जैव उर्वरक निम्न प्रकार से मृदा की पोषक गुणवत्ता में वृद्धिकरते हैं :
जीवाणु-ये निम्न प्रकार से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को उपयोग किए जाने योग्य रूप में स्थिरीकरण करते हैं:
(अ ) सहजीवी संबंध में फलीदार पौधों में मूल ग्रंथियों का निर्माण करके, जैसे: राइजोबियम)।
(ब) मृदा में स्वतंत्र रूप से निवास करके, जैसे: एजोटोवेक्टर और एजोस्पाइरिलम।
कवक - कवकमूल पौधों के मूलों के साथ सहजीवी संबंध स्थापित करते हैं।
कवकमूल मृदा से फॉस्फोरस का अवशोषण करते हैं और इसे पौधे तक पहुँचा देते हैं । इन पौधों में अन्य लक्षण भी विकसित होते हैं, जैसे: मूल से उत्पन्न रोगजनकों के प्रति प्रतिरोधकता, लवणता और सूखे के प्रति सहनशीलता तथा पौधे की अत्यधिक वृद्धि एवं विकास ।
सायनोबैक्टीरिया- ये स्वपोषी सूक्ष्म जीव मृदा में व्यापक रूप से फैले हुए होते हैं और वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं, जैसे: एनाबीना, नोस्टोक, ऑसिलैटोरिया इत्यादि।
(i) समुद्र में होने वाले कच्चे तेल के अधिप्लावों में अनेक हानिकारक रसायन होते हैं, जो समुद्री पर्यावरण को क्षति पहुँचाते हैं। अधिकतर पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन वायवीय स्थितियों में जैवनिम्नीकरणीय होते हैं। अनेक सूक्ष्म जीव हानिकारक हाइड्रोकार्बन का ऑक्सीकरण करने और मृदा का विखंडन करने में सक्षम होते हैं। जीवाणुओं की संख्या और इस प्रक्रिया की गति में वृद्धि करने के लिए, नाइट्रेट और फॉस्फेट उर्वरक डाली जाती है, जिससे कि जीवाणुओं (bacteria) के द्वारा कच्चे तेल के अधिप्लावों के विखंडन को प्रेरित किया जा सके।
(ii) ) ब्रेड निर्माण की प्रक्रिया में, यीस्ट शर्करा को कार्बन डाइऑक्साइड और ऐथानॉल में परिवर्तित कर देता है।
आटे को कुछ समय के लिए गर्म स्थान पर रख दिया जाता है, जिससे कि यीस्ट शर्करा का उपभोग कर सके और अपने इष्टतम तापमान पर जनन कर सके। सेंकने पर आटा फूल जाता है, क्योंकि गेहूँ के ग्लूटन रेशों के बीच कार्बन डाइऑक्साइड प्रवेश कर लेती है और ऐथानॉल बाहर निकल जाती है।
(i) पशुओं के प्रथम आमाशय के अन्दर उपस्थित मीथेनोबैक्टीरियम घास में पाए जाने वाले सेलुलोस का पाचन करता है, अतः पशुओं के मल में इस प्रकार का जीवाणु प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इस पशुमल का प्रयोग जैव गैस संयंत्र में जैव गैस उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।
(ii) जैविक अपशिष्टों का अपघटन अवायवीय पर्यावरण में होता है। अतः, जैव गैस उत्पन्न करने की प्रक्रिया को अवायवीय पाचन भी कहा जाता है। ।
(iii) जैव गैस ऊर्जा का एक नवीकरणीय, गैर-प्रदूषणकारी और स्वच्छ स्रोत है। इस प्रक्रिया में किसी प्रकार का कोई दहन नहीं होता अर्थात वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों का शून्य उत्सर्जन होता है। अतः, यह विधि विश्वव्यापी उष्णता का सामना करने की सर्वाधिक उपयुक्त विधि है।
(iv) भोजन बनाने के लिए खुले में आग के बजाय गैस के स्टोव का प्रयोग करने से धुएँ के संपर्क में आने से बचा जा सकता है। इससे घातक श्वसन रोगों की रोकथाम होती है।
(v) ऐसे स्थानों पर औद्योगिक जैव गैस संयंत्रों की स्थापना की जानी चाहिए, जहाँ कच्ची सामग्री, जैसे: पशुमल, खाद्य अपशिष्ट और खाद प्रचुर मात्रा में हों। इस कारण से, नगरीय क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण और उपनगरीय क्षेत्र जैव गैस उत्पन्न करने के लिए अधिक उपयुक्त हैं।
A. जीन गन
B. सूक्ष्म अंतःक्षेपण (माइक्रोइंजेक्शन )
C. बायोलिस्टीक
D. इलेक्ट्रोपोरेशन
सूक्ष्म अंतःक्षेपण, पुनर्योगज डी.एन.ए को कोशिका के केन्द्रक में महीन सूई द्वारा प्रवेश कराने की प्रक्रिया है |
A. संयोजन
B. रूपांतरण
C. पारगमन
D. Hfr संयोजन.
रूपांतरण में, जीवाणु कोशिकाएँ जो मृत होती हैं, निकटवर्ती जीवित कोशिकाओं में रूपांतरित हो सकती हैं। इस स्थिती में, डी.एन.ए का अंत नहीं होता एवं इसे प्राप्तकर्ता से जीवाणु कोशिका में स्थानांतरित किया जाता है। अन्य सभी कोशिकाओं में, दो जीवित सूक्ष्मजीवी कोशिकाओं को डी.एन.ए हस्तांतरण में भाग लेना पड़ता है।
A. FEB.
B. EFB.
C. FBI.
D. CISF.
EFB (यूरोपीय संघ जैव प्रौद्योगिकी) द्वारा दी गई परिभाषा है “नए उत्पादों तथा सेवाओं के लिए प्राकृतिक विज्ञान व जीवों, व उनकी कोशिकाओं व उनके अंग तथा आण्विक अनुरूपों का समायोजन जैव प्रौद्योगिकी है ।
जीवाणुभोजी एक विषाणु होता है जो जीवाणुओं को संक्रमित करता है।
रूपांतरण, बाहरी डी.एन.ए के प्रवेश और अभिव्यक्ति के परिणामस्वरूप एक कोशिका में आनुवांशिक परिवर्तन है।
Ori (प्रतिकृति की उत्पत्ति) एक अनुक्रम है, जिसे यदि डी.एन.ए के किसी भी खंड में शामिल किया जाए तो वह परपोषी कोशिकाओं के भीतर प्रतिकृति कर सकता है ।
अभी तक, 900 से अधिक प्रतिबंधित एंजाइम को जीवाणु के 230 से अधिक उपभेदों से पृथक किया जा चुका है,जिनमें से प्रत्येक एंजाइम अलग-अलग पहचान अनुक्रमों को पहचानता है।
B. प्रतिबंधन एंजाइ C. RNA पॉलीमरेज D. DNA पॉलीमरेज विशिष्ट स्थानों पर DNA को काटना तथा कथित 'आण्विक कैंची' अर्थात प्रतिबंधन एंजाइमों की खोज के कारण संभव हुआ है ।
B. RNA द्वारा C. प्लाज्मिड द्वारा D. विरायड द्वारा आनुवंशिक इंजीनियरिंग में प्लाज्मिड का उपयोग किया जाता है जिन्हें संवाहक कहा जाता है। प्लाज्मिड , आनुवांशिक इंजीनियरिंग एवं पुनर्योगज DNA प्रौद्योगिकी में महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करते हैं।
प्लाज्मिड जीवाणुओं (बैक्टीरिया) में प्राकृतिक रूप से उपस्थित होते हैं। वे कभी-कभी यूकैरियोटिक जीवों में भी पाए जाते हैं, उदाहरण: सैकरोमाइसिस सैरीवीसी
वनोंमूलन। B. प्रदूषण। C. मृदा अपरदन। D. शहरीकरण। वनोंमूलन ऊष्णकटिबंधीय जातियों की विलुप्ति और वैश्विक जलवायु परिवर्तनों में योगदान देता है। लकड़बग्घे और भेड़िये दुर्लभ हो जाएंगे। B. वन्य क्षेत्र मनुष्यों और घरेलू जानवरों के लिए सुरक्षित होंगे। C. इसका जीन पूल हमेशा के लिए लुप्त जाएगा। D. हिरण जैसे सुंदर जानवरों की आबादी स्थिर हो जाएगी। किसी जाति या आबादी का जीन पूल उस जाति के प्रत्येक जीवित सदस्य की आनुवंशिक सामग्री में उपस्थित एलील का पूरा सेट होता है। जब एक जीव विलुप्त होता है, तो उसका जीन पूल भी विलुप्त हो जाता है। म्यांमार की खाड़ी B. सुंदरबन C. नीलगिरी D. नंदा देवी नीलगिरी 1986 में भारत में स्थापित प्रथम जीवमंडल संरक्षित क्षेत्र था। यह पश्चिमी घाटों में स्थित है और इसमें भारत के 10 जैव भौगोलिक प्रांतों में से 2 शामिल हैं। थॉमस माल्टस B. डेविड टिलमैन C. पॉल एहरलिक D. डब्ल्यूजी रोजेन रिवेट-पोपर परिकल्पना एक प्रसिद्ध पारिस्थितिकविद् पॉल एहरलिक ने दी थी। इस परिकल्पना में, पॉल ने पारिस्थितिक तंत्र की तुलना एक वायुयान से और इसके घटकों की तुलना वायुयान के रिवेटों से करके, पारिस्थितिक तंत्र के विभिन्न घटकों के महत्व पर प्रकाश डाला है। बढ़ती है। B. घटती है। C. स्थिर रहती है। D. यादृच्छिक होती है। ध्रुवीय क्षेत्रों में ध्रुवीय बर्फ की टोपियाँ प्रभावी रूप से उपस्थित होती हैं और ये पृथ्वी पर सबसे असह्य स्थान हैं। इसलिए यहाँ जैव विविधता कम है | प्राणी उद्यान में लुप्तप्राय जातियों के जनन के लिए। B. जीवमंडल संरक्षण की सुरक्षा के लिए। C. वन्यजीव अभ्यारण्य के निर्माण के लिए। D. संरक्षित वनों में शिकार की रोकथाम के लिए। चिड़ियाघर और वनस्पति उद्यान बाह्य स्थाने संरक्षण की सबसे पारंपरिक विधियाँ हैं। जब भी आवश्यक हो और संभव हो, तो इनमें जीवों को जनन के लिए आश्रय और संरक्षित किया जाता है फिर इन्हें वनों में पुनः भेज दिया जाता है | जाति विविधता जातियों के स्तर पर विविधता है। उदाहरण के लिए, पश्चिमी घाटों में पूर्वी घाटों की तुलना में उभयचर जाति विविधता अधिक है। पारस्परिक विलुप्तता B. परा विलुप्तता C. पार विलुप्तता D. सह-विलुप्तता उदाहरण के लिए यदि एक मछली विलुप्त हो जाती है, तो उस मछली की जाति पर निर्भर सभी परजीवी भी विलुप्त जाते हैं। सह-विलुप्तता न केवल परजीवी और पोषी के बीच सम्पन्न होती है, बल्कि शिकारी और शिकार एवं शाकाहारियों और पौधों के बीच भी सम्पन्न होती है। जब किसी क्षेत्र में जैव विविधता की क्षति होती है तो यह पौधों के उत्पादन में कमी का कारण बन सकता है जिसके कारण पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो जाता है। पौधों और प्राणियों के बीच B. पौधों की विभिन्न जातियों के बीच C. प्राणियों की विभिन्न जातियों के बीच D. एक ही जाति के सदस्यों के बीच जीन या गुणसूत्र संरचना में आनुवंशिक विविधताओं के आधार पर एक ही जाति के सदस्य एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। पर्यावरण आनुवंशिक विविधता में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। बार्सिलोना। B. मिलान। C. बुखारेस्ट। D. रियो डी जेनेरो। 1992 में, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास की तत्काल समस्याओं को हल करने के लिए ब्राजील के रियो डी जेनेरो में प्रथम अंतर्राष्ट्रीय "पृथ्वी शिखर सम्मेलन" के लिए 100 से अधिक प्रमुख राज्य मिले।
गौरैय्या B. गैंडा C. शेर D. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड विश्व में बस्टर्ड की 23 जातियों में से भारतीय बस्टर्ड सबसे लुप्तप्राय है। संभवतः भारत में 400-500 बस्टर्ड जीवित हैं, यदि उन्हें बचाने के लिए तत्काल कार्रवाई नहीं की गई तो ये विलुप्त हो सकती है। दक्षिण अफ्रीका में प्रिटोरिया। B. ऑस्ट्रिया में वियेना। C. ब्रिटेन में डबलिन। D. दक्षिण अफ्रीका में जोहान्सबर्ग। इस सम्मेलन में अन्य मुद्दों पर चर्चा के अलावा, पर्यावरण से संबंधित मुद्दे जैसे- ऊर्जा के नवीनीकरणीय स्रोत, ऊर्जा दक्षता और इसका संरक्षण थे। संसाधनों का अधिक उपयोग। B. प्राकृतिक अनवीकरणीय संसाधनों का कम उपयोग। C. प्राकृतिक संसाधनों का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग। D. प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग न करना। संरक्षण पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों का रक्षण और सावधानीपूर्वक प्रबंधन है। 10%। B. 8%। C. 6%। D. 4%। पृथ्वी का 14% स्थलीय भाग ऊष्णकटिबंधीय वर्षा वनों द्वारा घिरा हुआ था और हाल के वर्षों में यह 6% कम हो गया है | ये तेजी से नष्ट हो रहे हैं, जिससे आवास की क्षति हो रही है। स्व-स्थाने संरक्षण में कुल पारिस्थितिक तंत्रों की सुरक्षा पर जोर दिया जाता है जिसमें, राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों और जीवमंडल रिजर्व जैसे संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं। ऐसी जाति जिसे किसी भौगोलिक क्षेत्र से अपनी प्राकृतिक सीमा से बाहर के क्षेत्र में स्थानांतरित किया गया हो उसे विदेशी जाति कहते हैं | ये विदेशी जातियाँ संसाधनों के लिए मूल जातियों के साथ प्रतिस्पर्धा करके उनके आवास, जीवनशैली, कुछ बहुमूल्य जातियों के जीवों के व्यवहार को प्रभावित करती हैं | आनुवांशिक विविधता किसी समष्टि को अपने पर्यावरण के अनुकूल बनाने और परिवर्तनशील स्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया करने में सहायता करती है। अधिक विविधता वाली जातियां पर्यावरणीय परिवर्तनों के लिए अधिक अनुकूल हो सकती हैं और अगली पीढ़ी में अपनी विशेषताओं को को हस्तांतरित कर सकती हैं। इसलिए अनुवांशिक विविधता किसी जाति के अस्तित्व में सहायक होती है। ध्रुवीय क्षेत्र में। B. समशीतोष्ण क्षेत्र में। C. समशीतोष्ण पर्णपाती क्षेत्र में। D. ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्र में। ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वर्ष भर अधिक सौर ऊर्जा उपलब्ध होती है, जो उत्पादकता को बढ़ाने में योगदान देती है; बदले में यह अप्रत्यक्ष रूप से अधिक विविधता में योगदान दे सकता है। बढ़ती है। B. घटती है। C. परिवर्तित होती रहती है। D. स्थिर रहती है। अक्षांश सीमा में वृद्धि के साथ जैव विविधता कम हो जाती है। भूमध्य रेखा के पास के क्षेत्र में सजीवों की विविधता, भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों की तुलना में अधिक होती है। इसलिए, समशीतोष्ण क्षेत्रों की तुलना में ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक विविधताएँ उपलब्ध हैं। कृषि कीट नियंत्रण में अपनाई गई जैविक नियंत्रण विधियां शिकार की समष्टि को नियंत्रित करने के लिए परभक्षी की क्षमता पर आधारित हैं। इसका कारण मुख्य रूप से सर्द के साथ-साथ गर्म जलवायु में शरीर के तापमान को स्थिर बनाए रखने की उनकी क्षमता है। समुद्री एनीमोन और क्लाउन मछली द्वारा प्रदर्शित पारस्परिक क्रिया का नाम सह्भोजिता है | डायपाज प्रतिकूल परिस्थितियों में निलंबित विकास का चरण है, उदाहरण- अनेक जंतुप्लवक जातियाँ । हाइबर्नेशन प्राणियों में निष्क्रियता और चयापचय अवसाद की एक अवस्था है, जिसे शरीर के कम तापमान, मंद श्वसन और कम चयापचय दर द्वारा विशेषीकृत किया जाता है। एक समुद्री मछली के लिए, स्वच्छ जल के एक्वेरियम में जीवित रहना मुश्किल है क्योंकि मछली लवणीय जल में रहने के लिए अनुकूलित है और शारीरिक समस्याओं के कारण वह बाहरी अल्पपरासारी वातावरण का सामना करने में सक्षम नहीं होगी | आकारिकीय अनुकूलन गैर-आनुवांशिक होते हैं, अतः ये एक जीव के जीवनकाल में संपन्न होते हैं और जब परिस्थितियाँ अस्तित्व नहीं होती हैं तो उस जीव का क्षय हो जाता है, उदाहरण के लिए, पर्यनुकूलन, व्यवहारिक परिवर्तन आदि। ऑफ्रिस नामक भूमध्यसागरीय ऑर्किड, मक्षिका की एक जाति द्वारा परागित होने के लिए 'लैंगिक कपट' करता है | इस पुष्प की पंखुड़ी आकार, रंग और चिह्नों में एक मादा मक्षिका के समान दिखाई देती है। नर मक्षिका इसे मादा समझकर इसकी ओर आकर्षित होती है और पुष्प के साथ छद्ममैथुन करने का प्रयास करती है। इस प्रक्रिया में उस पुष्प के पराग मक्षिका के शरीर पर चिपक जाते हैं। जब यह मक्षिका अन्य पुष्प के साथ छद्ममैथुन करती है, तो ये पराग उस पुष्प पर स्थानांतरित हो जाते हैं और उसे परागित करते हैं । (अ) आयु वितरण: • समष्टि के लिए आयु वितरण आलेखित किया जाता है | • इस आरेख को आयु पिरामिड के रूप में जाना जाता है | • यह विभिन्न आयु समूहों में व्यक्तियों की संख्या को दर्शाता है | • पिरामिड का आकार समष्टि की स्थिति को दर्शाता है | (ब) समष्टि का साइज़: • एक आवास में, समष्टि में जीवों की संख्या को दर्शाता है | • जीवों के बीच प्रतिस्पर्धा के परिणाम के विषय में व्याख्या करने के लिए साइज़ में परिवर्तन का उपयोग किया जा सकता है | (स) समष्टि घनत्व: • यह एक आवास के विषय में बात करने के लिए सबसे उपयुक्त माप है | • इसे एन के रूप में निर्दिष्ट किया जाता है | • यह किसी आवास में प्रति इकाई क्षेत्र में उपस्थित एक जाति के जीवों की संख्या है | (अ) सह्भोजिता: एक पारस्परिक क्रिया जिसमें एक जाति लाभान्वित होती है और दूसरी जाति को न लाभ होता है और न हानि | उदाहरण- समुद्री एनीमोन जिनमें दंशन स्पर्शक पाए जाते हैं, और क्लाउन मछली के बीच पारस्परिक क्रिया जो उनमें रहती है। मछली परभक्षियों से सुरक्षित रहती है और यह समुद्री एनीमोन को कोई हानि या लाभ नहीं पहुंचाती है। (ब) परजीविता: इस संबंध में परजीवी नामक एक जीव भोजन या आश्रय के लिए पोषी नामक अन्य जीवों पर या उनके अन्दर रहता है, जो कि कुछ अन्य प्रजातियों का है। इस अन्तः क्रिया में परजीवी को सभी लाभ मिलते हैं जबकि पोषी गंभीर रूप से प्रभावित होता है। उदाहरण- मलेरिया परजीवी, मनुष्य में मलेरिया ज्वर उत्पन्न करता है, जो उनका पोषी है। (स) छद्मावरण: यह प्राणियों को परिवेश के साथ मिश्रित होने की क्षमता है जिससे शत्रुओं द्वारा आसानी से पहचाना न जा सके। उदाहरण- काठ कीट । (द) सहजीविता: यह अन्तः क्रिया दोनों जातियों को लाभ प्रदान करती है, उदाहरण- लाइकेन, जिसमें प्रकाश संश्लेषक शैवाल और कवक एक-दूसरे को लाभान्वित करते हैं | (ई) स्पर्धा: समान संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धित दो जातियों जीवों के बीच पारस्परिक संबंध, उदाहरण- मोनार्क तितली और रानी मोनार्क । लॉजिस्टिक समष्टि वृद्धि: प्रकृति में किसी भी जाति की समष्टि में चरघातांकी वृद्धि के लिए असीमित संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। इससे सीमित संसाधनों के लिए जीवों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है। प्रकृति में, किसी दिए गए आवास में अधिकतम संख्या का समर्थन करने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं, जिसके आगे और अधिक विकास संभव नहीं है। इस सीमा को उस आवास में, उस जाति के लिए प्रकृति की पोषण क्षमता (k) कहा जाता है। सीमित संसाधनों युक्त आवास में बढ़ती हुई समष्टि, प्रारंभ में एक पश्चता प्रावस्था दर्शाती है, इसके बाद त्वरण और मंदन तथा अंत में अनंतस्पर्शी प्रावस्थाएँ आती हैं, जब समष्टि घनत्व पोषण क्षमता तक पहुंच जाती है। समय (t) के सन्दर्भ में N के आरेख से एक सिग्मोइड वक्र बन जाता है। इस प्रकार की जनसंख्या वृद्धि विर्हुस्ट-पर्ल लॉजिस्टिक वृद्धि कहलाती है । N = समय t पर जनसंख्या घनत्व, r = प्राकृतिक वृद्धि की इंट्रिन्जिक दर, k = पोषण क्षमता चूंकि, अधिकांश प्राणी समष्टियों के विकास के लिए संसाधन सीमित हैं और ये शीघ्र या बाद में सीमित होने वाले हैं, अतः लॉजिस्टिक वृद्धि मॉडल को अधिक यथार्थपूर्ण माना जाता है। तलछटी चक्र वे होते हैं जिनमें भंडार पृथ्वी के पटल में स्थित होता है। अवसादी चक्र के उदाहरण हैं: सल्फर चक्र और फॉस्फोरस चक्र।
B. अनुक्रमण C. अनुकूलन D. स्तरीकरण अनुक्रमण एक दूसरे के साथ समन्वय में एक भौगोलिक क्षेत्र पर जलवायु और समुदाय में अनुक्रमिक परिवर्तन है और अंत में एक स्थिर जलवायु और समुदाय के रूप में नामित समुदाय में स्थिर हो जाता है।
B. कार्बनिक पदार्थों का दहन C. ऊर्जा और परिवहन के लिए जीवाश्मी ईंधनों का संचय D. ऊर्जा और परिवहन के लिए जीवाश्मी ईंधनों को बड़े स्तर पर जलाना निम्न मानवीय गतिविधियों के कारण कार्बन डाइऑक्साइड के मुक्त होने की दर अत्यंत शीघ्रता से बढ़ रही है:
B. उपजाऊ भूमि में C. भूकंप अनाच्छादित झेत्र में D. हिमनदन अनाच्छादित झेत्र में प्राथमिक अनुक्रमण तब संपन्न होता है, जब कोई क्षेत्र पूरी तरह से बंजर हो और वहाँ पहले भी कोई वनस्पति उत्पन्न न हुई हो जबकि; द्वितीयक अनुक्रमण ऐसे क्षेत्र में संपन्न होता है, जो किसी प्राकृतिक आपदा जैसे- हिमनदन या भूकंप के कारण हाल ही में अनाच्छादित हुआ हो।
B. दो वर्गों में C. तीन वर्गों में D. चार वर्गों में पौधों में अनुक्रमण को उनके आवास की प्रकृति के आधार पर दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं- जलारंभी अनुक्रमण और मरुद्भिद अनुक्रमण।
B. सीधी अवस्था में मिलता है। C. टेढ़ी अवस्था में मिलता है। D. लेटी अवस्था में मिलता है। जैवमात्रा का पिरामिड, जैवमात्रा और पोषण स्तर के बीच संबंध को प्रदर्शित करता है। यह अधिकाँश पारितंत्रों में खड़ी अवस्था में मिलता है, किन्तु समुद्री पारितंत्र में उल्टी अवस्था में मिलता है। इसका कारण यह है कि उत्पादक संख्या में शाकाहारियों से अधिक होते हैं, जबकि शाकाहारी संख्या में मांसाहारियों से अधिक होते हैं।
B. प्रथम उपभोक्ता C. द्वितीयक उपभोक्ता D. तृतीयक उपभोक्ता जैव भार प्रत्येक स्तर बढ़ने पर घटता जाता है| इसलिए किसी भी उपभोक्ता की तुलना में उत्पादक का जैव भार हमेशा अधिक होता है|
B. उपभोक्ता C. मृतपोषी D. उत्पादक तथा उपभोक्ता उत्पादकों और उपभोक्ताओं के मरणोप्रान्त मृतपोषियों या पूर्तिजीवियों द्वारा उनका अपघटन किया जाता है। यह पुनश्चक्रण की एक प्रक्रिया है।
हरे पौधे सूर्य के प्रकाश में उपस्थित ऊर्जा को ग्रहण करते हैं और इसे रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित कर देते हैं।
B. मृदा, आर्द्रता तथा प्राणी C. वायु, प्रकाश तथा सूक्ष्म जीव D. जल, तापमान तथा वनस्पति पारितंत्र को प्रभावित करने वाले दो मुख्य कारक होते हैं: अजैविक कारक और जैविक कारक। अजैविक कारकों में - जलवायुवीय कारक जैसे- तापमान, जल, आर्द्रता, प्रकाश, वायु आदि तथा मृदीय कारक जैसे- मृदा और अधःस्तर शामिल हैं ।
B. वृक्क रोग C. उपास्थि अविकसन D. हिरोशिमा रोग मिनामाता रोग 1950 के दशक में जापान की खाड़ी के लोगों में पारा (मरकरी) संदूषित जल वाली मछली को खाने से उत्पन्न हुआ एक रोग है ;गंभीर मस्तिष्क विकार इसका लक्षण है |
क्षोभमंडल में ओजोन एक प्रदूषक है (टायर की कठोरता, पत्ति के मुरझाने का कारण ) और समताप मंडल में एक संरक्षक (यूवी किरणों को पृथ्वी तक पहुंचने से रोकता है) |
ओजोन परत का अपक्षय करने वाले पदार्थों पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, ओजोन के अपक्षय के लिए ज़िम्मेदार कई पदार्थों के उत्पादन को समाप्त करके, ओजोन परत की सुरक्षा के लिए बनाई गई एक अंतरराष्ट्रीय संधि है।
प्रकाश रासायनिक स्मोग प्रदूषकों का मिश्रण है जिसमें कण, नाइट्रोजन ऑक्साइड्स, ओजोन, एल्डिहाइड ,परोक्सीएसिटाइल नाइट्रेट (पीएएन) |
B. स्वेडवर्ग इकाई C. पास्कल D. डेसीबेल वायुमंडल के निचले भाग से लेकर शिखर तक के वायु स्तंभ (कॉलम) में ओजोन की मोटाई डॉबसन यूनिट (डीयू) में मापी जाती है |
B. सुपोषण C. जलीय प्रदूषण D. स्तरविन्यास जलीय पोषक तत्व संवर्धन की प्रक्रिया और प्रजातियों की विविधता में लगातार कमी को सुपोषण कहा जाता है। अत्यधिक पोषक तत्वों की उपलब्धता नीले-हरे शैवाल में तेजी से वृद्धि का कारण बनती है जिसके परिणामस्वरूप शैवाल प्रस्फुटन होता हैं।
B. मत्स्य पालन C. दीर्घ-उपयोगी कृषि D. बागवानी (उद्यान कृषि ) दीर्घ-उपयोगी कृषि में नवीकरणीय स्रोतों का उपयोग होता है जिससे प्रदूषण कम होता है और यह उपज के इष्टतम स्तर को बनाए रखता है |
B. फ़्लश शौचालय (टायलेट) C. खुले शौचालय (टायलेट) D. ऑफ साईट तंत्र इकोसैन शौचालय वह स्वच्छता तंत्र जिसमें जल की आवश्यकता नहीं होती | यह आसपास के पर्यावरण से पूरी तरह से अलग स्थित होता है और यह भू-जल संसाधनों को दूषित नहीं कर सकता है। मानव उत्सर्जन का, बायोगैस (ऊर्जा स्रोत) और खाद उर्वरकों के उत्पादन के लिए पुनर्नवीनीकरण किया जा सकता है, क्योंकि अपशिष्ट उपयोग अपशिष्ट प्रबंधन का सबसे अच्छा तरीका है।
B. लकड़ी C. प्लास्टिक D. कागज़ प्लास्टिक व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले बहुलक हैं | ये अजैवनिम्नीकरणीय किन्तु पुनश्चक्रण योग्य ठोस अपशिष्ट का निर्माण करते हैं |प्लास्टिक का निपटान कठिन है क्योंकि जलने पर यह जहरीली गैसें उत्पन्न करती है | गाड़ने पर यह अपघटित नहीं होती और तरलों के संपर्क में आने पर हानिकारक रसायन उत्सर्जित कर सकती है| इसलिए प्लास्टिक का सुरक्षित रूप से निपटान केवल पुनश्चक्रण / एक रूप से दूसरे रूप में पुनः उपयोग द्वारा किया जा सकता है |
B. दोपहर C. शाम D. रात्रि सुपोषित जल निकाय में दिन की अपेक्षा रात्रि के समय ऑक्सीजन की कमी तेजी से होती है क्योंकि रात्रि के समय प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं होती और पशु व पौधे दोनों केवल श्वसन करते हैं |
डॉबसन यूनिट (डीयू) ओजोन परत की मोटाई नापने वाली इकाई है| पुनर्वनीकरण एक वन को पुनः स्थापित करने की प्रक्रिया है जो पहले कभी उपस्थित था लेकिन अतीत में किसी समय पर नष्ट कर दिया गया था । क्लोरोफ्लोरो कार्बन वाहित मल में मुख्य रूप से जैव निम्नीकरणीय कार्बनिक पदार्थ होते हैं जो सूक्ष्म जीवों के विकास के लिए कार्यद्रव (सब्सट्रेट) के रूप में कार्य करता है। ये सूक्ष्मजीव बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन का उपभोग करते हैं जिसके परिणामस्वरूप विसर्जन स्थल पर भी अनुप्रवाह (डाउनस्ट्रीम) में तेजी से गिरावट आती है। यह मछली और अन्य जलीय प्राणियों की मृत्यु का कारण बनता है। यह एक कृषि पद्धति है जिसमें वनों के वृक्षों को काटते हैं और पादप अवशेष को जला देते हैं | राख का प्रयोग उर्वरक के रूप में तथा भूमि का प्रयोग खेती के लिए या पशु चरागाह के रूप में किया जाता है | खेती के बाद उस भूमि को कई वर्षो के लिए खाली छोड़ दिया जाता है ताकि वह पुनः उर्वक हो जाए | इसे सामान्यतः झूम खेती कहा जाता है | यूवी-बी विकिरण मनुष्यों पर निम्नलिखित हानिकारक प्रभाव डालती है| 1. शोर अवांछित उच्च स्तरीय ध्वनी है| 2. भारत के वायु (प्रदूषण निरोध और नियंत्रण) संशोधित अधिनियम 1987 के अंतर्गत शोर को वायु प्रदूषण के अंतर्गत शामिल किया गया है | 3. शोर से मनुष्यों में मनोवैज्ञानिक और शारीरिक विकार उत्पन होते हैं। कान के परदे को नुकसान पहुंचा सकता है जिससे सुनने की क्षमता स्थायी रूप से नष्ट हो सकती है। शोर से अनिंद्रा, हृदय की धड़कन में वृद्धि, श्वास पैटर्न में बदलाव होता है, इस प्रकार यह मनुष्यों में काफी तनाव उत्पन करता है। समताप मंडल में ओजोन और ऑक्सीजन के बीच संतुलन होता है। ओजोन गैस लगातार आण्विक ऑक्सीजन से बनती रहती है और इसका निम्नीकरण होता रहता है । हालांकि वायुमंडल के निचले भाग में उत्सर्जित CFCs के ऊपर गति करते हैं और समताप मंडल में पपहुँचने पर ये Cl परमाणु का मोचन करते हैं जिससे समताप मंडल का संतुलन बिगड़ रहा है | ये Cl, ओजोन को मुक्त करने वाली आण्विक ऑक्सीजन को क्षति पहुँचाती है और इस प्रकार ओजोन परत का अपक्षय होता है | जैविक उपकरण अपशिष्ट को नियंत्रित करने और कम करने के अच्छे साधन हैं | मल अपशिष्ट, सब्जी और कृषि अपशिष्ट जैसे जटिल कार्बनिक अपशिष्ट को विभिन्न सूक्ष्म जीव आसानी से, सरल और उपयोग करने योग्य रूप में अपघटित कर देते है। कार्बनिक अपशिष्ट को बायोगैस (एक ईंधन) और खाद का उत्पादन करने के लिए अवायवीय रूप से पचाया जा सकता है। इसे कार्बनिक उर्वरकों का उत्पादन करने के लिए भी कंपोस्ट किया जा सकता है। कई शैवाल और पौधों में भारी धातुओं को अवशोषित करने और बनाए रखने की क्षमता होती है, इस प्रकार पर्यावरण से, विशेष रूप से जल निकायों से विषाक्त पदार्थों को हटाया जाता है। पौधे और कई सूक्ष्मजीवों में पर्यावरण से CO2 का उपयोग करने की क्षमता होती है।जिससे CO2 को सांद्रता में कमी आती है | सूक्ष्मजीवों से प्राप्त बहुलक जैसे जैवनिम्नीकृत प्लास्टिक, हालांकि थोडी महंगी है, पर उपलब्ध हैं और भविष्य में प्लास्टिक को प्रतिस्थापित करने की क्षमता रखती है। जैव ईंधन कम घातक गैसों को उत्सर्जित करता है और कार्बन को अवशोषित करके और चक्रण करके वायुमंडल में CO2 के स्तर को नियंत्रित कर सकता है। जैव आवर्धन पदार्थ के उत्सर्जन/अपक्षय (चयापचय द्वारा) की दर में गिरावट के कारण पोषण स्तर (ट्राफिक लेवल) पर आविषाक्त की सांद्रता में वृद्धि का होना है| उदहारण के लिए, लिपोफिलिक पदार्थ मूत्र में उत्सर्जित नहीं हो सकते जो एक जल-आधारित माध्यम है, और अतः, यदि जीव में विघटनकारी एंजाइम अनुपस्थित हैं तो ये वसा ऊतकों में संचित हो जाते हैं | जब इन्हें अन्य जीव द्वारा खाया जाता है तो यह वसा उनकी आंत में अवशोषित होती है, और इस प्रकार यह उन परजीवियों में संचित हो जाती है | B. पिरामिड C. खाद्य श्रंखला D. खाद्य जाल पारितंत्र प्रकृति की एक क्रियात्मक इकाई है, जिसमें जीवधारी आपस में और अपने आस पास के भौतिक पर्यावरण के साथ पारस्परिक क्रिया करते हैं।
B. क्रेब्स चक्र C. विनियम चक्र D. ऊर्जा चक्र एक पोषक चक्र के माध्यम से रासायनिक तत्व या अणु का पृथ्वी के जैविक और अजैविक घटकों के बीच चक्रण होता है।
ऊर्जा पिरामिड, जो सदैव खड़ी अवस्था में होता है, कभी उल्टा नहीं होता और इसका प्रत्येक स्तंभ प्रत्येक पोषण स्तर पर उपस्थित ऊर्जा की मात्रा को प्रदर्शित करता है।
इस पिरामिड के अनुसार, निचले स्तर पर ऊर्जा, ऊपरी स्तर से सदैव अधिक होती है।
B. तीन C. चार D. पांच पारिस्थितिक पिरामिड तीन प्रकार के होते हैं:
• संख्या का पिरामिड
• जैवमात्रा का पिरामिड
• ऊर्जा पिरामिड
पौधे केवल 1 प्रतिशत सूर्य के प्रकाश को ग्रहण करते हैं। इसमें से 10 प्रतिशत ऊर्जा अगले पोषण स्तर को स्थानांतरित हो जाती है। इस नियम को 10 प्रतिशत नियम कहा जाता है। शेष ऊर्जा का ऊष्मा के रूप में पर्यावरण में क्षय हो जाता है।
B. एकदिशीय C. द्विदिशीय D. बहुदिशीय पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है। ऊर्जा का प्रवाह उत्पादकों द्वारा आरम्भ किया जाता है, जो खाद्य शृंखला और आहार जाल के आरंभिक बिंदु के रूप में भी कार्य करते हैं। यह प्राथमिक उत्पादकों से उच्च श्रेणी के उपभोक्ताओं की ओर प्रवाहित होती है और प्रत्येक चरण पर ऊष्मा के रूप में इसका क्षय होता जाता है।
B. अपचय C. निक्षालन D. ह्यूमीफिकेशन खंडन, निक्षालन, अपचय, ह्यूमीफिकेशन तथा खनिजीकरण अपघटन की प्रक्रिया में शामिल चरण होते हैं| ह्यूमीफिकेशन मृदा के अपघटन के समय संपन्न होता है। इसके कारण ह्यूमस का संचय होता है।
B. केवल शाकाहारियों पर C. मांसाहारियों तथा शाकाहारियों पर D. किसी पर नहीं तृतीयक उपभोक्ता जो तृतीय श्रेणी उपभोक्ता भी कहलाते हैं, अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए मांसाहारियों और शाकाहारियों- दोनों का शिकार करते हैं। इनके कुछ उदाहरण हैं: लोमड़ी, उल्लू, मोर आदि।
B. गाय तथा कुत्ता C. बकरी तथा बिल्ली D. खरगोश तथा बिल्ली प्राथमिक उपभोक्ताओं को प्रथम श्रेणी उपभोक्ता या शाकाहारी भी कहा जाता है। शाकाहारी प्रत्यक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर होते हैं। प्राथमिक उपभोक्ताओं के कुछ उदाहरण हैं: हिरन, खरगोश, बकरी और गाय आदि।
हरे पौधे, प्रकाश संश्लेषक जीवाणु, शैवाल और कुछ प्रोटोजोआ प्राथमिक उत्पादक हैं, जो सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड और जल की सहायता से अपना भोजन स्वयं तैयार कर सकते हैं।
पारितंत्र क्रियाशीलता के चार प्रमुख पहलू हैं: उत्पादकता, अपघटन, ऊर्जा प्रवाह और पोषक चक्रण। खाद्य शृंखला के प्रत्येक चरण को पोषण स्तर कहा जाता है। उपभोक्ता वे प्राणी होते हैं, जो अपने भोजन के लिए उत्पादकों पर निर्भर होते हैं। ये परपोषी भी कहलाते हैं। एक पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है। ऊर्जा का प्रवाह उत्पादकों द्वारा आरम्भ किया जाता है, जो खाद्य शृंखला और आहार जाल के आरंभिक बिंदु के रूप में भी कार्य करते हैं। ये रासायनिक ऊर्जा के अंतिम उत्पादक होते हैं।यह प्राथमिक उत्पादकों से उच्च श्रेणी के उपभोक्ताओं की ओर प्रवाहित होती है और प्रत्येक चरण पर ऊष्मा के रूप में इसका क्षय होता जाता है। पौधे केवल 1 प्रतिशत सूर्य के प्रकाश को ग्रहण करते हैं। इसमें से 10 प्रतिशत ऊर्जा अगले पोषण स्तर को स्थानांतरित हो जाती है। इस नियम को 10 प्रतिशत नियम कहा जाता है। शेष ऊर्जा का ऊष्मा के रूप में पर्यावरण में क्षय हो जाता है। पारितंत्र प्रकृति की एक क्रियात्मक इकाई है, जिसमें जीवधारी आपस में और अपने आस पास के भौतिक पर्यावरण के साथ पारस्परिक क्रिया करते हैं। पारितंत्र के तीन प्रकार - स्थलीय पारितंत्र, जलीय पारितंत्र और मानव निर्मित पारितंत्र हैं। जंगल के पारितंत्र का योगदान: B. अनासंजी कट C. चिपचिपा कट D. प्रतिबंधित कट अनासंजी कट में, DNA में दो अनासंजी सिरों का उत्पादन करने के लिए विपरीत बिंदुओं पर दो DNA रज्जुकों को काटा जाता है। ऐसे कटों को जैव प्रौद्योगिकी में उपयोग में लाया जाता है।
B. एगार-एगार C. ब्रोथ D. स्पिरुलिना आजकल, सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला मैट्रिक्स एग्रोस है, जो एक प्राकृतिक बहुलक है।
यह सभी प्रक्रियाएँ सूक्ष्मजीव -मध्यस्थ प्रक्रियाएँ हैं,अतः जैव प्रौद्योगिकी का एक रूप है।
यह T- DNA ट्यूमर कोशिकाओं को रोगजनक द्वारा आवश्यक रसायनों का उत्पादन करने के लिए निर्देशित करता है।
B. जीवाणु प्रभेद C. सामान्य नाम D. प्रजाति का नाम
पहला अक्षर : जीवाणु का वंश जहां से एंजाइम व्युत्पन्न हुआ है (इशचेरिचिया)
• अगले दो अक्षर : जीवाणुकी प्रजाति है (कोलाई)
चौथा बड़ा अक्षर : जीवाणु का प्रभेद (RY13)
• रोमन अंक : उस विशेष प्रभेद (प्रथम) से एंजाइम की खोज की क्रमिक संख्या
B. C=O C. C-H D. H-H लाईगेज एक एंजाइम है जो C एवं O के बीच एक नया रासायनिक बंधन बनाकर दो बड़े अणुओं के जुड़ने को उत्प्रेरित कर सकता है।
B. इशचेरिचिया कोलाई C. राईजोबियम D. pBR322.
A. स्थानांतरण SOLUTION
A. OirSOLUTION
Right Answer is: D
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A. DNA लाइगेजSOLUTION
A. गुणसूत्रीय DNA द्वाराSOLUTION
A. प्रोटिस्टाSOLUTION
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Right Answer is: C
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A. पारितंत्र SOLUTION
A. ज्वालामुखीय गतिविधि SOLUTION
A. बंजर भूमि में SOLUTION
A. एक वर्ग में SOLUTION
A. उल्टी अवस्था में मिलता है।SOLUTION
A. उत्पादकSOLUTION
A. उत्पादक SOLUTION
SOLUTION
A. जल, वायु तथा तापमानSOLUTION
A. मिनामाता रोगSOLUTION
Right Answer is: B
SOLUTION
A. अनवरत कार्बनिक प्रदूषण SOLUTION
SOLUTION
A. डॉबसन इकाईSOLUTION
A. जैव आवर्धनSOLUTION
A. संयुक्त कृषिSOLUTION
A. इकोसैन शौचालय (टायलेट)SOLUTION
A. सब्जियाँSOLUTION
A. सुबहSOLUTION
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DDT का जैव आवर्धन
A. पारितंत्रSOLUTION
A. पोषक चक्रSOLUTION
Right Answer is: B
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A. दोSOLUTION
A. स्तर पर निर्भर होती हैSOLUTION
A. अदिशीयSOLUTION
A. खंडनSOLUTION
A. केवल मांसाहारियों परSOLUTION
A. हिरन तथा खरगोशSOLUTION
A. भोजन के लिए दूसरे जीवों पर निर्भर रहते हैंSOLUTION
Right Answer is:
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Right Answer is:
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Right Answer is:
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SOLUTION
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A. असम्मुख कटSOLUTION
A. एग्रोसSOLUTION
SOLUTION
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A. खोज का क्रम।SOLUTION
A. C=CSOLUTION
A. एग्रोबैक्टीरियम ट्युमीफेसियंस