पुष्पी पादपों में,
प्राणियों को निम्न वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है:
• सजीव प्रजक
• अंड प्रजक
अंड प्रजक प्राणियों में, निषेचन और युग्मनज विकास बाह्य होता है। अंडे निषेचित या अनिषेचित हो सकते हैं। निषेचित अंडे कठोर कैल्शियम कवच द्वारा अवरित होते हैं और निवेशन के पश्चात स्फुटन द्वारा नए शिशु का जन्म होता है । इनके उदाहरण हैं- मछलियाँ, उभयचर और सरीसृप।
सजीव प्रजक प्राणियों में निषेचन और युग्मनज का विकास आंतरिक होता है। ये शिशुओं को जन्म देते हैं। मादा जीव के शरीर से प्रसव के द्वारा शिशु पैदा होते हैं। सही भ्रूणीय देखभाल और संरक्षण के कारण संततियों की उत्तरजीविता के अवसर बढ़ जाते हैं। मनुष्यों सहित अधिकाँश स्तनधारी इसके उदाहरण हैं।
A. स्वयुग्मन परागण
B. परानिषेचन परागण
C. सजातपुष्पी परागण
D. परनिषेचन परागण
स्वयुग्मन या स्व-परागण का वास्तविक अर्थ होता है- समान आनुवंशिक गठन वाले व्यष्टियों के बीच एक संकरण। इसके अंतर्गत एक पुष्प के पराग कण उसी पौधे के दुसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरित होते हैं| इसके कारण पीढ़ी दर पीढ़ी जीवनशक्ति में कमी होती चली जाती है। इसे अन्तः प्रजनन अवनमन कहते हैं।
A. 1898
B. 1899
C. 1878
D. 1868
द्विनिषेचन की खोज सर्वप्रथम नावाशिचन ने 1898 में की थी।
A. भिन्नकालपक्वता
B. स्वःनिषेच्य उभयलिंगिता
C. स्त्रीपूर्वता
D. विषमरूपी पुष्प
किसी पुष्प के पुंकेसर और अंडप भिन्न-भिन्न समयों पर परिपक्व होते हैं। इसे भिन्नकालपक्वता कहा जाता है, यह पुष्प में परानिषेचन के लिए अनुकूल होती है| यदि पुंकेसर अंडपों से पहले परिपक्व हो जाते हैं, तो यह स्थिति पुंपूर्वता कहलाती है और यदि अंडप पुंकेसरों से पहले परिपक्व हो जाते हैं, तो यह स्थिति स्त्रीपूर्वता कहलाती है।
नर युग्मकों का अंड कोशिका केन्द्रक के साथ संलयन को युग्मक संलयन कहते हैं |
आवृतबीजी में, निषेचन के परिणामस्वरूप एक द्विगुणित युग्मनज तथा एक त्रिगुणित भ्रूणपोष केन्द्रक का निर्माण होता है। युग्मनज बीज के अन्दर भ्रूण में विकसित होता है।
पक्षिओं द्वारा परागित पुष्प लाल और नारंगी जैसे समृद्ध रंग के होते हैं क्योंकि पक्षी इन रंगों के प्रति संवेदनशील होते हैं। पक्षिओं द्वारा परागित पुष्प अधिक मात्रा में मकरंद उत्पादित करते हैं जो कि मटके के आकार के रूपांतरित परागकोष में संचित रहता है| इन पौधों को ऑर्निथोफिलिस पौधे भी कहते हैं|
असंगजनन जनन या प्रवर्धन की अलैंगिक विधि के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला एक सामान्य शब्द है, जिसमें भ्रूण का निर्माण और उसके बाद निषेचन सम्मिलित नहीं होता।
अनिषेकजनन को अनिषेचित अंड कोशिका से भ्रूण के विकास के रूप में परिभाषित किया जाता है।
चमगादड़ परागण में पराग कण चमगादड़ द्वारा स्थानांतरित किये जाते हैं| चमगादड़ द्वारा परागित पुष्प बड़े होते हैं तथा तेज गन्ध प्रसारित करते हैं| ये अधिक मात्रा में मकरंद उत्पादित करते हैं तथा इनमें अन्य पुष्पों की तुलना में अधिक संख्या में पुंकेसर पाए जाते हैं|
नारियल मे केंद्रकी और कोशिकीय भ्रूणपोष होता है | उसका बाहरी भाग कोशिकीय भ्रूणपोष और दूधिया पानी केंद्रकी भ्रूणपोष होता है |
पुरुषों में वृषण के लीडिग कोशिकाएँ पुंजनों अर्थात एंड्रोजन्स के संश्लेषण और स्राव को उद्दीपित करती हैं।
द्वितीयक पुटक के तृतीय पुटक में परिवर्तन के दौरान द्रव से भरी हुई एक गुहा-गहवर का निर्माण होता है|
शुक्राणु के अग्रभाग में उपस्थित अग्रपिंडक, अंडाणु के पारदर्शी अंडावरण अर्थात जोना पेल्युसिडा के माध्यम से अंडाणु के कोशिकाद्रव्य में प्रवेश करने में सहायता करता है।
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शुक्रजनन |
अंडजनन |
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यह प्रक्रिया यौवनारम्भ से प्रारम्भ होती है| |
यह भ्रूणीय चरण के दौरान प्रारम्भ होती है| |
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इसके अंतर्गत, एक शुक्राणु कोशिका द्वारा चार कार्यात्मक शुक्राणुओं का निर्माण होता है| |
इसके अंतर्गत, प्राथमिक अंडक द्वारा केवल एक अंडाणु का निर्माण होता है| |

एक वृषण की आरेखीय काट में शुक्रजनन के विभिन्न चरण
वृषण उदर गुहा के बाहर वृषणकोष में स्थित होते हैं, जिनका तापमान सामान्य शरीर के तापमान से 1 से 3 डिग्री सेल्सियस कम होता है, क्योंकि शुक्राणु केवल निम्न तापमान पर ही निर्मित हो सकता है।

नर में निम्न सहायक ग्रंथियाँ उपस्थित होती हैं-
अ) शुक्राशय
ब) पुरस्थ ग्रंथि
स) काउपर की ग्रंथियाँ या बल्बोयुरेथ्रल ग्रंथियाँ
नर सहायक ग्रंथियों का मुख्य कार्य स्खलनीय वाहिनियों और मूत्रमार्ग में तरल पदार्थों का स्रावण है।

A.
शुक्राणुओं की संख्या में कमी
B.
शुक्राणुओं की गतिशीलता में कमी
C.
शरीर के बहार कृत्रिम परिस्थिति में निषेचन
D.
शरीर के अन्दर कृत्रिम परिस्थिति में निषेचन
पात्रे निषेचन (आई.वी.एफ.) के अंतर्गत शरीर के बहार कृत्रिम परिस्थिति में निषेचन होता है| इस तकनीक को समान्यतः टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक कहा जाता है|
यौन संचारित रोग अथवा सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज- एस.टी.डी. एक प्रकार का रोग अथवा संक्रमण होता है जो कि यौन संभोग के माध्यम से होता है|
A.
बढ़ते भ्रूण में विकास संबंधी विसंगतियाँ होने पर बढ़ते भ्रूण में विकास संबंधी विसंगतियाँ, गर्भनिरोधक की विफलता, माँ के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य पर संभावित खतरा तथा बलात्कार के कारण गर्भावस्था की स्थिति में एम.टी.पी की अनुमति दी जाती है| डिंबवाहिनी नलिका उच्छेदन B. शुक्रवाहक-उच्छेदन C. गर्भाशय नलिका उच्छेदन D. शुक्राशय-उच्छेदन बंध्यकरण शल्यक्रिया को आगे गर्भावस्था को स्थायी रूप से रोकने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ किया जाता है। इसको पुरुषों में शुक्रवाहक-उच्छेदन अर्थात वासैक्टोमी तथा स्त्रियों में डिंबवाहिनी नलिका उच्छेदन अर्थात टूबैक्टोमी कहा जाता है| सहेली B. निरोध C. माला डी D. आई पिल सहेली विश्व की प्रथम हार्मोन-रहित गर्भनिरोधक गोलियाँ हैं| यह एक कृत्रिम, गैर-स्टेरॉयड या आ-स्टेरॉयड गर्भ निरोधक गोली है| यह एंटी-एस्ट्रोजेनिक है, जिस कारण यह प्रत्यारोपण को रोकती है| शुक्राणुओं की गतिशीलता में कमी B. शुक्राणुओं की गतिशीलता में वृद्धि C. जनन क्षमता में वृद्धि D. निषेचन क्षमता में वृद्धि अन्य अन्तः गर्भाशयी मल्टीलोड 375 एक तांबा मोचक युक्ति है| इससे आयन के मोचित होने से शुक्राणुओं की गतिशीलता तथा निषेचन क्षमता प्रभावित होती है| आपातकालीन गर्भाधान में मौखिक गर्भनिरोधक गोलियाँ गर्भाधान को रोकने के लिए उपयोग की जाती हैं| सामान्यतः इन्हें जन्म-नियंत्रक गोलियाँ कहा जाता है| ये एड्स तथा अन्य यौन संचारित रोगों के प्रसार की रोक-थाम नहीं कर पातीं| निरोध पुरुषों के लिए कंडोम का एक लोकप्रिय ब्रांड है। एड्स और अन्य यौन संक्रमित बीमारियों से अनुबंध करने से उपयोगकर्ता की सुरक्षा के अतिरिक्त लाभ के कारण हाल के वर्षों में इसका उपयोग बढ़ गया है। मासिक धर्म चक्र के 14 से 17 वें दिन संभोग ना करके B. मासिक धर्म चक्र के 14 से 21 वें दिन संभोग ना करके C. मासिक धर्म चक्र के 10 से 17 वें दिन संभोग ना करके D. मासिक धर्म चक्र के 7 से 14 वें दिन संभोग ना करके अगर दंपति मासिक धर्म चक्र के 10 से 17 वें दिन संभोग ना करे तो अनचाहे गर्भाधान से बचा जा सकता है| विवाह के लिए प्रेरित करने के लिए हम दो हमारे दो यह एक नारा है जिसको छोटे और खुशहाल परिवार की अवधारणा को विकसित करने के लिए मीडिया के माध्यम से संचारित किया गया। हम दो हमारा एक, इसको आजकल शहरों में काम-काजी जोड़ों द्वारा अपनाया गया है| वाल्टर सटन और थियोडोर बोवेरी ने सर्वप्रथम वंशागति का गुणसूत्री सिद्धांत प्रतिपादन किया था। उत्परिवर्तन किसी जीव के जीनों में होने वाला आकस्मिक और वंशानुगत परिवर्तन है। बहुप्रभाविता को एक एकल जीन के अनेक प्रभावों के रूप में परिभाषित किया जाता है। कोशिका के प्रकार के आधार पर उत्परिवर्तन दो प्रकार का होता है: कायिक उत्परिवर्तन जनन उत्परिवर्तन कायिक कोशिकाओं या सामान्य कोशिकाओं में होने वाले उत्परिवर्तन, समसूत्रण के माध्यम से मात्र कोशिकाओं से संतति कोशिकाओं में हस्तांतरित हो सकते हैं। जनन कोशिकाओं के युग्मकों में होने वाले उत्परिवर्तन अधिक प्रभावी होते हैं, क्योंकि ये संतति तक सफल रूप से हस्तांतरित हो जाते हैं। स्वतंत्र अपव्यूहन के नियम के अनुसार- “जब एक संकर में लक्षणों के दो समुच्चय पाए जाते हैं, तो लक्षणों के एक युग्म का विसंयोजन दूसरे युग्म से स्वतंत्र होता है। इस नियम का तात्पर्य यह है कि लक्षणों के एक युग्म की वंशागति दूसरे युग्म की वंशागति से प्रभावित नहीं होती।” समयुग्मजी जब एक जीन के लिए युग्म विकल्पी जोड़ा बड़ा Y बड़ा Y या छोटा y छोटा y के समान होता है, तो यह जीन समयुग्मजी कहलाता है। विषमयुग्मजी यदि एक जीन के लिए युग्म विकल्पी जोड़े में युग्म विकल्पी विपरीत लक्षणों को अभिव्यक्त करते हैं, जैसे- बड़ा Y छोटा y, तो यह स्थिति विषमयुग्मजी कहलाती है। हीमोफीलिया एक लिंग-सहलग्न अप्रभावी विकार है। हीमोफीलिया के लिए युग्मविकल्पी माँ से वंशानुगत होता है, लेकिन लगभग हमेशा केवल पुरुषों को ही यह रोग होता है, क्योंकि यह एक लिंग-सहलग्न अप्रभावी लक्षण है। जब एक सामान्य पुरुष एक वाहक महिला से विवाह करता है, तो सामान्य संतति उत्पन्न होने के 50% अवसर होते हैं; अर्थात 25% पुत्रों और 25% पुत्रियों के जीन समयुग्मजी या विषमयुग्मजी स्थिति में नहीं होंगे। 25% पुत्रों में समयुग्मजी स्थिति के कारण विकार हो सकता है, जबकि 25% पुत्रियाँ विषमयुग्मजी स्थिति के कारण वाहकों की भूमिका निभा सकती हैं | और इस विकार को अपने पुत्रों को संचारित कर सकती हैं। इस संकरण का F2 जीनप्ररुपी अनुपात मेंडल के संकरणों (1:2:1) के समान होता है, किंतु F2 में लक्षण प्ररुपी अनुपात 3 : 1 से 1 (लाल) : 2 (गुलाबी) : 1 (सफेद) में परिवर्तित हो गया है। इस प्रकार, अपूर्ण प्रभाविता में लक्षण प्ररुपी और जीनप्ररुपी अनुपात दोनों समान होते हैं। i. अभिकर्मक वे कारक होते हैं जो उत्परिवर्तन उत्पन्न करते हैं| इन्हें रासायनिक उत्परिवर्तजन और भौतिक उत्परिवर्तजनों के रूप में समूहबद्ध किया जा सकता है। पराबैंगनी विकिरण भौतिक उत्परिवर्तजन का एक उदाहरण है। एक्स-रे के संपर्क में लंबे समय तक रहने से भी उत्परिवर्तन हो सकता है। रासायनिक उत्परिवर्तजन कुछ रसायन होते हैं, जिनमें DNA या गुणसूत्र की संरचना को परिवर्तित करने की क्षमता होती है। ii. लोपन : लोपन के अंतर्गत, गुणसूत्र का एक भाग टूटकर अलग हो जाता है, जिससे गुणसूत्र और छोटा हो जाता है। व्युत्क्रमण : व्युत्क्रमण दूसरे प्रकार का गुणसूत्री उत्परिवर्तन है, जहाँ गुणसूत्र का एक भाग टूट जाता है और उसी स्थान पर पुनः जुड़ जाता स्वतंत्र अपव्यूहन के नियम के अनुसार “जब एक संकर में लक्षणों के दो समुच्चय या सेट पाए जाते हैं, तो लक्षणों के एक युग्म का विसंयोजन (segregation) दूसरे युग्म से स्वतंत्र होता है। इस नियम का तात्पर्य यह है कि लक्षणों के एक युग्म की वंशागति दूसरे युग्म की वंशागति से प्रभावित नहीं होती।” 16 F2 पौधों में से 12 पौधे पीले बीज और 4 पौधे हरे बीज धारण करते हैं। दूसरे शब्दों में, F2 बीजों के ¾ पीले और शेष ¼ हरे थे। इसका यह तात्पर्य है कि विपरीत लक्षणों के एकल युग्म अर्थात पीले और हरे बीज विसंयोजित हुए और मेंडल के 3:1 अनुपात में पुनः मिल गए। यह प्रभावी लक्षण या पीले बीजों के पक्ष में है। यही तथ्य गोल और झुर्रीदार लक्षणों के लिए भी लागू होता है।12 गोल बीज और 4 झुर्रीदार बीज हैं।इस स्थिति में भी, F2 जीवों के ¾ में प्रभावी लक्षण और शेष ¼ में अप्रभावी लक्षण पाए जाते हैं। इस प्रकार द्विसंकर संकरण का जीन प्ररुपी अनुपात 1:2:1:2:4:2:1:2:1 है। द्विसंकर संकरण का लक्षण प्ररुपी अनुपात 9:3:3:1 है। 3 गोल और 1 झुर्रीदार बीज जब 3 पीले और 1 हरे बीज से मिलते हैं, तो उत्पन्न करते हैं- 9 गोल-पीले; 3 गोल-हरे; 3 झुर्रीदार-पीले; 1 झुर्रीदार-हरा यही F2 का 9:3:3:1 लक्षण प्ररुपी अनुपात है। इस प्रकार, यदि हम लक्षणों की वंशागति को एक दूसरे से स्वतंत्र मानते हैं, तब भी वंशागति अनुपात में कोई परिवर्तन नहीं होता है। चार्ल्स डार्विन कई लेखकों, विद्वानों, दार्शनिकों और मित्रों से प्रभावित थे। अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस उनको प्रभावित करने वालों में से एक थे। माल्थस द्वारा लिखे "जीवसंख्या के सिद्धांत पर निबंध” (1798) को पढ़कर डार्विन प्रभावित हुए।
समष्टि द्वारा एक अनुकूलहीन ऐलील की हानि या लाभ को आनुवांशिक अपवाह कहा जाता है। उदाहरण, इस तरह का जीन समष्टि में प्रदेशियों के प्रवासन के माध्यम से प्रवेश कर सकता है या महामारी के कारण खत्म हो सकता है|
विस्तार की प्रक्रिया में, प्रत्येक वस्तु अन्य वस्तु से दूर होती गयी | इसके परिणामस्वरूप कम गति क्रिया के कारण उसकी गतिज ऊर्जा में कमी आती गयी | इस प्रकार सापेक्ष औसत ऊर्जा कम होती चली गयी |
एस.एल. मिलर, एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने प्रयोगशाला में वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं जैसी जीवन की उत्पत्ति के समय पृथ्वी पर थीं | उन्होंने प्रयोग करने के लिए एक बंद फ्लास्क में निहित मीथेन, हाइड्रोजन, अमोनिया और जल वाष्प में 800oC ताप के साथ विद्युत प्रवाह (डिस्चार्ज) किया।
जीवन की उत्पत्ति रासायनिक विकास अर्थात अकार्बनिक से विभिन्न कार्बनिक अणुओं के गठन से पहले हुई थी। रासायनिक विकास के समय पृथ्वी पर उच्च तापमान, ज्वालामुखी तूफ़ान, अपचायक वातावरण जैसी परिस्थितियाँ थीं|
B. 4000 C C. 8000 C D. 12000 C एस.एल. मिलर, एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने परीक्षण के लिए एक बंद फ्लास्क में निहित मीथेन, हाइड्रोजन, अमोनिया और जल वाष्प में 800oC ताप के साथ एक विद्युत प्रवाह (डिस्चार्ज) किया।
मिलर द्वारा जीवन की उत्पत्ति की संभावना के लिए किए गए प्रयोगों में उन्होंने शर्करा, नाइट्रोजनीय क्षारकों, वर्णकों और वसा प्राप्त किये |
मिलर के परीक्षणों (1953) में दिखाया गया कि प्रयोगशाला में आद्य परिस्थितियों को उत्पन्न कर H2, NH3, H2O and CH4 जैसे सरल अकार्बनिक अणुओं से जीवन के लिए आवश्यक आधारभूत कार्बनिक अणुओं का निर्माण किया जा सकता है। जीवन की उत्पत्ति के इतिहास में, अब यह स्वीकृत है कि वातावरण में पूर्व विद्यमान जीवन की अनुपस्थिति में सरल कार्बनिक अणु, संचित हुए और रासायनिक विकास के लिए एक समृद्ध वातावरण प्रदान किया।
प्रारंभिक बहुकोशिकीय पौधे और कवक 1,700 से 1,200 मिलियन वर्ष पूर्व चट्टानों में पाए गए थे, हालांकि शुरुआती बहुकोशिकीय प्राणी जीवाश्म बहुत बाद में लगभग 580 मिलियन वर्ष पूर्व पाए गए । फिर भी, वायु में ऑक्सीजन की वृद्धि के साथ जंतुओं में बहुत तेज़ी से विविधता आयी |
जिनकी रचना उनके पर्यावरण में सफलतापूर्वक रहने के अनुरूप होती है वे प्रकृति द्वारा चुने जाते हैं | डार्विन ने इसे प्राकृतिक चयन कहा है और इसे विकास की क्रियाविधि के रूप में लक्षित किया |
B. रोगकारक प्रतिरक्षा होती है। C. रोगजनक से संपर्क होने पर सक्रिय होती है। D. अधिक तीव्रता की प्राथमिक अनुक्रिया उत्पन्न करती है। अर्जित प्रतिरक्षा रोगजनक विशिष्ट प्रतिरक्षा होती है। यह प्रतिरक्षा रोगजनक से संपर्क होने पर सक्रिय होती है। यह कम तीव्रता की प्राथमिक अनुक्रिया उत्पन्न करती है। बाद में उसी रोगजनक से पुनः संपर्क होने पर यह उच्च तीव्रता वाली द्वितीयक या पूर्ववृत्तीय अनुक्रिया उत्पन्न करती है। उत्कृष्ट स्मृति अर्जित प्रतिरक्षा का एक लक्षण है।
कैनाबिनॉइड्स ऐसे रसायन हैं, जो कैनेबिस सैटाइवा या भाँग के पौधे के पुष्पक्रम से प्राप्त होते हैं।ये मस्तिष्क में कैनाबिनॉइड ग्राहियों से संपर्क करते हैं और विभ्रम उत्पन्न करते हैं। ये ह्रदय वाहिका तंत्र को प्रभावित करते हैं।
T कोशिकाएं कोशिका-माध्यित प्रतिरक्षा प्रदान करती हैं जो प्राथमिक रूप से उन रोगाणुओं की ओर निर्देशित होती हैं, जो भक्षकाणुओं द्वारा बच जाती हैं और गैर-भक्षकाणुक कोशिकाओं को संक्रमित करती हैं।
न्यूमोनिया निचले श्वसन पथ को प्रभावित करता है।
यह स्ट्रेप्टोकोकस नीमोनी जैसे जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न होता है। यह वायरस द्वारा भी उत्पन्न हो सकता है
मैरिजुआना या गाँजा, हशीश या चरस तथा भाँग कैनेबिस सैटाइवा से निर्मित होने वाले सामान्य उत्पाद हैं|
B. 1-ii, 2-iv, 3-i, 4-iii C. 1-iv, 2-iii, 3-ii, 4-i D. 1-ii, 2-iii, 3-iv, 4-i प्रतिरक्षा संक्रमण, रोग या अन्य अवांछित जैविक आक्रमणों से बचने के लिए पर्याप्त जैविक सुरक्षाओं से युक्त होने की एक स्थति है जो प्रतिरक्षा तंत्र के कार्यों से संबंधित होती है।
सामान्य स्थिति में कोई ऐसा शारीरिक या कार्यात्मक परिवर्तन, जो असुविधा अथवा अक्षमता उत्पन्न करता है अथवा किसी सजीव के स्वास्थ्य को हानि पहुँचाता है, रोग कहलाता है। रोग संक्रामक और असंक्रामक हो सकते हैं।
B. श्वेत रुधिर कोशिकाओं में। C. यकृत कोशिकाओं में। D. आंत में। परजीवी प्रारंभ में यकृत कोशिकाओं के भीतर गुणन करता है और फिर लाल रुधिर कोशिकाओं पर हमला करता है।
B. विषाणु C. शैवाल D. कवक दाद माइक्रोस्पोरम, ट्राइकोफाइटॉन और एपिडर्मोफाइटॉन जैसे कवकों से उत्पन्न होता है। यह त्वचा, नाखून और शिरोवल्क को प्रभावित करती है।
B. साल्मोनेला टाइफी द्वारा C. स्ट्रेप्टोकोकस नीमोनी द्वारा D. एनोफिलीज द्वारा सामान्य जुकाम राइनो वायरस द्वारा उत्पन्न होता है।
यह नाक और अन्य अंगों जैसे-साइनस, कानों और श्वसन नलियों में होने वाला संक्रमण है।
B. संक्रमित मच्छरों के काटने से C. TB से पीड़ित रोगियों द्वारा छोड़े गए बिंदुकों के अंतःश्वसन से D. घरेलू मक्खी द्वारा बिना ढके भोजन पर मल से एक स्वस्थ व्यक्ति निम्न प्रकार से TB से संक्रमित हो सकता है:
लसीकाणु अस्थि मज्जा में उत्पन्न होते हैं।
थाइमस अस्थि मज्जा के साथ लसीकाणुओं का विकास और परिपक्वन के लिए सूक्ष्म पर्यावरण प्रदान करती है।
प्लीहा लसीकाभ अंग रक्त जनित सूक्ष्म जीवों को फंसाकर, रुधिर का निस्यंदन करता है।
लसीका ग्रंथियाँ स्व-प्रतिरक्षा अनुक्रिया उत्पन्न करने के उद्देश्य से लसीकाणुओं को सक्रिय करने के लिए सूक्ष्म जीवों और अन्य प्रतिजनों को फंसाती हैं।
B. मियासथीनिया ग्रेविस C. स्वप्रतिरक्षी हेमोलीटिक रक्ताल्पता D. संधिवात गठिया तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने वाले कुछ स्व-प्रतिरक्षा रोग हैं:
B. पाचक C. उत्सर्जी D. अन्तःस्रावी ऐलर्जी प्रतिरक्षा तंत्र का एक विकार है, जो एलर्जन नामक पर्यावरणीय पदार्थों के कारण उत्पन्न होता है, जैसे- धूल के कण, पराग कण, कुछ खाद्य पदार्थ, बालों की रुसी आदि।
B. यौवनावस्था से प्रौढ़ता तक की एक अवधि। C. बाल्यावस्था से यौवनावस्था तक की एक अवधि। D. यौवनावस्था से मृत्यु तक की एक अवधि। किशोरावस्था, यौवनावस्था से प्रौढ़ता तक की एक अवधि है जो सामान्यतः पुरुषों में 14 वर्ष और स्त्रियों में 12 वर्ष में प्रारंभ हो जाती है।
B. वुचेरेरिया बैंक्रोफ्टाई, C. वुचेरेरिया मैलाई D. ब्रूगिआ टिमोरि एस्केरिस लुम्ब्रीकोइड्स नामक कृमि ऐस्केरिएसिस का रोगकारक है। इस रोग से प्रभावित होने वाला अंग आँत है।
श्लीपद रोग संक्रमित मादा क्यूलेक्स मच्छर के काटने से संचारित होता है। लसीका तंत्र में परजीवियों के रहने से संक्रमण उत्पन्न होता है। इस रोग के कारण पैरों और जनन अंगों में लंबे समय तक सूजन और अधिक विरूपताएँ हो जाती हैं|
B. स्ट्रेप्टोकोकस नीमोनी C. एनोफिलीज D. एंटअमीबा हिस्टोलिटिका अमीबता एंटअमीबा हिस्टोलिटिका नामक एक प्रोटोजोआ द्वारा फैलता है। यह आँतों का एक संक्रमण है, जो संक्रमित व्यक्ति में अनेक वर्षों तक उपस्थित रह सकता है।
मलेरिया प्लाज्मोडियम द्वारा उत्पन्न होता है। रोगकारक को अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए दो परपोषियों की आवश्यकता होती है, जो हैं- मनुष्य और मादा एनोफिलीज मच्छर।
B. लोपन C. व्युत्क्रमण D. उत्परिवर्तजन लोपन के अंतर्गत, गुणसूत्र का एक भाग टूटकर अलग हो जाता है, जिससे गुणसूत्र और छोटा हो जाता है। इस भाग की पूरी तरह से क्षति हो सकती है अथवा यह संजीन में किसी दूसरे स्थान पर जुड़ सकता है।
B. 3 C. 4 D. 7 मेंडल ने मटर के पौधे में विपरीत लक्षणों वाले सात युग्मों का चयन किया। इन लक्षणों को सुविधा के लिए ‘युग्मों या जोड़ों’ के रूप में संदर्भित किया जाता है, क्योंकि ये स्पष्ट रूप से एक लक्षण के दो भिन्न प्रकार प्रतीत होते हैं।
B. डाउन सिंड्रोम C. क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम D. थैलेसीमिया क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम XXY सिंड्रोम के नाम से भी प्रसिद्ध है। इससे प्रभावित व्यक्ति में एक मानक मानव नर गुणसूत्र प्ररूप के साथ-साथ 1 अतिरिक्त X गुणसूत्र होता है, जिसके कारण एक सामान्य व्यक्ति में पाए जाने वाले 46 गुणसूत्रों की अपेक्षा इसमें कुल 47 गुणसूत्र होते हैं।
B. 17 C. 19 D. 21 डाउन सिंड्रोम गुणसूत्र 21 की त्रिसूत्रता के कारण उत्पन्न होता है। इस प्रकार के व्यक्तियों में 47 गुणसूत्र होते हैं|
B. गुणसूत्री विकार C. सह प्रभाविता D. गुणसूत्री वंशागति मानवों में ABO रुधिर वर्ग प्रणाली सह प्रभाविता और बहु-युग्म विकल्पिता का एक उदाहरण है। ABO प्रणाली में, RBCs की सतह पर जीन I द्वारा नियंत्रित शर्करा या कार्बोहाइड्रेट्स के लंबे बहुलक पाए जाते हैं।
B. 45 C. 46 D. 64 मनुष्यों की सभी कोशिकाओं में एक विशेष संख्या में गुणसूत्र उपस्थित होते हैं।
गुणसूत्रों की इस संख्या को द्विगुणित गुणसूत्र संख्या के नाम से जाना जाता है, जो स्थिर अर्थात 46 रहती है। इन 46 गुणसूत्रों में से, 22 जोड़े ऑटोसोम्स या अलिंगसूत्रों के और 1 जोड़ा लिंग गुणसूत्र का होता है।
B. वर्णांधता C. थैलेसीमिया D. फीनाइल कीटोन्यूरिया वर्णांधता एक अप्रभावी लिंग-सहलग्न लक्षण है। वर्णांधता रोग में आँखें लाल और हरे रंग के बीच अंतर करने में असफल रहती हैं।
B. एल्ब्यूमिन C. हीमोग्लोबिन D. केराटिन दात्र कोशिका अरक्तता हीमोग्लोबिन नामक एक प्रोटीन, जिसमें दो एल्फा और दो बीटा- ये चार शृंखलाएँ होती हैं, को कोड करने वाले एक जीन के DNA के एकल क्षार युग्म में परिवर्तन से उत्पन्न होता है। ये सभी एमिनो अम्ल की लंबी श्रृंखलाओं से बने हुए होते हैं।
B. C. D. किसी वंशावली (pedigree) चार्ट का निर्माण करने के लिए विशेष प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है। वंशावली के चार्ट के प्रतीकों में से गोल चिन्ह एक मादा को प्रस्तुत करता है।
B. 1:1:2 C. 2:1:1 D. 1:2:1 तीन प्रभावी लक्षणप्ररूपों में से, दो विषमयुग्मजी होते हैं, जबकि शेष एक समयुग्मजी प्रभावी होता है। अर्थात दो प्रभावियों में Yy और शेष एक में YY के जीनप्ररूप होते हैं। संक्षेप में, समयुग्मजी प्रभावी, विषमयुग्मजी प्रभावी और समयुग्मजी अप्रभावी का जीन प्ररूपी अनुपात 1:2:1 हो जाता है।
B. कारक C. गुणसूत्र D. जीन किसी जीन के दो या अधिक वैकल्पिक रूप युग्म विकल्पी कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, फूल के रंग के जीन के लिए दो युग्म विकल्पी होते हैं, जिनमें से एक सफेद रंग और दूसरा बैंगनी रंग उत्पन्न करता है।
मटर के पौधों को उगाना बहुत सरल होता है और इन्हें कम रख-रखाव की आवश्यकता होती है। मटर के पुष्प स्व-परागित होते हैं। इसलिए ऐसे जीवनक्षम बीजों को प्राप्त करने के लिए इन्हें आसानी से संकरित किया जा सकता है, जिनका प्रयोग मटर के नए पौधों को उगाने में किया जा सकता है।
B. Xc Xc C. X X D. Xc Yc वर्णांधता स्त्रियों में केवल तभी प्रकट होती है, जब दोनों लिंग गुणसूत्र अप्रभावी जीन (Xc Xc ) को धारण करते हैं। स्त्रियाँ केवल तभी एक वाहक के रूप में कार्य करती हैं, जब लिंग गुणसूत्रों (XXc) पर वर्णांधता के लिए एक एकल अप्रभावी युग्मविकल्पी उपस्थित होता है।
B. गुणसूत्र 16 C. गुणसूत्र 17 D. गुणसूत्र 19 गुणसूत्र 19 पर एक जीन के 3'अस्थानांतरित भाग में एक ट्राई न्यूक्लिओटाइड पुनरावर्तक के प्रसार से यह रोग उत्पन्न होता है।
मायोटोनिक दुष्पोषण रोग की गंभीरता ट्राई न्यूक्लिओटाइड पुनरावर्तक इकाई की प्रतिलिपियों की संख्या के साथ सह-संबद्ध होती है।
B. अंटोनी वैन लीवेनहोक C. रोबर्ट ब्राउन D. टी.एच.मॉर्गन सर ग्रेगर जॉन मेंडल का जन्म सन् 1822 में ऑस्ट्रिया में हुआ था। वंशागति के प्रारूप में इनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण अध्ययन के लिए इन्हें ‘आनुवांशिकी के जनक’ के रूप में जाना जाता है।
मादाओं में लिंग गुणसूत्रों के रूप में ऑटोसोम्स और X-गुणसूत्रों का एक जोड़ा होता है। नरों में लिंग गुणसूत्रों के रूप में ऑटोसोम्स तथा X और Y गुणसूत्र का एक जोड़ा उपस्थित होता है। Y गुणसूत्र लिंग निर्धारित करता है|
B. XX/XO C. YY/XO D. XX/OO झींगुर, अनेक अर्धपंखी कीट, टिड्डे में XX/XO की विधि द्वारा लिंग निर्धारण होता है | इसमें केवल एक लिंग गुणसूत्र, X-गुणसूत्र उपस्थित होता है।
मादाओं में दो और नरों में केवल एक X-गुणसूत्र उपस्थित होता है।
मादाओं को XX और नरों को XO कहा जाता है। नरों में अक्षर ‘O ’ एक X -गुणसूत्र के अभाव को दर्शाता है।
B. 9:3:1:3 C. 1:3:3:9 D. 3:3:3:9 द्विसंकर संकरण के F2 पीढ़ी में भिन्न-भिन्न लक्षणप्ररूप उपस्थित हैं।
• 4 + 2 + 2 + 1 = 9 गोल पीले
• 2 + 1 = 3 झुर्रीदार पीले
• 2 + 1 = 3 गोल हरे
• 1 झुर्रीदार हरा
B. एकसंकर संकरण C. द्विसंकर संकरण D. परीक्षार्थ संकरण एक प्रभावी F2 पौधे के जीन प्ररूप का निर्धारण करने के लिए, मेंडल ने एक अप्रभावी पौधे से इसका संकरण कराया। अज्ञात जीनप्ररूप वाले एक पौधे का अप्रभावी जीन प्ररूप वाले पौधे के साथ संकरण करने की इस प्रक्रिया को परीक्षार्थ संकरण कहते हैं।
B. 20 C. 30 D. 40 एक गुणसूत्र पर जीन की एक जोड़ी या युग्म जो एक साथ संचरित होती है उसे सहलग्नता समूह कहा जाता है। जितने गुणसूत्रों की जोड़ी होती है उतने सहलग्नता समूह होते हैं|
B. एसीब्यूटोलौल C. स्टैटिन D. साइक्लोस्पोरिन A स्टैटिन का निष्कर्षण मोनॉस्कस परप्यूरीअस यीस्ट से किया जाता है। ये कोलेस्ट्रॉल संश्लेषण के लिए उत्तरदायी एंजाइम का प्रतिस्पर्धी संदमन करते हुए, कार्य करते हैं। ये मैवलोनेट के समान दिखाई देते हैं और ß-हाइड्रोक्सी-ß- मिथाइल ग्लूटेराइल CoA रिडक्टेस के प्रतिस्पर्धी संदमक होते हैं।
B. विषाणु (virus) C. विरोइड (viroid) D. प्रोटीन. प्रायोंस कुछ संक्रामक और गलत तरीके से वलित प्रोटीन हैं, जो स्तनधारियों में रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
B. पशुओं के प्रथम आमाशय C. पक्षियों की आंत्र D. मृदा के गहरे स्तर पशु सेलुलोस युक्त पदार्थों को अत्यधिक मात्रा में खाते हैं, जिनका पाचन करना आवश्यक होता है। ये जीवाणु सेलुलोस के विघटन में सहायता करते हैं और पशुओं के पोषण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
B. पर्याप्त रूप से कम हो जाती है। C. मूल मात्रा के समान हो जाती है। D. इसकी प्रदूषण क्षमता से अधिक हो जाती है। जब वाहित मल की BOD पर्याप्त रूप से कम हो जाती है तो वाहित मल के बहिःस्राव को एक निःसादन टैंक में से गुजारा जाता है, जहाँ ऊर्णक नामक जीवाणु आगे उपचार के लिए उसका अवसादन कर देते हैं।
B. कवकमूल C. ऊर्णक D. राइजोपस ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करने के लिए, वायवीय सूक्ष्मजीवों की ऊर्णकों के रूप में प्रबल वृद्धि होने लगती है।
IARI और KVIC दोनों ने भारत में बायोगैस उत्पादन की तकनीक विकसित की है।
B. पर्यावरण एवं वन मंत्रालय C. गृह मंत्रालय D. गृह मंत्रालयSOLUTION
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A. वीजमैन के जननद्रव (जर्मप्लाज्म) की निरंतरता के सिद्धांत से SOLUTION
A. महामारी के कारण एक प्रजाति की कुछ मूल विशेषताओं वाले जींस का SOLUTION
A. निर्माण के दौरान गोल हो गया SOLUTION
A. लुई पाश्चरSOLUTION
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A. 2000 CSOLUTION
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A. सहजननSOLUTION
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A. उपार्जित लक्षणों की वंशागति SOLUTION
A. निम्न तीव्रता वाली द्वितीयक या पूर्ववृत्तीय अनुक्रिया उत्पन्न करती है।SOLUTION
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A. 1-iii, 2-i, 3-iv, 4-iiSOLUTION
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A. लाल रुधिर कोशिकाओं में।SOLUTION
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A. राइनो वायरस द्वाराSOLUTION
A. श्वसन नलियों में होने वाले संक्रमण सेSOLUTION
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A. बाल्यावस्था से प्रौढ़ता तक की एक अवधि।SOLUTION
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A. साल्मोनेला टाइफीSOLUTION
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A. 2SOLUTION
A. टर्नर सिंड्रोमSOLUTION
A. 15SOLUTION
A. बहुप्रभाविताSOLUTION
A. 23SOLUTION
A. मायोटोनिक दुष्पोषणSOLUTION
A. थ्रोम्बिन्न SOLUTION
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A. 9:3:3:3:1SOLUTION
A. युग्म विकल्पी SOLUTION
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A. Xc XSOLUTION
A. गुणसूत्र 15SOLUTION
A. ग्रेगर जॉन मेंडलSOLUTION
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A. 9:3:3:1SOLUTION
A. सह प्रभाविताSOLUTION
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A. पैनीसिलीनSOLUTION
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A. मानव आंत्र SOLUTION
A. पर्याप्त रूप से बढ़ जाती है।SOLUTION
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A. नगर निगम