A. नाभिक का मिलना
B. नाभिक का विभाजन
C. नाभिक का जलना
D. नाभिक का जलना
सितारों में ऊर्जा का निर्माण संलयन के कारण होता है।
संलयन वह नाभिकीय प्रतिक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक हल्के नाभिक मिलकर एक अपेक्षाकृत बड़ा लेकिन स्थिर नाभिक बनाते हैं। इससे बड़ी मात्रा में ऊर्जा निर्मुक्त होती है।
A. 5
B. 6
C. 12
D. 13
A. 28.24 MeV
B. 17.28 MeV
C. 1.46 MeV
D. 39.2 MeV
ऊर्जा =
=2 x 4 x 7.06 –[0+7 x 5.60]
=17.28 MeV
A.
B.
C.
D.
गामा क्षय में,A और Z के मान नहीं बदलते हैं|
A. E1 = 2 E2
B. E2 = 2 E1
C. E1 > E2
D. E2 > E1
ऊर्जा निकलने के कारण, उत्पाद की प्रति न्यूक्लियॉन बंधन-उर्जा, ऊर्जा अभिकारक की तुलना में अधिक होती है|
A. 3.6 फर्मी
B. 6 फर्मी
C. 0.6 फर्मी
D. 2.16 फर्मी
A. 1015 m
B. 1014 m
C. 10-15 m
D. 10-14 m
A. 56 तथा 144
B. 88 तथा 144
C. 56 तथा 88
D. 144 तथा 88
Z = परमाणु क्रमांक = प्रोटॉन की संख्या
A = द्रव्यमान संख्या = Z+N, ( N = न्यूट्रॉन की संख्या)
N = न्यूट्रॉन की संख्या = A-Z
तो,
प्रोटॉन की संख्या: 56
न्यूट्रॉन की संख्या: 144-56 =88
A. 2.5 x 10-8J
B. 1.5 x 10-10J
C. 4.2 x 10-19 J
D. 1.9 x 10-21J
A. 1c = 1 x 1010Bq
B. 1c = 2.5 x 1010Bq
C. 1c = 3.0 x 1010Bq
D. 1c = 3.7 x 1010Bq
1 क्यूरी (c) = 3.7 x 1010 क्षय प्रति सेकंड
और, 1 बैकेरल (Bq) = 1 क्षय प्रति सेकंड
तो, 1c = 3.7 x 1010Bq
A. 0.09242 प्रति वर्ष
B. 0.24152 प्रति वर्ष
C. 0.67241 प्रति वर्ष
D. 0.89241 प्रति वर्ष
A. द्रव्यमान संख्या (A) के घनमूल के सीधे आनुपातिक
B. द्रव्यमान संख्या (A) के घनमूल के सीधे आनुपातिक
C. द्रव्यमान संख्या (A) के घनमूल के व्युत्क्रमानुपाती
D. द्रव्यमान संख्या (A) के घनक्षेत्र के व्युत्क्रमानुपाती
A. क्लोरीन के समभारिक
B. क्लोरीन के समन्यूट्रानिक
C. क्लोरीन के समस्थानिक
D. क्लोरीन के रेडियोधर्मी यौगिक
किसी दिए गए तत्व के समस्थानिकों के नाभिकों में प्रोटॉनों की संख्या तो समान होती है,
परंतु वे एक-दूसरे से न्यूट्रानों की संख्या की दृष्टि से भिन्न होते हैं।
1) प्रतिबिंब की स्थिति ज्ञात कीजिए।
2) प्रतिबिंब की स्थिति को लैंस से और दूर करने हेतु एक और लैंस उपरोक्त लैंस के संपर्क में रखा जाए तो इस दूसरे लैंस की प्रकर्ति ज्ञात कीजिए।

लाल, हरे तथा नीले रंगों के लिए प्रिज़्म के अपवर्तनांक क्रमश: 1.39, 1.44 तथा 1.47 हैं। बताइए किस रंग का पूर्ण आतंरिक परावर्तन होगा तथा किस का निर्गमन होगा?





A. 30o
B. 45o
C. 60o
D. 90o
A. 0.0344 mm
B. 0.344 mm
C. 0.433 mm
D. 0.2882 mm
A.
B.
C.
D.
दिया गया है कि, दूरदर्शी का व्यास
इस प्रकार, यदि
A. 5.0 mm
B. 2.5 mm
C. 1.2 mm
D. 0.5 mm
फ्रिंज दूरी :
A. 4.2 mm
B. 4.0 mm
C. 3.4 mm
D. 2.4 mm
A.
B.
C.
D.
A. 0.1 mm
B. 0.01 mm
C. 0.02 mm
D. 0.2 mm
केंद्रीय उच्चिष्ठ विवर्तन पैटर्न में इसके केंद्र के प्रत्येक तरफ पाँच व्यतिकरण उच्चिष्ठ होने चाहिए। ऐसा तब होगा जब पाँचवें उच्चिष्ठ व्यतिकरण की कोणीय स्थिति केंद्रीय उच्चिष्ठ के दोनों ओर प्रथम निम्निष्ठ विवर्तन की कोणीय स्थिति के साथ मेल खाती है। अर्थात,
A.
B.
C.
D.
काँच की प्लेट को रखने पर पथांतर:
A. 0.51 mm
B. 0.55 mm
C. 0.65 mm
D. 0.85 mm
झिरी की चौड़ाई दी जाती है,
तो झिरी अंतराल होगा:
A.
B.
C.
D.
B. C. D. केन्द्रीय उच्चिष्ठ की चौड़ाई:
B. 40 m C. 32 m D. 26 m दूरी जब तक किरण प्रकाशिकी वैध है:
B. 600 nm C. 300 nm D. 100 nm
B. C. D. यदि Io ध्रुवक द्वारा पारगमित प्रकाश की तीव्रता है तथा I विश्लेषक द्वारा पारगमित प्रकाश की तीव्रता है, तब
B. 45o C. 60o D. 90o
B. हाइड्रोजन परमाणु C. द्वितः आयनित लीथियम D. एकधा आयनित लीथियम त्रिज्या परमाणु संख्या के व्युत्क्रमानुपाती है। लीथियम की परमाणु संख्या सबसे अधिक है।
B. पॉज़िट्रान के C. न्यूट्रॉन के D. न्युट्रीनो के पॉज़िट्रान इलेक्ट्रॉन के प्रति-कण है; इसलिए इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान समान है।
B. n=6 से n=2 C. n=1 से n=2 D. n=2 से n=1 संक्रमण n=6 से n=2 के मध्य सबसे अधिक अंतर है। इसलिए उत्सर्जित ऊर्जा अधिकतम है|
B. शून्य C. शून्य से अधिक D. कभी शून्य से कम और कभी अधिक क्योंकि इलेक्ट्रॉन नाभिक से परिबद्ध है, यही कारण है कि कुल ऊर्जा ऋणात्मक है अर्थात शून्य से कम है।
इलेक्ट्रॉन द्वारा धारित ऊर्जा शून्य होगी। बामर श्रेणी EM स्पेक्ट्रम के दृश्य क्षेत्र में स्थित है| अवरक्त क्षेत्र में स्थित हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम की श्रेणियों का नाम है: हां, हाइड्रोजन परमाणु फोटॉन को अवशोषित कर सकता है। लाइमैन श्रेणी पराबैंगनी क्षेत्र में स्थित है | हीलियम परमाणु के त्रिज्या का क्रम 10-10m है| स्वर्ण पन्नी की अनुमानित मोटाई 10-8m है| रदरफोर्ड का ऐल्फा कण प्रयोग परमाणु नाभिक की खोज का कारण बना| निकाले गए दो इलेक्ट्रॉनों के साथ हीलियम परमाणु को ऐल्फा कण कहा जाता है। दिया हुआ है:- हाइड्रोजन परमाणु की निम्नतम अवस्था में उर्जा, E1 = - X eV गतिज उर्जा, K = -E1 K =-(-X eV) K = X eV अतः गतिज उर्जा X eV होगी| प्रकृति में उत्पन्न होने वाले रेडियोऐक्टिव क्षय के विभिन्न प्रकार हैं:- नाभिक में न्यूक्लिआनों के बीच एक ऐसा आकर्षण बल कार्य करता है जो प्रोटॉन – प्रोटॉन, प्रोटॉन – न्यूट्रॉन, न्यूट्रॉन – न्यूट्रॉन को आकर्षण में बाँधे रखता है। इस बल को नाभिकीय बल कहते हैं। नाभिकीय बल के प्रमुख गुण : नाभिकीय रियेक्टर वह युक्ति है जिसमें नाभिकीय विखण्डन श्रृंखला अभिक्रिया नियंत्रित तरीके से उत्पन्न होती है ताकि, उत्पन्न ऊर्जा स्थिर दर पर हो। नाभिकीय रियेक्टर के मुख्य अवयव अपने कार्यों के साथ नीचे दिये गए है:- नाभिकीय विखंडन तथा संलयन के बीच अन्तर के मुख्य बिन्दु निम्न सारणी में दिये गए हैं :- B. NAND गेट C. NOR गेट D. NOT गेट यह सर्वाधिक मूलभूत गेट है जिसमें केवल एक निवेश तथा एक निर्गत होता है| यदि निवेश ‘0’ है तो ‘1’ निर्गत उत्पन्न करता है तथा यदि निवेश ‘1’ है तो ‘0’ निर्गत उत्पन्न करता है|
B. B, D C. B, C D. C, D यदि डायोड-2 अर्ध-तरंग दिष्टकारी A, C देता है तो डायोड-1 B, D देगा या इसके विपरीत देगा।
B. 0.25π C. 0.5π D. π एक उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक में, निवेश और निर्गत वोल्टता समाना कला में होते हैं।
B. A=0, B=1 C. A=1, B=0 D. A=1, B=1 AND गेट के लिए बूलियन व्यंजक Y= A.B है|
AND गेट की सत्यमान सारणी है:
B. 20 mA C. 20 A D. 30 A
संधि डायोड अग्रदिशिक बायस में है|
इसलिए, I = (4V – 2V)/100 Ω = 20 mA
B. 14 V C. 42 V D. 7 V परिपथ में, ज़ेनर डायोड का उपयोग वोल्टता-नियंत्रित युक्ति के रूप में किया जाता है। निर्गत वोल्टता Vo = 6V है, जो कि ज़ेनर डायोड के सिरों की क्षमता है क्योंकि, पार्श्वक्रम में, क्षमता समान रहती है।
जब एक अर्धचालक को दाता अशुद्धता के साथ अपमिश्रित किया जाता है, तो इलेक्ट्रॉनों का घनत्व बढ़ जाता है और होल घनत्व कम हो जाता है क्योंकि अशुद्धता परमाणु अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन प्रदान करते हैं।
B. होल C. प्रोटॉन D. न्यूट्रॉन p-प्रकार का अर्धचालक तब बनता है जब Si Ge में ग्रुप-III की त्रिसंयोजी अपमिश्रित की जाती है| अपमिश्रिक में Si या Ge की अपेक्षा एक बाहरी इलेक्ट्रॉन कम होता है और इसलिए यह परमाणु तीन ओर से Si परमाणुओं से बंध बना सकता है, लेकिन चौथी ओर बंध बनाने के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉन उपलब्ध न होने के कारण चौथा बंध बनाने में सफल नहीं हो पाता| अत: त्रिसंयोजक परमाणु तथा चौथे निकटस्थ परमाणु के बीच बंध में एक होल होता है|
B. C. D. ज़ेनर डायोड एक वोल्टता-नियंत्रित युक्ति के रूप में पाया जा सकता है|
इसे भंजन क्षेत्र में पश्चदिशिक बायस दशा में प्रचालित करते है|
पश्चदिशिक भंजन क्षेत्र में, जेनर डायोड में वोल्टेज में बहुत छोटा बदलाव परिपथ द्वारा धारा में बहुत बड़ा परिवर्तन उत्पन्न करता है।
जब जेनर डायोड की पश्चदिशिक बायस भंजन वोल्टता से आगे बढ़ जाती है, तो इससे धारा में काफी वृद्धि होती है।
B. C. D.
B. 40 Hz C. 80 Hz D. 120 Hz
पूर्ण-तरंग दिष्टकारी में, प्रत्येक निवेश तरंग को दो धनात्मक अर्ध तरंगों में तोड़ा जाता है। तो, निर्गत आवृत्ति 2 x 40 Hz = 80 Hz है।
B. NOT गेट तथा AND गेट C. NOR गेट तथा AND गेट D. OR गेट तथा NOR गेट यह एक AND गेट है जो NOT गेट द्वारा अनुगमन करता है| NAND गेटों को सार्वत्रिक गेट भी कहते हैं, क्योंकि इन गेटों के प्रयोग से आप अन्य मूलभुत गेट प्राप्त कर सकते हैं|
कारक जिस पर धातु की विद्युत चालकता निर्भर करती है : (i) मुक्त्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या। (ii) मुक्त्त इलेक्ट्रॉनों का अपवाह वेग जब विद्युत क्षेत्र आरोपित किया जाता है, (iii) विद्युत क्षेत्र, तथा (iv) तापमान पर निर्भर करती है। NO + 1/2 O2 B. N2 + O2 C. 2N2O5 D. NO2 + CO ताप में वृद्धि होने से इस अभिक्रिया का वेग वास्तव में घटता है। सक्रियण ऊर्जा को बढ़ा देता है। B. अभिक्रिया के ऊर्जा अवरोध को कम कर देता है। C. संघट्ट व्यास को कम कर देता है। D. ताप गुणांक को बढ़ा देता है। उत्प्रेरक की उपस्थिति में, अभिक्रिया निम्न सक्रियण ऊर्जा पथ का अनुगमन करती है। ये ऐसा पथ होता है जिसमें संघट्ट कणों को प्रभावी टकराव के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। फलतः, अभिक्रिया के लिए ऊर्जा अवरोध घट जाता है। सक्रियण ऊर्जा परिवर्तित होती है। B. साम्य सांद्रता परिवर्तित होती है। C. अभिक्रिया की ऊष्मा परिवर्तित होती है। D. अंतिम उत्पाद परिवर्तित होता है। उत्प्रेरक किसी अभिक्रिया को पूरा करने के लिए वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है। उत्प्रेरक की उपस्थिति में, अभिक्रिया कम सक्रियण ऊर्जा के पथ का अनुगमन करती है। m = -Ea/RT. B. m = exp( Ea/RT). C. log m = Ea/2.303RT. D. m = 10-Ea/RT . विलायक पर B. ताप पर C. अभिकारकों की सांद्रता पर D. अभिकारकों की प्रकृति पर k का मान अभिकारकों की सांद्रता पर निर्भर नहीं करता है। इसका मान निकाय के ताप पर निर्भर करता है। प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए B. शून्य कोटि की अभिक्रिया के लिए C. द्विपरमाणुक अभिक्रिया के लिए D. अंतर-आण्विक अभिक्रिया के लिए द्विपरमाणुक अभिक्रियाओं में एक साथ दो स्पीशीज़ का संघट्ट होता है। उदाहरणार्थ, हाइड्रोजन आयोडाइड का वियोजन। इसमें अभिकारक अणुओं को कठोर गोला माना जाता है और अभिक्रिया तब होती है जब अणु एक दूसरे के साथ संघट्ट करते हैं। अभिक्रिया के वेग को समझने में B. अभिक्रिया की क्रियाविधि को समझने में C. आयनों की संख्या को परिकलित करने में D. मुक्त ऊर्जा परिकलित करने में प्राथमिक अभिक्रिया में भाग लेने वाली स्पीशीज़ (परमाणु, आयन अथवा अणु) जो कि एक साथ संघट्ट के फलस्वरूप रासायनिक अभिक्रिया करती हैं, की संख्या को अभिक्रिया की आण्विकता कहते हैं। प्रारंभिक सांद्रता पर B. प्रारंभिक सांद्रता के घनमूल पर C. अंतिम सांद्रता के वर्गमूल पर D. अंतिम सांद्रता की प्रथम घात पर रेडियोधर्मी पदार्थ के विघटन की दर प्रथम कोटि की बलगतिकी का पालन करती है और प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए अर्द्ध-आयु निम्न होती है; B. C. D. 17 min-1 B. 4.07 C. 2.07 D. 2.09 प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए, अभिकारकों की प्रारंभिक सांद्रता के समानुपाती होती है। B. अभिकारकों की प्रारंभिक सांद्रता पर निर्भर नहीं करती है। C. अभिकारकों की प्रारंभिक सांद्रता के व्युत्क्रमानुपाती होती है। D. अभिकारकों की प्रारंभिक सांद्रता के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है। अभिक्रिया का ताप बदलता है। B. अभिक्रिया मिश्रण में उत्प्रेरक मिलाया जाता है। C. अभिक्रिया मिश्रण UV-विकिरण के संपर्क में आता है। D. अभिकारकों की सांद्रता समान रहती है। अभिक्रिया के वेग में परिवर्तन तब होता है जब अभिकारकों की सांद्रता में या अभिक्रिया के ताप में परिवर्तन होता है। उत्प्रेरक की उपस्थिति और विकिरण के संपर्क में आने पर भी अभिक्रिया के वेग में परिवर्तन होता है। शून्य कोटि अभिक्रियाएँ देहली ऊर्जा वह न्यूनतम ऊर्जा होती है, जो संघट्य अणुओं के पास होनी चाहिए जिससे उनके बीच संघट्ट प्रभावी हो सके। देहली ऊर्जा = संक्रियण ऊर्जा + अभिक्रियक अणुओं की ऊर्जा यदि एक अभिक्रियक आधिक्य में उपस्थित हो, तो द्विपरमाणुक अभिक्रिया गतिक रूप से प्रथम कोटि की हो सकती है। NaOH के साथ एथिल एसीटेट के जलअपघटन की दर CH3COOC2H5 तथा NaOH दोनों की सांद्रता पर निर्भर करती है जबकि HCl के साथ यह केवल एथिल एसीटेट की सांद्रता पर निर्भर करती है। अभिक्रिया के आधा पूर्ण होने में लगने वाला समय अभिक्रिया की अर्धायु कहलाता है। अभिक्रिया का वेग निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होता है- उत्प्रेरक सक्रियण ऊर्जा को कम करके अभिक्रिया वेग में वृद्धि कर सकते हैं। यह अभिक्रिया के लिए वैकल्पिक मार्ग प्रदान करते हैं। अभिक्रिया के दौरान यह अस्थिर मध्यवर्ती बनाता है। यह ΔG, ΔH, ΔS, तथा k को प्रभावित नहीं करता है। उत्प्रेरक अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा को कम करके अग्र एवं प्रतीप दोनों अभिक्रियाओं को समान रूप से उत्प्रेरित करता है। शून्य कोटि की अभिक्रिया वह होती है जिसमें अभिक्रिया का वेग अभिक्रियकों की सांद्रता में परिवर्तन से अपरिवर्तित रहता है। अभिक्रिया का वेग अभिक्रिया के दौरान निरंतर स्थिर रहता है। उदाहरणार्थ: B. Cu - 2e- → Cu2+ C. 2Ag+ + 2e- → 2Ag D. Ag - e- → Ag+ ऑक्सीकरण अर्ध सेल अभिक्रिया Cu - 2e- → Cu2+ है।
अपचयन अर्ध सेल अभिक्रिया 2Ag+ + 2e- → 2Ag है।
B. G = k/R C. G = 1/R D. G = k x R चालकता (G) प्रतिरोध (R) का व्युत्क्रम होती है।
B. इसे लवणीय जल में रखना C. आयरन एनोड बनाना D. इसे जल में रखना आयरन केवल तभी इलेक्ट्रॉन त्यागकर Fe2+ आयन बनाता है, जब यह ऐनोड के रूप में कार्य करता है।
B. तनुकरण करने पर घटती है। C. वैद्युत अपघट्य के घनत्व पर निर्भर करती है। D. तनुकरण करने पर कोई परिवर्तन नहीं होता है। प्रबल वैद्युत अपघट्य विलयन में पूर्ण रूप से वियोजित हो जाते हैं। तनुकरण करने पर आयनों की गति में वृद्धि होती है, जो चालकता को बढ़ाती है।
B. C. D. यहाँ, कॉपर के टुकड़े को ऐनोड बनाया गया है और धातु की चाबी को कैथोड बनाया गया है। पात्र में लिया गया वैद्युत अपघट्य कॉपर लवण का विलयन है जो किसी वस्तु के विद्युत लेपन के लिए आवश्यक है।
B. ऐनोड पर (रंगहीन), कैथोड पर (पीला हरा) C. ऐनोड पर (पीला हरा), कैथोड पर (रंगहीन) D. ऐनोड पर (पीला हरा), कैथोड पर (पीला हरा) HCl (l) में H+ और Cl- आयन दोनों होते हैं।
B. गतिज ऊर्जा घटती है। C. विभव ऊर्जा वैद्युत ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। D. गतिज ऊर्जा वैद्युत ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।
A. दो गुणा होगी SOLUTION
A. SOLUTION
A. 52 mSOLUTION
A. 650 nmSOLUTION
A. SOLUTION
A. 30oSOLUTION
A. डूटीरियम परमाणुSOLUTION
A. प्रोटोन केSOLUTION
A. n=2 से n=6SOLUTION
A. शून्य से कमSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION

SOLUTION

Right Answer is:
SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल की कमी निम्नानुसार दी गई हैं: -
SOLUTION

SOLUTION
1) ऐल्फा - क्षय जिसमें एक हीलियम नाभिक उत्सर्जित होता है।
2) बीटा - क्षय जिसमें, इलेक्ट्रॉन तथा पोजिट्रोन (वह कण जिसका इलेक्ट्रॉन के समान द्र्व्यमान होता है लेकिन, आवेश इलेक्ट्रॉन के विपरीत होता है) उत्सर्जित होते हैं।
3) गामा - क्षय जिसमें उच्च ऊर्जा (हजारों keV या अधिक) के फोटोन उत्सर्जित होते हैं।SOLUTION
(1) नाभिकीय बल आकर्षणात्मक बल है।
(2) नाभिकीय बल अत्यंत प्रबल होते हैं।
(3) यह बल 10-15 मीटर के लघु परिसर में कार्य करते हैं।
(4) प्रोटॉन – प्रोटॉन, प्रोटॉन – न्यूट्रॉन एवं न्यूट्रॉन – प्रोटॉन के बीच लगने वाले नाभिकीय बल लगभग समान परिमाण के होते है।SOLUTION
किसी नाभिकीय रियेक्टर का सरलीकृत चित्र नीचे दिया गया है:-
1. विखंडनीय पदार्थ:- विखंडनीय पदार्थ वह पदार्थ है जो ईंधन के रूप में कार्य करते हैं तथा नाभिकीय रियेक्टर को संचालित करते है। यहाँ, यूरेनियम का संवर्धित समस्थानिक ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है।
2. मंदक :- इसका मुख्य कार्य तीव्र गति के न्यूट्रॉनों की गति को मंद करना होता है। भारी जल, ड्यूटरियम तथा पैराफिन मंदक के रूप में उपयोग किए जाते है।
3. नियंत्रक छड़े :- यह अनियंत्रित अभिक्रिया को नियंत्रित करने के लिए उपयोग की जाती है। अनियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया में ऊर्जा की विशाल मात्रा मुक्त होती है जिससे विस्फोट भी हो सकता है। यहाँ, न्यूट्रॉन अवशोषित पदार्थ जैसे बोरॉन तथा कैडमियम की छड़ें रियेक्टर क्रोड में लगाई जाती हैं।
4. शीतलक:- तरल सोडियम या भारी जल शीतलक के रूप में प्रयोग किया जाता है।यह नाभिक श्रृंखला प्रतिक्रिया में उत्पन्न गर्मी को अवशोषित करता है। फिर, यह पानी में अवशोषित गर्मी ऊर्जा को जारी करता है, जो पानी को गर्म गर्म भाप में परिवर्तित करता है।
5. कंक्रीट परिरक्षण:- रियेक्टर के पास काम करने वाले व्यक्तियों को हमेशा नाभिकीय अभिक्रिया के दौरान उत्सर्जित विकिरणों से खतरा रहता है। जैसे ही सम्पूर्ण रियेक्टर को मोटी कंक्रीट से परिरक्षित करते है, तो इस नाभिकीय रियेक्टर से हानिकारक विकिरणें मुक्त नहीं होती है।SOLUTION
मुक्त प्रोटोन का द्र्व्यमान = 1.007825 u
मुक्त न्यूट्रॉन का द्र्व्यमान = 1.008665u
हीलियम नाभिक का द्र्व्यमान = 4.002800 u
[दिया गया है:- 1 u = 931.5 MeV]
SOLUTION
A. AND गेटSOLUTION
A. A, BSOLUTION
A. 0SOLUTION
ें है:
A. A=0, B=0SOLUTION
A
B
Y
0
0
0
0
1
0
1
0
0
1
1
1
A. 10 mASOLUTION
A. 6 VSOLUTION
A. होलों की सांद्रता घट जाती हैSOLUTION
A. इलेक्ट्रॉनSOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. 20 HzSOLUTION
SOLUTION
A. OR गेट तथा AND गेटSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
A.
NO2
2NO
4NO2 + O2
CO2 + NO SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. 



SOLUTION
A.
10-2 min-1
10-2 min-1
10-2 min-1 SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
(1) अभिक्रियकों की प्रकृति
(2) अभिक्रियकों की भौतिक अवस्था
(3) अभिक्रियक का पृष्ठ क्षेत्रफल
(4) अभिक्रियक की सांद्रता
(5) अभिक्रिया का ताप
(6) उत्प्रेरक
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
Cu(s) + 2Ag+(aq) →Cu2+(aq) + 2Ag(s)
अपचयन अर्ध सेल अभिक्रिया है-
A. Cu + 2e- →Cu2+SOLUTION
A. G = RSOLUTION
A. आयरन कैथोड बनाना SOLUTION
A. तनुकरण करने पर धीरे-धीरे बढ़ती है।SOLUTION
A. 



SOLUTION
इन इलेक्ट्रोडों पर मुक्त गैसों का रंग होगा:
A. ऐनोड पर (रंगहीन), कैथोड पर (रंगहीन)SOLUTION
इस प्रकार कैथोड पर क्लोरीन गैस मुक्त होती है क्योंकि इसका मानक अपचयन विभव अधिक होता है। हम जानते हैं कि क्लोरीन गैस का रंग पीला-हरा होता है।
चूँकि आयन जिसका अपचयन विभव कम होता है ऐनोड पर पहले ऑक्सीकृत होगा, H+ आयनों के ऑक्सीकरण के कारण ऐनोड पर हाइड्रोजन गैस मुक्त होगी जो कि एक रंगहीन गैस है।
A. विभव ऊर्जा घटती है।