(a) Platinum is the most precious of all metals.
(b) King Solomon was the wisest of all men.
(c) Sophia is not as fast as Lauren.
(d) No one in the world is as rich as Bill Gates.
(e) No one in the competition has as high marks as him.
(a) Lead is heavier than other metals.
(b) He is the wisest of all men.
(c) Of the two evils, choose the less.
(d) Samantha loves to eat sweet dishes.
(e) Abu Dhabi is a big city.
(a) Dogs are the most faithful animals.
(b) Guacamole dip tastes better than tartar sauce.
(c) His father is older than his mother.
(d) Sansa is the eldest in the family.
(e) Bill Gates is the richest man in the world.
(a) My brother is five years older than me.
(b) Which is the better of the two?
(c) We can’t go any farther without a rest.
(d) Sam’s painting is superior to Ian’s.
(e) Solomon was wiser than all other men.
A. अर्नेस्ट मैके
B. जी. एफ. डेल्स
C. जॉन मार्शल
D. आर. ई. एम. व्हीलर
1960 के दशक में, जॉर्ज डेल्स ने मोहनजोदड़ो में नरसंहार के सबूत पर सवाल उठाए| उन्होंने दिखाया कि उस स्थल में मिले ढाँचे उस युग के नहीं थे|
A.
अलेक्जै़डर कनिंघम
B.
हारग्रीव्स
C.
जेम्स बुर्गेस
D.
जॉन मार्शल
सिन्धु घाटी में उत्खनन शुरू करने से पूर्व, जॉन मार्शल ने यूनान व क्रीट में पुरातत्वेत्ता का काम किया था| उन्होंने वहाँ के कार्यानुभव का उपयोग सिन्धु घाटी में में उत्खनन के दौरान किया|
A.
मनके बनाना
B. ईंट बनाना
C. हथकरघा
D. जहाज निर्माण
चन्हुदडो एक महत्वपूर्ण बस्ती थी, जो लगभग पूरी तरह से शिल्प-उत्पादन में संलग्न थी। शिल्प कार्यांे में मनके बनाना, शंख की कटाई, धातुकर्म, मुहर निर्माण तथा बाट बनाना सम्मिलित थे।
A.
बहरीन द्वीप
B.
ओमान
C.
हडप्पा क्षेत्र
D.
जापान द्वीप
रासायनिक विश्लेषण दर्शाते हैं कि ओमानी ताँबे तथा हड़प्पाई पुरावस्तुओं, दोनों में निकल के अंश मिले हैं, जो दोनों के साझा उद्भव की ओर संवेफत करते हैं।
A.
दिलमुन
B.
खेतड़ी
C.
मगान
D.
मेलुहा
तीसरी सहस्राब्दि ईसा पूर्व में दिनांकित मेसोपोटामिया के लेखों में मगान जो संभवतः ओमान के लिए प्रयुक्त नाम था, नामक क्षेत्रा से ताँबे के आगमन के संदर्भ मिलते हैं।
A.
लोथल
B.
राखीगढ़ी
C.
धौलावीरा
D.
हडप्पा
मनके बनाने की तकनीकों में प्रयुक्त पदार्थ के अनुसार भिन्नताएँ थीं। पत्थर के पिंडों को पहले अपरिष्कृत आकारों में तोड़ा जाता था, और फिर बारीकी से शल्क निकाल कर इन्हें अंतिम रूप दिया जाता था। घिसाई, पाॅलिश और इनमें छेद करने के साथ ही यह प्रक्रिया पूरी होती थी। चन्हुदड़ो, लोथल और, हाल ही में, धौलावीरा से छेद करने के विशेष उपकरण मिले हैं।
A. 1500 ईसा पूर्व
B. 1600 ईसा पूर्व
C. 1700 ईसा पूर्व
D. 1800 ईसा पूर्व
विकसित हड्प्प्न चरण के दौरान इस सभ्यता का शेहरी कल था, जब समृद्ध हड्प्प्न शहरों का विकास हुआ| इसके बाद उत्तर हड्प्पा हुआ, जहाँ की संस्कृति एक ग्रामीण जीवनशैली की थी|
A. अफ़ग़ानिस्तान
B. गुजरात
C. पंजाब
D. राजस्थान
गणेश्वर-जोधपुर संस्कृति का सटीक स्थान राजस्थान के खेतड़ी क्षेत्र में है| पुरातत्विदों के अनुसार, यहाँ के मृदभाण्ड हडप्पा के मृदभाण्डों से भिन्न थे, और ताम्बे की वस्तुओं की असाधारण संपदा थी|
A. चोलिस्तान और बनावली
B. धौलावीरा और लोथल
C. मोहनजोदड़ो और हडप्पा
D. नागेश्वर और बालाकोट
मोहनजोदड़ो और हडप्पा विशाल बस्तियाँ थी| फयाँन्स से बने लघुपात्र, जो संभवतः सुगंधित द्रव्यों के पात्रों के रूप में प्रयुक्त होते थे, अधिकांशतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से मिले हैं।



भारतीय अभिलेख विज्ञान में एक उल्लेखनीय प्रगति 1830 के दशक में हुई, जब ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला। इन लिपियों का उपयोग सबसे आरंभिक अभिलेखों और सिक्कों में किया गया है। प्रिंसेप को पता चला कि अधिकारी अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी, यानी मनोहर मुखाकृति वाले राजा का नाम लिखा है। कुछ अभिलेखों पर राजा का नाम अशोक भी लिखा है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक सर्वाधिक प्रसिद्ध शासकों में से एक था। इस शोध् से आरंभिक भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन को नयी दिशा मिली, क्योंकि भारतीय और यूरोपीय विद्वानों ने उपमहाद्वीप पर शासन करने वाले प्रमुख राजवंशों की वंशावलियों की पुनर्रचना के लिए विभिन्न भाषाओं में लिखे अभिलेखों और ग्रन्थों का उपयोग किया। परिणामस्वरूप बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों तक उपमहाद्वीप के राजनीतिक इतिहास का एक सामान्य चित्र तैयार हो गया। उसके बाद विद्वानों ने अपना ध्यान राजनीतिक इतिहास के संदर्भ की ओर लगाया और यह छानबीन करने की कोशिश की कि क्या राजनीतिक परिवर्तनों और आर्थिक तथा सामाजिक विकासों के बीच कोई संबंध् था।
खरोष्टी लिपि, ब्राह्मी लिपि की समकालीन थी। यह 3 शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास दिखाई दी और 4 शताब्दी ईस्वी तक इसका उत्तर पश्चिमी भारत और मध्य एशिया में प्रयोग किया गया था। इसे आड़ी रेखाओं में दाईं से बाईं ओर लिखा जाता था। ब्राह्मी की तरह खरोष्टी प्राकृत बोलियों के लिए विकसित की गई थी । खरोष्टी लिपि का उत्तर पश्चिम में शिलालेख में इस्तेमाल किया जाता था। इस क्षेत्र पर शासन करने वाले इंडो-ग्रीक राजाओं के द्विभाषी सिक्कों ने उद्वाचन में सहायता की। सिक्कों में राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी में लिखे गए हैं । यूनानी भाषा पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने अक्षरों का मेल किया। उन्होने प्रिंसेप के साथ खरोष्ठी में लिखे अभिलेखों की भाषा की पहचान प्राकृत के रूप में की थी इसलिए अशोक के शिलालेख में लंबे अभिलेखों को पढ़ना सरल हो गया जिनमें से कुछ एशियाई उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम से थे वो खरोष्टी लिपि में लिखे गए थे।
मौर्य साम्राज्य के पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र थे, राजधानी पाटलिपुत्र और चार प्रांतीय केंद्र तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि। इन सबका उल्लेख अशोक के अभिलेखों में किया गया है। यदि हम इन अभिलेखों का परीक्षण करें तो पता चलता है कि आधुनिक पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत से लेकर आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक हर स्थान पर एक जैसे संदेश उत्कीर्ण किए गए थे। क्या इतने विशाल साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था समान रही होगी? इतिहासकार अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि ऐसा संभव नहीं था। साम्राज्य में शामिल क्षेत्रा बड़े विविध् और भिन्न-भिन्न प्रकार के थे: कहाँ अफगानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र और कहाँ उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र।
यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण साम्राज्य की राजधानी तथा उसके आसपास के प्रांतीय केन्द्रों पर रहा हो। इन केन्द्रों का चयन बड़े ध्यान से किया गया। तक्षशिला और उज्जयिनी दोनों लंबी दूरी वाले महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर स्थित थे जबकि सुवर्णगिरि (अर्थात् सोने के पहाड़) कर्नाटक में सोने की खदान के लिए उपयोगी था।
साम्राज्य के संचालन के लिए भूमि और नदियों दोनों मार्गों से आवागमन बना रहना अत्यंत आवश्यक था। राजधानी से प्रांतों तक जाने में कई सप्ताह या महीनों का समय लगता होगा। इसका अर्थ यह है कि यात्रियों के लिए खान-पान की व्यवस्था और उनकी सुरक्षा भी करनी पड़ती होगी। यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि सेना सुरक्षा का एक प्रमुख माध्यम रही होगी।
मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य (322 – 295 )ईसा पूर्व)के दरबार में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज़ ने सैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए एक समिति और छः उपसमितियों का उल्लेख किया है। इनमें से एक का काम नौसेना का संचालन करना था, तो दूसरी यातायात और खान-पान का संचालन करती थी, तीसरी का काम पैदल सैनिकों का संचालन, चौथी का अश्वारोहियों, पाँचवीं का रथारोहियों तथा छठी का काम हाथियों का संचालन करना था। दूसरी उपसमिति का दायित्व विभिन्न प्रकार का था: उपकरणों के ढोने के लिए बैलगाडि़यों की व्यवस्था, सैनिकों के लिए भोजन और जानवरों के लिए चारे की व्यवस्था करना तथा सैनिकों की देखभाल के लिए सेवकों और शिल्पकारों की नियुक्ति करना। अशोक (273 – 232) ईसा पूर्व , ने अपने साम्राज्य को अखंड बनाए रखने का प्रयास किया। ऐसा उन्होंने धम्म के प्रचार द्वारा भी किया। जैसा कि हमने अभी ऊपर पढ़ा, धम्म के सिद्धान्त बहुत ही साधारण और सार्वभौमिक थे। अशोक के अनुसार धम्म के माध्यम से लोगों का जीवन इस संसार में और इसके बाद के संसार में अच्छा रहेगा। धम्म के प्रचार के लिए धम्म महामात्त नाम से विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की गई।
शिलालेख से राजाओं और उनकी जनता के मध्य संबंध के बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त नहीं होती है।वस्तुतः साधरण जनता द्वारा राजाओं के बारे में अपने विचारों और अनुभव के विवरण कम ही छोड़े गए हैं। फिर भी इतिहासकारों ने इसका निराकरण करने का प्रयास किया है।
उदाहरण के तौर पर, जातक और पंचतंत्र जैसे ग्रंथों में वर्णित कथाओं की समीक्षा करके इतिहासकारों ने पता लगाया है कि इनमें से अनेक कथाओं के स्रोत मौखिक किस्से-कहानियाँ हैं जिन्हें बाद में लिपिबद्ध किया गया होगा।
जातक कथाएँ पहली सहस्राब्दि ई. के मध्य में पालि भाषा में लिखी गईं। गंदतिन्दु जातक नामक एक कहानी में बताया गया है कि एक कुटिल राजा की प्रजा किस प्रकार से दुखी रहती है। इन लोगों में वृद्ध महिलाएँ,पुरुष, किसान, पशुपालक, ग्रामीण बालक और यहाँ तक कि जानवर भी शामिल हैं। जब राजा अपनी पहचान बदल कर प्रजा के बीच में यह पता लगाने गया कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं तो एक-एक कर सबने अपने दुखों के लिए राजा को भला-बुरा कहा। उनकी शिकायत थी कि रात में डकैत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकठ्ठा करने वाले अधिकारी। ऐसी परिस्थिति से बचने के लिए लोग अपने-अपने गाँव छोड़ कर जंगल में बस गए। जैसा कि इस कथा से पता चलता है कि राजा और प्रजा, विशेषकर ग्रामीण प्रजा, के बीच संबंध् तनावपूर्ण रहते थे, क्योंकि शासक अपने राजकोष को भरने के लिए बड़े-बड़े कर की माँग करते थे जिससे किसान खासतौर पर त्रस्त रहते थे। इस जातक कथा से पता चलता है कि इस संकट से बचने का एक उपाय जंगल की ओर भाग जाना होता था।
दूसरा, इसी बीच करों की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए किसानों ने उपज बढ़ाने के और उपाए ढूँढ़ने शुरू किए। उपज बढ़ाने के लिए कईं नीतियाँ जैसे कि लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग, कुओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों के माध्यम से सिंचाई करना आदि अपनाई गई । व्यक्तिगत लोगों और कृषक समुदायों ने मिलकर सिंचाई के साधन निर्मित किए। व्यक्तिगत तौर पर तालाबों, कुओं और नहरों जैसे सिंचाई के साधन निर्मित करने वाले लोग प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग थे जिन्होंने अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाया।
यह उत्पादकता बढ़ाने के लिए खेती को बढ़ाने के प्रयासों के रूप में राज्य के संभावित समर्थन का संकेत हो सकता है जिसका अप्रत्यक्ष रूप से करों की बढ़ती मांग को पूरा करने हेतु राजस्व की बड़ी राशि एकत्र करने में इस्तेमाल किया जाता था, जिसकी निर्माण गतिविधियों और कृषि क्षेत्र में आगे निवेश करने के लिए राजा को आवश्यकता होती थी ।
A. 16,000 पृष्ठों में
B. 15,000 पृष्ठों में
C. 14,000 पृष्ठों में
D. 13,000 पृष्ठों में
वि० एस० सुकथंकर ने 1919 में महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण की परिकल्पना आरम्भ का दी| उनकी मंडली ने भिन्न प्रदेशों से भिन्न भाषाओँ में लिखी गयी महाभारत की पांडुलिपियों का संग्रह किया| वे चुने हुए छंदों पर ही कार्य करते थे, जो कि कई संस्करणों में एक समान थे| उन्होंने इन छंदों का प्रकाशन 13000 पृष्ठों में किया| यद्यपि इस कार्य के पूर्ण होने में 47 वर्ष लगे|
A. 1955-56
B. 1953-54
C. 1952-5
D. 1951-52
बी.बी. लाल ने मेरठ (उ०प्र०) जिले के हस्तिनापुर नामक गाँव में उत्खनन किया| उन्हें यहाँ आबादी के पाँच स्तरों के साक्ष्य मिले थे, जिनमें से दूसरा और तीसरा स्तर हमारे लिए महत्वपूर्ण है|
प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था और उस गोत्र के सदस्य ऋषि के वंशज माने जाते थे| गोत्र का एक महत्वपूर्ण नियम यह है कि विवाह के पश्चात स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था|
B. महाभारत C. मनुस्मृति D. पुराण ‘स्मृति’हिन्दू धर्म से संबंधित एक ग्रन्थ है| लगभग 500 ईसा पूर्व वेदों की रचना के बाद स्मृति का संग्रह रखने वाला साहित्य है| इनमें से सबसे प्रमुख ग्रन्थ मनुस्मृति था|
B. लालच और क्रोध C. हिंसा और छल D. पेटूपन और झूठ गांधारी ने अपने पुत्र दुर्योधन को ललचा और क्रोध से दूर रहने की सलाह दी थी| ये बुराइयां एक व्यक्ति को उसकी उन्नतियों से दूर ले जाती हैं| इन दोनों बुराइयों को हराकर एक राजा पृथ्वी पर विजय पा सकता है|
B. बहिर्विवाह C. बहुपत्नी प्रथा D. बहुपति प्रथा हिन्दू विवाह में कन्यादान (विवाह में कन्या की भेंट) अधिक मूल्यवान है| समकालीन और रूढ़िवादी के अनुसार, हिन्दू सिद्धांत यह कहता है कि अपनी कन्या को उसके पति के घर भेजना न केवल एक माता-पिताकी मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है, बल्कि उन्हें उनके पापों से भी मुक्त करता है|
B. मल्ल C. शाक्य D. कुरु कुरु उत्तरी लौह युग भारत का एक वैदिक आर्य आदिवासी संघ था, जो आधुनिक युग में दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शामिल हो गया है| यह मध्य वैदिक काल प्रमुख राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र था|
B. महाश्वेता देवी C. सरोजनी नायडू D. महादेवी वर्मा कम-से-कम तीन कहानियाँ ऎसी हैं, जिनका प्रारंभ वहां से होता है, जहाँ पर महाभारत के प्रसंग का अंत होता है| ये इस प्रकार से हैं- पंचकन्या, कुंती ओ निषाद और सौवाली| लघु कथा ‘कुंती ओ निषादी’ की लेखिकामहाश्वेता देवी हैं| ये बंगाल की एक उपन्यासकार हैं| यह कुंती (पांडवों की माता) की कहानी है और निषाद, जिसकी सास, पति और भाई एक दुर्घटना में मार दिय गए|
B. लगभग1200 ईसा पूर्व C. लगभग1100 ईसा पूर्व D. लगभग1000 ईसा पूर्व मुख्य रूप से ब्राह्मणों ने लोगों को उनके गोत्र के आधार पर वर्गीकृत किया था| प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था और उस गोत्र के सदस्य ऋषि के वंशज माने जाते थे|
B. इतिहास C. औषधि D. राजनीति चरक और सुश्रुत संहितालगभग 100 ईसवी से संबंधित हैं| इन पुस्तकों की रचना संस्कृत में की गयी है| चरक संहिता के लेखक महान ऋषि चरक हैं|
B. क्षत्रिय की C. वैश्य की D. शूद्र की महाभारत की वास्तविक कहानी संभवतः भाट सारथी (सूत) ने रची थी, जो क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्ध क्षेत्र में जाते थे और उनकी विजय व उपलब्धियों के बारे में कवितायें लिखते थे| इन रचनाओं का प्रेषण मौखिक रूप में हुआ|
B. युधिष्ठिर से C. दुर्योधन से D. कृष्ण से दुर्योधन गांधारी का ज्येष्ठ पुत्र था| जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया, तो उसने दुर्योधन से इस लालच और क्रोध से दूर रहने की विनती की
B. अंगुत्तर निकाय C. संयुत्त निकाय D. दीघनिकाय मज्झिमनिकाय में एक धनाढ्य शूद्र की कहानी है| यह कहानी एक राजाअवन्तिपुत्र और बुद्ध के अनुयायी कच्चन के बीच हुए संवाद का हिस्साहै। यह बौद्धों के वर्ण संबंधी रवैये को दर्शाती है|
महाकाव्य दीर्घ रचनाएँ हैं । महाकाव्यों में उत्कृष्ट रचनाओं में स्त्री-पुरुषों की वीरगाथाएँ तथा देवताओं से जुड़ी कथाएँ हैं। यह युद्ध कुरु के सिंहासन और उनकी राजधानी हस्तिनापुर को नियंत्रित करने के लिए लड़ा गया था। यज्ञ के बाद जन की एक सभा होती थी सभा में सब लोग चुने गये। राजा को बधाई देते थे जन के लोग अपने घर से उसके लिए कुछ भेंट व चढ़ाव लाते थे । कोई घी, गाय या सोने के जेवर देते थे । इस भेंट को आर्य लोग बलि कहते थे । राजा इन भेटों को जरुरत के अनुसार बाँट देता था । वैदिकालीन युद्धों में जन के सभी लोग मिलकर लड़ते थे । युद्ध की अगुवाई करने के लिए जन का राजा चुना जाता था । जन को युद्ध में विजय दिलाना राजा का काम था । जन की सुरक्षा निश्चित करना भी उसका प्रमुख दायित्व था । आर्य लोग पहले पशुपालन करते थे ये लोग युद्ध से प्राप्त सम्पति पर ही हमेशा निर्भर रहते थे । आर्यों ने अपनी आवश्यकता पूर्ण करने के लिए कृषि पर ध्यान दिया और वे लोग नदियों के किनारे गेहूँ, धान, दाल व तिलहन भी उगाने लगे थे । वैदिक काल में घर में ही रहकर घरेलू कार्यों, संगीत व नृत्य की शिक्षा प्राप्त करती थीं । यद्यपि महिलाओं की स्थिति पुरषों के बराबर नहीं थी किन्तु घर में उनका सम्मान था । तमिल भाषा के संगम साहित्यिक संग्रह में सामाजिक और आर्थिक संबंधों का अच्छा चित्रण है जो इस ओर इंगित करता है कि हालाँकि धनी और निर्धन के बीच विषमताएँ थीं, जिन लोगों का संसाधनों पर नियंत्रण था उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे मिल-बाँट कर उसका उपयोग करेंगे। क) विरासत से प्राप्त संपत्ति । ख) खोज द्वारा प्राप्त संपत्ति । ग) निवेश कार्य द्वारा खरीदी गई संपत्ति । घ) सज्जनों द्वारा भेट में प्राप्त संपत्ति । ड.) कार्य करके प्राप्त संपत्ति । क) महाभारत काल में स्त्रियों की दशा निम्न थी । ।ख) बहुविवाह का प्रचलन था ।ग) अनैतिक वर्गीकरण । घ) समाज का नैतिक पतन । इतिहासकार किसी ग्रंथ का विश्लेषण करते समय निम्नलिखित अनेक पहलुओं पर विचार करते हैं – (1)वे इस बात का परीक्षण करते हैं कि ग्रंथ किस भाषा में लिखा गया: पालि, प्राकृत अथवा तमिल, जो आम लोगों द्वारा बोली जाती थी अथवा संस्कृत जो विशिष्ट रूप से पुरोहितों और खास वर्ग द्वारा प्रयोग में लाई जाती थी। (2)इतिहासकार ग्रन्थ के प्रकार पर भी ध्यान देते हैं। क्या यह ग्रंथ ‘मंत्र’ थे जो अनुष्ठानकर्ताओं द्वारा पढ़े और उच्चारित किए जाते थे अथवा ये ‘कथा’ ग्रंथ थे जिन्हें लोग पढ़ और सुन सकते थे तथा दिलचस्प होने पर जिन्हें दुबारा सुनाया जा सकता था? (3)इसके अलावा इतिहासकार लेखक के बारे में भी जानने का प्रयास करते हैं जिनके दृष्टिकोण और विचारों ने ग्रंथों को रूप दिया। (4)इन ग्रंथों के श्रोताओं का भी इतिहासकार परीक्षण करते हैं क्योंकि लेखकों ने अपनी रचना करते समय श्रोताओं की अभिरुचि पर ध्यान दिया होगा। (5)इतिहासकार ग्रंथ के संभावित संकलन/रचना काल और उसकी रचनाभूमि का भी विश्लेषण करते हैं। इन सब मुद्दों का जायजा लेने के बाद ही इतिहासकार किसी भी ग्रंथ की विषयवस्तु का इतिहास के पूनर्निर्माण के लिए इस्तेमाल करते हैं। बुद्ध के समय में राजत्व के दैवीय उत्त्पत्ति होने का पौराणिक सिद्धान्त प्रचलित था। ऐसा माना जाता था कि युद्ध ने राजा द्वारा अपना नेतृत्व देने की अपरिहार्यता को जन्म दिया। लेकिन दीघ निकाय में दी गयी बौद्ध अवधारणा ने ब्राह्मण सिद्धांत के दैवीय उत्त्पत्ति के सिद्धांत का विरोध करते हुए समाज की एक वास्तविक राजनीतिक आवश्यकता को राजत्व की उत्पत्ति का कारण बतलाया है। सुत्त पिटक के अनुसार, चोरी और अन्य दोषों को रोकने के लिए विकास के एक निश्चित चरण पर, माँ प्रकृति द्वारा प्रदत चीजों को ग्रहण करने की जरूरत ने कभी भी ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर न्याय करने के लिए एक महान नेता की एक वास्तविक सामाजिक आवश्यकता को प्रेरित किया।इसलिए राजा का चुनाव एवं अनुमोदन लोगों (महासम्मत्त) द्वारा किया जाता था। ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवा के बदले उसे देते थे। यह इस बात को भी दर्शाता है कि राजत्व की संस्था सामाजिक आवश्यकता का तर्कसंगत परिणाम था। अपने मौजूदा स्वरूप में विशद महाकाव्य महाभारत में सामाजिक श्रेणियों और स्थितियों की एक विस्तृत श्रृंखला के चित्रण के साथ एक लाख से अधिक श्लोक हैं। साहित्यिक परंपरा में इस बृहत रचना के रचयिता ऋषि व्यास माने जाते हैं। महाभारत में अन्य किसी भी प्रमुख महाकाव्य की भाँति युद्धों, वनों, राजमहलों और बस्तियों का अत्यंत जीवंत चित्रण है।महाभारत की मूल कथा बांधवों के दो दलों (कौरव और पांडव) के बीच भूमि और सत्ता को लेकर हुए संघर्ष का चित्रण करती है। दोनों ही दल कुरु वंश से संबन्धित थे जिनका एक जनपद पर शासन था। यह संघर्ष एक युद्ध में परिणत हुआ जिसमें पांडव विजयी हुए। इनके उपरांत पितृवंशिक उत्तराधिकार को उद्घोषित किया गया। हम बहुधा पारिवारिक जीवन को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं। किन्तु आपने देखा होगा कि सभी परिवार एक जैसे नहीं होते: पारिवारिक जनों की गिनती, एक दूसरे से उनका रिश्ता और उनके क्रियाकलापों में भी भिन्नता होती है। कई बार एक ही परिवार के लोग भोजन और अन्य संसाधनों का आपस में मिल-बाँटकर इस्तेमाल करते हैं, एक साथ रहते और काम करते हैं और अनुष्ठानों को साथ ही संपादित करते हैं। परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा होते हैं जिन्हें हम संबंधी कहते हैं। तकनीकी भाषा का इस्तेमाल करें तो हम संबंधियों को जाति समूह कह सकते हैं। पारिवारिक रिश्ते ‘नैसर्गिक’ और रक्त संबंध माने जाते हैं किन्तु इन संबंधों की परिभाषा अलग-अलग तरीके से की जाती है। कुछ समाजों में भाई-बहन (चचेरे, मौसेरे आदि) से खून का रिश्ता माना जाता है किन्तु अन्य समाज ऐसा नहीं मानते। आरंभिक समाजों के संदर्भ में इतिहासकारों को विशिष्ट परिवारों के बारे में जानकारी आसानी से मिल जाती है किन्तु सामान्य लोगों के पारिवारिक सम्बन्धों को पुनर्निर्मित करना मुश्किल हो जाता है। इतिहासकार परिवार और बंधुता संबंधी विचारों का भी विश्लेषण करते हैं। इनका अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे लोगों की सोच का पता चलता है। संभवतः इन विचारों ने लोगों के क्रियाकलापों को प्रभावित किया होगा। इसी तरह व्यवहार ने विचारों पर भी असर डाला होगा। ये जटिलताएँ समाज के वर्गीकरण के लिए शास्त्रों में प्रयुक्त एक और शब्द जाति से भी स्पष्ट होती हैं। ब्राह्मणीय सिद्धान्त में वर्ण की तरह जाति भी जन्म पर आधरित थी। किन्तु वर्ण जहाँ मात्रा चार थे वहीं जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी। वस्तुतः जहाँ कहीं भी ब्राह्मणीय व्यवस्था का नए समुदायों से आमना-सामना हुआ - उदाहरणतः जंगल में रहने वाले निषाद या फिर व्यावसायिक वर्ग जैसे सुवर्णकार, जिन्हें चार वर्णों वाली व्यवस्था में समाहित करना संभव नहीं था, उनका जाति में वर्गीकरण कर दिया गया। वे जातियाँ जो एक ही जीविका अथवा व्यवसाय से जुड़ी थीं उन्हें कभी-कभी श्रेणियों में भी संगठित किया जाता था। संस्कृत के ग्रंथ और अभिलेखों में व्यापारियों के लिए वणिक शब्द प्रयुक्त किया जाता है। हालाँकि शास्त्रों में व्यापार को वैश्यों की जीविका बताया जाता है अन्य स्रोतों में अधिक जटिल परिस्थिति देखने को मिलती है। जैसे शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् (लगभग चौथी शताब्दी ईसवी) में नायक चारुदत्त को ब्राह्मण-वणिक बताया गया है। पाँचवीं शताब्दी ईसवी के एक अभिलेख में दो भाइयों को क्षत्रिय-वणिक कहा गया है, जिन्होंने एक मंदिर के निर्माण के लिए धन दिया। हालाँकि इन समुदायों के इतिहास का लेखा-जोखा हमें कम ही प्राप्त होता है, किन्तु कुछ अपवाद हैं जैसे कि मंदसौर (मध्य प्रदेश) से मिला अभिलेख (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी)। इसमें रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी का वर्णन मिलता है जो मूलतः लाट (गुजरात) प्रदेश के निवासी थे और वहाँ से मंदसौर चले गए थे, जिसे उस समय दशपुर के नाम से जाना जाता था। यह कठिन यात्रा उन्होंने अपने बच्चों और बांधवों के साथ संपन्न की। उन्होंने वहाँ के राजा की महानता के बारे में सुना था अतः वे उसके राज्य में बसना चाहते थे। यह अभिलेख जटिल सामाजिक प्रक्रियाओं की झलक देता है तथा श्रेणियों के स्वरूप के विषय में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। हालाँकि श्रेणी की सदस्यता शिल्प में विशेषज्ञता पर निर्भर थी। कुछ सदस्य अन्य जीविका भी अपना लेते थे। इस अभिलेख से यह भी ज्ञात होता है कि सदस्य एक व्यवसाय के अतिरिक्त और चीजों में भी सहभागी होते थे। सामूहिक रूप से उन्होंने शिल्पकर्म से अर्जित धन को सूर्य देवता के सम्मान में मंदिर बनवाने पर खर्च किया। मंदसोर शिलालेख से संस्कृत भाषा में रचित एक उद्वरण एक श्रेणी संगठन के विभिन्न सदस्यों द्वारा किए जाने वाले विभिन्न व्यवसायों का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है: कुछ लोगों को संगीत से अत्यंत प्रेम है जो कानों को प्रिय होता है; अन्य को गर्व है सैकड़ों उत्तम जीवनियों (के रचयिता होने) का, इस तरह वे अनेक कथाओं से परिचित हैं। (अन्य) विनीत भाव से उत्तम धार्मिक व्याख्यानों में तल्लीन हैं... कुछ लोग अपने धार्मिक अनुष्ठानों में श्रेष्ठ हैं; इसी तरह अपने पर निग्रह रखने वाले (वैदिक) खगोल शास्त्र में पारंगत हैं। अन्य जन युद्ध करने में शूरवीर, शत्रुओं का अनिष्ट करते हैं। सूत्रों और धर्मशास्त्रों में एक आदर्श व्यवस्था का उल्लेख किया गया था। धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में चारों वर्गों के लिए आदर्श ‘जीविका’ से जुड़े कई नियम मिलते हैं। ब्राह्मणों का कार्य अध्ययन, वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना और करवाना था तथा उनका काम दान देना और लेना था। क्षत्रियों का कर्म युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना, न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना और दान-दक्षिणा देना था। व्यवस्था के भीतर पदसौपान का निर्धारण जन्माधारित माना जाता था। ब्राह्मण, इस क्रम में शीर्ष पर थे। वे शासकों को यह उपदेश देते थे कि वे इस व्यवस्था के नियमों का अपने राज्यों में अनुसरण करें। किन्तु ऐसा करना आसान बात नहीं थी। शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे,किन्तु अनेक महत्वपूर्ण राजवंशों की उत्पत्ति अन्य वर्णों से भी हुई थी। मौर्य वंश जिसने एक विशाल साम्राज्य पर शासन किया, के उद्भव पर गर्मजोशी से बहस होती रही है। बाद के बौद्ध ग्रंथों में यह इंगित किया गया है कि वे क्षत्रिय थे किन्तु ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं। शुंग और कण्व जो मौर्यों के उत्तराधिकारी थे, ब्राह्मण थे। वस्तुतः राजनीतिक सत्ता का उपभोग हर वह व्यक्ति कर सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके । राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर शायद ही निर्भर करता था। अन्य शासकों को, जैसे शक जो मध्य एशिया से भारत आए, ब्राह्मण मलेच्छ, बर्बर अथवा अन्यदेशीय मानते थे। किन्तु संस्कृत के संभवतः आरंभिक अभिलेखों में से एक में प्रसिद्ध शक राजा रुद्रदामन (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) द्वारा सुदर्शन सरोवर के जीर्णोद्धार का वर्णन मिलता है। इससे यह ज्ञात होता है कि शक्तिशाली मलेच्छ संस्कृतीय परिपाटी से अवगत थे। एक और दिलचस्प बात यह है कि सातवाहन कुल के सबसे प्रसिद्ध शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकर्णी ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण और साथ ही क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया था। उसने यह भी दावा किया कि चार वर्णों के बीच विवाह संबंध् होने पर उसने रोक लगाई।किन्तु फिर भी रुद्रदामन के परिवार से उसने विवाह संबंध् स्थापित किए। जैसा आप इस उदाहरण में देख सकते हैं, जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना बहुधा एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया थी। सातवाहन स्वयं को ब्राह्मण वर्ण का बताते थे जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र के अनुसार राजा को क्षत्रिय होना चाहिए। वे चतुर्वर्णी व्यवस्था की मर्यादा बनाए रखने का दावा करते थे किन्तु साथ ही उन लोगों से वैवाहिक संबंध् भी स्थापित करते थे जो इस वर्ण व्यवस्था से ही बाहर थे और जैसा हमने देखा वह अंतर्विवाह पद्धति का पालन करते थे न कि बहिर्विवाह प्रणाली का जो ब्राह्मणीय ग्रन्थों में प्रस्तावित है। गोत्र एक वंश अथवा गण होता है जो जन्म के समय में एक हिंदू को दिया जाता है । एक ब्राह्मणीय पद्धति जो लगभग 1000 ई.पू. के बाद से प्रचलन में आई, वह लोगों (खासतौर से ब्राह्मणों) को गोत्रों में वर्गीकृत करने की थी। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। उस गोत्र के सदस्य ऋषि के वंशज माने जाते थे। गोत्रों के दो नियम महत्वपूर्ण थे:विवाह के पश्चात स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था तथा एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे। क्या इन नियमों का सामान्यतः अनुसरण होता था, इस बात को जानने के लिए हमें स्त्री और पुरुष नामों का विश्लेषण करना पड़ेगा जो कभी-कभी गोत्रों के नाम से उद्धृत होते थे। हमें कुछ नाम सातवाहनों जैसे प्रबल शासकों के वंश से मिलते हैं। इन राजाओं का पश्चिमी भारत और दक्कन के कुछ भागों पर शासन था (लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू.से दूसरी शताब्दी ईसवी तक)। सातवाहनों के कई अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनके आधार पर इतिहासकारों ने पारिवारिक और वैवाहिक रिश्तों का खाका तैयार किया है।कुछ सातवाहन राजा बहुपत्नी प्रथा(अर्थात् एक से अधिक पत्नी) को मानने वाले थे। सातवाहन राजाओं से विवाह करने वाली रानियों के नामों का विश्लेषण इस तथ्य की ओर इंगित करता है कि उनके नाम गौतम तथा वशिष्ठ गोत्रों से उद्भूत थे जो उनके पिता के गोत्र थे। इससे प्रतीत होता है कि विवाह के बाद भी अपने पति कुल के गोत्र को ग्रहण करने की अपेक्षा, जैसा ब्राह्मणीय व्यवस्था में अपेक्षित था, उन्होंने पिता का गोत्र नाम ही कायम रखा। यह भी पता चलता है कि कुछ रानियाँ एक ही गोत्र से थीं। यह तथ्य बहिर्विवाह पद्धति के नियमों के विरुद्ध था। वस्तुतः यह उदाहरण एक वैकल्पिक प्रथा अंतर्विवाह पद्धति अर्थात् बंधुओं में विवाह संबंध् को दर्शाता है जिसका प्रचलन दक्षिण भारत के कई समुदायों में (भी) है। बांधवों (ममेरे, चचेरे इत्यादि भाई-बहन) के साथ जोड़े गए विवाह संबंधें की वजह से एक सुगठित समुदाय उभर पाता था। अभिलेखों से सातवाहन राजाओं की कई पीढि़यों के नाम प्राप्त हुए हैं।इन सभी नामों में राजा की एक जैसी पदवी पर ध्यान दीजिए। इसके अलावा अगले शब्द को भी लक्षित कीजिए जिसका पुत्त से अंत होता है। यह एक प्राकृत शब्द है जिसका अर्थ ‘पुत्र’ है। गोतमी-पुत्त का अर्थ है ‘गोतमी का पुत्र’। गोतमी और वसिथि स्त्रीवाची नाम हैं गौतम और वशिष्ठ के। ये दोनों वैदिक ऋषि थे जिनके नाम से गोत्र हैं। संभवतः उपमहाद्वीप के और भागों में अन्य विविधताएं भी मौजूद थीं किन्तु उनके विशिष्ट ब्योरों को पुनर्निर्मित करना संभव नहीं हो पाया है। (अ) युधिष्ठिर राजा पांडु और रानी कुंती के ज्येष्ठ पुत्र थे। वह दोनों इंद्रप्रस्थ और बाद में हस्तिनापुर के राजा बने थे। उन्होंने कौरवों के हाथों द्यूत क्रीड़ा में सब कुछ खो दिया था। अंतिम वस्तु जो शेष रह गई थी वो उनकी पत्नी द्रोपदी थी अतः उन्होने उसे भी जो कुछ वो खो चुके थे उसे पुनः प्राप्त करने के लिए दाँव पर लगा दिया था। (ब)द्रौपदी ने युधिष्ठिर द्वारा स्वयं (युधिष्ठिर) को हार जाने एवं अपनी स्वतन्त्रता खो देने के पश्चात उसे(द्रौपदी को)दाँव पर लगाने के उसके अधिकार की वैधता पर लगातार प्रश्न उठाया। इस प्रश्न के उत्तर में दो भिन्न मतों को प्रस्तुत किया गया। 1.प्रथम तो यह कि यदि युधिष्ठिर ने स्वयं को हार जाने के पश्चात द्रौपदी को दाँव पर लगाया तो यह अनुचित नहीं क्योंकि पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है। 2.दूसरा यह कि एक दासत्व स्वीकार करने वाला पुरुष(जैसे उस क्षण युधिष्ठिर थे) किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता। (स) इन मुद्दों का कोई निष्कर्ष नहीं निकला और अंततः धृतराष्ट्र ने अपने वंश के हाथों द्रौपदी के साथ हुए शर्मनाक व्यवहार में बदलाव करने के लिए हस्तक्षेप किया। उन्होंने द्रौपदी को जो भी वो चाहती है , उसकी मंशा प्रकट करने को कहा, इस पर द्रौपदी ने पांडवों को बंधन मुक्त करने को कहा। इस पर धृतराष्ट्र ने उसकी इच्छापूर्ति करते हुए पांडवों को जो कुछ उन्होने द्यूत क्रीड़ा में हारा था उसे उन्हें पुनः लौटा दिया और सभी पांडवों और द्रौपदी को उनकी निजी स्वतंत्रता पुनः लौटा दी। अ) यह कहानी पालि भाषा के बौद्ध ग्रंथ मज्झिमनिकाय से है जिसमें एक राजा अवन्तिपुत्र और बुद्ध के अनुयायी कच्चन के बीच हुए दीर्घ संवाद निहित है। ब) ब्राह्मणों ने अपनी स्थिति को दैवीय शक्ति द्वारा प्रदत होने के सिद्धान्त को जनप्रिय बनाकर उनके द्वारा प्राप्त शक्ति का औचित्य साबित करने का प्रयत्न किया। वे स्वयं को निम्नरुपेण मानते थे: 1)वे सर्वश्रेष्ठ हैं और अन्य जातियाँ निम्न कोटि की हैं । 2)ब्राह्मण का वर्ण शुभ्र है और अन्य जातियाँ काली हैं। 3)केवल ब्राह्मण पवित्र है अन्य नहीं। 4) ब्राह्मण ब्रह्मा के पुत्र हैं, ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं, उनसे ही रचित हैं तथा ब्रह्मा के वंशज हैं। स) इस ग्रंथ के अनुसार सामाजिक वर्गों में से कोई भी एक वर्ग यदि धन अर्जित करता है तो वह अन्य जाति के सेवक को अपना आज्ञावाही सेवक बना सकता है।यदि शूद्र के पास धन है तो वह क्षत्रिय या फिर ब्राह्मण अथवा वैश्य को अपने आज्ञाकारी सेवक के रूप में प्राप्त कर सकता है, इस आधार पर चारों वर्णों में कोई भेद नहीं है। क )हस्तिनापुर का उत्खनन कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के बी बी लाल द्वारा 1951-1952 में किया गया था । वे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक थे। उन्हें बड़ी संख्या में उत्खनन कार्य करने का श्रेय प्राप्त है जिसमें पुरापाषाण काल से प्रारंभिक इतिहास तक का एक विस्तृत क्षेत्र सम्मिलित है। ख)महाभारत में कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर की खोज को महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि- i) यह महाकाव्य और 'वास्तविक इतिहास' के मध्य पुरातात्विक कड़ी उपलब्ध कराने वाला पहला पर्याप्त साक्ष्य है। ग) छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू. में हस्तिनापुर में निर्मित घरों की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं? 1) इस अवधि के घर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के बने हुए थे। 2)इनमें शोषक-घट और ईंटों के नाले गंदे पानी के निकास के लिए इस्तेमाल किए जाते थे, तथा 3) टेरकोटा वलय-कूपों का इस्तेमाल, कुओं और मल की निकासी वाले गर्तों, दोनों ही रूपों में किया जाता था। B. कुरु C. सातवाहन D. शुंग शास्त्रों के अनुसार, केवल क्षत्रिय ही राजा बन सकते हैं| लेकिन कई शासकों के वंश भिन्न थे| केवल मौर्यों की पृष्ठभूमि पर ही चर्चा की जाती है| बौद्ध ग्रन्थ उन्हें क्षत्रिय कुल का बताते हैं, लेकिनब्राह्मणीय शास्त्र मौर्यों को निम्न कुल का मानते हैं|
B. नहापाना C. रुद्रदामन D. शूदोसा शक राजा मध्य एशिया से भारत आये थे| शक्तिशाली मलेच्छसंस्कृत परिपाटी से अवगत थे क्योंकि शक को संस्कृत का ज्ञान नहीं था|
B. श्वैन-त्सांग C. ती-जिंग D. आई कियान श्वैन-त्सांग एक प्रसिद्द चीनी बौद्ध भिक्षु, विद्यां, यात्री और अनुवादक था, जो भारत और चीन के मध्य वार्ता लाया था| उसने भारत की सामाजिक प्रथाओं पर टिप्पणी की है| वह बौद्ध शिक्षा तथा बौद्ध पांडुलिपियों के संग्रहण के लिए भारत आया था|
B. संस्कृत के इतिहास पर C. संस्कृत के मंत्रों पर D. संस्कृत के नाटकों पर पाणिनि लगभग 5वीं शताब्दी ईसवी के व्याकरण के एक पंडित थे| ‘अष्टाध्यायी’ पुस्तक में उन्होंने 3959 सूत्रों में संस्कृत की रूपरेखा का वर्णन किया है|अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण की सबसे प्राचीनतम पुस्तकों में से एक है|
B. इलियद C. ऋगवेद D. महाभारत वि० एस० सुकथंकर के अंतर्गत 1919 में यह परिकल्पना आरम्भ की गयी| वे एक संस्कृतगज्ञ थे| उनकी मंडली ने उन छंदों को चुना, जो की कई संस्करणों में एकसमान थे और 13,000 पृष्ठों का प्रकाशन आरम्भ किया|
B. वसिथि-पुत्त (सामि) सिरि-पुलुमायि C. गोतमी-पुत्त सामि-सिरि-यन-सातकनि D. वसिथि-पुत्त सातकनि गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने भी यह घोषित कर दिया कि चार वर्णों के सदस्यों के मध्य कोई भी अंतर्जातीय विवाह नहीं कराया गया है|
B. तमिल में C. पाली में D. प्राकृत में लगभग 400-500 ईसवी के प्राचीन भारत में कई ग्रन्थ लिखे गए| इसमें कालिदास के नाटक, आर्यभट्ट और वराह मिहिर के खगोल और गणित आधारित कार्य (संस्कृत में) तथा प्राकृत में जैन ग्रंथों का संग्रहण शामिल है|
वैदिक काल में समाज में परिवार पितृसत्तात्मक होते थे । वैदिक काल में मध्य भारत को आर्यावर्त कहते थे । वैदिक काल में राजा का पद वंशानुगत होता था। वैदिक साहित्य का सृजन वैदिक काल में हुआ था। पुजारियों द्वारा वर्ण व्यवस्था को जन्माधारित बताकर उचित ठहराया गया था ।
पुराणों और महाभारत का संकलन व्यास द्वारा किया गया था ।
महाभारत और रामायण दो प्रसिद्ध संस्कृत महाकाव्य हैं । वे जातियाँ जो एक ही जीविका अथवा व्यवसाय से जुड़ी थीं उन्हें कभी-कभी श्रेणियों में भी संगठित किया जाता था। ये श्रेणियां अपने सदस्यों के जीवन के कई पहलुओं को नियंत्रित किया करती थीं। ये श्रेणियां माल के विक्रय मूल्य का निर्धारण करती थीं और अपने सदस्यों के लिए इनकी स्वयं अपनी न्याय-प्रणाली थी। कृष्ण द्वैपायन व्यास (वेदव्यास) 1. युद्ध करना 2. लोगों को सुरक्षा प्रदान करना। वैदिक काल के वर्ण व्यवस्था में शूद्र चौथा वर्ण था शूद्रों का कार्य तीनों वर्णों की सेवा करना था । इस वर्ण का समाज के अन्य वर्णों की अपेक्षा बहुत निम्न स्थान होता था । इस वर्ण को धर्मपालन और अध्ययन से वंचित रखा गया था। वेद चार हैं उनके नाम हैं :- शब्द आश्रम का उपयोग जीवन के एक चरण के लिए किया गया था। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास को चार आश्रम के रूप में जाना जाता था । B. उज्जयिनी। C. भाबरु D. सांची। उज्जैन उज्जयिनी का आधुनिक नाम है। उज्जयिनी भी मौर्य साम्राज्य में पांच प्रमुख राजनीतिक केन्द्रों में से एक था।
B. गुप्ता राजवंश। C. मौर्य वंश। D. मगध राजवंश। शुरू में एक गांव जो पाटलिग्राम कहा जाता है, 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में, पाटलिपुत्र मगध शासकों की राजधानी बन गया।
B. कुषाण। C. मौर्य। D. शक्या कुषाण सोने के सिक्के लगभग समकालीन रोमन सम्राटों और ईरान के पार्थियन शासकों द्वारा जारी किए गए सिक्कों के वजन में समान थे।
B. धम्म। C. सैन्य गत्विधियाँ। D. धार्मिक गत्विधियाँ। मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक 'इंडिका' में मौर्य साम्राज्य के प्रशासन का विस्तार में वर्णन किया है। यह ग्रंथ खंडित रूप में उपलब्ध है।
B. कर्नाटक। C. ओडिशा। D. केरल। सुवर्णगिरि का मतलब है "गोल्डन माउंटेन"। आज भी, कर्नाटक अपनी कोलार गोल्ड फील्ड्स के लिए लोकप्रिय है।
B. ऋग्वेद। C. समा वेद। D. अथर्ववेद। ऋग्वेद किसी भी अन्य इंडो-आर्यन पाठ से कहीं अधिक पुरातन माना जाता है। इस पुस्तक में, शहरों और सिंधु नदी के किनारे रहने वाले लोगों, और उसकी सहायक नदियों का एक विवरण दिया गया है।
B. संस्कृत। C. ग्रीक। D. अरमेक। अशोका पहले शासक थे जिन्होंने शिलालेख के माध्यम से लोगों को अपने संदेश देने की कोशिश की थी।
B. पार्थियन और यौधेया। C. यौधेया और शाका शत्रप। D. रोमन और शाका शत्रप कुषाण के सोने के सिक्के ईरान के रोमन और पार्थियन शासकों के सिक्के पर आधारित हैं। इन सिक्कों को उत्तर भारत और मध्य एशिया में कई साइटों से पाया गया है।
B. क्षत्रिय। C. वैश्य D. शूद्र। ब्राह्मणों को आम तौर पर राजा को भू-राजस्व और अन्य बकाया भुगतान से छूट दी गई थी, और अक्सर स्थानीय लोगों को इन बकाया राशि इकट्ठा करने का अधिकार दिया गया।
B. लाल सागर। C. भूमध्य - सागर। D. अरब सागर। लाल सागर मिस्र में स्वेज से दक्षिण पूर्व में फैली हुई है|
B. चंद्रगुप्त द्वितीय। C. चंद्रगुप्त मौर्य D. अशोका धम्म, एक धर्म या धार्मिक व्यवस्था नहीं है बल्कि एक नैतिक कानून है, जो सभी धर्मों के लिए एक आम आधार है|
B. चौथी सदी। C. पांचवीं शताब्दी। D. छठी शताब्दी। चौथी सदी के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में कई राज्य सामंता, पर निर्भर करते थे।
B. चंद्रगुप्त द्वितीय। C. स्कन्दगुप्त। D. समुद्रगुप्त।
समुद्रगुप्त चंद्रगुप्त प्रथम के उत्तराधिकारी था। अपने पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने राज्य शासन करना शुरू कर दिया और आराम नहीं किया जब तक उन्होंने पूरे भारत में विजय प्राप्त की।
B. डेक्कन C. पंजाब D. राजस्थान हरियाणा भी यौधेय गणराज्य का हिस्सा था। पुरातत्वविदों ने यौधेय द्वारा जारी किए गए कई हजार तांबे के सिक्के का पता लगाया है, जो बाद के हित और आर्थिक आदान-प्रदान में भागीदारी की ओर इशारा करते हैं।
B. ब्राह्मी और खरोश्ती। C. पाली और खरोश्ती। D. प्राक्रित और ग्रीक। राजा अशोक ने अपने विचारों का प्रचार करने के लिए प्राकृत और ब्राह्मी लिपियों का इस्तेमाल किया। इन विचारों को अलग-अलग भाषाओं में प्रचारित किया गया|
B. तोसाली C. तक्षिला D. उज्जयिनी मौर्य साम्राज्य में पाँचप्रमुख राजनीतिक केंद्र थे - राजधानी पाटलिपुत्र और प्रांतीय केंद्र तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसाली और सुवर्णगिरि।
B. बिन्दुसार। C. चंद्रगुप्त मौर्य। D. सम्प्रति। मेगस्थनीज के खाते जो टुकड़ों में बच गये हैवह मूल्यवान समकालीन कृत्य है जो इतिहासकारों द्वारा इस्तेमाल किये गये है प्राचीन भारतीय इतिहास को फिर से संगठित करने के लिए
B. कुषाण राजवंश। C. मौर्य राजवंश। D. नंदा राजवंश। अशोका, मौर्य शासक, ने खुद को 'देवानांपिय' अर्थात देवताओं के प्रिय और 'पियदस्सी' अर्थात , सुखद रूप सेनिहारना में वर्णित किया है|
मौर्य शासकों की राजधानी पाटलिपुत्र का वर्तमान नाम ‘पटना’ है।
B.
ब्राह्मण C.
किसान D.
संत
संतचरित्र
अक्सर संत की
सफलताओं का
गुणगान करते
हैं, तो वे
वस्तुतः
परिशुद नहीं
हो सकते| उनकी महत्ता
यह है कि वे उस धार्मिक
परंपरा के
अनुयायी के
विश्वासों
का विवरण
करते हैं|
जैन
धर्म के अनुसार;
पत्थर,
चट्टान व पानी
इत्यादि में
जीवन है|
मनुष्य,
जानवर, पौधे व
कीडे समित सभी
जीवित
प्राणियों
के प्रति अहिंसा
का भाव जैन
धर्म का
केंद्र है|
B.
सिद्धार्थ C.
तीर्थंकर D.
तथागत
गौतम
बुद्ध, जो
सिद्धार्थ
के नाम से
जन्मे थे, सकय
कुल के एक
स्थानीय सरदार
के बेटे थे|
B.
स्वर्ग C.
कर्म D.
माया
जैन
धर्म के
अनुसार,
मनुष्य, त्याग
व तपस्या के
द्वारा, अपनेआप
को कर्म के
चक्र से
मुक्त कर
सकता है| यह
केवल संसार
को त्याग
करने से संभव
है|
B.
चित C.
शकीय D.
सिद्ध
'चित' शब्द
का अर्थ है अंतिम
संस्कार, और
विस्तार से,
अंत्येष्टि टीला|
बौद्ध
साहित्य कई
चैत्य का
विवरण करते
है|
महाप्रजापति
गोतमी B.
मेहेनी
उड़वा C.
तथालोक D.
यशोधरा
संघ
में शामिल
होने वाली कई
महिलाओं धम्म
के शिक्षक
बने, और बाद
में थेरी बने –
आदर्निय्पूर्ण
महिलाएँ जिन्होनें
मोक्ष
प्राप्त
किया|
बुद्ध B.
कल्हण C.
कालिदास D.
महावीर
A. स्त्रियाँ विवाह के पश्चात भी पिता के गोत्र को ही बरकरार रखती थींSOLUTION
A. रामायणSOLUTION
A. बेईमानी और झूठSOLUTION
A. अंतर्विवाहSOLUTION
A. शूरसेनSOLUTION
A. सुभद्रा कुमारी चौहानSOLUTION
A. लगभग 1300 ईसा पूर्वSOLUTION
A. अर्थशास्त्रSOLUTION
A. ब्राह्मण कीSOLUTION
A. अर्जुन सेSOLUTION
A. मज्झिमनिकायSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
(ख) क्या युधिष्ठिर के पास उसकी पत्नी को दाँव पर लगाने का अधिकार था?
(ग) किसने मध्यस्थता कर पांडवों और द्रौपदी की स्वतन्त्रता को पुनः बहाल किया था?
SOLUTION
स. इस ग्रंथ के अनुसार क्या स्थिति सामाजिक अंतर को स्पष्ट करती है ?
SOLUTION
(ख) इतिहासकारों द्वारा हस्तिनापुर की खोज को महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
(ग) छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू. में हस्तिनापुर में निर्मित घरों की मुख्य विशेषताएं क्या थीं?
[2+3+2=8]
SOLUTION
ii) दूसरा, यह 'डार्क एज' (अंधकार युग) पर रोशनी डालने वाला प्रथम सुनिर्देशित चरण था।
A. मौर्यSOLUTION
A. चस्तानाSOLUTION
A. सो जियान SOLUTION
A. संस्कृत व्याकरण पर SOLUTION
A. रामायणSOLUTION
A. गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनिSOLUTION
A. संस्कृत मेंSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
4. अर्थवेद ।SOLUTION
A. विदिशा।SOLUTION
A. नंदा वंश।SOLUTION
A. गुप्त।SOLUTION
A. कृषि गत्विधियाँ।SOLUTION
A. बंगाल।SOLUTION
A. यजुर वेद।SOLUTION
A. प्राकृत।SOLUTION
A. रोमन और पार्थियन शासकों।SOLUTION
A. ब्राह्मण।SOLUTION
A. काला सागर।SOLUTION
A. बिम्बिसार।SOLUTION
A. तीसरी शताब्दी।SOLUTION
A. चंद्रगुप्त प्रथमISOLUTION
A. कर्नाटकSOLUTION
A. खरोश्ती और ग्रीक।SOLUTION
A. पाटलिपुत्र।SOLUTION
A. अशोक।SOLUTION
A. गुप्ता राजवंशSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
A.
चित्रकारSOLUTION
B.
C.
D.
Right Answer is: ASOLUTION
A.
गौतमSOLUTION
A.
आत्माSOLUTION
A.
चित्रSOLUTION
A.
SOLUTION
A.