A. गेहूँ के खेत
B. धान के खेत
C. गन्ने के खेत
D. कपास के खेत
धान के खेतों में, सायनोबैक्टीरिया एक महत्वपूर्ण जैवउर्वरक के रूप में कार्य करता है। नील-हरित शैवाल भी मृदा में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा में वृद्धि करते हैं और इसकी उर्वरता को बढ़ाते हैं।
A. इसकी प्रदूषण क्षमता उतनी ही अधिक होती है।
B. इसकी प्रदूषण क्षमता उतनी ही कम होती है।
C. ऑक्सीजन की मात्रा उतनी ही अधिक होती है।
D. बायोगैस के रूप में इसकी उपयोगिता उतनी ही कम होती है।
जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग एक रासायनिक क्रियाविधि है, जो जल के एक नमूने में सजीवों (living organisms) द्वारा घुली हुई ऑक्सीजन की उद्ग्रहण दर (uptake rate) का निर्धारण करती है। हालाँकि यह मात्रा संबंधी एक शुद्ध परीक्षण नहीं है, किन्तु जल की गुणवत्ता के एक संकेत के रूप में इसका व्यापक स्तर पर प्रयोग किया जाता है।
A. सक्रियीत आपंक
B. प्राथमिक आपंक
C. बायोगैस
D. ऊर्णक
जल के प्राथमिक उपचार की प्रक्रिया में प्राथमिक आपंक उत्पन्न होता है।
A. वाइन
B. एसीटिक अम्ल
C. ब्रेड
D. बीयर
जौ के दाने गेहूँ के दानों के समान होते हैं। इसकी खेती अधिकतर अमेरिका और यूरोप में की जाती है। विशेष प्रकार के जौ का प्रयोग भिन्न-भिन्न प्रकार की बीयरों के निर्माण में किया जाता है। माल्टीकृत जौ (Malted barley) वह जौ होता है, जिसे अंकुरित होने दिया जाता है और फिर धीरे-धीरे सुखाया जाता है।
A. ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड
B. मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड और कार्बन डाइऑक्साइड
C. मीथेन और ऑक्सीजन
D. हाइड्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड
बायोगैस खाद, गाय के गोबर, नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट आदि कार्बनिक पदार्थों के अवायवीय किण्वन से उत्पन्न गैसों का मिश्रण है। बायोगैस में प्रमुख रूप से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड होती है। इसके साथ-साथ इसमें थोड़ी सी मात्रा में हाइड्रोजन और लेशमात्र हाइड्रोजन सल्फाइड भी होती है।
A. पेनिसिलियम रॉकफोर्ट
B. पेनिसिलियम नोटेटम
C. प्रोपिओनी बैक्टीरियम शर्मानी
D. एस्परजिलस नाइजर
पेनिसिलियम रॉकफोर्ट एक सामान्य मृतपोषी कवक है। इसे मृदा, क्षयशील कार्बनिक पदार्थों और पौधों से प्राप्त किया जा सकता है। इस कवक का प्रमुख औद्योगिक प्रयोग पेनिसिलियम रॉकफोर्टाई नामक नीले चीज़ का उत्पादन करने में होता है।
A. एसीटीक अम्ल
B. सिट्रिक अम्ल
C. ऑक्सैलिक अम्ल
D. लेक्टिक अम्ल
दुग्ध शर्करा लैक्टोज के सूक्ष्मजैविक किण्वन से उत्पन्न होने वाला प्रथम जैविक अम्ल लेक्टिक अम्ल है। इसका प्रयोग कंफेक्शनरी, फलों के जूस, डिब्बाबंद सब्जियों आदि में किया जाता है। इसके साथ-साथ, यह चमड़ा शोधन, प्लास्टिक और दवा निर्माण उद्योगों में रंगबंधक के रूप में भी प्रयुक्त होता है।
A. जीवाणु
B. नील-हरित शैवाल
C. लाल शैवाल
D. भूरे शैवाल
एगार मुख्यतया लंका या जाफना में पाए जाने वाले लाल शैवाल या समुद्री खरपतवार की अनेक प्रजातियों से, मॉस (ग्रेसिलेरिआ लाइकेनोइड) और जिलेडियम की प्रजातियों से प्राप्त होता है।
A. ब्यूटेनोल और ट्राईग्लिसराइड
B. ब्यूटेनोल, ग्लिसरॉल और पायरुबिक अम्ल
C. एसीटीक अम्ल और फीनॉफ्थेलिन
D. मिथाइल सैलिसिलिक अम्ल और ग्लूकोज़
यीस्ट के किण्वन से उत्पन्न होने वाले महत्वपूर्ण उत्पाद हैं: ब्यूटेनोल, ग्लिसरॉल और पायरुबिक अम्ल
जैव नियंत्रण कारक, पर्यावरण के प्रति अनुकूल सूक्ष्मजीव होते हैं, जिनका प्रयोग पादप पीड़कों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है | कीटनाशक, पीड़कनाशी और रासायनिक प्रदूषण फैलाकर पर्यावरण को क्षति पहुँचाते हैं।
B. स्ट्रेप्टोकोकस C. लैक्टोबैसिलस D. क्लोस्ट्रीडियम व्यक्ति की हृद धमनी में एक अस्थिर थक्का बन जाने के कारण उसे हृदयाघात हुआ है। उसके उपचार के लिए स्ट्रेप्टोकोकस नामक जीवाणु का प्रयोग किया जा सकता है। यह जीवाणु आनुवंशिक अभियांत्रिकी के माध्यम से रूपांतरित किया गया है और इसका प्रयोग रोगियों की रक्त वाहिकाओं से थक्के हटाने के लिए थक्का स्फोटन के रूप में किया जाता है।
B. निवेश द्रव्य C. बायोगैस D. प्राथमिक आपंक सक्रियीत आपंक का एक छोटा भाग निवेश द्रव्य के रूप में कार्य करने के लिए वायवीय टैंक के अन्दर वापिस पंप किया जाता है। आपंक का शेष भाग अवायवीय आपंक संपाचित्र नामक बड़े-बड़े टैंकों में पंप होता है।
लाइपेज का प्रयोग अपमार्जक संरूपणों में और कपड़ों से तेल के दाग हटाने में किया जाता है। एंजाइम के उत्पादन में सूक्ष्मजीव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
B. जैव प्रबलीकरण C. कृत्रिम संकरीकरण D. जैव उर्वरक जैव प्रबलीकरण, ऐसी खाद्य फसलों के प्रजनन की एक प्रक्रिया है, जिनमें जैवीय रूप से उपलब्ध सूक्ष्म पोषक, वसा और प्रोटीन प्रचुर मात्रा में होते हैं। इस कारण उपभोग के लिए फसल पोषक तत्वों से समृद्ध और स्वास्थ्यप्रद बन जाती है।
B. अंतःविशिष्ट कृत्रिम संकरण C. MOET D. बहिःसंकरण डेरी पशु प्रजनन के क्षेत्र में उच्च अंडोत्सर्जन और भ्रूण अंतरण तकनीकों का सुनियोजित ढ़ंग से प्रयोग बहु अंडोत्सर्ग भ्रूण अंतरण योजनाओं का एक उद्देश्य है।
B. पशुओं की विभिन्न प्रजातियों की व्यष्टियाँ संगम करती हैं। C. एकलिंगाश्रयी पुष्प परागण करते हैं। D. कृत्रिम परागण किया जाता है। संबंधित व्यष्टियों के बीच प्रजनन के परिणामस्वरूप किसी समष्टि की योग्यता में कमी अंतःप्रजनन अवसादन कहलाती है। इसके कारण, अप्रभावी लक्षण व्यक्त होते हैं, क्योंकि इस स्थिति में उन्हें समयुग्मज दशा में व्यक्त किया जा सकता है।
B. NBRI C. CCMB D. ICGEB NSC निरंतर इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयासरत है कि अनुमोदन प्रदान करने के पश्चात उत्पन्न किए गए और बाजार में बेचे जा रहे बीजों की गुणवत्ता बनाई रखी जाए। इस दिशा में, राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्थाएँ बीजों को प्रमाणित करती हैं। NSC की एक अंतर्निहित आंतरिक गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली भी है।
B. CRRI C. BRRI D. IARI Dee-geo-woo-gen और पेटा चावलों के बीच संकरण, IRRI ने सन् 1962 में किया था। सन् 1966 में, प्रजनन वंशक्रम एक नया कंषण बन गया, जिसे IR-8 कहा जाता है।
B. श्वेत किट्ट C. जैसिड D. प्ररोह और फल भेदक पूसा A-4, भिंडी की एक किस्म है, जो प्ररोह और फल भेदक के प्रति प्रतिरोधकता प्रदर्शित करती है।
B. मीथियोनीन (methionine) और हिस्टीन C. सिस्टीन (cysteine) और आरजीनीन (arginine) D. एस्पार्टिक अम्ल (aspartic acid) और ग्लूटैमिक अम्ल (glutamic acid) धान्यों और बाजरे में 6-12% प्रोटीन होते हैं, जिनमें सामान्यतः लायसीन और ट्रिप्टोफान का अभाव होता है।
B. सोमाक्लोन. C. कायिक संकर. D. जनन द्रव्य. कायिक संकरों का निर्माण कोशिकाओं के संलयन से होता है। दो विभिन्न प्रजातियों से संवर्धित कोशिकाओं को संलयन के लिए प्रेरित किया जाता है, जिससे कि वे संकर कोशिकाओं का रूप धारण कर सकें। इन कोशिकाओं की केन्द्रकी में भी संलयन होता है। [विषमकेंद्रक].
B. ब्रायोफाइट C. आवृतबीजी D. टैरिडोफाइट एकल कोशिका प्रोटीन संवर्धित शैवाल, खमीर या जीवाणु से निष्कर्षित प्रोटीन है, जिसका प्रयोग प्रोटीन से समृद्ध भोजन, विशेषकर पशु आहार के विकल्प के रूप में किया जाता है।
B. पुष्प अक्ष पर पत्र-प्रकलिकाओं की वृद्धि में C. कायिक मुकुलकों की वृद्धि में D. एक पूर्ण पादप के रूप में विकसित होने में एक कोशिका से एक सम्पूर्ण पौधा उत्पन्न किया जा सकता है, जब कोशिका का निवेशन ऐसे पोषक माध्यम में किया जाता है, जिसमें सुक्रोज, अकार्बनिक लवण, विटामिन, अमीनो अम्ल जैसे कार्बन स्रोत तथा ऑक्सिन और सायटोकाइनिन जैसे वृद्धि नियंत्रक उपस्थित होते हैं। यह घटना पूर्णशक्तता कहलाती है और पौधे इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं।
डेरी-उद्योग एक पशु प्रबंधन पद्धति है, जिससे मानव उपभोग के लिए दुग्ध तथा इसके उत्पाद प्राप्त होते हैं। सूक्ष्म प्रवर्धन द्वारा पौधे उत्पन्न करने का मुख्य लाभ यह है कि बहुत ही कम समय अवधि में एक बड़ी संख्या में पौधे उत्पन्न किए जा सकते हैं। भारत और चीन में सम्पूर्ण विश्व का 70% से भी अधिक पशुधन उपस्थित है। पशु प्रजनन में प्रयुक्त होने वाली विधियाँ निम्नानुसार हैं: 1. प्राकृतिक विधियाँ - इनमें शामिल हैं: (i) यादृच्छिक प्रजनन (ii) नियंत्रित प्रजनन. 2. कृत्रिम विधियाँ - इनमें शामिल हैं: (i) कृत्रिम वीर्यसेचन (ii) बहु अंडोत्सर्ग भ्रूण अंतरण प्रौद्योगिकी (MOET). पशु प्रजनन की कृत्रिम विधि सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि यह उत्पन्न होने वाली संतति में वाँछित गुणों को सुनिश्चित करती है। इसके अतिरिक्त, यह विधि कम व्यय वाली है, क्योंकि एक बैल से प्राप्त वीर्य का प्रयोग कई हजार गायों (यहाँ तक कि सुदूर स्थानों पर स्थित) में वीर्यसेचन के लिए किया जा सकता है। वह प्रक्रिया जिसके अंतर्गत जीनों के आधार अनुक्रम में परिवर्तनों द्वारा आनुवंशिक विविधताएँ उत्पन्न होती हैं, उत्परिवर्तन कहलाती है। इसके परिणामस्वरूप, नए लक्षण अथवा विशेषक विकसित होते हैं, जो जनकों में नहीं पाए जाते। उत्परिवर्तन को कृत्रिम रूप से रसायनों के प्रयोग द्वारा अथवा विकिरणों जैसे- गामा विकिरणों द्वारा प्रेरित किया जा सकता है। पशुओं के वे समूह, जो वंश तथा सामान्य लक्षणों जैसे: सामान्य रूप, आकृति, आकार, संरूपण आदि में समान हों, समान नस्ल के कहलाते हैं। पशु प्रजनन के उद्देश्य हैं: दुग्ध की गुणवत्ता में सुधार करने तथा उसके उत्पादन में वृद्धि करने के लिए, हम डेरी फार्म प्रबंधन से संबंधित निम्न संसाधनों तथा तंत्रों को ध्यान में रखेंगे। (i) दुग्ध उत्पादन मूल रूप से फार्म में रहने वाले पशुओं की नस्ल की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। इस प्रकार, उच्च उत्पादन क्षमता वाली अच्छी नस्ल (क्षेत्र की जलवायु परिस्थितियों के अंतर्गत) का चयन तथा उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। (ii) पशुओं को समुचित आहार प्रदान करने के साथ-साथ कड़ी सफाई तथा स्वास्थ्य का भी सर्वोपरि महत्व है। (iii) इसके अतिरिक्त, फार्म पर स्वास्थ्यकर वातावरण बनाए रखने के लिए, पशुओं की देखभाल करने वाले, दुग्धीकरण, दुग्ध उत्पादों के भंडारण तथा परिवहन पर भी समुचित ध्यान रखने की आवश्यकता है। (iv) समय-समय पर चिकित्सकीय देखरेख जैसे: पशुओं का टीकाकरण भी अत्यंत आवश्यक है। पशुपालन में शामिल है: पशुओं को आहार प्रदान करना, प्रजनन और उन्हें पालना। पशुपालन का प्रमुख उद्देश्य मांस और दूध प्रदान करना है। 1. दूध मानव उपभोग के लिए सर्वोत्कृष्ट भोजन माना जाता है। 2. पशुओं के मांस में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन होता है। कुक्कुट पक्षियों से प्राप्त अंडे और उच्च गुणवत्तापूर्ण मांस एक संतुलित आहार प्रदान करते हैं तथा पशु प्रोटीन का सस्ता स्रोत माने जाते हैं। इस प्रकार, दूध, अंडे, मांस, ऊन, रेशम, शहद, मोम और अन्य वस्तुएँ प्रदान कर, पशुपालन मानव कल्याण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पादप प्रजनन में निम्नलिखित चरण शामिल होते हैं: i) परिवर्तनशीलता का संग्रहण अर्थात जनन द्रव्य संग्रहण: समष्टियों में उपलब्ध प्राकृतिक जीनों के प्रभावी समुपयोजन के लिए कृष्य प्रजातियों की विभिन्न जंगली किस्मों, प्रजातियों और संबंधियों का संग्रहण और परिरक्षण। ii) जनकों का मूल्यांकन तथा चयन: वाँछनीय लक्षणों वाले पादपों की पहचान की जाती है, उन्हें बहुगुणित किया जाता है, उनका संकरण किया जाता है और उनके शुद्ध वंशक्रम प्राप्त किए जाते हैं। iii) चयनित जनकों के बीच पर-संकरण: नर जनक के रूप में चुने गए वाँछित पौधे से पराग कण एकत्र किए जाते हैं और उन्हें मादा जनक के रूप में चुने गए वाँछित पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र पर डाल दिया जाता है। चुने गए जनकों में बेहतर उत्पादन और रोग प्रतिरोधकता जैसी विशेषताएँ होती हैं। यह एक कठिन प्रक्रिया है, जिसके लिए कौशल की आवश्यकता होती है। iv) श्रेष्ठ पुनर्योगजों का चयन तथा परीक्षण : वाँछित लक्षणों में अपने दोनों जनकों से श्रेष्ठ पौधों का चयन किया जाता है, और अनेक पीढ़ियों तक उनका स्वपरागण किया जाता है, जब तक कि समयुग्मजता की स्थिति प्राप्त नहीं हो जाती है, जो यह सुनिश्चित करती है कि लक्षण विसंयोजित नहीं होंगे। v) नए कंषणों का परीक्षण, निर्मुक्त होना तथा व्यापारीकरण : फार्मों पर तथा अनुसंधान वाले खेतों में नए चुने गए वंशानुक्रम वाले पौधों को आदर्श परिस्थितियों में उगाकर उनका मूल्यांकन किया जाता है। फिर लगातार कम से कम तीन ऋतुओं तक अनेक स्थाओं पर परीक्षण किया जाता है। यदि नया वंशानुक्रम सभी दृष्टिकोणों से सफल पाया जाता है, तो उसे नई किस्म या कंषणों पर निर्मुक्त कर दिया जाता है। एकल कोशिका प्रोटीन- सूक्ष्म जीवों से बड़े पैमाने पर खाद्य प्रोटीनों का उत्पादन एकल कोशिका प्रोटीन कहलाता है। पशुओं और मानवों की संख्या में तीव्र दर से वृद्धि होने के कारण, आवश्यक भोजन की माँग की पूर्ति करने के लिए कृषि उत्पादन पर्याप्त नहीं है। 25 प्रतिशत से भी अधिक मानव जनसंख्या भूख तथा कुपोषण की शिकार है। इसका एक समाधान एकल कोशिका प्रोटीन है। एकल कोशिका प्रोटीन प्राप्त करने के लिए, सूक्ष्मजीवों का प्रोटीन के अच्छे स्रोत के रूप में औद्योगिक स्तर पर उत्पादन किया जा रहा है। सूक्ष्मजीव जैसे स्पाइरूलाइना को, आलू संसाधन संयंत्र से निकले अपशिष्ट जल (जिसमें स्टार्च उपस्थित होता है), घासफूस, शीरा, पशुखाद और यहाँ तक कि वाहितमल पर आसानी से उगाया जा सकता है, ताकि इसका बड़ी मात्रा में उत्पादन किया जा सके। चार्ल्स डार्विन ने अपने विश्व भ्रमण पर किये गए अवलोकनों के पश्चात, विशिष्ट सृष्टिवाद की सभी परिकल्पनाओं को उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान कठोर चुनौती दी थी |
जीवन के प्रथम अकोशिकीय रूप में, भीमकाय अणु (जैसे आर.एन.ए., प्रोटीन, पॉलीसैकराइडों आदि) की उत्पत्ति की अनुमानित अवधि तीन अरब वर्ष पूर्व है|
लुई पाश्चर ने सावधानीपूर्वक प्रयोगों द्वारा यह प्रदर्शित किया कि जीव की उत्पत्ति जीव से ही होती है| यह प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता है |
सर्वबीजाणु (पैन-स्पर्मिया) एक परिकल्पना है, जो मानती है कि जीवन के बीज पूरे ब्रहमाण्ड मे उपस्थित हैं| जीवन के ये बीज अनुकूल आवासों में जीवन की उत्पत्ति करते हैं |
B. बादलों का गठन C. ठंडी जलवायु D. गुरुत्वाकर्षणीय प्रभाव गैसें मुख्यतः गुरुत्वाकर्षणीय प्रभाव के कारण संघनित हुईं और वर्तमान ब्रह्माण्ड में आकाशगंगाओं का गठन किया |
एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिंदु से शुरू होकर अन्य भू –भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होने को अनुकूली विकिरण कहा जाता है।
दो संरचनाएँ जब समान या एक जैसा कार्य एक जैसी विधि से करती हैं , किन्तु भ्रूणीय परिवर्धन में भिन्नता प्रदर्शित करती हैं, समरूप कहलाती हैं|
आर्कियोप्टेरिक्स सरीसृपों और पक्षियों के बीच की संयोजी कड़ी है | इसमें सरीसृप की विशेषताएँ जैसे जबड़े में दांतों की उपस्थिति, अग्रपादों में नखर, मुक्त दुम कशेरुक के साथ लंबी पूंछ थी । इसमें पक्षियों की तरह पंखों की उपस्थिति, अग्रपादों का पंखों में रुपान्तर, V-आकार की फरकुला अस्थि और पक्षियों की तरह पादों की अस्थियाँ और मेखला उपस्थित थीं |
पश्च औद्योगीकरण अवधि के दौरान औद्योगिक धुआं और कालिख के कारण पेड़ों के तने काले पड़ गए थे। इस परिस्थिति में श्वेत पंखी शलभ जीवित नहीं रहे, क्योंकि वे शिकारियों द्वारा आसानी से पकडे जाते थे, जबकि काले पंख वाले या कृष्ण वर्ण शलभ आसानी से छिप सकने के कारण जीवित रह सके|
जीवों की कोई भी दो जातियाँ जिनकी वातावरणीय आवश्यकताएँ बिलकुल समान हों, बहुत समय तक एक ही स्थान पर नहीं रह सकती हैं क्योंकि उनके जीवों में समान वातावरणीय परिस्थितियों और आवास की के लिए प्रतिस्पर्धा होती है|
बिस्टन बेटूलरिया (शलभ) बोगेनबिलिया एवं क्युकरबिटा के काँटे एवं प्रतान (टेनड्रिल्स)| स्टेनले मिलर और हैलडेन उरे| समजातीय संरचनाओं में शरीर रचना समान होती है लेकिन उनके कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं, उदाहरण- व्हेल, चमगादड़ और मानव के अग्रपाद की संरचना समान हैं लेकिन वे भिन्न –भिन्न कार्य करते हैं। समजातता अपसारी विकास का परिणाम है। तुल्यरूप संरचनाओं में शरीर रचना समान नहीं होती है लेकिन ये समान कार्य करते हैं, उदाहरण- पेंगुइन और डॉल्फ़िन के पर। तुल्यरूपता अभिसारी विकास का परिणाम है। जीवाश्म चट्टानों में दबे जीवन के कठोर अंगों के अवशेष हैं। विभिन्न अवसादी परतों में जीवाश्मों का अध्ययन उस भूगर्भीय अवधि को इंगित करता है जिसमें वे विद्यमान थे। अवसाद पृथ्वी के लंबे इतिहास में जमा की गई भूमि की परतें हैं। हार्डी-वेनवर्ग साम्यता के अनुसार, एक जीव संख्या में अलील आवृत्तियाँ सुस्थिर होती है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थिर रहती हैं। जीन कोश सदा अपरिवर्तनीय रहता है। सभी अलील आवृत्तियों का कुल योग एक होता है। हार्डी-वेनवर्ग साम्यता में परिवर्तन की सीमा विकास का संकेत है। यदि जीन स्थानांतरण एक स्थान से दूसरे स्थान पर कई बार होता है, तो इसे जीन प्रवाह कहा जाता है। यदि यही परिवर्तन संयोगवश होता है, तो आनुवांशिक अपवाह कहलाता है। कभी-कभी समष्टि के नए नमूने में अलील आवृत्ति में परिवर्तन इतने भिन्न होते हैं कि वे एक अलग प्रजाति बन जाते हैं। मौलिक अपवाहित समष्टि संस्थापक बन जाती है और इस प्रभाव को संस्थापक प्रभाव कहा जाता है। पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर जीवन के अस्तित्व में आने तक इसकी संरचना में निम्नलिखित चरण सम्मिलित थे: (अ) ओपेरिन और हैलडेन ने प्रस्तावित किया कि जीवन का पहला स्वरूप पूर्व-विद्यमान निर्जीव पदार्थ से हो सकता है। (ब) उस समय , पृथ्वी की अवस्था उच्च तापयुक्त, ज्वालामुखीय तूफान वाली तथा वायुमंडल में मीथेन, अमोनिया आदि की कमी वाली थी| (स) 1953 में मिलर ने प्रयोगशाला में इसी पैमाने की स्थितियाँ उत्पन्न की और एक बंद फ्लास्क में निहित मीथेन, हाइड्रोजन, अमोनिया और जल वाष्प तथा 800oC ताप के साथ एक विद्युत प्रवाह किया। (द) एक सप्ताह के बाद, उन्होंने नमूने में अमिनो अम्ल, शर्करा, नाइट्रोजन क्षारको, वर्णकों तथा वसा और अन्य कार्बनिक अणुओं के गठन का विश्लेषण किया।
1850 में, औद्योगिकीकरण से पहले, यह देखा गया था कि इंग्लैंड में गहरे वर्णों के पंख वाले शलभ की तुलना में श्वेत पंखी शलभ अधिक थे। 1920 में, औद्योगीकरण के बाद, उसी क्षेत्र में श्वेत पंखी शलभ की तुलना में गहरे वर्ण पंखी शलभ अभिक संख्या में पाए गए। पूर्व-औद्योगिकीकरण अवधि में, श्वेत पंखी शलभ, श्वेत लाइकेन से लदे वृक्षों पर होते थे और इसलिए शिकारियों की नज़र से बच जाते थे; जबकि शिकारी द्वारा काले शलभों को आसानी से पकड़ लिया जाता था। औद्योगिकीकरण अवधि के बाद, औद्योगिक धुआं और कालिख के कारण पेड़ों के तने काले पड़ गए| इस परिस्थिति में, श्वेत पंखी शलभ, शिकारियों के कारण जीवित नहीं रहे और इस प्रकार काले शलभों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गयी। इससे पता चलता है कि एक मिश्रित समष्टि में, जो बेहतर अनुकूलन कर सकते हैं, जीवित रह सकते हैं और अपनी समष्टि के आकार में वृद्धि कर सकते हैं। स्त्री जनन हार्मोनों के स्रावण में कमी रोध विधियों के अंतर्गत, एक अंडाणु और एक शुक्राणु को कुछ रोधक साधनों की सहायता से एक दूसरे से संलयित होने से रोका जाता है। सामान्यतः उपलब्ध रोधक साधन हैं: पुरुष कंडोम तथा स्त्री कंडोम| बंध्यता B. आर्तव चक्र की अनुपस्थिति C. किशोरावस्था में आर्तव चक्र का प्रारम्भ D. एक स्त्री में आर्तव चक्र की समाप्ति ऋतुरोध अर्थात एमेनोरिया का तात्पर्य है आर्तव चक्र की अनुपस्थिति| इसके अंतर्गत प्रसव के उपरान्त स्त्री द्वारा शिशु को स्तनपान कराने के दौरान आर्तव चक्र और अण्डोत्सर्ग प्रारम्भ नहीं होते| बड़े परिवार को प्रोत्साहन B. गर्भनिरोधक उपाय का विरोध C. सुनिश्चित विवाह योग्य वैधानिक आयु D. बंध्यता विवाह योग्य वैधानिक आयु स्त्री के लिए 18 वर्ष तथा पुरुष के लिए 21 वर्ष सुनिश्चित करने से जनसंख्या नियंत्रित की जा सकती है| जननक्षम युगलों की वृद्धि B. जननक्षमता में वृद्धि C. यौन संचारित रोगों की वृद्धि D. यौन-संबंधी समस्याओं के लिए समग्र चिकित्सा सुविधाओं यौन संबंधी मामलों, नियंत्रित प्रसव के बारे में जागरूकता, चिकित्सकीय सहायता प्राप्त प्रसव की संख्या में वृद्धि, बेहतर प्रसवोत्तर देखभाल, बेहतर पहचान और यौन संचारित रोग का उपचार और सभी यौन-संबंधी समस्याओं के लिए समग्र चिकित्सा सुविधाओं में वृद्धि ने समाज के जनन स्वास्थ्य में सुधार किया है। आधुनिक सुविधाएँ B. एम्नियोसेंटेसिस C. जन्मदर की मृत्युदर से अधिकता D. मृत्युदर की जन्मदर से अधिकता जनसंख्या में औसत वार्षिक प्रतिशत परिवर्तन जन्मदर की मृत्युदर से अधिकता अथवा देश में प्रवेश करने और छोड़ने वाले प्रवासियों के संतुलन में परिवर्तन के कारण हो सकता है| भ्रूण में रोग की उत्पत्ति B. मादा भ्रूण हत्या में वृद्धि C. चिकित्सीय सुविधाओं में कमी D. परीक्षण में प्रयोग की जाने वाली किरणों द्वारा भ्रूण में विकृति की उत्पत्ति उल्बवेधन अर्थात एम्नियोसेंटेसिस गुणसूत्र दोषों का पता लगाने के लिए प्रयोग किया जाने वाला एक परीक्षण है। लेकिन, भ्रूण लिंग निर्धारण के लिए इसका दुरुपयोग किया जाता है जिसके परिणामस्वरूप मादा भ्रूण हत्या की जाती हैं| कानूनी रूप से बढ़ती मादा भ्रूण की जांच करने के लिए लिंग निर्धारण को प्रतिबंध कर दिया गया| गर्भ निरोधक पर नियंत्रण B. जनसंख्या में वृद्धि C. जनसंख्या में वृद्धि की रोकथाम D. अनचाही गर्भावस्था की रोकथाम जनन तथा बाल स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम के कुछ आधार निम्न हैं: अनचाहे गर्भावस्था की रोकथाम, गर्भ निरोधकों के उपयोग में वृद्धि, आपातकालीन गर्भनिरोधक, सुरक्षित गर्भपात, गर्भावस्था तथा प्रसव सेवाएँ आदि|
रोग की अनुपस्थिति B. यौन संचारित रोग की अनुपस्थिति C. रोग तथा यौन संचारित रोग की अनुपस्थिति, D. पूर्ण शारीरिक, भावनात्मक, व्यवहारिक और सामाजिक स्वास्थ्य जनन स्वास्थ्य को न कि केवल रोग की अनुपस्थिति अपितु पूर्ण शारीरिक, भावनात्मक, व्यवहारिक और सामाजिक स्वास्थ्य की स्थिति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है| जनन स्वास्थ्य, जनन तंत्र, प्रक्रियाएँ तथा कार्यों से सम्बंधित होता है| एस.टी.डी B. एम.टी.पी C. एम.एम.आर D. ए.आर.टी गर्भावस्था की चिकित्सीय समाप्ति (एम.टी.पी) चिकित्सा या गैर-शल्य चिकित्सा पद्धति से गर्भावस्था की समाप्ति होती है, इससे पहले कि भ्रूण स्वतंत्र रूप से विकसित हो सके| प्रोजेस्टेरोन B. वृद्धि हार्मोन C. थायरोक्सिन D. ल्युटिनाइजिंग हार्मोन मौखिक गर्भनिरोधक गोलियाँ जन्म को नियंत्रित करने के लिए उपयोग की जाती हैं जिसमें सबसे महत्वपूर्ण घटक प्रोजेस्टेरोन होता है। असुरक्षित यौन संबंध के एक या अधिक वर्षों के बाद भी गर्भ धारण करने में असमर्थता बंध्यता कहलाती है। जनन तथा बाल स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज को जनसंख्या स्थिरीकरण प्राप्त करने में सक्षम बनाना है| जनन स्वास्थ्य को न कि केवल रोग की अनुपस्थिति अपितु पूर्ण शारीरिक, भावनात्मक, व्यवहारिक और सामाजिक स्वास्थ्य की स्थिति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है| स्तनपान अनार्तव अथवा ऋतुरोध अर्थात एमेनोरिया का तात्पर्य है आर्तव चक्र की अनुपस्थिति| यह गर्भनिरोधन की एक विधि है| प्रसव के उपरान्त स्त्री द्वारा शिशु को स्तनपान कराने के दौरान आर्तव चक्र और अण्डोत्सर्ग प्रारम्भ नहीं होते| यह प्रसव के बाद छ महीने तक प्रभावी रहता है| इसलिए पुर्णतः स्तनपान कराने वाली स्त्री में गर्भधारण के अवसर लगभग शून्य होते हैं| 1) उपयोगकर्ता के अनुकूल होना चाहिए। 2) प्रभावी या कम दुष्प्रभावों के साथ उत्क्रमणीय होना चाहिए। 3) उपयोगकर्ता की यौन इच्छा में बाधक नहीं होना चाहिए। 4) आसानी से उपलब्ध हो सकता हो| प्राकृतिक जन्म नियंत्रण विधियाँ: 1) आवधिक संयम 2) बाह्य स्खलन या अंतरित मैथुन अर्थात कोइटस इन्ट्रप्सन 3) स्तनपान अनार्तव अर्थात लैक्टेशनल एमेनोरिया शुक्रवाहक-उच्छेदन डिंबवाहिनी नलिका उच्छेदन पुरुषों के लिए एक स्थायी वंध्यीकरण प्रक्रिया है| स्त्रियों के लिए एक स्थायी वंध्यीकरण प्रक्रिया है| शुक्रवाहक को काट अथवा बाँध दिया जाता है जो नर जनन तंत्र में शुक्राणुओं को ले जाने के लिए एक प्रकार की नली होती हैं| गर्भावस्था को रोकने के लिए डिंबवाहिनी नली को काटकर बाँध दिया जाता है| संयुक्त मौखिक गर्भ निरोधक गोलियाँ प्रोजेस्टोजेन गर्भ निरोधक गोलियाँ एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टोजेन दोनों का संयोजन होता है| प्रोजेस्टोजेन उपस्थित होता है| इनको प्रति दिन एक बार लिया जाता है| इनको प्रति दिन एक बार लिया जाता है| उदाहरण- माला-डी, माला-एन| उदाहरण: नॉरलेवो तथा प्रेग्नौन| आईवीएफ के परिणामस्वरूप गर्भावस्था को पूर्ण करने के लिए, चार चरण सम्मिलित होते हैं: उद्धिपन्न, पुनर्प्राप्ति, निषेचन तथा स्थापन| §पहले चरण में अंडाशय को हार्मोन द्वारा कई जीवनक्षम अंडाणुओं का उत्पादन करने के लिए उद्दीपित करना है | §दूसरे चरण में स्त्री जनन मार्ग के माध्यम से अंडाशय से अंडाणु की पुनर्प्राप्ति होती है| §तीसरे चरण में आई.वी.एफ प्रयोगशाला में अंडाणु का निषेचन तथा भ्रूण का संवर्धन सम्मिलित होता है| §और चौथा चरण भ्रूण स्थानांतरण अथवा ई.टी है जिसके अंतर्गत भ्रूण का गर्भाशय में स्थानान्तरण किया जाता है, जिसे इंट्रा यूटेराइन ट्रांसफर – आई.यु.टी कहा जाता है| यौन संचारित रोग (STD) एक प्रकार का रोग अथवा संक्रमण होता है जो कि यौन संभोग के माध्यम से होता है| इसे रतिजरोग अथवा जनन मार्ग संक्रमण भी कहा जाता है| उदहारण: हेपेटाइटिस बी, जननांग हर्पीस और एच.आई.वी. संक्रमण| निम्न उपायों के द्वारा यौन संचारित रोगों की रोकथाम की जा सकती है: · किसी अनजान व्यक्ति अथवा बहुत से वक्तियों के साथ यौन संबंध बनाने से बचना चाहिए| · संभोग के समय सदैव कंडोम का प्रयोग करना चाहिए| · किसी प्रकार के संदेह के मामले में, रोग की प्रारम्भिक जांच के लिए डॉक्टर से परामर्श लें और रोग का पता चलने पर पूरा उपचार लिया जाना चाहिए। केवल कुछ को छोड़कर अधिकांशतः यौन संचारित रोगों का उपचार प्रतिरक्षीयों द्वारा किया जा सकता है| भाँग )कैनेबिस सैटाइवा( एक विभ्रांति उत्पादक पौधा है | विडाल परीक्षण का प्रयोग मियादी बुखार और अन्य साल्मोनेला संक्रमणों की पहचान के लिए किया जाता है। साल्मोनेला टाइफी मियादी बुखार या टाइफायड का रोगकारक है | विभ्रांति उत्पादक गुण वाले पौधे हैं- भाँग (कैनेबिस सैटाइवा), बेलाडोना (ऐट्रोफा बेलाडोना), धतूरा (डाटूरा स्ट्रेमोनियम)। सामान्य स्थिति में कोई ऐसा शारीरिक या कार्यात्मक परिवर्तन, जो असुविधा अथवा अक्षमता उत्पन्न करता है अथवा किसी सजीव के स्वास्थ्य को हानि पहुँचाता है, रोग कहलाता है। ऐल्कोहल सबसे अधिक और सामान्यतः उपभोग और कुप्रयोग किया जाने वाला मादक पदार्थ है। यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है जिस कारण चालाक अपने पर नियंत्रण रखने में असमर्थ हो जाता है तथा उचित निर्णय नहीं ले पाता| अतः शराब पीकर गाड़ी चलाना हानिकारक हो सकता है| अ) मियादी बुखार या टाइफायड - साल्मोनेला टाइफी अ) मलेरिया का रोगजनक: प्रोटोज़ोन परजीवी HIV का संचारण निम्न प्रकार से होता है: HIV संक्रमणों के परवर्ती लक्षण: • ऊर्जा और वजन में कमी • बारबार बुखार और पसीना आना • जीभ या मुँह में मोटी सफेद परत का जमना • गंभीर या बार-बार होने वाला योनि यीस्ट संक्रमण • दीर्घकालीन श्रोणि शोथ रोग • लंबे समय से बारबार अतिसार का रोग • कंठ, काँख या श्रोणि में स्थित ग्रंथियों में सूजन • चेतना की स्थिति में परिवर्तन, व्यक्तित्व में परिवर्तन, मानसिक ह्रास B. नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग C. प्रोफेसर पंचानन माहेश्वरी D. ग्रेगर जॉन मेंडल नोबेल पुरस्कार विजेता नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग ने गेहूँ की अर्ध-वामन किस्में विकसित की थीं, जो भारत, पाकिस्तान और मैक्सिको में सफलतापूर्वक उगाई गईं थीं।
B. फसल क्रांति C. कृषि क्रांति D. हरित क्रांति बढ़ती हुई जनसंख्या की माँग की पूर्ति के लिए खाद्य उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से सन् 1960 के दशक के मध्य में पादप प्रजनन की अनेक तकनीकों का प्रयोग करते हुए गेहूँ और चावल की उच्च उत्पादकता वाली अनेक किस्में विकसित की गई। इस चरण को हरित क्रांति कहा जाता है।
B. 55%. C. 33%. D. 20%. भारत एक कृषिप्रधान देश है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि का योगदान लगभग 33% है और भारत की लगभग 62% जनसंख्या कृषि क्षेत्र में संलग्न है।
B. 5,000-8,000 वर्ष C. 9,000-11,000 वर्ष D. 12,000-15,000 वर्ष पारंपरिक पादप प्रजनन की विधि का अभ्यास मानव सभ्यता के आरम्भ के समय से किया जाता रहा है। इस प्रकार, यह प्रथा लगभग 9,000-11,000 वर्ष प्राचीन है।
B. प्रसव के पश्चात बच्चे को स्तनपान कराने में सक्षम नहीं होती है। C. एक से अधिक भ्रूणों को धारण करती है। D. कृत्रिम वीर्यसेचन किए जाने के पश्चात अपने स्वयं के भ्रूण के साथ गर्भाधान करती है। एक प्रतिनियुक्त माँ अन्य महिला के भ्रूण के विकास के लिए अपना गर्भाशय किराये पर देती है। वह बच्चे की जैविक माँ नहीं होती। अतः बच्चे के जन्म के पश्चात, उसे वह बच्चा उसकी वास्तविक माँ को सौंपना होता है।
B. कृत्रिम वीर्यसेचन C. गर्भनिरोधकों का प्रयोग D. गोलियों का सेवन कृत्रिम वीर्यसेचन विधि के अंतर्गत, वाँछित नर से वीर्य एकत्र किया जाता है और प्रजनक इसे इंजेक्शन के माध्यम से चयनित मादा के जनन पथ के अन्दर प्रविष्ट कर देता है।
B. अंतराविशिष्ट कृत्रिम संकरीकरण C. अंतःविशिष्ट कृत्रिम संकरीकरण D. अंतःप्रजनन संकरण अंतःविशिष्ट कृत्रिम संकरीकरण के अंतर्गत, दो विभिन्न प्रजातियों के नर और मादा पशुओं का संगम कराया जाता है, जिससे कि दोनों प्रजातियों की वाँछित विशेषताओं को मिलाकर एक नई जाति उत्पन्न की जा सके। खच्चर की उत्पत्ति गधे और घोड़े के बीच संकरण के फलस्वरूप होती है।
B. 25%. C. 40%. D. 70%. एक अनुमान के अनुसार, भारत और चीन में सम्पूर्ण विश्व का 70% से भी अधिक पशुधन है। किन्तु, उत्पादन के दृष्टिकोण से, यह पशुधन मात्र 25 % है अर्थात प्रति पशु उत्पादकता अत्यंत कम है। पशुधन की संख्या के अनुसार इस उत्पादकता में वृद्धि होनी चाहिए।
B. पशुचिकित्साविज्ञान C. पशु प्रजनन D. डेरी उद्योग डेरी फार्म प्रबंधन दूध प्रदान करने वाले पशुओं और प्रणालियों से संबंधित है, जिनसे दूध की गुणवत्ता में सुधार और उसके उत्पादन में वृद्धि होती है।
B. बैंगन C. गेहूँ D. चावल परभणी क्रांति, भिंडी की एक नई किस्म है। जंगली किस्मों से भिन्न-भिन्न गुण प्राप्त करने के लिए विभिन्न जीन कृष्य किस्मों में स्थानांतरित किए जाते हैं, जिससे कि उनमें वाँछित श्रेष्ठ लक्षणों का प्रवेश कराया जा सके। उदाहरण: भिंडी में पीला मोजेक विषाणु प्रतिरोधी जीन एक जंगली प्रजाति से स्थानांतरित किया गया है और परभणी क्रांति नामक एक नई किस्म सफलतापूर्वक विकसित की गई है।
एंटीबायोटिक सूक्ष्मजीव द्वारा उत्पन्न होने वाला एक कार्बनिक यौगिक है, जो अन्य सूक्ष्म जीवों की वृद्धि को रोक देता है या उन्हें नष्ट कर देता है । प्रोटिएस, एमाइलेज और रेनिन। इडली और डोसा बनाने के लिए प्रयोग किया जाने वाला आटा CO2 गैस उत्पन्न होने के कारण फूल जाता है। यह प्रदर्शित करता है कि उपापचय के समय सूक्ष्म जीव गैस उत्पन्न करते हैं। प्राथमिक उपचार पूरी तरह से यांत्रिक होता है, जिसमें निस्यंदन और अवसादन के माध्यम से छोटे और बड़े कण बाहर निकाल दिए जाते हैं। जबकि द्वितीयक उपचार जैविक होता है, जिसमें सूक्ष्म जीव मुख्य भूमिका निभाते हैं। कृषि उत्पादों की माँग में हो रही सतत वृद्धि को ध्यान में रखते हुए रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है, किन्तु इससे बड़े स्तर पर प्रदूषण भी फैलता है। इस प्रकार के प्रदूषण से बचने या इसे कम करने के लिए, यह आवश्यक है कि जैव उर्वरकों का प्रयोग करने वाली जैव खेती को अपनाया जाए। सूक्ष्म जीवों का सबसे अनुकूल आवास मृदा है, जहाँ ये बहुतायत में पाए जाते हैं। सामान्यतः, मृदा की सबसे ऊपरी परत से लेकर 5-15 सेमी की गहराई तक ये अत्यधिक संख्या (1000000 प्रति cu cm) में पाए जाते हैं। मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीव कार्बनिक पदार्थों का अपघटन करके और मुक्त नाइट्रोजन का उपयोग किए जाने योग्य रूप में स्थिरीकरण करके मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करते हैं। नहीं! इस उद्देश्य के लिए जीवाणुओं का प्रयोग नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनमें वे विशिष्ट एंजाइम नहीं पाए जाते हैं, जिनकी आवश्यकता प्राथमिक स्थानांतरण उत्पादों में कार्बोहाइड्रेट या लिपिड जोड़ने के लिए होती है। स्थानान्तरण के पश्चात रूपांतरित प्रोटीन या तो किसी संवर्धन माध्यम में वृद्धि कर रही पारजीनी सुकेंद्रकी कोशिकाओं में या पारजीनी जीवों (पौधों या प्राणियों) में उत्पन्न किए जा सकते हैं। मुख्य रूप से, इस विधि का प्रयोग किसी लाभकारी प्रोटीन के उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
A. जैव नियंत्रण कारक SOLUTION
A. जाइमोमोनाजSOLUTION
A. ऊर्णकSOLUTION
A. स्ट्रैप्टोकाइनेजSOLUTION
A. जैव आवर्धनSOLUTION
A. नियंत्रित प्रजनन प्रयोगSOLUTION
A. घनिष्ठ रूप से संबंधित पशुओं की व्यष्टियाँ संगम करती हैं।SOLUTION
A. NSCSOLUTION
A. IRRISOLUTION
A. ऐफिडSOLUTION
A. लायसीन और ट्रिप्टोफान SOLUTION
A. किण.SOLUTION
A. शैवालSOLUTION
A. पर्ण कोरों पर पादपकों की वृद्धि मेंSOLUTION
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A. सोलहवीं शताब्दी के दौरान SOLUTION
A. एक अरब वर्ष पूर्व SOLUTION
A. फ्लास्क में पैदा हो सकता है” SOLUTION
A. पृथ्वी पर अंतःविकसित है SOLUTION
A. निम्न ऊर्जा घनत्वSOLUTION
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A. कार्यात्मक समानता हो SOLUTION
Right Answer is: A
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(1) प्रारंभिक पृथ्वी पर कोई वातावरण नहीं था।
(2) चट्टानों के पिघलने से निकले जल वाष्प, मीथेन, कार्बन-डाई-ऑक्साइड और अमोनिया ने इसकी सतह को ढक लिया।
(3) सूर्य से पैराबैंगनी (UV) किरणों ने जल को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ दिया और हल्का हाइड्रोजन मुक्त हो गया |
(4) ऑक्सीजन ने अमोनिया और मीथेन के साथ मिलकर जल, कार्बनडाइऑक्साइड और अन्य यौगिक बनाये।
(5) ओजोन परत का निर्माण हुआ।
(6) जैसे ही तापमान का स्तर नीचे आया जल वाष्प वर्षा के रूप में नीचे बरस पड़ा|
(7) गहरे स्थानों में जल एकत्रित होने से महासागरों का निर्माण हुआ|
(8) पृथ्वी की उत्पत्ति के 500 मिलियन वर्ष बाद जीवन अस्तित्व में आया| SOLUTION
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B.
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A.
B.
C.
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आ) क्षय रोग - माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस
इ) न्यूमोनिया - स्ट्रेप्टोकोकस नीमोनी A.
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
i. प्लाज्मोडियम वाइवेक्स या
ii. प्लाज्मोडियम फैल्सीपैरम
ब) मलेरिया का संक्रमण: मलेरिया संक्रमण आमतौर पर मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से किसी भी व्यक्ति को प्रेषित किया जाता है। मनुष्यों में ये परजीवी यकृत में वृद्धि करते हैं और लाल रुधिर कोशिकाओं पर आक्रमण करके उन्हें नष्ट कर देते हैं|
स) मलेरिया के लक्षण:
i. चरम ठंड के साथ बुखार।
ii. शरीर के तापमान में अचानक वृद्धि और फिर बुखार में पसीना आ जाता है। यह बार-बार निश्चित अंतराल अवधि के साथ होता है।
iii.. सिरदर्द, शरीर या पेशी दर्द
iv. मतली और उल्टी|
B.
C.
D.
Right Answer is: SOLUTION
A. प्रोफेसर एम.एस.स्वामीनाथनSOLUTION
A. श्वेत क्रांतिSOLUTION
A. 80%.SOLUTION
A. 2,000-4,000 वर्षSOLUTION
A. अन्य महिला के भ्रूण के लिए अपना गर्भाशय किराये पर देती है।SOLUTION
A. प्राकृतिक वीर्यसेचनSOLUTION
A. यादृच्छिक प्रजनन SOLUTION
A. 10%.SOLUTION
A. पशु कृषिSOLUTION
A. भिंडीSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
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