A.
उपभोक्ता से उचित मूल्य लेना
B.
कार्यकर्ता से उचित व्यवहार करना
C.
कार्यकर्ताओ को पर्याप्त लेखन सामग्री प्रदान करना
D.
सरकार को कर चुकाना
कार्यकर्ताओ को पर्याप्त लेखन सामग्री प्रदान करना व्यवसायिक नीति का उदाहरण है लेकिन यह सामान्य व्यवयायिक गतिविधि है।
A.
कानुन के द्वारा दण्डनीय
B.
आचार संहिता से प्रशासित
C.
उच्च प्रबंधन से अनुसरण करना
D.
व्यवसाय के बीच ईमानदारी का पालन
व्यवसायिक नीति नियमो के एक ढाँचे से प्रशासित की जाती है जैसेः आचार संहिता।
A.
फिटिंग का
B. मार्क्स का
C. वेबस्टर का
D. पी०जिस्बर्ट का
प्रसिद्ध विद्वान वेबस्टर के अनुसार “पर्यावरण से तात्पर्य उन घेरे में रहने वाली शर्तों, परिस्थितियों एवं प्रभावों से है जो कि सभी व्यक्तियों तथा जीवित वस्तुओं के जीवन को प्रभावित करती हैं ” ।
A.
20-30 किमी तक फैला हुआ है ।
B. 100-200 किमी तक फैला हुआ है।
C. 200-300 किमी तक फैला हुआ है ।
D. 50-100 किमी तक फैला हुआ है ।
वायु मण्डल, स्थल एवं जल मण्डल के ऊपर लगभग 200-300 किमी तक फैला हुआ है जिसमें विभिन्न प्रकार की गैसें पाई जाती हैं ।
A.
जल प्रदूषण बढ़ रहा है।
B. ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है ।
C. वायु प्रदूषण बढ़ रहा है ।
D. मृदा प्रदूषण बढ़ रहा है।
वाहनों से निकलने वाले धुएं से कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा वायु में बढ़ जाने के कारण वायु प्रदूषण बढ़ रहा है ।
A.
दिल्ली में है।
B. जयपुर में है।
C. मुंबई में है ।
D. कोलकत्ता में है।
विमानों, वाहनों तथा मशीनों की अधिकता के कारण भारत में ध्वनि प्रदूषण सबसे अधिक मुंबई में है ।
A.
तीन भागों में बांटा गया है ।
B. सात भागों में बांटा गया है ।
C. चार भागों में बांटा गया है ।
D. दो भागों में बांटा गया है ।
अध्ययन की दृष्टि से पर्यावरण को
चार भागों में बांटा गया है ।
· स्थल मण्डल
· वायु मण्डल
· जल मण्डल
· जैव मण्डल
व्यक्तिगत दृष्टिकोण से एक व्यावसायिक फर्म का मूल उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है।
व्यक्तिगत दृष्टिकोण से एक व्यावसायिक फर्म का मूल उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है।
नैतिक व्यापार अच्छा व्यवसाय होता है क्योंकि नैतिक व्यापार व्यवहार एक संगठन की सार्वजनिक छवि को बेहतर बनाता है, लोगों का विश्वास और भरोसा जीतता है और व्यापार को अधिक से अधिक सफलता की ओर ले जाता है।
पर्यावरण के प्रमुख अंग भूमि, जल, वायु, उर्जा, खनिज, वनस्पति एवं जीव जन्तु हैं ।
मृदा प्रदूषण को रोकने के उपाय निम्नलिखित हैं
· परमाणु विस्फोटों पर रोक लगाना ।
· खेती में कीटनाशक दवाइयों के उपयोग पर रोक लगाना ।
अवशिष्ट पदार्थों के कारण भूमि के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों पर विपरीत प्रभाव पड़ना मृदा प्रदूषण कहलाता है ।
सौर कुकर में कुचालित धात्विक बॉक्स की आंतरिक सतह को काला पेन्ट इसलिए किया जाता है, क्योंकि, काली सतह उष्मीय ऊर्जा की अच्छी अवशोषक होती है जो कि कुकर के अन्दर रखे खाने को बनाने में मदद करती है।
वह ऊर्जा जो पृथ्वी के अंदर पिघली हुई चट्टानों और अन्य सामग्री से बनी है, भूतापीय उर्जा कहलाती है।
कार्य करने की शक्ति या क्षमता ऊर्जा के रूप में जानी जाती है।
ऊर्जा के वे स्त्रोत जिनको पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता है, ऊर्जा के अनवीकरणीय स्त्रोत कहलाते हैं। उदाहरण- पत्थर का कोयला, मिट्टी का तेल, डीजल, पेट्रोल आदि।
ऊर्जा के स्रोतों को निमन्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है:-
1. ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोत के रूप में।
2. ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत के रूप में।
सौर ऊर्जा के दो गुण हैं -
1.यह ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है तथा हमारे लिए नि:शुल्क उपलब्ध है ।
2. यह प्रदूषण रहित है ।
घरों में प्रयुक्त होने वाले ऊर्जा के दो प्रमुख रूप हैं – 1. विद्युत ऊर्जा तथा 2. एल.पी.जी के रूप में जीवाश्म ईंधन की ऊर्जा।
ऊर्जा के दो नवीकरणीय स्त्रोत हैं
सौर सेल बनाने के लिए उपयोग किए जाने वाले दो अर्धचालक पदार्थों के नाम हैं -(1) जर्मेनियम तथा (2) सिलिकॉन ।
क्रियात्मक पवन चक्की के लिए आवश्यक न्यूनतम पवन वेग लगभग
वह ऊर्जा, जो हमें सीधे सूरज से प्राप्त होती है सौर ऊर्जा कहलाती है | सौर ऊर्जा ही मौसम एवं जलवायु का परिवर्तन करती है |
ऊर्जा के पारंपरिक स्रोत बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जाते हैं और यह हमारी ऊर्जा की आवश्यकता के एक बड़े हिस्से को पूरा करते हैं। ऊर्जा का मुख्य पारंपरिक स्रोत हैं - जीवाश्म ईंधन, तापीय ऊर्जा, जलविद्युत ऊर्जा, बायोमास ऊर्जा, वायु ऊर्जा आदि।
चार प्रकार के विद्युत संयंत्रों हैं:-
1. जल विद्युत संयंत्र,
2. ताप विद्युत संयंत्र,
3. वायु ऊर्जा विद्युत संयंत्र,
4. परमाणु ऊर्जा विद्युत संयंत्र।
फसलों के अवशेष, जल, मल-मूत्र, गोबर, लकड़ी आदि का ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में अपघटन करने पर बायोगैस प्राप्त होती है। यह गैस खाना पकाने तथा प्रकाश उत्पन्न करने में उपयोग की जाती है।
सौर तापन उपकरण के चार उपयोग हैं :-
1. यह पानी को गर्म करने के लिए उपयोग किया जाता है।
2. यह विद्युत के उत्पादन के लिए उपयोग किया जाता है।
3. यह खाना बनाने के लिए उपयोग किया जाता है।
4. यह धातुओं को पिघलने के लिए उपयोग किया जाता है।
भूतापीय ऊर्जा के लाभः-
1. भूतापीय ऊर्जा का विद्युत ऊर्जा में रूपांतरण चौबीस घण्टे और प्रतिवर्ष किया जा सकता है।
2. इस ऊर्जा से पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता व व्यय भी कम होता है। भूतापीय ऊर्जा पर आधारित संयंत्र न्यूजीलैण्ड व संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थापित किये गए हैं।
उर्जा का उत्तम स्त्रोत वह होता है जो :-

|
नाभिकीय विखण्डन |
नाभिकीय संलयन |
|
1 इस प्रक्रिया में एक नाभिक टूटकर ऊर्जा के मुक्त होने के साथ-साथ दो या दो से अधिक छोटे नाभिकों में विभाजित हो जाता है। |
1. इस प्रक्रिया में छोटे नाभिक मिलकर एक बड़ा नाभिक बनाते हैं तथा ऊष्मा व प्रकाश ऊर्जा की भारी मात्रा मुक्त होती है। |
|
2. इसमें भारी नाभिक प्रयोग किये जाते हैं। |
2.इसमें हल्के नाभिक प्रयोग किए जाते हैं। |
|
3. इसे नियंत्रक छड़ों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है । |
3.इसे साधारण तकनीकों के द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। |
किसी ईंधन का चयन करते समय हम निम्न बातों का ध्यान रखते हैं-
1. गर्म होने पर वह ताप की उपयुक्त मात्रा का उत्पादन करे।
2. जलने पर कम प्रदूषण का उत्पादन करें।
3. जो आसानी से उपलब्ध हो।
4. जिसे आसानी से लाया और ले जाया जा सके।
नाभिकीय ऊर्जा के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं
1. वह ईंधन जो बिना प्रदूषण उत्पन्न किए अधिक मात्रा में ऊष्मा देता है।
2. दहन के बाद हानिकारक गैसें उत्पन्न नहीं करता हो।
3. ईंधन सस्ता व उस का रख-रखाव आसान हो।
4. ज्वलन ताप मध्यम होना चाहिए।
पवन-चक्की वह युक्ति है जिसकी सहायता से पवन ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। इस उर्जा का उपयोग कुओं से जल खींचकर सिंचाई में और टरबाइन चलाकर विद्युत ऊर्जा उत्पादन में किया जाता है । व्यापारिक स्तर पर उच्च पवन क्षेत्र में अधिक संख्या में पवन चक्कियाँ लगाकर उन्हें युग्मित कर लिया जाता है । जिससे विद्युत ऊर्जा उत्पादन के लिए अधिक धन खर्च नहीं करना पड़ता तथा जनित्र चलाने के लिए ईंधन की आवश्यकता नहीं पड़ती, अतः पर्यावरण प्रदूषण से बचा जा सकता है । इसी कारण पवन चक्कियों को पर्यावरण हितैषी कहते हैं।
पवन ऊर्जा गतिमान वायु की ऊर्जा है। सौर ऊर्जा से पर्यावरण में दाब बनता है जिससे वायु गतिमान हो जाती है और पवन ऊर्जा उत्पन्न होती है ।
पवन ऊर्जा के निम्नलिखित उपयोग हैं:-
1. पानी खींचने वाले पंप में ।
2. विद्युत बनाने वाली पवन चक्की में ।
3. नावों के परिवहन में ।
पवन ऊर्जा के निम्नलिखित लाभ हैं: -
1. इसके द्वारा विद्युत उत्पादन के लिए बार-बार धन खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती।
2. नवीकरणीय ऊर्जा का एक पर्यावरणीय-हितैषी एवं दक्ष स्रोत है।
पवन ऊर्जा की निम्नलिखित सीमाएँ हैं: -
1. इस ऊर्जा को सभी स्थानों पर और हर समय इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है ।
2. 15 km/h से अधिक गति की हवा प्राप्त करना मुश्किल है ।
3. बहुत ज़्यादा ध्वनी प्रदूषण होता है ।
4. पवन चक्की फार्म लगाने के लिए बड़े क्षेत्र और बहुत खर्चों की आवश्यकता होती है ।
5. उच्च स्तर के रखरखाव की आवश्यकता होती है ।
जब दो हल्के नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी तत्व के नाभिक की रचना करते हैं तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। नाभिकीय संलयन में जारी ऊर्जा परमाणु विखंडन में जारी ऊर्जा से अधिक होती है। हाइड्रोजन बम विनाश का सबसे शक्तिशाली हथियार है| यह नाभिकीय संलयन की प्रकिया पर आधारित है। नाभिकीय संलयन को नियंत्रित करना एक कठिन प्रक्रिया है। इसलिए, बिजली उत्पादन में , यह उपयोग में नहीं लाया जाता है।
परमाणु बिजली उत्पादन की कुछ सीमाएँ है:-
1. पर्यावरण प्रदूषण का उच्च जोखिम और स्थापना में उच्च लागत।
2. यूरेनियम की सीमित उपलब्धता ।
3. नाभिकीय विकिरणों के आकस्मिक रिसाव का खतरा।
सौर कुकर एक ऐसी युक्ति है जिसमें खाना पकाने के लिए सूर्य द्वारा प्रसारित उष्मा (अवरक्त- विकिरणों के रूप में) उपयोग की जाती है ।
क्रियाविधि :- सौर कुकर की बनावट निम्नानुसार है

चित्र में दिखाए अनुसार जब सूर्य की किरणें परावर्तक पर गिरती है तो काँच की शीट के माध्यम से सौर कुकर की ओर परावर्तित हो जाती है। यहाँ समतल दर्पण परावर्तक के रूप में कार्य करता है। इसका कार्य सूर्य की सौर ऊर्जा को सीधे सौर कुकर की ओर प्रसारित करना है । सूर्य की यह अत्यधिक ऊर्जा सौर कुकर को तेजी से गर्म करती है । काँच की शीट के माध्यम से गुजरने पर यह ऊर्जा परावर्तित हो जाती है । यह उपकरण ऊष्मा ऊर्जा को कुकर के कॉम्पेक्ट बॉक्स से निकलने की अनुमति नहीं देता है। कुकर का बॉक्स चारों तरफ से अचालक पदार्थ से परिबद्ध होता है । बॉक्स की आंतरिक सतह भी काली धातु की बनी होती है जो उच्च ऊष्मा अवशोषण का गुण है ।इस तरह सूर्य से अवरक्त किरणें बॉक्स में चली जाती हैं तथा तापमान लगभग 100 oC से 150 oC तक बढ़ जाता है।
दिया गया है,
आपतन कोण = 40o
(c) विद्यार्थी R के अनुसार, अपवर्तन कोण = 25o
चूंकि काँच का अपवर्तनांक 1.5 होता है, इसलिए विद्यार्थी R ने प्रयोग को सही विधि से किया है|
II उत्तर सबसे अच्छा परिणाम देंगा क्योंकि इस प्रायोगिक व्यवस्था में आपतन कोण सबसे बढ़ा है, जिसके कारण आपतन तथा आकस्मिक किरण के बीच पार्श्व विस्थापन ज्यादा से ज्यादा होगा|
प्रकाश, विरल माध्यम की तुलना में प्रकाशिक सघन माध्यम में धीमी चाल से संचरण करता है| इस प्रकार, प्रकाश की किरण सघन माध्यम में प्रवेश करने पर अभिलम्ब की ओर मुड़ जाती है|
A. निर्गत कोण अपवर्तन कोण से छोटा है
B. आपतन कोण निर्गत कोण से बड़ा है
C. निर्गत किरण अपवर्तित किरण के समानान्तर है
D. आपतित किरण तथा निर्गत किरण एक-दूसरे के समानान्तर हैं
जब एक आपतित किरण किसी काँच के स्लैब से होकर गुज़रती है तो वह अपने पथ से कुछ विस्थापित हो जाती है किन्तु निर्गत के समय वह सदैव आपतित किरण के समानांतर रहती है|
A. ‘सेन्टीमीटर’
B. ‘मीटर’
C. ‘डायोप्टर’
D. आयामरहित
आवर्धन, प्रतिबिम्ब की ऊंचाई तथा निकाय (बिम्ब) की ऊंचाई के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है| समान इकाईओं का अनुपात होने के कारण यह आयामरहित है|
A. आपतन कोण पर
B. अपवर्तन कोण पर
C. पदार्थ की प्रकृति तथा उपयोग होने वाले प्रकाश की तरंगदैर्ध्य पर
D. केवल पदार्थ की प्रकृति पर
किसी पदार्थ का अपवर्तनांक, पदार्थ की प्रकृति के साथ - साथ उपयोग किए जाने वाले प्रकाश की तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करता है| इस तथ्य से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि किसी विशेष माध्यम के लिए, बैगनी प्रकाश (सूक्ष्म तरंगदैर्ध्य) लाल प्रकाश (अधिक तरंगदैर्ध्य) की तुलना में अधिक झुकाव से गुज़रता है|
A. कोई भी गोलाकार दर्पण
B. अवतल दर्पण
C. उत्तल दर्पण
D. समतल दर्पण
एक उत्तल दर्पण हमेशा आकार में कम तथा आभासी प्रतिबिम्ब बनाता है| इस प्रकार, दृश्य क्षेत्र व्यापक होता है| इसलिए, यह वाहनों में पश्च दृश्यक दर्पण के रूप में उपयोग किया जाता है|
फोकस दूरी = 1/शक्ति = (1/8.5) m = 0.12 m
चूँकि, अवतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिम्ब वास्तविक होते हैं, यह उल्टे होने चाहिए| इसके अलावा, एक अवतल दर्पण हमेशा वस्तु की तरह समान ओर पर वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाता है| इस तथ्य से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वास्तविक प्रकाश किरणें वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाने के लिए दर्पण के पीछे कभी भी नहीं मिल सकती हैं|
A. अवतल
B. उत्तल
C. समतल
D. बेलनाकार
सूर्य से आने वाली प्रकाश किरणें परावर्तन के बाद अवतल दर्पण के फोकस पर अभिसरित हो जाती हैं जो किसी अन्य प्रकार के दर्पण में सम्भव नहीं है| यह हमें अपने फोकस पर ऊष्मा की उच्च तीव्रता प्राप्त करने में सक्षम बनाता है जो वस्तुओं को गर्म करने के लिए उपयोग किया जा सकता है| इस प्रकार, सौर भट्टियों में अवतल दर्पण का उपयोग किया जाता है|
किसी लेंस की फोकस दूरी, अपनी शक्ति का व्युत्क्रम (मीटर में) होती है| इस प्रकार, f = 1/4 = 0.25 m = 25 cm
किसी समतल दर्पण द्वारा बना प्रतिबिम्ब, निकाय (बिम्ब) के समान आकार का होता है| इस प्रकार, बिम्ब का आकार भी 7 cm होगा|
एक उत्तल दर्पण, निकाय (बिम्ब) के सापेक्ष हमेशा अपने पीछे आभासी तथा सीधा प्रतिबिम्ब बनाता है|
हम जानते हैं कि आवर्धन = - ( प्रतिबिम्ब की दूरी /निकायकी दूरी)
यदि आवर्धन धनात्मक है, इसका तात्पर्य है कि निकाय तथा प्रतिबिम्ब दोनों दर्पण के एक ओर है| इसलिए, किसी अवतल दर्पण के लिए, धनात्मक आवर्धन का तात्पर्य है कि प्रतिबिम्ब आभासी तथा सीधा है|
जहाँ, कोण i = आपतन कोण कोण r = अपवर्तन कोण कोण e = निर्गत कोण PQ = पाश्र्विक विस्थापन किसी उत्तल दर्पण द्वारा परावर्तित किरणें मुख्य अक्ष पर एक बिंदु से आती हुई प्रतीत होती हैं। यह बिंदु उत्तल दर्पण का मुख्य फोकस कहलाता है। लेंस की आवर्धन क्षमता को प्रतिबिम्ब की ऊँचाई तथा बिम्ब की ऊँचाई से अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है। परावर्तित किरण की विशेषताएँ: (b) इस प्रकार, परावर्तन के नियमों से, प्रकाश की यह किरण परावर्तन के बाद पुनः लौट जाती है। किसी उत्तल दर्पण द्वारा परावर्तित किरणें मुख्य अक्ष पर एक बिंदु से आती हुई प्रतीत होती हैं। यह बिंदु उत्तल दर्पण का मुख्य फोकस कहलाता है। :आरेख के अनुसार, समानांतर किरण युक्ति ‘A’ पर होने वाली घटना है और युक्ति से लगभग 12 cm दूर स्क्रीन पर केंद्रित है। अवतल दर्पण में समानांतर किरण प्रतिबिंब के बाद फोकस बिंदु पर मिलते हैं। तो आरेख युक्ति ‘A’ के अनुसार फोकल लम्बाई 12 cm का अवतल दर्पण है| किरण आरेख (I), (II) व (III) सही है | लेंस के वक्रता केंद्र से गुजरने वाली प्रकाश किरणें अपवर्तन के बाद सीधी निकल जाती हैं | मुख्य अक्ष के समानांतर प्रकाश किरणें अपवर्तन के बाद दूसरे फ़ोकस के से गुजरती हैं। लेंस के फोकस बिन्दु से गुजरने प्रकश किरणें अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष के समानांतर होती हैं। (a) प्रतिबिम्ब को फोकस करते समय विद्यार्थी को लेंस से दूर जाना चाहिए क्यूंकि अगर वह लेंस की ओर सरकता है तो प्रतिबिम्ब लेंस से दूर खिसक जायेगा । (b) बिम्ब को लेंस के बहुत निकट ले जाने पर, प्रतिबिम्ब काल्पनिक|सीधा और बड़ा बनेगा,
उत्तल लेंस,
अभिसारी
लेंस के रूप
में जाना
जाता है
क्योंकि यह
इस पर गिरने
वाली प्रकाश
किरणों को एक
बिंदु पर
अभिसारित कर
देता है।
नीचे दिया
गया किरण आरेख, उत्तल लेंस
की अभिसारी
क्रिया को
दर्शा रहा है। दी गई काँच की प्लेट को मुद्रित अक्षरों पर रखते हैं। काँच की प्लेट मुद्रित अक्षरों के पास होनी चाहिए। (1) यदि यह अक्षर आवर्धित प्रतीत होते हैं, तो दिया गया काँच का टुकड़ा उत्तल लेंस है। (2) यदि यह अक्षर आकार में कम प्रतीत होते हैं, तो दिया गया काँच का टुकड़ा अवतल लेंस है। (3) यदि अक्षर समान आकार के प्रतीत होते हैं, तो दिया गया काँच का टुकड़ा समतल काँच का टुकड़ा है। दिया गया है, अपवर्तनांक, हमें ज्ञात है कि, लेंस की शक्ति,P = + 2.0 D माना,लेंस की फोकस दूरी F है, चूँकि, F = ( 1/ P) इसलिए, = ( 1 / 2.0 D) = (1 / 2) x ( 1 / D) = 0.5 m [ (1/ D) = 1 m] = 50.0 cm दिया गया है, पानी का अपवर्तनांक , वस्तु की वास्तविक गहरायी = 10 m वस्तु की आभासित गहराई लेंस द्वारा प्रतिबिम्ब बनने के नियम : 1. मुख्य अक्ष के समानान्तर सभी किरणें अपवर्तन के बाद मुख्य फोकस के माध्यम से गुज़रती हैं या इससे आ रही प्रतीत होती हैं। 2. फोकस के माध्यम से गुज़र रही प्रकाश की किरण अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष के समानान्तर हो जाती है। 3. लेंस के प्रकाशिक केन्द्र के माध्यम से गुज़र रही प्रकाश की किरण अपवर्तन के बाद अविचलित गुज़रती है। वास्तविक तथा आभासी प्रतिबिम्ब के बीच अन्तर निम्नानुसार दिया जाता है - वास्तविक प्रतिबिम्ब आभासी प्रतिबिम्ब (1) वास्तविक प्रतिबिम्ब पर्दे पर प्राप्त किया जा सकता है । (2) वास्तविक प्रतिबिम्ब परावर्तितया अपवर्तित प्रकाश किरण के वास्तविक प्रतिच्छेदन द्वारा बनता है। (3) यह हमेशा उल्टा होता है। (1) आभासी प्रतिबिम्ब पर्दे पर प्राप्तनहीं किया जा सकता है लेकिन दर्पण या लेन्स में से केवल देखा जा सकता है । (2) आभासी प्रतिबिम्ब, परावर्तित या अपवर्तित प्रकाश किरण के स्पष्ट प्रतिच्छेदन द्वारा बनता है जब उनकी दिशा पीछे की ओर की गई हो।
किसी माध्यम का अपवर्तनांक वस्तु की दूरी, u = -3 m प्रतिबिम्ब की दूरी, v = -1 m फोकस दूरी, f = ? शक्ति, लेंस सूत्र से, उपयोग किया गया लेंस अवतल लेंस है| जब वस्तु वक्रता केंद्र तथा फोकस के बीच रखी जाती है, तो इसका प्रतिबिम्ब वास्तविक तथा उल्टा, दर्पण के सामने वक्रता केंद्र के पीछे तथा बढ़ा हुआ बनता है। (i) काँच के स्लैब के माध्यम से अपवर्तन के समय यह देखा गया कि प्रकाश किरण की निर्गामी किरण आपतित किरण के समानान्तर है लेकिन आपतित किरण के पथ से पार्शविक विस्थापित होती है। निर्गामी किरण तथा आपतित किरण के वास्तविक पथ के बीच अन्तर की लम्बवत दूरी को पार्शविक विस्थापन के रूप में जाना जाता है। (ii) (a)जब प्रकाश किरण, विरल माध्यम से सघन माध्यम में होकर गुज़रती है, तो यह अभिलम्ब की ओर मुड़ जाती है। (b)जब प्रकाश किरण, सघन माध्यम से विरल माध्यम में होकर गुज़रती है, तो यह अभिलम्ब से दूर मुड़ जाती है। माध्यम-1 का निर्पेक्ष अपवर्तनांक n1 तथा माध्यम-2 का निर्पेक्ष अपवर्तनांक n2 मानें तो माध्यम-1 के सापेक्ष माध्यम-2 का अपवर्तनांक, माध्यम-2 के सापेक्ष माध्यम-1 का अपवर्तनांक, अत: उदाहरण- जल के सापेक्ष काँच का अपवर्तनांक (wng)= ng/nw = 1.5/1.33 = 1.13 कांच के सापेक्ष जल का अपवर्तनांक (gnw) = nw/ng = 1.33/1.5 = 0.89 अत: wngxgnw = 1.13 x 0.89= 1 (i) आपतन कोण वह कोण है, जो आपतित किरण, अभिलम्ब के साथ बनाती है। इस प्रकार, आपतन कोण, i = 90o – 27o = 63o। (ii) अपवर्तन कोण वह कोण है, जो अपवर्तित किरण, अभिलम्ब के साथ बनाती है। इस प्रकार, ज्यामिति से, i = r + 37o इसलिए, अपवर्तन कोण, r = 63o – 37o = 26o (iii) स्नैल के नियम से, परिभाषा के अनुसार, यदि स्नैल के नियम से, चूंकि, बना हुआ प्रतिबिम्ब सीधा तथा आभासी है । इसके अलावा आवर्धन 1 से अधिक है| इससे यह पता चलता है कि उपयोग किया गया दर्पण अवतल दर्पण है। इस प्रकार, हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह प्रतिबिम्ब दर्पण के पीछे बनता है । इस प्रकार प्रश्नानुसार, आवर्धन, समीकरण (1) तथा (2) से, समीकरण (1) तथा (3) से, दर्पण सूत्र से, B. B-II C. C-III D. D-IV जब प्रकाश विरल माध्यम से सघन माध्यम में प्रवेश करता है, तब यह अभिलम्ब की ओर झुकती है और जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करता है, तब यह अभिलम्ब से दूर झुकती है| यह स्थिति विकल्प (C) के लिए सही है|
B. नीले प्रकाश की तरंगदैर्ध्य सूक्ष्म होती है आकाश नीला प्रतीत होता है क्योंकि, नीले सिरे पर सूक्ष्म तरंगदैर्ध्य का प्रकाश, लाल प्रकाश जिसकी तरंगदैर्ध्य 1.8 गुना होती है, की तुलना में अधिक प्रकीर्णित होता है।
B. वास्तविक स्थिति की तुलना में नीचे C. वास्तविक स्थिति के रूप में समान D. वास्तविक स्थिति के बाईं ओर विस्थापित जब तारों से आता हुआ प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो यह वायुमंडल की विभिन्न परतों पर पुनरावृत्तीय अपवर्तन से गुज़रता है। जब अपवर्तनांक में वृद्धि होती है, तो प्रकाश किरणें प्रत्येक परत के माध्यम से गुज़रने पर अभिलम्ब की ओर मुड़ने लगती है। परिणामस्वरूप, तारों की आभासी स्थिति वास्तविक स्थिति की तुलना में ऊपर हो जाती है।
B. जल - वाष्प द्वारा प्रकाश का प्रकीर्णन होता है। C. वायुमंडल में छोटी जल बूंदों द्वारा प्रकाश का प्रकीर्णन होता है। D. बादलों द्वारा प्रकाश का प्रकीर्णन होता है। वायुमंडल में छोटी जल बूंदें सूक्ष्म प्रिज्मों के रूप में कार्य करती हैं और अपने पर गिरने वाली प्रकाश किरणों को प्रकीर्णित कर देती है। यह इन्द्रधनुष के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाती है।
B. स्थिर बनी रहेगी C. में कमी होगी D. स्थिर रह सकती है या नहीं भी चूँकि, अभिनेत्र - लेंस तथा रेटिना के बीच दूरी नियत होती है। इसलिए, प्रतिबिम्ब - दूरी, वस्तु की दूरी के सापेक्ष समान बनी रहती है।
B. वर्ण – अन्धता के लिए C. दृष्टि के स्थाईत्व के लिए D. दृष्टि की अल्पतम दूरी के लिए पक्ष्माभी पेशियों की सहायता से, अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी देखी जाने वाली वस्तु की दूरी के अनुसार परिवर्तित की जा सकती है। आँख से विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं को देखने के लिए फोकस दूरी में परिवर्तन का यह गुण समंजन क्षमता कहलाता है।
B. प्रकाश के प्रकीर्णन के रूप में जाना जाता है। C. छः रंगों का बैण्ड होता है, जो स्पैक्ट्रम के रूप में जाना जाता है। D. प्रकाश के विक्षेपण के रूप में जाना जाता है। प्रकाश का प्रकीर्णन, श्वेत प्रकाश का त्रिभुजाकार प्रिज़्म के माध्यम से गुजरने पर सात रंगों में विभाजन है।
B. बैंगनी रंग के लिए C. पीले रंग के लिए D. नीले रंग के लिए बैंगनी रंग प्रिज़्म के माध्यम से गुज़रने पर अधिकतम विचलन को दर्शाता है। इसलिए, बैंगनी रंग के लिए अपवर्तनांक अधिकतम है।
B. न्यूनतम C. बिलकुल 25 c m D. शुन्य के बराबर जब पक्ष्माभी पेशियाँ शिथिल होती हैं, तो अभिनेत्र लेंस पतला हो जाता है। यह अभिनेत्र - लेंस की अधिकतम फोकस - दूरी के लिए मुख्य भूमिका निभाता है।
B. दूर दृष्टता C. जरा दृष्टता D. मोतियाबिंद दीर्घ - दृष्टि दोष, दूर - दृष्टिता के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि, व्यक्ति दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम होते हैं, लेकिन, पास की वस्तुओं को नहीं देख पाते हैं।
B. जरा - दूर दृष्टि दोष से। C. दीर्घ दृष्टि दोष से। D. मोतियाबिंद से। यह व्यक्ति निकट दृष्टि दोष से पीड़ित है जिसकी आँख का दूरस्थ – बिंदु, अनंत से कम है, इसलिए, व्यक्ति पास की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख पाता है लेकिन, दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता है।
B. दृष्टिपटल C. पुतली D. परितारिका स्वच्छ मंडल नेत्र गोलक के अग्र पृष्ठ पर उपस्थित होता है। इसलिए, मानव नेत्र में प्रवेश करने वाला प्रकाश सर्वप्रथम स्वच्छ मंडल से हो कर ही गुज़रता है।
पहले प्रिज़्म द्वारा प्रकाश के सात रंग विभिन कोनों पर निर्गत होते हैं| इसलिए, अलग अलग दिखाई देते हैं| किन्तु, जब एक अन्य सर्व सम प्रिज़्म पहले प्रिज़्म के सामने रखा जाता है तो सातों रंग फिर से समान कोण पर विचलित हो जाते हैं तथा संयोजित हो कर श्वेत प्रकाश बनाते हैं|
B. 3 मिनट की C. 4 मिनट की D. 6 मिनट की वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण, सूर्य हमें वास्तविक सूर्योदय से 2 मिनट पहले तथा वास्तविक सूर्यास्त के 2 मिनट बाद तक दिखाई देता है। इसलिए, दिन की कुल अवधि में 4 मिनट की वृद्धि हो जाती है।
B. उत्तल लेंस के उपयोग से C. अवतल दर्पण के उपयोग से D. उत्तल दर्पण के उपयोग से अवतल लेंस अपसारी लेंस होते हैं। निकट - दृष्टि दोष की स्थिति में, प्रतिबिम्ब, रेटिना के पहले बनता है। इसलिए, अवतल लेंस के उपयोग से नेत्रों में प्रवेश होने वाली प्रकाश किरणें अपसरित हो जाती हैं तथा प्रतिबिम्ब रेटिना पर बन जाता है।
जब पेशियाँ शिथिल होती हैं तो अभिनेत्र लेंस पतला हो जाता है तथा इसकी फोकस दूरी बढ़ जाती है| फलस्वरूप,हम दूर रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट रूप से देख पाते हैं|
B. अधिक प्रकाश को प्रवेश करने देती है C. अँधेरे में D. खतरे से बचाव करते समय परितारिका वह मांसपेशी है जो तीव्र प्रकाश में पुतली को संकुचित कर देती है तथा इस प्रकार, आँख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करती है।
B. मोतियाबिंद से C. निकट दृष्टि दोष से D. जरा – दूरदृष्टिता से दीर्घ - दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति की आँख का निकटतम - बिंदु 25 c m से अधिक होता है। इसलिए, व्यक्ति निकट की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता है, दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख सकता है।
B. प्रकाश का अपवर्तन C. प्रकाश का प्रकीर्णन D. प्रकाश की दिशा में याद्रच्छिक परिवर्तन वायु में स्थित सूक्ष्म कणों से टकरा कर प्रकाश किरणों की दिशा में याद्रच्छिक परिवर्तन प्रकाश का प्रकीर्णन कहलाता है|
श्वेत प्रकाश सात विभिन्न रंगों का संयोजन होता है। जब श्वेत प्रकाश किसी प्रिज़्म द्वारा गुज़रता है, तो ये सात रंग प्रिज़्म के माध्यम से विभिन्न कोणों द्वारा विचलित हो जाते हैं तथा अलग-अलग दिखाई देते हैं| प्रकाश के सात रंगों का यह संयोजन स्पैक्ट्रम कहलाता है।
B. 1 m C. 25 m D. अनन्त वह अल्पतम दूरी जिस पर रखी गई वस्तु को आँख बिना किसी तनाव के स्पष्ट रूप से देख सकती है, दृष्टि की अल्पतम दूरी कहलाती है। यह सामान्य आँख के लिए 25 c m होती है।
A. आभासी तथा उल्टा हैSOLUTION
SOLUTION

SOLUTION

Right Answer is:
SOLUTION

SOLUTION
(a) अवतल दर्पण के वक्रता केंद्र के माध्यम से गुजर रही प्रकाश किरण, दर्पण पर अभिलंबवत गिरती है।SOLUTION

SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
![]()


SOLUTION
SOLUTION
= 1.33

SOLUTION



SOLUTION
(3) यह सीधा होता है ।SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION

SOLUTION


(c)जब प्रकाश किरण, काँच के स्लैब पर अभिलम्बवत गिरती है, तो यह प्रकाश किरण, बिना विचलित हुए सीधी निकल जाती है|
SOLUTION



जल का अपवर्तनांक 1.33 तथा काँच का अपवर्तनांक 1.5 हो तो (iii) पदार्थ P का अपवर्तनांक।

SOLUTION

SOLUTION

=c/v [c =निर्वात में प्रकाश की चाल, v =माध्यम में प्रकाश की चाल]
तथा
माध्यम 1 तथा माध्यम 2 के अपवर्तनांक हैं तथा v1 एवं v2 दो माध्यमों में प्रकाश की चाल है, तो
तथा 


SOLUTION
वस्तु की दूरी (u) + प्रतिबिम्ब की दूरी (v) = 100cm
या |u| + |v| = 100cm ….…(1)



SOLUTION
दिखाए गए चित्र में,
A = प्रिज़्म कोण है ,
X = आपतन कोण
यह आपतन किरण और प्रिज़्म के पृष्ठ के अभिलम्ब के बीच का कोण है|
M = निर्गत कोण
यह निर्गत किरण और प्रिज़्म के पृष्ठ के अभिलम्ब के बीच का कोण है |
Z = विचलन कोण
यह निर्गत किरण और आपतन किरण के बीच का कोण है |
अत: विकल्प (C) सही है |
इनमें से किरण का सही पथ दर्शाने वाला छात्र तथा आरेख है:
A. A-ISOLUTION
A. वायुमंडल में वायु के अणु तथा अन्य कण, दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की तुलना में बड़े होते हैं।SOLUTION
A. वास्तविक स्थिति की तुलना में ऊपरSOLUTION
A. वायुमंडलीय धूल के कणों द्वारा प्रकाश का प्रकीर्णन होता है।SOLUTION
A. में वृद्धि होगीSOLUTION
A. समंजन क्षमता के लिए SOLUTION
A. प्रिज्म के आधार के कारण होता है।SOLUTION
A. लाल रंग के लिएSOLUTION
A. अधिकतमSOLUTION
A. निकट दृष्टताSOLUTION
A. निकट दृष्टि दोष से SOLUTION
A. स्वच्छ मंडलSOLUTION
SOLUTION
A. 2 मिनट की SOLUTION
A. अवतल लेंस के उपयोग से SOLUTION
A. पास रखी वस्तुएँ सुस्पष्ट दिखाई देती हैंSOLUTION
A. तीव्र प्रकाश मेंSOLUTION
A. दीर्घ दृष्टि दोष सेSOLUTION
A. प्रकाश का परावर्तनSOLUTION
A. श्वेत प्रकाश निर्गत होता हैSOLUTION
A. 25 cmSOLUTION