A. अर्धपारगम्य झिल्ली के दोनों ओर एक-समान दर से
B. अर्धपारगम्य झिल्ली के दोनों ओर असमान दर से
C. तनु विलयन से सांद्र विलयन की ओर
D. सांद्र विलयन से तनु विलयन की ओर
परासरण, अर्धपारगम्य झिल्ली से शुद्ध विलायक का विलयन की ओर अर्थात तनु विलयन से सांद्र विलयन की ओर प्रवाह होता है।
A. उच्च दाब और उच्च ताप पर
B. निम्न दाब और निम्न ताप पर
C. उच्च दाब और निम्न ताप पर
D. निम्न दाब और उच्च ताप पर
हेनरी के नियम के अनुसार स्थिर ताप पर साम्यावस्था में किसी गैस की द्रव में विलेयता गैस के दाब के समानुपाती होती है। यह तभी लागू होता है जब वास्तविक गैस, आदर्श गैस की तरह व्यवहार करती है अर्थात जब दाब निम्न और ताप उच्च होता है।
A. ऐसीटोन-क्लोरोफॉर्म
B. बेंज़ीन-ऐसीटोन
C. जल-एथेनॉल
D. क्लोरोफॉर्म-कार्बन टेट्राक्लोराइड
अनादर्श विलयन राउल्ट के नियम से धनात्मक अथवा ऋणात्मक विचलन दर्शाता है। राउल्ट के नियम से धनात्मक विचलन दर्शाने वाले विलयनों की विरचन की ऊष्मा और मिश्रण का आयतन दोनों धनात्मक होते हैं। राउल्ट के नियम से ऋणात्मक विचलन दर्शाने वाले विलयनों की विरचन की ऊष्मा और मिश्रण का आयतन दोनों ऋणात्मक होते हैं। एसीटोन-क्लोरोफॉर्म विलयन ऋणात्मक विचलन दर्शाता है।
A. हिमांक में अवनमन
B. क्वथनांक में उन्नयन
C. परासरण दाब
D. वाष्प दाब
अणुसंख्य गुणधर्म का मान कणों की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि यह कणों की संख्या पर निर्भर करता है।
A. मुक्त उर्जा में परिवर्तन
B. दाब में परिवर्तन
C. वाष्पीकरण की ऊष्मा
D. परासरण दाब
विलयन के वे गुण जो विलायक की निश्चित मात्रा में घुली हुई विलेय (अणुओं या आयनों) के कणों की संख्या पर निर्भर करते हैं अणुसंख्य गुणधर्म कहलाते हैं। ये गुण विलेय की प्रकृति पर निर्भर नहीं करते हैं। यहाँ पर केवल परासरण दाब ही कणों की संख्या पर निर्भर करता है। अतः यह एक अणुसंख्य गुणधर्म है।
A. सिकुड़ जाता है।
B. फूल जाता है।
C. पक जाता है।
D. अप्रभावित रहता है।
विलायक कणों का निम्न सांद्रता से उच्च सांद्रता की ओर संचलन परासरण है। आम में जल के संचलन के कारण आम फूल जाता है।
A. राउल्ट के नियम से धनात्मक विचलन ।
B. राउल्ट के नियम से ऋणात्मक विचलन ।
C. राउल्ट के नियम का पालन ।
D. आदर्श विलयन की तरह व्यवहार ।
जब ऐसीटोन को एथेनॉल में मिलाया जाता है, तो ऐसीटोन के अणु एथेनॉल अणुओं के मध्य के स्थान को ग्रहण कर लेते हैं। परिणामस्वरूप, एल्कोहॉल अणुओं के मध्य उपस्थित कुछ हाइड्रोजन आबंध टूट जाते हैं और एल्कोहॉल अणुओं के मध्य आकर्षण बल दुर्बल हो जाते हैं तथा एथेनॉल और ऐसीटोन अणुओं की पलायन की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप, विलयन का वाष्प दाब अपेक्षित वाष्प दाब से अधिक हो जाता है।
A. विलेय के अंतराआण्विक बलों पर
B. विलायक के अणुभार पर
C. विलयन की सांद्रता पर
D. विलायक की गतिज ऊर्जा पर
अर्धपारगम्य झिल्ली में से विलायक का तनु विलयन से सांद्र विलयन की ओर प्रवाह, परासरण के कारण होता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि विलायक के अणु हमेशा विलयन की निम्न सांद्रता से उच्च सांद्रता की ओर प्रवाहित होते हैं। अतः परासरण दाब विलयन की सांद्रता पर निर्भर करता है।
A. केवल गैस की प्रकृति पर
B. केवल ताप पर
C. केवल गैस के आयतन पर
D. गैस के दाब, ताप और प्रकृति पर
हेनरी नियम के अनुसार स्थिर ताप पर किसी गैस की द्रव में विलेयता साम्यावस्था पर गैस के दाब के समानुपाती होती है।
A. 1:2:3
B. 3:2:2
C. 1:1:2
D. 3:1:2
हिमांक में अवनमन अणुसंख्य गुणधर्म है। यूरिया, ग्लूकोस और सोडियम क्लोराइड में कणों की मोलर सांद्रता का अनुपात 1: 1: 2 है, अतः इनके हिमांक में अवनमन का अनुपात भी समान होगा। राउल्ट के नियम के अनुसार जब एक अवाष्पशील ठोस विलायक में मिलाया जाता है तो विलायक का वाष्प दाब कम हो जाता है और अब इसका वाष्पदाब कुछ कम ताप पर ठोस विलायक के वाष्पदाब के बराबर होता है।
A. विलेय की प्रकृति पर
B. विलायक की प्रकृति पर
C. विलायक के क्वथनांक पर
D. विलयन के वाष्प दाब पर
मोलल उन्नयन स्थिरांक (Kb) को 1 kg विलायक में 1 मोल विलेय घोलने पर क्वथनांक में उन्नयन के रूप में परिभाषित किया जाता है। Kb की इकाई केल्विन किलोग्राम प्रतिमोल होती है।
A. उच्च दाब भोजन को नरम कर देता है।
B. निम्न दाब भोजन को नरम कर देता है।
C. कुकर के अंदर जल का क्वथनांक अधिक हो जाता है।
D. कुकर के अंदर जल का क्वथनांक कम हो जाता है।
द्रव का क्वथनांक वह ताप है जिस पर इसका वाष्प दाब वायुमंडलीय दाब के बराबर हो जाता है। प्रेशर कुकर के अंदर दाब अधिक होता है, इसलिए इसके अंदर जल का क्वथनांक भी बढ़ जाता है और भोजन कम समय में पक जाता है।
A. 0.062
B. 0.62
C. 6.2
D. 0.0062
आण्विकता |
कोटि |
|
1. यह अणुओं की कुल संख्या होती है, जो संतुलित रासायनिक अभिक्रिया में उपस्थित होती है, जिनसे उत्पादों का निर्माण होता है। |
1. यह अणुओं की कुल संख्या होती है जिनकी सांद्रता परिवर्तित होती है। |
|
2. अभिक्रिया की आण्विकता कभी भी भिन्न संख्या नहीं हो सकती है। |
2.अभिक्रिया की कोटि भिन्न संख्या हो सकती है। |
|
3. अभिक्रिया की आण्विकता शून्य नहीं हो सकती है। |
3.अभिक्रिया की कोटि शून्य हो सकती है। |
(i) अभिक्रिया की आण्विकता 3 है तथा अभिक्रिया की कोटि भी 3 है।
(ii) वेग = 2.0 x 10-6 x 0.1 x 0.2 x 0.2
= 8 x 10-9 mol L-1s-1
(iii) atm-2 s-1
(i)
|
अभिक्रिया वेग |
वेग स्थिरांक |
|
प्रति इकाई समय में अभिक्रियक की सांद्रता में परिवर्तन |
वेग नियम समीकरण में समानुपातन स्थिरांक |
|
किसी निश्चित समय पर अभिक्रियकों की मोलर सांद्रताओं पर निर्भर करता है। |
अभिक्रियक की मोलर सांद्रता पर निर्भर नहीं करता है। |
|
अभिक्रिया वेग की इकाई हमेशा mol L-1s-1 होती है। |
इकाई अभिक्रिया की कोटि पर निर्भर करती है। |
(ii)
(iii) तापमान में वृद्धि के साथ अभिक्रिया वेग में वृद्धि मुख्यतः प्रभावी संघट्टों की संख्या में वृद्धि के कारण होती है।
A. ब्राउनी गति
B. वैद्युत परासरण
C. टिंडल प्रभाव
D. वैद्युत् अपोहन
टिंडल ने इस परिघटना को 1869 में प्रेक्षित किया था। यह कोलॉइडी कणों की विषमांगी प्रकृति की पुष्टि करने में सहायक है।
A. हरे प्रकाश के
B. लाल प्रकाश के
C. श्वेत प्रकाश के
D. नीले प्रकाश के
हवा में जल के साथ निलंबित धूल के कण हमारी आँखों तक पहुँचने वाले नीले प्रकाश को प्रकीर्णित करते हैं एवं हमें आकाश नीला दिखाई देता है।
A. अमोनिया उत्पादन का हाबर प्रक्रम
B. संपर्क प्रक्रम में SO2 का SO3 में उत्प्रेरकी रूपांतरण
C. तेलों का उत्प्रेरकी हाइड्रोजनीकरण
D. मेथिल एसिटेट का अम्लीय जल अपघटन
मेथिल एसीटेट के अम्लीय जल अपघटन में उत्प्रेरक और अभिकर्मक दोनों एक ही प्रावस्था (द्रव) में होते हैं।
A. जल से कम होता है।
B. जल से अधिक होता है।
C. जल के बराबर होता है।
D. जल से कम या अधिक हो सकता है।
जलरागी सॉल का जल के प्रति आकर्षण होता है। जलरागी सॉल का पृष्ठ तनाव जल से कम होता है।
A. गोंद
B. जिलेटिन
C. स्टार्च
D. धातु सल्फाइड
ये सॉल आसानी से अवक्षेपित हो जाते हैं, अतः ये स्थायी नहीं होते हैं।
A. धुँआ
B. झाग
C. धुँध
D. दूध
पायस, कोलॉइडी परिक्षेपण है जिसमें परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम दोनों द्रव होते हैं।
A. 10-9 से 104
B. 10-9 से 10-6
C. 10-7 से 10-4
D. 10-7 से 10-6
कोलॉइडी कणों के आकार यथार्थ विलयन और निलंबन के मध्य का होता है।
A. ऐल्कोसॉल
B. बेन्जोसॉल
C. एरोसॉल
D. हाइड्रोसॉल
परिक्षेपण माध्यम में पदार्थ कोलॉइडी कणों के रूप में परिक्षिप्त प्रावस्था में रहता है।
A. N2
B. CO2
C. Cl2
D. O2
अधिक क्रांतिक ताप वाली गैसें आसानी से द्रवित हो जाती है और यह अधिक मात्रा में अधिशोषित होती हैं।
A. सोडियम स्टिऐरेट
B. गोल्ड सॉल
C. NaCl का विलयन
D. माणिक्य
सोडियम स्टिऐरेट मिसेल बनाता है और इसका उपयोग तेलयुक्त गंदगी वाले गंदे कपड़े को धोने के लिए किया जाता है। वास्तव में, सोडियम स्टिऐरेट अणु (C17H35COONa) के दो भाग होते हैं: लंबी श्रृंखला वाला हाइड्रोकार्बन भाग (C17H35) और ध्रुवीय भाग (-COONa)। हाइड्रोकार्बन भाग जल विरोधी प्रकृति का होता है जो तेलयुक्त गंदगी से जुड़ जाता है और ध्रुवीय भाग जल में ही रहता है और इस प्रकार मिसेल बनता है।
A. अपोहन द्वारा
B. वैद्युत परासरण द्वारा
C. स्कंदन द्वारा
D. निस्यंदन द्वारा
मानव शरीर में रक्त, जो कि कोलॉइडी प्रकृति की होता है, उसको शुद्ध करने के लिए किडनी अपोहक की तरह कार्य करती है। कृत्रिम किडनी भी अपोहन के सिद्धांत पर ही कार्य करती है।
A. एथेन
B. मेथेन
C. सल्फर डाइऑक्साइड
D. डाइहाइड्रोजन
ठोस द्वारा अधिशोषित गैस की मात्रा गैस की प्रकृति पर निर्भर करती है। सामान्यत: अधिक आसानी से द्रवित की जा सकने वाली गैसें (अर्थात उच्च क्रांतिक ताप वाली) आसानी से अधिशोषित होती हैं, क्योंकि क्रांतिक ताप पर वान्डर वाल्स बल प्रबल होते हैं। अतः 1 ग्राम सक्रियित चारकोल, मेथेन (क्रांतिक ताप 190 K) की अपेक्षा सल्फर डाइऑक्साइड (क्रांतिक ताप 630K) को अधिक अधिशोषित करता है।
A. NaCl के लिए
B. BaCl2 के लिए
C. K2CrO4 के लिए
D. K3[Fe(CN)6] के लिए
फेरिक हाइड्रॉक्साइड एक धनात्मक सॉल है अतः यह K3[Fe(CN)6] का सबसे अधिक स्कंदन करता है क्योंकि इस पर सबसे अधिक ऋणावेश होता है।
A. ब्राउनी गति
B. वैद्युत परासरण
C. वैद्युतकणसंचलन
D. विद्युत अपोहन
कोलॉइडी विलयन में विद्युतधारा प्रवाहित करने पर उसके कणों की गति वैद्युतकण संचलन कहलाती है।
A. उनके कणों पर उपस्थित आवेश
B. उनके कणों का आकार बड़ा होना
C. उनके कणों का आकार छोटा होना
D. परिक्षेपण माध्यम की परत उपस्थित होना
द्रवरागी कोलॉइड का स्थायित्व सॉल कणों के चारों ओर परिक्षेपण माध्यम की परत की उपस्थिति के कारण होता है|
A. रसायनज्ञों द्वारा कपड़े धोने के पाउडर को सक्रियित करने के लिए बनाये गए पदार्थ
B. अति क्रियाशील वनस्पति उत्प्रेरक
C. जीवों में पाए जाने वाले उत्प्रेरक
D. संश्लेषिक उत्प्रेरक
एन्जाइम जटिल नाइट्रोजनी कार्बनिक यौगिक होते हैं जो कि जीवित पौधों एवं जन्तुओं में निर्मित होते हैं। ये अत्यंत विशिष्ट प्रकृति के होते हैं।
A. यह एक छोटा अणु होता है।
B. यह ऋणायन आवेशित आयन होता है।
C. इसमें इलेक्ट्रॉनों के असहभाजित युग्म होते हैं।
D. यह धनायन आवेशित आयन होता है।
उपसहसंयोजन यौगिक में, केंद्रीय धातु धनायन की द्वितीयक संयोजकता उस स्पीशीज द्वारा संतुष्ट की जाती है जिसमें इलेक्ट्रॉन का असहभाजित युग्म होता है और वह इस असहभाजित युग्म से दाता आबंध बनाता है। अतः लिगन्ड पर असहभाजित इलेक्ट्रॉन युग्म का उपस्थित होना आवश्यक है।
A. ध्रुवण समावयवता
B. उपसहसंयोजन समावयवता
C. विलायकयोजन समावयवता
D. स्थिति समावयवता
संकुल में उपस्थित भिन्न धातु आयनों की धनायनिक एवं ऋणायनिक सत्ता के मध्य लिगन्डों का अंतरपरिवर्तन के कारण यौगिक उपसहसंयोजन समावयवता प्रदर्शित करता है। उदाहरणार्थ: Co(NH3)6][Cr(CN)6]
A. [Pt (gly)2]
B. [Pt Cl2 (py)2]
C. [Ni (CH2NH2COO)2]
D. [Pt (NH3)2 Cl2]
उपसहसंयोजन संख्या 4 के लिए, वर्ग समतलीय संकुल ध्रुवण समावयवता प्रदर्शित नहीं करते हैं क्योंकि उनमें सममिति तल होता है लेकिन असममित उभयदंती लिगन्ड वाले चतुष्फलकीय संकुल ध्रुवण समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
A. मैग्नीशियम आयन
B. आयरन आयन
C. कोबाल्ट आयन
D. क्रोमियम आयन
विटामिन B12 रासायनिक रूप से सायनोकोबालऐमीन और कोबाल्ट एवं कोरिन वलय अणुओं का समुच्चय है।
A. हेक्साऐम्मीनक्रोमियम(III)हेक्सासायनोकोबाल्ट(III)
B. हेक्सासायनोकोबाल्ट (III)हेक्साऐम्मीनक्रोमिमेट(III)
C. हेक्साऐम्मीनक्रोमियम(III)हेक्सासायनोकोबाल्टेट (III)
D. हेक्सासायनोकोबाल्टेट (III) हेक्साऐम्मीनक्रोमियम (III)
[Cr(NH3)6][Co(CN)6] में, धनायन तथा ऋणायन दोनों संकुल होते हैं।
इस प्रकार Cr तथा Co की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्रमशः 3 तथा 3 होती हैं।
संकुल का नामकरण करते समय धनावेशित संकुल को प्राथमिकता दी जाती है तथा ऋणावेशित संकुल में धातु के नाम के अंत में ऐट जोड़ दिया जाता है।
A. उपसहसंयोजन समावयवता
B. बंधनी समावयवता
C. ज्यामितीय समावयवता
D. ध्रुवण समावयवता
[Fe(NO2)3Cl3] तथा [Fe(ONO)3Cl3] बंधनी समावयवता प्रदर्शित करते हैं। उभयदंतुर लिगन्ड युक्त उपसहसंयोजन यौगिकों में बंधनी समावयवता पायी जाती है। NO2 एक उभयदंतुर लिगन्ड है।
A. 2
B. 3
C. 6
D. 1
चूँकि EDTA एक षटदंतुर लिगन्ड है, इसलिए EDTA का केवल एक अणु इसके अष्टफलकीय संकुल में Ca2+ आयनों की द्वितीयक संयोजकताओं को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त होता है।
A. क्युप्रेमोनियम सल्फेट
B. मोर लवण
C. पोटैशियम फेरीसायनाइड
D. कोबाल्ट हेक्साएम्मीन क्लोराइड
जलीय विलयन में, मोर लवण दो भिन्न प्रकार के लवण प्रदान करता है। इसलिए यह एक द्विलवण है।
उपसहसंयोजन यौगिकों का वह भाग जो गुरू कोष्ठक में लिखा होता है, उपसहसंयोजन सत्ता अथवा उपसहसंयोजन मंडल कहलाता है।
बहुदंतुर लिगंड जो दो या दो से अधिक दाता परमाणुओं से केंद्रीय धातु आयन से जुड़े होते हैं और इसके चारों ओर एक या एक से अधिक वलय का निर्माण करते हैं, कीलेटीकारक अथवा कीलेटिंग लिगंड कहलाते हैं।

वे यौगिक जिनके आण्विक सूत्र समान होते हैं, लेकिन केंद्रीय परमाणु अथवा आयन पर बंधित लिगन्ड भिन्न-भिन्न हो, बंधनी समावयवी कहलाते हैं और यह परिघटना बंधनी समावयवता कहलाती है।
उदाहरणार्थ: [Co(ONO)(NH3)5]Cl2 और [Co(NO2)(NH3)5]Cl2
वे संकुल यौगिक जिनमें संक्रमण धातु परमाणु अनेक ऋणायनों अथवा उदासीन अणुओं से परिबद्ध रहते हैं, उपसहसंयोजक यौगिक कहलाते हैं।
संकुल के स्थायित्व को प्रभावित करने वाले कारक निम्न हैं:
1. केंद्रीय धातु आयन की प्रकृति: अधिक आवेश तथा छोटा आयनिक आकार संकुल के स्थायित्व में सहायक होता है। अतः, अधिक आवेश वाला छोटा आयन अधिक स्थायी संकुल बनाएगा।
2. लिगन्ड की प्रकृति: लिगन्ड इलेक्ट्रॉन दाता परमाणु होते हैं। सामान्यतः इनमें एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म रखने वाले एक या एक से अधिक परमाणु होते हैं। लिगन्ड लूईस क्षारों के समान व्यवहार दर्शाते हैं।

धातु कार्बोनिल की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं:
1. सभी कार्बोनिल सहसंयोजक यौगिक होते हैं और इसलिए कार्बनिक विलायकों में आसानी से घुल जाते हैं।
2. Ni(CO)4, Fe(CO)5, Ru(CO)5 तथा Os(CO)5 द्रव होते हैं, जबकि अन्य सभी क्रिस्टलीय ठोस होते हैं। ये कम ताप पर द्रवित या विघटित हो जाते हैं।
3. V(CO)6 को छोड़कर, अन्य सभी कार्बोनिल प्रतिचुंबकीय होते हैं।
4. V(CO)6 एक आयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति के कारण अनुचुंबकीय होता है।
संयोजकता आबंध सिद्धांत संकुलों के ज्यामिती तथा चुंबकीय व्यवहार को गुणात्मक रूप से समझाने में सफल रहा। किन्तु यह निम्नलिखित की व्याख्या नहीं कर सका:
1. उनके अवशोषण स्पेक्ट्रम की उत्पत्ति को समझाया नहीं जा सका।
2. विभिन्न संकुलों के सापेक्ष स्थायित्व को नहीं समझाया जा सका।
3. एक ही धातु के विभिन्न संकुल अलग-अलग रंग क्यों प्रदर्शित करते हैं?
4. क्यों कुछ लिगन्ड उच्च प्रचक्रण संकुल बनाते हैं जबकि अन्य लिगन्ड निम्न प्रचक्रण संकुल बनाते हैं?
(i) [Ni(CO)4] - टेट्राकार्बोनिलनिकैल(0)
(ii) [CoCl2(en)2]SO4 - डाइक्लोरोबिस (एथिलीनडाइऐमीन) कोबाल्ट (III) सल्फेट
(iii) [PtClNO2(NH3)4]SO4 – टेट्राऐम्मीनक्लोरोनाइट्रोप्लैटिनम (IV) सल्फेट
ज्यामितीय समावयवता 4 अथवा 6 उपसहसंयोजन संख्या वाले द्विप्रतिस्थापित संकुलों में पाई जाती है, जिसमें क्रमशः वर्ग समतली तथा अष्टफलकीय विन्यास होते हैं। जब समान समूह एक-दूसरे के विपरीत होते हैं, तो इसे विपक्ष समावयव कहा जाता है, वहीं जब समान समूह एक ही दिशा में होते हैं, तो यह समपक्ष समावयव कहलाते हैं।

A.
एटार्ड अभिक्रिया
B.
मेंडियस अभिक्रिया
C.
रोजेनमुन्ड अभिक्रिया
D.
गाटरमान अभिक्रिया
गाटरमान अभिक्रिया में, ताम्र चूर्ण की उपस्थिति में डाइऐज़ोनियम लवण को हैलोजन अम्ल के साथ गरम करने पर उसके संगत हैलोबेंजीन बनते हैं। सैंडमायर अभिक्रिया की तुलना में गाटरमान अभिक्रिया की लब्धि कम होती है।
A.
फेनिल आइसोसायनाइड बनता है।
B.
फीनॉल बनता है।
C.
बेंज़ीन बनती है।
D. आयोडोबेंज़ीन बनती है।
यह डाइएज़ो समूह के प्रतिस्थापन की अभिक्रिया है जिसके लिए उत्प्रेरक के रूप में क्यूप्रस हैलाइड अथवा कॉपर की आवश्यकता नहीं होती है।
A. शॉटन बोमान अभिक्रिया
B. हॉफमान ब्रोमेमाइड अभिक्रिया
C. गाटरमान अभिक्रिया
D. सैंडमायर अभिक्रिया
जब बेंज़ीनडाइऐज़ोनियम लवण को क्यूपरस क्लोराइड तथा हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के साथ गरम किया जाता है तो क्लोरोबेंजीन का निर्माण होता है। इस अभिक्रिया को सैंडमायर अभिक्रिया कहते है।
A. पीले रंग
B. नारंगी रंग
C. हरे रंग
D. लाल रंग
ऐज़ो यौगिकों का रंग, असंतृप्त केंद्र अथवा क्रोमोफोरिक समूह के कारण होता है तथा दोनों ऐरोमैटिक वलयों एवं इन्हें जोड़ने वाले –N=N– द्विबन्ध के बीच विस्तारित संयुग्मन होता है।
A.
डाइऐज़ोनियम लवण
B.
क्लोरोऐनिलीन
C.
D. फेनिलहाइड्राजीन
यह प्रक्रम डाइऐज़ोकरण कहलाता है।
A.
क्लोरोबेंज़ीन
B.
फीनॉल
C.
बेंज़ीन
D.
टॉलूईन
बेंज़ीनडाइऐज़ोनियम क्लोराइड, फ़ीनॉल से अभिक्रिया करके पैरा- हाइड्रोक्सीऐज़ोबेंज़ीन अथवा नारंगी रंजक बनाता है। दो बेंज़ीन वलय नाइट्रोजन सेतु से जुड़े होते हैं।
A.
आर्थो तथा
B.
C.
D.
केवल
ऐनिलीन कक्ष ताप पर ब्रोमीन जल से अभिक्रिया करके 2,4,6- ट्राइब्रोमोऐनिलीन का सफ़ेद अवक्षेप बनाती है। ऐनिलीन + Br2 जल → 2,4,6- ट्राइब्रोमोऐनिलीन
A. डाइऐल्किलअमोनियम नाइट्राइट
B. ट्राइऐल्किलअमोनियम नाइट्राइट
C. डाइऐज़ोनियम लवण
D.
ऐलीफैटिक तथा ऐरोमैटिक- दोनों द्वितीयक ऐमीन नाइट्रस अम्ल के साथ अभिक्रिया करके N-नाइट्रोसोऐमीन उत्पन्न करते हैं, जो तनु खनिज लवणों में अविलेय होने के कारण पीले रंग के तैलीय यौगिकों के रूप में पृथक हो जाते हैं।
A.
B.
C.
D.
यह अभिक्रिया दर्शाती है कि (X) एक ऐमाइड है तथा (Y) प्राथमिक 1º ऐमीन है। (क्योंकि केवल प्राथमिक ऐमीन ही कार्बिलऐमीन परीक्षण दर्शाती हैं। )
A.
B.
C.
D.
द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीन यह परीक्षण नहीं दर्शाती हैं जबकि प्राथमिक ऐमीन यह परीक्षण दर्शाती है।
A.
B.
C.
D.
बेंज़ोनाइट्राइल फेनिल सायनाइड C6H5CN है।
A.
टारट्रेट ऋणायन से कॉपर आयनों का संकुलन
B.
बेंज़ीन सल्फोनिल क्लोराइड
C.
D.
टारट्रेट ऋणायन से जिंक आयनों का संकुलन
हिन्सबर्ग अभिकर्मक C6H4SO2Cl है। इसका उपयोग प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक ऐमीन के मध्य विभेद के लिए किया जाता है।
A.
फेनिल आइसोसायनाइड बनता है।
B.
फीनॉल बनता है।
C.
बेंजीन बनती है।
D. ऐनिलीन बनती है।
A. एसिटिलीकरण
B. ऐसिलन
C. डाइऐज़ोकरण
D. बेंज़ाइलन
प्राथमिक ऐरोमैटिक ऐमीन के डाइऐज़ोनियम लवण में परिवर्तन को डाइऐज़ोकरण कहते हैं।
A.
केवल
B.
केवल
C.
केवल
D.
ऐनिलीन में -NH2 समूह में o, p-निर्देशक होता है क्योंकि यह इन स्थानों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व में वृद्धि करता है।
A.
इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन का
B.
नाभिकरागी प्रतिस्थापन का
C.
इलेक्ट्रॉनरागी योगज का
D.
नाभिकरागी योगज का
बेंजीन डाइऐज़ोनियम क्लोराइड फीनॉल से अभिक्रिया करने पर इसके पैरा स्थान पर डाइऐज़ोनियम लवण से युग्मित होकर p-हाइड्रोक्सीऐज़ोबेंजीन बनाता है।
A.
कम
B.
अधिक
C.
शून्य
D.
एक
pKb का मान जितना कम होता है, क्षार उतना प्रबल होता है।
A.
गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण
B.
राइमर-टीमान अभिक्रिया
C.
ऐल्केनों का अमोनीअपघटन
D.
कार्बिलऐमीन अभिक्रिया
गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण द्वारा प्राथमिक ऐमीन का निर्माण होता है। कार्बिलऐमीन अभिक्रिया द्वारा आइसोसायनाइड बनते हैं। राइमर-टीमान अभिक्रिया एल्डिहाइड देती है।
A.
ऐनिलीन
B.
C.
D.
इलेक्ट्रॉन मुक्त करने वाले समूह (मेथिल) क्षारकीय प्राबल्य में वृद्धि करते हैं।
A.
एथिल आयोडाइड पर अमोनिया की अभिक्रिया द्वारा
B.
एथिल ऐल्कोहॉल पर अमोनिया की अभिक्रिया द्वारा
C.
एथिल आयोडाइड पर अमोनिया की अभिक्रिया द्वारा तथा एथिल ऐल्कोहॉल पर अमोनिया की अभिक्रिया द्वारा
D.
मेथिल ऐल्कोहॉल पर अमोनिया की अभिक्रिया द्वारा
एथिल ऐमीन के विरचन के लिए दोनों अभिक्रियाएँ अर्थात एथिल आयोडाइड पर अमोनिया की अभिक्रिया तथा एथिल ऐल्कोहॉल पर अमोनिया की अभिक्रिया उपयोग की जाती हैं।
हम 'हिंसबर्ग परीक्षण' से प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक ऐमीनों को पृथक कर सकते हैं। जब ऐमीन, बेंजीन सल्फोनिल क्लोराइड के गर्म किए जाते है, तो निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं:
(i) प्राथमिक ऐमीन मोनोऐल्किल बेंजीन सल्फोनैमाइड बनाते हैं, जो KOH में विलेय होता है।

(ii) द्वितीयक ऐमीन डाइऐल्किल बेंजीन सल्फोनैमाइड बनाते हैं, जो KOH में अविलेय होता है।

(iii) तृतीयक ऐमीन यह अभिक्रिया नहीं देते हैं।
नाइट्रो समूह दो भिन्न परमाणुओं अर्थात् O परमाणु तथा N परमाणु से जुड़ सकता है। अतः नाइट्रो समूह एक उभयदंती समूह है।
कच्चे लोहे में 4% कार्बन होता है तथा इसे विभिन्न आकृतियों में आसानी से ढाला जा सकता है जबकि ढलवाँ लोहे में कार्बन की मात्रा कम होती है तथा यह अति कठोर और भंगुर होता है।
फेन प्लवन प्रक्रिया के दौरान अवनमक जैसे NaCN को टैंक में मिलाया जाता है। अवनमक चयनित रूप से ZnS को फेन में आने से रोकता है परंतु PbS को फेन में आने देता है और इस प्रकार फेन के साथ PbS को पृथक करने में सहायता करता है।
फेन प्लवन प्रक्रिया के दौरान संग्राही जैसे चीड़ का तेल तथा वसा अम्ल खनिज कणों की अक्लेदनीयता बढ़ाने के लिए मिलाये जाते हैं तथा फेन स्थायीकारक जैसे क्रिसॉल, ऐनीलिन फेन को स्थायित्व प्रदान करते हैं।
आयरन का अयस्क हेमेटाइट-Fe2O3 है तथा कॉपर का अयस्क कॉपर पाइराइट CuFeS2 होता है।
अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं:
C + O2 CO2
CaCO3 CaO + CO2
CO2+ C CO
3Fe2O3 + CO Fe3O4 +CO2
Fe3O4 + CO 3FeO + CO2
FeO +CO Fe + CO2
FeO + C Fe + CO
CaO + SiO2 CaSiO3
भर्जन:
i) इसमें वायु की अनुपस्थिति में अयस्क को गर्म किया जाता है।
ii) इसका उपयोग सामान्यतः कार्बोनेट अयस्कों के लिए किया जाता है।
iii) अयस्क से नमी तथा कार्बनिक अशुद्धियाँ निकल जाती हैं।
निस्तापन:
i) अयस्क को वायु की उपस्थिति में गर्म किया जाता है।
ii) इसका उपयोग सामान्यतः सल्फाइड अयस्कों के लिए किया जाता है।
iii) वाष्पशील अशुद्धियाँ ऑक्साइड के रूप में निकल जाती हैं।
A. उपसहसंयोजक यौगिकों की प्राथमिक संयोजकता आयननीय होती है।
B. उपसहसंयोजक यौगिक की द्वितीयक संयोजकता आयननीय होती है।
C. प्राथमिक संयोजकताएँ धनायनों द्वारा संतुष्ट होती हैं।
D. द्वितीयक संयोजकताएँ धनायनों द्वारा संतुष्ट होती हैं।
उपसहसंयोजक यौगिकों में धातुएँ दो प्रकार की संयोजकताएँ दर्शाती हैं- प्राथमिक एवं द्वितीयक। प्राथमिक संयोजकताएँ सामान्य रूप से आयननीय होती हैं तथा ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती हैं। द्वितीयक संयोजकताएँ अन-आयननीय होती हैं। ये उदासीन अणुओं अथवा ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती हैं। द्वितीयक संयोजकता उपसहसंयोजन संख्या के बराबर होती है तथा इसका मान किसी धातु के लिए निश्चित होता है।
A. सिग्मा तथा पाइ-आबंधों दोनों से आबंधित धातु आयन के चारों ओर लिगन्डों की संख्या
B. पाइ-आबंधों से आबंधित धातु आयन के चारों ओर लिगन्डों की संख्या
C. उपसहसंयोजन-आबंधों से आबंधित धातु आयन के चारों ओर लिगन्डों की संख्या
D. धातु आयन से आबंधित केवल आयनिक लिगन्डों की संख्या
किसी संकुल में केंद्रीय धातु परमाणु की उपसहसंयोजक संख्या, उपसहसंयोजन-आबंधों से आबंधित धातु आयन के चारों ओर एकदंतुर लिगन्डों की संख्या के बराबर, द्विदंतुर लिगन्डों की संख्या की दोगुनी और इसी प्रकार अन्य लिगन्डों में होती है।
A. एसीटेट
B. ऑक्सैलेट
C. सायनाइड
D. अमोनिया
ऑक्सैलेट आयन एक द्विदंतुर लिगन्ड है। यह अपने दो ऑक्सीजन परमाणुओं से दो उपसहसंयोजन आबंधों के निर्माण के द्वारा कीलेट बना सकता है।
A. ट्राइऐम्मीनक्लोरोब्रोमोनाइट्रोप्लेटिनम
B. ट्राइऐम्मीनब्रोमोनाइट्रोक्लोरोप्लेटिनम
C. ट्राइऐम्मीनब्रोमोक्लोरोनाइट्रोप्लेटिनम (IV) क्लोराइड
D. ट्राइऐम्मीननाइट्रोक्लोरोब्रोमोप्लेटिनम
चूँकि क्लोरीन समन्वय मंडल के बाहर होता है, इसलिए संकुल में इसका नाम क्लोराइड लिखा जाता है। समन्वय मंडल के अन्दर लिगंडों का नाम अंग्रेजी के वर्ण माला के क्रमानुसार लिखा जाता है तथा प्लेटिनम की ऑक्सीकरण अवस्था IV है क्योंकि 3 लिगंडों पर एकल ऋणात्मक आवेश है।
A. चाँदी
B. रूथीनीयम धातु
C. रोडियम धातु
D. रीनीयम धातु
अनेक औद्योगिक प्रक्रमों में उपसहसंयोजक यौगिकों का उपयोग उत्प्रेरकों के रूप में किया जाता है। उदाहरणार्थ- विल्किन्सन उत्प्रेरक [(Ph3P)3RhCl] का उपयोग एल्कीनों के हाइड्रोजनन में किया जाता है।
A. चतुष्फलकीय
B. त्रिकोणीय
C. वर्ग समतलीय
D. अष्टफलकीय
क्यूप्रामोनियम आयन में, केंद्रीय धातु Cu, dsp2 संकरित है। अतः इसका आकार वर्ग समतलीय होता है।
A. K2[Ni(EDTA)]
B. [Pt(en)2Cl2]
C. K3[Al(C2O4)3]
D. [Ag(NH3)2]Cl
K2[Ni(EDTA)] में वलयों की अधिकतम संख्या अर्थात् 6 होती है। जब एक लिगन्ड अपने दो या अधिक दाता परमाणुओं का प्रयोग एक ही धातु आयन से आबंधन के लिए करता है, तो यह कीलेट लिगन्ड कहलाता है। बृहत् कीलेशन वाला संकुल अधिक स्थायी होता है। इस प्रकार, 6 दाता परमाणुओं वाला K2[Ni(EDTA)] अधिक स्थायी होता है।
A. द्विदंतुर लिगन्ड
B. त्रिदंतुर लिगन्ड
C. चार दंतुर लिगन्ड
D. पाँच दंतुर लिगन्ड
डाइएथिलीन ट्राइऐमीन (डाइईन) एक त्रिदंतुर लिगन्ड है। इसमें तीन एमिनो समूह होते हैं जिनमें से तीन नाइट्रोजन परमाणु होते हैं जो प्रत्येक एक एकाकी-युग्म दान करते हैं तथा तीन उपसहसंयोजन आबंध का निर्माण करते हैं।
A. दो
B. चार
C. पाँच
D. छह
Ni एक ऑक्सैलेट आयन (द्विदंतुर लिगन्ड) तथा दो एथिलीनडाइऐमीन (द्विदंतुर लिगन्ड) से आबंधित होता है। द्विदंतुर लिगन्ड केंद्रीय धातु आयन में दो भिन्न स्थानों से जुड़े होते हैं। इस प्रकार 3 द्विदंतुर लिगन्ड वाले इस संकुल में Ni की उपसहसंयोजन संख्या 6 है।
A. 2
B. 4
C. 6
D. 8
क्यूप्रामोनियम सल्फेट [Cu (NH3)4]SO4 है। चूँकि कॉपर चार एकदंतुर लिगन्ड से जुड़ा होता है, इसलिए इस यौगिक में कॉपर की उपसहसंयोजन संख्या चार है।
A. आयरन
B. जिर्कोनियम
C. टाइटेनियम
D. रोडियम
त्सीगलर–नाटा उत्प्रेरक R3Al + TiCl3 अथवा TiCl4 है।
A. 3
B. 6
C. 9
D. 18
लिगन्ड के रूप में उपस्थित छह अमोनिया अणुओं में सहसंयोजक आबंध के होते हैं। प्रत्येक अमोनिया अणु में 3 सहसंयोजक आबंध होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप इस यौगिक में 18 सहसंयोजक आबंध हैं।
A. लिगन्ड के आवेश
B. उपसहसंयोजन संख्या
C. धातु परमाणु पर लिगन्ड एवं आवेश से उत्पन्न क्षेत्र
D. धातु परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत एक स्थिर वैद्युत मॉडल है जिसके अनुसार धातु-लिगन्ड आबंध आयनिक होते हैं, जो केवल धातु आयन तथा लिगन्ड के मध्य स्थिरवैद्युत अन्योन्य क्रियाओं द्वारा उत्पन्न होते हैं। क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन धातु पर आवेश तथा लिगन्ड द्वारा उत्पन्न क्षेत्र पर निर्भर करता है।
A. [Co(en)2Cl2]+
B. [Co(NH3)5Cl]2+
C. [Co(NH3)4Cl2]+
D. [Cr(ox)3]3-
ज्यामितीय समावयवता लिगन्डों की भिन्न संभव व्यवस्थाओं के कारण होती है। इस व्यवहार के प्रमुख उदाहरण 4 एवं 6 उपसहसंयोजन संख्या वाले संकुलों में पाए जाते हैं। ध्रुवण समावयव दर्पण प्रतिबिंब होते हैं, जो अध्यारोपित नहीं किए जा सकते हैं। [Co(en)2Cl2]+ दो प्रतिबिंब रूपों दक्षिण ध्रुवण घूर्णक और वाम ध्रुवण घूर्णक के रूप में होता है तथा यह समपक्ष एवं विपक्ष समावयवता दर्शाता है।
ज्वीटर आयन एक उदासीन अणु है, जो उस अणु में विभिन्न स्थानों पर धनात्मक एवं ऋणात्मक आवेश से युक्त होता है।
उदाहरणार्थ – सल्फैनिलिक अम्ल

इस अभिक्रिया के परिणामस्वरूप क्लोरोबेन्जीन बनती है।
यह अभिक्रिया सैंडमायर अभिक्रिया कहलाती है।

बेंजीन डाइएजोनियम क्लोराइड और फीनॉल की अभिक्रिया के दौरान फीनॉल अणु अपनी पैरा स्थिति से डाइएजोनियम लवण से युग्मित होकर p-हाइड्रॉक्सीऐजोबेंजीन बनाता है। इस प्रकार की अभिक्रिया को युग्मन अभिक्रिया कहते हैं।

ऐमीनों के उपयोग निम्न हैं:
1. ये कार्बनिक संश्लेषणों में अभिकर्मकों के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
2. इनका उपयोग योगज के रूप में तथा वल्कनीकरण में किया जाता है।
3. इनका उपयोग फेनिल आइसोसाइनेट के विरचन के लिए किया जाता है।
ऐमीनों के भौतिक गुणधर्म निम्न हैं:
1. ऐमीन रंगहीन होते हैं परंतु लंबे समय तक वायु के संपर्क में रखने पर ये रंगीन हो जाते हैं।
2. ऐमीन के क्वथनांक अधिक होते है।
3. निम्नतर ऐलिफैटिक ऐमीन जल में विलेय होते हैं।
(ख) ऐनिलीन का pKb मेथिलऐमीन की तुलना में अधिक होता है।
(क)

(ख) ऐनिलीन में, N-परमाणु पर एकाकी इलेक्ट्रॉन युगल बेंजीन वलय पर विस्थानीकृत होता है। परिणामस्वरूप नाइट्रोजन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है। इसके विपरीत, CH3NH2 में CH3 के +I प्रभाव के कारण N-परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है। इसलिए, ऐनिलीन, मेथिलऐमीन की तुलना में दुर्बल क्षार होता है और इसका pKb मान मेथिलऐमीन से अधिक होता है।