A. आर्मेचर में
B. क्षेत्र चुंबकों में
C. सर्पी वलयों में
D. विभक्त वलयों में
किसी आर्मेचर को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाने पर उसमें से गुज़रने वाली फ्लक्स रेखाओं में निरंतर परिवर्तन होता रहता है, जिसके कारण आर्मेचर में एक प्रेरित विद्युत-वाहक बल और बाह्य परिपथ व आर्मेचर में प्रेरित विद्युत धारा बहती है।
A. 5 एम्पियर
B. 15एम्पियर
C. 20एम्पियर
D. 25एम्पियर
प्रायःघरोंमेंदोपृथक परिपथहोतेहैं, एक 15 एम्पियरविद्युतधाराअनुमतांककेलिएजिसकाउपयोगउच्चशक्ति वालेविद्युतसाधित्रोंजैसेगीज़र, वायुशीतित्र, आदिकेलिएकिया जाताहै।दूसराविद्युतपरिपथ 5 एम्पियरविद्युतधाराअनुमतांककेलिएहोताहैजिससेबल्ब पंखेआदिचलाएजातेहैं।
चुंबकीय क्षेत्र का S.I.मात्रक टेसला प्रसिद्द वैज्ञानिक निकोला टेसला के सम्मान में रखा गया|
B. पश्चिम की ओर C. उत्तर की ओर D. दक्षिण की ओर दक्षिण हस्त के नियम के अनुसार, यह देखा जा सकता है कि जब किसी चालक में विद्युत् धारा पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है, तो चालक के ऊपर किसी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र उत्तर की ओर होता है।
B. 25 Hz C. 30 Hz D. 0 Hz B. चुंबक के द्वारा C. बैटरी के द्वारा D. कार्बन ब्रुश के द्वारा कार्बन ब्रुश, दिक् परिवर्तक की घूर्णी वलयों के साथ संपर्क बनाते हैं तथा कुंडली को विद्युत् धारा प्रदान करते हैं।
वह प्रक्रम जिसके द्वारा किसी चालक के परिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र के कारण अन्य चालक में विद्युत धारा प्रेरित होती है, वैद्युत चुंबकीय प्रेरण कहलाता है। व्यवहार में हम किसी कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा को या तो उसे किसी चुंबकीय क्षेत्र में गति कराकर अथवा उसके चारों ओर के चुंबकीय क्षेत्र को,परिवर्तित करके, उत्पन्न कर सकते हैं।
कुंडली के सापेक्ष चुंबक की गति एक प्रेरित विभवांतर उत्पन्न करती है, जिसके कारण परिपथ में प्रेरित विद्युत धारा प्रवाहित होती है।इस उत्पन्न धारा के कारण गैल्वेनोमीटर की सुई अपने स्थान से विक्षेपित हो जाती है|
B. नीचे की तरफ C. अनियमित D. दिशा बताने के लिए और मानकों की आवश्यकता है फ्लेमिंग के दक्षिण हस्त नियम के अनुसार, यदि हम दाहिने हाथ के अंगूठे, तर्जनी तथा मध्यमा को इस तरह से फैलाएं कि तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा की ओर संकेत करती है, अंगूठा चालक की दिशा की ओर संकेत करता है, तो फिर मध्यमा उत्पन्न धारा की ओर संकेत करती है|
भारत में सामान्य घरेलु विद्युत् आपूर्ति 220 V , 50 Hz है। इसलिए, हमारे भारत में प्रयोग किए जाने वाले अधिकतर घरेलु साधित्र 220 V , 50 Hz पर कार्य करते हैं|
जब लौह चूर्ण को छड़ चुंबक के आस पास फैला कर उसे थपथपाया जाता है तो वे स्वयं को चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के अनुसार निरुपित कर लेती हैं| इस कारण वे चुम्बक के ध्रुवों के मध्य एक ऐसा पैटर्न बना लेती हैं जो चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को दर्शाती हैं|
परिनालिका के अन्दर चुंबकीय बल रेखाएँ समानान्तर सरल रेखाओं के रूप में होती है। यह इंगित करती हैं कि चुंबकीय क्षेत्र परिनालिका के अन्दर सभी बिन्दुओं पर समान है। अर्थात्, समरूप क्षेत्र। इस प्रकार, कुंडली के अन्दर रखने पर उत्पन्न प्रबल चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग चुंबकीय पदार्थ को चुम्बकित करने के लिए किया जा सकता है और परिणामस्वरूप, एक विद्युत चुंबक बन जाता है।
धातु के चालक से विद्युत धारा प्रवाहित करनेपर चालक एक छड़ चुंबक की भाँती कार्य करने लगता है| तथापि, नाल चुंबक के ध्रुवों के पास आने पर यह आकर्षण तथा प्रतिकर्षण बल के कारण विस्थापित हो जाता है|
B. नर्म लौहे की क्रोड़ की C. प्लास्टिक की क्रोड़ की D. रबर की क्रोड़ की किसी परिनालिका के अन्दर उत्पन्न प्रबल चुंबकीय क्षेत्र एक चुंबकीय पदार्थ को विद्युत चुंबक बना सकता है।नर्म लोहेकी क्रोड़ भी एक चुंबकीय पदार्थ है| इसलिए, परिनालिका तथानर्म लोहेकी क्रोड़ का प्रयोग करके विद्युत चुंबक बनायी जा सकती है|
समान ध्रुव एक दूसरे को प्रतिकर्षित तथा असमान ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते हैं।
B. विद्युत् क्षेत्र के भीतर C. चुंबकीय ध्रुव के भीतर D. विद्युत् ध्रुव के भीतर चुंबकीय क्षेत्र किसी चुम्बक के चारों ओर वह क्षेत्र होता है जहाँ, चुंबकीय आकर्षण बल तथा प्रतिकर्षण बल अनुभव किया जाता है| तथापि, इसके भीतर किसी चुंबक का बल पता लगाया जा सकता है|
B. विद्युत ऊर्जा का C. यांत्रिक ऊर्जा का D. विद्युत आवेश का विद्युत जनित्र एकऐसीयुक्तिहै जोयांत्रिक ऊर्जा कोविद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करदेती है।
चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की निकटता, चुंबकीय क्षेत्र के सापेक्ष तीव्रता का वर्णन करती हैं। इसलिए चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की निकटता के कारण चुंबकीय क्षेत्र प्रबल होगा।
B. स्थाई चुंबक पर C. स्थाई आवेश पर D. गतिशील आवेश पर स्थायी आवेश कोई चुंबकीय प्रभाव नहीं दर्शाता है| इसलिए, एक दूसरा चुंबकीय क्षेत्र, स्थाई आवेश पर बल नहीं लगाता है।
धातु के चालक से विद्युत धारा प्रवाहित करनेपर चालक के आस-पास चुंबकीय छेत्र उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण दिक्सूचक सुई विस्थापित हो जाती है|
निम्न विधियों द्वारा हम चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता में वृद्धि कर सकते हैं - ओर्स्टेड ने निष्कर्ष निकाला कि किसी विद्युत धारावाही चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न किया जा सकता है। जब विद्युत धारा परिनालिका के माध्यम से गुज़रती है, तो इसके चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। निम्न चित्र परिनालिका के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र को दर्शाती है। फ्लेमिंग के वाम - हस्त नियम के अनुसार, यदि हमारे हाथ की तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में संकेत करती है, मध्यमा धारा की दिशा में संकेत करती है, तो अंगूठा चालक पर बल की दिशा में संकेत करेगा। प्रत्यावर्ती धारा वह धारा होती है जिसका मान एक चक्र का समय अन्तराल ( आवृत्ति इस प्रकार फ्लेमिंग के दक्षिण-हस्त नियम के अनुसार, यदि हमारे हाथ की तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में संकेत करती है, तथा अंगूठा चालक की गति की दिशा में संकेत करता है, तो मध्यमा प्रेरित धारा की दिशा में संकेत करेगी। चुंबक के चारों ओर वह क्षेत्र जहाँ आकर्षण या प्रतिकर्षण का बल चुम्बकीय पदार्थ द्वारा अनुभव किया जा सकता है, चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है। विद्युत पंखे विद्युत तथा चुम्बकत्व के बीच सम्बन्ध हैन्स क्रिश्चियन ओर्स्टेड द्वारा दिया गया था। परिनालिका, विद्युतरोधी तार की एक बड़ी संख्या की निकट फेरों वाली लम्बी कुण्डली होती है जो अपने में से विद्युत धारा के गुज़रने पर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। दिष्ट धारा वह धारा है जिसकी दिशा तथा परिमाण समय के साथ नहीं बदलते हैं अर्थात जिसकी दिशा व परिमाण सदैव नियत रहते हैं। किसी सेल या बैटरी से प्राप्त धारा दिष्ट धारा होती है। ऑक्सीकरण
अभिक्रिया
जब
वसा और तेल
ऑक्सीकृत
होते हैं तो
ये विकृतगंधित
हो जाते हैं
और उनकी गंध
और रंग
परिवर्तित
हो जाते हैं |
सामान्यतः
वसा और तेल
युक्त भोजन
में
ऑक्सीकरण को
रोकने वाले
पदार्थ
(प्रतिऑक्सीकारक)
मिलाये जाते
हैं |
अभिक्रिया में भाग लेने वाले विभिन्न अभिकारकों की भौतिक अवस्था के बारे में एक संतुलित रासायनिक अभिक्रिया अभिकारकों और उत्पादों की भौतिक अवस्था के साथ अभिक्रिया के लिए आवश्यक ताप, दाब आदि जैसी भौतिक अवस्थाओं के बारे में भी बताती है |
FeSO4 (s) B. Pb(NO3)2 (s) C. AgCl (s) D. BaCl2 (aq) सिल्वर क्लोराइड का श्वेत रंग प्रकाश की उपस्थिति में धूसर रंग में परिवर्तित हो जाता है | ऐसा सिल्वर क्लोराइड के सूर्य के प्रकाश के कारण सिल्वर और क्लोरीन में अपचयन के कारण होता है |
ऊष्माक्षेपी
अभिक्रिया
इस
अभिक्रिया
में
कैल्शियम
ऑक्साइड और
जल संयुक्त
होकर एक
उत्पाद
बनाते हैं |
ऐसी अभिक्रिया
जिसमें दो या
अधिक
अभिकारकों
से एक उत्पाद का
निर्माण
होता है,
संयोजन
अभिक्रिया
कहलाती है |
कैल्शियम
ऑक्साइड जल
के साथ तीव्र
अभिक्रिया
करके बुझा
हुआ चूना (कैल्शियम
हाइड्रॉक्साइड)
बनाता है और
एक बड़ी मात्रा
में ऊष्मा
मुक्त करता
है | अतः यह एक
ऊष्माक्षेपी
अभिक्रिया
भी है |
MnO2 B.
HCl C.
MnCl2 D.
H2O
दी
गयी
अभिक्रिया
में MnO2 ऑक्सीजन
त्याग रहा है
इसलिए यह MnCl2 में
अपचयित हो
रहा है |
वसा और तेल युक्त भोजन को सल्फर गैस से भरे पात्र में रखकर विकृतगंधिता को तेल और वसा युक्त भोजन में प्रतिऑक्सीकारक मिलाकर रोका जा सकता है | जब भोजन में प्रतिऑक्सीकारक मिलाये जाते हैं उनमें उपस्थित वसा और तेल आसानी से ऑक्सीकृत नहीं होते हैं और इसलिए विकृतगंधित नहीं होते हैं | इसलिए भोजन बहुत लम्बे समय तक खाने के लिए उपयुक्त बना रहता है |
जब एक
परमाणु
अपचयित होता
है, यह
ऑक्सीजन
मुक्त करता
है या
हाइड्रोजन
ग्रहण करता
है | ऑक्सीकरण
और अपचयन के
दौरान उस
परमाणु की
ऑक्सीकरण अवस्था
परिवर्तित
होती है |
प्रतिऑक्सीकारक अपचायक होते हैं जो भोजन के ऑक्सीकरण को रोकते हैं | ऑक्सीकरण अभिक्रिया में मुक्त मूलक सम्मिलित होते हैं और ये प्रतिऑक्सीकारक मुक्त मूलक मध्यवर्तियों को हटाकर श्रृंखला अभिक्रिया को रोक देते हैं |
लोहे के संक्षारण (या ज़ंग) के दौरान आयरन धातु जल (नमी) की उपस्थिति में वायु में उपस्थित ऑक्सीजन से ऑक्सीकृत होकर जलयोजित आयरन (III) ऑक्साइड का निर्माण करती है जो कि ज़ंग कहलाता है | ब्युटिलीकृत
हाइड्रॉक्सी
एनिसोल
BHA (ब्युटिलीकृत
हाइड्रॉक्सी-एनिसोल)
और BHT
(ब्युटिलीकृत
हाइड्रॉक्सी-टॉलुईन)
भोजन में
विकृतगंधिता
को रोकने के
लिए उपयोग
किये जाने
वाले दो
सामान्य
प्रतिऑक्सीकारक
है |
ऑक्सीजन B.
नाइट्रोजन C.
हाइड्रोजन D.
कार्बन
मोनोक्साइड
नाइट्रोजन
गैस एक
अनभिक्रियाशील
गैस है और यह
ऑक्सीजन
(वायु) को
चिप्स तक
पहुँचने तथा
इसका
ऑक्सीकरण
करने से
रोकती है |
इसलिए चिप्स
के निर्माता
चिप्स के
प्लास्टिक
पैकेट को
नाइट्रोजन
से भर देते
हैं जो इसे
ऑक्सीकृत
तथा विकृतगंधित
होने से
रोकती है |
B. C. D. विकल्प 3 में दर्शाया गया अभिक्रिया समीकरण अभिक्रिया का सही रूप प्रदर्शित कर रहा है क्योंकि यह सभी अभिकारकों और उत्पादों की अवस्थाओं को सही प्रदर्शित कर रहा है और यह संतुलित भी है |
विस्थापन
अभिक्रिया
स्पष्टीकरण:एक
अभिक्रिया जिसमें
दो या अधिक
अभिकारकों
से एकल
उत्पाद बनता
है संयोजन
अभिक्रिया
कहलाती है |
उपरोक्त अभिक्रिया
में हमारे
पास दो
अभिकारक है
और एक उत्पाद
है |
प्रकाश रासायनिक
अभिक्रिया
एक
प्रकाश रासायनिक
अभिक्रिया
में अभिकारक
प्रकाशिक सक्रिय
होते हैं | ये
फोटोन का
अवशोषण कर
उत्पाद का
निर्माण
करते हैं |
ऊर्जा का
अवशोषण होता
है
ऊष्माक्षेपी
अभिक्रिया
में
अभिकारकों
की कुल बन्ध
ऊर्जा
उत्पादों की
कुल बन्ध
ऊर्जा से अधिक
होती है |
इसलिए
ऊष्माक्षेपी
अभिक्रिया
के दौरान
ऊर्जा मुक्त
होती है |
द्रव B. जलीय C. गैसीय D. ठोस CaO का जलीय विलयन बुझा हुआ चूना Ca(OH)2 या जलयोजित चूना कहलाता है | यह एक सफेद पाउडर होता है जो CaO को जल के साथ मिलाने पर प्राप्त होता है |
प्रकाश B. ऊष्मा C. उत्प्रेरक D. दाब प्रतीक डेल्टा यह दर्शाता है की रासायनिक परिवर्तन के दौरान ऊष्मा अवशोषित की गयी है | ऊष्माशोषी अभिक्रिया में हम इस प्रतीक का उपयोग करते हैं क्योंकि इन अभिक्रियाओं में ऊष्मा अवशोषित की जाती है |
नहीं, यह द्विविस्थापन अभिक्रिया का उदाहरण है| ऐसी अभिक्रिया जिसमें एकल पदार्थ वियोजित होकर दो या दो से अधिक पदार्थ देता है, वियोजन अथवा अपघटन अभिक्रिया कहलाती है। आर्मेचर नर्म लोहे के एक क्रोड पर लिपटी हुई तथा बहुत अधिक संख्या में लिए गए पृथककृत विद्युतरोधी तारों की कुण्डली है। चुंबकीय क्षेत्र के भीतर खींचा गया वह सतत् वक्र जो चुंबकीय क्षेत्र की दिशा का अवितरित प्रदर्शन करता है, चुंबकीय बल रेखा कहलाता है। चुंबकीय बल रेखाओं के गुणः- 1. चुंबक के बाहर इन बल रेखाओं की दिशा उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर तथा चुंबक के अंदर दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर होती है। इस प्रकार ये बंद वक्र होते हैं। 2. चुंबकीय बल रेखा के किसी बिंदु पर खींची गयी स्पर्श रेखा उस बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है। 3. चुंबकीय बल रेखाएँ एक दूसरे को कभी नहीं काटती, क्योंकि एक बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की दो दिशाएँ संभव नहीं है। धारावाही परिनालिका के भीतर प्रबल चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग किसी चुंबकीय पदार्थ, जैसे-गर्म लोहे को परिनालिका के भीतर रखकर चुंबक बनाने में किया जा सकता है। अर्थात किसी नर्म लोहे की छड़ को परिनालिका के भीतर स्थित प्रबल चुंबकीय क्षेत्र में रख कर चुंबक में परिवर्तित किया जा सकता है।इस प्रकार निर्मित चुंबक, विद्युत चुंबक कहलाते हैं। चुंबकीय बल रेखाओं से स्पर्श रेखा , चुंबकीय क्षेत्र की दिशा प्रदान करती है। यदि हम मानें कि किसी बिंदु पर चुंबकीय बल रेखाएँ प्रतिच्छेदित करती हैं तो इस स्थिति में, दो स्पर्श रेखाएँ चुंबकीय क्षेत्र की दो दिशाओं को प्रदर्शित करेंगी, जो प्रायोगिक रूप से संभव नहीं है। इस प्रकार, दो चुंबकीय बल रेखाएँ एक – दूसरे को प्रतिच्छेदित नहीं करती हैं। जनित्र, यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। जनित्र, विद्युत-चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है। जनित्र में चुंबकीय क्षेत्र में कुण्डली को घुमाकर, प्रेरित विद्युत-वाहक बल उत्पन्न किया जाता है । ऐसी वोल्टेज जिसका परिमाण व दिशा समय के साथ-साथ बदलते रहते हैं तथा एक निश्चित समय के पश्चात् उसी दिशा में उसी परिमाण के साथ उसकी पुनरावृत्ति होती है, प्रत्यावर्ती वोल्टेज कहलाती है। निम्नलिखित कुछ महत्वपूर्ण कारक हैं जिस पर परिनालिका द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र निर्भर करता है : 1. परिनालिका के माध्यम से प्रवाहित धारा की मात्रा पर। 2. परिनालिका में कुल फेरों की संख्या पर। 3. परिनालिका के भीतर उपस्थित क्रोड की प्रकृति पर। चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के गुण - (a) चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर होती है अर्थात ये रेखाएँ बंद वक्र बनाती हैं। (b) चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ उत्तर दिशा को निरूपित करती हैं। (c) चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ एक दूसरे को नहीं काटती। (d) चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ चुंबकीय क्षेत्र का निर्धारण करती हैं। (i)विद्युत मोटर एक ऐसी घूर्णन-युक्ति है जिसमें विद्युत ऊर्जा का यांत्रिक ऊर्जा में रूपांतरण होता है। विद्युत पंखों, विद्युत मिश्रकों, वाशिंग मशीनों,आदि में एक महत्वपूर्ण अवयव के रूप में विद्युत मोटर का उपयोग किया जाता है। (ii)वह युक्ति जो परिपथ में विद्युत धारा के प्रवाह को उत्क्रमित कर देती है, दिक्परिवर्तक कहलाती है|विद्युत मोटर में विभक्तवलय दिक्परिवर्तक का कार्य करता है। निम्न सीधे धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय बल रेखाओं की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं : 1. चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ सीधे धारावाही चालक पर उभयनिष्ठ केन्द्र से संकेंद्रित वृतों के रूप में उत्पन्न होती हैं। 2. चुंबकीय बल रेखाओं की दिशा बदलने पर चालक के माध्यम से गुज़र रही धारा की दिशा भी परिवर्तित हो जाती है। 3. चुंबकीय क्षेत्र तथा चालक की लम्बाई के बीच कोण 90o होता है। 4. प्रति एकांक क्षेत्रफल बल रेखाओं की संख्या चालक के माध्यम से प्रवाहित धारा के परिमाण पर निर्भर करती है। धारा के परिमाण में वृद्धि से इसमें वृद्धि होती है। 5. धारावाही चालक के निकट चुंबकीय बल रेखाएँ वृताकार होती हैं जबकि चालक से दूर थोड़ी दीर्घ वृताकार होती हैं। रचना : ए. सी. जनित्र के विभिन्न भाग निम्न से मिलकर बने होते हैं : (1) आर्मेचर (ABCD): ए. सी. जनित्र में एक आयताकार कुंडली ABCD होती है जो आर्मेचर कहलाती है। यह क्षेत्र चुंबक के दो ध्रुवों के बीच घूर्णन करने में सक्षम होती है। (2) क्षेत्र चुंबक: आर्मेचर, चुम्बक के दो ध्रुवों के बीच रखा जाता है। छोटे जनित्र की स्थिति में, स्थाई चुंबक का उपयोग किया जा सकता है जबकि बड़े जनित्र में विद्युत चुंबक का उपयोग किया जा सकता है। यह समरूप चुंबकीय क्षेत्र प्रदान करते हैं। (3) सर्पण वलय (R1 तथा R2) : आयताकार कुंडली के दो मुक्त सिरे दो वलय ‘R1’ तथा ‘R2’ से जुड़े होते हैं। (4) कार्बन ब्रुश : यह सर्पण वलय R1 तथा R2, ब्रुश B1 तथा B2 से जुड़ी होती है। (5) लोड (L) : लोड (L) दो कार्बन ब्रुशों‘ B1’ तथा ‘B2’ के बीच जुड़ा होता है। यह वह उपकरण है जिसके माध्यम से AC धारा गुज़रती है। छड़ चुंबक विद्युत चुंबक छड़ चुंबक एक स्थाई चुम्बक है। यह अस्थाई चुंबक होती है तथा इसे अचुंबकित किया जा सकता है। इसकी तीव्रता स्थिर रहती है। चुंबकीय तीव्रता को बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इसकी ध्रुवता स्थिर रहती है। इसकी ध्रुवता को परिवर्तित किया जा सकता है। इसके लिए किसी विद्युत शक्ति की आवश्यकता नहीं होती है। इसमें विद्युत शक्ति की आवश्यकता होती है। प्रत्यावर्ती धारा जनित्र के तीन प्रमुख भाग होते हैं- सिद्धांत:- जब कुण्डली को क्षेत्र चुम्बक द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र में घुमाते हैं, तब कुण्डली से सहबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होने के कारण कुण्डली में विद्युत चुंबकीय प्रेरण से विद्युत-वाहक बल उत्पन्न होता है, जिससे कुण्डली तथा बाह्य परिपथ में धारा प्रवाहित होती है। कुण्डली में उत्पन्न विद्युत-वाहक बल प्रत्यावर्ती होता है, परन्तु विभक्त वलय दिशा परिवर्तन द्वारा बाह्य परिपथ में दिष्ट धारा प्रदान करता है। विद्युतघर सामान्यतया उन स्थानों से दूर होते हैं जहाँ विद्युत का उपयोग किया जाता है। यह विद्युत ऊर्जा विद्युत संयंत्र से 11,000 V पर उत्पन्न की जाती है। इस विभव की आवृत्ति 50 Hz होती है। घरेलु विद्युत परिपथ : हमारे घरों में विद्युत ऊर्जा तीन तार विधुन्मय तार, उदासीन तार तथा भू - तार के माध्यम से आती है। हम इन तारों के रोधक के लिए रंग कोड का उपयोग करते हैं। लाल तार विधुन्मय तार कहलाता है तथा काला तार उदासीन तार कहलाता है। हरे रंग का तार भू - तार होता है। लाल तार 220 V के उच्च विभव पर होता है जबकि उदासीन तार शून्य विभव पर होता है। इस प्रकार, विधुन्मय तार तथा उदासीन तार के बीच विभवान्तर (220 – 0) V = 220 V होता है। किसी बंद कुण्डली को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाने पर उसमें से गुज़रने वाली फ्लक्स रेखाओं में निरंतर परिवर्तन होता है, जिस कारण से कुण्डली में एक प्रेरित विद्युत-वाहक बल और बाह्य परिपथ व कुण्डली में प्रेरित विद्युत धारा बहती है। कुण्डली को घुमाने में व्यय यांत्रिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। नए पदार्थ का बनना रासायनिक अभिक्रिया होने की पहली शर्त है |
सिल्वर
ब्रोमाइड
सिल्वर
ब्रोमाइड
सूर्य के
प्रकाश से
अभिक्रिया
करके सिल्वर
देता है जो की
धूसर रंग का
होता है |
अपघटन
अभिक्रियाओं
में
अभिकारकों
को तोड़ने के
लिए ऊष्मा,
प्रकाश या
विद्युत के
रूप में
ऊर्जा की
आवश्यकता
होती है |
अभिक्रियाएँ
जिनमें ऊर्जा
का अवशोषण
किया जाता है
ऊष्माशोषी
अभिक्रियाएँ
कहलाती है |
वही रहेगा ज़िंक आयरन से अधिक अभिक्रियाशील होता है | इसलिए यह आयरन सल्फेट में से आयरन को प्रतिस्थापित कर देता है और विलयन का हरा रंग गायब हो जाता है |
(अ) सब्स्क्रिप्ट से यह ज्ञात होता है कि एक यौगिक में एक तत्व विशेष के कितने परमाणु हैं। गुणांक यौगिक की मात्रा अथवा अणुओं की संख्या को बताता है। (ब) वह अभिक्रिया जिसमें उपचयन और अपचयन साथ-साथ होते हैं उपचयन-अपचयन अभिक्रिया अथवा रेडॉक्स अभिक्रिया कहलाती हैं | उदाहरण- रासायनिक अभिक्रियाएँ मुख्यतः निम्न प्रकार की होती है − 1. संयोजन अभिक्रिया 2. वियोजन अभिक्रिया 3. विस्थापन अभिक्रिया 4. द्विविस्थापन अभिक्रिया 5. उपचयन व अपचयन अभिक्रिया 6. अवक्षेपण अभिक्रिया 1. संयोजन अभिक्रिया- वह अभिक्रिया जिसमें दो या दो से अधिक अदार्थ एक नया पदार्थ (एकल उत्पाद) बनाते हैं, इसे संयोजन अभिक्रिया कहते हैं | उदाहरण − कैल्शियम ऑक्साइड (बिना बुझा चूना) जल के साथ तीव्रता से अभिक्रिया करके कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड (बुझा हुआ चूना) बनाता है तथा इस अभिक्रिया में अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है | इस Ca(OH)2 विलयन का उपयोग दीवारों पर सफेदी करने के लिए किया जाता है | यह वायुमंडल में उपस्थित के CO2 के साथ 2-3 दिन में धीरे-धीरे क्रिया करके दीवारों पर CaCO3 की पतली परत बनाता है | 2. वियोजन अभिक्रिया- वह अभिक्रिया जिसमें एक पदार्थ टूटकर एक से अधिक छोटे-छोटे उत्पाद बनाता है उसे वियोजन अभिक्रिया कहते हैं | उदाहरण- लैड नाइट्रेट को गर्म करने पर लैड ऑक्साइड NO2 तथा O2 बनाता है | NO2 के कारण इसमें भूरे रंग का धुआँ निकलता है | वियोजन अभिक्रिया संयोजन अभिक्रिया की विपरीत होती है क्योंकि वियोजन अभिक्रिया में एक अभिकर्मक टूटकर छोटे-छोटे एक से अधिक उत्पाद बनाता है जबकि संयोजन अभिक्रिया में दो या दो से अधिक पदार्थ मिलकर एक नया पदार्थ बनाते है | 1. वह वियोजन अभिक्रिया जिसमें ऊष्मा के रूप में ऊर्जा प्रदान की जाती है, ऊष्मीय वियोजन कहलाता है | 2. वियोजन अभिक्रिया जिसमें प्रकाश के रूप में ऊर्जा दी जाती है | (सिल्वर क्लोराइड) धूसर रंग 3. वियोजन अभिक्रिया जिसमें विद्युत के रूप में ऊर्जा दी जाती है | (a) 2Na + 2H2O (b) 3BaCl2 + Al2(SO4)3 (c) 2H2S +3O2 एक संतुलित रासायनिक अभिक्रिया से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त होती है 1. अभिकारकों एवं उत्पादों के सूत्र 2.अभिकारकों एवं उत्पादों के प्रतीक, नाम तथा भौतिक अवस्था 3.रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेने वाले अभिकारकों तथा उत्पादों के परमाणुओं तथा अणुओं की सापेक्षिक संख्या 4.अभिकारकों तथा उत्पादों के मोलों तथा द्रव्यमानों का अनुपात 5.गैसीय अभिकारकों तथा उत्पादों के आयतनों का अनुपात कॉपर (II) क्लोराइड B.
कॉपर (I) क्लोराइड C.
कॉपर (III) क्लोराइड D.
कॉपर (IV) क्लोराइड
जब कॉपर
ऑक्साइड और HCl को मिलाया
जाता है तो
विलयन का रंग
नीला-हरा हो
जाता है और
कॉपर
ऑक्साइड घुल
जाता है |
विलयन का
नीला-हरा रंग
अभिक्रिया
में कॉपर (I) क्लोराइड
के बनने के
कारण होता है |
अम्लीय
प्रकृति के B.
क्षारीय
प्रकृति के C.
उदासीन
D.
स्वाद
में कड़वे
अधातुओं
के ऑक्साइड
अम्लीय
प्रकृति के
होते हैं
क्योंकि ये
जल से
अभिक्रिया
करते हैं और अम्ल
बनाते हैं |
जिनका
रंग अम्लीय
या क्षारीय
माध्यम में
परिवर्तित
हो जाता है
सूचक वे
पदार्थ होते
हैं जिनका
रंग अम्लीय
या क्षारीय
माध्यम में
परिवर्तित
हो जाता है | उदाहरण
के लिए
फिनॉल्फथैलिन
अम्लीय
माध्यम में
रंगहीन होता
है जबकि
क्षारीय
माध्यम में
यह गुलाबी हो
जाता है |
उदासीनीकरण
अभिक्रियाएँ
वे
अभिक्रियाएँ
हैं जिनमें
अम्ल और
क्षार
संयुक्त
होकर लवण और
जल का
निर्माण
करते हैं |
क्षारों की pH > 7 होती है और ये स्वाद में कड़वे होते हैं | ये विलयन में OH- आयन मुक्त करते हैं |
कार्बन
डाइऑक्साइड
के निर्माण
के लिए B.
एक
क्षार के
निर्माण के
लिए C.
अम्लों
से
हाइड्रोजन
को
प्रतिस्थापित
कर हाइड्रोजन
गैस के
निष्कासन के
लिए D.
अम्लीय
लवण के
निर्माण के
लिए
अधिकांश
धातुएँ
अम्लों के
साथ अभिक्रिया
कर
हाइड्रोजन
को अम्लों से
प्रतिस्थापित
कर देती है और
धात्विक लवण
तथा हाइड्रोजन
गैस बनाती
हैं |
ऑक्सीजन B. जल C. हाइड्रोजन गैस D. कार्बन डाइऑक्साइड गैस ज़िंक जैसी कुछ धातुएँ प्रबल क्षारों अर्थात NaOH से अभिक्रिया कर हाइड्रोजन गैस मुक्त करती हैं |
कार्बन
डाइऑक्साइड B.
हाइड्रोजन
C.
सल्फर
डाइऑक्साइड D.
कार्बन
मोनोक्साइड
धातु
कार्बोनेट
और
हाइड्रोजन कार्बोनेट
अम्लों के
साथ
अभिक्रिया
करके कार्बन
डाइऑक्साइड,
जल और लवण
देते हैं |
अभिक्रिया
ऊष्माशोषी
है
एक अम्ल
या क्षार में
जल मिलाना एक
अत्यधिक ऊष्माक्षेपी
अभिक्रिया
है, जिसके
कारण मिश्रण के
छींटे उछल
सकते हैं या
गर्म होने के
कारण काँच का
पात्र भी टूट
सकता है |
लवण
जल विलयन या
समुद्री जल
से B.
सोडियम
धातु को जल
में घोलकर C.
बॉक्साइट
से D.
सोडियम,
ऑक्सीजन और
हाइड्रोजन
के सीधे
संयोजन से
लवण जल
या समुद्री
जल प्रमुख
कच्चा माल
हैं क्योंकि
यह बहुत कम
लागत में
आसानी से
उपलब्ध है |
सूचक
जो भिन्न
हाइड्रॉक्सिल
आयन
सांद्रता पर
अपना रंग
परिवर्तित
कर लेता है
सार्वत्रिक
सूचक कुछ
अलग-अलग
सूचकों का
मिश्रण होता
है जो
हाइड्रोजन
आयन की भिन्न
सान्द्रताओं
पर अलग-अलग
रंग दर्शाता
है और विलयन
में उपस्थित
अम्ल और
क्षार के
सामर्थ्य के
बारे में बताता
है |
सजीव
क्षारीय pH की
परिस्थितियों
में जीवित रह
सकते हैं
अम्ल
वर्षा
हानिकारक
होती है
क्योंकि ऐसे
वर्षा जल की pH 5.6 से कम
होती है जो
नदियों के जल
को भी अम्लीय
बना देता है |
सजीव 7.0 से
7.8 की एक छोटी
pH सीमा में
जीवित रह
सकते हैं |
जीवाणुओं
की संख्या बढ़
जाती है
मुँह
में उपस्थित
जीवाणु
शर्करा और
खाने के बाद
मुँह में बचे
हुए खाद्य
कणों के
अपघटन से अम्लों
का निर्माण
करते हैं |
मुँह में
दन्तक्षय
प्रारम्भ हो
जाता है
क्योंकि जब pH का मान 5.5 से
कम हो जाता है
तो अघुलनशील
कैल्शियम
फॉस्फेट
क्षयित हो
जाता है |
हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन की अभिक्रिया द्वारा जल का बनना संयोजन अभिक्रिया है ι वह आभिक्रिया जिसमें एक तत्व दूसरे तत्व को उसके विलयन से विस्थापित कर देता है विस्थापन अभिक्रिया कहलाती है । लोहे पर ज़ंग लगना संक्षारण का एक उदाहरण है। हल्का पीला संतुलित रासायनिक समीकरण को लिखने के लिए द्रव्यमान संरक्षण के नियम का उपयोग किया जाता है |
A. चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ हैंSOLUTION
A. पूर्व की ओरSOLUTION
A. 50 HzSOLUTION
A. दिक् – परिवर्तक वलय के द्वाराSOLUTION
A. उसमें विद्युत प्रवाह का परिमाण कम कर सकते हैंSOLUTION
SOLUTION
A. ऊपर की तरफ SOLUTION
A. 220 V, 100 Hzपर SOLUTION
Right Answer is: C
SOLUTION
A. जब चुंबकित चुंबकीय पदार्थ को कुंडली के अन्दर रखा जाता हैSOLUTION
A. चालक स्थिर रहता हैSOLUTION
A. लकड़ी की क्रोड़ कीSOLUTION
A. जब इसे मुक्त रूप से निलंबित किया जाता है, ये उत्तर – दक्षिण दिशा में संरेखित हो जाती हैSOLUTION
A. चुंबकीय क्षेत्र के भीतरSOLUTION
A. ऊष्मा उत्पन्न करने काSOLUTION
A. क्षेत्र की तीव्रता को दुर्बल करती हैंSOLUTION
A. गतिशील चुंबक परSOLUTION
A. स्थिर रहती हैSOLUTION
SOLUTION
1. कुण्डली में फेरों की संख्या में वृद्धि करने से।
2. कुण्डली के माध्यम से प्रवाहित विद्युत धारा में वृद्धि से।SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
किसी सेल से प्राप्त विद्युत धारा का ग्राफ़:-
A.
SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A.
SOLUTION
में
अपचयित होने
वाला पदार्थ
है:
A.
SOLUTION
A. SOLUTION
A.
B.
C.
D.
Right Answer is: ASOLUTION
SOLUTION
Right Answer is: B
SOLUTION

ध्यान दीजिए ज़ंग में जल के अणुओं की संख्या (x) निश्चित नहीं होती है, यह परिवर्तित होती रहती है |
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A. 



SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
में Ca(OH)2 की भौतिक अवस्था है :
A. SOLUTION
का उपयोग क्यों किया जाता है?
A. SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
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SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

Right Answer is:
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
(i) क्षेत्र चुंबक:- यह एक बहुत शक्तिशाली नाल चुंबक होती है जिसके ध्रुवों के मध्य लगभग समरूप एवं शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र विद्यमान होते हैं। इस चुंबकीय क्षेत्र में एक कुण्डली को तीव्र गति से घुमाया जाता है।
(ii) आर्मेचर या कुण्डली:- यह ताम्बे के पृथककृत तारों की एक कुण्डली होती है जिसे आर्मेचर भी कहते हैं। इस आर्मेचर को चुंबकीय क्षेत्र में तीव्र गति से घुमाया जाता है।
(iii) सर्पी वलय तथा ब्रुश:- ये ताम्बे के बने दो छल्ले होते हैं जिन्हें सर्पी वलय भी कहते हैं। इनका सम्बन्ध एक ओर तो कुण्डली से आये ताम्बे के तारों से कर दिया जाता है तथा दूसरी ओर ग्रेफाईट के दो ब्रुशों से होता है। इन ब्रुशों का सम्बन्ध बाह्य परिपथ से कर देते हैं जिससे धारा प्रवाहित करनी होती है।SOLUTION
कार्यविधि:- जब कुण्डली को क्षेत्र चुंबक के N-S ध्रुवों के मध्य-दक्षिणावर्त दिशा में घुमाया जाता है, तब कुण्डली ABCD में प्रेरित धारा उत्पन्न होती है। पहले आधे चक्र में कुण्डली में प्रेरित धारा की दिशा ABCD होती है।

इस स्थिति में P का सम्बन्ध ब्रुश X तथा Q का सम्बन्ध ब्रुश Y से होता है, इसलिए बाह्य परिपथ में धारा X से Y की ओर प्रवाहित होती है। दूसरे आधे चक्र में विभक्त सर्पीवलय P का सम्बन्ध ब्रुश Y से तथा Q का सम्बन्ध X से होता है, जिससे कुण्डली में विद्युत धारा की दिशा DCBA होने पर भी बाह्य परिपथ में विद्युत धारा X से Y की ओर प्रभावित होती है।

इस तरह यह प्रक्रिया चलती रहती है, तथा दिष्ट धारा जनित्र के द्वारा बाह्य परिपथ में धारा स्थाई रूप में प्राप्त की जाती है।SOLUTION

SOLUTION
क्रिया विधि:- मान लेते हैं कि प्रारंभ में कुण्डली ABCD का तल चुंबकीय क्षेत्र के लम्बवत है। कुण्डली का सिरा A, सर्पी वलय P से तथा D सर्पी वलय Q से जुड़ा होता है। ब्रुश X वलय P को तथा ब्रुश Y वलय Q को स्पर्श करता है। इस स्थिति में कुण्डली से सम्बन्ध चुम्बकीय फ्लक्स का मान अधिकतम होता है, परन्तु इस अवस्था में प्रेरित विद्युत-वाहक बल शून्य होता है। अब कुण्डली को इस तरह घुमाया जाए कि कुण्डली की भुजा AB ऊपर की ओर तथा भुजा CD नीचे की ओर हो तब कुण्डली से सम्बन्ध चुंबकीय फ्लक्स का मान घटता है, तथा कुण्डली में प्रेरित धारा की दिशा ABCD होती है।

इससे बाह्य परिपथ में धारा की दिशा ब्रुश Y से X की ओर होती है।
जब कुण्डली 90 डिग्री घूमती है, तब (अर्थात जब कुण्डली का तल चुंबकीय क्षेत्र के समंतार होता है तो) कुण्डली से सम्बन्ध चुंबकीय फ्लक्स का मान शून्य हो जाता है, तथा प्रेरित विद्युत-वाहक बल का मान अधिकतम होता है। कुण्डली के पुन: 90 डिग्री घूमने पर कुण्डली की भुजा AB, CD के स्थान पर तथा CD , AB के स्थान पर आ जाती है। सर्पी वलय P व Q भी अपने स्थान पर घूमजाते है। अतः ब्रुश X का सम्बन्ध सर्पी वलय P से तथा ब्रुश Y का सम्बन्ध सर्पी वलय Q से ही बना रहता है। इस स्थिति में पुन: कुण्डली से सम्बन्ध चुंबकीय फ्लक्स अधिकतम होता है, तथा प्रेरित विधुत-वाहक बल शुन्य होता है।अब कुण्डली को और घुमाने पर कुण्डली की भुजा AB नीचे की ओर तथा भुजा CD ऊपर की ओर आ जाती है, जिससे कुण्डली से सम्बन्ध चुंबकीय फ्लक्स बदलता है, तथा प्रेरित धारा DCBA दिशा में बहती है।

इससे बाह्य परिपथ में धारा की दिशा ब्रुश X से ब्रुश Y की ओर होती है।
अब कुण्डली के 90 डिग्री घूमने पर कुण्डली का तल चुंबकीय क्षेत्र के समान्तर हो जाता है, जिससे कुण्डली से सम्बन्ध चुंबकीय फ्लक्स का मान घटता है, तथा शून्य हो जाता है और विधुत-वाहक बल अधिकतम हो जाता है। अब यदि कुण्डली 90 डिग्री और घुमती है, तब कुण्डली का तल चुंबकीय क्षेत्र के लम्बवत हो जाता है, जिससे कुण्डली से सम्बन्ध चुंबकीय फ्लक्स अधिकतम हो जाता है, तथा कुण्डली में प्रेरित विधुत-वाहक बल शून्य हो जाता है। कुण्डली के एक चक्कर घूमने में बाह्य परिपथ में प्रेरित धारा की दिशा आधे चक्कर में एक दिशा में होती है तथा शेष आधे चक्कर में विपरीत दिशा में होती है। तथा हमें प्रत्यावर्ती धारा प्राप्त होती है। Right Answer is: D
SOLUTION
A.
SOLUTION
A. SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION


SOLUTION

सोडियम हाइड्रॉक्साइड + हाइड्रोजन
(b) बेरियम क्लोराइड + एलुमिनियम सल्फेट
बेरियम सल्फेट + एलुमिनियम क्लोराइड
(c) हाइड्रोजन सल्फाइड + ऑक्सीजन
जल + सल्फर डाइऑक्साइड
SOLUTION
2NaOH + H2
3 BaSO4 + 2AlCl3
2H2O +2SO2
(b) सिल्वर क्लोराइड को सूर्य के प्रकाश मे रखा जाता है ।
(c) फेरस सल्फेट को गर्म किया जाता है ।
(d) सिल्वर नाइट्रेट हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से अभिक्रिया करता है ।
(e) वायु की उपस्थिति में मेथेन का दहन किया जाता है।
SOLUTION

SOLUTION

SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: DSOLUTION
Right Answer is: B
SOLUTION
A.
SOLUTION
A. SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
A.
SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
