाजित करके AR की गणना की जाती है। मान लो, फर्म 200 मोबाइल फोन को बेचकर 45,000 रूपये की कुल संप्राप्ति अर्जित करती है। ऐसी स्थिति में,
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रुपये
सीमांत संप्राप्ति (MR) एक वस्तु की अतिरिक्त इकाई के विक्रय द्वारा कुल संप्राप्ति का योग है। जब उत्पादन की एक और अतिरिक्त इकाई को बेच दिया जाता है, तब यह कुल संप्राप्ति का शुद्ध योग है।
प्रतीकात्मक रूप में: MR = TRn – TRn-1
जहां: n = बेची गयी उत्पादन की इकाइयों की संख्या|
कुल संप्राप्ति दिये हुये उत्पादन की बिक्री से फर्म द्वारा प्राप्त धन की कुल राशि को दर्शाती है। इसे उत्पादन की बेची गयी मात्रा के साथ वस्तु की प्रति इकाई कीमत को गुणा करके प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि एक फर्म 3000 रूपये प्रति स्कूटर की कीमत पर 100 स्कूटरों को बेचती है, तो इसकी कुल संप्राप्ति होगी:
कुल संप्राप्ति = कीमत x उत्पादन
TR= P x Q= ( 100 x 3000)
=30,000 रुपये
एक
फर्म का
पूर्ति वक्र
एक वस्तु की
विभिन्न
मात्राओं को
दर्शाता है
जिसकी फर्म
विभिन्न
कीमतों पर पूर्ति
करने के लिए
तैयार है। यह MC और MR वक्रों
की पारस्परिक
क्रिया
द्वारा
निर्धारित
होता है।
* नीचे
दिये गये
चित्र में: P0 कीमत
पर, फर्म Q0 मात्रा
उत्पादित
करती है।
* P1कीमत
पर, फर्म Q1 मात्रा
उत्पादित
करती है।
* P2 कीमत
पर, फर्म Q2 मात्रा
उत्पादित
करती है।
E0, E1 और E2 को जोड़ने पर, हमें फर्म का अल्पकालीन पूर्ति वक्र प्राप्त होता है, जिसे एक अलग चित्र में दिखाया गया है।

पूर्ण प्रतिस्पर्ध के अंतर्गत, उद्योग कीमत निर्धारक है और फर्में कीमत-स्वीकारक हैं। इसलिए, एक वस्तु की सभी इकाइयों को एक ही कीमत पर बेचा जाता है।MR AR के बराबर है इसलिए फर्में एक दी हुयी कीमत पर वस्तु की किसी भी मात्रा को बेच सकती हैं।
इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक अतिरिक्त इकाई की बिक्री के साथ ही, अतिरिक्त संप्राप्ति (MR) और औसत संप्राप्ति (AR) कीमत के बराबर हो जाएगी (AR=MR=P). AR और MR वक्र x-अक्ष के समानांतर एक क्षैतिज सीधी रेखा में एक समान हो जाते हैं।

अन्य चीजें स्थिर रहते हुए जब एक वस्तु की पूर्ति इसकी कीमत में कमी के साथ कम हो जाती है तो इसे पूर्ति का संकुचन कहा जाता है।

एक वस्तु की पूर्ति में वृद्धि या कमी से तात्पर्य उसी पूर्ति वक्र पर साथ साथ गति करना है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसी वक्र पर मात्रा में हुए परिवर्तन को दर्शाया जाता है। चित्र में, जब कीमत OP1 थी तब पूर्ति की मात्रा OQ1 थी और OP तक कीमत में गिरावट के साथ ही पूर्ति की मात्रा भी संकुचित होकर OQ हो गयी। A से C बिंदु तक की गति को पूर्ति के संकुचन के रूप में जाना जाता है।
दिया है, कीमत में प्रतिशत परिवर्तन= 10 प्रतिशत, Q=200 इकाइयाँ, Q1=225 इकाइयाँ
इकाइयाँ
पूर्ति
की गई मात्रा
में प्रतिशत
परिवर्तन=
=
प्रतिशत
पूर्ति
की कीमत लोच (Es)=
=
पूर्ति में वृद्धि एक ऐसी स्थिति को दर्शाती है जहां उत्पादक वस्तु की अपनी कीमत के अलावा अन्य कारकों में परिवर्तन के कारण उसी कीमत पर एक बहुत बड़ी मात्रा की पूर्ति करने को तैयार रहते हैं। पूर्ति वक्र के दायीं ओर खिसकने को नीचे दिये गये चित्र में दर्शाया गया है-

चित्र में OP कीमत पर पूर्ति की मात्रा OQ1 थी, वस्तु की कीमत के अलावा अन्य कारकों में परिवर्तन के साथ ही उसी कीमत पर अब OQ2 वस्तु की मात्रा की पूर्ति की जाती है और नया पूर्ति वक्र S1 है। A से B बिंदु तक का स्थानांतरण पूर्ति में वृद्धि का संकेत देता है।
पूर्ति के विस्तार की दशा में, स्वयं वस्तु की कीमत में परिवर्तन के कारण पूर्ति की मात्रा बढ़ जाती है। पूर्ति मात्रा में परिवर्तन को एक विशिष्ट पूर्ति वक्र के साथ गति के द्वारा दर्शाया जाता है। पूर्ति वक्र के साथ ऊपर की ओर चलने वाली गति को पूर्ति का विस्तार कहा जाता है।

चित्र में OP1 कीमत पर पूर्ति की मात्रा OQ1 थी, वस्तु की कीमत के OP2 तक बढ़ने के साथ अब OQ2 वस्तु की मात्रा की पूर्ति की जाती है। A से B बिंदु तक का स्थानांतरण पूर्ति में विस्तार का संकेत देता है।
A.
MR से
अधिक
B. AR के बराबर
C. MR के बराबर
D.
दोनों (b) तथा (c)
इस प्रतिस्पर्ध में फर्म को प्रचलित कीमत स्वीकार करनी पड़ती है जिस कारण औसत संप्राप्ति और सीमांत संप्राप्ति स्थिर रहती है और P=AR=MR होता हैं|
A.
लागतें
+ लाभ
B. लागतें - लाभ
C. लागतें × लाभ
D. लागतें ÷ लाभ
कुल लाभ, कुल संप्राप्ति घटा कुल लागत होता है जिससे संप्राप्ति को किल लागत जोड़ कुल लाभ भी कहा जा सकता है|
A.
x-अक्ष के समांतर एक क्षैतिज सरल रेखा
B.
Y-अक्ष के समांतर एक खड़ी सरल रेखा
C.
Y-अक्ष से शुरू होती एक सरल रेखा
D.
x-अक्ष से शुरू होती एक सरल रेखा
Es>1 जब एक सरल रेखा धनात्मक ढलान वाला पूर्ति वक्र Y-अक्ष से शुरू होता है|
A.
अधिक लोचदार
B.
कम लोचदार
C.
पूर्णतया लोचदार
D.
पूर्णतया बेलोचदार
टिकाऊ वस्तुओं को जमा या स्टोर करके रखने और उनके उपभोग होने तक की अवधि लम्बी होती है|
A.
अति अल्पकाल की स्थिति में
B.
अल्पकाल की स्तिथि में
C.
दीर्धकाल की स्तिथि में
D. दोनों (b) तथा (c)
एक सरल रेखा पूर्ति वक्र, जो Y-अक्ष से शुरू होता है यह दर्शाता है की Es>1 चाहे यह कोई भी कोण बनाए|
A.
शून्य
B.
इकाई
C.
अनंत
D.
नकारात्मक
जब Es=∞ होता है, तब कीमत में मामूली परिवर्तन भी पूर्ति की मात्रा में अनंत परिवर्तन लता है|
A.
पूर्ति
की लोच एक के
बराबर है
B. पूर्ति की लोच शून्य के बराबर है
C.
पूर्ति की लोच एक से कम है
D.
पूर्ति की लोच एक से अधिक है
Es<1 जब एक सरल रेखा, धनात्मक ढलान वाला पूर्ति वके x-अक्ष से शुरू होता है चाहे यह कोई भी कोण बनाए|
A.
Es=0
B.
Es>1
C.
Es=1
D.
Es<1
चाहे यह कोई भी कोण बनाए, एक सरल रेखा पूर्ति वक्र जो मूल बिंदु से शुरू होता है, वह दर्शाता है की Es=1
A.
इकाई लोचदार पूर्ति
B.
पूर्णतया लोचदार पूर्ति
C.
पूर्णतया बेलोचदार पूर्ति
D.
सापेक्षतया लोचदार पूर्ति
वह स्थिति जिसमें कीमत में पूर्ति स्थिर रहती है चाहे वस्तु की कीमत में कोई भी परिवर्तन क्यों ना हो|
A.
पूर्ति में कमी होती है
B.
पूर्ति में कोई परिवर्तन नहीं होता
C.
पूर्ति में वृद्धि होती है
D. दोनों (b) तथा (c)
उत्पादकों के लिए परिणामी हानि की क्षतिपूर्ति आर्थिक सहायता के माध्यम से की जाती है| अतः जब आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है तब वस्तु का पूर्ति वक्र दाई ओर खिसक जाता है|
A.
दाई ओर
B.
दाई ओर के साथ बाई ओर
C.
बाई ओर
D. इनमें से कोई नहीं
जब कर लगाया जाता है तब पूर्ति वक्र बाई ओर खिसकता हैं| वस्तु की वर्त्तमान कीमत पर कम मात्रा में पूर्ति की जाती है|
A.
दूसरे
पूर्ति वक्र
पर दाई ओर
B. दूसरे पूर्ति वक्र पर बाई ओर
C. पूर्ति वक्र के ऊपरी बिंदु से निचले बिंदु की ओर
D. पूर्ति वक्र के निचले बिंदु से ऊपरी बिंदु की ओर
पूर्ति में वृद्धि से अभिप्राय पूर्ति वक्र के दाई ओर खिसकाव से है| यह वह स्थिति है जिसमें उत्पादक वर्तमान कीमत पर वस्तु की अधिक मात्रा बेचने के लिए तैयार हैं|
A.
ऊपरी
बिंदु से
निचले बिंदु
की ओर
B. दूसरे पूर्ति वक्र पर दाई ओर
C. दूसरे पूर्ति वक्र पर बाई ओर
D. दोनों (b) तथा (c)
पूर्ति का संकुचन तब होता है जब वस्तु की अपनी कीमत में कमी के फलस्वरूप पूर्ति की गई मात्रा में कमी होती हैं|
A.
पूर्ति
में कमी
B. पूर्ति में संकुचन
C. पूर्ति में विस्तार
D. इनमें से कोई नहीं
तकनीक या प्रोघोगिकी का पुराना पड़ जाना जिसके कारण कुशलता में कमी होती हैं तथा उत्पादन लागत में वृद्धि होती हैं| अतः उत्पादकों को पूर्ति को सीमित करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं|
A.
पूर्ति
में वृद्धि
B. पूर्ति में कमी
C. पूर्ति में संकुचन
D. इनमें से कोई नहीं
पूर्ति में संकुचन के कारण पूर्ति वक्र में निचे की ओर संचलन होता है|
A.
वस्तु की अपनी कीमत के अतिरिक्त अन्य तत्वों के कारण
B.
वस्तु की अपनी कीमत में वृद्धि के कारण
C.
वस्तु की अपनी कीमत में कमी के कारण
D.
दोनों (2) तथा (3)
पूर्ति का विस्तार वस्तु की अपनी कीमत में वृद्धि के कारण पूर्ति की गई मात्रा में वृद्धि से होता हैं और पूर्ति में संकुचन वस्तु की अपनी कीमत में कमी के कारण पूर्ति की गई मात्रा में कमी से होता हैं|
A.
कारक
कीमत में कमी
के कारण
B. उच्च व्यवसायिक आशंसाओं के कारण
C. बाज़ार में फर्मो की वृद्धि के कारण
D. उपरोक्त सभी
किसी वस्तु की पूर्ति में वृद्धि या कमी, जब वस्तु की कीमत के अतिरिक्त अन्य निधार्रक तत्वों में परिवर्तन होता है|
A.
औघोगिक
वस्तुओं पर
B. कृषि उत्पादित वस्तुओं पर
C. नाशवान वस्तुओं पर
D.
दोनों (b) तथा (c)
चावल की कीमत बढ़ने पर भी उसकी पूर्ति कम रह सकती है, यदि प्रकृतिक प्रकोपों के कारण चावल का उत्पादन ही सीमित हुआ हो|
A.
फर्म
के उदेश्य के
कारण
B. वस्तु की अपनी कीमत के कारण
C. फर्मो की संख्या के कारण
D. उत्पादन की तकनीक के कारण
पूर्ति के विस्तार का अर्थ है कि वस्तु की अपनी कीमत में वृद्धि के कारण पूर्ति की गई मात्रा में वृद्धि होती हैं|
A.
नकारात्मक
संबंध
B. स्थिर संबंध
C. धनात्मक संबंध
D. कोई संबंध नहीं होता
वस्तु की अपनी कीमत बढ़ने पर पूर्ति की गई मात्रा में वृद्धि होती है तथा कीमत कम होने पर पूर्ति की गई मात्रा में कमी होती है|
A.
उत्पादक
का माँग वक्र
B. उपभोक्ता का माँग वक्र
C. व्यक्तिगत पूर्ति वक्र
D. बाज़ार पूर्ति वक्र
व्यक्तिगत पूर्ति वक्र के निचे से ऊपर की ओर ढलान से ज्ञात होता है कि वस्तु की कीमत तथा उसकी पूर्ति की गई मात्रा में धनात्मक संबंध होता हैं|
A.
पूर्ति
तथा भण्डार में
अंतर होता है
B. पूर्ति सरकार की कर नीति पर निर्भर नहीं करती
C. भण्डार वह मात्रा है जो बाज़ार में बिकने के लिए आती है
D. भण्डार तथा पूर्ति हमेशा बराबर होते हैं
वस्तु की वह मात्रा जो निश्चित समय पर फर्म के पास उपलब्ध होती है उसे भण्डार कहते हैं| जबकि भण्डार की वह मात्रा जो फर्म वर्तमान में एक निश्चित कीमत पर बेचने के लिए तैयार हो उसे पूर्ति कहते हैं|
A.
बाज़ार
पूर्ति
बाज़ार माँग
से कम होगी
B. संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा बढ़ेगी
C. दोनों (a) तथा (b)
D. न तो (a) और न ही (b)
अतिरिक्त माँग के दबाव के कारण बाज़ार कीमत में वृद्धि होती है| इसके फलस्वरूप माँगी गई मात्रा में कमी तथा पूर्ति की गई मात्रा में वृद्धि होती है|
A.
संतुलन
कीमत
अपरिवर्तित
रहती है
परन्तु संतुलन
मात्रा बढ़ती
है
B. केवल संतुलन कीमत अपरिवर्तित रहती है
C. संतुलन कीमत अपरिवर्तित रहती है परन्तु संतुलन मात्रा घटती है
D. केवल संतुलन मात्रा अपरिवर्तित रहती है
जब माँग में वृद्धि पूर्ति में वृद्धि के बराबर होती है तब न तो अतिरिक्त माँग और न ही अतिरिक्त पूर्ति की स्थिति उत्पन्न होती है| इसलिए कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता| हालांकि संतुलन मात्रा में वृद्धि होती है|
A.
संतुलन
कीमत तथा
मात्रा
बढ़ेगी
B. संतुलन कीमत घटेगी तथा मात्रा बढ़ेगी
C. संतुलन कीमत तथा मात्रा घटेगी
D. संतुलन कीमत बढ़ेगी तथा मात्रा घटेगी
उपभोक्ताओं की आय में वृद्धि होने पर निम्न्कोटी वस्तुओं जैसे की ज़ोवार, बाजरा आदि की माँग में कमी होती है जिस कारण माँग वक्र बाई ओर खिसकता है जिससे संतुलन कीमत तथा मात्रा में कमी होती है|
A.
संतुलन कीमत बढ़ जाती है
B.
संतुलन कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता
C.
संतुलन कीमत घट जाती है
D.
इनमे से कोई नहीं
उपभोक्ताओं की संख्या में कमी के कारण बाज़ार में वस्तुओं की माँग में कमी होगी जिस से माँग वक्र में दाई ओर खिसकाव होगा और वस्तुओं की कीमतें घट जाएगी|
A.
अतिरिक्त
पूर्ति की
B. अतिरिक्त माँग की
C. संतुलन की
D. इनमें से कोई नहीं
यह स्थिति है असंतुलन की जिसमें दी हुई कीमत पर उपभोक्ताओं द्वारा वस्तु की माँग उत्पादकों द्वारा वस्तु की पूर्ति से अधिक है|
A.
अति
अल्पकाल
B. दीर्धकाल
C. अल्पकाल
D.
उपरोक्त सभी
टिकाऊ वस्तुओं की तुलना में नाशवान वस्तुओं जैसे की फल-सब्जियों को जमा या स्टोर करके रखने और उपभोग होने तक की अवधि अल्प होती है जिस कारण नाशवान वस्तुओं की पूर्ति पूर्ण बेलोचदार होती है|
A.
कीमत
पर कोई
प्रभाव नहीं
पढता
B. कीमत में क्रमशः वृद्धि या कमी होती है
C. संतुलन मात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पढता
D.
दोनों (b) तथा (c)
जब माँग वक्र दाई ओर खिसकता है तब कीमत में वृद्धि होती है ओर जब माँग वक्र बाई ओर खिसकता है तब कीमत में कमी होती है किन्तु पूर्ति में और मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता|
A.
संतुलन
कीमत बढ़ेगी
तथा मात्रा
घटेगी
B. संतुलन कीमत तथा मात्रा घटेगी
C. संतुलन कीमत घटेगी तथा मात्रा बढ़ेगी
D. संतुलन कीमत तथा मात्रा बढ़ेगी
आगतों की कीमत में कमी होने पर फर्म की लागत में कमी होती है जिस कारण वह अपनी पूर्ति बढाती है जिस कारण पूर्ति वक्र में दाई ओर खिसकाव होता है जिससे संतुलन कीमत में कमी होती है और मात्रा बढ़ती है|
अतिरिक्त पूर्ति की स्थिति में दी गई कीमत पर उत्पादक उस मात्रा से अधिक मात्रा बेचने के लिए इच्छुक होते है जो मात्रा उप्भोक्ता खरीदने के लिए इच्छुक है| इस दबाव के कारण कीमतों में कमी होती है|
A.
बाज़ार
माँग = बाज़ार
पूर्ति
B. बाज़ार माँग < बाज़ार पूर्ति
C. बाज़ार माँग > बाज़ार पूर्ति
D. इनमें से कोई नहीं
संतुलन की स्थिति में बाज़ार में nन ही कुछ आधिक्य और न ही कोई कमी होती है| जो कीमत और मात्रा बाज़ार में प्रचलन में होती है वह संतुलन कीमत ओर संत्तुलन मात्रा कहलाती है|
पूर्ण प्रतिस्पर्धा के अंतर्गत AR=MR होता है क्योंकि बाजार में एक ही कीमत का प्रचलन होता है।
संतुलन कीमत में कमी होगी|
माँग तथा पूर्ति दोनों की सहायिता से|
संतुलन
प्राप्त
करने हेतु एक
फर्म के लिए
निम्नलिखित
दो शर्तों को
पूरा करना
जरूरी है;
(अ)
MC=MR
(ब) MC को
नीचे से MR को
काटना
चाहिए।
बेचे गए उत्पाद की प्रति इकाई पर प्राप्त संप्राप्ति को औसत संप्राप्ति कहते हैं।
जब परिवर्तन (वृद्धि या कमी) कीमत के अलावा अन्य कारकों में परिवर्तन के कारण होती है, तो इसे मात्र पूर्ति में परिवर्तन कहा जाता है। आरेखीय रूप से, इसका अर्थ पूर्ति वक्र में खिसकाव है।
लागत बचत तकनीकी प्रगति के कारण पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जायेगा।
A.
बाज़ार माँग < बाज़ार पूर्ति
B.
बाज़ार माँग > बाज़ार पूर्ति
C.
बाज़ार माँग=बाज़ार पूर्ति
D.
बाज़ार माँग = 0
बाज़ार संतुलन की स्थिति में बाज़ार माँग बाज़ार पूर्ति के बराबर होती है |
पूर्ण प्रतियोगिता में एक वस्तु की संतुलन कीमत माँग तथा पूर्ति दोनों के द्वारा निर्धारित होती है|
दीर्घकाल में प्रचलित कीमत को सामान्य कीमत कहा जाता है।
मांग और कीमत के बीच प्रतिकूल (विपरीत) संबंध है जिसका अर्थ है जैसे ही वस्तु की कीमत बढ़ती है वैसे ही इसकी मांग में कमी हो जाती है। आय और मांग के बीच सीधा संबंध होता है जिसका अर्थ है जैसे ही एक व्यक्ति की आय बढ़ती है, वैसे ही वस्तु के लिए मांग भी बढ़ जाती है।
पूर्ति को स्थिर मानते हुए जब एक वस्तु की मांग बाजार में बढ़ जायेगी, तो संतुलन कीमत में वृद्धि हो जायेगी।
कीमत जोकि अल्प अवधि में बाजार में प्रचलित होती है उस को बाजार कीमत कहा जाता है।
जब स्थानापन्न वस्तु की कीमत गिरती है, तब दी हुयी वस्तु की मांग भी गिर जाती है। उदाहरण के लिए, यदि चाय की कीमत कम होती है तब कॉफी जो चाय का एक स्थानापन्न है की मांग भी कम हो जाती है क्योंकि लोग चाय पीना पसंद करते है जोकि कॉफी की तुलना में सस्ती है।
बाजार में कीमत या अन्य कारकों में परिवर्तन होने के कारण मांग में वृद्धि या कमी होना ही मांग में परिवर्तन है।
बाजार में जब आपूर्तिकर्ता द्वारा पूर्ति की मात्रा क्रेता द्वारा मांगी गयी मात्रा से अधिक होती है, तब इसे अतिरिक्त पूर्ति कहा जाता है।
बाजार में जब अतिरिक्त पूर्ति होती है तो उपभोक्ता लाभ में होता है क्योंकि अतिरिक्त पूर्ति के कारण वस्तु की कीमत गिर जायेगी। इससे उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता बढ़ जाती है।
बाजार में जब पूर्ति की तुलना में मांग अधिक हो जाती है, तो कीमत संतुलन स्तर से ऊपर उठ जायेगी।
संतुलन साम्य की स्थिति है। यह सभी प्रक्रियाओं में एक साथ घटित होने वाली बाधाओं से बचने के लिए आवश्यक है।
एक साईकिल में दो पहियों का संतुलन अपने दैनिक जीवन में देखे गये संतुलन का एक उदाहरण है।
संतुलन एक ऐसी स्थिति को दर्शाता है जिसमें मांग की मात्रा बाजार में वस्तु की पूर्ति के बराबर होती है।
बाजार
की दो प्रमुख
विशेषताएं
है:
*
बाजार को
एक विशेष स्थान
या क्षेत्र
की आवश्यकता
नहीं होती
है। यह एक
भौतिक या
आभासी क्षेत्र
में हो सकता
है।
*
क्रेता और
विक्रेता
क्रय और
विक्रय करने
हेतु कीमत और
मात्रा के
बारे में
सौदेबाजी को
प्रभावित
करने के लिए
सक्षम होने
चाहिए।
संपूरक वस्तुओं को ऐसी वस्तुओं के रूप में परिभाषित किया जाता है जिनकी मांग तब बढ़ती है जब अन्य वस्तुओं की कीमत कम हो जाती है और मांग तब कम होती है जब अन्य वस्तुओं की कीमत बढ़ जाती हैं। इन वस्तुओं की मांग संयुक्त होती हैं। उदाहरण के लिए, जब पेट्रोल की कीमत बढ़ती है तो कार की मांग कम हो जाती है क्योंकि कार पेट्रोल पर चलती है।
जब पूर्तिकर्ता द्वारा बाजार में क्रेता द्वारा मांगी गयी मात्रा से अधिक मात्रा की पूर्ति की जाती है तब इसे अतिरिक्त पूर्ति कहा जाता है।
अतिरिक्त पूर्ति कीमत को कम कर देती है और जब तक कीमतें संतुलन स्तर पर नहीं पहुंचती तब तक प्रक्रिया जारी रहती है।
काटने के लिए कैंची के दो फलक की आवश्यकता होती है। दोनों जरूरी हैं और दोनों महत्वपूर्ण है। उसी प्रकार, संतुलित कीमत और मात्रा का निर्धारण करने के लिए मांग और पूर्ति दोनों का संयुक्त रूप से प्रतिस्पर्धी बाजार में होना आवश्यक है। मांग या पूर्ति अकेले बाजार में किसी भी परिवर्तन को निर्धारित नहीं कर सकती है। इसलिए, यह कहना सही है कि मांग और पूर्ति एक कैंची के दो फलक है।
एक बहुत लंबी अवधि जिसमें मांग और पूर्ति के बीच पूर्ण समायोजन किया जा सकता है को चिरकालिक अवधि कहा जाता है।
चिरकालिक
अवधि की
विशेषताएं
निम्नलिखित
हैं:
* उत्पादन
के कारकों को
मांग और
पूर्ति में
परिवर्तन के
कारण बदला जा
सकता है।
* मांग, पूर्ति,
आय, जनसंख्या,
उत्पादन
की तकनीक, नए
आवष्किार
आदि में
परिवर्तन
किया जा सकता
है।
* क्योंकि
समय अवधि
बहुत लंबी
होती है,इसलिए
कोई सामान्यकरण
इस बारे में
नहीं बनाया
जा सकता है।
अल्प काल की तुलना में दीर्घ काल अधिक लोचदार होता है क्योंकि दीर्घ काल में वस्तु की पूर्ति को मांग में वृद्धि के कारण बाजार में हुये परिवर्तनों के अनुसार समायोजित किया जा सकता है। नई फर्में बाजार में प्रवेश कर सकती हैं। पुरानी फर्में बाजार छोड़ सकती हैं और वर्तमान फर्में अपने उत्पादन के स्तर को बदल सकती हैं।
|
पूर्णत: प्रतिस्पर्धी |
एकाधिकार |
|
बहुत सारे विक्रेता |
एक विक्रेता |
|
क्रेता और विक्रेताओं को सौदेबाजी का कोई अधिकार नहीं होता है। |
विक्रेता कीमत निर्धारित करता है और क्रेता को सौदेबाजी का कोई अधिकार नहीं होता है। |
|
मांग वक्र लोचदार होता है |
मांग वक्र बेलोचदार होता है |
|
प्रवेश और निकास की स्वतंत्रता |
प्रवेश के लिए बाधांए |
|
फर्म केवल सामान्य लाभ कमाती है |
फर्म असामान्य लाभ कमाती है |
एकाधिकार में, बाजार में केवल एक ही विक्रेता होता है, इसलिए कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती है। बाजार में विक्रेता कीमत निर्धारक है। क्योंकि बाजार में उत्पादित वस्तुओं की कोई स्थानापन्न वस्तुएं उपलब्ध नहीं होती है। कोई विक्रय लागत मौजूद नहीं होती है इसलिए उत्पाद को बढ़ावा देने या विज्ञापन की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
अपूर्ण प्रतियोगिता की मुख्य विशेषताएं निम्नांकित है-
(1)फर्मों (विक्रेताओं) की अधिक संख्या - बाजार की ऐसी अवस्था में किसी वस्तु का उत्पादन करने वाली फर्मों की संख्या काफी अधिक होती है।
(2)क्रेताओं की अधिक संख्या -ऐसे बाजार में किसी वस्तु के प्रत्येक ब्रान्ड को खरीदने वाले अनेक क्रेता होते हैं।
(3)वस्तु विभेद - अनेक फर्में मिलती जुलती वस्तुओं का उत्पादन करती हैं,अर्थात रंग,रूप,आकार,डिजाइन,पैंकिंग,आदि के आधार पर वस्तु विभेद पाया जाता है। वस्तुओं एक दूसरे की निकट स्थानापन्न होती है।
(4)फर्मों के प्रवेश एवं बहिर्गमन की स्वतन्त्रता - अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत नर्इ फर्मों को बाजार में प्रवेश करने तथा पुरानी फर्मों को बाजार को छोड़ने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।
(5)बाजार का अपूर्ण ज्ञान - क्रेता यह नहीं जान पाते हैं कि कौन-सी फर्में वस्तु को सबसे कम कीमत पर बेच रही है। इसलिए क्रेताओं तथा विक्रेताओं को बाजार का अपूर्ण ज्ञान रहता है।
(6)समझौता नहीं - कीमत या उत्पादन के संबंध में फर्मों के बीच कोर्इ समझौता नहीं होता है। प्रत्येक फर्म अपनी वस्तु की कीमत तथा उत्पादन के बारे में स्वतंत्र निर्णय ले सकती है।
(7)विक्रय लागतें - फर्मों की वस्तुएं एक दूसरे की निकट स्थानापन्न होती हैं इसलिए सभी फर्में अपनी वस्तु की बिक्री बढ़ाने के लिए समाचारपत्रों,पत्रिकाओं,सिनेमा,रेडियों,टेलीविजन,आदि में विज्ञापन पर पर्याप्त धनराशि व्यय करती हैं।
(8)गैर कीमत प्रतियोगिता - पूर्ण प्रतियोगिता में फर्में अपनी वस्तुओं को अधिक से अधिक मात्रा में बेचने के लिए गिफ्ट योजना चलाकर, ग्राहकों को विशेष सुविधाएं प्रदान कर गैर-कीमत प्रतियोगिता के विभिन्न तरीके अपनाती है।
(9)औसत तथा सीमांत आय वक्र - अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत प्रत्येक फर्म की अपनी स्वतंत्र कीमत नीति होती है। वस्तु को अधिक मात्रा में बेचने के लिए प्रत्येक फर्म को अपनी कीमत कम करनी पड़ती है। इसलिए फर्म के औसत आय वक्र और सीमांत आय वक्र बार्इं ओर नीचे को झुके होते है।
(10)लागत तथा पूर्ण वक्र - ऐसे बाजार में औसत लागत,सीमांत लागत,औसत परिवर्तनशील लागत तथा विक्रय लागत के वक्र U - आकार के होते हैं।
(1) यदि मांग पूर्णत: लोचदार है और पूर्ति घटती है, तो कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होगा। जब पूर्ति SS से घटकर S2S2 हो जाती है, तो कीमत OP पर स्थिर बनी रहती है लेकिन मात्रा OQ से घटकर OQ2 हो जाती है।
(2) जब पूर्ति पूर्णत: बेलोचदार होती है और मांग बढ़ जाती है, तो वस्तु की कीमत बढ़ जायेगी और मात्रा स्थिर बनी रहेगी। आरेख में जब मांग DD से बढ़करD1D1हो जाती है, तो कीमत भी OP से बढ़करOP1हो जाती है लेकिन मात्राOQपर वैसी ही बनी रहती है।
A.
मिलान की अवधारण
B.
लागत की अवधारणा
C.
मुद्रा मापांकन अवधारणा
D.
द्वि-पहलू अवधारणा।
द्वि-पक्षीय अवधारणा के अनुसार, प्रत्येक लेन-देन के दो पहलू होते हैं, अतः यदि कोई लेन-देन या घटना घटित होती है तो उसके भी दो प्रभाव होंगे।
A.
सभी व्यावसायिक व्यवहारों का लेखा करना
B.
वित्तीय ऑकडों की व्याख्या करना
C.
प्रबन्ध को कुशलतापूर्वक कार्य करने में सहयोग देना
D.
उपरोक्त में कोई नहीं।
लेखांकन की इस शाखा का मुख्य उद्देश्य व्यायसायिक लेन-देनों का नियमानुसार लेखा करना, लाभ-हानि खाता बनाकर लेखांकन अवधि के लाभ-हानि को ज्ञात करना और स्थिति विवरण बनाकर व्यवसाय की वित्तीय स्थिति को प्रकट करना है। लेखांकन की यह शाखा प्रबन्धकों एवं व्यवसाय में हित रखने वाले अन्य पक्षकारों को उनके द्वारा वांछित सूचनाएँ प्रदान करती है।
A.
वित्तीय लेखाकंन
B.
लागत लेखांकन
C.
प्रबन्धकीय लेखांकन
D.
उपरोक्त सभी।
आधुनिक प्रबन्ध को अपने कार्यो को अधिक कुशलतापूर्वक सम्पादन करने के लिए विभिन्न प्रकार की सचनाओं की आवश्यकता होती है। प्रबन्ध की बढती हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लेखांकन की विशिष्ट शखओं का विकास हुआ है जैसे कि वित्तीय लेखांकन, लागत लेखांकन, प्रबन्धकीय लेखांकन, कर लेखांकन, सामाजिक दायित्व लेखांकन इत्यादि।
A.
वित्तीय
B.
प्राकृतिक
C.
मानवीय
D.
उपर्युक्त में से कोई नहीं।
लेखांकन उन व्यावसायिक लेन-देनों और घटनाओं को लेखांकन करने एवं वर्गीकरण करने का विज्ञान है जो मुख्यतः वित्तीय प्रकृति के हैं और यह इन लेन-देनों और घटनाओं का सारांश, वर्गीकरण एवं व्याख्या करने एवं परिणामों को इनमें रूचि रखने वाले व्यक्तियों को संवहन करने की कला भी है जिनके आधार वह अपने निर्णय ले सकें।
A.
व्यवहारों का लिखना
B.
वित्तीय विवरण तैयार करना
C.
वित्तीय सूचनाओं का सम्प्रेषण।
D.
वित्तीय सूचनाओं का विश्लेषण एवं व्याख्या
लेखांकन की विशेषताओं में वित्तीय डाटा को इसके उपयोकर्ताओं तक प्रेषित करना (संवहन करना) भी सम्मिलित है जो अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार इनका विश्लेषण करते हैं।
A.
विज्ञान है
B.
कला है
C.
विज्ञान एवं कला है।
D.
उपर्युक्त में से कोई नहीं।
यह मुख्य रूप से लेखा पुस्तकें रखने से सम्बन्धित है। लेखा पुस्तकें रखने में निम्न चार क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है : (i) विभिन्न लेन-देनों में से ऐसे लेन-देनों की पहचान करना जो वित्तीय प्रकृति के हैं। (ii) पहचान किए गए लेन-देनों को मुद्रा के रूप में मापना (iii) पहचान किए गए लीन-देनों की प्रारम्भिक लेखें की पुस्तकों में प्रविश्टि करना (iv) इनका खाताबही में वर्गीकरण करना।
A.
माल का विक्रय
B.
वेतन का भुगतान
C.
स्टाफ की गुणवत्ता
D.
उपर्युक्त में से कोई नहीं।
पुस्तकों में प्रत्येक लेन-देन का मुद्रा के रूप में ही लेखा किया जाता है जैसे कि एक व्यवसायी ने 200 कुर्सियों व 10 मेजें खरीदी तो इनका मुदा के रूप में जो मूल्य होगा उसी का लेखा किया जाएगा।
A.
लेखांकन
B.
पुस्तपालन
C.
उपर्युक्त सभी
D.
उपर्युक्त में से कोई नहीं।
सारांश तैयार करना एक ऐसी कला है जिसके अंतर्गत वर्गीकृत किए गए आंकड़ो को इस ढंग से पेश किया जाता है कि वह प्रबन्धकों एवं अन्य व्यक्तियों की समझ में आ जाएँ और उनके लिए उपयोगी सिद्ध हों। इसके लिए खाताबही के समस्त खातों के षेश निकाले जाते हैं एवं उनकी सहायता से तलपट तैयार किया जाता है। तलपट की सहायता से अन्तिम खाते तैयार किए जाते हैं जिनमें व्यापारिक खाता, लाभ-हानि खाता, तथा स्थिति विवरण सम्मिलित होते हैं।
A.
वित्तीय संमकों का सारांश तैयार करने की विधि तैयार करना
B.
आनतरिक और बाह्य उपयोगकर्ताओं के लिए संमकों के निष्कर्ष तैयार करना
C.
व्यवसायिक संस्था के वित्तीय विवरण तैयार करना
D.
उपर्युक्त में से कोई नहीं।
पुस्तपालन उन सब व्यापारिक व्यवहारों को जिनमें मुद्रा या मुद्रा के तुल्य मूल्य का हस्तांतरण होता हो, बहियों में सही-सही लिखने की विज्ञान व कला है।
A.
लेन-देन का पूर्ण अभिलेखन,
B.
व्यवसाय पर वित्तीय प्रभावों का निर्धारण
C.
डाटा का विशलेषण तथा निर्वचन
D.
(i) तथा (ii) दोनों
पुस्तपालन व्यावसायिक अथवा वित्तीय लेन-देनों के मौद्रिक पहलू को लेखे की पुस्तकों में लेखांकन करने की कला है।
A.
वित्तीय लेखांकन
B.
पुस्तपालन
C.
प्रबधकीय लेखांकन
D.
लागत लेखांकन
पुस्तपालन का क्षेत्र सीमित है। इसमें व्यवहारों को प्रारम्भिक लेखा-पुस्तकों में लिखा जाता है। प्रारम्भिक लेखा-पुस्तकों से खाताबही में पोस्टिंग की जाती है तथा खातों का शेष ज्ञात किया जाता है।
A.
सम्भावित विनियोक्ता
B.
लेनदार
C.
प्रबंधक
D.
कर्मचारी
लेखांकन सूचनओं के आन्तरिक प्रयोगकर्ता वे व्यक्ति अथवा समूह हैं जो संगठन के अन्दर कार्यरत हैं।
A.
प्रविष्टि
B.
लेन-देन
C.
डाटा
D.
ऑकडे
लेन-देनों को दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है : बाह्य एवं आन्तरिक। बाह्य लेन-देन दो स्वतन्त्र व्यावसायिक इकाईयों के बीच हुई आथिर्क क्रियाओं को कहा जाता है जैसे कि माल का क्रय अथवा विक्रय।
A.
रू 5,000 माल का विक्रय
B.
रू 4,000 का अन्तिम रहतिया
C.
रू 8,000 के माल का क्रय
D.
रू 2,000 का किराया भुगतान
घटना किसी लेनदेन का निष्कर्ष या परिणाम होती है।
A. एक लेन-देन
B. एक घटना
C. लेन-देन तथा घटना दोनों
D. न ही लेन-देन न ही घटना।
घटना किसी लेनदेन का निष्कर्ष या परिणाम होती है।
A. व्यवसाय मे हित रखने वाले विभिन्न पक्षकारों को सूचनाएँ प्रदान करना
B. पुस्तकों मं लेन-देनों का लेखांकन करना
C. वित्तीय विवरणें के रूप में सारांश तैयार करना
D. लेन-देनों का खाताबही में अलग-अलग शीर्षकों में वर्गीकरण करना
लेखांकन का उद्देश्य व्यावसायिक क्रियाओं के बारे में सम्बन्धित पक्षों को वित्तीय विवरण (लाभ-हानि खाता तथा चिट्ठा) द्वारा वित्तीय सूचना उपलब्ध कराना है जिससे वे सही आर्थिक निर्णय ले सकें।
अतिरिक्त मांग के अर्थ को निम्न आरेख की मदद से समझाया जा सकता है:

आरेख में, कीमत को X- अक्ष पर दिखाया गया है और मात्रा कोY- अक्ष पर दिखाया गया है।E संतुलन बिंदु है जहां मांग पूर्ति के बराबर है। OP संतुलन कीमत है। OQ संतुलन मात्रा है।
जब कीमतOP1 तक कम हो जाती है तब मांगOQ से बढ़ कर OQ2 हो जाती है और पूर्ति OQ से कम होकर OQ1 हो जाती है। यहां, मांग(OQ2) पूर्ति (OQ1) से अधिक है। इसे अतिरिक्त मांग के रूप में जाना जाता है।
नहीं, सामान्य परिस्थितियों में मांग और पूर्ति वक्र दो बिंदुओं पर एक दूसरे नहीं काट सकते हैं, क्योंकि नीचे ओर झुका हुआ मांग वक्र कीमत और मांगी गयी मात्रा के बीच विपरीत संबंध को दिखाता है। दूसरी ओर, पूर्ति वक्र कीमत और पूर्ति के बीच सकारात्मक संबंध के कारण बायें से दायें ऊपर की ओर झुका हुआ है। इसलिए, ये दोनों वक्र केवल एक ही बिंदु पर एक दूसरे को काटेगे।
अर्थव्यवस्था को मंदी सेउभारने या इसे हानियों से बचाने के लिए मांग पैदा की जाती है। ऊंची कीमतें रखते हुए और आवश्यक मुनाफा कमाने के लिए वस्तुएं कम मात्रा में बाजार में बेची जाती हैं।
हां यह कहना सही है कि कीमत में वृद्धि होते ही मांग घट जाती है और पूर्ति बढ़ जाती है।
जब कीमत में वृद्धि होती है तो उपभोक्ता कम खरीदारी करने में सक्षम होते हैं और इसलिए मांग घट जाती है। दूसरी ओर, जब कीमत में वृद्धि होती है तो उत्पादक अधिक पूर्ति करना चाहते हैं क्योंकि वे अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं।
भले ही अतिरिक्त पूर्ति होती है तो भी आपूर्तिकर्ताओं द्वारा जमाखोरी, कालाबाजारी और अत्यधिक निर्यातों आदि जैसी अवैध प्रक्रियाओं के कारण अर्थव्यवस्था में वस्तु की कीमतें ऊंची बनी रहती है।
मांग
की तीन
विशेषताएं
निम्नलिखित
हैं:
* यह
खरीदने की
इच्छा और क्षमता
है।
* यह
सदैव एक कीमत
होती है।
* इसे
सदैव एक
विशिष्ट
समय के
संदर्भ में
व्यक्त
किया जाता
है।
मांग बहुत ही अल्प अवधि या बाजार अवधि में मूल्य निर्धारण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूर्ति को बहुत कम अवधि में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है और इसलिए मांग बाजार में वस्तु की कीमत का निर्धारण करती है।
संतुलन कीमत को मांग और पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित किया जाता है। यह एक कीमत है जिस पर एक वस्तु की मांग और पूर्ति बराबर होती हैं तथा मांग और पूर्ति वक्र एक दूसरे को काटते हैं।
निम्न अनुसूची संतुलन कीमत के निर्धारण को दर्शाती है:
|
कीमत (रूपये) |
मांग (इकाइयां) |
पूर्ति (इकाइयां) |
|
5 |
100 |
500 अतिरिक्त पूर्ति |
|
4 |
200 |
400 अतिरिक्त पूर्ति |
|
3 |
300 |
300 मांग=पूर्ति |
|
2 |
400 |
200अतिरिक्त मांग |
|
1 |
500 |
100अतिरिक्त मांग |
Eबिंदु पर, संतुलन कीमतOP और संतुलन मात्राOQ है।