CBSE - MCQ Question Banks (के. मा. शि. बो . -प्रश्नमाला )

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Q. 160601 यज्ञ, जो वैदिक परंपरा का अभिन्न अंग था, लगभग इस समय तक, सामूहिक तौर पर किये जाते थे -


A. 1500 ईसा पूर्व

B. 500 ईसा पूर्व

C. 1500 ईसा पूर्व

D. 1000 ईसा पूर्व

Right Answer is: D

SOLUTION

ऋग्वेद कई देवताओं, खासकर अग्नि, की स्तुति का संग्रह करते थे| यज्ञों के समय कई स्रोतों का उच्चारण किया जाता था, जब लोग मवेशी, पुत्र, स्वास्थ्य, लम्बी आयु इत्यादि के लिए प्रार्थना करते थे|  लगभग 1000 ईसा पूर्व तक, यज्ञ, सामूहिक रूप में, किये जाते थे|


Q. 160602 ‘ताज-उल-तारीख भोपाल’ के लेखक थे -


A. जॉन मार्शल

B. एच. एच. कोल

C.

सुल्तान जेहान बेगम

D. शाहजहाँ बेगम

Right Answer is: D

SOLUTION

शाहजहाँ बेगम, और उनके उतराधिकारी, सुल्तान जेहान बेगम, दोनों ने साँची के पराचीने स्थल की सुरक्षा हेतु धन का अनुदान किया|


Q. 160603 जैन धर्म के अनुसार, त्याग व तपस्या की आवश्यकता इसके लिया ज़रूरत है -


A.

किरियमन

B.

कर्म

C. प्रभ्ध

D. संचिता

Right Answer is: B

SOLUTION

कर्म का अर्थ है ‘काम’ या ‘कार्य’, या बड़े पैमाने पर, कारण का सार्वभौमिक सिद्धांत|


Q. 160604 जैन धर्म के अनुसार, अंतिम तीर्थंकर थे-


A.

मक्काली गोसल

B.

सिद्धार्थ

C.

महावीर

D.

अजित केस्कम्ब्लिन

Right Answer is: C

SOLUTION

6वी शताब्दी ईसा पूर्व में, महावीर से पूर्व, जैन धर्म का मूल सिद्धांत, उत्तरी भारत में, मौजूद था| जैन परंपरा के अनुसार, उनसे पहले, 23 तीर्थंकर आये थे – वे जो दूसरों को जीवन की नदी के पार पहुंचाते थे|


Q. 160605 हिन्दू धर्म का एक रूप, जहाँ भगवन शिव की पूजा, प्रमुख देवता के रूप में किया गया था -


A.

ब्राह्मणवाद

B.

भाग्वात्वाद

C.

शैववाद

D.

वैष्णवाद

Right Answer is: C

SOLUTION

शैव धर्म में, भगवन शिव को एक लिंग के रूप में प्रतीत किया गया था| कभी-कभी, उन्हें मानवीय रूप में भी दिखाया गया|


Q. 160606 बौद्ध धर्म का पूर्वी एशिया में प्रचार के बाद, तीर्थयात्री, बौद्ध ग्रन्थ की खोज में, यहाँ से आये-


A.

तिब्बत

B.

चीन

C.

कोरिया

D.

जापान

Right Answer is: B

SOLUTION

बौद्ध धर्म का पूर्वी एशिया में प्रचार के बाद, तीर्थयात्री, बौद्ध ग्रन्थ की खोज में, चीन से आये| इन्हें फिर चीन ले जाया गया, जहाँ इनका अनुवाद विद्वान द्वारा किये गए|


Q. 160607 बुद्ध ने अपना पहला उपदेश कहाँ दिया।


A. वाराणसी

B. कुसीनगर

C. सारनाथ

D. लुम्बीनी

Right Answer is: C

SOLUTION

बौद्ध धर्म के इतिहास में यह शिक्षा ‘धर्म चक्र परिवर्तन’ कहलाती है। इस महान शिक्षा के पश्चात, बुद्ध पहली बार अपने शिष्य बनाने में सफल हुए।


Q. 160608 जिस पुस्तक में बौध धर्म के संघ के नियम लिखे जाते थे उसे कहते थे।


A. सुट्टा पिताका

B. जताका

C. ब्रह्माणा

D. विनाया पिताका

Right Answer is: D

SOLUTION

यह पुस्तक हमें बताती है कि सभी मर्द संघ में शामिल हो सकते हैं। यहाँ तक की बच्चे अपने माता पिता की आज्ञा लेकर तथा गुलाम अपने आकाओं की आज्ञा से संघ से जुड़ सकते हैं।


Q. 160609 बौद्ध धर्म के संस्थापक थे।


A. सिद्धार्थ

B. महावीर

C. अजातसत्तु

D. बिम्बीसारा

Right Answer is: A

SOLUTION

सिद्धार्थ, गौतम के नाम से भी जाने जाते हैं, बौर्द्ध धर्म के संस्थापक थे तथा उनका जन्म लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ था।


Q. 160610 विनय पिताका किससे सम्बन्धित है।


A. जैन धर्म

B. हिन्दु धर्म

C. बौर्द्ध धर्म

D. सिख धर्म

Right Answer is: C

SOLUTION

बौद्ध संघ के लिए जो नियम बनाए गए थे वह एक पुस्तक में लिखे गए थे। विनय पिताका, त्रिपिताका का एक भाग है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पालन किए जाने वाले नियम तथा विनियम लिखे हुए हैं। वर्तमान में पाठ के केवल 6 संस्करण उपलब्ध हैं।


Q. 160611 महावीर के अनुयायी जाने जाते थे ?


A. जैन

B. बौद्ध

C. हिन्दु

D. मुस्लिम

Right Answer is: A

SOLUTION

जैनी बहुत ही सरल जीवन व्यतीत करते हैं। वह जैन तिर्थांकरों द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का अनुसरण करते थे।


Q. 160612 वर्द्धमान महावीर ने अपने अनुयाईयों को किस सिद्धान्त का पालन करने के लिए अधिक बल दिया।


A. हिंसा

B. केवला

C. अहिंसा

D. धम्मा

Right Answer is: C

SOLUTION

महावीर के अहिंसा पद का अर्थ यह है कि किसी भी जीवित को चोट न पहुंचाई जाए ना ही किसी जीव की हत्या की जाए। महावीर ने अहिंसा की अवधारणा में एक और विशेषता जोड दी थी। जिसे अनेकान्तवाद कहा जाता था। इससे उनका तात्पर्य था कि सत्य के अनेक पहलू होते हैं।


Q. 160613 भिक्षु तथा भिक्षुणी किसके सदस्य थे ?


A. आश्रम

B. शाही परिवार

C. क्षत्रीय परिवार

D. संघ

Right Answer is: D

SOLUTION

यह बौद्ध संघ के सदस्य थे। यह अत्यधिक समय चिन्तन करते थे तथा भोजन के लिए गांव तथा शहरों में भीख मांगने जाते थे। वह दूसरों को शिक्षित करते थे तथा एक दूसरे की मदद करते थे।


Q. 160614 हिन्दू जाति व्यवस्था में, अल-बिरूनी ने इसको मान्यता नहीं दी -


A.

पदक्रम

B.

नीची जाति

C.

बहिष्कृत

D.

अपवित्रता

Right Answer is: D

SOLUTION

अल-बिरूनी के अनुसार, हर अपवित्र वस्तु, अपनी पवित्राता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का सफतोपुर्वक प्रयास करती है| सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है।


Q. 160615 अल-बिरूनी ने, जाति व्यवस्था में, अपवित्रता के विचार को इसके नियमों के विरुद्ध ठहराया -


A. देवताओं

B. कुदरत

C. पुरोहित

D. धर्मों

Right Answer is: B

SOLUTION

अल-बिरूनी ने, जाति व्यवस्था में, अपवित्रता के विचार को मान्यता नहीं दी| उसके अनुसार, हर वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्राता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है।


Q. 160616 इब्न बत्तुता द्वारा लिखी गई वृतांत का नाम है -


A. रिहला

B. किताब-अल-हिन्द

C. तुजुक-ई-बाबरी

D. ऐन-ई-अकबरी

Right Answer is: A

SOLUTION

इब्न बत्तुता का यात्रा वृतांत का अभिलेख एक पुस्तक के रूप में किया गया है, जिसका नाम है रिहला|


Q. 160617 अल-बिरूनी का जन्म इस शहर में हुआ -


A. हेरात

B. ख्वारिज़्म

C. समरकंद

D. बल्ख

Right Answer is: B

SOLUTION

अल-बिरूनी का जन्म, 973 ईस्वी में, ख्वारिज़्म शहर में हुआ, जो शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था|


Q. 160618 वो यात्री, जो अफ्रीका से भारत आया था, उसका नाम था -


A. दूरते बारबोसा

B. अंतोनियो मानसेरेते

C. इब्न बत्तुता

D. शेख अली हाज़िन

Right Answer is: C

SOLUTION

इब्न बत्तुता, जो उत्तर-पश्चिम अफ्रीका में स्तिथ मोरक्को से था, दूर-दूर की जगहों तक जाना पसंद करता था| वह यात्राओं से अर्जित अनुभव को ज्ञान का अध्कि महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था।


Q. 160619 वो यूरोपीय यात्री, जिसने भारत तथा चीन की यात्रा की, का नाम था -


A. पीटर मुंडी

B. मार्को पोलो

C. फ्रांस्वा बर्नीयर

D. अंतोनियो मानसेरेते

Right Answer is: B

SOLUTION

मार्को पोलो, जो इटली में वेनिस से आया था, ने 13वी शताब्दी में भारत और चीन की यात्रा की|


Q. 160620 जिस शाही व्यक्ति की सेवा, फ्रांस्वा बर्नीयर ने, एक चिकित्सक के रूप में किया, उसका नाम था -


A. लुई 14वां

B. दानिशमंद खान

C. शाह जहान

D. दारा शिकोह

Right Answer is: D

SOLUTION

फ्रांस्वा बर्नीयर, नजदीकी रूप से, मुग़ल साम्राज्य से जुड़े थे| वह मुग़ल बादशाह शाह जहाँ के ज्येष्ठ पुत्र, दारा शिकोह के चिकित्सक थे| बाद में, वह दानिशमंद खान के यहाँ, जो मुग़ल दरबार में एक अर्मेनियाई अमिर थे, एक बुधजिवी व वैज्ञानिक के रूप में, सेवा की|


Q. 160621 वो यात्री, जो 1656-68 ईस्वी तक भारत में रहा, था -


A.

ज्यौं-बैप्टिस्ट तैवर्नियर

B. फ्रांस्वा बर्नीयर

C. दूरते बारबोसा

D. रोबर्टो नोबिली

Right Answer is: B

SOLUTION

फ्रांस्वा बर्नीयर, एक फ्रांसीसी यात्री, अवसर पाने हेतु, भारत आया| वह 12 साल तक (1656-68 ईस्वी) भारत में रहा|


Q. 160622 जिस यात्री ने सती प्रथा का विवरण किया, वह था -


A. दूरते बारबोसा

B. फ्रांस्वा बर्नीयर

C.

इब्न बत्तुता

D. पेलसर्ट

Right Answer is: B

SOLUTION

भारत में आने वाले सभी यूरोपीय यात्री व लेखक, अक्सर महिलाओं के प्रति बर्ताव के द्वारा, पूर्वी व पश्चिमी समाजों के बीच महत्वपूर्ण भिन्नताओं के संकेत देते थे| उनमें से एक, फ्रांस्वा बर्नीयर, ने सती प्रथा का विस्तृत विवरण किया| उसके अनुसार, कुछ औरतों ने प्रसन्नतापूर्वक मृत्यु को गले लगाया, पर अन्य को मरने पर मजबूर किया गया|


Q. 160623 जिस पौधे के पत्तों का विशेष विवरण इब्न बत्तुता के वृतांत में मिलता है, वो है -


A. आम का पेड़

B. नीम का पेड़

C. पान का पेड़

D. नारियल का पेड़

Right Answer is: C

SOLUTION

इब्न बत्तुता के अनुसार, पान के पेड़ को अंगूर-लता की तरह उगाया जाता था| परंतु, इससे कोई फल नहीं उगता था, और इसे सिर्फ अपने पत्तों हेतु उगाया जाता था|


Q. 160624 मध्यकालीन भारत में, जिनका जन्म जाति व्यवस्था के बाहर हुआ, उन्हें कहा गया -


A. शुद्र

B. अंत्यज

C.

वैश्य

D. ब्राह्मण

Right Answer is: B

SOLUTION

मध्यकालीन भारत में, जिन्हें अंत्यज (व्यवस्था से परे) से यह उम्मीद थी कि वे किसानों और ज़मींदारों को सस्ता क्ष्रम प्रदान करें| हालाँकि ये अक्सर सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होते थे, फिर भी इन्हें आवश्याक तंत्रा में शामिल किया जाता था।


Q. 160625 मुग़ल साम्राज्य में भू-राजस्व, जो मुग़ल शासकों के लिए ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ के रूप में माँग था, असल में यह था -


A.

भूमि का कर

B.

फसल का कर

C. किराया

D. कृषि कर

Right Answer is: B

SOLUTION

सोलहवीं शताब्दी में अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबलु फज़्ल भूिम राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है, जो शासक द्वारा अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के बदले की गई माँग थी, न कि अपने स्वामित्व वाली भूमि पर लगान था। संभवतः यूरोपीय यात्राी ऐसी माँगों को लगान मानते थे क्योंकि भूमि राजस्व की माँग अकसर बहुत अधिक होती थी। लेकिन असल में यह न तो लगान, न ही भूमिकर था, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।


Q. 160626 ज्यौं-बैप्टिस्ट तैवर्नियर द्वारा लिखी गई किताब का नाम है -


A.

त्रवेल्लेर्स इंडिया – ऍन एंथ्रोपोलॉजी

B.

ट्रेवल्स इन द मुग़ल एम्पायर

C.

ट्रेवल्स इन इंडिया

D.

इंडिया बिफोर यूरोप

Right Answer is: C

SOLUTION

ज्यौं-बैप्टिस्ट तैवर्नियर भारत की यात्रा करने वाले सबसे प्रसिद्ध यात्रीयों में से एक था| उसने कम-से-कम छह बार भारत की यात्रा की| वह खासकर भारत में व्यापारिक स्तिथि से प्रभावित था, जिसकी तुलना उसने ईरान व ओटोमन साम्राज्य के साथ की| उसने ‘ट्रेवल्स इन इंडिया’ किताब लिखा|


Q. 160627 भारत की ओर जाते हुए, इब्न बतुता, इस वर्ष में, सिंध क्षेत्रे पहुँच गया -


A.

1332 ईस्वी

B.

1333 ईस्वी

C.

1334 ईस्वी

D.

1335 ईस्वी

Right Answer is: B

SOLUTION

इब्न बतुता, 14वि शताब्दी में, भारत आए| उन्होंने, अरबी में, रिहला नामक एक यात्रा वृतांत लिखा| भारत की ओर आते हुए, वे 1333 ईस्वी में, सिंध क्षेत्र पहुंचे|


Q. 160628 किस भाषा में ‘ट्रेवल्स इन द मुग़ल एम्पायर’ लिखी गई?


A.

अंग्रेज़ी

B.

जर्मन

C.

डच

D.

फ्रांसीसी

Right Answer is: D

SOLUTION

बर्नियर की किताब ‘ट्रेवल्स इन द मुग़ल एम्पायर’, 1670-71 ईस्वी में, फ्रांस में प्रकाशित की गई| अगले पांच वर्षों में, इसका अनुवाद अग्रेज़ी, जर्मन व इतावली भाषाओँ में किया गया|


Q. 160629 इब्न बतूता कौन था?
Right Answer is:

SOLUTION

इब्न बतूता, मोरक्को, अफ्रीका से एक चौदहवीं सदी का यात्री था


Q. 160630 'अलबेरूनी' की प्रसिद्ध रचना का नाम बताइये ?
Right Answer is:

SOLUTION

'किताब अल हिंद', अलबेरूनी की एक महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध रचना थी


Q. 160631 भारत में किन दो चीजों ने इब्नबतूता को चकित कर दिया था?
Right Answer is:

SOLUTION

इब्नबतूता द्वारा जिन दो चीजों का उल्लेख किया गया था वे पान और नारियल थेइब्न बतूता की चित्रण की विधियों के कुछ बेहतरीन उदाहरण उन तरीकों में मिलते हैं जिनसे वह नारियल और पान, दो ऐसी वानस्पतिक उपज जिनसे उसके पाठक पूरी तरह से अपरिचित थे, का वर्णन करता है।


Q. 160632 इब्न बतूता के अनुसार दो डाक व्यवस्थाएँ कौनसी थीं?
Right Answer is:

SOLUTION

इब्नबतूता के अनुसार भारत में दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी।

1.अश्व डाक व्यवस्था जिसे उलुक कहा जाता था, हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों द्वारा चालित होती थी।

2.पैदल डाक व्यवस्था के प्रति मील तीन अवस्थान होते थे, इसे दावा कहा जाता था।


Q. 160633 इब्न बतूता ने नारियल के वृक्ष और नारियल का वर्णन किस प्रकार किया है?
Right Answer is:

SOLUTION

इब्न बतूता ने नारियल के वृक्ष को सबसे अनोखे तथा प्रकृति में सबसे विस्मयकारी वृक्षों में से एक बताया है। उसके अनुसार ये हू-बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं। इनमें कोई अंतर नहीं है सिवाय एक अपवाद के - एक से काष्ठफल प्राप्त होता है और दूसरे से खजूर।

नारियल के वृक्ष का फल मानव सिर से मेल खाता है क्योंकि इसमें भी मानो दो आँखें तथा एक मुख है और अंदर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा दिखता है।


Q. 160634 सूफी थे-


A. मुस्लिम रहस्यवादी

B. हिन्दू रहस्यवादी

C. योगी

D. नाथपंति

Right Answer is: A

SOLUTION

सूफियों ने धर्म के बाहरी आडंबरों को अस्वीकार करते हुए ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति तथा सभी मनुष्यों के प्रति दयाभाव रखने पर बल दिया था।


Q. 160635 सूफी सिलसिलों का नामकरण कैसे किया जाता था?
Right Answer is:

SOLUTION

ज्यादातर सूफी वंश उन्हें स्थापित करने वालों के नाम पर पड़े। उदाहरणतः, कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर पड़ा। कुछ अन्य सिलसिलों का नामकरण उनके जन्मस्थान पर हुआ जैसे चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर से लिया गया।


Q. 160636 सिलसिला क्या थे ?
Right Answer is:

SOLUTION

सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है जंजीर जो शेख और मुरीद के बीच एक निरंतर रिश्ते की द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है बारहवीं शताब्दी के आसपास इस्लामी दुनिया में सूफी सिलसिलों का गठन होने लगा।


Q. 160637 दरगाह का क्या अर्थ होता है?
Right Answer is:

SOLUTION

दरगाह एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ दरबार होता है। पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह उसके मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी। इस तरह पीर की दरगाह पर शियारत के लिए जाने की, खासतौर से उनकी बरसी के अवसर पर, परिपाटी चल निकली।

 

 


Q. 160638 कब सूफीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन के रूप में विकसित हो गया था?
Right Answer is:

SOLUTION

ग्यारहवीं शताब्दी तक आते-आते सूफीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था जिसका सूफी और कुरान से जुड़ा अपना साहित्य था। संस्थागत दृष्टि से सूफी अपने को एक संगठित समुदाय-ख़ानकाह (फारसी)के इर्द-गिर्द स्थापित करते थे। ख़ानकाह का नियंत्रण शेख (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फारसी) के हाथ में था। वे अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (खलीफा)की नियुक्ति करते थे। आध्यात्मिक व्यवहार के नियम निर्धारित करने के अलावा ख़ानकाह में रहने वालों के बीच के संबंध और शेख व जनसामान्य के बीच के रिश्तों की सीमा भी नियत करते थे।


Q. 160639 चिश्ती ज़ियारत पर एक टिप्पणी लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

सूफी संतों की दरगाह पर की गई ज़ियारत सारे इस्लामी संसार में प्रचलित है। इस अवसर पर संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद यानी बरकत की कामना की जाती है। पिछले सात सौ सालों से अलग-अलग संप्रदायों, वर्गों और समुदायों के लोग पाँच महान चिश्ती संतों की दरगाह पर अपनी आस्था प्रकट करते रहे हैं।


Q. 160640 सूफी धर्म का समकालीन समाज पर क्या प्रभाव पड़ा।
Right Answer is:

SOLUTION

सूफीवाद का प्रभाव

 

सूफी सम्प्रदाय मत प्रेम का, सौन्दर्य का और संगीत का सम्प्रदाय था। बुद्धि की अपेक्षा भावना पर अधिक आश्रित था, इसलिए इसका प्रभाव समाज पर व्यापक रूप से पड़ा। इस्लाम धर्मावलम्बियों ने ही इसे नहीं अपनाया बल्कि सभी धर्मों के मानने वाले व्यक्तियों ने इसे स्वीकार किया। सूफी मत के संक्षेप में निम्नलिखित प्रभाव हुए -

(1) धार्मिक एकता - सूफी सम्प्रदाय अपने आप में ही कई विचारधाराओं और मतों पर आश्रित था, अतः इसके मूल में एकता की भावना थी। जिसने समाज में धार्मिक एकता की भावना को पैदा किया।

(2) प्रेम का प्रसार - सूफी संत प्रेममार्गी सन्त थे, इसलिए समाज से द्वेष घृणा तथा वैमनस्य की भावना को दूर करने में वे सफल रहे। सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत नामक प्रेमकाव्य लिखा।

(3) साहित्य पर प्रभाव - भारतवर्ष में सूफी मत ने ऐसे महत्वपूर्ण काव्य को जन्म दिया जिससे भारत की वैविध्यपूर्ण साहित्य की विरासत और अधिक समृद्ध हुई।

(4) समाज सेवा की भावना को बल - सूफियों ने ईश्वर को प्राप्त करने के लिए जो मार्ग निर्धारित किया, उसमें समाज सेवा का महत्वपूर्ण स्थान था। इसलिए समाज में गरीबों और दुःखियों की सेवा की भावना जाग्रत हुई।

(5) अहंकार के स्थान पर विनम्रता -सूफियों के विश्वास के अनुसार मनुष्य ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं कर सकता। इस प्रकार मनुष्य को अहंकार करने का अवसर सूफी मत में कहीं भी नहीं है। इसका परिणाम यह हुआ कि समाज में अहंकार की भावना का स्थान विनम्रता ने ले लिया।


Q. 160641
सूफीवाद के किन्हीं दो सिद्धांतों का उल्लेख कीजिए।
Right Answer is:

SOLUTION

1) सूफी संगीत व गायन को ईश्वर-प्राप्ति का प्रमुख साधन मानते हैं व सिर्फ एक ईश्वर में विश्वास करता है। 2) सूफी मत किसी प्रकार के वर्ग-विभेद, जातिभेद व कर्मकाण्ड को स्वीकार नहीं करता है।


Q. 160642
कबीर के दो प्रमुख उपदेशों का मूल्यांकन कीजिए।
Right Answer is:

SOLUTION

1) हिन्दू-मूस्लिम एकता पर जोर दिया।2) कथनी व करनी में भेद रखने वालों का घोर विरोध किया। 3) समाज में प्रचलित अंधविश्वासों व रीति-रिवाजों की तीव्र आलोचना की।


Q. 160643
कबीर की वाणी जिन पुस्तकों में संकलित है उनमें से किन्हीं दो के नाम लिखिए ।
Right Answer is:

SOLUTION

1) कबीर ग्रंथावली 2) कबीर बीजक


Q. 160644 तमिलनाडू के विष्णु एवं शिव भक्त संतों को किस नाम से जाना जाता है?
Right Answer is:

SOLUTION

नयनार एवं अलवार


Q. 160645 अलवर नयनार संत परंपरा की दो स्त्री-भक्तों के नाम लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

1. कन्नपा नयनार 2. कराइक्काल अम्मइयार 3. अंडाल।


Q. 160646 राज्य के साथ सूफी सम्बन्धों का वर्णन कीजिये।
Right Answer is:

SOLUTION

1)चिश्ती संप्रदाय की एक और विशेषता संयम और सादगी का जीवन था जिसमें सत्ता से दूर रहने पर बल दिया जाता था। किंतु सत्ताधारी विशिष्ट वर्ग अगर बिना माँगे अनुदान या भेंट देता था तो सूफी संत उसे स्वीकार करते थे।

2)सुल्तानों ने ख़ानकाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि अनुदान में दी और दान संबंधी न्यास स्थापित किए।

 

3) इन वजहों से शासक भी उनका समर्थन हासिल करना चाहते थे। शासक न केवल सूफी संतों से संपर्क रखना चाहते थे अपितु उनके समर्थन के भी कायल थे। जब तुर्कों ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की तो उलेमा द्वारा शरिया लागू किए जाने की माँग को ठुकरा दिया। सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा इस्लाम धर्म मानने वाली नहीं है।


Q. 160647
भक्ति आंदोलन के विकास पर प्रकाश डालिये।
Right Answer is:

SOLUTION

भक्ति आंदोलन की शुरूआत छठी शताब्दी में दक्षिण भारत में हुई । इसको चलाने वाले अलवर व नयनार थे । अलवर विष्णु उपासक थे जबकि नयनार शिव उपासकों को कहा जाता था । इन भक्ति संतों में मीरा बाई, गुरूनानक, कबीर, संत तुकाराम, संत रैदास आदि शामिल थे । इन संतों ने बाह्मणों की प्रभुसत्ता व जाति प्रथा का विरोध किया। सूफी संतों ने भी सरल जीवन की और लोगों को अग्रेषित किया ।


Q. 160648
गुरूनानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिये।
Right Answer is:

SOLUTION

1. गुरूनानक ने मार्गदर्शन के लिए गुरू की अनिवार्यता को स्वीकारा। 2. मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा आदि धार्मिक आडम्बरों का विरोध किया।3. अवतारवाद का विरोध किया।4. हिन्दू व मुस्लिम धर्म ग्रन्थों का विरोध किया।5. एकेश्वरवाद पर जोर दिया। निर्गुण भक्ति का प्रचार किया।6. रब की उपासना के लिये निरंतर स्मरण व नाम के जप पर बल दिया।


Q. 160649 आप ख़ानकाह और सिलसिला से क्या समझते हैं ?
Right Answer is:

SOLUTION

ग्यारहवीं शताब्दी तक आते-आते सूफीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था जिसका सूफी और कुरान से जुड़ा अपना साहित्य था। संस्थागत दृष्टि से सूफी अपने को एक संगठित समुदाय-ख़ानकाह (फारसी)के इर्द-गिर्द स्थापित करते थे। ख़ानकाह का नियंत्रण शेख (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फारसी) के हाथ में था। वे अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (खलीफा)की नियुक्ति करते थे। आध्यात्मिक व्यवहार के नियम निर्धारित करने के अलावा ख़ानकाह में रहने वालों के बीच के संबंध और शेख व जनसामान्य के बीच के रिश्तों की सीमा भी नियत करते थे।

बारहवीं शताब्दी के आसपास इस्लामी दुनिया में सूफी सिलसिलों का गठन होने लगा। सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है जंजीर जो शेख और मुरीद के बीच एक निरंतर रिश्ते की द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है। इस कड़ी के द्वारा आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद मुरीदों तक पहुँचता था। दीक्षा के विशिष्ट अनुष्ठान विकसित किए गए जिसमें दीक्षित को निष्ठा का वचन देना होता था, और सिर मुँड़ाकर थेगड़ी लगे वस्त्र धारण करने पड़ते थे। पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह (फारसी में इसका अर्थ दरबार) उसके मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी। इस तरह पीर की दरगाह पर शियारत के लिए जाने की, खासतौर से उनकी बरसी के अवसर पर, परिपाटी चल निकली। इस परिपाटी को उर्स (विवाह, मायने पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन) कहा जाता था क्योंकि लोगों का मानना था कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत हो जाते हैं और इस तरह पहले के बजाय उनके अधिक करीब हो जाते हैं। लोग आध्यात्मिक और ऐहिक कामनाओं की पूर्ति के लिए उनका आशीर्वाद लेने जाते थे। इस तरह शेख का व ली के रूप में आदर करने की परिपाटी शुरू हुई।

कुछ रहस्यवादियों ने सूफी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नवीन आंदोलनों की नींव रखी। ख़ानकाह का तिरस्कार करके यह रहस्यवादी,फकीर की ज़िदगी बिताते थे। निर्धनता और ब्रह्मचर्य को उन्होंने गौरव प्रदान किया। इन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता था- कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी इत्यादि। शरिया की अवहेलना करने के कारण उन्हें बे-शरिया कहा जाता था। इस तरह उन्हें शरिया का पालन करने वाले (बा-शरिया) सूफियों से अलग करके देखा जाता था।

बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आने वाले सूफी समुदायों में चिश्ती सबसे अधिक प्रभावशाली रहे। इसका कारण यह था कि उन्होंने न केवल अपने आपको स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला अपितु भारतीय भक्ति परंपरा की कई विशिष्टताओं को भी अपनाया। ख़ानक़ाह सामाजिक जीवन का केंद्र बिन्दु था। हमें शेख निशामुद्दीन औलिया (चौदहवीं शताब्दी) की ख़ानक़ाह के बारे में पता है जो उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर यमुना नदी के किनारे गि़यासपुर में था। यहाँ कई छोटे-छोटे कमरे और एक बड़ा हॉल (जमातख़ाना) था जहाँ सहवासी और अतिथि रहते, और उपासना करते थे। सहवासियों में शेख का अपना परिवार, सेवक और अनुयायी थे।शेख एक छोटे कमरे में छत पर रहते थे जहाँ वह मेहमानों से सुबह-शाम मिला करते थे। आँगन एक गलियारे से घिरा होता था और ख़ानक़ाह को चारों ओर से दीवार घेरे रहती थी। एक बार मंगोल आक्रमण के समय पड़ोसी क्षेत्र के लोगों ने ख़ानक़ाह में शरण ली। (बिना माँगी खैर) पर यहाँ एक सामुदायिक रसोई (लंगर) फुतूह चलती थी। सुबह से देर रात तक सब तबके के लोग-सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिन्दू जोगी और कलंदर यहाँ अनुयायी बनने, इबादत करने, ताबीज लेने अथवा विभिन्न मसलों पर शेख की मध्यस्थता के लिए आते थे। कुछ अन्य मिलने वालों में अमीर हसन सिजज़ी और अमीर खुसरो जैसे कवि तथा दरबारी इतिहासकार शियाउद्दीन बरनी जैसे लोग शामिल थे। इन सभी लोगों ने शेख के बारे में लिखा। शेख के सामने झुकना, मिलने वालों को पानी पिलाना, दीक्षितों वेफ सर का मुंडन तथा यौगिक व्यायाम आदि व्यवहार इस तथ्य के घोतक हैं कि स्थानीय परंपराओं को आत्मसात करने का प्रयत्न किया गया।


Q. 160650 निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिए।
1. वीर शैव परंपरा
2. कबीर
3. खानकाह
Right Answer is:

SOLUTION

1- वीर शैव परंपरा

 

 

 

बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक आंदोलन उद्भव हुआ जिसका नेतृत्व बासवन्ना(1106-68) नामक एक ब्राह्मण ने किया! बासवन्ना प्रारम्भ में जैन मत को मानने वाले थे और चालुक्य राजा के दरबार में मंत्री थे। इनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर ) व् लिंगायत (लिंग धारण करने वाले ) कहलाए ।

 

2. कबीर

जीवन - महात्मा कबीर का जन्म सम्वत् 1456 विक्रमी (1399 ई.) में हुआ था। कहते हैं कि किसी विधवा ब्राह्मणी को स्वामी रामानन्द ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था। पुत्र होने पर वह लोक लजजा से बचने के लिये उसे लहरतारा नामक तालाब के पास छोड़ गई। नीरू जुलाहा और उसकी पत्नी ने इस शिशु का पालन पोषण किया। यही बालक कबीर थे। बड़े होने पर कबीर ने रामानन्द जी को अपना गुरू मान लिया। उनका विवाह लोई नामक स्त्री से हुआ था। जिससे कमाल नामक पुत्र तथा कमाली नामक कन्या हुई। कबीर कपड़ा बुनते थे, साधु संगति करते थे, अतः उन्होने बहुत ज्ञात प्राप्त कर लिया था। 120 वर्ष की लम्बी आयु पाकर वे मगहर में मरे।

 

3-खानकाह - सभी सूफी, नगर के निकट खानकाह (आश्रम) बनाकर रहते थे। साधारणतः वे उन स्थानों पर खानकाह बनाते थे, जहाँ निर्धन, पद-दलित, हिन्दू निम्न जातियों के समूह रहते थे और जिन्हें सहानुभूति की ज्यादा आवशयकता थी। ये खानकाह, घास, फूस और मिटटी के बने होते थे और उनमें एक या दो कमरे सूफी संत और उसके परिवार के लिए होते थे। एक बड़ा हॉल या जमैयत खाना होता था, जहाँ उनके शिष्य, अतिथि आदि एकत्रित होकर धार्मिक कार्य करते थे। खानकाह प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक समय उपलब्ध थे ।


Q. 160651
भक्ति आंदोलन के प्रमुख धर्म सुधारकों का परिचय दीजिए ।
Right Answer is:

SOLUTION

1) स्वामी रामनुजाचार्य - इनका जन्म श्रीरंगम (तमिलनाडु) में हुआ था । यह दक्षिण के वैष्णव आचार्य थे । “विशिष्टाद्वैतवाद“ का प्रचार किया । सगुण ईश्वर भक्ति पर जोर दिया। वह ईश्वर की एकता में विश्वास करते थे । वह आत्मा व प्रकृति को ईश्वर का अंग मानते थे । उनका विश्वास था कि एक शूद्र भी ईश्वर के आगे आत्म समर्पण करके मोक्ष प्राप्त कर सकता है । 2) निम्बकाचार्य - यह कृष्णभक्त सन्त थे । अवतारवाद में विश्वास रखते थे । इन्होंने “द्वैताद्वैतवाद“ के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था । आपका विश्वास था कि जीव अज्ञान व अविद्या के कारण कर्म व पुर्नजन्म के चक्कर में फंस जाता है । 3) माधवाचार्य - यह विष्णुभक्त सन्त थे, इनमें वाद-विवाद करने की अदभुत क्षमता थी । आपने द्वैतवाद का प्रचार किया । आपने ईश्वर को सर्वगुण संपन्न व सर्वशक्तिमान मानते हुए कहा कि भक्ति के माध्यम से उसे प्राप्त किया जा सकता है । 4) रामानन्द रामानन्द ने शुद्ध आचरण पर अधिक जोर दिया । धार्मिक क्षेत्र में उसका सबसे बडा काम जात-पात के भेदभाव का खण्डन करना था । उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण शूद्रों व निम्न जातियों में जागरण की भावना पैदा हुई । स्त्रियों की दशा सुधारने का विशेष प्रयास किया । प्रथम संत उपदेशक थे जिन्होंने अपने उपदेशों के लिए जनभाषा का प्रयोग किया। 5) मीराबाई - आपका जन्म मेड़ता (राजस्थान) में हुआ था । यह कृष्ण भक्त थीं। मध्यकालीन संतों में मीराबाई का महत्वपूर्ण स्थान है । इनके समस्त भजन कृष्ण के प्रति प्रेम व भक्ति भावना से ओत-प्रोत हैं । मीरा के पदों में सांसारिक बंधनों से मुक्ति पाकर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना दृष्टिगत होती है।6) बल्लभाचार्य - इनका चलाया मत शुद्वाद्वैतवाद के नाम से जाना जाता है । इन्होंने वेदान्त की व्याख्या की । आप कृष्ण उपासक थे । आपने अनेक ग्रन्थों की रचना की जिनमें अणुभाष्य, पूर्व मीमांसा भाष्य, भागवत सिद्धांत प्रतिपादक आदि प्रमुख हैं। भक्त सूरदास इन्हीं के अनुयायी थे।


Q. 160652
धर्म के इतिहासकारों द्वारा भक्ति पंरपरा को किन मुख्य वर्गो में बाँटा गया है?
Right Answer is:

SOLUTION

इतिहासकारों द्वारा भक्ति परंपरा को दो मुख्य वर्गो में बाँटा गया हैः-1. सगुण भक्ति परंपराः- इस वर्ग में शिव, विष्णु व उनके अवतारों व देवी के उपासकों को शामिल किया गया है। भगवान के मूर्त अवतार की अवधारणा प्रचलित है।2. निगुर्ण भक्ति-उपासकः- इस वर्ग के लोग भगवान के निराकार व अमूर्त स्वरूप के उपासक हैं।


Q. 160653 चिश्ती ख़ानक़ाह में किस प्रकार का जीवन होता था?
Right Answer is:

SOLUTION

1)ख़ानक़ाह सामाजिक जीवन का केंद्र बिन्दु था।

 2)यहाँ कई छोटे-छोटे कमरे और एक बड़ा हॉल(जमातख़ाना) था जहाँ सहवासी और अतिथि रहते, और उपासना करते थे।

3)यहाँ एक सामुदायिक रसोई (लंगर)फुतूह चलती थी।

4)सुबह से देर रात तक सब तबके के लोग विभिन्न मसलों पर शेख की मध्यस्थता के लिए आते थे।

5)कुछ अन्य मिलने वालों में अमीर हसन सिजज़ी और अमीर खुसरो जैसे कवि तथा दरबारी इतिहासकार जीयाउद्दीन बरनी जैसे लोग शामिल थे। इन सभी लोगों ने शेख के बारे में लिखा।


Q. 160654 इब्न बतूता की यात्रा और उसके प्रसिद्ध यात्रा-विवरण रेहला पर एक विस्तृत लेख लिखिये।
Right Answer is:

SOLUTION

इब्नबतूता की यात्रा-

मोरक्को के इस यात्री का जन्म तैंजियर के सबसे सम्मानित तथा शिक्षित परिवारों में से एक, जो इस्लामी कानून अथवा शरिया पर अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था, में हुआ था। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार इब्न बतूता ने कम उम्र में ही साहित्यिक तथा शास्त्रारूढ़ शिक्षा हासिल की। अपनी श्रेणी के अन्य सदस्यों के विपरीत, इब्न बतूता पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से अर्जित अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्त्रोत मानता था। उसे यात्राएँ करने का बहुत शौक था और वह नए-नए देशों और लोगों के विषय में जानने के लिए दूर-दूर के क्षेत्रों तक गया। 1332-33 में भारत के लिए प्रस्थान करने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाहों की यात्राएँ कर चुका था।

इब्नबतूता की भारत यात्रा-

मध्य एशिया के रास्ते होकर इब्न बतूता सन् 1333 में स्थलमार्ग से सिंध् पहुँचा। उसने दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में सुना था और कला और साहित्य के एक दयाशील संरक्षक के रूप में उसकी ख्याति से आकर्षित हो बतूता ने मुल्तान और उच्छ के रास्ते होकर

दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। सुल्तान उसकी विद्वता से प्रभावित हुआ और उसे दिल्ली का काशी या न्यायाधीश नियुक्त किया। वह इस पद पर कई वर्षों तक रहा, पर फिर उसने विश्वास खो दिया और उसे कारागार में कैद कर दिया गया। बाद में सुल्तान और उसके बीच की गलतफहमी दूर होने के बाद उसे राजकीय सेवा में पुनर्स्थापित किया गया और 1342 ई. में मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया। अपनी नयी नियुक्ति के साथ इब्नबतूता मध्य भारत के रास्ते मालाबार तट की ओर बढ़ा। मालाबार से वह मालद्वीप गया जहाँ वह अठारह महीनों तक काशी के पद पर रहा पर अंततः उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया। बाद में एक बार फिर वह मालाबार तट तथा मालद्वीप गया और चीन जाने के अपने कार्य को दोबारा शुरू करने से पहले वह बंगाल तथा असम भी गया। वह जहाज से सुमात्रा गया और सुमात्रा से एक अन्य जहाज से चीनी बंदरगाह नगर जायतुन (जो आज क्वानझू के नाम से जाना जाता है) गया। उसने व्यापक रूप से चीन में यात्रा की और वह बीजिंग तक गया, लेकिन वहाँ लंबे समय तक नहीं ठहरा। 1347 में उसने वापस अपने घर जाने का निश्चय किया। चीन के विषय में उसके वृत्तांत की तुलना मार्को पोलो, जिसने तेरहवीं शताब्दी वेफ अंत में वेनिस से चलकर चीन (और भारत की भी) की यात्रा की थी, के वृत्तांत से की जाती है। इब्न बतूता ने नवीन संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं, मान्यताओं आदि के विषय में अपने अभिमत को सावधनी तथा कुशलतापूर्वक दर्ज किया। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि यह विश्व-यात्री चौदहवीं शताब्दी में यात्राएँ कर रहा था, जब आज की तुलना में यात्रा करना अधिक कठिन तथा जोखिम भरा कार्य था। इब्न बतूता के अनुसार उसे मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में चालीस और सिंध् से दिल्ली की यात्रा में लगभग पचास दिन का समय लगा था। दौलताबाद से दिल्ली की दूरी चालीस, जबकि ग्वालियर से दिल्ली की दूरी दस दिन में तय की जा सकती थी।

रेहला-

इब्न बतूता द्वारा अरबी भाषा में लिखा गया उसका यात्रा वृत्तांत जिसे रेहला कहा जाता है, चौदहवीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के विषय में बहुत ही प्रचुर तथा रोचक जानकारियाँ देता है। इब्नबतूता ने नवीन संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं, मान्यताओं आदि के विषय में अपने अभिमत को सावधानी तथा  कुशलतापूर्वक दर्ज किया है। इनमें अपनी धर्मनिष्ठता के लिए प्रसिद्ध लोगों की, ऐसे राजाओं जो निर्दयी तथा दयावान दोनों हो सकते थे की, तथा समान्य पुरुषों और महिलाओं तथा उनके जीवन की कहानियाँ सम्मिलित थीं, जो भी कुछ अपरिचित था उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता था। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता था कि श्रोता अथवा पाठक सुदूर पर सुगम्य देशों के वृत्तांतों से पूरी तरह प्रभावित हो सकें।


Q. 160655 कश्मीर में एक प्रमुख धार्मिक प्रचारक थे -


A.

लाल शाहबाज़ कलंदर

B.

लाल देद

C.

शराफुद्दीन याहया मनेरी

D.

अब्दुल्ला सत्तारी

Right Answer is: B

SOLUTION

14वी शताब्दी के दौरान, लाल देद कश्मीर में एक जाने-माने धार्मिक प्रचारक थे|


Q. 160656 ‘सियार-उल-औलिया’ के लेखक थे -


A.

आमिर हसन सिजज़ी देहलवी

B.

मीर खुर्द किरमानी

C.

नक्शबंदी शेख अहमद सिर्हिंदी

D.

हसन सिजज़ी देहलवी

Right Answer is: B

SOLUTION

‘सियार-उल-औलिया’, जिसे 14वी शताब्दी में लिखा गया था, भारत की सबसे पहली सूफी तज़किरा है|


Q. 160657 गुजरात में, एक प्रसिद्ध धार्मिक प्रचारक थे -


A. सूरदास

B. श्री चैतन्य

C. वल्लभाचार्य

D. शंकरदेव

Right Answer is: C

SOLUTION

वल्लभाचार्य, 15वी शताब्दी के दौरान, गुजरात के सबसे लोकप्रिय धार्मिक प्रचारकों में से एक थे|


Q. 160658 ‘सूफीवाद’ शब्द इस भाषा से उत्पन्न हुआ है -


A. अरबी

B. अंग्रेज़ी

C. ईरानी

D. उर्दू

Right Answer is: B

SOLUTION

‘सूफीवाद’ शब्द 19वी सदी में मुद्रित एक अंग्रेज़ी शब्द है| इस्लामी ग्रंथों में इसके लिए शब्द ‘तसव्वुफ़’ है| कुछ विद्वान मानते हैं कि यह ‘सूफ’ शब्द, जिसका अर्थ ऊन है, से लिया गया है| यह सूफियों द्वारा पहने गए खुदरा ऊनी कपडे की ओर इशारा करता है|


Q. 160659 शंकरदेव इस धर्म के मुख्य प्रचारक के रूप में उभरे -


A. ब्राह्मण धर्म

B. भगवती धर्म

C. शैव धर्म

D. वैष्णव धर्म

Right Answer is: D

SOLUTION

शंकरदेव के उपदेश को भगवती धर्म कहा जाता है, क्योंकि ये भगवद गीता और भगवद पूरण पर आधारित थे| वे सर्वोच्च देवता – भगवान विष्णु – के प्रति पूर्ण समर्पण भाव पर केंद्रित थे| शंकरदेव, जो असम में लोकप्रिय थे, के प्रमुख काव्य-रचनाओं में कीर्तनघोष भी है|


Q. 160660 निम्न सूफी सिलसिलों में से, जिन्हें बे-शरिया कहा जाता था, वे थे -


A. सुहरावर्दी

B. चिश्ती

C. नक्शबंदी

D. कलंदर

Right Answer is: D

SOLUTION

कुछ सूफियों ने, सूफी सिद्धांत के मौलिक व्यवस्था के आधार पर, नए आन्दोलन शुरू किए| कई रहस्यवादियों ने फ़क़ीर की ज़िन्दगी बिताई| इन्हें कई विभिन्न नाम से जाने जाते थे – कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी इत्यादि| क्योंकि ये शरिया का अवहेलना करते थे, इन्हें बे-शरिया कहा जाता था|


Q. 160661 मुरक्का-ए-देहली (दिल्ली की अलबम) के लेखक थे -


A. शेख अब्दुल कादिर जिलानी

B. शेख अहमद सिर्हिंदी

C. शेख नसीरुद्दीन चिराघ-ए-देहली

D. दरगाह कुली खान

Right Answer is: D

SOLUTION

दरगाह कुली खान, 18वी सदी में, दक्कन से दिल्ली आए| उन्होंने मुरक्का-ए-देहली (दिल्ली की अलबम) में शेख नसीरुद्दीन चिराघ-ए-देहली के दरगाह के बारे में लिखा|


Q. 160662 दक्षिण भारत का भक्ति संत, जो ब्राह्मण की जाति का था, का नाम था -


A. अप्पार

B. अंडाल

C. रामानुजाचार्य

D. तोंद्राडिप्पोडि

Right Answer is: D

SOLUTION

अलवार और नयनार संतों ने जाती प्रणाली तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध आवाज़ उठाई, या कम से कम प्रणाली में सुधार लाने का प्रयत्न किया| वे विविध समुदायों से थे; जैसे ब्राह्मण, कारीगर, किसान, यहाँ तक की ‘अस्पृश्य’ जातियों से| तोंद्राडिप्पोडि, एक अलवार संत, ब्राह्मण थे|


Q. 160663 सामूहिक पूजा हेतु, बाबा गुरु नानक द्वारा बनाए गए नियमों को कहा जाता है -


A.

जुलाहा

B. सतगुरु

C. संगत

D. रबाब

Right Answer is: C

SOLUTION

बाबा गुरु नानक ने, सामूहिक पूजा हेतु, नियम बनाए, जिन्हें संगत कहे जाने लगे| इसमें, सामुदायिक उपासना शामिल था|


Q. 160664 निम्न संतों में से, भगवन शिव के भक्त थे -


A. तोंद्राडिप्पोडि

B. अंडाल

C.

मनिक्व्चक्कार

D. शंकरदेव

Right Answer is: C

SOLUTION

मनिक्व्चक्कार, भक्तिगीत गाते और रचना करते हुए, अलग-अलग स्थान घूमे| उन्होंने, तमिल भाषा में, कई सुन्दर भातिगीत की रचना की|


Q. 160665 कराइक्काल अम्मइय्यार इस देवता की भक्त थी -


A. भगवान कृष्ण

B. भगवान राम

C. भगवान शिव

D. भगवान ब्रह्मा

Right Answer is: C

SOLUTION

तमिलनाडु में पैदा हुई कराइक्काल अम्मइय्यार ने, अपना लक्ष्य पाने हेतु, घोर तपस्या का मार्ग अपनाया| उनकी रचनाएँ नयनार परमपरा में संरक्षित किया गया|


Q. 160666 सिख समुदाय का, एक सामाजिक-धार्मिक व सैन्य बल के रूप में, इनके नेतृत्व में, समेकन किया गया था-


A. बाबा गुरु नानक

B. गुरु गोबिंद सिंह

C.

गुरु तेघ बहादुर

D. गुरु अर्जन

Right Answer is: B

SOLUTION

गुरु गोबिंद सिंह, जिन्होनें खालसा सेना का आधार बनाया, ने इसके पांच चिन्ह को परिभाषित किया – बिना कटे केश, कृपान, कच्छ, कंघा और लोहे का कड़ा|


Q. 160667 अल्वारों के ‘नलयिरादिव्यप्रबंधम’ की तुलना इससे की गयी थी -


A.

वेद

B.

मनुस्मृति

C. महाभारत

D. रामायण

Right Answer is: A

SOLUTION

‘नलयिरादिव्यप्रबंधम’ की रचना 10वी शताब्दी के प्रारंभ में की गई थी| इसकी, तमिल वेद के रूप में स्वीकृति, अल्वार व नयनार के, दक्षिण भारतीय समाज पर, प्रभाव को दर्शाती है|


Q. 160668 ‘सियार-उल-औलिया’ इस शताब्दी के दौरान लिखी गयी थी -


A.

12वी शताब्दी

B.

13वी शताब्दी

C.

14वी शताब्दी

D.

15वी शताब्दी

Right Answer is: C

SOLUTION

मीर खुर्द किरमानी द्वारा लिखी गई ‘सियार-उल-औलिया’ भारत में लिखा गया पहला सूफी तजकिरा था|


Q. 160669 निम्न सूफी संतों में से, जो संत बिहार में लोकप्रिय था -


A.

शराफुद्दीन याहया मनेरी

B.

अब्दुल्ला सत्तारी

C.

मुहम्मद शाह आलम

D.

मीर सयैद मौहम्मद गेसू दराज़

Right Answer is: A

SOLUTION

15वी शताब्दी के दौरान, कई सूफी संत भारतीय महाद्वीप में उभर कर आए| इनमे से एक, शरफुद्दीन याहया मनेरी, बिहार में एक प्रसिद्ध सूफी संत थे|


Q. 160670 खालसा पंथ की स्थापना किसने की थी?


A.

गुरु गोबिंद सिंह

B.

बाबा गुरु नानक

C.

गुरु अर्जन

D.

गुरु अंगद

Right Answer is: A

SOLUTION

सिक्खों के दसवे गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी| ‘खालसा’ शब्द का अर्थ है ‘शुद्ध’|


Q. 160671 सोलहवीं शताब्दी के भक्तिसंत चैतन्यदेव कहाँ से संबन्धित थे ...


A. बंगाल।

B. तमिलनाडु।

C. कर्नाटक।

D. महाराष्ट्र।

Right Answer is: A

SOLUTION

चैतन्यदेव, सोलहवीं शताब्दी के बंगाल के एक भक्ति संत थे। इन्होंने कृष्ण-राधा के प्रति नि: स्वार्थ भक्ति-भाव का उपदेश दिया।


Q. 160672 अलवर जिस ईश्वर के उपासक थे-


A. विष्णु

B. शिव

C. ब्रह्मा

D. वरुण

Right Answer is: A

SOLUTION

अलवार दक्षिण भारत के संत थे। भगवान विष्णु के प्रति समर्पित संन्यासी को अलवार कहा जाता था, भिन्न जाति पृष्ठभूमि से संबंधित 12 अलवार थे।


Q. 160673 'नामघर' की स्थापना करने की प्रथा की शुरुआत किसके द्वारा की गयी थी...


A. शंकरदेव

B. सूरदास

C. तुलसीदास

D. कालीदास

Right Answer is: A

SOLUTION

शंकरदेव ने विष्णु की भक्ति पर बल दिया और असमिया भाषा में कविताएँ तथा नाटक लिखे। उन्होंने ही ‘नामघर’ अथवा कविता पाठ और प्रार्थना गृह स्थापित करने की पद्धति चलाई, जो आज तक चल रही है।


Q. 160674 बर्नियर ने अपने विवरण में सती प्रथा के बारे में क्या कहा है?
Right Answer is:

SOLUTION

बर्नियर ने अपने विवरण में सती प्रथा का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है। उसने लिखा है कि हालाँकि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं,अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था। आगे उसने बाल सती का उल्लेख किया है जिसमें एक अल्पवयस्क विधवा जिसकी आयु बारह वर्ष से अधिक नहीं थी, की बलि दी गई थी।


Q. 160675 कश्मीर की अपनी यात्रा के दौरान बर्नियर से किन वस्तुओं को अपने साथ ले जाने की अपेक्षा की गई थी?
Right Answer is:

SOLUTION

बर्नियर से दो अच्छे तुर्कमान घोड़े रखने और अपने साथ एक शक्तिशाली फारसी ऊँट तथा चालक, घोड़ों की देखभाल करने वाला, एक खानसामा तथा एक सेवक जो हाथ में पानी का पात्र लेकर उसके घोड़े के आगे चलता है, रखने की अपेक्षा की गई थी।


Q. 160676 बर्नियर के विवरण में व्यापारियों और कारीगरों के बारे में क्या उल्लेखित है?

Right Answer is:

SOLUTION

बर्नियर ने अपने विवरण में उल्लेख किया है कि कारीगरों को उनके विनिर्माण की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए कोई प्रोत्साहन प्राप्त नहीं था।

व्यापारी अक्सर मजबूत सामुदायिक अथवा बंधुत्व संबंधों से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन कहा जाता था और उनके मुखिया को सेठ।


Q. 160677 कौनसी जानकारी बर्नियर के विवरण को अन्य यात्रियों के विवरण से भिन्न दर्शाती है?
Right Answer is:

SOLUTION

संभवतः बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है जो राजकीय कारखानों की कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण प्रदान करता है। उसने अनेक स्थान पर उल्लेख किया है कि उसने शिल्पकारों के लिए निर्मित विशाल कारखाने देखें हैं। एक निरीक्षणकर्ता के अधीन कई शिल्पकार जैसे कि कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, रोगन लगाने वाले, बढ़ई, खरादी, दर्जी तथा जूते बनाने वाले, रेशम, जरी तथा महीन मलमल का काम करने वाले अपने-अपने कक्ष में कार्य करते थे। शिल्पकार सुबह से शाम तक कार्य करते थे। अन्य यात्रियों ने सारे समाज अथवा संस्कृति का विवरण प्रस्तुत किया था, लेकिन किसी ने भी इस तरह के शाही उपयोग की एक महत्वपूर्ण वस्तु का उल्लेख नहीं किया है।


Q. 160678 बर्नियर के विवरण में व्यापारियों और कारीगरों के बारे में क्या उल्लेखित है?
Right Answer is:

SOLUTION

बर्नियर ने अपने विवरण में उल्लेख किया है कि कारीगरों को उनके विनिर्माण की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए कोई प्रोत्साहन प्राप्त नहीं था।

 

व्यापारी अक्सर मजबूत सामुदायिक अथवा बंधुत्व संबंधों से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन कहा जाता था और उनके मुखिया को सेठ।


Q. 160679 जाति व्यवस्था में अपवित्रता की धारणा के बारे में अल्बेरूनी के क्या विचार थे?
Right Answer is:

SOLUTION

जाति व्यवस्था के संबंध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानने के बावजूद, अल्बेरूनी ने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार किया।उसने लिखा कि हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है। सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। अल्बेरूनी ज़ोर देकर कहता है कि यदि ऐसा नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता।


Q. 160680 इब्नबतूता ने भारतीय समाज में विद्यमान दासों के बारे में क्या कहा था?
Right Answer is:

SOLUTION

अनेक यात्रियों ने भारतीय समाज में विद्यमान दासों के बारे में लिखा था। उदाहरण के लिए, बाजारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप दिए जाते थे। जब इब्नबतूता सिंध् पहुँचा तो उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के लिए भेंटस्वरूप घोड़े, ऊँट तथा दास खरीदे। जब वह मुल्तान पहुँचा तो उसने गवर्नर को किशमिश,बादाम के साथ एक दास और घोड़ा भेंट के रूप में दिए। इब्न बतूता बताता है कि मुहम्मद बिन तुगलक नसीरुद्दीन नामक धर्मोपदेशक के प्रवचन से इतना प्रसन्न हुआ कि उसे एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास दे दिए। इब्न बतूता के विवरण से प्रतीत होता है कि दासों में काफी विभेद था। सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं, और इब्न बतूता सुल्तान की बहन की शादी के अवसर पर उनके प्रदर्शन से खूब आनंदित हुआ। सुल्तान अपने अमीरों पर नजर रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। दासों को सामान्यतः घरेलू श्रम के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था, और इब्न बतूता ने इनकी सेवाओं को, पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में विशेष रूप से अपरिहार्य पाया। दासों की कीमत, विशेष रूप से उन दासियों की, जिनकी आवश्यकता घरेलू श्रम के लिए थी, बहुत कम होती थी।


Q. 160681 इब्नबतूता ने भारतीय समाज में विद्यमान दासों के बारे में क्या कहा था?
Right Answer is:

SOLUTION

जब इब्नबतूता सिंध् पहुँचा तो उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के लिए भेंटस्वरूप घोड़े, ऊँट तथा दास खरीदे। जब वह मुल्तान पहुँचा तो उसने गवर्नर को किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा भेंट के रूप में दिए। इब्न बतूता बताता है कि मुहम्मद बिन तुगलक नसीरुद्दीन नामक धर्मोपदेशक के प्रवचन से इतना प्रसन्न हुआ कि उसे एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास दे दिए। इब्न बतूता के विवरण से प्रतीत होता है कि दासों में काफी विभेद था। सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं, और इब्न बतूता सुल्तान की बहन की शादी के अवसर पर उनके प्रदर्शन से खूब आनंदित हुआ। सुल्तान अपने अमीरों पर नजर रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। दासों को सामान्यतः घरेलू श्रम के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था, और इब्न बतूता ने इनकी सेवाओं को, पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में विशेष रूप से अपरिहार्य पाया। दासों की कीमत, विशेष रूप से उन दासियों की, जिनकी आवश्यकता घरेलू श्रम के लिए थी, बहुत कम होती थी।


Q. 160682
विदेशी यात्रियों द्वारा वर्णित दास-दासियों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
Right Answer is:

SOLUTION

विदेशी यात्रियों द्वारा वर्णित दास-दासियों का विवरणः-1. दास-दासियाँ- इब्नबूतता लिखता है कि भारतीय बाजारों में अन्य वस्तुओं की तरंग दास-दासियाँ खुले आम बेचे जाते थे व नियमित रूप से भेंटस्वरूप दिए जाते थे। स्वंय इब्नबूतता ने सुल्तान को भेंट करने के लिए घोड़ें, ऊँट व दास खरीदे थे। वह एक घटना का विवरण देते हुए लिखता है कि नसीरूद्धीन नामक धर्मोपदेशक के प्रवचनों से प्रसन्न होकर मुहम्मद बिन तुगलक ने उसे एक लाख टके व दो-सौ दास दिए थे।2. दासों में विभेदः- दास-दासियाँ विभिन्न कार्यो में यथा नृत्य, संगीत, घुडसवारी आदि में माहिर थे।3. दासों का घरेलू श्रम के लिए प्रयोगः- घरेलू श्रम के लिए रखे दास-दासियों का मूल्य कम होने से अधिकांश परिवारों में दास रखे जाते थे। इनका कार्य महिलाओं की पालकी आदि को उठाना था।4. अमीरों की गतिविधियों की निगराने के लिएः-प्रायः अपने अमीरों की गतिविधियों की निगरानी के लिए सुल्तान दास-दासियों की नियुक्त करता था।


Q. 160683 बर्नियर ने भारत में जो देखा उसकी तुलना यूरोप से की, इसका मूल्यांकन कीजिए।
Right Answer is:

SOLUTION

फ्रांस्वा बर्नीयर अनेक देशों और उनके अनेक भागों की यात्रा करके, देशों की तुलना यूरोपीय स्थिति से करना चाहता था, उसने लगभग प्रत्येक दृष्टांत में भारत की स्थिति की तुलना, यूरोप में हुए विकास की तुलना से करते हुए उसे (भारतीय स्थिति) को दयनीय बताया।निः संदेह यद्यपि उसका मूल्यांकन सदैव पूरी तरह ठीक नहीं था लेकिन इससे उसे ख्याति मिली। उसने भारत में जो कुछ भी देखा, वह उसकी सामान्य रूप से यूरोप और विशेष रूप से फ्रांस में व्याप्त स्थितियों से तुलना तथा भिन्नता को उजागर करने के प्रति अधिक चिंतित था, विशेष रूप से वे स्थितियां जिन्हें उसने अवसादकारी पाया जैसे कि भारत में नीजि भू-स्वामित्व का अभाव !


Q. 160684 इब्नबतूता ने भारतीय शहरों का वर्णन किस प्रकार किया है?
Right Answer is:

SOLUTION

इब्न बतूता ने भारतीय शहरों को उन लोगों के लिए व्यापक अवसरों से भरपूर पाया जिनके पास आवश्यक इच्छा, साधन तथा कौशल था। ये शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे सिवाय कभी-कभी युद्धों तथा अभियानों से होने वाले विध्वंस के ।उन्होंने दिल्ली और दौलताबाद का वर्णन एवं उनकी तुलना प्रस्तुत की।

बाजार मात्र आर्थिक विनिमय के स्थान ही नहीं थे बल्कि ये सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे। इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत का प्रयोग यह तर्क देने में किया है कि शहर अपनी संपत्ति का एक बड़ा भाग से अधिशेष के अधिग्रहण से प्राप्त करते थे। इब्न बतूता ने पाया कि भारतीय कृषि के इतना अधिक उत्पादनकारी होने का कारण मिट्टी का उपजाऊपन था, जो किसानों के लिए वर्ष में दो फसलें उगाना संभव करता था। भारतीय माल की मध्य तथा दक्षिण-पूर्व एशिया, दोनों में बहुत माँग थी जिससे शिल्पकारों तथा व्यापारियों को भारी मुनाफा होता था। भारतीय कपड़ों, विशेषरूप से सूती कपड़ा, महीन मलमल, रेशम, जरी तथा साटन की अत्यधिक माँग थी। इब्न बतूता हमें बताता है कि महीन मलमल की कई किस्में अत्यधिक मँहगी थीं। इन सब बातों ने काफी हद तक शहरों की समृद्धि में सहायता प्रदान की।


Q. 160685
इतिहास में बर्नियर के यात्रा वर्णनों का क्या महत्व है?
Right Answer is:

SOLUTION

इतिहास में बर्नियर के यात्रा वर्णनों का महत्व- बर्नियर की यात्रा का दृष्टिकोण - बर्नियर पेशे से एक चिकित्सक, राजनीतिक,दार्शनिक व इतिहासकार था। उसकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य मुगल साम्राज्य में स्थान बनाना था। उसने अपने चिकित्सकीय ज्ञान का प्रयोग मुगल दरबार में बखूबी किया । 2) उसने विभिन्न देशों की यात्राएँ की व उनकी तुलना यूरोप से की। उसने सदैव विकास की दृष्टि से यूरोप को उच्च स्थान दिया व भारत में विकास को निम्न स्थान दिया । उसका मूल्यांकन निष्पक्ष नहीं था। 3) बर्नियर बुद्धिजीवी परंपरा से था उसने भारत में देखी गई हर बात की तुलना यूरोप विशेषकर फ्रांस से की व उनका तुलनात्मक विश्लेषण किया। 4) उसने मुगल सेना के बीच रहकर उनके दोषों को जानने का प्रयास किया व मुगल सैनिकों द्वारा प्रयुक्त किये जाने वाले साज-सामान का उल्लेख किया। 5) मुगल साम्राज्य को किसानों की दुर्दशा, गरीबी व कृषि के पिछडे़पन का कारण बताता है। भारतीय समाज में फैली बुराइयाँ जैसे सती-प्रथा, अस्पृश्यता आदि के बारे ध्यान दिलाता है।


Q. 160686 बर्नियर ने यूरोप और भारत में भूमि पर स्वामित्व के अधिकार की तुलना कैसे की थी?
Right Answer is:

SOLUTION

बर्नियर बौद्धिक यूरोपीय परंपरा का एक बुद्धिजीवी था। बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक मुगल भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था जो सामान्य यूरोपीय परिदृश्य से भिन्न एक विशेषता थी। यहां राज्य भूमि का स्वामी था और वह इसका वितरण अभिजात वर्ग में करता था।उसका निजी स्वामित्व के अधिकार में दृढ़ विश्वास था और उसने भूमि पर राजकीय स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक माना इस प्रकार, निजी भूस्वामित्व के अभाव ने ‘‘बेहतर’’ भूधारकों के वर्ग के उदय (जैसा कि पश्चिमी यूरोप में) को रोका जो भूमि के रखरखाव व बेहतरी के प्रति सजग रहते। इसी के चलते कृषि का समान रूप से विनाश, किसानों का असीम उत्पीड़न तथा समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में अनवरत पतन की स्थिति उत्पन्न हुई है, सिवाय शासक वर्ग के ।


Q. 160687
इब्नबतूता व बर्नियर के यात्रा वृतांतों की तुलना कीजिए।
Right Answer is:

SOLUTION

इब्नबतूता व बर्नियर के यात्रा वृतांतों का तुलनात्मक अध्ययन - 1) इब्नबतूता 14वीं शताब्दी में भारत आया था । वह भारत के सामाजिक वसांस्कृतिक जीवन की पूर्ण जानकारी प्राप्त करना चाहता था । किताबी ज्ञान के विपरीत वह अनुभव से प्राप्त ज्ञान को महत्व देता था । इसी उद्देश्य से उसने नए-नए देशों की यात्रा की।2) इस्लाम का कट्टर अनुयायी था । हजयात्रा की थी, अनेक मुस्लिम देशों जैसे ईराक, फारस, सीरिया, यमन व पूर्वी अफ्रीका के अनेक तटीय व्यापारिक बन्दरगाहों की यात्रा की। दिल्ली सल्तनत में न्यायाधीश का कत्र्तव्य निभाया व सुलतान मुहम्मद बिन तुगलक के आदेशानुसार चीन की यात्रा की । उसने चीन के सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन को समझने का प्रयास किया । दक्षिण भारत के साथ-साथ श्रीलंका, मालदीव की यात्रा की व यहाँ के रीति-रिवाजों, प्रथाओं, संस्कृतियों आदि का अध्ययन किया ।3) उसने नए-लोगों के साथ जीवंत संपर्क किया । अकेले यात्री के रूप में मोरक्को से भारत व चीन तक लंबी-लंबी यात्राएँ की व अपने साहस का परिचय दिया । 4) अपनी यात्रा में दृष्टव्य प्रत्येक घटना का सूक्ष्म विवरण अनुठेपन के साथ अपने वृतांत में वर्णित किया ।बर्नियर की यात्रा का दृष्टिकोण - बर्नियर पेशे से एक चिकित्सक, राजनीतिक, दार्शनिक व इतिहासकार था । उसकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य मुगल साम्राज्य में स्थान बनाना था । उसने अपने चिकित्सकीय ज्ञान का प्रयोग मुगल दरबार में बखूबी किया ।2) उसने विभिन्न देशों की यात्राएँ की व उनकी तुलना यूरोप से की । उसने सदैव विकास की दृष्टि से यूरोप को उच्च स्थान दिया व भारत में विकास को निम्न स्थान दिया । उसका मूल्यांकन निष्पक्ष नहीं था । 3) बर्नियर बुद्धिजीवी परंपरा से था उसने भारत में देखी गई हर बात की तुलना यूरोप विशेषकर फ्रांस से की व उनका तुलनात्मक विश्लेषण किया । 4) उसने मुगल सेना के बीच रहकर उनके दोषों को जानने का प्रयास किया व मुगल सैनिकों द्वारा प्रयुक्त किये जाने वाले साजो-सामान का उल्लेख किया। 5) मुगल साम्राज्य को किसानों की दुर्दशा, गरीबी व कृषि के पिछडे़पन का कारण बताता है । भारतीय समाज में फैली बुराइयाँ जैसे सती-प्रथा, अस्पृश्यता आदि के बारे ध्यान दिलाता है ।


Q. 160688 इब्नबतूता के अनुसार भारत में दो प्रकार की डाक व्यवस्थाएँ कौनसी थी?
Right Answer is:

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इब्नबतूता के अनुसार भारत में दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी।

1.अश्व डाक व्यवस्था जिसे उलुक कहा जाता था, हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों द्वारा चालित होती थी।

2.पैदल डाक व्यवस्था के प्रति मील तीन अवस्थान होते थे, इसे दावा कहा जाता था।हर तीन मील पर घनी आबादी वाला एक गाँव होता था जिसके बाहर तीन मंडप होते थे जिनमें लोग कार्य आरंभ के लिए तैयार बैठे रहते थे। उनमें से प्रत्येक के पास दो हाथ लंबी एक छड़ होती थी जिसके ऊपर ताँबे की घंटियाँ लगी होती थी। जब संदेशवाहक शहर से यात्रा आरंभ करता था तो एक हाथ में पत्र तथा दूसरे में घंटियों सहित छड़ लिए वह क्षमतानुसार तेज भागता था। जब मंडप में बैठे लोग घंटियों की आवाज सुनते थे तो वे तैयार हो जाते थे। जैसे ही संदेशवाहक उनके पास पहुँचता था, उनमें से एक उससे पत्र लेता था और वह छड़ हिलाते हुए पूरी ताकत से दौड़ता था, जब तक वह अगले दावा तक नहीं पहुँच जाता। पत्र के अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचने तक यही प्रक्रिया चलती रहती थी। डाक प्रणाली इतनी कुशल थी कि जहाँ सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे वहीं गुप्तचरों की खबरें सुलतान तक इस डाक व्यवस्था के माध्यम से मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।


Q. 160689 फ्रेंकोइस बर्नियर और उसके यात्रा विवरण पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

फ्रांस का रहने वाला फ्रांस्वा बर्नियर एक चिकित्सक, तथा एक फ्रांसीसी व्यक्ति था। कई और लोगों की तरह ही वह मुगल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया था। वह 1656 से 1668 तक भारत में बारह वर्ष तक रहा और मुगल दरबार से नजदीकी रूप से जुड़ा रहा-पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह का चिकित्सक था।

बर्नियर की यात्रा और यात्रा विवरण: बर्नियर ने देश के कई भागों की यात्रा की और जो देखा उसके विषय में विवरण लिखे। वह सामान्यतः भारत में जो सामाजिक स्थिति देखता था उसकी तुलना यूरोपीय स्थिति से करता था। बर्नियर के कार्य फ्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुए थे, और अगले पाँच वर्षों के भीतर ही अंग्रेजी, डच, जर्मन तथा इतालवी भाषाओं में इनका अनुवाद हो गया। बाद में इसका कईं बार पुनर्मुद्रण किया गया था। उसने अपनी प्रमुख कृति को फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित किया था और उसके कई अन्य कार्य प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों को पत्रों के रूप में लिखे गए थे।


Q. 160690
फ्रांस्वा बर्नियर द्वारा की गई ’पूर्व व पश्चिम’ की तुलना को उल्लेखित कीजिये।
Right Answer is:

SOLUTION

बर्नियर फ्रांस का रहने वाला था व बारह वर्षो तक मुगल दरबार में चिकित्सक, बुद्धीजीवी व वैज्ञानिक के रूप में जुड़ा रहा । उसका लिखा ग्रंथ “टेªवल्स इन द मुगल एम्पायर“ भारत की यूरोप से तुलना करता है व भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में दिखाता है ।1) भू-स्वामित्व का प्रश्न:- यूरोप में जहाँ भूमि पर निजी स्वामित्व था वहीं भारत में भूमि पर राजा का स्वामित्व होता था । इस कारण भू सुधारक भूमि को अपने बच्चों को हस्तांरित नहीं कर सकते थे । इस स्थिति के कारण वह भूमि को उन्नत बनाने का प्रयास नहीं करते थे ना ही उत्पादन के स्तर को बनाए रखने का प्रयत्न करते थे । इस कारण कृषि का विनाश हुआ व किसानों को उत्पीड़न का शिकार बनना पड़ा ।2) एक जटिल सामाजिक सच्चाई - एक तरफ बर्नियर कहता है कि शिल्पकारों के पास अपने उत्पादों के विस्तार के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं था क्योंकि लाभ का अधिग्रहण राज्य कर लेता था व उत्पादन पतनोन्मुख था । इसके विपरीत वह यह भी कहता है कि संपूर्ण विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थीं व एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय भारत में मौजूद था । 3) सती प्रथा - भारत में सती प्रथा का उल्लेख करते हुए वह लिखता है कि स्त्रियाँ प्रसन्नता से चिता में जल कर मर जाती थीं। विधवाओं को मरने के लिये बाध्य किया जाता था। जबकि यूरोप में महिलाओं की स्थिति उच्च थी ।4) भारतीय शहर:- मुगलकालीन शहरों को वह “शिविर नगर“ के रूप में देखता था जो राजकीय दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते थे व उनके मिट जाने के बाद शहर भी मिट जाते थे, जबकि यूरोप में ऐसा नहीं था । 5) व्यावसायिक वर्ग - इस वर्ग में हकीम, वैद्य, पंडित, मुल्ला, अधिवक्ता, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक आदि सम्मिलित थे ।6) विकास - भारत की तुलना में युरोप विकसित स्थिति में था । 7) मुगल साम्राज्य का स्वरूप - बर्नियर के अनुसार मुगल-साम्राज्य का राजा ’भिखारियों और क्रूर लोगों’ का राजा था । मुगल-राज्य के शहर व नगर विनष्ट व खराब वायू से दूषित थे । इनके खेत ’झाड़ीदार’ व ’घातक दलदली’ थे । जबकि यूरोप में ऐसा नहीं था ।


Q. 160691 क्या आपको लगता है कि समकालीन शहरी केन्द्रों में जीवन-शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्नबतूता का वृतांत सहायक हैं? उत्तर के कारण दीजिये।
Right Answer is:

SOLUTION

समकालीन शहरी केन्द्रों में जीवन शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्नबतूता का वृत्तांत बहुत सहायक है क्योंकि उसने शहरी केन्द्रों का विस्तृत विवरण दिया है जो उसके सूक्ष्म अवलोकन एवं अध्ययन पर आधारित था। वृत्तांत से निम्न जानकारियाँ प्राप्त होती हैं-1. तत्कालीन नगर घनी आबादी वाले व समृद्ध थे। परंतु कभी-कभी युद्धों वअभियानों के कारण कुछ नगर नष्ट भी हो जाते थे।2. अधिकांश शहरों में बड़े-बड़े बाजार थे जो सामाजिक व आर्थिक गतिविधियों काभी केन्द्र थे। इनमें प्रायः एक मंदिर व मजिस्द होती थी साथ ही नर्तकी, संगीतकारों व गायक के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए स्थान निश्चित थे।3. इब्नबतूता के अनुसार दिल्ली एक बहुत बड़ा शहर था जिसकी आबादी बहुत थी। उसके अनुसार सबसे बड़ा शहर दिल्ली था दौलताबाद भी दिल्ली के बराबर शहर था। 4. दिल्ली के बारे में वर्णन करते हुए उसने बताया कि यह एक घनी आबादी वाला शहर था जिसके चारों और प्राचीर बनी हुई है भीतर रात्रि के पहरेदार व द्वारपालों के कक्ष हैं। अंदर खाद्य सामग्री, हथियार, बारूद, प्रक्षेपास्त्र आदि के भण्डारगृह हैं। शहर में प्रवेश के लिए 28 दरवाजे हैं, जिनमें सबसे बड़ा दरवाजा बदायूँ दरवाजा है। मांडवी दरवाजे के भीतर एक अनाज मण्डी है। तथापि उसकी रूचि शहरी वर्णन में नहीं थी तथापि उसके वृत्तांत इतिहासकारों के लिए सहायक सिद्ध हुए हैं कि शहर अपनी संपति का एक बड़ा भाग गाँवों से अधिशेष के अधिग्रहण से प्राप्त करते हैं।


Q. 160692 इब्नबतूता द्वारा वर्णित भारत की डाक व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
Right Answer is:

SOLUTION

भारत की डाक व्यवस्था की कार्यकुशलता को देखकर इब्नबूतता बड़ा चकित हुआ। वह लिखता है कि सिंध से दिल्ली की यात्रा में जहाँ 50 पचास दिन लगते थे वहीं गुप्तचरों की सूचनाएँ सुल्तान तक उस डाक व्यवस्था द्वारा मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।वह दो प्रकार की डाक व्यवस्था का उल्लेख करता हैः-1. अश्व डाक व्यवस्था 2. पैदल डाक व्यवस्था;1द्ध अश्व डाक व्यवस्थाः-यह व्यवस्था ‘उलुक’ कहलाती थी। हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों द्वारा संचालित होती थी।;2द्ध पैदल डाक व्यवस्थाः- इस व्यवस्था में प्रति मील तीन चैकियाँ होती थीं जिन्हें ‘दावा’ कहा जाता था। हर एक तिहाई मील पर घनी आबादी वाला गाँव होता था, जिसके बाहर तीन मण्डप होते थे जहाँ लोग कार्य करने के लिए तैयार बैठे रहते थे। प्रत्येक के पास एक घंटी वाली दो हाथ लंबी छड़ी होती थी। जब संदेशवाहक एक शहर से यात्रा शुरू करता था तो वह एक हाथ में पत्र व दूसरे हाथ में घंटी वाली छड़ी लेकर यथाशक्ति तेज भागता था। घंटियों की आवाज से आगे वाले मंडप के लोग तैयार हो जाते थे। जैसे ही सन्देश वाहक उनके निकट पहुँचता था, मण्डप में से एक पत्र वाहक वह पत्र लेकर आगे प्रस्थान करता था। इस प्रकार गंतव्य तक पहुँचने तक यह प्रक्रिया सतत चलती रहती थी। यह पैदल व्यवस्था अश्व डाक व्यवस्था से अधिक तीव्र होती थी।


Q. 160693
भारतीय जाति व्यवस्था के बारे में अलबरूनी का यात्रा वर्णन क्यों महत्वपूर्ण है?
Right Answer is:

SOLUTION

1) जाति व्यवस्था को फारस के सामाजिक वर्गों के माध्यम से समझने का प्रयास- अलबरूनी लिखता है कि जिस प्रकार भारत में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता प्राप्त थी । फारस में सामाजिक वर्ग थे शासक वर्ग, पुरोहित व चिकित्सक वर्ग, खगोल शास्त्री व अन्य वैज्ञानिक वर्ग व अन्त में कृषक व शिल्पकार । इसके साथ ही उसने यह भी बताया कि भिन्नताऐं मात्र धार्मिकता के पालन में थी । 2) अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकृति - ब्राहम्णवादी व्याख्या को मानने के बावजूद अलबरूनी ने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार किया उसके अनुसार प्रत्येक वस्तु जो अपवित्र हो जाती है अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है व सफल होती है । उसके अनुसार जाति व्यवस्था में निहित अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरूद्ध थी । 3) वर्णव्यवस्था का उल्लेख - भारतीय समाज में मौजूद चारों वर्णों का उल्लेख अलबरूनी ने किया है । उसके अनुसार हिन्दू धर्मग्रन्थों में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है क्योंकि वह ब्रह्मा के सिर से उत्पन्न हुए हैं व सिर शरीर का सबसे चुनिंदा भाग है इसलिए ब्राह्मण प्रकृति का चुनिंदा भाग है । जातियों में अगला स्थान क्षत्रिय का था जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के हाथों व कन्ध्यों से हुई थी । तीसरे स्थान पर वैश्य जिनका जन्म ब्रह्मा की जंधाओं से हुआ था जबकि शूदों का स्थान निकृष्ट इसलिए है कि उनका सृजन ब्रह्मा के चरणों से हुआ था । इस प्रकार कहा जा सकता है कि अलबरूनी का जाति व्यवस्था का विवरण उसके संस्कृत ग्रंथों के गहन अध्ययन से प्रभावित था । इसीलिए उसने ब्राह्मणवादी नियमों का प्रतिपादन किया ।


Q. 160694 सांची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूपों की विशेषता बताइये ।
Right Answer is:

SOLUTION

सांची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूप बिना अलंकरण के हैं सिवाए इसके कि उनमें पत्थर की वेदिकाएँ और तोरणद्वार हैं। ये पत्थर की वेदिकाएँ किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वार पर खूब नक्काशी की गई थी। उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाईं तरफ रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों। बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी।


Q. 160695 आप चैत्य से क्या समझते हैं?
Right Answer is:

SOLUTION

बहुत प्राचीन काल से ही लोग कुछ जगहों को पवित्र मानते थे।अक्सर जहाँ खास वनस्पति होती थी, अनूठी चट्टाने थीं या विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य था, वहाँ पवित्र स्थल बन जाते थे। ऐसे कुछ स्थलों पर एक छोटी-सी वेदी भी बनी रहती थीं जिन्हें कभी-कभी चैत्य कहा जाता था।


Q. 160696 बौद्ध धर्म में स्तूपों का क्या महत्व है?
Right Answer is:

SOLUTION

टीलों पर निर्मित स्तूपों का बौद्ध धर्म में बहुत महत्व है, क्योंकि इन जगहों पर बुद्ध से जुड़े कुछ पवित्र अवशेष जैसे उनकी अस्थियाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए गए थे। इन टीलों को स्तूप कहते थे।ये स्तूप महत्वपूर्ण तीर्थस्थल माने जाते हैं।


Q. 160697 साँची स्तूप
Right Answer is:

SOLUTION

साँची का स्तूप, मध्य प्रदेश में विदिशा के पास स्थित हैं। शुंग काल में इस स्तूप के आकार में वृद्धि की गई तथा कई नवीन निर्माण किये गये। अशोक के समय में यह स्तूप ईंटों का बनवाया गया था। शुंग काल में उस पर पाषाण की शिलाओं का आवरण लगाया गया।


Q. 160698 टिप्पणी लिखिए। भरहुप स्तूप-
Right Answer is:

SOLUTION

भरहुत, मध्य भारत में मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित एक स्थान है, यह, बौद्ध स्तूप के अपने प्रसिद्ध अवशेषों के लिए जाना जाता है, भरहुत मूर्तियां, भारतीय और बौद्ध कला के कुछ प्राचीनतम उदाहरणों का प्रतिनिधित्व करती हैं !


Q. 160699 टिप्पणी लिखिए। बाघ की गुफाऐं-
Right Answer is:

SOLUTION

बाघ पहाड़ी मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित है, इसमें नौ गुफायें प्राप्त होती हैं। इनमें कुछ गुप्तकालीन हैं। बाघ की गुफायें बौद्ध धर्म से सम्बन्धित हैं। ये सभी भिक्षुओं के निवास के लिये बनायी गयी थीं।


Q. 160700 ऐसे दो स्थानों का उल्लेख कीजिए, जहाँ स्तूप बनाए गये थे।
Right Answer is:

SOLUTION

1. साँची 2. भरहुत 3. वैशाली


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