दो अलग अलग प्रकार के लोग हैं-
(1) लोग जिनकी गतिविधियां प्राथमिक और द्वितीय क्षेत्र के विकास में मदद करती हैं। ये लोग वस्तु का उत्पादन नहीं करते हैं परंतु उत्पादन प्रक्रिया में बहुतसहायता करते हैं। उदाहरण के लिए,ट्रांसपोर्टर जो थोक एवं खुदरा दुकानों के लिए प्राथमिक और प्रसंस्कृत वस्तुओं का परिवहन करते हैं।
(2) लोग जो आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराते हैं लेकिन वे प्रत्यक्ष तौर पर उत्पादन प्रक्रिया में मदद नहीं कर सकते हैं उदाहरण के लिए अध्यापक, डॉक्टर, वकील आदि।
प्राथमिक क्षेत्रक से अभिप्राय है प्राकृतिक संसाधनों के उत्पादन पर आधारित आर्थिक गतिविधियां|
उदाहरण- कृषक द्वारा अनाजउत्पादन करना, खन्ना और उत्खनन।
क्षेत्रकों को निम्न के आधार पर वर्गीकृत किया गया है :
· आर्थिक गतिविधि की प्रकृति के आधार पर
· रोजगार की परीस्थितियों के आधार पर
· उद्यमों के स्वामित्व के आधार पर
आर्थिक गतिविधि की प्रकृति के आधार पर तीन क्षेत्रक है :
· प्राथमिक क्षेत्रक
· द्वितीयक क्षेत्रक
· तृतीयक क्षेत्रक
रोजगार की परीस्थितियों के आधार पर दो क्षेत्रक है:
· संगठित क्षेत्रक
· असंगठित क्षेत्रक
उद्यमों के स्वामित्व के आधार पर दो क्षेत्रक है:
· निजी उद्यम
· सार्वजनिक उद्यम
सभी तीनों क्षेत्र एक दूसरे पर निर्भर हैं।
यदि किसान एक विशिष्ट चीनी कारखानें को गन्ने बेचने से मना कर दें, तो परिणाम स्वरूप
कारखाना बंद हो जायेगा। इससे पता चलता है कि द्वितीयक क्षेत्रक प्राथमिक क्षेत्रक पर निर्भर है।
यदि भारतीय कंपनियां घरेलू बाजार से कपास नहीं खरीदने और बल्कि इसे अन्य देशों से आयात करने का निर्णय करें, तो परिणाम स्वरूप भारतीय कपास की खेती पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और किसान दिवालिया भी हो सकते हैं। इससे पता चलता है कि प्राथमिक क्षेत्रक द्वितीयक क्षेत्रक पर निर्भर है।
यदि परिवहन चालक हड़ताल पर चले जाएँ, तो परिणाम स्वरूप कृषि आधारित उद्योगों या संबंधित उद्योगों के लिए प्राथमिक उत्पादों की पूर्ति कम हो जायेगी । किसान अपने उत्पादों को बेचने में असमर्थ हो जायेगे।
इससे पता चलता है कि प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक तृतीयक क्षेत्रक पर निर्भर है।
सामान्यता, यह देखा गया है कि विकसित देशों में विकास के प्रारंभिक चरण में, प्राथमिक क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि थी। लेकिन बाद में-
(1) लोगों ने अन्य गतिविधियां भी शुरू कर दी जैसे अविष्कार और नवोन्मेष जिससे खेती के तरीके बदले और खाद्य फसलों के उत्पादन में वृद्धि हुई।
(2) शिल्पकारों और व्यापारियों की संख्या में वृद्धि हुई जिससे क्रय विक्रय की गतिविधियां बढ़ीं और बैंकिंग और बीमा जैसी सेवाएँ शुरू हुई। लोग कारखानों में बनी वस्तुओं का अधिक उपयोग करने लगे।
(3) धीरे-धीरे प्रसंस्करण और विनिर्माण इकाइयों की संख्या बढ़ी। कारखानें लगने शुरू हुए। इसके परिणामस्वरूप द्वितीयक क्षेत्रक उत्पादन और रोजगार के मामलें में बहुत महत्वपूर्ण बन गया।
कृषि क्षेत्र की मुख्य समस्याएँ इस प्रकार हैं-
असिंचित भूमि और वर्षा पर अत्यधिक निर्भरता के कारण भारत में किसान साल मी केवल एक या दो बार ही फसल उगा पाते हैं और खेती की उत्पादकता कम रहती है|
खेती के लिए किसानों को बैंक और साहुकार या तो ऋण देते ही नहीं और अगर देते भी हैं तो ब्याज दर बहुत अधिक रखते हैं जिसके कारण किसानों पर कर्ज भर बहुत अधिक रहता है| इस कर्ज को चुकाने के लिए, किसान फसल की कटाई होते ही स्थानीय व्यापारियों को आनाज बेचने पर मजबूर हो जाते हैं, जिसके कारण उन्हें फसल का कम मूल्य प्राप्त होता है|
गाँव में मंदी काल में रोजगार का अभाव होता है, इसके कारण बेरोजगार लोगों को काम की तलाश में शहरों में प्रवासन करना पड़ता है| शहरों में जीवन यापन की लागत अधिक होने कारण प्रायः केवल पुरुष ही गाँव से शहर में आते हैं जिससे कई परिवार अलग हो जाते हैं और कई परिवारों को मलिन बस्तियों में रहना पड़ता है| इससे प्रवासित परिवारों के बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा दोने पर ही प्रभाव पड़ता है|
इस अधिनियम का उद्देश्य काम के अधिकार को लागू करना है। इस अधिनियम के अंतर्गत वे सभी लोग, जो काम करने में सक्षम हैं और जिन्हें काम की जरूरत है, को सरकार द्वारा वर्ष में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी गयी है। इसके अनुसार यदि सरकार रोजगार उपलब्ध कराने में असफल रहती है, तो सरकार लोगों को बेरोजगारी भत्ता देगी।
यह गांव में आधारभूत संरचना का निर्माण करने में भी सहायक है| यह लोगों का गाँव से शहरों में व्रवासन रोकने में भी सहायक है।
इस अधिनियम के अंतर्गत उन कामों को अधिमान दिया जाता है जो ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि की उत्पादकता बढ़ने में सहायक हों जैसे कुओं और नहरों का निर्माण|
तृतीयक क्षेत्रक वस्तुओं का उत्पादन नहीं करता है परंतु प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक के विकास में मदद करता है।
इसमें शामिल है कुछ आवश्यक सेवाएं, जैसे कि शिक्षिक, डॉक्टर, वकील आदि की सेवा, जो कि प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं के उत्पादन में मदद नहीं कर सकती है।
तृतीयक क्षेत्रक को सेवा क्षेत्रक भी कहा जाता है क्योंकि इस क्षेत्रक में वस्तुओं के स्थान पर सेवाओं का सृजन होता है|
उदाहरण के लिए, परिवहन, संचार, बैंकिंगसेवाएँ, आदि|
वर्तमान में तृतीयक क्षेत्रक कुल उत्पादन की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण है लेकिन फिर भी इस में कार्यबल का अनुपात कृषि क्षेत्रक से बहुत कम और द्वितीयक क्षेत्रक के लगभग बराबर है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि-
1) आवश्यकता से अधिक लोग प्राथमिक क्षेत्रक में लगे हुये है जिसके कारण इस क्षेत्रक में प्रच्छन्न बेरोजगारी होती है। अगर कुछ लोगों को इस क्षेत्र से हटा दिया जाये फिर भी उत्पादन प्रभावित नहीं होगा।
2) कृषि प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सुधार की अधिक संभावनाएं है जिनका दोहन नहीं हो रहा है।
3) गरीबी के कारण किसान आधुनिक तकनीकों को अपनाने में सक्षम नहीं हैं जिसके कारण उनकी उत्पादकता कम रहती है।
4) किसान कृषि विधियों में अच्छी तरह से शिक्षित और प्रशिक्षित नहीं हैं।
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तुलना के बिंदु |
संगठित क्षेत्र |
असंगठित क्षेत्र |
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1- पंजीकरण |
किसी भी उद्योग/प्रतिष्ठान के लिये आवश्यक है । |
प्रतिष्ठान/दुकान के लिये आवश्यक नहीं है। |
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2-नियम/विनियोग |
निर्धारित नियमों/विनियमों का पालन अनिवार्य होता है। सभी नियम सभी पर यथा नियोक्ता, कर्मचारी व श्रमिक पर समान रूप से लागू होते हैं । |
नियम/विनियम होते अवश्य हैं पर पालन अनिवार्य रूप से नहीं होता । |
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3- कार्य, वेतन व भत्ते आदि |
कार्य करने की अवधि व घंटे निश्चित होते हैं । पूर्व निर्धारित वेतनमान पर कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है । विभिन्न भत्ते व वार्षिक वेतन वृद्धि भी मिलती है । |
वेतन भत्ते पूर्व निर्धारित नहीं होते । मनमाफिक मजदूरी दी जाती है जबकि प्रपत्र पर अधिक मजदूरी दिखाई जाती है । रोजगार नियमित न होने के कारण वार्षिक वेतन वृद्धि नहीं दी जाती । |
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4- रोजगार की सुरक्षा |
कर्मचारियों के लिए नौकरी छोड़ने और नियुक्त होने की औपचारिक प्रक्रियाएं और कार्यप्रणालियां होती है। |
रोजगार की कोई सुरक्षा नहीं होती किसी भी श्रमिक को कभी भी कार्य विमुक्त किया जा सकता है। |
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5- शोषण |
श्रम संगठनों की मौजूदगी व सरकार के नियमों के कारण शोषण नहीं होता। |
श्रम संघ का अस्तित्व ना होने से श्रमिकों का भरपूर शोषण होता है। |
भारतीय अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी दूर करने हेतु सुझाव : 1) शिक्षा को रोजगारन्मुख बनाया जाए। 2) देश में आधारभूत संरचना-परिवहन, संचार, बैंकिग आदि का विकास किया जाना चाहिए।
3) प्राथमिक सेवा क्षेत्रक में रोजगार के नए अवसर सृजित किए जाना चाहिए ताकि अल्प बेरोजगारी दूर की जा सके।
4) ग्रामीण क्षेत्रों में लघु-एवं कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
5) कृषि के लिए सिंचाई सुविधाओं, भण्डारण, वित्त व विपणन सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
6) स्वनियोजित रोजगार की व्यवस्था करके लिए ग्राम और शहर में साक्षर नौजवानों को कम ब्याज दर पर बैंकों द्वारा साख उपलब्ध कराया जाना चाहिए|
प्रच्छन्न बेरोजगारी को दूर करने करने के लिए निम्नलिखित उपाए अपनाए जा सकते हैं-
1) ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अन्य अवसर उपलब्ध कराये जाने चाहिए।
2) नये कारखानें खोले जाने चाहिए जिससे कि अधिकतर श्रमिक वहां लग सकें और कृषि-पर आधारित मीलों की स्थापना की जनि चाहिए।
3) सिंचाई की अधिक सुविधाएं उपलब्ध करायी जानी चाहिए जिससे कि किसान एक वर्ष में 2 या 3 फसलें उगाने में समक्ष हो जिससे की कृषि में ही काम और उत्पादकता बढ़े।
4) सरकार को गाँव में स्कूलों और हस्पतालों का निर्माण करनाचाहिए जिससे अध्यापकों, डाक्टरों और नर्सों की रिक्तियां उत्पन्न हों।
5)कुटीरउद्योगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए|
6) स्वनियोजित रोजगार की व्यवस्था करके लिए ग्राम वासियों को कम ब्याज दर पर बैंकों द्वारा साख उपलब्ध कराया जाना चाहिए|
A.
दोहरे
संयोग का
माध्यम
B. किसी वस्तू के मूल्याङ्कन का माध्यम
C. भविष्य में भुगतान का माध्यम
D. विनिमय का माध्यम
मुद्रा के विकास ने दोहरे संयोग की समस्या को हल किया है |
चेक एक ऐसा कागज हैं,जो बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से चेक पर लिखे नाम के किसी अन्य व्यक्ति को चेक पर लिखी धनराशी का भुगतान करने का आदेश देता हैं |
A.
व्यापार बाधाएं हटाना
B.
व्यापार बाधाएं बढ़ाना
C.
घरेलू उद्योगों का संरक्षण
D.
बंद अर्थव्यवस्था
व्यापार के उदारीकरण के कारण, व्यापारों को आयात और निर्यात करने की स्वतंत्रता दी जाती है।
हर किसी को वैश्वीकरण से लाभ नहीं होता। शिक्षित, कौशल युक्त लोग और धनी लोग अवसरों का सर्वश्रेष्ठ प्रयोग कर पते हैं, हालांकि छोटे उत्पादकों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा से काफी नुकसान होता है।
व्यापार बाधा किसी विदेशी देश से सेवाओं और वस्तुओं के आयात की मात्रा पर लगाया जाने वाला प्रतिबंध या कर है।
अधिक विदेशी निवेश और अधिक विदेशी व्यापार से देशों के बीच उत्पादों और बाज़ारों का एकीकरण हुआ है। बहु-राष्ट्रीय कम्पनी वैश्वीकरण प्रक्रिया में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत में वैश्वीकरण ने बाज़ारों को बदल कर रख दिय है,और उपभोक्ताओं के लिए बहुत अधिक विकल्प उपलब्ध हुए हैं।
भारत सरकार ने विदेशी व्यापार और विदेशी निवेश पर कुछ व्यापार बाधाओं को तय कर रखा है जिससे भारतीय व्यापारियों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सके और विदेशी व्यापार को नियमित किया जा सके।
निवेश वह धन है जिसे परिसंपत्तियों को खरीदने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जैसे भूमि, भवन, मशीन और अन्य निवेश।
A.
तकनीकी
सुधार
B. उदारीकरण
C. व्यापार बाधाएं
D. विश्व व्यापार संगठन से दबाव
वैश्वीकरण कई कारकों से सुगम हुआ जैसे तकनीक में सुधार, व्यापार का उदारीकरण और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों जैसे विश्वव्यापार संगठन से दबाव।
निवेश वह प्रक्रिया है जिसमे परिसंपत्ति या वस्तुओं को भविष्य में आय या धन अर्जित करने की उम्मीद से खरीदा जाता है| इसके अंतर्गत प्राय: भूमि, इमारत, मशीनों और अन्य परिसंपत्तियों को खरीदा जाता है|
वैश्वीकरण किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का दूसरे देशों के साथ व्यापार, पूंजीगत प्रवाह और तकनीक के माध्यम से एकीकरण होने की प्रक्रिया है।
उपहार अर्थव्यवस्था के अंतर्गत सेवाएं और वस्तुएं बिना किसी आर्थिक अनुबंध के प्रदान की जाती हैं।
विदेशी निवेश वह प्रक्रिया है जिसमे एक देश की कंपनी या व्यक्ति दूसरे देश की परिसंपत्तियों या उस देश में स्थित कंपनियों के शेयरों में निवेश करते है।
एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी वह कम्पनी है जो एक या एक से अधिक देशों में या तो उत्पादन करती है या उत्पादन पर नियंत्रण करती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां उन क्षेत्रों में अपने कार्यालय स्थापित करती हैं जहाँ उन्हें सस्ता श्रम और अन्य संसाधन प्राप्त हो सकें।
अगर कर आयात या निर्यात पर लगाया जाए तो यह एक व्यापार बाधा ही होगा।
डब्ल्यू.टी.ओ का पूरा नाम विश्व व्यापार संगठन है।
किसी देश की अर्थव्यवस्था में विदेशी व्यापार पर सरकार द्वारा लगाए गए प्रशुल्क और भौतिक बाधाओं को हटाए जाने की प्रक्रिया को उदारीकरण कहा जाता है।
सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र को स्वामित्व और नियंत्रण के हस्तांतरण की प्रक्रिया को निजीकरण कहा जाता है।
व्यापार बाधाएं वस्तुओं और सेवाओं के आयात या निर्यात पर किए जाने वाले प्रतिरोध हैं जिन्हें सरकार व्यापार को निगमित करने के लिए स्थापित करती है। उदाहरण के लिए, आयात पर कर, आयात कोटा, आदि।
न्यायसंगत वैश्वीकरण वह वैश्वीकरण है जिसमें गरीब वर्ग सहित सभी के लिए समान अवसर हों और यह सुनिश्चित करा जाए कि वैश्वीकरण के लाभ सभी के साथ साझे किए जाएं।
एक मिश्रित अर्थव्यवस्था निजी संपत्ति की रक्षा करना और पूंजी के उपयोग में आर्थिक स्वतंत्रता देने के साथ सामाजिक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए सरकारों को आर्थिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करने का प्रावधान देती है|
जब दो देश एक दुसरे के साथ व्यापार करने के लिए व्यापार से संबंधित नियमों और शर्तों पर समझौता करते हैं उन दोनों के बीच कीए जाने वाले ऐसे अनुबंध को द्विपक्षीय अनुबंध कहा जाता है।
बहुराष्ट्रीय कम्पनी अपनी उत्पादन लागत को कम करने के लिए और अपने लाभ में वृद्धि करने के लिए कई देशों में उत्पादन विस्तार करती हैं|
विदेशी व्यापार या विदेशी निवेश पर सरकार द्वारा स्थापित प्रतिबंधों को हटाने की प्रक्रिया को उदारीकरण कहा जाता है।
निम्नलिखित कारकों ने वैश्वीकरण में मदद की है:
1. प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार|
2. विदेशी व्यापार और विदेशी निवेश नीति में उदारीकरण|
3. बहुराष्ट्रीय निगमों की निवेश नीतियां|
4. विश्व व्यापार संगठन जैसी अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से दबाव|
व्यापार बाधाएं वस्तुओं और सेवाओं के आयात या निर्यात पर किए जाने वाले प्रतिरोध हैं जिन्हें सरकार व्यापार को निगमित करने के लिए स्थापित करती है।
इसके प्रकार हैं:
1. प्रशुल्क बाधाएं: यह एक प्रकार का कर है जो आयात या निर्यात पर लगाया जाता है। उदाहरण के लिए, कस्टम ड्यूटी, यथामूल्य कर, आदि| और
2. गैर प्रशुल्क बाधाएं: यह वे व्यापार बाधाएं हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से देश के आयात और देश के निर्यात को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, आयात लाइसेंस, निर्यात लाइसेंस, आयात कोटा, आदि
भारत में वैश्वीकरण के तीन सकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:
1. उपभोक्ताओं के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतों पर गुणवत्ता परक उत्पादों और सेवाओं की उपलब्धता में वृद्धि हुई।
2. नई प्रौद्योगिकियों में निवेश की वजह से उत्पादकता में वृद्धि हुई।
3. उपभोग की बदलती पद्धति ने जीवन यापन के उच्च मानकों को जन्म दिया।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादन स्थान का निर्धारण करने वाले चार कारण इस प्रकार हैं:
1. उत्पादन स्थल की बाजार से निकटता
2. कम कीमत पर कुशल और अकुशल श्रमबल की उपलब्धता
3. उत्पादन के अन्य कारकों की उपलब्धता
4. अनुकूल सरकारी नीतियाँ
सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आई.सी.टी) ने हमारी सेवाओं के उत्पादन को कई दूसरे देशों में फैलाने में और इस प्रकार वैश्वीकरण को सुगम बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इसे नीचे दिए गए उदाहरण में समझा जा सकता है:
लन्दन की एक समाचार पत्रिका दिल्ली में पत्रिका को डिजाइन और प्रिंट करवाना चाहती है|इसके लिए वह पत्रिका के टेक्स्ट और डिजाइन निर्देशों को इंटरनेट के माध्यम से दिल्ली के प्रकाशन कार्यालय में भेज सकती है|
भारत के कुशल श्रमिक कंप्यूटर में डिजाइनिंग कर सकते हैं|फिर पत्रिका को छाप कर उसे हवाई जहाज से लंदन भेजा जा सकता है|ई-बैंकिंग के माध्यम से डिजाइन और मुद्रण के काम का भुगतान तुरन्त ही भारतीय श्रमिकों को किया जा सकता है|
नई अर्थव्यवस्था नीति 1991 के उद्देश्य, इस प्रकार है:
1. देश के भीतर माल की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए |
2. कुछ शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा व्यापार बाधा को हटाने के दबाव को रोकने के लिए|
3. विदेशी उत्पादकों के साथ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने के लिए|
4. घरेलू उत्पादकों के कामकाज में सुधार करने के लिए|
न्यायसंगत वैश्वीकरण से सभी के लिए अवसर पैदा होता है, और यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि वैश्वीकरण के लाभों को बेहतर ढंग से साझा किया जाए।
न्यायसंगत वैश्वीकरण के संबंध में सरकार की भूमिका इस प्रकार है:
1. सरकार यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि उत्पादक श्रम कानूनों को ठीक से लागू कर रहे हैं और श्रमिकों को उनके अधिकार प्राप्त हो रहे हैं|
2. छोटे उत्पादकों के प्रदर्शन में सुधार करने के लिए सरकार को उनका समर्थन करना चाहिए।
3. सरकार व्यापार और निवेश बाधाओं का उपयोग करके स्तानीय उद्यमों को अनुचित विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचा सकती है ।
4. सरकार निष्पक्ष नियमों के लिए विश्व व्यापार संगठन के साथ समझौता वार्ता भी कर सकती है|
वे कारक जिनकी वजह से 1991 में आर्थिक सुधार शुरू किए गए थे इस प्रकार हैं:
• भारत के भुगतान संतुलन का घाटा लगातार बढ़ रहा था|
• खाड़ी देशों से आयात होने वाले पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि हो रही थी|
• देश में विदेशी मुद्रा का आरक्षित घटता जा रहा था जिसकी वजह से भारत दूसरे देशों से लिए गए ऋण का भुगतान कर पाने में असमर्थ था|
• सार्वजनिक क्षेत्रों में अप्रभावी प्रबंधन और भ्रष्टाचार प्रचलित था| इसकी वजह से संसाधनों का अपव्यय होता था|
• निवेश की कमी के कारण औद्योगीकरण नहीं हो पा रहा था जिसकी वजह से आर्थिक विकास धीमी गति से हो रहा था|
• असंतोषजनक औद्योगीकरण की वजह से बेरोजगारी और गरीबी की समस्या गंभीर बनती जा रही थी|
भारत सरकार द्वारा उदारीकरण के पक्ष में उठाए गए बड़े क़दमों का विवरण इस प्रकार है:
1. औद्योगिक लाइसेंसिंग का उन्मूलन: अर्थव्यवस्था का निजी क्षेत्र एक कठोर लाइसेंस प्रणाली के अंतर्गत कार्य कर रहा था। नई आर्थिक नीति के अंतर्गत निजी क्षेत्र को लाइसेंस के बोझ से काफी हद तक मुक्त किया गया है।
2. एकाधिकार से रियायतें: अब म.आर.टी.पी अधिनियम के अंतर्गत आने वाली कंपनियों को बड़ी रियायतें प्रदान की जा रही हैं। इन कंपनियों को अब निवेश निर्णय लेते समय सरकार की अनुमति लेना आवश्यक नहीं हैं।
3. विस्तार के लिए स्वतंत्रता: उद्योग का विस्तार करने और उत्पादन करने के लिए स्वतंत्र दी गई है। उन्हें किसी भी पूर्व अधिकारी की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। अब उत्पादक उत्पादकों की मांग के आधार पर कुछ भी निर्माण करने के लिए स्वतंत्र हैं।
4. पूंजीगत सामान आयात करने की स्वतंत्रता: भारतीय उद्योगों का विस्तार करने और खुद को आधुनिक बनाने के लिए व्यवसाय विदेशों से मशीनों और कच्चे माल खरीदने के लिए स्वतंत्र हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था में तीव्र औद्योगिकीकरण निम्न कारणों से आवश्यकता है:
1. औद्योगीकरण में उत्पादकता दर कृषि से अधिक होती है| इस वजह से औद्योगीकरण से आय के उत्पादन में तेजी आती है|
2. अधिक से अधिक उद्योगों की स्थापना करके हम तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण उत्पन्न श्रमबल के लिए रोजगार के अवसरों में वृद्धि कर सकते हैं| इससे बेरोज़गारी की समस्या से बचा जा सकता है|
3. उद्योग एक देश में उपलब्ध सभी प्रकार के संसाधनों का उपयोग करने में सक्षम हैं। वे बेकार और अपशिष्ट सामग्री का भी उपयोग कर सकते हैं।
उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीति को अपनाने के कारण भारत में निम्न परिवर्तन हुए हैं:
• संचार के क्षेत्र में बेहतर सेवाएं जैसे टेलीफोन, रंगीन टीवी, इलेक्ट्रॉनिक सामान आदि|
• उपभोक्ताओं के लिए विदेशी एवं घरेलू वस्तुओं के बीच चयन करने का अवसर उत्त्पन्न हुए हैं।
• वस्तुओं के व्यापार में भारत का हिस्सा बढ़ गया है| घरेलू उत्पादकों को विदेशी बाज़ारों में भी क्रय-विक्रय करने का अवसर मिलता है|
• फर्मों को उत्पादन के स्थान की एवं श्रमिकों को काम करने के स्थान का चयन करने की स्वतंत्रता प्राप्त हुई है|
• विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि हुई है|
• रोजगार और जीवन स्तर में वृद्धि हुई है।
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विदेशी व्यापार |
विदेशी निवेश |
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1. एक अनुबंध के अंतर्गत वस्तुओं और सेवाओं को बेचना और खरीदना। |
1. किसी विदेशी भूमि पर शेयर और संपत्तियों पर निवेश करना। |
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2. एक देश से दूसरे देश में वस्तुओं और सेवाओं का प्रवाह। |
2. एक देश से दूसरे देश में पूंजी के स्वामित्व का प्रवाह। |
|
3. विभिन्न देशों में बाज़ारों के एकीकरण का प्रचार| |
3. औद्योगीकरण की प्रक्रिया का प्रचार| |
वैश्वीकरण ने भारत और अन्य देशों के बीच पारस्परिक निर्भरता में निम्न रूप से वृद्धि की है:
• अन्य देशों के निर्माता भारत में अपने उत्पादों को बेच सकते हैं। भारतीय उद्योगपति भी अन्य देशों में अपने उत्पादों को बेच सकते हैं।
• विदेशी उद्योगपति भारत में उद्योगों की स्थापना कर सकते हैं और अपने उत्पाद का निर्यात अन्य देशों में कर सकते हैं। वे अपने उत्पादों को भारत में भी बेच सकते हैं। इसी तरह भारतीय कंपनियां भी अन्य देशों में ऐसा कर सकती हैं।
• वैश्वीकरण में एक देश से दूसरे देश से मजदूरों का आवागमन भी सम्मिलित हैं। अन्य देशों से कार्यकर्ता भारत की ओर पलायन कर सकते हैं और भारतीय कामगार रोजगार के अवसरों के लिए अन्य देशों में जा सकते हैं।
• वैश्वीकरण विभिन्न देशों के बीच पूंजी, प्रौद्योगिकी और अनुभव के विनिमय की अनुमति देता है। प्रौद्योगिकी की कमी होने पर, वैश्वीकरण की वजह से इसे अन्य देशों से प्राप्त किया जा सकता है।
इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वैश्वीकरण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्भरता को बढ़ावा देता है।
वर्तमान में विश्व व्यापार में सर्वाधिक हिस्सेदारी अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे विकसित देशों की है| इसलिए ये देश विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से भारत सहित अन्य विकासशील देशों को अनुचित नियमों द्वारा विदेश व्यापार और निवेश में प्रतिबंध करते हैं| विकासशील देशों को विश्व व्यापार संगठन के सदस्य होने के लाभ बहुत सीमित हैं क्योंकि विश्व व्यापार संगठन के नियम पक्षपाती हैं। व्यापार से संबंधित विवादों के मामले में विश्व व्यापार संगठन अधिकतर विकसित देशों के पक्ष में निर्णय लेता हैं। यह विकासशील देशों के हित को अनदेखा कर देता है। यह विकसित देशों के हित के लिए विकासशील या अविकसित देशों को अपनी अर्थव्यवस्था खोलने पर जोर देता है।
विश्व व्यापार संगठन व्यापार के अलावा भी कई क्षेत्रों में दखल दे रहा है जैसे कृषि पर विश्व व्यापार संगठन के अनुबंध ने भारत में आर्थिक-सहायता प्राप्त खाद्यान्नों के प्रावधान को सीमित कर दिया है। इस तरह के प्रतिबंध से मूल्यों में वृद्धि हो सकती है। इससे देश के गरीब लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं।
यह भी आशंका जताई गई है कि जैसे ही भारत पूरी तरह से विश्व व्यापार संगठन के नियमों का पालन करेगा वैसे ही आवश्यक और जीवन रक्षक दवाइयों के मूल्य एकदम से बढ़ सकते हैं, और इससे उपभोक्ता और मरीज बहुत हद तक प्रभावित होंगे।
सन 1991 से पहले भारत ने आर्थिक विकास के लिए संरक्षित और सरकार द्वारा नियंत्रित नीतियों का पालन किया। वे उद्योग जो अर्थव्यवस्था के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हैं जैसे कोयला, लोहा, बिजली आदि उनका रखरखाव और संचालन सरकार द्वारा नियंत्रित किए जाते थे। औद्योगिक निति में सार्वजनिक क्षेत्र को 17 उद्योग सौंपे गए थे और निजी क्षेत्र को केवल 12 उद्योग सौंपे गए थे| निजी उद्योगों पर लाइसेंस और अधिनियमों के द्वारा कई प्रतिबंध लगाए जाते थे| आयात प्रतिस्थापन पर ज़ोर दिया जाता था तथा विदेशी निवेश पर प्रतिबंध लगाया हुआ था|
लेकिन इससे विभिन्न क्षेत्रों में विकासात्मक गतिविधियों को शुरू करने के लिए सरकार के पास संसाधन उपलब्ध हुए। घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण भी दिया गया|
सार्वजनिक क्षेत्र में सरकार ने अपने राजस्व का एक काफी हिस्सा निवेश किया और कई सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को शुरू किया। इसका उद्देश्य था गरीबी को खत्म करना, असमानता को कम करना और सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक विकास दर हासिल करना। इस प्रकार, स्वतंत्रता के बाद भारत की विकास रणनीति में सकारात्मक और नकारात्मक पहलू दोनों थे।
A.
सुरक्षा
B. विकल्प
C. सूचना
D. शिकायत निस्तारण
सुरक्षा, सूचना और शिकायत, प्रतिनिधित्व और उपभोक्ता शिक्षा के अधिकार सहित चयन का अधिकार भारतीय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 का हिस्सा है।
A.
नई
दिल्ली
B. मुंबई
C. चेन्नई
D. कोलकता
उपभोक्ता विवादों का त्वरित हल निकालने के लिए अर्ध न्यायिक इकाई की स्थापना जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर की गयी है।
COPRA से अभिप्राय है उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम।
राज्य स्तर पर उपभोक्ता न्यायालयों को राज्य उपभोक्ता विवाद निस्तारण आयोग कहते हैं |
भारत में 24 दिसम्बर राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता हैं |
एगमार्क भारत में कृषि उत्पादों के लिए प्रमाणन चिन्ह है। यह कृषि वस्तुओं के लिए गुणवत्ता मानकों की गारंटी देता है।
हालमार्क भारतीय मानक ब्यूरो के द्वारा प्रदान किया गया एक चिह्न है जो भारत में सोने के आभूषणों की शुद्धता को सत्यापित करता है।
हम बाज़ार में उत्पादक और उपभोक्ता दोनों के रूप में भाग लेते हैं |
एक शिक्षित और जागरूक उपभोक्ता एक अच्छा नागरिक होता है। वह अपनी भागीदारी से बाजार की गतिविधियों में एक संतुलन बनाए रखता हैं। उपभोक्ता आंदोलन तभी प्रभावी हो सकते हैं जब उपभोक्ता एकजुट होकर एक दिशा में कार्य करें है। यह एक स्वैच्छिक प्रयास हैं और इस संघर्ष सभी की भागीदारी आवश्यक है।
वे उपभोक्ता जिनके पास उपभोक्ता अधिकारों और कल्याण के बारे में अच्छी जानकारी हासिल होती है, उन्हें अच्छी तरह से सूचित उपभोक्ता कहते हैं।
उपभोक्ता जागरूकता का से अभिप्राय है कि एक व्यक्ति को उपभोक्ता के रूप में अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना, उन उपलब्ध उत्पादों और सेवाओं के बारे जानना चाहिए जिनका प्रचार किया जा रहा है या ख़रीदा और बेचा जा रहा है।
जब किसी खाद्य या प्राकृतिक उत्पादन में ऐसी कोई बाहरी वस्तु को मिलाया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है तो इसे मिलावट कहते हैं। यह उपभोक्ताओं के शोषण का एक तरीका है।
ISO एक अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण का संस्थान है ।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता आयोग उपभोक्ता इंटरनेश्नल कहते हैं |
सही शिकायतों के लिए उपभोक्ताओं को शिकायत करनी चाहिए।
उपभोक्ता अपने अधिकारों के संरक्षण के लिए संघ और औपचारिक संगठन या समूहों का गठन कर सकते हैं। वे कानूनी विशेषज्ञों की मदद ले सकते हैं। विशेषज्ञों या वकीलों का शुल्क और फीस का खर्च संघ या संगठन द्वारा उठाया जा सकता है। प्रभावित व्यक्ति बकाए धन या उचित पर्याप्त राशि का भुगतान उपभोक्ता संघ या अपने क्षेत्र के संगठन के कार्यालय में कर सकता हैं।
दुकानदार दोषपूर्ण वजन मशीनों का उपयोग करके उपभोक्ताओं का शोषण करते हैं | वे ग्राहकों को उचित वजन से कम वस्तू देते हैं |
उदाहरण के लिए पेट्रोल पंपों पर की जाने वाली पेट्रोल की चोरी : पेट्रोल पंप विक्रेता पेट्रोल भरवाते समय अपने ग्राहकों को मीटर रीडिंग पर शून्य पढने का समय नहीं देते | वे अक्सर पेट्रोल मापन यंत्र के द्वारा छेड़छाड़ करके उपभोक्ताओं को गुमराह करने का प्रयास करते हैं |
उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार कोपरा के अंतर्गत एक अधिकार है। इसमें उपभोक्ता को अधिकार दिया गया हैं कि वे अपने अधिकारों और सम्बंधित निवारणों के बारें में शिक्षा प्राप्त करें । निवारण की प्रक्रियाओं और अनुचित व्यवहार की पहचान के संबंध में जागरूकता हासिल करने का अधिकार दिया गया । शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम उपभोक्ताओं को जागरूक करने का प्रयास किया गया हैं ।
साक्षरत का स्तर उत्पादों और बाज़ारों के बारे में जागरूकता के स्तर को सीधे प्रभावित करता है। निरक्षरता वह सबसे बड़ा कारण है जिससे उपभोक्ताओं का शोषण होता है। अधिकांशतः उपभोक्ता (खासतौर पर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में) अपने अधिकारों के बारे में अशिक्षित तथा अनभिज्ञ होने के कारण विक्रेताओं के द्वारा आसानी से शोषण का शिकार हो जाते हैं |
भारत में उपभोक्ता आन्दोलन को निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ा:
· उपभोक्ता शोषण के मामलों में साक्ष्य जैसे कैश मेमो इकट्ठा करना मुश्किल होता है।
· मुआवजे के मुद्दे पर मौजूदा कानून स्पष्ट नहीं हैं।
· उपभोक्ता अधिकारों के बारे में जागरूकता फ़ैलाने की प्रक्रिया बहुत धीमी है।
सूचना का अधिकार अधिनियम को अक्टूबर 2005 में अधिनियमित किया गया था। यह भारत के नागरिकों को सरकारी विभागों के कार्यों के बारे में जानकारी हासिल करने का अधिकार देता है। इसमें कई तरह की सूचनाओं तक पहुँच सम्मिलित होती है जैसे सार्वजनिक नीति और प्रक्रियाएं, विभागीय रिकॉर्ड, सेवाओं का वितरण, व्यापार जानकारी, सूचना का अधिकार आदि। सूचना का अधिकार अधिनियम, COPRA का एक अभिन्न अंग है।
सुरक्षा के अधिकार को उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम 1986 के अंतर्गत सम्मिलित किया गया। यह उपभोक्ताओं को खतरनाक वस्तुओं के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है। उत्पादक और विक्रेताओं को घरेलू वस्तुओं और उपकरणों के मामले में सुरक्षा का आश्वासन प्रदान करना चाहिए। उदाहरण के लिए खाद्य उत्पादों में कृत्रिम रंगों का मामला जो यकृत को नुकसान पहुंचाता है या इलाज के मामले में जीवन पर भी एक खतरा बन जाता है।
नौकाएं तट की अपेक्षा आमतौर पर 20 मीटर से अधिक गहरे पानी में अधिक सुरक्षित होती हैं। नाव को गहरे समुद्र में ले जायें।
हिन्द महासागर में आये इस समुद्री सुनामी भूकम्प के झटकों ने तो कुछ छोटे-छोटे द्वीपों को भी अपनी जगह से कई- कई मीटर दूर खिसका दिया। कुछ द्वीप ऊपर उठ गये, तो कुछ एक-दूसरे से तटीय आधार पर कटकर समुद्र में समा गये।
वर्ष 1883 में, इंडोनेशिया में क्रकटू के नाम से विख्यात ज्वालामुखी में भयानक विस्फोट हुआ और इसके कारण 40 मीटर ऊँची, सूनामी लहरें उत्पन्न हुईं जो जावा और सुमात्रा में कहर ढा गई। इन सूनामी लहरों से 36,000 लोगों की मृत्यु हुई। शक्तिशाली सुनामी लहरें सागरों को पार कर सकती हैं। समुद्र तल के पास या उसके नीचे भूकम्प आने पर समुद्र में हलचल पैदा होती है और यह हलचल लगभग प्रायः सूनामी का रूप धारण कर लेती है।

नागरिक प्रतिरक्षा सलाह के लिए लगातार रेडियो को सुने| यदि चोट लगी हो तो अपनी जांच करें और जरूरी हो तो प्राथमिक चिकित्सा प्राप्त करें। जब घरों या भवनों में पुन: प्रवेश करें, तो अत्यंत सावधानी बरतें क्योकि बाढ़ का पानी भवनों को क्षतिग्रस्त कर चुका हो सकता है। उपयोगी सुविधाओं की टूटी लाईनों की जांच करें और समुचित प्राधिकारियों को इसकी रिपोर्ट करें।
भारत के अण्डमान निकोबार द्वीप समूह, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, पाण्डिचेरी, केरल के अलावा श्रीलंका, इण्डोनेशिया, थाइलैण्ड, मलेशिया, म्यांमार, मालदीव, सोमालिया, सुमात्रा, बैंकाक के अधिकांश भागों को अपनी चपेट में ले लिया।
यह पता करें कि क्या आपका घर, स्कूल, कार्यस्थल, सूनामी संकट की आशंका वाले क्षेत्रा के अंतर्गत आता है। अपने परिवार के साथ सूनामी के बारे में चर्चा करें। पता लगाएं कि समुद्र तल से आपके घर की सड़क की ऊँचाई कितनी है और तट से या उच्च जोखिम वाले जलक्षेत्र से उसकी दूरी कितनी है। सूनामी के खतरे से आशंकित हैं तो वहां से बचाव रास्तों की योजना तैयार करें। बचाव रास्तों से बाहर निकलने का अभ्यास करें। आपदा में काम आने वाले सामान को तैयार रखें।
अपने पालतू पशुओं को साथ ले लें यदि आप सुरक्षित रूप से ऐसा कर सकें। तुरंत जितना हो सके नजदीक की सबसे ऊंची भूमि की ओर जाएं, या तट से दूर आंतरिक क्षेत्र में पहुंचें। यदि संभव हो तो पैदल या साइकिल से जाएं और यदि बहुत जरूरी हो तभी गाड़ी चलाएं। यदि स्थान ख़ाली करके बाहर जाने का नक्शा मौजूद है, तो दिखाए गए मार्गों का अनुसरण करें।
A.
गैर-आणविक के रूप में
B.
कुचालक के रूप में
C.
सुचालक के रूप में
D.
आणविक के रूप में
प्लास्टिक, रबर, कांच, आदि जैसे पदार्थों से विद्युत नहीं गुजर सकती है| इन्हें विद्युत कुचालक के रूप में जाना जाता है।
A.
अग्नि
B.
फ्यान
C.
फैलिन
D.
सिद्र
1999 में आए ओड़िशा चक्रवात के बाद भारत में फैलिन दूसरा सबसे शक्तिशाली उष्णकटिबंधीय चक्रवात था।
A.
रोगाणुरोधक
B.
ओआरएस
C.
जीवाणुनाशक
D.
दर्दनाशक
A.
इंडोनेशिया में बोर्नियो के पूर्वी तट से दूर
B.
इंडोनेशिया में बोर्नियो के पश्चिमी तट से दूर
C.
इंडोनेशिया में सुमात्रा के पूर्वी तट से दूर
D.
इंडोनेशिया में सुमात्रा के पश्चिमी तट से दूर
A.
एपिडर्मिस
B.
डर्मिस
C.
अधस्तवचीय ऊतक
D.
हाइपोडर्मिस
एपिडर्मिस त्वचा की सबसे बाहरी परत होती है। त्वचा की यह परत प्रथम श्रेणी के जलने में क्षतिग्रस्त हो जाती है।
A.
प्रथम श्रेणी जलन के रूप में
B.
द्वितीय श्रेणी जलन के रूप में
C.
तृतीय श्रेणी जलन के रूप में
D.
चतुर्थ श्रेणी जलन के रूप में
A.
कटना
B.
चोट लगना
C.
जलन
D.
छिलना
शुष्क ऊष्मा के सम्पर्क में आने के कारण त्वचा को जो क्षति पहुँचती है, उसे जलन कहते हैं। यह अग्नि, अग्नि की लपटों, भाप, गरम तरल पदार्थ, गरम धातु, धूप, बिजली अथवा रसायनों के कारण हो सकती है।
A.
डॉक्टरों को
B.
सूचना प्रौद्योगिकी पेशेवरों को
C.
शिक्षकों को
D.
पूर्व सैन्य कर्मियों को
A.
26 दिसम्बर,
2004
B. 26 जनवरी, 2001
C. 26 जनवरी, 2004
D. 26 फरवरी, 2001
भारत के 52वें गणतंत्र दिवस पर आये भयानक भूकंप ने भुज में भारी तबाही मचाई थी| इसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.6 और 7.7 के बीच मापी गए थी। इस त्रासदी में लगभग 20,000 लोग मारे गए थे और 1,67,000 लोग घायल हुए थे।
A.
सर्पदंश
B.
कुत्ते का काटना
C.
तुषाराघात
D.
जलना
जले हुए भाग पर ठंडा पानी डालने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यह त्वचा को ठंडा करने और फफोले पड़ने से बचाने का सबसे अच्छा तरीका है।
A.
इलेक्ट्रीशियन के उपकरण बॉक्स
B.
पत्र पात्र
C.
प्राथमिक उपचार किट
D.
माचिस
प्राथमिक उपचार किट में पाए जाने वाली अन्य वस्तुएँ, जैसे चिपकाने वाली टेप, कीटाणु रहित मरहम पट्टी, तिकोणीय बैंडेज, कैंची, दस्ताने, साबुन, पीड़ा नाशक दवा, ऐनटेसिड, ओ.आर.एस. पैकेट, आदि हैं।
A.
बेहोशी
B.
विषाक्तीकरण
C.
तापाघात
D.
तुषाराघात
बेहोशी मस्तिष्क को ऑक्सीजन की अपर्याप्त आपूर्ति के कारण आती है।
हां,
उपभोक्ताओं
के पास
उत्पादकों
के द्वारा किए
जा रहे शोषण
से बचने के
लिए कुछ
दायित्व होते
हैं। उन्हें निम्न
क़दमों को
उठाना चाहिए:
उपभोक्ताओं को मानकीकृत आईएसआई या एगमार्क चिन्हों को देखना चाहिए जो उत्पाद और वारंटी अवधि दोनों की गारंटी देता है।
उपभोक्ताओं को हमेशा ही कैश मेमो और एक वारंटी कार्ड के लिए पूछना व लेना चाहिए।
उपभोक्ताओं के साथ शोषण के संबंध के मामलों के बारे में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए उपभोक्ता जागरूकता संगठनों का गठन करना चाहिए।
विक्रेता बाजार में पूर्ति को कृत्रिम रूप से नियंत्रित करके कमी की स्थिति उत्त्पन्न कर देते हैं जिससे वे भविष्य में कीमतें ऊँची होने पर लाभ कमा सके |
विक्रेता
का यह कदम
जमाखोरी के
रूप में जाना
जाता है।
उदाहरण के
लिए:
प्याज की
ऊँची
कीमते जनता में
रोष उत्पन्न
कर देती हैं ।
प्याज के
विक्रेता
प्याज की
पूर्ति को
नियंत्रित
करते हैं
जिसकी वजह से
प्याज की
कीमतों में
वृद्धि हो
जाती हैं ।
व्यापारियों
द्वारा वस्तुओं
का भंडारण कर
लिया जाता
हैं, जिसके
द्वारा वे उपभोक्ताओं
से अनावश्यक
रूप से ऊंची
कीमतें वसूल
करते है।
और
परिणामस्वरूप
कालाबाजारी
की स्थिति
उत्त्पन्न
हो जाती है।
उपभोक्ताओं में बढ़ते असंतोष के कारण उपभोक्ता आंदोलन की आवश्यकता महसूस हुई | विक्रेता के अनुचित व्यवहार के कारण उपभोक्ता का शोषण होता था | पहले उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए किसी भी प्रकार के नियम व कानून की व्यवस्था नहीं थी | उपभोक्ता आंदोलन का जन्म भारत में सामाजिक बल के रूप में हुआ | यह उपभोक्ताओं को व्यवसाय के अनैतिक और अनुचित व्यवहार से रक्षा करने के कारण हुआ | 1986, में भारत सरकार ने उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम को कानून बनाया जो कोपरा lके नाम से जाना जाता हैं |
कोपरा के अंतर्गत एक त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र की स्थापना की गई हैं जो उपभोक्ता विवादों को जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर निवारण करती हैं ।
उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम 1986 के अंतर्गत उपभोक्ताओं के पास प्रतिनिधित्व का अधिकार होता है। इसका अभिप्राय है कि उपभोक्ता की बात सुनी जाएगी और यह सुनिश्चित किया गया कि उपभोक्ताओं के हितों पर विचार किया जाएगा। यह निम्न को बताता है:
उपभोक्ता विभिन्न स्तरों पर उपभोक्ता न्यायालय में शोषण के खिलाफ मुकदमा कर सकते हैं।
· शिकायत दाखिल करते समय किसी भी किस्म की कानूनी औपचारिकताओं की आवश्यकता नहीं होती है |
· किसी वकील को नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं होती है |
प्रमाणिक चिन्ह, लोगो (logo) और प्रमाणपत्र वस्तुओं और सेवाओं को खरीदते समय सुनिश्चित करते हैं कि उपभोक्ताओं को एक सुनिश्चित गुणवत्ता मिले।
· आईएसआई: बी.आई.एस उत्पाद गुणवत्ता की जांच करके आई.एस.आई मार्क का प्रयोग करने की अनुमति देते हैं जो श्रेष्ठ गुणवत्ता का प्रतीक हैं।
· हालमार्क: सोने के आभूषण की उत्कृष्टता या शुद्धता का आश्वासन देता है और इस बात की गारंटी देता है कि आभूषण का परीक्षण किया गया है।
· एगमार्क: कृषि वस्तुओं के लिए गुणवत्ता मानक गारंटी देता है।
उपभोक्ता शोषण के लिए अग्रणी कारक:
उपभोक्ता का शोषण कई बार विक्रेता या उत्पादक के द्वारा कई कारकों के द्वारा किया जाता है, जो नीचे दिए गए हैं:
· उपभोक्ताओं में कई वस्तुओं को जांचने की जानकारी की कमी होती है। एक उपभोक्ता कई तरह की वस्तुए खरीदता है। एक या दो क्षेत्रों में, वह विशेषज्ञ हो सकता है और वह खुद को शोषण से बचा सकता है, मगर उन क्षेत्रों के बारे में प्रयास नहीं कर पाता जिनमें उसकी जानकारी नहीं है। बाज़ार इस समय लगभग सभी वस्तु के नए ब्रांड से भरा हुआ है और वे इतनी तेज गति से आ रहे हैं कि उपभोक्ताओं के लिए उनकी सच्चाई को आंकना बहुत मुश्किल हो जाता है। हर बार जब भी कुछ अंतर के बाद वह बाज़ार जाता है तो वह चीज़ों की विविधता देखकर चौंक जाता है।
· उपभोक्ता अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में सजग नहीं होते हैं। अधिकतर उपभोक्ता अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं। किसी भी शिकायत के मामले में उन्हें यह नहीं पता होता कि उन्हें किससे संपर्क करना है। उनमें उपभोक्ता शिक्षा की कमी होती है।
· विज्ञापन के कुप्रभाव: अधिकतर उपभोक्ता विभिन्न सामानों के विज्ञापन के द्वारा इस तरह आकर्षित हो जाते हैं कि वे विभिन्न वस्तुओं की गुणवत्ता सत्यापित करने की कोशिश ही नहीं करते हैं। वे द्रुत गति से सामान खरीद लेते हैं और उसके बाद पछताते हैं।
· अशिक्षा तथा अज्ञान: अधिकांशतः उपभोक्ता (खासतौर पर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में) अपने अधिकारों के बारे में अशिक्षित तथा अनभिज्ञ होने के कारण विक्रेताओं के द्वारा आसानी से शोषण का शिकार हो जाते हैं |
· अंधविश्वास: आम तौर दोषपूर्ण वस्तुओं और सेवाओं क्रय लेने पर उपभोक्ता उन्हें अपना बुरा भाग्य समझ कर स्वीकार कर लेते हैं । इस तरह की मान्यता और विश्वाश उपभोक्ताओं को अक्सर असुविधा और वित्तीय नुकसान का कारण बनतें हैं ।
कोपरा उपभोक्ताओं के लिए निम्नलिखित अधिकार सुनिश्चित करता हैं:
· सुरक्षा का अधिकार : उपभोक्ताओं को हानिकारक और खतरनाक माल से संरक्षण प्रदान करता हैं । घरेलू सामान और उपकरणों के मामले में सुरक्षा का आश्वासन देता । खाद्य उत्पादों में प्रयुक्त कृत्रिम रंगों के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है जो शरीर के अंगों को नुकसान पहुचातें हैं । इस अधिकार में चिकित्सा उपचार के दौरान जीवन सुरक्षा भी शामिल किया गया है।
· सुचना पाने का अधिकार : इसमें उपभोक्ता को यह अधिकार दिया गया हैं कि वे वस्तू की गुणवत्ता, मात्रा, शुद्धता, कीमत, मानक के बारे में जानकारी हासिल कर सकें | उत्पादक को भी निर्देश दिया गया हैं वह कि उत्पाद के पैकेट और लेबल पर प्रासंगिक जानकारी प्रदान करें।
· चुनने का अधिकार : इसमें उपभोक्ता को बाजार में उपलब्ध विकल्पों के बीच चयन करने का अधिकार दिया गया हैं । निर्माता को यह दिशानिर्देश दिया गया हैं कि वह उत्पादों के अस्पष्ट और भ्रामक विज्ञापन न दें ।
· उपभोक्ता को सुनवाई का अधिकार : इसमें उपभोक्ता को यह अधिकार दिया गया हैं कि वह अपने असंतोष को रजिस्टर करा सकें । उपभोक्ता को यह अधिकार हैं कि वे किसी उत्पाद या कंपनी के खिलाफ अपनी शिकायत और चिंता को रजिस्टर करा सकते हैं ।
· क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार : इसमें किसी भी प्रकार धोखाधड़ी के खिलाफ निवारण का अधिकार शामिल है। इसमें उपभोक्ता को किसी भी प्रकार की क्षति का सामना करने पर विक्रेता के द्वारा मुआवजा या उत्पाद प्रतिस्थापन प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है।
· उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार : इसमें उपभोक्ता को अधिकार दिया गया हैं कि वे अपने अधिकारों और सम्बंधित निवारणों के बारें में शिक्षा प्राप्त करें ।
· प्रतिनिधित्व का अधिकार : इस अधिनियम में उपभोक्ता को अधिकार दिया गया हैं कि वे कि अपने साथ हुए किसी भी शोषण के खिलाफ़ उपभोक्ता न्यायालयों में अपील कर सकतें हैं | अपील करने के लिए किसी भी प्रकार की कानूनी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं हैं |