A. लैकलांशे सेल
B. सांद्रता सेल
C. ईंधन सेल
D. लेड संचायक बैटरी
सांद्रता सेल में भिन्न सांद्रता वाले एक ही पदार्थ के दो अर्ध सेल होते हैं। इनमें रासायनिक ऊर्जा सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित होती है।
A. टिन द्वारा
B. जिंक द्वारा
C. निकेल द्वारा
D. कॉपर द्वारा
वैद्युत संरक्षण विधि में लोहे की वस्तुएँ लोहे से अधिक सक्रिय धातुओं द्वारा संरक्षित होती हैं, उदाहरणार्थ- जिंक, मैग्नीशियम।
A. आयरन कार्बोनेट
B. फ़ैरस ऑक्साइड
C. फ़ेरिक ऑक्साइड
D. आयरन परॉक्साइड
ज़ंग हाइड्रेटेड फ़ेरिक ऑक्साइड है। इसका रासायनिक सूत्र Fe2O3.xH2O होता है।
A. Zn-Cu
B. Zn-Ni
C. Cu-Cd
D. Ni-Cd
Ni-Cd संचायक सेल पुनः आवेशित किए जाने वाले सेल का उदाहरण है।
A. यह कम प्रदूषणकारी है।
B. इसके दहन से केवल जल बनता है।
C. यह एक नवीकरणीय स्रोत है।
D. इसका संचयन आसान नहीं है।
ईंधन सेलों में हाइड्रोजन के उपयोग से उच्च दक्षता, कम प्रदूषणकारी होना, नवीकरणीय होना जैसे अनेक लाभ हैं लेकिन हाइड्रोजन का संचयन करने में आने वाली कठिनाइयों के कारण इसका व्यवहारिक रूप में अभी तक उपयोग नहीं किया जा रहा है।
A. अशुद्धियों की उपस्थिति
B. वायु एवं नमी की उपस्थिति
C. जिंक आवरण की उपस्थिति
D. वैद्युत अपघट्य की उपस्थिति
जब जिंक जैसी अधिक अभिक्रियाशील धातुओं से लोहे की सतह को लेपित किया जाता है, तो संक्षारण की दर धीमी हो जाती है। दूसरी ओर अशुद्धता, वैद्युतअपघट्य और नमी की उपस्थिति के कारण संक्षारण की दर बढ़ जाती है।
A. यह सबसे हल्की गैस है।
B. इसका प्रज्वलन ताप अधिक होता है।
C. इसमें प्रज्वलन ताप कम होता है।
D. इसमें प्रबलतम बंध होते हैं।
कम प्रज्वलन तापमान के कारण यह अत्यधिक ज्वलनशील होती है इसलिए इसका उपयोग सामान्य ईंधन के रूप में नहीं किया जाता है।
A. आसुत जल में
B. मृदु जल में
C. कठोर जल में
D. लवणीय जल में
लवणीय जल में प्रबल वैद्युत अपघट्य जैसे- NaCl, KCl के विलयन होते हैं। जो जंग लगने की प्रक्रिया को तीव्र कर देते हैं।
A. परिपथ में किसी धारा का प्रवाह नहीं होता है।
B. वैद्युत रासायनिक सेल में लवण सेतु का उपयोग किया जाता है।
C. वैद्युत रासायनिक सेल का द्रव सेल संयोजन विभव शून्य होता है।
D. परिपथ में न्यूनतम धारा प्रवाह होती है।
सेल का emf उसके सिरो पर अधिकतम विभव होता है।
विसरण धारा की दिशा बहुसंख्यक आवेश वाहकों के कारण P सतह से N सतह की ओर होती है तथा अपवाह धारा की दिशा संधि डायोड में अल्पसंख्यक आवेश वाहकों के कारण N सतह से P सतह की ओर होती है।
लॉजिक गेट ऐसा अंकीय परिपथ होता है जो निवेशी तथा निर्गत वोल्टताओं के बीच किसी निश्चित तार्किक सम्बन्ध का पालन करता है| एक लॉजिक गेट में एक या एक से अधिक निवेश होते हैं परन्तु इसका केवल एक ही निर्गत होता है|
मूल लॉजिक गेटों के नाम हैं: OR गेट, AND गेट तथा NOT गेट|
नैज अर्धचालक शुद्ध अर्धचालक होते हैं जो हर प्रकार की अशुद्धि से मुक्त होते हैं। उदाहरण : जर्मेनियम तथा सिलिकन।
शुद्ध अर्धचालक की चालकता, संयोजी बैण्ड से चालन बैण्ड की ओर तापीय रूप से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के रूप में व्यक्त की जाती है।
दो सिद्धान्त जिसके द्वारा नैज अर्धचालक को समझा जा सकता है : संयोजी बन्ध सिद्धान्त तथा ऊर्जा बन्ध सिद्धान्त।
सिलिकॉन तथा जर्मेनियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है :
सिलिकॉन परमाणु : 1s2 2s2 2p6 3s2 3p2
जर्मेनियम परमाणु : 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 3d10 4s2 4p2
जैसे - जैसे तापमान बढ़ता है, अर्धचालक की चालकता में वृद्धि होती है। यह इसलिए होता है क्योंकि ऊष्मा देने पर, कुछ सहसंयोजी बन्ध टूट जाते है तथा इलेक्ट्रॉन - हॉल युग्म उत्पन्न होने लगते हैं। चूँकि, इलेक्ट्रॉनों तथा होलों, दोनों की संख्या में वृद्धि होती है, इसलिए, इलेक्ट्रॉन धारा में वृद्धि के साथ - साथ होल धारा में समान वृद्धि होती है।
वह दिष्टकारी जो ac निवेश के केवल आधे चक्र का दिष्टकरण करता है, अर्द्ध तरंग दिष्टकारी कहलाता है।
अर्द्ध तरंग दिष्टकारी का सिद्धान्त :
जब ac निवेश संधि डायोड के सापेक्ष आरोपित की जाती है, तो यह एक अर्द्ध चक्र के दौरान अग्र बायसित तथा दूसरे विपरीत अर्द्ध चक्र के दौरान पश्च बायसित हो जाता है।
इसका तात्पर्य है कि निर्गम, a.c. निवेश के एकान्तर अर्द्ध चक्र के दौरान प्राप्त किया जायेगा।
ज़ेनर डायोड, वह युक्ति है जो अनियंत्रित DC विधुत आपूर्ति के निर्गम को नियंत्रित करने के लिए उपयोग की जाती है।
इसे भंजन क्षेत्र में पश्चदिशिक वोल्टता में प्रचालित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है तथा इसका उपयोग वोल्टता नियंत्रक के रूप में किया जाता है|
(i) दो प्रकार के अपद्रवी अर्धचालक है : P प्रकार का अर्धचालक तथा N प्रकार का अर्धचालक। N प्रकार के अर्धचालक की गतिशीलता P प्रकार के अर्धचालक की तुलना में अधिक होती है। यह इसलिए होता है क्योंकि, इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता होलों की गतिशीलता की तुलना में बहुत अधिक होती है। और इस प्रकार, N - प्रकार के अर्धचालक में, इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक आवेश वाहक तथा होल अल्पसंख्यक आवेश वाहक होते हैं। इसी प्रकार, P प्रकार के अर्धचालक में, होल बहुसंख्यक आवेश वाहक तथा इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक आवेश वाहक होते हैं। इस प्रकार, N - प्रकार के अर्धचालक की गतिशीलता अधिक होती है।
(ii) इलेक्ट्रॉन तथा होल के बीच दो अन्तर हैं :
|
इलेक्ट्रॉन |
होल |
|
यह ऋणावेशित कण है। |
यह एक काल्पनिक कण है जो धनावेशित होता है। जब किसी अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन सहसंयोजक बंध से टूटता है तो यह उत्पन्न होता है। |
|
इसके आवेश का परिमाण = 1.6 x 10-19 C तथा इलेक्ट्रॉन की गतिशीलता होल की तुलना में अधिक होती है। |
इसके आवेश का परिमाण इलेक्ट्रॉन की तुलना में समान होता है तथा होल की गतिशीलता इलेक्ट्रॉन की तुलना में कम होती है। |
(i) OR गेट के पश्चात एक NOT संक्रिया अनुप्रयुक्त करने से NOR गेट प्राप्त होता है| इसके दो या अधिक निवेश तथा एक निर्गत होता है| इसके जब दोनों निवेश A तथा B शून्य होते हैं तो निर्गत Y 1 होता है|
(ii) NOR गेट के लिए सत्यमान सारणी:
|
निवेश 1 |
निवेश 2 |
निर्गत |
|
0 |
0 |
1 |
|
0 |
1 |
0 |
|
1 |
0 |
0 |
|
1 |
1 |
0 |
सौर सेल एक p-n संधि युक्ति है जो सौर ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है। यह फोटोडायोड के समान सिद्धान्त पर कार्य करता है।
सौर सेल की बनावट :
इसमें एक P –Si पटलिका होती है जिसके फलक पर N-Si की एक पतली परत विसरण प्रक्रिया द्वारा वर्धित की जाती है| P –Si के दूसरे फलक पर कोई धातु का लेपन किया जाता है| N-Si की सतह के शीर्ष पर धातु फ़िंगर इलेक्ट्रोड निक्षेपित करतें है| यह अग्र संपर्क की भांति कार्य करता है| घात्विक ग्रिड सेल के क्षेत्रफल का बहुत थोड़ा भाग घेरती है ताकि सेल पर प्रकाश शीर्ष से आपतित हो सके|
धातु का उपरी इलेक्ट्रोड एनोड के रूप में कार्य करता है और नीचे वाला एक कैथोड के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार उत्पादित emf को फोटो वोल्टता के रूप में जाना जाता है।
| निवेश 1 | निवेश 2 | A | B | निर्गत |
| 0 | 0 | |||
| 0 | 1 | |||
| 1 | 0 | |||
| 1 | 1 |
(i) इस्तेमाल किए गए तीन प्रकार के गेट हैं: NOR गेट, AND गेट और OR गेट।
(ii )गेटों के इस संयोजन के लिए सत्यमान सारणी:
|
निवेश 1 |
निवेश 2 |
A |
B |
निर्गत |
|
0 |
0 |
1 |
0 |
1 |
|
0 |
1 |
0 |
0 |
0 |
|
1 |
0 |
0 |
0 |
0 |
|
1 |
1 |
0 |
1 |
1 |
A. सोडियम क्लोराइड
B. आयरन
C. बर्फ
D. ग्रेफाईट
आण्विक ठोसों के अवयवी कण ध्रुवी या अध्रुवीय हो सकते हैं। बर्फ में जल (H2O) के अणु होते हैं।
A. चालक
B. अर्धचालक
C. अतिचालक
D. विद्युतरोधी
विद्युतरोधी में नगण्य चालकता होती है। सामान्यतया चालकों की चालकता 104 से 107 ohm-1cm-1 के मध्य होती है और अर्धचालकों की चालकता 10-6 ohm-1cm-1 से 104 ohm-1cm-1 के मध्य होती है जबकि विद्युतरोधी की चालकता बहुत कम 10-20 से 10-10 ohm-1cm-1 के परास के मध्य होती है।
A. 4 और 2
B. 9 और 14
C. 14 और 9
D. 2 और 4
A. चुंबकीय पदार्थ
B. धनायन रिक्तिकाएँ
C. ऋणायन रिक्तिकाएँ
D. धातु आधिक्य दोष
जब SrCl2 की अल्प मात्रा वाले सोडियम क्लोराइड को क्रिस्टलीकृत किया जाता है, तो यह धनायन रिक्तिकाओं को उत्पन्न करता है क्योंकि प्रत्येक Sr2+ दो Na+ आयनों को प्रतिस्थापित करता है,
A. 74
B. 50
C. 26
D. 25
संकुलन के ABABAB... प्रकार में षटकोणीय निविड संकुलन जिसमें 74% स्थान भरा होता है और 26% स्थान खाली होता है।
A. A3B4
B. A4B3
C. A2B3
D. A3B2
जालक में बनने वाली चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या तत्व B के परमाणुओं के संख्या के दोगुने के बराबर होगी।
केवल 2/3 रिक्तियाँ ही A के परमाणुओं से अध्यासित हैं।
इस प्रकार, A तथा B के परमाणुओं की संख्या का अनुपात होगा:
2 x (2/3) : 1 = 4:3
अतः यौगिक का सूत्र A4B3 होगा।
A. आयनिक ठोस
B. सह्संयोजी ठोस
C. धात्विक ठोस
D. आण्विक ठोस
आण्विक ठोस अणुओं से बने होते हैं और ये अणु ध्रुवीय या अध्रुवीय हो सकते हैं। ये अणु आण्विक ठोस में त्रिविमीय जालक में व्यवस्थित होते हैं तथा दुर्बल वान्डर वाल्स बलों द्वारा आपस में बँधे होते हैं।
A. यह एक अक्रिस्टलीय ठोस है।
B. यह समदैशिक होता है।
C. यह एक क्रिस्टलीय ठोस है।
D. यह आभासी ठोस है।
यूरिया एक क्रिस्टलीय ठोस होता है और इसका गलनांक निश्चित होता है जबकि अक्रिस्टलीय ठोस ताप के एक निश्चित परास पर नरम होकर पिघलते हैं। ।
A. NaBr
B. MgBr2
C. AgBr
D. AlBr3
सिल्वर और ब्रोमाइड आयनों के आकार में बड़े अंतर के कारण AgBr में फ्रैंकेल दोष होता है ।
(i) संक्षारण, धातु और ऑक्सीजन की सतह पर वायुमंडलीय गैसों द्वारा धातु के ऑक्साइडों, सल्फाइडों, कार्बोनेटों और सल्फेटों में परिवर्तन की प्रक्रिया है।
(ii) गैल्वेनीकरण आयरन पर जिंक के लेपन की प्रक्रिया है। यह लोहे को जंग से बचाती है।
(i) विद्युत् रासायनिक सेल में, लवण सेतु का उपयोग दो अर्ध सेलों में विलयनों की विद्युत् उदासीनता बनाए रखने के लिए किया जाता है। यह आयनों को दो विलयनों को मिश्रित किए बिना एक विलयन से दूसरे विलयन तक जाने देकर विद्युत् परिपथ को पूर्ण करता है।
(ii) एक इलेक्ट्रोड के इलेक्ट्रोड विभव के निरपेक्ष मान को मापा नहीं जा सकता है क्योंकि अर्ध सेल का ऑक्सीकरण एवं अपचयन अकेले नहीं हो सकता है। इस कठिनाई को दूर करने के लिए, हम एक संदर्भ इलेक्ट्रोड का उपयोग करते हैं जिसका इलेक्ट्रोड विभव निश्चित मान लिया जाता है।
उदाहरण: मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड अथवा सामान्य हाइड्रोजन इलेक्ट्रॉन (SHE या NHE)- इसका इलेक्ट्रोड विभव 0 K पर 0.00 वोल्ट के रूप में लिया जाता है।
किसी भी इलेक्ट्रोड के इलेक्ट्रोड विभव को निर्धारित करने के लिए इसे एक सेल के एक इलेक्ट्रोड में SHE के साथ लगाया जाता है। चूँकि SHE इलेक्ट्रोड का EMF 0.00 V माना जाता है। अतः सेल का EMF उस इलेक्ट्रोड के इलेक्ट्रोड विभव का का मान बताएगा।
(iii) इलेक्ट्रोड विभव के बढ़ते हुए मानों के क्रम में विभिन्न तत्वों की व्यवस्था को विद्युत रसायन श्रेणी के रूप में जाना जाता है।
(a) इलेक्ट्रोड विभव का धनात्मक संकेत अपचयन विभव को निरुपित करता है। यह संकेत करता है कि अपचयन विभव का अधिक मान जितना अधिक होता है, पदार्थ उतनी सरलता से अपचयित होता है। इसे प्रबल ऑक्सीकारक कहा जाता है।
अतः, वैद्युत रासायनिक श्रेणियों के अनुसार, F2 का अपचयन विभव अधिकतम (प्रबलतम ऑक्सीकारक) होता है और Li+ आयन का अपचयन विभव न्यूनतम होता है, इसलिए यह श्रेणी में दुर्बलतम ऑक्सीकारक है।
(b) अधिक ऑक्सीकरण विभव वाली धातु कम ऑक्सीकरण विभव वाली धातुओं को उनके लवण विलयन से प्रतिस्थापित कर सकती हैं।
उदाहरणार्थ: इन धातुओं के ऑक्सीकरण विभव को घटते क्रम में निम्नप्रकार लिखा जा सकता है:
Mg > Zn > Fe > Cu > Ag
अतः, प्रत्येक धातु लवण विलयनों से धातुओं को उनके दाहिनी ओर की धातु द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है।
(i) फैराडे का वैद्युत अपघटन का प्रथम नियम:
किसी इलेक्ट्रोड पर निक्षेपित या मुक्त किसी पदार्थ का द्रव्यमान वैद्युत अपघट्य से होकर गुजरने वाली विद्युत् की मात्रा के अनुक्रमानुपाती होता है।
फैराडे के वैद्युत अपघटन का द्वितीय नियम:
जब श्रेणी में जुड़े विभिन्न वैद्युत-अपघट्यों से विद्युत की समान मात्रा प्रवाहित की जाती है, तो इलैक्ट्रोडों पर निक्षेपित पदार्थों के भार उनके तुल्यांकि भारों के अनुक्रमानुपाती होते हैं।
(ii) चालकता प्रतिरोध का व्युत्क्रम है, इसलिए विलयन की चालकता = 1/20 = 0.05 ओम-1 होगी।
(iii) दुर्बल वैद्युतअपघट्य के लिए अनंत तनुता पर चालकता में अत्यधिक वृद्धि होती है क्योंकि दुर्बल वैद्युतअपघट्य की सांद्रता इसके आयनीकरण से अत्यधिक कम हो जाती है।
(iv) दुर्बल वैद्युतअपघट्य के वियोजन स्थिरांक की गणना Kc = Ca2/1-a सूत्र से की जा सकती है, जहाँ a दुर्बल वैद्युतअपघट्य के वियोजन की मात्रा है।
(i) वायु में उपस्थित गैसों की अभिक्रिया के कारण धातुओं के मंद गति से अपरदन की प्रक्रिया संक्षारण कहलाता है। संक्षारण के परिणामस्वरुप ऑक्साइड, सल्फाइड आदि जैसे यौगिकों का निर्माण होता है।
(ii) ज़ंग, जलयोजित फेरिक ऑक्साइड (Fe2O3.xH2O) होती है।
(iii) धातु की अभिक्रियाशीलता: अधिक सक्रिय धातुएँ आसानी से संक्षारित होती हैं।
वायु एवं नमी की उपस्थिति: वायु एवं नमी संक्षारण को तीव्र कर देती है।
वैद्युत अपघट्यों की उपस्थिति: शुद्ध जल की अपेक्षा लवणीय जल में लोहे में तेजी से जंग लगती है।
A. जटिल अभिक्रिया
B. एक अणुक अभिक्रिया
C. त्रि-परमाणुक अभिक्रिया
D. द्वि-परमाणुक अभिक्रिया
इस अभिक्रिया की आणविकता एक है, अतः यह एक-अणुक अभिक्रिया है।
A. अभिकारक की प्रारंभिक सांद्रता के समानुपाती होती है।
B. वेग स्थिरांक के समानुपाती होती है।
C. अभिकारक की प्रारंभिक सांद्रता के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
D. ताप के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
शून्य कोटि की अभिक्रिया की अर्द्ध आयु t1/2 = [R0]/2k होती है।
A. शून्य कोटि की अभिक्रिया है ।
B. प्रथम कोटि की अभिक्रिया है ।
C. द्वितीय कोटि की अभिक्रिया है ।
D. छद्म- प्रथम कोटि की अभिक्रिया
यह छद्म- प्रथम कोटि की अभिक्रिया है, क्योंकि विलायक जल आधिक्य है।
A.
बंध निर्माण
B.
सक्रियण ऊर्जा में वृद्धि
C.
एंथैल्पी में कमी
D.
संघट्ट में कमी
अभिकारक अणुओं का सही अभिविन्यास बंध निर्माण के कारण होता है जबकि गलत अभिविन्यास के कारण वे केवल टकराते हैं, उत्पाद नहीं बनाते हैं।
A.
ऑक्सैलिक अम्ल का निर्जलन
B.
एथिल ऐसीटेट का क्षार-उत्प्रेरित जलअपघटन
C.
एथिल ऐसीटेट का अम्ल-उत्प्रेरित जलअपघटन
D.
हाइड्रोजन परॉक्साइड का वियोजन
अम्ल-उत्प्रेरित अभिक्रिया वस्तुतः द्वितीय कोटि की अभिक्रिया है, परंतु विलायक (जल) के आधिक्य होने के कारण प्रथम कोटि की अभिक्रिया की तरह व्यवहार करती है।
A.
ठोस अवस्था
B.
द्रव अवस्था
C.
गैस अवस्था
D.
अर्द्ध ठोस अवस्था
किसी अभिक्रिया का वेग ठोस अवस्था में में अधिकतम इसलिए होता है क्योंकि गैसें सुगमतापूर्वक एक-दूसरे के साथ मिश्रित हो जाती हैं।
A.
बोल्ट्समान गुणक
B.
आवृति गुणक
C.
गतिज कारक
D.
ऊष्मागतिकी कारक
बोल्ट्समान गुणक T ताप पर एक विशिष्ट मान E से अधिक ऊर्जा वाले अणुओं की संख्या बताता है।
A.
L mol-1s-1
B.
s-1
C.
mol L-1s-1
D.
L2mol-2s-1
अभिक्रिया का वेग सांद्रता बटा समय (सांद्रता / समय) के बराबर होता है।
A. 1
B. 2
C. 3
D. 4
परमाणुओं, आयनों या अणुओं की संख्या जिनके एक साथ संघट्ट के फलस्वरूप रासायनिक अभिक्रिया होती है, अभिक्रिया की आण्विकता कहलाती है।
A.
शून्य
B.
एक
C.
दो
D.
तीन
nवें कोटि की अभिक्रिया के लिए
.
A.
अभिविन्यास गुणक
B.
ऊर्जा गुणक
C.
संघट्ट आवृति
D.
बोल्टज़मान गुणक
प्रभावी संघट्ट होने के लिए संघट्ट अणुओं की ऊर्जा देहली ऊर्जा से अधिक होनी चाहिए।
A.

B.

C.
D.

ग्राफ (बी) आर्रेनिअस समीकरण के अनुसार है।
A. अभिक्रिया अधिक समय तक करवाने पर
B. ताप बढ़ाने पर
C. अभिकारकों की सांद्रता में वृद्धि करने पर
D. अभिकारकों की सांद्रता कम करने पर
चूँकि, log k = log A – Ea/2.303 RT होता है। अतः ताप में वृद्धि होने से k का मान बढ़ जाता है।
A.
पूर्णतः शुद्ध रूप में होता है।
B.
छोटे टुकड़ों के रूप में होता है।
C.
चूर्णित रूप में होता है।
D.
बड़े टुकड़ों के रूप में होता है।
चूर्णित रूप में पृष्ठीय क्षेत्रफल अधिकतम होता है।
A. 8
B. 4
C. 2
D. 1
fcc संरचना में फलक केंद्र पर उपस्थित प्रत्येक परमाणु दो निकटवर्ती एकक कोष्ठिकाओं के मध्य सहभाजित होता है। प्रत्येक फलक के केंद्र पर उपस्थित परमाणु दो सन्निकट के मध्य सहभाजित होता है तथा प्रत्येक परमाणु का केवल ½ भाग एक एकक कोष्ठिका में सम्मलित होता है। अतः प्रति एकक कोष्ठिका परमाणुओं की कुल संख्या चार होती है।
A. घनीय निविड संकुलन
B. षटकोणीय निविड संकुलन
C. वर्ग निविड संकुलन
D. अंतःकेन्द्रित निविड संकुलन
ccp संरचनाओं में आयरन, निकैल, कॉपर, सिल्वर, गोल्ड और एल्यूमीनियम क्रिस्टलीकृत होते हैं।
A. 4
B. 6
C. 8
D. 12
hcp व्यवस्था में परमाणु की उप सहसंयोजन संख्या 12 होती है।
A. त्रिसंयोजी अशुद्धता
B. चतुर्संयोजी अशुद्धता
C. पंचसंयोजी अशुद्धता
D. द्विसंयोजी अशुद्धता
चूँकि Ge समूह 14 का तत्व है। धनात्मक छिद्र को समूह 13 त्रिसंयोजी अशुद्धता के अपमिश्रण से बनाया जा सकता है।
A. n-प्रकार अर्धचालक
B. p- प्रकार अर्धचालक
C. धात्विक चालक
D. विद्युतरोधी
फॉस्फोरस का सिलिकॉन के साथ अपमिश्रण अतिरिक्त विस्थानित इलेक्ट्रॉन प्रदान करता है जिसके परिणामस्वरुप n-प्रकार अर्धचालक प्राप्त होता है।
A. फ्रेंकेल दोष
B. धातु आधिक्य दोष
C. ऊष्मागतिकी दोष
D. आंतर दोष
वे यौगिक जिसमें उपस्थित धनात्मक एवं ऋणात्मक आयनों का अनुपात भिन्न होता है जो उनके आदर्श रासायनिक सूत्र द्वारा आवश्यक होता है, नॉन स्टॉइकियोमीट्री यौगिक कहलाते हैं। धातु आधिक्य दोष में धनात्मक आयनों की अधिकता होती है।
A. घनीय
B. षट्कोणीय
C. विषमलंबाक्ष
D. त्रिसमनताक्ष
चूँकि दोनों भुजाएँ a और b बराबर हैं लेकिन दोनों c i.e. a=b≠c के लिए असमान होती हैं और 90° के दो कोणों अर्थात् a=b=90° तथा g=120° षट्कोणीय क्रिस्टल तंत्र हैं।
A. निकैल
B. ऑक्सीजन अणु
C. क्रोमियम ऑक्साइड (CrO2)
D. मैग्नेटाइट
मैग्नेटाइट (Fe3O4) में चुंबकीय डोमेनों का संरेखण समानांतर एवं प्रति समानांतर दिशाओं में असमान होता है जिसके परिणामस्वरुप चुंबकीय आघूर्ण होता है।
A. ऋणात्मक
B. धनात्मक
C. उदासीन
D. अशुद्धियों के सांद्रण पर निर्भर
जब सिलिकन अथवा जर्मेनियम को समूह 13 के तत्वों जैसे B अथवा Al से अपमिश्रित किया जाता है, तो वे निकटस्थ Si अथवा Ge के साथ तीन सहसंयोजक बंध बनाते हैं। इस प्रकार स्थल पर छिद्र उत्पन्न हो जाता है जहाँ चौथा इलेक्ट्रॉन नहीं होता है। निकटवर्ती परमाणु से इलेक्ट्रॉन आकर छिद्र को भर सकता है परंतु ऐसा करने पर वह अपने मूल स्थान पर छिद्र छोड़ जाता है। इससे सिलिकन अथवा जर्मेनियम अर्धचालक की वैद्युत चालकता बढ़ जाती है लेकिन यह वैद्युत रूप से उदासीन बना रहता है।
A. धनायनों एवं ऋणायनों की असमान संख्या जालक से लुप्त हो जाती हैं।
B. धनायनों एवं ऋणायनों की समान संख्या जालक से लुप्त हो जाती हैं।
C. आयन अपने वास्तविक स्थान को छोड़ देता है और अंतराकाशी स्थल को ग्रहण कर लेता है।
D. क्रिस्टल का घनत्व बढ़ जाता है।
यदि प्रकार A+B- के आयनिक क्रिस्टल में धनायनों एवं ऋणायनों की समान संख्या अपने जालक स्थलों से लुप्त हो जाती हैं और क्रिस्टल वैद्युत रूप से उदासीन रहता है तो यह दोष शॉट्की दोष कहलाता है। इसके परिणामस्वरुप क्रिस्टल के घनत्व में कमी आती है।
A. फ्रेंकेल दोष
B. अंतराकाशी स्थान
C. F-केंद्र
D. शॉट्की दोष
क्षारीय धातु हैलाइड में, ऋणायन रिक्तिकाएं उत्पन्न होती हैं और इन रिक्तियों में अध्यासित इलेक्ट्रॉनों को F-केंद्र के रूप में जाना जाता है। क्रिस्टल का रंग, ऋणायन रिक्तियों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के उत्तेजित होने के कारण उत्पन्न होता है ।
अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों द्वारा भरी ऋणायनिक रिक्तिकाओं को, F-केंद्र कहते हैं।
bcc की एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या 2 होती है और fcc में 4 होती है ।
(i) (Fe3O4) जब पदार्थ में डोमेनों के चुंबकीय आघूर्ण असमान संख्याओं में समानांतर एवं प्रतिसमानांतर दिशाओं में संरेखित होते हैं, तो इसका परिणाम शुद्ध चुंबकीय आघूर्ण होता है। इसे फेरीचुंबकत्व कहा जाता है। ये लौहचुंबकत्व पदार्थों की तुलना में चुंबकीय क्षेत्र द्वारा दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं। उदाहरणार्थ- मैग्नेटाइट (Fe3O4)
(ii) प्रतिलोहचुंबकत्व प्रदर्शित करने वाले पदार्थ जैसे MnO में डोमेनों संरचना लोहचुंबकीय पदार्थ के सदृश होती है परंतु उनके डोमेन एक दूसरे के विपरीत दिशा में अभिविन्यासित होते हैं तथा एक दूसरे के चुंबकीय आघूर्ण को निरस्त कर देते हैं।
उदाहरणार्थ- MnO
किसी क्रिस्टलीय पदार्थ में उचित अशुद्धि को उपयुक्त मात्रा में मिलाने की प्रक्रिया को अपमिश्रण कहते हैं। P, As, Sb जैसे इलेक्ट्रॉन धनी अशुद्धियों के साथ सिलिकन अथवा जरमेनियम के अपमिश्रण के परिणामस्वरुप n-प्रकार के अर्धचालक बनते हैं जबकि p-प्रकार के अर्धचालक B, Al, Ga जैसे समूह 13 के तत्वों को मिलाने से बनते हैं।
(i) अध्रुवी आण्विक ठोसों में, अवयवी कण अध्रुवी परमाणु या अणु होते हैं। अध्रुवी आण्विक ठोसों में परमाणु अथवा अणु दुर्बल परिक्षेपण बलों या लंदन बलों द्वारा बंधे रहते हैं। उदाहरणार्थ- I2
(ii) धात्विक ठोस, धनावेशित धातु आयनों से बने होते हैं, जो मुक्त इलेक्ट्रॉनों के समुद्र में घिरे रहते हैं। धात्विक ठोस, ऊष्मा और विद्युत के अच्छे चालक होते हैं। उदाहरणार्थ- Ag, Cu
(i) क्रिस्टल जालक त्रि-आयामी स्थान में क्रिस्टल के परमाणुओं, अणुओं या आयनों स्पष्ट सम व्यवस्था है।
(ii) संकुलन क्षमता कुल उपलब्ध स्थान का वह प्रतिशत है जो कणों द्वारा संपूरित होता है ।


(i) परमाणु एवं आयन गोलाकार आकार में होते हैं। परमाणुओं या आयनों के निविड संकुलन द्वारा निर्मित क्रिस्टल की स्थिति में गोले एक दूसरे को केवल बिन्दुओं पर स्पर्श करते हैं और उनके बीच कुछ खाली स्थान छोड़ देते हैं। यह स्थान रिक्ति या छिद्र कहलाता है।
(ii) चतुष्फलकीय रिक्ति चार गोलों (परमाणुओं) से घिरा रहती है, जो समचतुष्फलक के सिरे पर स्थित होती है जबकि अष्टफलकीय रिक्ति छः गोलों (परमाणुओं) से घिरा रहती है।
(iii)

A. 0.027
B. 0.036
C. 0.018
D. 0.009
एक मोलल जलीय विलयन में 1000 ग्राम (1000/18 = 55.55 जल के मोल) जल में एक मोल विलेय होता है। अतः, विलेय का मोल-अंश = 1 / (1 + 55.55) = 0.018 होगा।
A. उसकी मोललता बढ़ती है।
B. उसकी मोलरता बढ़ती है।
C. उसका मोल-अंश बढ़ता है।
D. उसका द्रव्यमान प्रतिशत (% w/w) बढ़ता है।
ताप कम करने पर, सामान्यतया विलयन का आयतन घटता है। विलयन की मोलरता विलयन के आयतन के व्युत्क्रमानुपाती होती है, अतः ताप घटने पर मोलरता बढ़ती है।
A. विलेय की प्रकृति पर
B. विलायक की प्रकृति पर
C. विलायक के हिमांक पर
D. विलयन के वाष्प दाब पर
हिमांक में अवनमन (Tf) Δ Tf = Kf.m तनु विलयन (आदर्श विलयन) के लिए समानुपातिक स्थिरांक K, विलयन की मोललता m के अनुक्रमानुपाती होता है। Kf, जो कि विलायक की प्रकृति पर निर्भर करता है, मोलल अवनमन स्थिरांक कहलाता है।
A. मोललता में कमी
B. मोलरता में कमी
C. मोल-अंश में कमी
D. द्रव्यमान प्रतिशत (% w/w) में कमी
एक लीटर विलयन में घुले हुए विलेय के मोलों की संख्या को उस विलयन की मोलरता कहते हैं। ताप बढ़ाने पर, विलयन का आयतन बढ़ता है, इसलिए मोलरता घटती है।
A. मोलों की संख्या
B. परमाणुओं की संख्या
C. सूत्र भार की संख्या
D. कुल परमाणुओं की संख्या
मोलरता विलयन की सांद्रता व्यक्त करने की विधि है। यह विलेय के मोलों की संख्या तथा विलयन के लीटर में आयतन का अनुपात होती है।
यह हेनरी नियम है तथा इस नियम में ताप को स्थिर रखा जाता है।
[हेनरी नियम के अनुसार, वाष्प प्रावस्था में गैस का आंशिक दाब स्थिर ताप पर विलयन में गैस के मोल-अंश के समानुपाती होता है।]
K4[Fe(CN)6] 4 K + + [Fe(CN)6]
चूँकि K4[Fe(CN)6] का एक अणु वियोजित होकर 5 आयनों में वियोजित होता है, इसलिए इसके वान्ट हॉफ गुणक का मान 5 होगा ।
ऐसीटिक अम्ल (CH3COOH) का सामान्य आण्विक द्रव्यमान 60 होता है। बेंजीन में घोलने पर इसका डाइमराइजेशन हो जाता है। इसलिए, बेंज़ीन में घुले होने पर ऐसीटिक अम्ल का आण्विक द्रव्यमान 120 होगा।
स्थिरक्वाथी ऐसे द्विअंगी मिश्रण होते हैं, जिनका द्रव व वाष्प प्रावस्था में संघटन समान होता है तथा ये एक स्थिर ताप पर उबलते हैं। नाइट्रिक अम्ल तथा जल का मिश्रण अधिकतम क्वथनांकी स्थिरक्वाथी का एक उदाहरण है।


(i) क्लोरोफार्म तथा ऐसीटोन को मिलाने से बना विलयन, आदर्श व्यवहार से ऋणात्मक विचलन प्रदर्शित करता है।
(ii) परिणामी विलयन आदर्श व्यवहार से ऋणात्मक विचलन प्रदर्शित करता है क्योंकि ऐसीटोन तथा क्लोरोफार्म अणुओं के मध्य अंतर-आण्विक हाइड्रोजन आबंध बनते हैं। चूँकि हाइड्रोजन आबंध तुलनात्मक रूप से प्रबल आकर्षण बल होते हैं,अतः विलयन का आयतन घटता है। इसलिए परिणामी विलयन का आयतन100mLसे कम होगा।
(iii) विलयन का वाष्प दाब घटता है क्योंकि नए बने हाइड्रोजन आबंध पृथक विलयनों में उपस्थित मूल आकर्षण बल से प्रबल होते हैं।



1. जब Al2(SO4)3 को जल में घोला जाता है, तो इसका एक अणु 2 Al3+ तथा 3 आयनों में वियोजित हो जाता है, इसलिए इसका वान्ट हॉफ गुणक 5 है।
2. जब MgCl2 को जल में घोला जाता है, तो इसका एक अणु 1 Mg2+ तथा 2Cl– आयनों में वियोजित हो जाता है, इसलिए इसका वान्ट हॉफ गुणक 3 है।
3. जब बेंजोइक अम्ल को बेंजीन में घोला जाता है, तो इसके दो अणु संगुणित होकर द्वितय बनाते हैं। इसलिए इसका वान्ट हॉफ गुणक 1/2 है।
4. ग्लूकोस का संगुणन अथवा वियोजन नहीं होता है, इसलिए ग्लूकोस का वान्ट हॉफ गुणक 1 है।
5. जब KCl को जल में घोला जाता है, तो इसका प्रत्येक अणु दो आयनों में वियोजित हो जाता है, इसलिए इसका वान्ट हॉफ गुणक 2 है।
A. 273 K
B. 300 K
C. 298 K
D. 323 K
SHE में काँच की ट्यूब में सीलबंद प्लैटिनम तार होते हैं और इससे प्लैटिनम की पतली पट्टी संलग्न होती है। यह पट्टी प्लैटिनम ब्लैक से लेपित होती है और यह 1M HCl में डूबी रहती है। 1 atm दाब पर शुद्ध हाइड्रोजन गैस को 298 K स्थिर ताप पर विलयन में निरंतर प्रवाहित किया जाता है।
A. इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह Cu इलेक्ट्रोड से Zn इलेक्ट्रोड की ओर होता है।
B. धारा प्रवाह Zn इलेक्ट्रोड से Cu इलेक्ट्रोड की ओर होता है।
C. धनायन Cu इलेक्ट्रोड की ओर गति करते हैं।
D. धनायन Zn इलेक्ट्रोड की ओर गति करते हैं।
Cu2+ आयन इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण करते हैं और कॉपर इलेक्ट्रोड पर निक्षेपित होते हैं।
A. कार्बन छड़
B. लेड डाइऑक्साइड
C. ग्रेफाइट छड़
D. निकैल ऑक्साइड
शुष्क सेल में गोल जिंक का पात्र ऐनोड का कार्य करता है और ग्रेफाईट की छड़ कैथोड का करती है।
A. ओम सेमी –1
B. ओम सेमी –2
C. ओम –1 सेमी
D. ओम –1 सेमी –1
विशिष्ट चालकता प्रतिरोधकता का व्युत्क्रम होती है, अर्थात्

(i) शॉट्की दोष –जालक स्थल से बराबर संख्या में धनायन और ऋणायन लुप्त होने के कारण उत्पन्न दोष शॉट्की दोष कहलाता है। वैद्युत उदासीनता को बनाए रखने के लिए लुप्त होने वाले धनायनों एवं ऋणायनों की संख्या बराबर होती है। यह दोष पदार्थ के घनत्व को घटाता है।
(ii) फ़्रेंकेल दोष –जालक स्थल से आयनों के लुप्त होने और अंतराकाशी स्थल ग्रहण करने के कारण उत्पन्न दोष को फ़्रेंकेल दोष कहते हैं । फ़्रेंकेल दोष में पदार्थ का घनत्व अपरिवर्तित रहता है।
(iii) बिंदु दोष - एक क्रिस्टलीय पदार्थ में एक बिंदु अथवा एक परमाणु के चारों ओर की आदर्श व्यवस्था में अनियमितताएँ बिंदु दोष कहलाते हैं। ये दोष क्रिस्टलीकरण के दौरान अपूर्ण संकुलन के कारण होते हैं।
(iv) अंतराकाशी दोष – अंतराकाशी दोष में कुछ अतिरिक्त अवयवी कण, अंतराकाशी स्थलों पर पाये जाते हैं। अंतराकाशी दोष पदार्थ के घनत्व को बढ़ाता है।
(v) रिक्तिका –जब कोई अवयवी कण क्रिस्टल जालक से लुप्त हो जाता है, तो वह रिक्त स्थान रिक्तिका कहलाता है।
A. एथेनॉल और ऐसीटोन
B. बेंज़ीन और टॉलूइन
C. ऐसीटोन और क्लोरोफॉर्म
D. ऐसीटोन और कार्बन डाइसल्फाइड
ऐसीटोन और क्लोरोफॉर्म को मिश्रित करने पर, द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्यक्रिया होती हैं। अतः, इसमें राउल्ट के नियम से ऋणात्मक विचलन होता है।
A. जल और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल को
B. जल और हाइड्रोआयोडिक अम्ल को
C. जल और एथेनॉल को
D. जल और नाइट्रिक अम्ल
जल और एथेनॉल के क्वथनांक क्रमशः 373K और 351.3K होते हैं, किंतु उनके स्थिरक्वाथी मिश्रण 351.15 K पर उबलते हैं।
A. जल और नाइट्रिक अम्ल का विलयन
B. जल और एथेनॉल का विलयन
C. बेंज़ीन और टॉलूईन का विलयन
D. बेंज़ीन और ऐसीटिक अम्ल का विलयन
जल और नाइट्रिक अम्ल का विलयन आदर्श व्यवहार से ऋणात्मक विचलन दर्शाता है। जल और नाइट्रिक अम्ल का क्वथनांक क्रमशः 373K और 359 K है, किंतु यह विलयन 393.5K पर उबलता है।
A. विलेय के मोलों और विलायक के मोलों का
B. विलेय के मोलों और विलयन के कुल मोलों का
C. विलायक के मोलों और विलयन के कुल मोलों का
D. विलायक के मोलों और विलेय के कुल आयनों का
A. मोललता
B. मोलरता
C. नार्मलता
D. द्रव्यमान आयतन प्रतिशत