
(ii) आर्थो प्रभाव के कारण ऐनिलीन की तुलना में o-टॉलूईडीन दुर्बल क्षार होता है।
A. संतृप्त तेल की
B. शर्करा की
C. प्रोटीन की
D. वसा की
प्रोटीन के क्षारीय विलयन में कॉपर सल्फेट का तनु विलयन मिलाने पर, बैंगनी रंग उत्पन्न होता है। यह परीक्षण (– CO – NH –) बंध की उपस्थिति दर्शाता है।
A. उनकी आकृति मुड़ी हुई गोलाकार होती है।
B. ये जल में विलेय होते हैं।
C. वे ताप और pH परिवर्तन पर स्थायी होते हैं।
D. इसकी पॉलीपेप्टाइड शृंखलाएं दुर्बल अंतराआण्विक हाइड्रोजन आबंधों द्वारा एक साथ जुड़ी होती हैं।
गोलिकाकार प्रोटीन ताप तथा pH परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं।
A. रेटिनॉल
B. ऐस्कॉर्बिक अम्ल
C. राइबोफ्लेविन
D. थायमीन
विटामिन A का रासायनिक नाम रेटिनल है और इसका रासायनिक सूत्र C20H30O है।
A. एंजाइम का निर्माण
B. मांसपेशियों का निर्माण
C. हीमोग्लोबिन का निर्माण
D. भोजन का निर्माण
कुछ प्रोटीन भोजन संग्रह के रूप में भी व्यवहार करते हैं।
A. ऐस्पिरिन
B. ऐमीनो अम्ल
C. DDT
D. ग्लूकोस
ऐमीनो अम्ल ज़्विटर आयन के रूप में विद्यमान रहते हैं। जलीय विलयन (pH = 7) में कार्बोक्सिल समूह एक प्रोटॉन मुक्त कर सकता है जबकि ऐमीनो समूह एक प्रोटॉन ग्रहण कर सकता है जिसके फलस्वरूप एक द्विध्रुवीय आयन बनता है जिसे ज़्विटर आयन कहते हैं।
A. विटामिन A का
B. विटामिन B का
C. विटामिन C का
D. विटामिन K का
विटामिन C का रासायनिक नाम ऐस्कॉर्बिक अम्ल है और इसका सूत्र C6H8O6 है।
A. पंख
B. सींग
C. नाख़ून
D. डीएनए
डीएनए एक प्रकार का न्यूक्लीक अम्ल है।
A. न्यूक्लिओसाइड का
B. न्यूक्लिओटाइड का
C. फास्फेट और पेन्टोस शर्करा का
D. नाइट्रोजनयुक्त क्षार और शर्करा का
न्यूक्लीक अम्ल, न्यूक्लिओटाइडों का बहुलक है जो नाइट्रोजनयुक्त क्षार, पेन्टोस शर्करा तथा फास्फेट अर्धांश से मिलकर बनता है।
A. विटामिन D में
B. हीमोग्लोबिन में
C. विटामिन B-12 में
D. विटामिन C में
विटामिन B-12 जल में विलेय विटामिन है जिसकी मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की कार्यप्रणाली और रक्त के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संरचनात्मक रूप से यह एक जटिल विटामिन होता है और इसमें कोबाल्ट होता है।
A. क्लोरोफिल में
B. विटामिन B-12 में
C. हीमोग्लोबिन में
D. कार्बोनिक एनहाइड्रेज में
पौधों में उपस्थित क्लोरोफिल में मैग्नीशियम होता है।
A. एन्जाइम है ।
B. प्रतिरक्षी है ।
C. हॉर्मोन है ।
D. ग्रंथि है ।
ऑक्सीटॉसिन पीयूष ग्रंथि द्वारा स्रावित होने वाला एक हॉर्मोन है।
A. A, C और D
B. A, B-समूह और C
C. B-समूह और C
D. B-समूह और D
विटामिन-B-समूह और विटामिन-C जल में विलेय विटामिन हैं जबकि विटामिन A, D, E और K वसा में विलेय विटामिन हैं।
A. कार्बोहाइड्रेट के
B. विटामिन के
C. वसा के
D. प्रोटीन के
दो या दो से अधिक ऐमीनो अम्ल के संघनन से पेप्टाइड बनता है। 10000 u से अधिक आण्विक द्रव्यमान वाले पेप्टाइड, प्रोटीन कहलाते हैं।
A. आयनिक आबंध द्वारा
B. द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्यक्रिया द्वारा
C. लंडन बल द्वारा
D. हाइड्रोजन आबंध द्वारा
ग्वानीन और साइटोसीन के मध्य तीन हाइड्रोजन आबंध तथा ऐडेनीन और थायमीन के मध्य दो हाइड्रोजन आबंध होते हैं।
A. की भूख कम हो जाती है।
B. को रिकेट्स हो जाता है।
C. को ऑस्टियोमेलेशिया हो जाता है।
D. की मांसपेशियाँ कमजोर हो जाती हैं।
विटामिन-D की कमी से हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती हैं और अस्थिमृदुता की बीमारी हो जाती हैं, जैसे कि बच्चों में रिकेट्स और वयस्कों में ऑस्टियोमेलेशिया। इसकी कमी से ऑस्टियोपोरोसिस भी हो सकता है।
A. कार्बोहाइड्रेट होते हैं।
B. वसा होते हैं।
C. रेशेदार प्रोटीन होते हैं।
D. गोलिकाकार प्रोटीन होते हैं।
लगभग सभी एन्जाइम गोलिकाकार प्रोटीन होते हैं।
A. अनअपचायी शर्करा में
B. पेन्टोस में
C. ऐल्डोस में
D. ओलिगोसैकैराइड में
ग्लूकोस एक मोनोसैकैराइड है, यह एक ऐल्डोहैक्सोज है।
A. सूक्रोस
B. लेक्टोस
C. फ्रक्टोस
D. गैलैक्टोस
दूध में पाया जाने वाला डाइसैकैराइड लैक्टोस (दुग्ध-शर्करा) होता है, जो ग्लूकोस और गैलैक्टोस अणुओं के जुड़ने से बनता है। इसका उपयोग पनीर बनाने में किया जाता है क्योंकि लैक्टिक बैक्टीरिया इसे लैक्टिक अम्ल में बदल देता है। इसके कारण दूध खट्टा हो जाता और दही जमता है।
A. हाइड्रोजन बंध
B. पेप्टाइड बंध
C. ग्लाइकोसाइडी बंध
D. एस्टर बंध
दो मोनोसैकैराइड इकाइयों के मध्य निर्मित बंध ग्लाइकोसाइडी बंध कहलाता है।
A. राइबोज
B. ग्लाइकोजन
C. गैलैक्टोस
D. ग्लूकोस
ग्लाइकोजन एक पॉलिसैकैराइड है, जो जंतुओं के यकृत और पेशियों में संग्रहीत होता है।
विटामिनों के मुख्य स्रोत दूध, मक्खन, पनीर, फल, हरी सब्जियाँ, माँस, मछली, अंडे इत्यादि हैं।
डाइसैकैराइड अथवा पॉलीसैकैराइड में दो मोनोसैकैराइड इकाइयाँ H2O के एक अणु के निष्कासन के उपरान्त बने ऑक्साइड बंध द्वारा जुड़ी रहती हैं। ऑक्सीजन परमाणुओं के माध्यम से दोनों मोनोसैकैराइड इकाइयों के बीच इस तरह के बंध को ग्लाइकोसाइडी बंध कहते हैं।
वे सभी कार्बोहाइड्रेट जिनमें हेमीऐसीटैल या हेमीकीटल में ऐल्डिहाइडिक अथवा कीटोनिक समूह होते हैं तथा टॉलेन अभिकर्मक अथवा फेलिंग विलयन को अपचयित कर देते हैं, अपचायी कार्बोहाइड्रेट कहलाते हैं जबकि अन्य जो इन अभिकर्मकों को अपचयित नहीं करते हैं उन्हें अनपचायी कार्बोहाइड्रेटों कहा जाता है।
जैव अणुओं को जटिल निर्जीव रासायनिक पदार्थों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो जीवन के आधार का निर्माण करते हैं, अर्थात ये ना केवल जैव तंत्रों (प्राणियों) का निर्माण करते हैं बल्कि उनकी वृद्धि, अनुरक्षण तथा पुनर्जनन की उनकी क्षमता के लिए भी उत्तरदायी होते हैं।
विटामिन जटिल कार्बनिक अणु हैं। इन्हें व्यापक रूप से निम्नलिखित वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
(i) जल में विलेय विटामिन: इनमें विटामिन B-कॉम्प्लेक्स तथा विटामिन C शामिल हैं।
(ii) वसा विलेय विटामिन: ये तैलीय पदार्थ होते हैं जो जल में आसानी से घुलनशील नहीं होते हैं। हालांकि ये तेल में विलेय होते हैं। इनमें विटामिन A, D, E और K शामिल होते हैं।
जब प्रोटीन के मूल रूप की भौतिक अवस्था, जैसे ताप में परिवर्तन अथवा रासायनिक परिवर्तन जैसे pH में परिवर्तन आदि, परिवर्तन किए जाते हैं, तो हाइड्रोजन आबंधों में अनियमितता उत्पन्न हो जाती है। इसके कारण गोलिका खुल जाती है तथा हैलिक्स अकुंडलित हो जाती है तथा प्रोटीन अपनी जैविक सक्रियता खो देता है। इसे प्रोटीन का विकृतीकरण कहते हैं।
कार्बोहाइड्रेट रासायनिक रूप से ध्रुवण घूर्णक पॉलिहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड अथवा कीटोन होते हैं।
इन्हें मुख्यतः निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया गया है:
(i) मोनोसैकैराइड
(ii) ओलिगोसैकैराइड
(iii) पॉलिसैकैराइड
पेप्टाइड वे एमाइड होते हैं जिनका निर्माण एक α ऐमीनो अम्ल के ऐमीनो समूह के दूसरे α एमीनो अम्ल के अणु के कार्बोक्सिलिक समूह के साथ संघनन करने से होता है और जिसमें जल का एक अणु मुक्त होता है। इस संघनन में भाग लेने वाले ऐमीनो अम्ल समान अथवा भिन्न हो सकते हैं। उन्हें डाइ, ट्राई, टेट्रा आदि के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
उदाहरणार्थ :

ऐमीनो अम्ल सामान्यतः रंगहीन, क्रिस्टलीय ठोस होते हैं। ये जल में विलेय तथा उच्च गलनांक वाले ठोस होते हैं। ये सामान्य ऐमीनों तथा कार्बोक्सिलिक अम्लों की भांति व्यवहार नहीं करते हैं बल्कि लवणों की भाँति व्यवहार करते हैं। इनका लवणों की भांति व्यवहार करने का कारण एक ही अणु में अम्लीय तथा क्षारकीय समूहों की उपस्थिति है। जलीय विलयन में कार्बोक्सिलिक समूह एक प्रोटॉन मुक्त कर सकता है और एमीनो समूह एक प्रोटॉन ग्रहण कर सकता है, जिसके फलस्वरूप एक द्विध्रुवीय आयन बनता है, जिसे ज़्विटर आयन कहते हैं।

(i) मोनोसैकैराइड सरलतम कार्बोहाइड्रेट होते हैं, जिनको पॉलिहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड अथवा कीटोन के और अधिक सरल यौगिकों में जल अपघटित नहीं किए जा सकता है।
ग्लूकोस और फ्रक्टोज मोनोसैकैराइड हैं।
ग्लूकोस: (C6H12O6)
फ्रक्टोज: (C6H12O6)
(ii) ग्लूकोस बनाने की विधियाँ:
(क) सूक्रोस से: जब सुक्रोस को तनु HCl अथवा H2SO4के साथ ऐल्कोहॉलिक विलयन में उबाला जाता है, तो ग्लूकोस तथा फ्रक्टोज समान मात्रा में प्राप्त होते हैं।

(ख) स्टार्च से: जब स्टार्च को तनु H2SO4 के साथ 393 K ताप तथा 2 से 3 atm दाब पर उबाला जाता है, तो ग्लूकोस प्राप्त होता है।

A. त्सीग्लर
B. नट्टा
C. गुडइयर
D. इंगोल्ड
रबर के वल्कनीकरण का सर्वप्रथम प्रयोग गुडइयर द्वारा किया गया था। वल्कनीकरण द्वारा प्राकृतिक रबर के गुणों में सुधार किया गया।
A. नाइलॉन
B. टेफलॉन
C. अल्प घनत्व पॉलिथीन
D. उच्च घनत्व पॉलिथीन
त्सीग्लर-नट्टा उत्प्रेरक का उपयोग उच्च घनत्व पॉलिथीन के निर्माण में किया जाता है।
A. Fe3+ आयन रक्त, जो ऋणावेशित सॉल होता है, को स्कंदित कर देते हैं।
B. Fe3+ आयन रक्त, जो धनावेशित सॉल होता है, को स्कंदित कर देते हैं।
C. Cl- आयन रक्त, जो धनावेशित सॉल होता है, को स्कंदित करते हैं।
D. Cl- आयन रक्त, जो ऋणावेशित सॉल होता है, को स्कंदित करते हैं।
Fe3+ आयन (रक्त प्लाज्मा में मौजूद) घुलनशील प्रोटीन को स्कंदित कर देते हैं, जो ऋणावेशित होता है।
A. स्कंदन
B. पेप्टन
C. संरक्षणात्मक क्रिया
D. अधिशोषण
गोंद एक रक्षी कोलॉइड की तरह कार्य करता है।
A. सक्रियण उर्जा को बढ़ाता है।
B. अभिक्रिया के उर्जा अवरोध को कम कर देता है।
C. संघट्ट व्यास को कम कर देता है।
D. ताप गुणांक को बढ़ा देता है।
उत्प्रेरक उर्जा अवरोध को कम कर देता है, और इसलिए सक्रियण उर्जा कम हो जाती है।
A. कम पृष्ठीय क्षेत्रफल
B. उच्च एन्थैल्पी
C. अधिक पृष्ठीय क्षेत्रफल
D. उच्च अनुत्क्रमणीयता
अधिशोषण का परिमाण अधिशोषक के पृष्ठीय क्षेत्रफल के बढ़ने के साथ बढ़ता है। अतः महीन चूर्णित धातुएँ एवं सरंध्र पदार्थ जिनका पृष्ठीय क्षेत्रफल अधिक होता है, अच्छे अधिशोषक होते हैं।
ब्राउनी गति, परिक्षेपण माध्यम के अणुओं द्वारा कोलॉइडी कणों के असमान टक्कर के कारण उत्पन्न होती है।
क्रांतिक ताप वह न्यूनतम ताप है जिसके ऊपर किसी भी गैस को द्रवित नहीं किया जा सकता, भले ही कितना अधिक दाब क्यों न लगाया जाये|
(i) झाग प्लवन प्रक्रम में: चीड़ का तेल तथा झाग कारक का उपयोग करके एक निम्न श्रेणी के सल्फाइड अयस्क को सिलिका एवं अन्य मृदा पदार्थों से पृथक कर सांद्रित किया जा सकता है।
(ii) गैस मास्क में: गैस मास्क (एक युक्ति, जिसमें साक्रियित चारकोल अथवा अधिशोषकों का मिश्रण होता है) का उपयोग वायुमंडल में मौजूद विषैली गैसों को अधिशोषित करने के लिए किया जाता है।
कोलॉइडी कणों पर विद्युत आवेश उत्पन्न होने के दो कारण ये हैं:
i) धातुओं के वैद्युतपरिक्षेपण के समय सॉल कणों के द्वारा इलेक्ट्रॉन प्रग्रहण के कारण और विलयन से आयनों के अधिमान्य अधिशोषण के कारण होता है।
ii) कोलॉइडी सॉल के विघटन के कारण होता है।
सूर्यास्त के समय, सूर्य क्षैतिज पर रहता है। सूर्य द्वारा उत्सर्जित प्रकाश को वायुमंडल में अधिक दूरी तय करनी पड़ती है। फलतः, प्रकाश का नीला भाग वायुमंडल में धूलकणों द्वारा प्रकीर्णित हो जाता है। अतः, केवल लाल भाग ही दिखाई देता है।
उत्प्रेरक के तीन गुण निम्न हैं:
i) सक्रियता: - यह इसकी रासायनिक अभिक्रिया के वेग को बढ़ाने की क्षमता है।
ii) चयनात्मकता: - यह इसकी किसी अभिक्रिया को दिशा देकर एक विशेष उत्पाद बनाने की क्षमता है।
iii) विशिष्टता: - एक पदार्थ केवल एक विशेष अभिक्रिया के लिए उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर सकता है न कि सभी अभिक्रियाओं के लिए।
गैस का ठोस पर अधिशोषण निम्न कारकों पर निर्भर करता है:
i) अधिशोषक का पृष्ठीय क्षेत्रफल: - पृष्ठीय क्षेत्रफल जितना अधिक होता है अधिशोषण भी उतना ही अधिक होता है।
ii) ताप: - ताप बढ़ने से गैस का अधिशोषण घट जाता है।
iii) दाब: - एक निश्चित ताप पर दाब बढ़ने से अधिशोषण बढ़ जाता है।
द्रवरागी कोलॉइड में यदि परिक्षेपण माध्यम को परिक्षिप्त माध्यम से अलग कर दिया जाता है तो सॉल को केवल परिक्षेपण माध्यम के साथ मिश्रित करके पुनः प्राप्त किया जा सकता है। अतः ये उत्क्रमणीय सॉल कहलाते हैं। उदाहरणार्थ: स्टार्च।
द्रवविरागी सॉल में यदि वैद्युत अपघट्य की थोड़ी सी मात्रा मिलायी जाती है, तो ये आसानी से अवक्षेपित हो जाते हैं तथा केवल परिक्षेपण माध्यम से मिलाने मात्र से पुनः कोलॉइडी सॉल नहीं बनाते हैं। अतः इनको अनुत्क्रमणीय सॉल कहते हैं। उदाहरणार्थ: धातु सल्फाइड।
A. Mg(CN)2
B. Ca(CN)2
C. NaCN
D. HCN
सोडियम सायनाइड ZnS की सतह पर सोडियम टेट्रासायनोजिंकेट (II) बनाता है जो इसके झाग को रोकता है।
A. आयरन का
B. मैग्नीशियम का
C. कॉपर का
D. लेड का
मैलाकाइट एक कार्बोनेट खनिज है जिसको सामान्यतः “कॉपर कार्बोनेट” कहा जाता है और इसका रसायनिक सूत्र CuCO3.Cu (OH)2 होता है।
A. Na3AlF6 अथवा CaF2
B. Na2AlF6 अथवा CaF2
C. Na2AlF6 अथवा CaF3
D. Na3AlF6 अथवा CaF3
ऐलुमीनियम के धातुकर्म में, शुद्ध Al2O3 में Na3AlF6 या CaF2 मिलाया जाता है, जिससे मिश्रण का गलनांक कम हो जाता है और उसकी चालकता बढ़ जाती है।
A. क्रायोलाइट
B. मैंगनीज
C. निकैल
D. जिरकोनियम
यह विधि Zr और Ti जैसी धातुओं में से ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के रूप में उपस्थित अशुद्धियों को हटाने के लिए बहुत उपयोगी होती है। परिष्कृत धातुओं को निर्वातित पात्र में आयोडीन के साथ गर्म किया जाता है। धातु आयोडाइड सहसंयोजी यौगिक होने के कारण आसानी से वाष्पीकृत हो जाते हैं ।
A. ढलवाँ लोहा
B. कच्चा लोहा
C. इस्पात
D. पिटवाँ लोहा
पिटवाँ लोहे में सिर्फ 0.2-0.5% तक कार्बन की अशुद्धि होती है।
A. जल और सल्फाइड
B. जल और कार्बन डाइऑक्साइड
C. कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड
D. जल और हाइड्रोजन सल्फाइड
निस्तापन का प्रयोग, वाष्पशील अशुद्धियों को हटाने तथा उनके अपघटन के लिए किया जाता है।
A. अम्लीय गालक की
B. क्षारीय गालक की
C. अम्लीय और क्षारीय दोनों गालकों की
D. अम्लीय और क्षारीय दोनों गालकों की जरूरत नहीं होगी।
चूँकि सिलिका अम्लीय अशुद्धि है, अतः गालक क्षारीय होना चाहिए। जैसे कि, CaO + SiO2 → CaSiO3
A. Zn और Pb
B. Fe और Hg
C. Pt और Hg
D. Fe और C
Fe और C, सीमेनटाइट (Fe3C) नामक मिश्रधातु बनाते हैं। यह कठोर तथा भंगुर होती है।
A. ऐलुमीनियम
B. कॉपर
C. आयरन
D. मैग्नीशियम
कॉपर धातु वायु, आर्द्रता और कार्बन डाइऑक्साइड से आसानी से प्रभावित नहीं होती है, इसलिए कभी-कभी यह मूल अवस्था में पायी जाती है।
A. गेलेना
B. सिडेराइट
C. हेमेटाइट
D. स्फेलेराइट
गेलेना (PbS) लेड का एक महत्वपूर्ण अयस्क है तथा यह भूपर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। यह व्यापक रूप से पाये जाने वाले सल्फाइड अयस्क में से एक है।
A. द्रावगलन परिष्करण
B. भर्जन
C. निस्तापन
D. प्रगलन
भर्जन प्रक्रम में सल्फर, सल्फाइड अयस्क (पाइराइट) से सल्फर ऑक्साइड के रूप में पृथक किया जाता है। इस विधि में,अयस्क को ऑक्सीजन की उपस्थिति में गर्म किया जाता है। जिसके परिणामस्वरूप, सल्फर, सल्फर-डाइऑक्साइड गैस के रूप में बाहर निकल जाता है।
A. ऑक्सीकरण को सुगम बनाना
B. अयस्क को सरंध्र बनाना
C. अपअयस्क को निकालना
D. अपचयन को सुगम बनाना
गालक वह पदार्थ है जो धातु की अशुद्धियों अर्थात अपअयस्क को निकालने के लिए प्रगलन भट्टी में डाला जाता है। आयरन और इस्पात भट्टियों में उपयोग किया जाने वाला गालक चूना पत्थर होता है, जिसे आयरन और ईंधन के साथ उचित अनुपात में मिलाया जाता है।
A. ऑक्साइड अयस्क है ।
B. एक सल्फाइड अयस्क है ।
C. एक कार्बाइड अयस्क है ।
D. कार्बोनेट अयस्क है ।
पाइरोलुसाइट (MnO2) मैंगनीज का एक महत्वपूर्ण ऑक्साइड अयस्क है।
A. वाष्प प्रावस्था परिष्करण
B. मंडल परिष्करण
C. स्तंभ-वर्णलेखन
D. वैद्युतअपघटन परिष्करण
यह विधि इस सिद्धांत पर आधारित है कि अशुद्धियों की विलेयता धातु की ठोस अवस्था की अपेक्षा गलित अवस्था में अधिक होती है। अशुद्ध धातु की छड़ के एक किनारे पर एक वृत्ताकार गतिशील तापक लगा रहता है। तापक जैसे जैसे आगे की ओर बढ़ता है, गलित से शुद्ध धातु क्रिस्टलित होती जाती है।
A. धातुमल कहलाती हैं ।
B. गालक कहलाती हैं ।
C. अपअयस्क कहलाती हैं ।
D. खनिज कहलाती हैं ।
बहुत कम ऐसे अयस्क होते हैं जिनमें केवल वांछित पदार्थ होते हैं। अयस्क सामान्यतया मृदा तथा अवांछित पदार्थों द्वारा संदूषित होते हैं, जिन्हें अपअयस्क अथवा गैंग कहते हैं।
A. NH3
B. NaCN
C. HNO3
D. HCl
Au और Ag का निष्कर्षण, CN– आयन के साथ अयस्क में उपस्थित धातु के निक्षालन से होता है। वस्तुतः Ag और Au दोनों NaCN में विलेय होते हैं और CN– आयनों के साथ संकुल बनाते हैं।
A. मैग्नेटाइट
B. गेलेना
C. कॉपर पाइराइट
D. हेमेटाइट
कॉपर पाइराइट CuFeS2 होता है। अतः, इसमें Cu और Fe दोनों धातुएँ उपस्थित होती हैं। अतः आयरन और कॉपर दोनों का निष्कर्षण कॉपर पाइराइट से किया जा सकता है।
A. Sn का
B. Pb का
C. Zn का
D. Mn का
कैसीटेराइट (SnO2) टिन ऑक्साइड है तथा यह टिन का एक अयस्क है। यह प्रायः अपारदर्शी होता है, किंतु इसका पतला क्रिस्टल पारभासी होता है। कैसीटेराइट टिन का मुख्य अयस्क है।
A. FeSiO3
B. FeSO4
C. Fe3O4
D. Fe2O3
कॉपर पाइराइट CuFeS2 है। कॉपर पाइराइट का भर्जन करने पर FeO और FeS प्राप्त होते हैं तथा SO2 जैसी वाष्पशील अशुद्धियाँ निकल जाती हैं। जब भर्जित अयस्क को रेत और कोक के साथ मिश्रित करके भट्टी में डाला जाता है, तो गर्म हवा FeO को FeSiO3 में परिवर्तित कर देती है। FeO + SiO2 → FeSiO3
A. गोल्ड
B. ज़िंक
C. प्लैटिनम
D. कॉपर
सिल्वर, का निष्कर्षण Ag2S अयस्क से किया जाता है। अयस्क को चूर्णित तथा संवर्धित किया जाता और इसकी NaCN विलयन के साथ अभिक्रिया कराई जाती है। Ag2S + 4NaCN → 2Na[Ag(CN)2] + Na2S Na[Ag(CN)2] विलयन को ज़िंक डस्ट से अभिकृत कराया जाता है जिसके परिणामस्वरूप सिल्वर अवक्षेप के रूप में प्राप्त हो जाती है। 2Na[Ag(CN)2]+ Zn → 2Na[Zn(CN)4] + 2Ag
A. सल्फाइड अयस्क का ऑक्सीकरण होता है ।
B. सल्फाइड अयस्क का धातु में अपचयन होता है ।
C. ऑक्साइड का धातु में अपचयन होता है ।
D. सल्फाइड अयस्क का अपचयन होता है ।
आयरन के ऑक्साइड अयस्कों को निस्तापन या भर्जन (जल को निष्कासित करने के लिए, कार्बोनेटों का अपघटन करने के लिए तथा सल्फाइडों को ऑक्सीकृत करने के लिए) के द्वारा सांद्रण के उपरांत चूना पत्थर तथा कोक के साथ वात्या भट्टी में ऊपर से डाल देते हैं। यहाँ ऑक्साइड धातु में अपचयित हो जाता है।
NaCl के जलीय विलयन का वैद्युत अपघटन करने पर NaOH,H2 तथा Cl2 प्राप्त होते हैं ।
फेन प्लवन विधि में अवनमक दो अयस्कों के मिश्रण में एक अयस्क को चयनित रूप से फेन तक आने से रोकता है। इस प्रकार फेन से दूसरे अयस्क को अलग करने में सक्षम बनाता है।
द्रवीय धावन की प्रक्रिया अयस्क तथा गैंग कणों के गुरुत्वीय अंतर पर निर्भर करती है और इसलिए गुरुत्वीय पृथक्करण के रुप में जानी जाती है।
अयस्कों से धातु पृथक्करण में प्रयुक्त होने वाली सम्पूर्ण वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक प्रक्रिया धातुकर्म कहलाती है।
चुंबकीय पृथक्करण में अयस्क को एक घूमते हुए पट्टे (conveyer belt)पर डाला जाता है, जो चुंबकीय रोलर पर लगा होता है। यदि अयस्क या गैंग चुंबकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होता है तो वह रोलर के निकट एकत्रित हो जाएगा तथा अचुंबकीय व्यवहार प्रदर्शित करने वाले कण रोलर से दूर एकत्रित हो जाएंगे।
A. एथिलीन ग्लाइकॉल तथा थैलिक अम्ल
B. एथिलीन ग्लाइकॉल तथा आइसोथैलिक अम्ल
C. एथिलीन ग्लाइकॉल तथा टेरेफ्थैलिक अम्ल
D. एथिलीन ग्लाइकॉल तथा डाइनाइट्रोथैलिक अम्ल
डेक्रॉन अथवा टेरिलीन पॉलिएस्टर का उदाहरण है। यह एथिलीन ग्लाइकॉल तथा टेरेफ्थैलिक अम्ल के मिश्रण को 420K से 460K ताप तक ज़िंक ऐसीटेट-एंटिमनी ट्राइऑक्साइड उत्प्रेरक की उपस्थिति में गर्म करने पर प्राप्त होता है।
A. एथेनॉल और मेथेनैल
B. फ़ीनॉल और मेथेनैल
C. एथेनॉल और मेथेनॉल
D. फ़ीनॉल और मेथेनॉल
बैकालाइट फ़ीनॉल तथा फार्मेल्डीहाइड (मेथेनैल) का संघनन बहुलक है।
A. पॉलिथीन
B. नाइलॉन
C. ब्यूना-S
D. मेलामाइन
ये रैखिक अथवा किंचित शाखित शृंखला बहुलक होते हैं, जो कमरे के ताप पर कठोर होते हैं, गरम करने पर मृदुल और ठंडा करने पर पुनः कठोर हो जाते हैं।
A. पॉलिस्टाइरीन
B. पॉलियुरेथेन
C. पॉलियूरिया
D. पॉलिऐमाइड
पॉलिस्टाइरीन, स्टाइरीन का बहुलक है।
A. टेफलॉन का
B. ग्लिप्टल का
C. ब्यूना-S का
D. नाइलॉन -6 का
F2C = CF2 टेफलॉन का एकलक है। इसका उपयोग नॉन-स्टिक सतह से लेपित बर्तन बनाने के लिए किया जाता है।
A. गैल्वेनीकरण
B. वल्कनीकरण
C. हाइड्रोजनीकरण
D. सल्फ़ोनीकरण
वल्कनीकरण एक प्रक्रिया है जिसमें प्राकृतिक रबर को सल्फर तथा उपयुक्त योगजों के साथ 373K से 415K के ताप परास के मध्य गरम किया जाता है।
A. PVC
B. नाइलॉन
C. टेरिलीन
D. टेफलॉन
टेरिलीन एक पॉलिएस्टर होता है। बहुलक जिनमें एस्टर बंध होते हैं, पॉलिएस्टर कहलाते हैं।
A. बैकेलाइट
B. ग्लाइकोजन
C. निम्न घनत्व पॉलिथीन
D. उच्च घनत्व पॉलिथीन
रैखिक बहुलको में एकलक एक दूसरे से लंबी एवं सीधी श्रृंखलाओं में जुड़े होते हैं।
A. एथिलीन ग्लाइकॉल और एडिपिक अम्ल का
B. मेलामाइन और फार्मेल्डीहाइड का
C. 1,3-ब्यूटाडाईन और वाइनिल क्लोराइड
D. 1,3- ब्यूटाडाईन और स्टाइरीन
ब्यूना-S 1,3- ब्यूटाडाईन और स्टाइरीन का सहबहुलक है।
A. विलकिंसन उत्प्रेरक
B. HCl - ZnCl2
C. त्सीग्लर-नट्टा उत्प्रेरक
D. आयरन उत्प्रेरक
त्सीग्लर-नट्टा उत्प्रेरक में ट्राईएथिलएलुमिनियम और टाइटेनियम टेट्राक्लोराइड होता है। इसका उपयोग उच्च घनत्व पॉलिथीन के निर्माण में किया जाता है।
A. संघनन बहुलक
B. समबहुलक
C. सहबहुलक
D. तिर्यकबंधित बहुलक
समबहुलक एक ही एकलक स्पीशीज के बहुलकन से बनने वाले योगज बहुलक हैं। टेफलॉन टेट्राफ्लुओरोएथीन का बहुलक है और नियोप्रीन क्लोरोप्रीन का बहुलक है।
A. नाइलॉन -66
B. टेफलॉन
C. सेलुलोस
D. बैकेलाइट
जीवित प्राणियों द्वारा उत्पादित बहुलक जैव बहुलक कहलाते हैं। स्टार्च, सेलुलोस, प्रोटीन आदि सभी जैवबहुलकों के उदाहरण हैं।
A. PVC
B. PTFE
C. PETE
D. पॉलिस्टाइरीन
PTFE या टेफलॉन नॉनस्टिक बर्तन पर लेपित होता है।
A. नाइलॉन -6
B. टेरिलीन
C. नाइलॉन -610
D. PMMA
नाइलॉन -6 कैप्रोलैक्टम का समबहुलक है।
A. स्टार्च
B. RNA
C. बैकेलाइट
D. क्लोरोप्रीन
क्लोरोप्रीन (2- क्लोरोब्यूटा -1, 3-डाईन) नियोप्रीन (संश्लेषित रबर के एक प्रकार) का एकलक है, जो मुक्त मूलक बहुलकन द्वारा निर्मित होता है।
A. ऑरलॉन
B. टेरिलीन
C. टेफलॉन
D. नाइलॉन
पॉलिएमाइड एक ऐसा बहुलक है जिसमें एकलक, ऐमाइड बंधों (-CONH-) से जुड़े होते हैं। ये प्राकृतिक रूप से (प्रोटीन, जैसे कि ऊन और रेशम) में पाए जा सकते हैं और पदशः वृद्धि बहुलकन (नाइलॉन, अरामिड आदि) के माध्यम से कृत्रिम रूप से बनाए जा सकते हैं।
A. 1,3-ब्यूटाडाईन
B. आइसोप्रीन
C. क्लोरोप्रीन
D. 1,2-ब्यूटाडाईन
प्राकृतिक रबर आइसोप्रीन (2-मेथिल1, 3- ब्यूटाडाईन) का बहुलक है।
A. ब्यूना-S
B. ऑरलॉन
C. स्टाइरीन
D. बैकेलाइट
बैकेलाइट एक संघनन बहुलक है जबकि अन्य सभी योगज बहुलक हैं।
प्रत्यास्थ बहुलक प्रत्यास्थ गुण युक्त रबर के समान ठोस होते हैं। प्रत्यास्थ बहुलकों में बहुलक की शृंखलाएँ आपस में दुर्बल अंतराआण्विक बलों द्वारा जुड़ी रहती हैं, जो बहुलक को तानित होने देते हैं। उदाहरण- ब्यूना-S, ब्यूना-N, निओप्नीन

A. कायिक प्रवर्धन
B. एकजनकीय
C. विखंडन
D. खंडन
जल कुंभी एक उष्णकटिबंधीय, प्लावी जलीय पादप है। इसमें कायिक प्रवर्धन अत्यंत तीव्र गति से होता है। यह ठहरे हुए जल में सबसे अधिक वृद्धि करने वाली खरपतवार है।
A. एकजनकीय
B. विखंडन
C. खंडन
D. कायिक प्रवर्धन
एकजनकीय एक ऐसी स्थिति है, जिसमें केवल एक जनक से गुणसूत्र संतति में स्थानांतरित होते हैं। जीव केवल एक जनक से गुणसूत्र की दो प्रतियाँ या एक भाग प्राप्त करता है। दूसरा जनक गुणसूत्र की कोई भी प्रति स्थानांतरित नहीं करता।
A. मुकुलन
B. विखंडन
C. खंडन
D. कायिक प्रवर्धन
मुकुलन की स्थिति में, जनक जीव से उद्वर्ध के रूप में एक नया जीव उत्पन्न होता है। मुकुलन के समय कोशिकाद्रव्य का विभाजन असमान होता है और छोटी कलिकाएँ उद्वर्ध के रूप में उत्पन्न होती हैं। उदाहरण- हाइड्रा
A. मुकुलन
B. विखंडन
C. खंडन
D. कायिक प्रवर्धन
विखंडन सबसे सामान्य प्रकार का अलैंगिक जनन है, जिसके परिणामस्वरूप दो संतति कोशिकाओं का निर्माण होता है। उदाहरण- अमीबा
A. अलैंगिक जनन
B. लैंगिक जनन
C. मुकुलन
D. कायिक प्रवर्धन
अलैंगिक जनन में केवल एक जनक संतति को उत्पन्न करता है। इसमें न तो युग्मक का निर्माण होता है और न ही निषेचन की प्रक्रिया होती है। संततियों में कोई विविधताएँ दिखाई नहीं देतीं, अतः इसके कारण कोई विकासमूलक परिवर्तन नहीं होते।
A. अलैंगिक जनन
B. लैंगिक जनन
C. मुकुलन
D. कायिक प्रवर्धन
अलैंगिक जनन में केवल एक जनक संतति को उत्पन्न करता है। इसमें न तो युग्मक का निर्माण होता है और न ही निषेचन की प्रक्रिया होती है।
कायिक प्रवर्धन पौधों में अलैंगिक जनन के लिए प्रयुक्त होने वाला पारिभाषिक शब्द है। कायिक प्रवर्धन में नए पौधे या तो भूमिगत तनों, भूपृष्ठीय तनों, आदि के द्वारा प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होते हैं अथवा वे तने या मूल के कर्तन, रोपण या सूक्ष्म प्रवर्धन जैसी जैव प्रौद्योगिकी विधियों के द्वारा कृत्रिम रूप से उत्पन्न होते हैं|