दो वस्तुओं के लिए बजट रेखा का समीकरण कुछ इस प्रकार होता है-
M = Px X + Py Y
कीमतों के साथ साथ एक उपभोक्ता की आय भी दुगनी हो जाने पर बजट रेखा का समीकरण इस प्रकार हो जाएगा –
(2M) = (2Px) X + (2Py) Y
2M = 2[Px X + Py Y]
समान घटकों को रद्द करके हमें निम्न समीकरण प्राप्त होता है -
M = Px X + Py Y
क्योंकि कीमतें और आय सामान अनुपात में बदली हैं, इसलिएऐसी स्थिति मेंउपभोक्ता के संतुलन में कोई बदलाव नहीं आएगा|
एक
वस्तु की
मांग की कीमत
लोच का
निर्धारण
करने वाले दो
कारक निम्न
हैं:
1. वस्तु
के लिए
नजदीकी स्थानापन्न
की उपलब्धता:एक
वस्तु की
मांग लोचदार
तब होगी यदि
इसके लिए अच्छे
स्थानापन्न
उपलब्ध
हैं। कोई स्थानापन्न
नहीं होने
वाली एक वस्तु
की मांग
बेलोचदार
होगी।उदाहरण
के लिए, कॉफ़ी
और चाय
स्थानापन्न
वस्तुए हैं|
कीमत बढ़ने पर
उपभोक्ता
इनमे से दूसरी
वस्तु की
मांग कर सकता
है|
2. वस्तु
पर कुल व्यय:जहां
आय का एक छोटा
सा हिस्सा
खर्च किया
जाता है वहां
ऐसी वस्तुओं
के लिए मांग
बेलोचदार होगी
उदाहरण, सूई, माचिस,
बटन
आदि।
मांग की लोच निम्न प्रकार से महत्वपूर्ण है:
(1)
व्यापारी
के लिए महत्व:व्यापारीअपनी
कीमत के
निर्धारण का
मांग की प्रकृति
से पता लगाता
है। यदि मांग
बेलोचदार है,
तो
वह जानता है
कि लोग ऐसी वस्तुओं
को खरीदेगे।
इस प्रकार, वह
अधिक कीमत
लेने और बड़ा
लाभ कमाने
में सक्षम हो
जायेगा।
(2)मजदूरी
का निर्धारण:मांग
की लोच की
अवधारणा एक
विशेष
प्रकार के श्रमिकों
की मजदूरी के
निर्धारण को
प्रभारित करती
है। यदि
विशेष
प्रकार के
श्रमिकों की
मांग
बेलोचदार है,
तब
श्रमिक संघ
अपनी मजूदरी
को आसानी से
बढ़वा सकते
हैं। दूसरी
तरफ, यदि
श्रमिकों की
मांग
अपेक्षाकृत
कम लोचदार है,
तब
श्रमिक संघ
मजदूरी
बढवाने में
इतने सफल नहीं
हो सकते हैं।
मांग में संकुचन और कमी के बीच अंतर इस प्रकार हैं:
|
मांग में संकुचन |
मांग में कमी |
|
इसमें वस्तु की अपनी कीमत में वृद्धि(गिरावट) के कारण मांग की मात्रा में कमी(वृद्धि)। |
इसमें वस्तु की अपनी कीमत में किसी परिवर्तन के बिना, मांग की मात्रा में परिवर्तन आता है| |
|
मांग को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। |
मांग को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों जैसे आय, स्वाद, संबंधित वस्तुओं के कीमत में परिवर्तन के कारण मांग की मात्रा में परिवर्तन आता है| |
|
उसी मांग वक्र में ऊपर की ओर या नीचे की ओर गति होती है। |
सम्पूर्ण मांग वक्र बाई या दाई ओर चला जाता है। |
इन
दोनों
उपागमों के
बीच अंतर हैं:
1.
उपयोगिता की
माप:
भौतिक रूप से
उपयोगिता कागणनावाचक
माप संभव
नहीं है क्योंकि
यह विशुद्ध
रूप से
उपभोक्ता
के मन की
मनोवैज्ञानिक
अवस्था है।
उदासीनता
वक्र विश्लेषणसंयोजनों
के लिए
अधिमानों के
आधार पर क्रमसूचक
उपयोगिता पर
विचार करता
है इसलिए यह
अधिक व्यवहारिक
है।
2.
कीमत प्रभाव
की अधिक
जानकारी:
सीमांत
उपयोगिता
विश्लेषण
आय प्रभाव की
उपेक्षा
करते हुए
प्रतिस्थापन
प्रभाव के
माध्यम से
किसी वस्तु
की कीमत में
हुए
परिवर्तन के
प्रभाव पर ध्यान
देता है।
अनधिमान
वक्र विश्लेषण
कीमत प्रभाव
को आय और
प्रतिस्थापन
प्रभाव
दोनों में
विभाजित
करता है।
|
गोलगप्पे की इकाइयां |
MU |
TU |
|
1 2 3 4 5 6 7 |
10 8 6 4 2 0 -2 |
10 18 24 28 30 30 28 |
किसी
इकाई तक कुल
उपयोगिता(TU) = उस
इकाई तक सभी
सीमांत
उपयोगिताओं(MU) का
योग|
जब कीमत में परिवर्तन के परिणामस्वरूप माँग में कोई परिवर्तन नहीं होता है तब माँग पूर्णतया बेलोचदार होती है।
बीजगणितीय रूप
ed = 0
वास्तविक जीवन में इसके बहुत कम उदाहरण मिलते है | इसका एक उदाहरण है - नमक जो एक आवश्यक वस्तु है और जिसकी कीमत में बहुत अधिक परिवर्तन होने पर भी उसकी माँग में परिवर्तन नहीं होता है |
इसकी माँग अनुसूची और माँग वक्र इस प्रकार है :



मान लीजिये दो माँग वक्र DD और D1D1 है | DD एक समतल माँग वक्र है जिसकी लोच अधिक है और D1D1 एक कम ढाल वाला माँग वक्र है जिसकी लोच कम है। कीमत P पर
दोनों ही वक्र DD और D1D1 के लिए इष्टतम मात्रा समान अर्थात OQ है।
मान लीजिए कि कीमत P से बढ़कर OP1 हो जाती है।
इष्टतम मात्रा समतल वक्र DD पर OQ से घटकर OQ2 हो जाती है।

इष्टतम मात्रा समतल वक्र D1D1 पर OQ से घटकर OQ1 हो जाती है।
इष्टतम मात्रा में गिरावट समतल वक्र पर ढालू माँग वक्र की तुलना में अधिक है।

अत: यह निष्कर्ष निकलता है कि DD पर इष्टतम मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन अधिक है- अधिक लोच
D1D1 पर इष्टतम मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन कम है - कम लोच|
मांग की कीमत लोच किसी वस्तु की कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन एवं उस वस्तु की मांग में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन का अनुपात है। इसका समीकरण इस प्रकार है-

मांग की कीमत लोच की श्रेणियां इस प्रकार हैं-
(1) पूर्ण लोचदार मांग - कीमत में थोडी कमी/वृद्धि होने पर वस्तु की मांग में अनन्त वृद्धि/कमी हो जाती है।
(2) पूर्णतया बेलोचदार मांग - वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर उस वस्तु की मांग में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
(3) बेलोचदार मांग - इसमें मांग का आनुपातिक परिवर्तन उस वस्तु की कीमत के आनुपातिक परिवर्तन से कम होता है।
(4) लोचदार मांग - मांग का आनुपातिक परिवर्तन कीमत के आनुपातिक परिवर्तन के बराबर होता है तो लोच इकाई के बराबर होती है।
(1) बजट रेखा का समीकरण यह होगा:
P1X1 + P2X2 = 20
4X1 + 5Y1 = 20
(2) यदि उपभोक्ता अपनी पूरी आय वस्तु1 पर खर्च करता हैतो उपभोक्ता वस्तु 1 की 5 इकाइयों का उपभोग कर सकती है।
4X1 + 5*0 = 20
X1=20/4 = 5
(3) बजट रेखा की ढाल ऋणात्मक है।
बजट
रेखा की ढाल=(-)
=(-)
= -0.8
(4) यदि उपभोक्ता अपनी पूरी आय वस्तु1 पर खर्च करता हैतो उपभोक्ता वस्तु 1 की 5 इकाइयों का उपभोग कर सकती है।
4*0 + 5Y1 = 20
Y1=20/5 = 4
अनधिमान वक्र विश्लेषण निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित होता है:
1. क्रमसूचक
उपयोगिता:
उपभोक्ता
संतुष्टि के
आधार पर
बंडलों को
क्रम दे सकता
है।
2. विवेकशीलता:
उपभोक्ता
अपनी दी गईआय
से अधिकतम
संतुष्टि
प्राप्त
करने का
प्रयास करता
है।
3. गैर-
तुष्टि:
उपभोक्ता तुष्टि के
बिंदु तक
नहीं पहुंच
पाता है
अर्थात् वह वस्तु
की अधिक से
अधिकइकाइयों
का उपभोग करना
चाहता है।
4. चयन
की
संक्रामिता:
ऐसा माना
जाता है कि
यदि कोई उपभोक्तासंयोजन
Aऔर
Bके
बीच Bको
अधिमानता
देता है औरBऔर Cके
बीच Cको
अधिमानता
देता है तो
उसेAऔर Cके
बीच Aको
अधिमानता देना
चाहिए। इस
मान्यता का
आशय यह है कि
उपभोक्ता
की रूचि एक सी
रहनी चाहिए।
5. प्रतिस्थापन
की ह्रासमान
सीमांत दर: क्योंकि
उपभोक्ता
अधिक से अधिक
एक वस्तु
(कहने के लिएX) का
दूसरी वस्तु
(कहने के लिएY) के
लिए प्रतिस्थापित
करता है, वहX की
एक अतिरिक्त
इकाई के लिएYकी
कम से कम
इकाइयों का
त्याग करने
के लिए तैयार
होगा।
6. चयन संगति: अगर किसी समय पर एक उपभोक्ता को बंडल A या बंडल B उपलब्ध हो और वह उन में से बंडल B का चयन करे, तो कुछ समय बाद भी इन दो बंडलों में से उपभोक्ता को बंडल B का ही चयन करना चाहिए|
उपभोक्ता
अपने संतुलन
को तब प्राप्त
करता है जब वह
दो वस्तुओं
की कीमतों और
अपनी दी हुई
आय से अपनी
कुल
उपयोगिता को
अधिकतम करता
है।
धन
की दी हुई
मात्रा जिसे
उपभोक्ता
दो वस्तुओं
पर खर्च करना
चाहता है तथा
दो वस्तुओं
की दी हुई
कीमतों से एक
बजट रेखा NM बनाई गई
है:

निम्न आरेख में IC1, IC2 और IC3 एक उपभोक्ता के तीन अनधिमान वक्र हैं|
उपभोक्ता संयोजन Aऔर P में से किसी का भी उपभोग कर सकता है, लेकिन क्योंकि संयोजन P पर बजट रेखा सर्वोच्च प्राप्य अनधिमान वक्र को स्पर्श करती है इसलिए यह संयोजन उपभोक्ता को अधिक्तम साध्य संतुष्टि देगा|
उपभोक्ता अनधिमान वक्र IC3 के किसी संयोजन, जैसे की D पर उपभोग नहीं कर सकता क्योंकि यह उपभोक्ता के बजट के बाहर है और इसलिए उपभोक्ता के लिए आसध्य है|
उपभोक्ता को संयोजन A भी उपलब्ध हैं लेकिन क्योंकि ये IC2 से निम्नतरअनधिमान वक्र पर मौजूद हैं इसलिए इनके उपभोग से उपभोक्ता को अधिक्तम प्राप्य संतुष्टि नही मिलेगी|
अनधिमान
वक्र का ढाल
दो वस्तुओं
के बीच
प्रतिस्थापन
की सीमांत दर (MRS) को
दिखाता है और
बजट रेखा का
ढाल दो वस्तुओं
की कीमतों के
बीच के
अनुपात को
दिखाता है | P को स्पर्श
करते बिंदु
परउपभोक्ता
की संतुलन की
शर्तों को व्यक्त
किया जा सकता
है जैसे: MRS=![]()
किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप उसकी मांग में जिस अनुपात या दर से परिवर्तन होता है उसे मांग की कीमत सापेक्षता या मांग की कीमत लोच कहते है।
मांग की कीमत लोच को मापने की विधि-
प्रतिशत विधि - इस विधि में माँग की कीमत लोच का निर्धारण इष्टतम मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन तथा कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के अनुपात के द्वारा किया जाता है। इस विधि की निम्न धारणाएँ है :
सूत्र :

औसत उत्पाद को इस प्रकार दर्शाया जा सकता है:
A. परिवर्ती अनुपात के नियम से
B. पैमाने के प्रतिफल से
C. दोनों (A) तथा (B) से
D. इनमें से कोई नहीं
अल्पकालीन उत्पादन फलन में केवल परिवर्ती कारक के प्रयोग में वृद्धि करके ही उत्पादन को बढ़ाया जा सकता हैं|
पैमाने के प्रतिफल उत्पादन पर सभी आगतों में अनुपातिक वृद्धि के प्रभाव को दर्शाता है।
उत्पादन
के दो नियम
हैं:
(1) अल्पकाल
में - कारक के
प्रतिफल
(2) दीर्घकाल
में - पैमाने
के प्रतिफल
उत्पादन
फलन के दो
प्रकार हैं:
(1) अल्पकालीन
उत्पादन
फलन
(2) दीर्घकालीन
उत्पादन
फलन
वह अवधि जिसमें उत्पादक सभी आगतों में परिवर्तन कर सकता है।
जब एक वस्तु के उत्पादन में प्रयुक्त सभी आगतें साथ-साथ उसी अनुपात में बदलती है, तब हम उत्पादन में परिवर्तन का अध्ययन दीर्घकालीन उत्पादन फलन में करते हैं।
सीमांत उत्पाद वक्र अपने अधिकतम बिंदु(AP वक्र)पर औसत उत्पाद वक्र को काटता है।
परवर्ती कारक उत्पादन का वह कारक है जिसकी मात्रा को उत्पादन के स्तर में परिवर्तन लाने के लिए अल्पकाल में परिवर्तित किया जाता है उदाहरण के लिए, श्रम और कच्चा माल।
उत्पादन के तीन अवस्थाएं नीचे दिये गये है;
* बढ़ते
प्रतिफल की
अवस्था
* घटते
प्रतिफल की
अवस्था
* नकारात्मक की
अवस्था
हां, जब सीमांत लागत बढ़ती है तो औसत लागत गिर सकती है क्योंकि MC, AC को इसके निम्नतम बिंदु पर काटता है। जब औसत लागत बढ़ती है तब यह औसत लागत से ऊपर होता है।
अ) परिवर्ती लागत
ब) स्थिर लागत
कुल स्थिर लागत और कुल परिवर्ती लागत के जोड़ से कुल लागत प्राप्त होती है| TC=TFC+TVC
औसत लागत उत्पादन के स्थिर और परिवर्ती दोनों साधनों की प्रति इकाई लागत है।
सामाजिक लागत उस लागत को दर्शाती है जिसे समाज को एक वस्तु के उत्पादन के कारण वहन करना पड़ता है।
यह फर्म द्वारा वस्तु के विनिर्माण या सेवा प्रदान करने में किए गए व्यय को दर्शाता है।
कुल लागत शून्य उत्पाद पर भी मोजूद होती है, इसलिए इसे अपरिहार्य लागत भी कहा जाता है।
1) स्थिर लागत वे लागत होती हैं जो उत्पादन के स्तर में परिवर्तन के साथ परिवर्तित नहीं होती हैं जबकि परिवर्ती लागत उत्पादन के स्तर में परिवर्तन के साथ परिवर्तित होती है।
2) स्थिर लागत उत्पादन के सभी स्तरों पर स्थिर बनी रहती है और कभी भी शून्य नहीं हो सकती है, जबकि परिवर्ती लागत शून्य उत्पादन के साथ शून्य होती है।
कुल उत्पाद (TP) स्थिर साधन के साथ एक परवर्ती साधन की विशिष्ट मात्रा के संयोजन द्वारा एक दी हुयी समयावधि के दौरान उत्पादित वस्तु की कुल मात्रा को दर्शाता है।
TP=∑MP
हृासमान प्रतिफलों के मुख्य कारण हैं:
* अधिक संख्या होना- यदि स्थिर साधनों की निर्धारित मात्रा के साथ अधिक से अधिक परवर्ती साधनों को लगाया जाता है, तो उत्पादकता मशीनों और उपकरणों की कमी के कारण कम हो जायेगी।
* प्रबंधन की समस्या- यदि बहुत अधिक श्रमिकों को लगाया जाता है तो उनकी जिम्मेदारियां बदल सकती है। काम को टालने की समस्या के अलावा उत्पादन में कमी पैदा होगी।
प्रश्न में दिये अनुसार:
मजदूरों के कुल उत्पादन में परिवर्तन = 36-30
TPL
= 6 कुर्सियां
मजदूरों की संख्या में परिवर्तन =12-10
L
= 2 श्रमिक
मजदूरों
का सीमांत
उत्पादन MPL=?
चूंकि,

MPL = 6/2
MPL = 3 कुर्सियां
(अ) जब AC वक्र गिरता है, तबMC वक्र AC वक्र से नीचे होता है।
(ब) जब AC वक्र बढ़ता है, तब MC वक्र AC वक्र से ऊपर होता है।

(1) TFC वक्र
X अक्ष के
समानांतर एक सीधी
रेखा होता
है।
(2) TVC वक्र
उत्पादन के
कुछ स्तर तक
नीचे की ओर
नतोदर होता
है, फिर ऊपर
की ओर नतोदर
होता है।
(3) AFC वक्र
एक आयताकार
अतिपरवलय
होता है जो निरंतर
बाएं से दाएं
नीचे की ओर
ढ़ालू होता
है।
(4) AC वक्र
U-आकार का
होता है।
बढ़ते पैमाने के प्रतिफल के अंतर्गत, उत्पादन में अनुपातिक वृद्धि आगतों में अनुपातिक वृद्धि की तुलना में अधिक होती है।
उदाहरण:
2 श्रमिक+ 1 मशीन = 70 इकाइयों का उत्पादन
4 श्रमिक + 2 मशीनें = 200 इकाइयों का उत्पादन
स्थिर पैमाने के प्रतिफल के अंतर्गत, उत्पादन में वृद्धि उसी अनुपात में होती है जिस अनुपात में सभी आगतों की मात्रा में वृद्धि होती है।
उदाहरण:
2 श्रमिक + 1 मशीन = 50 इकाइयों
का उत्पादन
4 श्रमिक + 2 मशीनें = 100 इकाइयों
का उत्पादन

TVC वक्र उत्पादन के OQ स्तर तक नीचे की ओर नतोदर है जो दर्शाता है कि TVC एक घटती हुयी दर से वृद्धि करता है। TVC स्थिर साधनों के पूर्ण उपयोग और अधिक से अधिक विशिष्टीकरण के कारण घटती हुयी दर से वृद्धि करता है। इसे परिवर्ती आगतों का वर्धमान प्रतिफल कहा जाता है।
TVC वक्र उत्पादन के OQ स्तर से आगे ऊपर की ओर उन्नोतदर होता है जो दर्शाता है कि TVC एक बढ़ती हुयी दर से वृद्धि करता है। TVC स्थिर साधनों के अति उपयोग और प्रबंधकीय समस्या के कारण बढ़ती हुयी दर से वृद्धि करता है। इसे परिवर्ती आगतों का ह्रासमान प्रतिफल कहा जाता है।
प्रति
श्रमिक उत्पादता
श्रम का औसत
उत्पाद
होती है। इसे
निम्न
सूत्र
द्वारा
परिकलित
किया जाता है-

प्रश्न
में दिया गया
है:
श्रम का कुल उत्पादन TPL= 5500 मीटर
श्रमिकों की संख्याL = 10
श्रमिकों
का औसत उत्पादनAPL=?
चूंकि
APL = 5500/10
APL = 550 मीटर कपडा प्रति घंटा
जब MP बढ़ता है, तब TP एक वृद्धि करती हुयी दर से बढ़ता है।
जब MP घटता है, तब TP घटती हुयी दर से घटता है।
जब
MP शून्य
होता है, तब
TP अधिकतम
और स्थिर हो
जाता है।
जब MP नकारात्मक
हो जाता है, तब TP गिरना
शुरू हो जाता
है।

| Q | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 |
| TC | 50 | 65 | 75 | 95 | 130 | 185 |
चूंकि
इसलिए
|
Q |
TC ( |
TFC ( |
TVC ( |
AFC ( |
AVC ( |
AC ( |
MC ( |
|
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औसत लागत व सीमांत लागत दोनों को कुल लागत की सहायता से ज्ञात किया जाता है।

2.जब औसत लागत घटती है तो सीमांत लागत भी घटती है। सीमांत लागत,औसत लागत की अपेक्षा अधिक तीव्रता से कम होती है।
3.औसत लागत के बढ़ने पर सीमांत लागत सदैव औसत लागत से अधिक होती है। जब औसत लागत बढ़ती है तो सीमांत लागत भी बढ़ती है,किंतु सीमांत लागत में वृद्धि औसत लागत की अपेक्षा तेजी से होती है। जैसा चित्र में दर्शाया गया है।

4. सीमांत वक्र औसत वक्र को नीचे से उसके न्यूनतम बिंदु पर काटता है- जब औसत लागत न्यूनतम होती है तो सीमांत लागत उसके बराबर होती है। ऐसी अवस्था में सीमांत वक्र,औसत वक्र को उसके न्यूनतम बिंदु पर नीचे से काटता हुआ ऊपर को चला जाता है। (जैसा चित्र में प्रदर्शित किया गया है।) सीमांत लागत के न्यूनतम बिंदु की अवस्था औसत लागत के न्यूनतम बिंदु से पहले आ जाती है।
5. औसत लागत के स्थिर होने पर सीमांत लागत का उसके बराबर होना- जब औसत लागत स्थिर होती है तो सीमांत लागत,औसत लागत के बराबर होती है।
पैमाने
के प्रतिफल
के नियम के
तीन चरण हैं:
(1) वर्धमान
पैमाने के
प्रतिफल
(2) स्थिर
पैमाने के
प्रतिफल
(3) ह्रासमान
पैमाने के
प्रतिफल
(1) जब उत्पादन (TP) उन सभी आदानों (मान लो 100 प्रतिशत) से एक बहुत बड़े अनुपात (मान लो 130 प्रतिशत) तक बढ़ जाता है, तब वर्धमान पैमाने के प्रतिफल प्राप्त होते हैं।
उदाहरण के लिए:
2 श्रमिक + 1 मशीन = 200 (TP)
4 श्रमिक + 2 मशीनें = 500 (TP) और 300 (MP)
पैमाने के आंतरिक और बाहृय मितव्ययिता ही वैसा होने के मुख्य कारण हो सकते हैं।
(2) जब उत्पादन में वृद्धि उसी अनुपात (मान लो 100 प्रतिशत तक) से होती है जैसी वृद्धि आगतों (मान लो 100 प्रतिशत) में होती है तब स्थिर पैमाने के प्रतिफल स्थान ले लेते है।
उदाहरण के लिए:
2 श्रमिक + 1 मशीन = 200 (TP)
4 श्रमिक + 2 मशीनें = 400 (TP) और 200 (MP)
(3) जब उत्पादन में वृद्धि आगतों में वृद्धि के अनुपात (मान लो 100 प्रतिशत) की तुलना में कम अनुपात (मान लो 70 प्रतिशत) होती है, तब ह्रासमान पैमाने के प्रतिफल प्राप्त होते हैं।
पैमाने के आंतरिक और बाहृय अपमितव्ययिता ही वैसा होने के मुख्य कारण हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए:
2 श्रमिक + 1 मशीन = 200 (TP)
4 श्रमिक + 2 मशीनें = 250 (TP) और 50 (MP).
उत्पादन लागत से आशय किसी वस्तु की निश्चित मात्रा के उत्पादन पर होने वाले कुल मौद्रिक व्यय से होता है। इसमें उन वस्तुओं और साधनों के मूल्य को शामिल नहीं किया जाता जिन्हें उत्पादक वस्तु के उत्पादन में अपने पास से लगाता है।
अर्थशास्त्र के अंतर्गत उत्पादन लागत में उत्पादक के स्वयं के साधनों (भूमि, पूंजी, श्रम व उद्यमी) के पुरस्कार, वस्तुओं के मूल्य तथा मूल्य ह्रास को भी शामिल किया जाता है। आधुनिक अर्थशास्त्री उत्पादन लागत में उद्यमी के सामान्य लाभ को भी शामिल करते है।
(i) स्थिर लागत-
स्थिर लागतें वे होती हैं जो अल्पकाल में उत्पादन में परिवर्तन होने पर परिवर्तित नहीं होती बल्कि स्थिर बनी रहती है। उत्पादन की मात्रा में एक सीमा तक वृद्धि या कमी होने पर भी ऐसी लागतें अपरिवर्तित बनी रहती हैं। उत्पादन क्रिया बंद होने पर भी उत्पादक को ऐसी लागतों का भुगतान करना पड़ता है। उत्पादन के शून्य होने पर स्थिर लागतें तथा कुल लागत बराबर होती है। स्थिर लागतों को परोक्ष लागतें भी कहते है।
स्थिर लागतों में शामिल व्यय-
(1) भवन व भूमि का किराया
(2) पूंजी पर ब्याज आदि
(ii) परिवर्ती लागत-
परिवर्ती लागतें वे लागतें होती हैं जो उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन के साथ-साथ परिवर्तित होती है। उत्पादन की मात्रा के कम होने पर परिवर्ती लागतें कम हो जाती हैं, उत्पादन के बढ़ने पर ये लागतें बढ़ जाती हैं जबकि उत्पादन के शून्य होने पर ये लागतें भी शून्य हो जाती है। परिवर्ती लागतों को अस्थिर लागतें, चल लागतें तथा प्रत्यक्ष लागतें भी कहते हैं।
परिवर्ती लागतों में शामिल व्यय-
(1) कच्चे माल पर व्यय
(2) अस्थायी कर्मचारियों का वेतन आदि
A.
15
B. 20
C. 30
D. 40
चूंकि
हैं
इस सूत्र के
अनुसार
और
. अतः MR=15
A.
एक
सामान्य
क्षैतिज सरल
रेखा द्वारा
B. एक सामान्य रेक्टैंगुलर हाइपरबोला द्वारा
C. एक सामान्य ऊध्वार्धर सरल रेखा द्वारा
D. नीचे की ओर ढलान वाली विभिन्न रेखाओं द्वारा
पूर्ण प्रतिस्पर्ध के अंतर्गत एक फर्म कीमत स्वीकारक होती है जिस कारण वह बाज़ार की कीमतों को प्रभावित नहीं कर सकती इसलिए वह प्रचलित कीमत पर कितनी भी मात्रा बेच सकती है| इसका अर्थ यह है कि एक फर्म के लिए औसत संप्राप्ति और सीमांत संप्राप्ति स्थिर है| जिससे वह एक एक सामान्य क्षैतिज सरल रेखा बनाती है|
A.
निकटतम
प्रतिस्थापनों
की उपलब्धता
के कारण
B. निकटतम प्रतिस्थापनों के अभाव के कारण
C. उत्पाद विभेदीकरण के कारण
D.
दोनों (1) तथा (3)
एकाधिकार की तुलना में एकाधिकारी प्रतिस्पर्ध में प्रतिस्थापन वस्तुएँ होती हैं जिस कारण कीमत में दिए हुए परिवर्तन के अनुरूप एकाधिकारी फर्म की तुलना में एकाधिकारी प्रतिस्पर्ध में माँग में परिवर्तन सापेक्षतया अधिक होता हैं|
A.
पूर्ण प्रतिस्पर्ध के अंतर्गत
B.
एकाधिकार के अंतर्गत
C.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्ध के अंतर्गत
D.
दोनों (2) तथा (3)
एकाधिकारी और एकाधिकारी प्रतिस्पर्ध के अंतर्गतवस्तु की अधिक मात्रा केवल कीमत को कम करके हे बेचीं जा सकती है| यह दर्शाता है की माँग और कीमत के बिच विपरीत संबंध है अतः MR, AR से भिन्न होता है|
A.
AR
तथा MR
दोनों
वक्रों का
ढलान ऊपर की
ओर होता है
B. AR वक्र का ढलान ऊपर की ओर जबकि MR वक्र का ढलान निचे की ओर होता है
C. AR तथा MR दोनों वक्रों का ढलान निचे की ओर होता है और MR वक्र AR वक्र से ऊपर होता है
D. AR तथा MR दोनों वक्रों का ढलान निचे की ओर होता है और MR वक्र AR वक्र से निचे होता है
एकाधिकारी फर्म यदि वस्तु की अधिक मात्रा बेचना चाहती है तो उसे वस्तु की कीमत अवश्य कम करनी पड़ेगी इस कारण AR तथा MR दोनों वक्रों का ढलान निचे की ओर होता है और MR वक्र AR वक्र से ऊपर होता है|
A.
शून्य
B. घटती हुई
C. बढ़ती हुई
D.
स्थिर
जब MR घट रहा होता है तब उत्पाद की प्रत्येक अतिरिक्त इकाई की बिक्री के फलस्वरूप TR में पहले से कम वृद्धि होती है|अतः TR में घटती सर से वृद्धि होती है|
A.
B.
C.
D.
जब किसी वस्तु की एक अधिक इकाई बेचीं जाती है तब उससे कुल संप्राप्ति में होने वाले परिवर्तन को सीमांत संप्राप्ति कहते है|
A.
नकारात्मक
हो सकती है
B. नकारात्मक नहीं हो सकती है
C. तब शून्य के बराबर होती है जब कुल संप्राप्ति शून्य होती है
D.
दोनों (b) तथा (c)
AR का गिरना दर्शाता है कि किसी वस्तु की अधिक मात्रा केवल तब बेचीं जाती है जब कीमत कम होती है इस कारण AR कभी नकारात्मक नहीं हो सकता क्योंकि कीमत कभी नकारात्मक नहीं हो सकती किन्तु AR शून्य के बराबर होती है जब कुल संप्राप्ति शून्य होती है|
| प्रति इकाई कीमत (रू.) | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 |
| विक्रय इकाइयां | 100 | 90 | 70 | 60 | 50 | 40 |
TR, AR और MR की गणना के लिए निम्न सूत्र का प्रयोग किया गया है:
कुल संप्राप्ति (TR) = कीमत x मात्रा

MRn = TRn – TR n-1
|
कीमत |
विक्रय इकाई |
TR |
AR |
MR |
|
1 |
100 |
100 |
1 |
- |
|
2 |
90 |
180 |
2 |
80 |
|
3 |
70 |
210 |
3 |
30 |
|
4 |
60 |
240 |
4 |
30 |
|
5 |
50 |
250 |
5 |
10 |
|
6 |
40 |
240 |
6 |
-10 |
जब
निम्न
शर्तों को
पूरा किया
जाता है तब
अल्पकालीन
अवधि के
अंतर्गत एक
पूर्णतया प्रतिस्पर्धी
फर्म संतुलन
को प्राप्त
कर लेती है।
अल्पकालीन
सीमांत लागत(SMC) सीमांत
संप्राप्ति (MR) के बराबर
होती है, अर्थात्
SMC = MR.
SMC वक्र MR वक्र
को नीचे से
काटता है।
एक पूर्णतया प्रतिस्पर्धी फर्म एक कीमत स्वीकारक होती है। औसत संप्राप्ति (AR) और सीमांत संप्राप्ति (MR) उत्पादन के प्रत्येक स्तर पर बाजार कीमत के स्तर के बराबर होते हैं।
नीचे
दिये गये
चित्र में:-
AC कीमत 'P' से
ऊपर है।
फर्म
को घाटा हो
रहा है।
E बिंदु पर, AR = AVC, इसलिए इसे बंद होने का बिंदु कहा जाता है।

A.
दोहरी
बाज़ार नीति
का
B. कीमत सीलिंग या उच्चतम निर्धारित कीमत का
C. न्यूनतम कीमत सीमा का
D.
राशनिंग का
न्यूनतम मज़दूरी कानून न्यूनतम कीमत सीमा का उदाहरण है|
A.
बाज़ार
पूर्ति
बाज़ार माँग
से अधिक होगी
B. संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा घटेगी
C. दोनों (1) तथा (2)
D.
बाज़ार पूर्ति बाज़ार माँग से कम होगी
अतिरिक्त पूर्ति की स्थति में, बाज़ार पूर्ति बाज़ार माँग से अधिक होगी और संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा घटेगी|
A.
बाज़ार
पूर्ति
बाज़ार माँग
से कम होगी
B. संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा बढ़ेगी
C. दोनों (1) तथा (2)
D.
बाज़ार पूर्ति बाज़ार माँग से अधिक होगी
अतिरिक्त माँग की स्थति में, बाज़ार पूर्ति बाज़ार माँग से कम होगी और संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा बढ़ेगी|
A.
केवल संतुलन कीमत अपरिवर्तित रहती है
B.
केवल संतुलन मात्रा अपरिवर्तित रहती है
C.
संतुलन कीमत अपरिवर्तित रहती है परन्तु संतुलन मात्रा घटती है
D.
संतुलन कीमत अपरिवर्त्तित रहती है परन्तु संतुलन मात्रा बढ़ती है
जब समानुपात में माँग एवं पूर्ति में वृद्धि के कारण माँग तथा पूर्ति दोनों वक्रों में खिसकाव होता है तब संतुलन कीमत अपरिवर्त्तित रहती है परन्तु संतुलन मात्रा बढ़ती है|
A.
संतुलन कीमत बढ़ेगी तथा मात्रा घटेगी
B.
संतुलन कीमत तथा मात्रा बढ़ेगी
C.
संतुलन कीमत घटेगी तथा मात्रा बढ़ेगी
D.
संतुलन कीमत तथा मात्रा घटेगी
क्रेताओं की आय में वृद्धि (निम्नकोटी वस्तुओं की स्थिति में) होने के कारण संतुलन कीमत तथा मात्रा घटेगी|
A.
संतुलन
कीमत बढ़ जाती
है
B. संतुलन कीमत घट जाती है
C. संतुलन कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता है
D. संतुलन कीमत शून्य हो जाती है
उपभोक्ताओं की संख्या में कमी होने के कारण संतुलन कीमत घट जाती है|
A.
अतिरिक्त माँग की
B.
तिरिक्त पूर्ति की
C.
संतुलन की
D.
इनमें से कोई नहीं
जब किसी दी हुई कीमत पर वस्तु की माँग, पूर्ति से अधिक है तो वह माँग आधिक्य या अतिरिक्त माँग की स्थिति को दर्शाता है |
सरकार द्वारा उत्पादन की खरीद के लिए किसानों को प्रदान की जाने वाली सुनिश्चित न्यूनतम कीमत को समर्थन कीमत कहते हैं|
अति-अल्पकाल मैं नाशवान वस्तुओं (जैसे—दूध, फल, मछली आदि) का बाज़ार पूर्ति वक्र एक खड़ी सीधी रेखा Y-अक्ष के बराबर होता है|
A.
अल्पकाल
B.
अति-अल्पकाल
C.
मध्य-काल
D.
दीर्घकाल
दीर्घकाल में माँग में परिवर्तन के अनुसार पूर्ति का पूर्णतया समायोजन हो जाता है|
A.
अतिरिक्त माँग
B.
अतिरिक्त पूर्ति
C. अभावी माँग
D.
संतुलन
जब अधिकतम कीमत संतुलन कीमत से कम निर्धारित की जाती है तो उच्चतम कीमत के कारण बाज़ार में अतिरिक्त माँग की स्थिति हो जाती है |
A.
जब वस्तु की माँग पूर्णतया लोचदार है
B.
जब वस्तु की माँग पूर्णतया बेलोचदार है
C. जब वस्तु की माँग कम लोचदार है
D.
जब वस्तु की माँग अधिक लोचदार है
जब वस्तु की माँग पूर्णतया बेलोचदार होती है तब पूर्ति में वृद्धि कब माँगी गई मात्रा को अपरिवर्तित छोड़ कर कीमत में कमी कर देगी|
A.
कीमत में कमी होती है
B.
संतुलन मत्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
C.
दोनों (1) तथा (2)
D.
इनमें से कोई नहीं
पूर्ति के पूर्णतया बेलोचदार होने की स्थिति में माँग में कमी से कीमत में कमी होती है और संतुलन मत्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता|
A.
संतुलन
कीमत घटेगी
तथा मात्रा
बढ़ेगी
B. संतुलन कीमत बढ़ेगी तथा मात्रा घटेगी
C. संतुलन कीमत तथा मात्रा घटेगी
D. संतुलन कीमत तथा मात्रा बढ़ेगी
आगत कीमतों में वृद्धि होने के कारण संतुलन कीमत बढ़ेगी तथा मात्रा घटेगी|
A.
कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होगा
B.
कीमत घट जाएगी
C.
कीमत बढ़ जाएगी
D.
इनमें से कोई नहीं
मांग में बिना परिवर्तन किये यदि पूर्ति बढ़ा दी जाए तो इस स्थिति में कीमत घट जाएगी |
बाज़ार कीमत अति-अल्पकाल से संबंधित होती है|
A.
कमी होगी
B.
वृद्धि होगी
C.
कमी तथा वृद्धि दोनों होगी
D.
दोनों में से कोई भी नहीं होगा
यदि किसी वस्तु की माँग अधिक होती है तो संतुलन कीमत में वृद्धि होगी|
जब
बाज़ार मैं
किसी वस्तु
के लिए
अतिरिक्त
पूर्ति की
स्थिति होती
है, तब उस
वस्तु की
बाज़ार कीमत
घटती है|
अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करने के लिए वह 88 रूपये को इस प्रकार खर्च करेगा ताकि प्रति रूपये X और Y की सीमांत उपयोगिताएं बराबर हो।यह इस समीकरण से दर्शाया जा सकता है - उपभोक्ता के लिए निम्न तीन संयोजनों पर उपरोक्त शर्त पूरी होती है – संयोजन A(xX=10,Y=7), संयोजन B(xX=6,Y=1)और संयोजन C(xX=8,Y=3)| 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 80 72 64 56 48 40 32 24 16 8 40 36 24 20 15 12 8 4 0 0 1) संयोजन A में रमेश X की 10 इकाइयां और Y की 7 इकाइयां खरीदता है| उसका कुल व्यय बजट के समीकरण द्वारा दर्शाया जा सकता है - PxX + PyY= व्यय 8*10 + 8*7 = 80 + 56 =126 व्यय > आय यहाँ व्यय आय से अधिक है, अत: यह संयोजन रमेश के लिए अप्राप्य है| 2) संयोजन B में रमेश X की 6 इकाइयां और Y की 1 इकाइयां खरीदता है| उसका कुल व्यय बजट के समीकरण द्वारा दर्शाया जा सकता है - PxX + PyY= व्यय 8*6 + 8*1 = 48 + 8 =56 व्यय < आय यहाँ व्यय आय से कम है, अत: इस संयोजन का उपभोग करने से रमेश को अधिक्तम प्राप्य संतुष्टि नहीं मिलेगी| 3) संयोजन C में रमेश X की 8 इकाइयां और Y की 3 इकाइयां खरीदता है| उसका कुल व्यय बजट के समीकरण द्वारा दर्शाया जा सकता है - PxX + PyY= व्यय 8*8 + 8*3 = 64 + 24 =88 व्यय = आय यहाँ व्यय आय के बराबर है, अत: इस संयोजन का उपभोग करने से रमेश को अधिक्तम प्राप्य संतुष्टि मिलेगी| इस प्रकार संयोजन C (8 X और 3 Y) अच्छा संयोजन होगा क्योंकि यहां उपभोक्ता को अधिकतम संतुष्टि प्राप्त होगी। ह्रासमान सीमांत उपयोगिता नियम के अनुसार किसी वस्तु की अतिरिक्त इकाई के उपभोग से, प्राप्त होने वाली अतिरिक्त उपयोगिता में त्वरित दर से गिरावट होती है| उपभोक्ता का संतुलन भी इस नियम पर आधारित होता है| जब एक उपभोक्ता एक वस्तु खरीदता है तो वह उस बिंदु पर संतुलन की स्थिति में होता है जहां वस्तु की सीमांत उपयोगिता अपनी कीमत के बराबर होती है। अर्थात MUx = Px (हमने यहाँ माना हुआ है कि मुद्रा की सीमांत उपयोगिता 1 है)| उदाहरण के लिए, सरिता संतरे खरीदना चाहती है| संतरों की प्रत्येक इकाई की कीमत 3 रु है और उसकी सीमांत उपयोगिता इस प्रकार है- संतरे 1 2 3 4 5 सीमांत उपयोगता 10 8 6 3 1 मान लीजिए, सरिता 3 संतरे खरीदती है| ऐसा करने पर उसकी सीमांत उपयोगिता (MUx), संतरे की कीमत (Px) से अधिक होती है | यहाँ MUx>Px इसलिए वह संतरों की और अधिक इकाइयां खरीदेगी क्योंकि संतरों से प्राप्त सीमान्त उपयोगिता मुद्रा से प्राप्त सीमान्त उपयोगिता की अपेक्षा अधिक है। ह्रासमान सीमांत उपयोगिता के नियम के अनुसार, जब उपभोक्ता वस्तु की अधिक इकाइयों का उपभोग करता है तो उपयोगिता घटती जाती है। इस नियम के लागू होने के कारण MUx गिर रही है और जब संतरों की चार इकाईयों का उपभोग किया जाता है तब चौथी इकाइयों से प्राप्त सीमांत उपयोगिता कीमत के बराबर हो गई है। यदि सरिता संतरे की चार से अधिक इकाइयां खरीदेगी तब ह्रासमान सीमांत उपयोगिता के नियम के लागू होने के कारण MUx < P होगा और तब सरिता संतरों की कम इकाईयां खरीदेगी क्योंकि पांचवी इकाइयों का क्रय करने से प्राप्त सीमान्त उपयोगिता संतरे की कीमत से कम होगा । जब उपभोक्ता चार संतरे खरीदता है तो वह संतुलन में होगा क्योंकि यहां सीमांत उपयोगिता कीमत के बराबर है।
दिया
गया है की Q=20, TC=110,
TFC=10 इससे
हम AVC इस
प्रकार
निकाल सकते
है
चूंकि
TC=TFC+TVC है
इसलिए TVC=100 होगा
और AVC=5 होगा
चूंकि केवल
परिवर्ती
लागत B.
केवल
स्थिर लागत C.
दोनों
(1)
तथा (2) D.
इनमें
से कोई नहीं
चूंकि
अतिरिक्त
लागत केवल
परिवर्ती
लागत हो सकती
है इसका
अनुमान इस
प्रकार
लगाया जा
सकता है: समान
होती B.
घटती
C.
बढ़ती
D.
नकारात्मक
होती
ह्रासमान
सीमांत
उत्पाद नियम
के अनुसार अगर
हम किसी आगत के
प्रयोग में वृद्धि
करते
हैं,
जब अन्य
आगत स्थिर हों,
तो एक
समय के बाद ऐसी
स्थिति आयेगी
कि प्राप्त होने
वाली
अतिरिक्त
आगत में गिरावट
आने लगेगी
जिससे
सीमांत लागत
में वृद्धि
होगी और कुल
लागत बढ़ती दर
से बढ़ेगी|
ATC
घटेगा B.
ATC
बढ़ा रहेगा C.
ATC
बढ़ेगा D.
इनमें
से कोई नहीं
जब सीमांत
लागत औसत
लागत से अधिक
होती है,तो
उत्पादन में
वृद्धि होने
से औसत लागत
बढ़ जाती है।
B.
परिवर्ती
लागत C.
औसत
लागत D.
इनमें
से कोई नहीं
औसत
लागत को
वस्तु की
प्रति इकाई
लागत कहा जाता
है क्योंकि
यह कुल लागत
को उत्पादन
की मात्रा से
विभाजित कर
प्राप्त
होती है B.
C.
D.
दोनों
(2)
तथा (3)
चूकिं
TC=TFC+TVC हैं
इसे TVC=TC-TFC
भी लिखा जा
सकता है, इस्सी
प्रकार जैसे शून्य
B.
नकारात्मक C.
सकारात्मक D.
परिवर्ती
लागत के
बराबर
स्थिर
लागतें
उत्पादन की
मात्रा के
साथ परिवर्तित
नहीं होती
इसलिए यह सदेव
सकारात्मक
ही रेहती हैं|
स्पष्ट
लागत का B.
अवसर
लागत का C.
निहित
लागत का D.
इनमें
से कोई नहीं
उत्पादक
द्वारा
स्व-स्वामित्व
आगतों के प्रयोग
पर किए खर्चे
को निहित
लागत के रूप
से जाना जाता
है|
B.
C.
D.
कुल
लागत, कुल
स्थिर लागत
और कुल
परिवर्ती
लागत के जोड़
से प्राप्त
की जा सकती है|
पूरक
लागतें भी B.
उपरी
लागतें भी C.
अप्रत्यक्ष
लागतें भी D.
उपरोक्त
सभी
स्थिर
लागत बाज़ार
से भाड़े पर
खरीदी गई
आगतों की
अवसर लागत
हैं|
B.
200 C.
300 D.
0.5
B.
U
आकार वक्र C.
रेक्टैंगुलर
हाइपरबोला D.
इनमें
से कोई नहीं
परिवर्ती
कारक की
मात्रा के
बढ़ने के साथ MP
शुरुआत में
बढ़ता है
परन्तु एक
सीमा आने पर
परिवर्ती
कारक की
मात्रा के
बढ़ने पर भी MP में
गिरावट आरंभ
हो जाती है|
B.
MP C.
MP=AP D.
उपरोक्त
सभी
MP=AP की
स्थिति में
औसत उत्पाद
अधिकतम होता
है अतः MP, AP को
उसके उच्चतम
बिंदु पर
काटता है|
कुल
उत्पाद बढ़ती
दर से बढ़ता है B.
कुल
उत्पाद घटती
दर से बढ़ता है C.
सीमांत
उत्पाद घटता
है D.
दोनों
(2)
तथा (3)
ह्रासमान
प्रतिफल की
अवस्था में MP घटता
है इसका यह
अर्थ है की TP में
उत्पादन की
कम इकाइयों
का योग होता
है| लेकिन फिर
भी TP बढ़ता
है|
B.
उपभोक्ता
वस्तुएँ C.
पूँजीगत
वस्तुएँ D.
इनमें
से कोई नहीं
मानवीय
आवश्यकताओं
को
प्रत्यक्ष
रूप से संतुष्ट
करने वाली
वस्तुएँ उपभोक्ता
वस्तुएँ
कहलाती हैं
क्योंकि
इनका सीधा
उपयोग
आवश्यकताओं
की संतुष्टि
के लिए किया
जाता हैं।
B.
कई
करोकों का
दूसरों की
तुलना में
कुशल होना C.
करोकों
का
विशिष्टीकरण
D.
इनमें
से कोई नहीं
परिवर्ती
अनुपात के
नियम के
अनुसार
स्थिर कारक
के साथ
परिवर्ती
कारक की अधिक
इकाइयों को जैसे-जैसे
प्रयोग में
लाया जाता
हैं,
परिवर्ती कारक
का सीमांत
उत्पाद आरंभ
में बढ़ता है,
परन्तु बाद
में गिरना
शुरू होजाता
है|
B.
कुल
उत्पाद घटना
आरंभ हो जाता
है C.
कुल
उत्पाद
स्थिर है D.
इनमें
से कोई नहीं
जब
परिवर्ती
कारक का
सीमांत
उत्पाद नकारात्मक
होगा तब कुल
उत्पाद
गिरेगा| यह
परिवर्ती
कारक के
अत्यधिक
रोज़गार की
स्थिति है
अथवा यह श्रम
जैसे
परिवर्ती
कारक के
अद्रश्य
बेरोज़गारी की
स्थिति है|
B.
C.
D.
MP का
अभिप्राय
कुल उत्पाद
में
परिवर्तन से
है जब
परिवर्ती
कारक की एक
अधिक इकाई
प्रयोग की जाती
है और जब अन्य
स्थिर कारक
समान रहते है|
संप्राप्ति
अपने उत्पाद
की बिक्री से
एक फर्म की
अपनी
मौद्रिक प्राप्तियां
हैं। लाभ
संप्राप्ति
और लागत के बीच
का अंतर है।
यह बाजार
की ऐसी अवस्था
होती है जिसमें
खरीदार और विक्रेता
मुक्त रूप से कार्य
करते हैं और उत्पाद
को एक समान दर पर
बेचा जाता है।
औसत संप्राप्ति
को ज्ञात
करने के लिए
निम्न
सूत्र का
प्रयोग किया
जाता है। AR= औसत
संप्राप्ति TR= कुल
संप्राप्ति Q= बेचीं गई
मात्रा
उद्गम
से होकर जाने
वाली पूर्ति
वक्र की सीधी रेखा
की कीमत लोच
इकाई के
बराबर होती
है।
पूर्ति की
कीमत लोच की
गणना करने के
लिए प्रयोग
किये जाने
वाला सूत्र
है: जहां: Q = प्रारंभिक
मात्रा; ∆Q
= पूर्ति
मात्रा में
परिवर्तन; ∆P
= कीमत
में
परिवर्तन; P = प्रारंभिककीमत
AC वक्र
को कीमत के
नीचे बनाया
जायेगा।
A.
बढ़ती
हैSOLUTION
वस्तु की इकाइयां
X वस्तु के लिए सीमांत उपयोगिता
Y वस्तु के लिए सीमांत उपयोगिता
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
80
72
64
56
48
40
32
24
16
8
40
36
24
20
16
12
8
4
0
0
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION

वस्तु की इकाइयां
X वस्तु के लिए सीमांत उपयोगिता
Y वस्तु के लिए सीमांत उपयोगिता
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
A.
B.
C.
D.
Right Answer is: CSOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
स्थिर
लागत SOLUTION
A.
SOLUTION
हैं
इसे TVC=
भी लिखा जा
सकता है|
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
![]()
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
5SOLUTION
औसत
उप्ताद कुल
उत्पाद को
परिवर्ती
कारक से
विभाजित कर
के प्राप्त
होता है|
A.
विपरीत
U
आकार वक्र SOLUTION
A.
MP>APSOLUTION
A.
SOLUTION
A.
मध्यवर्ती
वस्तुएँ SOLUTION
A.
कई
कारकों का
स्थिर होना SOLUTION
A.
कुल
उत्पाद बढ़ना
आरंभ हो जाता
है SOLUTION
A.
SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
![]()
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION

es = पूर्ति
की लोच;
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION