आपतन कोण
प्रिज़्म कोण
अल्पतम विचलन कोण
d
= (2
=
एक युवा आदमी के लिए सुस्पष्ट दृष्टि की अल्पतम दूरी लगभग
वह न्युनतम दूरी जिस पर आँख बिना किसी तनाव के वस्तु को देख सकती है सुस्पष्ट दृष्टि की अल्पतम दूरी कहलाती है।
वह विद्यार्थी दूर की वस्तुओं को देखने में सक्षम नहीं है। वह निकट दृष्टि दोष से पीड़ित है। यह दोष उपयुक्त्त शक्ति के अवतल लेन्स के उपयोग द्वारा दूर किया जा सकता है।
प्रकाश के प्रकीर्णन में बैंगनी प्रकाश अधिक झुकता है तथा लाल प्रकाश कम झुकता है।
जब श्वेत प्रकाश प्रिज़्म की सतह पर गिरता है
निलम्बित कणों द्वारा प्रकीर्णित प्रकाश का रंग कण के आकार पर निर्भर करता है।
किसी कोलॉइडी विलयन में कणों द्वारा प्रकाश का प्रकीर्णन टिंडल प्रभाव कहलाता है।
लेंस सूत्र के अनुसार,

अत:
मनुष्य के चश्मे में 37.5 सेमी फोकस दूरी का उत्तल लेन्स (धनात्मक चिन्ह के कारण) लगाना होगा।
इंद्रधनुष, वर्षा के पश्चात आकाश में जल के सूक्ष्म कणों में दिखाई देने वाला प्राकृतिक स्पेक्ट्रम है| यह वायुमंडल में उपस्थित जल की सूक्ष्म बूँदों द्वारा सूर्य के प्रकाश के परिक्षेपण के कारण प्राप्त होता है।
दूर दृष्टि दोष के दो कारण होते हैं:
जरा-दूरदृष्टता वृद्धावस्था में पक्ष्माभी पेशियों के धीरे-धीरे दुर्बल होने तथा क्रिस्टलीय लेंस के लचीलेपन में कमी आने के कारण उत्पन्न होता है।
कार्निया(Cornea) एवं नेत्र लेन्स के बीच के स्थान में जल के समान पारदर्शी द्रव भरा रहता है जिसका अपवर्तनांक 1.336 होता है। यह जलीय द्रव कहलाता है।
श्रेणीक्रम में संयोजित प्रतिरोधों के निकाय का प्रतिरोध परिपथ में लगे अधिकतम प्रतिरोध के मान से अधिक होता है।
पाश्र्व क्रम में संयोजित प्रतिरोधों के निकाय का प्रतिरोध परिपथ में लगे न्यूनतम प्रतिरोध के मान से कम होता है।
B. 3000 W C. 2300 W D. 2000 W P = VI
= 220 V x 15A
=3300 W
प्रतिरोधकता पदार्थ का एक विशेष गुण है। हर पदार्थ की प्रतिरोधकता नियत होती है जो उसके भौतिक कारकों पर निर्भर नहीं करती।
B. 22000 ओम C. 100 ओम D. 484 ओम B. विद्युत आवेश का C. इलेक्ट्रानों का D. विद्युत ऊर्जा का विद्युत सेल के प्रयोग से रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। इसमें होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाएं विद्युत धारा का प्रवाह उत्पन्न करती हैं।
B. 5 x 1015 होगी। C. 2 x 1016 होगी। D. 4 x 1018 होगी। B. 8R होगा C. 4R होगा D. R होगा H = I2RT
जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रतिरोधक में उत्पन्न होने वाली उष्मा दिए गए प्रतिरोधक में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है।
B. कूलॉम C. वोल्ट D. एम्पियर विद्युत आवेश का SI मात्राक कूलॉम(C) है, जो लगभग 6 x 1018 इलेक्ट्रोनों में समाए आवेश के तुल्य होता है।
B. 2 : 1 C. 1 : 4 D. 4 : 1 B. 625Ω C. 25Ω D. 2.5Ω B. P = l/V C. P = Vl D. P = V2/l विद्युत शक्ति की परिभाषा से हमें किसी विद्युत परिपथ में उपभुक्त अथवा क्षयित विद्युत ऊर्जा की दर प्राप्त होती है। शक्ति P को इस प्रकार व्यक्त करते हैं
P = VI
B. केवल अधात्विक चालकों के लिए C. केवल अर्ध चालकों के लिए D. सभी के लिए वैद्युत अभियांत्रिकी एवं इलेक्ट्रानिक्स में प्रयुक्त बहुत सी युक्तियाँ ओम के नियम का पालन नहीं करती हैं। ऐसी युक्तियों को अनओमीय युक्तियाँ कहते हैं। उदाहरण के लिये, डायोड एक अनओमीय युक्ति है।
B. ओम/सेमी C. ओम-सेमी D. वोल्ट यदि किसी चालक के दोनों सिरों के बीच विभवांतर 1 V है तथा उससे 1 A विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तब उस चालक का प्रतिरोध R, 1Ω होता है।
B. 1 वोल्ट C. 0.225 वोल्ट D. 2.25 वोल्ट B. उसका गलनांक बहुत कम होता है। C. उसका प्रतिरोध उपेक्षणीय होता है। D. इनमें से कोई नहीं। उसका गलनांक बहुत अधिक होता है जिसके कारण वह बहुत गरम होने पर भी नहीं पिघलता।
परिपथ में प्रवाहित विद्युत धारा का परिमाण मापने के लिए ऐमीटर का उपयोग किया जाता है।यह विद्युत परिपथ से हमेशा श्रेणी क्रम में जोड़ा जाता है। एक ही सॉकेट से एक ही समय पर बहुत से विद्युत साधित्रों को संयोजित करने से अतिभारण हो जाता है तथा परिपथ लघुपथन दर्शाता है, साथ ही साधित्रों के जल जाने का भी खतरा रहता है। दिया गया है, विद्युत धारा का आवेश = समय = परिपथ में प्रवाहित धारा, चिन्ह परिपाटी के अनुसार, सभी दूरियां प्रकाशिक केंद्र से मापी जाती हैं| आपतित प्रकाश की दिशा के अनुदिश मापी जाने वाली दूरियां धनात्मक के रूप में ली जाती है जबकि, आपतित प्रकाश की दिशा के अनुदिश मापी जाने वाली दूरियां ऋणात्मक के रूप में ली जाती हैं| यहाँ, फोकस दूरी (1/शक्ति) ऋणात्मक प्राप्त होती है| तथा इस प्रकार, यह आपतित प्रकाश की दिशा के विपरीत मापी जाती है| इसलिए, हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि लेंस अपसारी अर्थात, अवतल लेंस है|
लेंस को पर्दे की ओर गति कराकर, दूरस्थ निकाय (वस्तु) का स्पष्ट प्रतिबिम्ब प्राप्त किया जा सकता है| अर्थात, पेड़ प्राप्त हो जाएगा|
B. II C. III D. IV किरण आरेख में यह बिंदु दूर – दूर होने चाहिए तथा इन बिन्दुओं को मिलाने वाली रेखा और आपतन बिंदु से गुज़रने वाले अभिलम्ब के बीच 90º से कम का कोण होना चाहिए|
B. 4 × 107 m to 8 × 107 m C. 4 × 103 m to 8 × 103 m D. 2 × 10-3 m to 3 × 10-4 m मानव नेत्र 4 × 10–7 m से 8 × 10–7 m तक तरंगदैर्ध्य की परास की विद्युत् चुम्बकीय तरंगों को ही संसूचित कर सकती है| इस परास की विद्युत् चुम्बकीय तरंगे दृश्य प्रकाश कहलाती हैं|
‘i’ का मान लगभग निर्गत कोण के मान के बराबर होता है| इनके मानों में यह अन्तर प्रयोग करते समय प्रयोग में आने वाली त्रुटियों के कारण आता है|
पर्दे पर पेड़ का प्रतिबिम्ब, लम्बवत प्रतिलोमित (उल्टा) प्रतिबिम्ब होगा|
उत्तल दर्पण हमेशा सीधे प्रतिबिम्ब बनाता है| इसके अलावा, प्रतिबिम्ब छोटे आकार के होते हैं जिसके कारण, चालकको अपने पीछे आ रहे कई वाहनों के प्रतिबिम्बों को देखने के लिए व्यापक क्षेत्र मिलता है|
प्रकाश, विरल माध्यम की तुलना में प्रकाशिक सघन माध्यम में धीमी चाल से संचरण करता है| इस प्रकार, प्रकाश की किरण सघन माध्यम में प्रवेश करने पर अभिलम्ब की ओर मुड़ जाती है|
B. 50 cm होगी C. 75 cm होगी D. 100 cm होगी किसी गोलिय दर्पण की फोकस दूरी उसकी वक्रता त्रिज्या की आधी होती है|
f = R/2
= 50 cm/2
= 25 cm
प्रतिबिम्ब बना हुआ प्रतिबिम्ब हम उत्तल दर्पण को प्राथमिकता देते हैं यह प्रतिबिम्ब अवतल दर्पण के सामने वक्रता केंद्र पर बनेगा। अवतल दर्पण के उपयोग : फोकस दूरी, f = ? वक्रता त्रिज्या हमें ज्ञात है कि, स्नेल के प्रकाश के अपवर्तन के नियम के अनुसार, किन्हीं दो माध्यमों के लिए, आपतन कोण की ज्या से अपवर्तन कोण की ज्या का अनुपात एक स्थिरांक होता है। जब वस्तु किसी अवतल लेंस के अनन्त तथा प्रकाशिक केन्द्र के बीच निहित होती है, तो प्रतिबिम्ब का आकार, स्थिति तथा प्रकृति निम्न प्रकार होती है: प्रतिबिम्ब की स्थिति : फोकस तथा प्रकाशिक केन्द्र के बीच। प्रतिबिम्ब का आकार : छोटे आकार का। प्रतिबिम्ब की प्रकृति : आभासी तथा सीधा। दिया गया है, आपतन कोण परावर्तन कोण, वायु के सापेक्ष द्रव का अपवर्तनांक किसी माध्यम का निरपेक्ष अपवर्तनांक नेत्र लेन्स के पीछे दृष्टि पटल तक का स्थान एक गाढ़े, पारदर्शी एवं उच्च अपवर्तनांक के द्रव से भरा होता है। इसे काचाभ द्रव कहते हैं। तीव्र प्रकाश में, परितारिका के कारण हमारे आँख की पुतली छोटी हो जाती है। इसलिए, जब हम अँधेरे कमरे में प्रवेश करते हैं, तो हमारी आँख में बहुत ही कम प्रकाश प्रवेश करता है और हम ठीक से नहीं देख पाते हैं। कुछ समय बाद, हमारी आँख की पुतली फैलती है और बड़ी हो जाती है। तब हमारी आँखों में अधिक प्रकाश प्रवेश करता है और हम स्पष्ट रूप से देख पाते हैं। प्रातः काल अथवा संध्या काल के समय, सूर्य का लाल रंग दिखायी देना भी प्रकाश के प्रकीर्णन का प्रभाव है। सूर्योदय या सूर्यास्त के समय सूर्य का प्रकाश वायुमंडल की बहुत गहरी परत से गुज़रता है नहीं, नेत्र से वस्तु की दूरी बढ़ाने पर प्रतिबिम्ब की दूरी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता| ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मानव नेत्र की समंजन क्षमता स्थिर होती है| नेत्र के भीतर क्रिस्टलीय लेंस से दृष्टिपटल की दूरी स्थिर है| किन्तु वस्तु की दूरी बढ़ाने पर उसका प्रतिबिम्ब दृष्टिपटल पर उत्पन्न हो, ऐसा करने के लिए क्रिस्टलीय लेंस अपनी फोकस दूरी को बदलता रहता है| जब श्वेत प्रकाश प्रिज़्म की सतह पर गिरता है, तो यह मूल कणों में विभक्त हो जाता है। यही कारण है कि विभिन्न रंग विभिन्न कोणों से विचलित हो जाते हैं। किसी निश्चित रंग में उत्पन्न विचलन उस निश्चित रंग के लिए प्रिज़्म के पदार्थ के अपवर्तनांक पर निर्भर करता है। चूँकि, बैंगनी रंग के लिए पदार्थ का अपवर्तनांक, लाल रंग के लिए पदार्थ के अपवर्तनांक की तुलना में अधिक होता है। बैंगनी रंग अधिक विचलित तथा लाल रंग बहुत कम विचलित होता है। तारे की टिमटिमाहट, तारे के प्रकाश के वायुमण्डलीय अपवर्तन के कारण होती है। यह वायुमण्डल कई परतों का बना होता है तथा अपवर्तनांक वायु के घनत्व में परिवर्तन होने के कारण लगातार बदलता रहता है। परिणामस्वरूप, तारों से प्रकाश किरणों का पथ लगातार इनके पथ को परिवर्तित करता रहता है। आँखों में प्रवेश करने वाली किरणों की संख्या में समय के साथ परिवर्तन होता जाता है और तारे हमें टिमटिमाते हुए दिखाई देते हैं। पलकें खुलने पर वस्तु से आने वाला प्रकाश कार्निया पर पड़ता है तथा पुतली से होकर लेन्स पर आपतित होता है। परितारिका झिल्ली, पुतली के व्यास को इस प्रकार समंजित करती है कि कम प्रकाश वाली वस्तु से पर्याप्त मात्रा में तथा ज्यादा प्रकाश वाली वस्तु से सीमित मात्रा में प्रकाश नेत्र में प्रवेश कर सकें। पक्ष्माभी - पेशियाँ भी लेन्स के पृष्ठों की वक्रता त्रिज्याओं को घटा - बढ़ा कर लेन्स की फोकस दूरी को ऐसे समंजित करती हैं कि वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब रेटिना पर बने। प्रतिबिम्ब उल्टा तथा छोटा होता है। प्रतिबिम्ब के प्रकाश से प्रभावित होकर रेटिना की तंत्रिकाओं के सिरे, मस्तिष्क को सन्देश भेजते हैं, जिससे हम वस्तु को देख पाते हैं। दिन के समय सूर्य का रंग परिवर्तित होता रहता है। दोपहर के समय में, जब सूर्य हमारे सिर के ऊपर होता है, तो सूर्य का प्रकाश दिन के अन्य समय की तुलना में वायुमण्डल के माध्यम से कम दूरी तय करता है। इस प्रकार, सूर्य का प्रकाश कणों की कम संख्या से गुजरता है| परिणामस्वरूप, प्रकाश का प्रकीर्णन कम होता है। इसलिए, सूर्य दोपहर के समय श्वेत दिखाई देता है। सूर्योदय तथा सूर्यास्त पर, सूर्य का प्रकाश अधिक दूरी तय करता है तथा कणों की अधिक संख्या से गुज़रता है| जिसके कारण प्रकाश का प्रकीर्णन भी अधिक होता है। इसलिए, शाम व सुबह के समय हमारी आँखों तक पहुँचने वाला प्रकाश मुख्यतया लाल रंग का होता है। निकट दृष्टि दोष के निवारण के लिए अवतल लेंस का प्रयोग किया जाता है। अवतल लेंस आपतित समांतर किरणों को नेत्र लेंस पर पड़ने से पहले कुछ अपसरित कर देता है जिससे प्रतिबिम्ब रेटिना पर बन जाता है। अवतल लेंस लगाने पर वस्तु का एक आभासी प्रतिबिम्ब ‘O’ लेंस के फोकस पर बन जाता है, जो नेत्र लेंस के लिए वस्तु का कार्य करता है तथा इसका प्रतिबिम्ब रेटिना पर स्पष्ट बन जाता है। निकट दृष्टि दोष निवारण के लिए अवतल लेंस की फोकस दूरी दोष युक्त नेत्र के दूर बिंदु की दूरी के बराबर होनी चाहिए। प्रिज़्म में अपवर्तन दो झुकी हुई सतहों पर होता है। प्रिज़्म की पहली सतह पर, प्रकाश का प्रकीर्णन उत्पन्न होता है जहाँ, इसके मूल रंग विभिन्न कोणों के माध्यम से विचलित हो जाते हैं। दूसरी सतह पर ये विभाजित मूल रंग केवल अपवर्तन से गुज़रते हैं तथा आगे बढ़ने पर पृथक हो जाते हैं। आयताकार काँच के ब्लॉक की स्थिति में, प्रकाश का अपवर्तन दो समानान्तर सतहों पर होता है। हालांकि, पहली सतह पर श्वेत प्रकाश अपवर्तन से अपने मूल कणों में विभाजित हो जाता है लेकिन, दूसरी सतह पर अपवर्तन से गुजरने के बाद ये विभाजित रंग पुन: मिल जाते हैं तथा आपतित किरण के सापेक्ष समानान्तर किरण के रूप में बाहर निकल जाती है। इस प्रकार, पुनः मिलना श्वेत प्रकाश को प्रकट करता है। निकट दृष्टि दोष या निकट दृष्टिता आँख का दोष है जिसके कारण एक व्यक्ति निकट की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख सकता है लेकिन दूर की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख सकता है। दूर की वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना से पहले बनता है। निकट दृष्टि दोष के कारण है : (1) नेत्र गोलक का अत्यधिक विस्तार। (2) अभिनेत्र लेन्स की फोकस दूरी में कमी। निकट दृष्टि दोष उपयुक्त शक्ति के अवतल लेंस का उपयोग करके दूर किया जा सकता है। किसी प्रिज़्म के पृष्ठ पर विभिन्न आपतन कोणों पर प्रकाश डाल कर निर्गत किरण का मार्ग ज्ञात करके विभिन्न आपतन कोणों के लिए विचलन कोण ज्ञात किये जाए तो यह पाया जाता है कि आपतन कोण बढ़ाने से विचलन कोण का मान पहले तो घट जाता है परन्तु विचलन कोण के एक न्यूनतम मान पर पहुँच कर विचलन बढ़ने लगता है। प्रिज़्म में आपतन विचलन के इस सम्बन्ध को चित्र में आपतन विचलन ग्राफ़ द्वारा व्यक्त किया गया है। विचलन के इस न्यूनतम मान को प्रिज़्म का न्यूनतम विचलन कोण कहते हैं। न्यूनतम विचलन की स्थिति में - 1. प्रिज़्म के भीतर अपवर्तित किरण दोनों अपवर्तक पृष्ठों से समान कोण बनाती है तथा, 2.आपतन कोण का मान निर्गमन कोण के बराबर होता है। साफ दिनों में, आकाश नीले रंग के रूप में दिखाई देता है। यह सूर्य प्रकाश वायुमण्डल के माध्यम से गुज़रने से वायु में उपस्थित गैसों के अणु, पानी की बूंदों, धूल कणों, आदि से प्रकीर्णित हो जाता है। इनमें से गैस के अणु अपनी कम तरंगदैर्ध्य के कारण अधिक नीला प्रकाश प्रकीर्णित करते हैं। यह प्रकीर्णित प्रकाश जब हमारी आँखों तक पहुँचता है तो आकाश नीले रंग का दिखाई देता है। शहरों में वायु प्रदूषण के कारण, वायु में अधिक संख्या में कण उपस्थित होते हैं। अन्य कणों की तुलना में ये कण अन्य रंगों के प्रकाश को अधिक प्रकीर्णित करते हैं। इस प्रकार, इस प्रकीर्णित प्रकाश में नीले रंग के अतिरिक कुछ अन्य घटक भी होते हैं। इसलिए, शहरों में आकाश कम नीले रंग का दिखाई देता है। चूँकि अन्तरिक्ष में कोई कण नहीं होते हैं। इसलिए जब अन्तरिक्ष यात्री सूर्य से दूर देखते हैं तो प्रकाश का प्रकीर्णन ना होने के कारण उन्हें केवल अँधेरा दिखाई देता है। वायुमण्डलीय अपवर्तन के कारण सूर्य हमें, वास्तविक सूर्योदय से लगभग 2 मिनट पहले तथा वास्तविक सूर्यास्त के लगभग 2 मिनट बाद तक दिखाई देता है। जब सूर्य क्षैतिज के ठीक ऊपर होता है तो वास्तविक सूर्योदय होता है। सूर्य से आ रही प्रकाश किरण विभिन्न अपवर्तनांक की परतों के माध्यम से अपवर्तन का सामना करती है। परिणामस्वरूप, सूर्य की स्पष्ट स्थिति वास्तविक स्थिति से थोड़ी सी ऊपर हो जाती है। इस प्रकार, हम सूर्य को वास्तविक सूर्यास्त के बाद तथा वास्तविक सूर्योदय के पहले देख सकते हैं। इस चित्र में, आप क्षैतिज के सापेक्ष सूर्य की वास्तविक तथा स्पष्ट स्थिति देख सकते हैं। वास्तविक सूर्यास्त तथा स्पष्ट सूर्यास्त के बीच समय अन्तराल लगभग 2 मिनट होता है। B. 3.6 x 104 J C. 3.6 x 105 J D. 3.6 x 106 J पाश्र्व क्रम में संयोजित प्रतिरोधों के निकाय में विभावांतर का मान हर प्रतिरोध पर समान रहता है।
श्रेणीक्रम में संयोजित प्रतिरोधों के निकाय में विद्युत धारा का मान हर प्रतिरोध पर समान रहता है।
किसी चालक के सिरों पर विभवांतर बनाए रखने के लिए विद्युत स्रोत जैसे - बैटरी, सेल विद्युत जनित्र आदि का उपयोग किया जाता है। चालक का प्रतिरोध दिए गए सूत्र से व्यक्त किया जाता है, इस प्रकार, प्रतिरोध अनुप्रस्थ काट-क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है। इसलिए, जब दोनों तार समान पदार्थ के बने हुए हैं तो एक मोटे तार की तुलना में पतले तार का प्रतिरोध उच्च होता है। चूंकि प्रतिरोधकता केवल प्रयोग किए गए पदार्थ के प्रकार पर निर्भर करती है, इसलिए तार की लम्बाई बढ़ाने या घटाने से इसके मान में कोई परिवर्तन नहीं होता है। दिया हुआ है, R = 40W, V = 220 V ओम के नियम से, I = V / R = 220 / 40 = 5.5 A किसी भी आवेश के प्रवाह को विद्युत धारा कहते हैं। परन्तु, आवेश दो प्रकार(धनात्मक तथा ऋणात्मक) के होते हैं इसलिए दोनों आवेशों के लिए धारा की दिशा अलग-अलग होती है। परम्परागत मान्यता के अनुसार, विद्युत धारा की दिशा धन आवेश की गति की दिशा में तथा ऋण-आवेश की गति की दिशा के विपरीत मानी जाती है। अत: किसी धातु-खण्ड में मुक्त इलेक्ट्रानों का प्रवाह जिस दिशा में होता है, विद्युत धारा की दिशा उसके विपरीत होती है। फ्यूज़ एक ऐसी युक्ति होती है जो विद्युतपरिपथ का भंजन करने के लिए उपयोग की जाती है। अर्थात, जब परिपथ में विद्युत धारा अधिक हो जाती है, तो परिपथ फ्यूज़ के पिघलने के कारण भंजित हो जाता है। दिया गया है, आवेश, Q = 30 C समय, t = 20 s तो चालक के माध्यम से धारा की गणना निम्न सूत्र के उपयोग से की जा सकती है, Q = It I = Q / t = 30 C / 20 s = 1.5 A दिया गया है, आवेश, Q = 10 कूलॉम किया गया कार्य, W = 40 जूल तो, विभवान्तर, V = W / Q = 40 J / 10 C = किसी पदार्थ की प्रतिरोधकता 1 वर्गमीटर अनुप्रस्थ काट तथा 1 मीटर लम्बाई के किसी चालक के सिरों के बीच प्रतिरोध के बराबर होती है। इसे रो चालाक पर आवेश की मात्रा इस प्रकार व्यक्त की जाती है: एकांक धन आवेश को विद्युत परिपथ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक प्रवाहित करने में जो कार्य करना पड़ता है, उसे उन दोनों सिरे के बीच का विभवान्तर कहते हैं। विभवान्तर (V) = [कार्य(W)]/[प्रवाहित आवेश(q)] अथवा, V = W/q प्रवाहित आवेश = धारा x समय दिया गया है, विभवान्तर = 220V कुंडली का प्रतिरोध = 100 ओम दो प्रतिरोधों को पाश्र्वक्रम में जोड़ कर तीसरे प्रतिरोघ को उनके श्रेणीक्रम में जोड़ेंगे। P = 60 W, V = 220 V P = V x I इसलिए, I = P / V = 60 W / 220 V = (6 / 22)A इसके अलावा, V = I x R [ओम के नियम से] इसलिए, R = V / I = 220 V x (22 / 6) A = 806.66 किसी चालक का प्रतिरोध निम्न कारकों पर निर्भर करता है :- (1) चालक की लम्बाई पर। (2) चालक के पदार्थ की प्रकृति पर। (3) चालक के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल पर। (4) चालक के ताप पर। दिया गया है, I = 5A, R = 15 W, t = 1मिनट = 60 सेकंड उत्पन्न ऊष्मा, H= I2 x R x t = [(5)2 x 15 x 60] J = 22,500 J अगर विद्युत साधित्र श्रेणी में जुड़े हैं तो हर एक को कम वोल्टता मिलेगी और अगर कोई साधित्र बंद हो गया तो परिपथ टूट जाएगा और कोई साधित्र कार्य नहीं करेगा। इसलिए, हम घरेलू साधित्रों को पाश्र्वक्रम में जोड़ते हैं। ऐसा करने से हर साधित्र सीधा वोल्टता स्रोत से जुड़ा होगा। चूंकि, सारे साधित्र निजी स्त्रोत से जुड़े हैं, किसी एक साधित्र के बंद हो जाने पर भी अन्य साधित्र काम करते रहेंगे। प्रतिरोध में पाश्र्व क्रम में जुड़े प्रतिरोधों का तुल्य प्रतिरोध, तुल्य प्रतिरोध को 2 ओम के प्रतिरोध के साथ श्रेणीक्रम में जुड़ा है, वैद्युत शक्ति: किसी वैद्युत परिपथ में विद्युत ऊर्जा के व्यय की समय दर को वैद्युत शक्ति कहते हैं। (i)विभवान्तर के पदों में P = VI जहाँ, V = विद्युत विभवान्तर, तथा I = विद्युत धारा है। (ii)विद्युत धारा के पदों में ओम के नियम अनुसार, I = V/R इसलिए, P = I2R (i) पहले दो प्रतिरोधकों को पार्श्वक्रम में जोड़िए प्राप्त संयोजन को तीसरे प्रतिरोध से श्रेणीक्रम में जोड़ें
(ii) दो प्रतिरोधों को श्रेणीक्रम में संयोजित करें प्राप्त संयोजन को तीसरे प्रतिरोध से पार्श्वक्रम में जोड़ें
भाग 1 दिया गया है, रेफ्रीजिरेटर द्वारा उपभुक्त शक्ति = 100 W प्रतिदिन उपभोग का समय = 15 घंटे उपभोग की प्रति इकाई कीमत = रु 5 एक महिने में विद्युत का कुल उपभोग, =(वाट x घण्टा x दिन/1000) kW-h =(100x15x30/1000) kW-h = 45 kW-h एक माह में उपभुक्त विद्युत शक्ति की कुल कीमत =रु (5 x 45)= रु 225. माना कि तीन प्रतिरोधों का मान R1, R2 तथा R3 है। जब इसे V वोल्ट की बैटरी से जोड़ा जाता है तो प्रत्येक प्रतिरोध पर विभवान्तर का मान V1, V2 तथा V3 होगा जबकि विद्युत धारा I, स्थिर रहेगी । ओम के नियम अनुसार, V = IR …..(i) V1 = IR1 V2 = IR2 V3 = IR3 परिपथ में कुल विभवान्तर, V = V1 + V2 +V3 IR = IR1+ IR2+ IR3 IR = I (R1 + R2 + R3) R = R1 + R2 + R3 विभिन्न उपकरणों द्वारा उपभोग की गई ऊर्जा है :- बल्ब = 4 x 100 W x 6 h = 2400 Wh पंखा = 2 x 60 W x 8 h = 960 Wh प्रत्येक दिन उपभोग की गई यूनिट की संख्या = (2400 + 960) Wh = 3360 Wh = 3360 / 1000 kWh = 3.36 kWh जून के महीने में 30 दिन होते हैं। इसलिए, 30 दिनों के लिए कुल खपत = 3.36 x 30 = 100.8 kWh या 100.8 यूनिट एक यूनिट की लागत = 3 बिल की कुल लागत = 100.8 यूनिट x 3 = 302.4
A. निश्चित ही 1Ω से कम होगा SOLUTION
A. निश्चित ही 2Ω से कम होगाSOLUTION
A. 3300 WSOLUTION
A. आधी हो जाती हैSOLUTION
A. 0.22 ओमSOLUTION
A. विद्युत धारा का SOLUTION
A. 3 x 1012 होगी।SOLUTION
A. 16R होगाSOLUTION
A. दिए गए प्रतिरोधक में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती हैSOLUTION
A. जूलSOLUTION
A. 1 : 2 SOLUTION
A. 25000ΩSOLUTION
A. P = V/lSOLUTION
A. केवल धात्विक चालकों के लिएSOLUTION
A. ओमSOLUTION
A. 22.5 वोल्टSOLUTION
A. उसका गलनांक बहुत अधिक होता है।SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION
इस प्रकार, किसी दूरस्थ निकाय से आ रही प्रकाश किरणें समानान्तर पुंज के रूप में किसी लेंस पर आपतित होती है तथा पर्दे पर फोकसित हो जाती है| इस प्रकार, लेंस तथा पर्दे के बीच दूरी के मापन से लेंस की फोकस दूरी की गणना की जा सकती है|
Right Answer is: A
SOLUTION
SOLUTION

A. ISOLUTION
A. 4 × 10-7 m to 8 × 10-7 mSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
A. 25 cm होगीSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

b)उत्तल दर्पण2
SOLUTION
1. शेविंग दर्पण के रूप में।
2. मोटरवाहनों तथा सर्च लाइटों के लैम्प में परावर्तकों के रूप में।
1.कारों में पश्च दर्शक दर्पण के रूप में।
2. दुकानों में सुरक्षा दर्पण के रूप में।SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
दिखाए गए चित्र में,
A = प्रिज़्म कोण है ,
X = आपतन कोण
यह आपतन किरण और प्रिज़्म के पृष्ठ के अभिलम्ब के बीच का कोण है|
M = निर्गत कोण
यह निर्गत किरण और प्रिज़्म के पृष्ठ के अभिलम्ब के बीच का कोण है |
Z = विचलन कोण
यह निर्गत किरण और आपतन किरण के बीच का कोण है |
अत: विकल्प (C) सही है |
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
A. 3.6 x 103 JSOLUTION
A. आधा हो जाएगा SOLUTION
A. आधा हो जाएगा SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
प्रतीक द्वारा निरूपित करते हैं।SOLUTION
![]()
![]()
SOLUTION
SOLUTION
= 4 ऐम्पियर x (10 x 60)सेकेण्ड
= 2400 कूलॉम
1 इलेक्ट्रान का आवेश = 1.6 x 10-19 कूलॉम
2400 कूलॉम आवेश में इलेक्ट्रानों की संख्या (n)
n = (2400 कूलॉम)/(1.6 x 10-19कूलॉम)
=1.5 x 1022SOLUTION
SOLUTION


SOLUTION
![]()
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION


SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
विभवान्तर(V) = i x R
भाग 2 :
प्रवाहित धारा(i) = V/R
= 2.6वोल्ट /2.0ओम
= 1.3 ऐम्पियरSOLUTION
SOLUTION

SOLUTION
/यूनिट![]()