A.
1500
ईसा पूर्व
B. 500 ईसा पूर्व
C. 1500 ईसा पूर्व
D. 1000 ईसा पूर्व
ऋग्वेद कई देवताओं, खासकर अग्नि, की स्तुति का संग्रह करते थे| यज्ञों के समय कई स्रोतों का उच्चारण किया जाता था, जब लोग मवेशी, पुत्र, स्वास्थ्य, लम्बी आयु इत्यादि के लिए प्रार्थना करते थे| लगभग 1000 ईसा पूर्व तक, यज्ञ, सामूहिक रूप में, किये जाते थे|
A.
जॉन
मार्शल
B. एच. एच. कोल
C.
सुल्तान जेहान बेगम
D. शाहजहाँ बेगम
शाहजहाँ बेगम, और उनके उतराधिकारी, सुल्तान जेहान बेगम, दोनों ने साँची के पराचीने स्थल की सुरक्षा हेतु धन का अनुदान किया|
A.
किरियमन
B.
कर्म
C. प्रभ्ध
D. संचिता
कर्म का अर्थ है ‘काम’ या ‘कार्य’, या बड़े पैमाने पर, कारण का सार्वभौमिक सिद्धांत|
A.
मक्काली गोसल
B.
सिद्धार्थ
C.
महावीर
D.
अजित केस्कम्ब्लिन
6वी शताब्दी ईसा पूर्व में, महावीर से पूर्व, जैन धर्म का मूल सिद्धांत, उत्तरी भारत में, मौजूद था| जैन परंपरा के अनुसार, उनसे पहले, 23 तीर्थंकर आये थे – वे जो दूसरों को जीवन की नदी के पार पहुंचाते थे|
A.
ब्राह्मणवाद
B.
भाग्वात्वाद
C.
शैववाद
D.
वैष्णवाद
शैव धर्म में, भगवन शिव को एक लिंग के रूप में प्रतीत किया गया था| कभी-कभी, उन्हें मानवीय रूप में भी दिखाया गया|
A.
तिब्बत
B.
चीन
C.
कोरिया
D.
जापान
बौद्ध धर्म का पूर्वी एशिया में प्रचार के बाद, तीर्थयात्री, बौद्ध ग्रन्थ की खोज में, चीन से आये| इन्हें फिर चीन ले जाया गया, जहाँ इनका अनुवाद विद्वान द्वारा किये गए|
A. वाराणसी
B. कुसीनगर
C. सारनाथ
D. लुम्बीनी
बौद्ध धर्म के इतिहास में यह शिक्षा ‘धर्म चक्र परिवर्तन’ कहलाती है। इस महान शिक्षा के पश्चात, बुद्ध पहली बार अपने शिष्य बनाने में सफल हुए।
A.
सुट्टा पिताका
B. जताका
C. ब्रह्माणा
D. विनाया पिताका
यह पुस्तक हमें बताती है कि सभी मर्द संघ में शामिल हो सकते हैं। यहाँ तक की बच्चे अपने माता पिता की आज्ञा लेकर तथा गुलाम अपने आकाओं की आज्ञा से संघ से जुड़ सकते हैं।
A. सिद्धार्थ
B. महावीर
C. अजातसत्तु
D. बिम्बीसारा
सिद्धार्थ, गौतम के नाम से भी जाने जाते हैं, बौर्द्ध धर्म के संस्थापक थे तथा उनका जन्म लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ था।
A. जैन धर्म
B. हिन्दु धर्म
C. बौर्द्ध धर्म
D. सिख धर्म
बौद्ध संघ के लिए जो नियम बनाए गए थे वह एक पुस्तक में लिखे गए थे। विनय पिताका, त्रिपिताका का एक भाग है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पालन किए जाने वाले नियम तथा विनियम लिखे हुए हैं। वर्तमान में पाठ के केवल 6 संस्करण उपलब्ध हैं।
A. जैन
B. बौद्ध
C. हिन्दु
D. मुस्लिम
जैनी बहुत ही सरल जीवन व्यतीत करते हैं। वह जैन तिर्थांकरों द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का अनुसरण करते थे।
A. हिंसा
B. केवला
C. अहिंसा
D. धम्मा
महावीर के अहिंसा पद का अर्थ यह है कि किसी भी जीवित को चोट न पहुंचाई जाए ना ही किसी जीव की हत्या की जाए। महावीर ने अहिंसा की अवधारणा में एक और विशेषता जोड दी थी। जिसे अनेकान्तवाद कहा जाता था। इससे उनका तात्पर्य था कि सत्य के अनेक पहलू होते हैं।
A. आश्रम
B. शाही परिवार
C. क्षत्रीय परिवार
D. संघ
यह बौद्ध संघ के सदस्य थे। यह अत्यधिक समय चिन्तन करते थे तथा भोजन के लिए गांव तथा शहरों में भीख मांगने जाते थे। वह दूसरों को शिक्षित करते थे तथा एक दूसरे की मदद करते थे।
A.
पदक्रम
B.
नीची जाति
C.
बहिष्कृत
D.
अपवित्रता
अल-बिरूनी के अनुसार, हर अपवित्र वस्तु, अपनी पवित्राता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का सफतोपुर्वक प्रयास करती है| सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है।
A. देवताओं
B. कुदरत
C. पुरोहित
D. धर्मों
अल-बिरूनी ने, जाति व्यवस्था में, अपवित्रता के विचार को मान्यता नहीं दी| उसके अनुसार, हर वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्राता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है।
A. रिहला
B. किताब-अल-हिन्द
C. तुजुक-ई-बाबरी
D. ऐन-ई-अकबरी
इब्न बत्तुता का यात्रा वृतांत का अभिलेख एक पुस्तक के रूप में किया गया है, जिसका नाम है रिहला|
A. हेरात
B. ख्वारिज़्म
C. समरकंद
D. बल्ख
अल-बिरूनी का जन्म, 973 ईस्वी में, ख्वारिज़्म शहर में हुआ, जो शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था|
A. दूरते बारबोसा
B. अंतोनियो मानसेरेते
C. इब्न बत्तुता
D. शेख अली हाज़िन
इब्न बत्तुता, जो उत्तर-पश्चिम अफ्रीका में स्तिथ मोरक्को से था, दूर-दूर की जगहों तक जाना पसंद करता था| वह यात्राओं से अर्जित अनुभव को ज्ञान का अध्कि महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था।
A. पीटर मुंडी
B. मार्को पोलो
C. फ्रांस्वा बर्नीयर
D. अंतोनियो मानसेरेते
मार्को पोलो, जो इटली में वेनिस से आया था, ने 13वी शताब्दी में भारत और चीन की यात्रा की|
A. लुई 14वां
B. दानिशमंद खान
C. शाह जहान
D. दारा शिकोह
फ्रांस्वा बर्नीयर, नजदीकी रूप से, मुग़ल साम्राज्य से जुड़े थे| वह मुग़ल बादशाह शाह जहाँ के ज्येष्ठ पुत्र, दारा शिकोह के चिकित्सक थे| बाद में, वह दानिशमंद खान के यहाँ, जो मुग़ल दरबार में एक अर्मेनियाई अमिर थे, एक बुधजिवी व वैज्ञानिक के रूप में, सेवा की|
A.
ज्यौं-बैप्टिस्ट तैवर्नियर
B. फ्रांस्वा बर्नीयर
C. दूरते बारबोसा
D. रोबर्टो नोबिली
फ्रांस्वा बर्नीयर, एक फ्रांसीसी यात्री, अवसर पाने हेतु, भारत आया| वह 12 साल तक (1656-68 ईस्वी) भारत में रहा|
A. दूरते बारबोसा
B. फ्रांस्वा बर्नीयर
C.
इब्न बत्तुता
D. पेलसर्ट
भारत में आने वाले सभी यूरोपीय यात्री व लेखक, अक्सर महिलाओं के प्रति बर्ताव के द्वारा, पूर्वी व पश्चिमी समाजों के बीच महत्वपूर्ण भिन्नताओं के संकेत देते थे| उनमें से एक, फ्रांस्वा बर्नीयर, ने सती प्रथा का विस्तृत विवरण किया| उसके अनुसार, कुछ औरतों ने प्रसन्नतापूर्वक मृत्यु को गले लगाया, पर अन्य को मरने पर मजबूर किया गया|
A. आम का पेड़
B. नीम का पेड़
C. पान का पेड़
D. नारियल का पेड़
इब्न बत्तुता के अनुसार, पान के पेड़ को अंगूर-लता की तरह उगाया जाता था| परंतु, इससे कोई फल नहीं उगता था, और इसे सिर्फ अपने पत्तों हेतु उगाया जाता था|
A. शुद्र
B. अंत्यज
C.
वैश्य
D. ब्राह्मण
मध्यकालीन भारत में, जिन्हें अंत्यज (व्यवस्था से परे) से यह उम्मीद थी कि वे किसानों और ज़मींदारों को सस्ता क्ष्रम प्रदान करें| हालाँकि ये अक्सर सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होते थे, फिर भी इन्हें आवश्याक तंत्रा में शामिल किया जाता था।
A.
भूमि का कर
B.
फसल का कर
C. किराया
D. कृषि कर
सोलहवीं शताब्दी में अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबलु फज़्ल भूिम राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है, जो शासक द्वारा अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के बदले की गई माँग थी, न कि अपने स्वामित्व वाली भूमि पर लगान था। संभवतः यूरोपीय यात्राी ऐसी माँगों को लगान मानते थे क्योंकि भूमि राजस्व की माँग अकसर बहुत अधिक होती थी। लेकिन असल में यह न तो लगान, न ही भूमिकर था, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।
A.
त्रवेल्लेर्स इंडिया – ऍन एंथ्रोपोलॉजी
B.
ट्रेवल्स इन द मुग़ल एम्पायर
C.
ट्रेवल्स इन इंडिया
D.
इंडिया बिफोर यूरोप
ज्यौं-बैप्टिस्ट तैवर्नियर भारत की यात्रा करने वाले सबसे प्रसिद्ध यात्रीयों में से एक था| उसने कम-से-कम छह बार भारत की यात्रा की| वह खासकर भारत में व्यापारिक स्तिथि से प्रभावित था, जिसकी तुलना उसने ईरान व ओटोमन साम्राज्य के साथ की| उसने ‘ट्रेवल्स इन इंडिया’ किताब लिखा|
A.
1332 ईस्वी
B.
1333 ईस्वी
C.
1334 ईस्वी
D.
1335 ईस्वी
इब्न बतुता, 14वि शताब्दी में, भारत आए| उन्होंने, अरबी में, रिहला नामक एक यात्रा वृतांत लिखा| भारत की ओर आते हुए, वे 1333 ईस्वी में, सिंध क्षेत्र पहुंचे|
A.
अंग्रेज़ी
B.
जर्मन
C.
डच
D.
फ्रांसीसी
बर्नियर की किताब ‘ट्रेवल्स इन द मुग़ल एम्पायर’, 1670-71 ईस्वी में, फ्रांस में प्रकाशित की गई| अगले पांच वर्षों में, इसका अनुवाद अग्रेज़ी, जर्मन व इतावली भाषाओँ में किया गया|
इब्न बतूता, मोरक्को, अफ्रीका से एक चौदहवीं सदी का यात्री था
'किताब अल हिंद', अलबेरूनी की एक महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध रचना थी।
इब्नबतूता द्वारा जिन दो चीजों का उल्लेख किया गया था वे पान और नारियल थे।इब्न बतूता की चित्रण की विधियों के कुछ बेहतरीन उदाहरण उन तरीकों में मिलते हैं जिनसे वह नारियल और पान, दो ऐसी वानस्पतिक उपज जिनसे उसके पाठक पूरी तरह से अपरिचित थे, का वर्णन करता है।
इब्नबतूता के अनुसार भारत में दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी।
1.अश्व डाक व्यवस्था जिसे उलुक कहा जाता था, हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों द्वारा चालित होती थी।
2.पैदल डाक व्यवस्था के प्रति मील तीन अवस्थान होते थे, इसे दावा कहा जाता था।
इब्न बतूता ने नारियल के वृक्ष को सबसे अनोखे तथा प्रकृति में सबसे विस्मयकारी वृक्षों में से एक बताया है। उसके अनुसार ये हू-बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं। इनमें कोई अंतर नहीं है सिवाय एक अपवाद के - एक से काष्ठफल प्राप्त होता है और दूसरे से खजूर।
नारियल के वृक्ष का फल मानव सिर से मेल खाता है क्योंकि इसमें भी मानो दो आँखें तथा एक मुख है और अंदर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा दिखता है।
A. मुस्लिम रहस्यवादी
B. हिन्दू रहस्यवादी
C. योगी
D. नाथपंति
सूफियों ने धर्म के बाहरी आडंबरों को अस्वीकार करते हुए ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति तथा सभी मनुष्यों के प्रति दयाभाव रखने पर बल दिया था।
ज्यादातर सूफी वंश उन्हें स्थापित करने वालों के नाम पर पड़े। उदाहरणतः, कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर पड़ा। कुछ अन्य सिलसिलों का नामकरण उनके जन्मस्थान पर हुआ जैसे चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर से लिया गया।
सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है जंजीर जो शेख और मुरीद के बीच एक निरंतर रिश्ते की द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है बारहवीं शताब्दी के आसपास इस्लामी दुनिया में सूफी सिलसिलों का गठन होने लगा।
दरगाह एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ दरबार होता है। पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह उसके मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी। इस तरह पीर की दरगाह पर शियारत के लिए जाने की, खासतौर से उनकी बरसी के अवसर पर, परिपाटी चल निकली।
ग्यारहवीं शताब्दी तक आते-आते सूफीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था जिसका सूफी और कुरान से जुड़ा अपना साहित्य था। संस्थागत दृष्टि से सूफी अपने को एक संगठित समुदाय-ख़ानकाह (फारसी)के इर्द-गिर्द स्थापित करते थे। ख़ानकाह का नियंत्रण शेख (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फारसी) के हाथ में था। वे अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (खलीफा)की नियुक्ति करते थे। आध्यात्मिक व्यवहार के नियम निर्धारित करने के अलावा ख़ानकाह में रहने वालों के बीच के संबंध और शेख व जनसामान्य के बीच के रिश्तों की सीमा भी नियत करते थे।
सूफी संतों की दरगाह पर की गई ज़ियारत सारे इस्लामी संसार में प्रचलित है। इस अवसर पर संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद यानी बरकत की कामना की जाती है। पिछले सात सौ सालों से अलग-अलग संप्रदायों, वर्गों और समुदायों के लोग पाँच महान चिश्ती संतों की दरगाह पर अपनी आस्था प्रकट करते रहे हैं।
सूफीवाद का प्रभाव
सूफी सम्प्रदाय मत प्रेम का, सौन्दर्य का और संगीत का सम्प्रदाय था। बुद्धि की अपेक्षा भावना पर अधिक आश्रित था, इसलिए इसका प्रभाव समाज पर व्यापक रूप से पड़ा। इस्लाम धर्मावलम्बियों ने ही इसे नहीं अपनाया बल्कि सभी धर्मों के मानने वाले व्यक्तियों ने इसे स्वीकार किया। सूफी मत के संक्षेप में निम्नलिखित प्रभाव हुए -
(1) धार्मिक एकता - सूफी सम्प्रदाय अपने आप में ही कई विचारधाराओं और मतों पर आश्रित था, अतः इसके मूल में एकता की भावना थी। जिसने समाज में धार्मिक एकता की भावना को पैदा किया।
(2) प्रेम का प्रसार - सूफी संत प्रेममार्गी सन्त थे, इसलिए समाज से द्वेष घृणा तथा वैमनस्य की भावना को दूर करने में वे सफल रहे। सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत नामक प्रेमकाव्य लिखा।
(3) साहित्य पर प्रभाव - भारतवर्ष में सूफी मत ने ऐसे महत्वपूर्ण काव्य को जन्म दिया जिससे भारत की वैविध्यपूर्ण साहित्य की विरासत और अधिक समृद्ध हुई।
(4) समाज सेवा की भावना को बल - सूफियों ने ईश्वर को प्राप्त करने के लिए जो मार्ग निर्धारित किया, उसमें समाज सेवा का महत्वपूर्ण स्थान था। इसलिए समाज में गरीबों और दुःखियों की सेवा की भावना जाग्रत हुई।
(5) अहंकार के स्थान पर विनम्रता -सूफियों के विश्वास के अनुसार मनुष्य ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं कर सकता। इस प्रकार मनुष्य को अहंकार करने का अवसर सूफी मत में कहीं भी नहीं है। इसका परिणाम यह हुआ कि समाज में अहंकार की भावना का स्थान विनम्रता ने ले लिया।
नयनार एवं अलवार
1. कन्नपा नयनार 2. कराइक्काल अम्मइयार 3. अंडाल।
1)चिश्ती संप्रदाय की एक और विशेषता संयम और सादगी का जीवन था जिसमें सत्ता से दूर रहने पर बल दिया जाता था। किंतु सत्ताधारी विशिष्ट वर्ग अगर बिना माँगे अनुदान या भेंट देता था तो सूफी संत उसे स्वीकार करते थे।
2)सुल्तानों ने ख़ानकाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि अनुदान में दी और दान संबंधी न्यास स्थापित किए।
3) इन वजहों से शासक भी उनका समर्थन हासिल करना चाहते थे। शासक न केवल सूफी संतों से संपर्क रखना चाहते थे अपितु उनके समर्थन के भी कायल थे। जब तुर्कों ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की तो उलेमा द्वारा शरिया लागू किए जाने की माँग को ठुकरा दिया। सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा इस्लाम धर्म मानने वाली नहीं है।
ग्यारहवीं शताब्दी तक आते-आते सूफीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था जिसका सूफी और कुरान से जुड़ा अपना साहित्य था। संस्थागत दृष्टि से सूफी अपने को एक संगठित समुदाय-ख़ानकाह (फारसी)के इर्द-गिर्द स्थापित करते थे। ख़ानकाह का नियंत्रण शेख (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फारसी) के हाथ में था। वे अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (खलीफा)की नियुक्ति करते थे। आध्यात्मिक व्यवहार के नियम निर्धारित करने के अलावा ख़ानकाह में रहने वालों के बीच के संबंध और शेख व जनसामान्य के बीच के रिश्तों की सीमा भी नियत करते थे।
बारहवीं शताब्दी के आसपास इस्लामी दुनिया में सूफी सिलसिलों का गठन होने लगा। सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है जंजीर जो शेख और मुरीद के बीच एक निरंतर रिश्ते की द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है। इस कड़ी के द्वारा आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद मुरीदों तक पहुँचता था। दीक्षा के विशिष्ट अनुष्ठान विकसित किए गए जिसमें दीक्षित को निष्ठा का वचन देना होता था, और सिर मुँड़ाकर थेगड़ी लगे वस्त्र धारण करने पड़ते थे। पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह (फारसी में इसका अर्थ दरबार) उसके मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी। इस तरह पीर की दरगाह पर शियारत के लिए जाने की, खासतौर से उनकी बरसी के अवसर पर, परिपाटी चल निकली। इस परिपाटी को उर्स (विवाह, मायने पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन) कहा जाता था क्योंकि लोगों का मानना था कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत हो जाते हैं और इस तरह पहले के बजाय उनके अधिक करीब हो जाते हैं। लोग आध्यात्मिक और ऐहिक कामनाओं की पूर्ति के लिए उनका आशीर्वाद लेने जाते थे। इस तरह शेख का व ली के रूप में आदर करने की परिपाटी शुरू हुई।
कुछ रहस्यवादियों ने सूफी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नवीन आंदोलनों की नींव रखी। ख़ानकाह का तिरस्कार करके यह रहस्यवादी,फकीर की ज़िदगी बिताते थे। निर्धनता और ब्रह्मचर्य को उन्होंने गौरव प्रदान किया। इन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता था- कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी इत्यादि। शरिया की अवहेलना करने के कारण उन्हें बे-शरिया कहा जाता था। इस तरह उन्हें शरिया का पालन करने वाले (बा-शरिया) सूफियों से अलग करके देखा जाता था।
बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आने वाले सूफी समुदायों में चिश्ती सबसे अधिक प्रभावशाली रहे। इसका कारण यह था कि उन्होंने न केवल अपने आपको स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला अपितु भारतीय भक्ति परंपरा की कई विशिष्टताओं को भी अपनाया। ख़ानक़ाह सामाजिक जीवन का केंद्र बिन्दु था। हमें शेख निशामुद्दीन औलिया (चौदहवीं शताब्दी) की ख़ानक़ाह के बारे में पता है जो उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर यमुना नदी के किनारे गि़यासपुर में था। यहाँ कई छोटे-छोटे कमरे और एक बड़ा हॉल (जमातख़ाना) था जहाँ सहवासी और अतिथि रहते, और उपासना करते थे। सहवासियों में शेख का अपना परिवार, सेवक और अनुयायी थे।शेख एक छोटे कमरे में छत पर रहते थे जहाँ वह मेहमानों से सुबह-शाम मिला करते थे। आँगन एक गलियारे से घिरा होता था और ख़ानक़ाह को चारों ओर से दीवार घेरे रहती थी। एक बार मंगोल आक्रमण के समय पड़ोसी क्षेत्र के लोगों ने ख़ानक़ाह में शरण ली। (बिना माँगी खैर) पर यहाँ एक सामुदायिक रसोई (लंगर) फुतूह चलती थी। सुबह से देर रात तक सब तबके के लोग-सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिन्दू जोगी और कलंदर यहाँ अनुयायी बनने, इबादत करने, ताबीज लेने अथवा विभिन्न मसलों पर शेख की मध्यस्थता के लिए आते थे। कुछ अन्य मिलने वालों में अमीर हसन सिजज़ी और अमीर खुसरो जैसे कवि तथा दरबारी इतिहासकार शियाउद्दीन बरनी जैसे लोग शामिल थे। इन सभी लोगों ने शेख के बारे में लिखा। शेख के सामने झुकना, मिलने वालों को पानी पिलाना, दीक्षितों वेफ सर का मुंडन तथा यौगिक व्यायाम आदि व्यवहार इस तथ्य के घोतक हैं कि स्थानीय परंपराओं को आत्मसात करने का प्रयत्न किया गया।
1- वीर शैव परंपरा
बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक आंदोलन उद्भव हुआ जिसका नेतृत्व बासवन्ना(1106-68) नामक एक ब्राह्मण ने किया! बासवन्ना प्रारम्भ में जैन मत को मानने वाले थे और चालुक्य राजा के दरबार में मंत्री थे। इनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर ) व् लिंगायत (लिंग धारण करने वाले ) कहलाए ।
2. कबीर
जीवन - महात्मा कबीर का जन्म सम्वत् 1456 विक्रमी (1399 ई.) में हुआ था। कहते हैं कि किसी विधवा ब्राह्मणी को स्वामी रामानन्द ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था। पुत्र होने पर वह लोक लजजा से बचने के लिये उसे लहरतारा नामक तालाब के पास छोड़ गई। नीरू जुलाहा और उसकी पत्नी ने इस शिशु का पालन पोषण किया। यही बालक कबीर थे। बड़े होने पर कबीर ने रामानन्द जी को अपना गुरू मान लिया। उनका विवाह लोई नामक स्त्री से हुआ था। जिससे कमाल नामक पुत्र तथा कमाली नामक कन्या हुई। कबीर कपड़ा बुनते थे, साधु संगति करते थे, अतः उन्होने बहुत ज्ञात प्राप्त कर लिया था। 120 वर्ष की लम्बी आयु पाकर वे मगहर में मरे।
3-खानकाह - सभी सूफी, नगर के निकट खानकाह (आश्रम) बनाकर रहते थे। साधारणतः वे उन स्थानों पर खानकाह बनाते थे, जहाँ निर्धन, पद-दलित, हिन्दू निम्न जातियों के समूह रहते थे और जिन्हें सहानुभूति की ज्यादा आवशयकता थी। ये खानकाह, घास, फूस और मिटटी के बने होते थे और उनमें एक या दो कमरे सूफी संत और उसके परिवार के लिए होते थे। एक बड़ा हॉल या जमैयत खाना होता था, जहाँ उनके शिष्य, अतिथि आदि एकत्रित होकर धार्मिक कार्य करते थे। खानकाह प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक समय उपलब्ध थे ।
1)ख़ानक़ाह सामाजिक जीवन का केंद्र बिन्दु था।
2)यहाँ कई छोटे-छोटे कमरे और एक बड़ा हॉल(जमातख़ाना) था जहाँ सहवासी और अतिथि रहते, और उपासना करते थे।
3)यहाँ एक सामुदायिक रसोई (लंगर)फुतूह चलती थी।
4)सुबह से देर रात तक सब तबके के लोग विभिन्न मसलों पर शेख की मध्यस्थता के लिए आते थे।
5)कुछ अन्य मिलने वालों में अमीर हसन सिजज़ी और अमीर खुसरो जैसे कवि तथा दरबारी इतिहासकार जीयाउद्दीन बरनी जैसे लोग शामिल थे। इन सभी लोगों ने शेख के बारे में लिखा।
इब्नबतूता की यात्रा-
मोरक्को के इस यात्री का जन्म तैंजियर के सबसे सम्मानित तथा शिक्षित परिवारों में से एक, जो इस्लामी कानून अथवा शरिया पर अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था, में हुआ था। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार इब्न बतूता ने कम उम्र में ही साहित्यिक तथा शास्त्रारूढ़ शिक्षा हासिल की। अपनी श्रेणी के अन्य सदस्यों के विपरीत, इब्न बतूता पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से अर्जित अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्त्रोत मानता था। उसे यात्राएँ करने का बहुत शौक था और वह नए-नए देशों और लोगों के विषय में जानने के लिए दूर-दूर के क्षेत्रों तक गया। 1332-33 में भारत के लिए प्रस्थान करने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाहों की यात्राएँ कर चुका था।
इब्नबतूता की भारत यात्रा-
मध्य एशिया के रास्ते होकर इब्न बतूता सन् 1333 में स्थलमार्ग से सिंध् पहुँचा। उसने दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में सुना था और कला और साहित्य के एक दयाशील संरक्षक के रूप में उसकी ख्याति से आकर्षित हो बतूता ने मुल्तान और उच्छ के रास्ते होकर
दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। सुल्तान उसकी विद्वता से प्रभावित हुआ और उसे दिल्ली का काशी या न्यायाधीश नियुक्त किया। वह इस पद पर कई वर्षों तक रहा, पर फिर उसने विश्वास खो दिया और उसे कारागार में कैद कर दिया गया। बाद में सुल्तान और उसके बीच की गलतफहमी दूर होने के बाद उसे राजकीय सेवा में पुनर्स्थापित किया गया और 1342 ई. में मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया। अपनी नयी नियुक्ति के साथ इब्नबतूता मध्य भारत के रास्ते मालाबार तट की ओर बढ़ा। मालाबार से वह मालद्वीप गया जहाँ वह अठारह महीनों तक काशी के पद पर रहा पर अंततः उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया। बाद में एक बार फिर वह मालाबार तट तथा मालद्वीप गया और चीन जाने के अपने कार्य को दोबारा शुरू करने से पहले वह बंगाल तथा असम भी गया। वह जहाज से सुमात्रा गया और सुमात्रा से एक अन्य जहाज से चीनी बंदरगाह नगर जायतुन (जो आज क्वानझू के नाम से जाना जाता है) गया। उसने व्यापक रूप से चीन में यात्रा की और वह बीजिंग तक गया, लेकिन वहाँ लंबे समय तक नहीं ठहरा। 1347 में उसने वापस अपने घर जाने का निश्चय किया। चीन के विषय में उसके वृत्तांत की तुलना मार्को पोलो, जिसने तेरहवीं शताब्दी वेफ अंत में वेनिस से चलकर चीन (और भारत की भी) की यात्रा की थी, के वृत्तांत से की जाती है। इब्न बतूता ने नवीन संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं, मान्यताओं आदि के विषय में अपने अभिमत को सावधनी तथा कुशलतापूर्वक दर्ज किया। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि यह विश्व-यात्री चौदहवीं शताब्दी में यात्राएँ कर रहा था, जब आज की तुलना में यात्रा करना अधिक कठिन तथा जोखिम भरा कार्य था। इब्न बतूता के अनुसार उसे मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में चालीस और सिंध् से दिल्ली की यात्रा में लगभग पचास दिन का समय लगा था। दौलताबाद से दिल्ली की दूरी चालीस, जबकि ग्वालियर से दिल्ली की दूरी दस दिन में तय की जा सकती थी।
रेहला-
इब्न बतूता द्वारा अरबी भाषा में लिखा गया उसका यात्रा वृत्तांत जिसे रेहला कहा जाता है, चौदहवीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के विषय में बहुत ही प्रचुर तथा रोचक जानकारियाँ देता है। इब्नबतूता ने नवीन संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं, मान्यताओं आदि के विषय में अपने अभिमत को सावधानी तथा कुशलतापूर्वक दर्ज किया है। इनमें अपनी धर्मनिष्ठता के लिए प्रसिद्ध लोगों की, ऐसे राजाओं जो निर्दयी तथा दयावान दोनों हो सकते थे की, तथा समान्य पुरुषों और महिलाओं तथा उनके जीवन की कहानियाँ सम्मिलित थीं, जो भी कुछ अपरिचित था उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता था। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता था कि श्रोता अथवा पाठक सुदूर पर सुगम्य देशों के वृत्तांतों से पूरी तरह प्रभावित हो सकें।
A.
लाल शाहबाज़ कलंदर
B.
लाल देद
C.
शराफुद्दीन याहया मनेरी
D.
अब्दुल्ला सत्तारी
14वी शताब्दी के दौरान, लाल देद कश्मीर में एक जाने-माने धार्मिक प्रचारक थे|
A.
आमिर हसन सिजज़ी देहलवी
B.
मीर खुर्द किरमानी
C.
नक्शबंदी शेख अहमद सिर्हिंदी
D.
हसन सिजज़ी देहलवी
‘सियार-उल-औलिया’, जिसे 14वी शताब्दी में लिखा गया था, भारत की सबसे पहली सूफी तज़किरा है|
A. सूरदास
B. श्री चैतन्य
C. वल्लभाचार्य
D. शंकरदेव
वल्लभाचार्य, 15वी शताब्दी के दौरान, गुजरात के सबसे लोकप्रिय धार्मिक प्रचारकों में से एक थे|
A. अरबी
B. अंग्रेज़ी
C. ईरानी
D. उर्दू
‘सूफीवाद’ शब्द 19वी सदी में मुद्रित एक अंग्रेज़ी शब्द है| इस्लामी ग्रंथों में इसके लिए शब्द ‘तसव्वुफ़’ है| कुछ विद्वान मानते हैं कि यह ‘सूफ’ शब्द, जिसका अर्थ ऊन है, से लिया गया है| यह सूफियों द्वारा पहने गए खुदरा ऊनी कपडे की ओर इशारा करता है|
A. ब्राह्मण धर्म
B. भगवती धर्म
C. शैव धर्म
D. वैष्णव धर्म
शंकरदेव के उपदेश को भगवती धर्म कहा जाता है, क्योंकि ये भगवद गीता और भगवद पूरण पर आधारित थे| वे सर्वोच्च देवता – भगवान विष्णु – के प्रति पूर्ण समर्पण भाव पर केंद्रित थे| शंकरदेव, जो असम में लोकप्रिय थे, के प्रमुख काव्य-रचनाओं में कीर्तनघोष भी है|
A. सुहरावर्दी
B. चिश्ती
C. नक्शबंदी
D. कलंदर
कुछ सूफियों ने, सूफी सिद्धांत के मौलिक व्यवस्था के आधार पर, नए आन्दोलन शुरू किए| कई रहस्यवादियों ने फ़क़ीर की ज़िन्दगी बिताई| इन्हें कई विभिन्न नाम से जाने जाते थे – कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी इत्यादि| क्योंकि ये शरिया का अवहेलना करते थे, इन्हें बे-शरिया कहा जाता था|
A. शेख अब्दुल कादिर जिलानी
B. शेख अहमद सिर्हिंदी
C. शेख नसीरुद्दीन चिराघ-ए-देहली
D. दरगाह कुली खान
दरगाह कुली खान, 18वी सदी में, दक्कन से दिल्ली आए| उन्होंने मुरक्का-ए-देहली (दिल्ली की अलबम) में शेख नसीरुद्दीन चिराघ-ए-देहली के दरगाह के बारे में लिखा|
A. अप्पार
B. अंडाल
C. रामानुजाचार्य
D. तोंद्राडिप्पोडि
अलवार और नयनार संतों ने जाती प्रणाली तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध आवाज़ उठाई, या कम से कम प्रणाली में सुधार लाने का प्रयत्न किया| वे विविध समुदायों से थे; जैसे ब्राह्मण, कारीगर, किसान, यहाँ तक की ‘अस्पृश्य’ जातियों से| तोंद्राडिप्पोडि, एक अलवार संत, ब्राह्मण थे|
A.
जुलाहा
B. सतगुरु
C. संगत
D. रबाब
बाबा गुरु नानक ने, सामूहिक पूजा हेतु, नियम बनाए, जिन्हें संगत कहे जाने लगे| इसमें, सामुदायिक उपासना शामिल था|
A. तोंद्राडिप्पोडि
B. अंडाल
C.
मनिक्व्चक्कार
D. शंकरदेव
मनिक्व्चक्कार, भक्तिगीत गाते और रचना करते हुए, अलग-अलग स्थान घूमे| उन्होंने, तमिल भाषा में, कई सुन्दर भातिगीत की रचना की|
A. भगवान कृष्ण
B. भगवान राम
C. भगवान शिव
D. भगवान ब्रह्मा
तमिलनाडु में पैदा हुई कराइक्काल अम्मइय्यार ने, अपना लक्ष्य पाने हेतु, घोर तपस्या का मार्ग अपनाया| उनकी रचनाएँ नयनार परमपरा में संरक्षित किया गया|
A. बाबा गुरु नानक
B. गुरु गोबिंद सिंह
C.
गुरु तेघ बहादुर
D. गुरु अर्जन
गुरु गोबिंद सिंह, जिन्होनें खालसा सेना का आधार बनाया, ने इसके पांच चिन्ह को परिभाषित किया – बिना कटे केश, कृपान, कच्छ, कंघा और लोहे का कड़ा|
A.
वेद
B.
मनुस्मृति
C. महाभारत
D. रामायण
‘नलयिरादिव्यप्रबंधम’ की रचना 10वी शताब्दी के प्रारंभ में की गई थी| इसकी, तमिल वेद के रूप में स्वीकृति, अल्वार व नयनार के, दक्षिण भारतीय समाज पर, प्रभाव को दर्शाती है|
A.
12वी शताब्दी
B.
13वी शताब्दी
C.
14वी शताब्दी
D.
15वी शताब्दी
मीर खुर्द किरमानी द्वारा लिखी गई ‘सियार-उल-औलिया’ भारत में लिखा गया पहला सूफी तजकिरा था|
A.
शराफुद्दीन याहया मनेरी
B.
अब्दुल्ला सत्तारी
C.
मुहम्मद शाह आलम
D.
मीर सयैद मौहम्मद गेसू दराज़
15वी शताब्दी के दौरान, कई सूफी संत भारतीय महाद्वीप में उभर कर आए| इनमे से एक, शरफुद्दीन याहया मनेरी, बिहार में एक प्रसिद्ध सूफी संत थे|
A.
गुरु गोबिंद सिंह
B.
बाबा गुरु नानक
C.
गुरु अर्जन
D.
गुरु अंगद
सिक्खों के दसवे गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी| ‘खालसा’ शब्द का अर्थ है ‘शुद्ध’|
A. बंगाल।
B. तमिलनाडु।
C. कर्नाटक।
D. महाराष्ट्र।
चैतन्यदेव, सोलहवीं शताब्दी के बंगाल के एक भक्ति संत थे। इन्होंने कृष्ण-राधा के प्रति नि: स्वार्थ भक्ति-भाव का उपदेश दिया।
A. विष्णु
B. शिव
C. ब्रह्मा
D. वरुण
अलवार दक्षिण भारत के संत थे। भगवान विष्णु के प्रति समर्पित संन्यासी को अलवार कहा जाता था, भिन्न जाति पृष्ठभूमि से संबंधित 12 अलवार थे।
A. शंकरदेव
B. सूरदास
C. तुलसीदास
D. कालीदास
शंकरदेव ने विष्णु की भक्ति पर बल दिया और असमिया भाषा में कविताएँ तथा नाटक लिखे। उन्होंने ही ‘नामघर’ अथवा कविता पाठ और प्रार्थना गृह स्थापित करने की पद्धति चलाई, जो आज तक चल रही है।
बर्नियर ने अपने विवरण में सती प्रथा का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है। उसने लिखा है कि हालाँकि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं,अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था। आगे उसने बाल सती का उल्लेख किया है जिसमें एक अल्पवयस्क विधवा जिसकी आयु बारह वर्ष से अधिक नहीं थी, की बलि दी गई थी।
बर्नियर से दो अच्छे तुर्कमान घोड़े रखने और अपने साथ एक शक्तिशाली फारसी ऊँट तथा चालक, घोड़ों की देखभाल करने वाला, एक खानसामा तथा एक सेवक जो हाथ में पानी का पात्र लेकर उसके घोड़े के आगे चलता है, रखने की अपेक्षा की गई थी।
बर्नियर ने अपने विवरण में उल्लेख किया है कि कारीगरों को उनके विनिर्माण की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए कोई प्रोत्साहन प्राप्त नहीं था।
व्यापारी अक्सर मजबूत सामुदायिक अथवा बंधुत्व संबंधों से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन कहा जाता था और उनके मुखिया को सेठ।
संभवतः बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है जो राजकीय कारखानों की कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण प्रदान करता है। उसने अनेक स्थान पर उल्लेख किया है कि उसने शिल्पकारों के लिए निर्मित विशाल कारखाने देखें हैं। एक निरीक्षणकर्ता के अधीन कई शिल्पकार जैसे कि कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, रोगन लगाने वाले, बढ़ई, खरादी, दर्जी तथा जूते बनाने वाले, रेशम, जरी तथा महीन मलमल का काम करने वाले अपने-अपने कक्ष में कार्य करते थे। शिल्पकार सुबह से शाम तक कार्य करते थे। अन्य यात्रियों ने सारे समाज अथवा संस्कृति का विवरण प्रस्तुत किया था, लेकिन किसी ने भी इस तरह के शाही उपयोग की एक महत्वपूर्ण वस्तु का उल्लेख नहीं किया है।
बर्नियर ने अपने विवरण में उल्लेख किया है कि कारीगरों को उनके विनिर्माण की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए कोई प्रोत्साहन प्राप्त नहीं था।
व्यापारी अक्सर मजबूत सामुदायिक अथवा बंधुत्व संबंधों से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन कहा जाता था और उनके मुखिया को सेठ।
जाति व्यवस्था के संबंध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानने के बावजूद, अल्बेरूनी ने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार किया।उसने लिखा कि हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है। सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। अल्बेरूनी ज़ोर देकर कहता है कि यदि ऐसा नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता।
अनेक यात्रियों ने भारतीय समाज में विद्यमान दासों के बारे में लिखा था। उदाहरण के लिए, बाजारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप दिए जाते थे। जब इब्नबतूता सिंध् पहुँचा तो उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के लिए भेंटस्वरूप घोड़े, ऊँट तथा दास खरीदे। जब वह मुल्तान पहुँचा तो उसने गवर्नर को किशमिश,बादाम के साथ एक दास और घोड़ा भेंट के रूप में दिए। इब्न बतूता बताता है कि मुहम्मद बिन तुगलक नसीरुद्दीन नामक धर्मोपदेशक के प्रवचन से इतना प्रसन्न हुआ कि उसे एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास दे दिए। इब्न बतूता के विवरण से प्रतीत होता है कि दासों में काफी विभेद था। सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं, और इब्न बतूता सुल्तान की बहन की शादी के अवसर पर उनके प्रदर्शन से खूब आनंदित हुआ। सुल्तान अपने अमीरों पर नजर रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। दासों को सामान्यतः घरेलू श्रम के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था, और इब्न बतूता ने इनकी सेवाओं को, पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में विशेष रूप से अपरिहार्य पाया। दासों की कीमत, विशेष रूप से उन दासियों की, जिनकी आवश्यकता घरेलू श्रम के लिए थी, बहुत कम होती थी।
जब इब्नबतूता सिंध् पहुँचा तो उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के लिए भेंटस्वरूप घोड़े, ऊँट तथा दास खरीदे। जब वह मुल्तान पहुँचा तो उसने गवर्नर को किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा भेंट के रूप में दिए। इब्न बतूता बताता है कि मुहम्मद बिन तुगलक नसीरुद्दीन नामक धर्मोपदेशक के प्रवचन से इतना प्रसन्न हुआ कि उसे एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास दे दिए। इब्न बतूता के विवरण से प्रतीत होता है कि दासों में काफी विभेद था। सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं, और इब्न बतूता सुल्तान की बहन की शादी के अवसर पर उनके प्रदर्शन से खूब आनंदित हुआ। सुल्तान अपने अमीरों पर नजर रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। दासों को सामान्यतः घरेलू श्रम के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था, और इब्न बतूता ने इनकी सेवाओं को, पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में विशेष रूप से अपरिहार्य पाया। दासों की कीमत, विशेष रूप से उन दासियों की, जिनकी आवश्यकता घरेलू श्रम के लिए थी, बहुत कम होती थी।
फ्रांस्वा बर्नीयर अनेक देशों और उनके अनेक भागों की यात्रा करके, देशों की तुलना यूरोपीय स्थिति से करना चाहता था, उसने लगभग प्रत्येक दृष्टांत में भारत की स्थिति की तुलना, यूरोप में हुए विकास की तुलना से करते हुए उसे (भारतीय स्थिति) को दयनीय बताया।निः संदेह यद्यपि उसका मूल्यांकन सदैव पूरी तरह ठीक नहीं था लेकिन इससे उसे ख्याति मिली। उसने भारत में जो कुछ भी देखा, वह उसकी सामान्य रूप से यूरोप और विशेष रूप से फ्रांस में व्याप्त स्थितियों से तुलना तथा भिन्नता को उजागर करने के प्रति अधिक चिंतित था, विशेष रूप से वे स्थितियां जिन्हें उसने अवसादकारी पाया जैसे कि भारत में नीजि भू-स्वामित्व का अभाव !
इब्न बतूता ने भारतीय शहरों को उन लोगों के लिए व्यापक अवसरों से भरपूर पाया जिनके पास आवश्यक इच्छा, साधन तथा कौशल था। ये शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे सिवाय कभी-कभी युद्धों तथा अभियानों से होने वाले विध्वंस के ।उन्होंने दिल्ली और दौलताबाद का वर्णन एवं उनकी तुलना प्रस्तुत की।
बाजार मात्र आर्थिक विनिमय के स्थान ही नहीं थे बल्कि ये सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे। इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत का प्रयोग यह तर्क देने में किया है कि शहर अपनी संपत्ति का एक बड़ा भाग से अधिशेष के अधिग्रहण से प्राप्त करते थे। इब्न बतूता ने पाया कि भारतीय कृषि के इतना अधिक उत्पादनकारी होने का कारण मिट्टी का उपजाऊपन था, जो किसानों के लिए वर्ष में दो फसलें उगाना संभव करता था। भारतीय माल की मध्य तथा दक्षिण-पूर्व एशिया, दोनों में बहुत माँग थी जिससे शिल्पकारों तथा व्यापारियों को भारी मुनाफा होता था। भारतीय कपड़ों, विशेषरूप से सूती कपड़ा, महीन मलमल, रेशम, जरी तथा साटन की अत्यधिक माँग थी। इब्न बतूता हमें बताता है कि महीन मलमल की कई किस्में अत्यधिक मँहगी थीं। इन सब बातों ने काफी हद तक शहरों की समृद्धि में सहायता प्रदान की।
बर्नियर बौद्धिक यूरोपीय परंपरा का एक बुद्धिजीवी था। बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक मुगल भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था जो सामान्य यूरोपीय परिदृश्य से भिन्न एक विशेषता थी। यहां राज्य भूमि का स्वामी था और वह इसका वितरण अभिजात वर्ग में करता था।उसका निजी स्वामित्व के अधिकार में दृढ़ विश्वास था और उसने भूमि पर राजकीय स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक माना इस प्रकार, निजी भूस्वामित्व के अभाव ने ‘‘बेहतर’’ भूधारकों के वर्ग के उदय (जैसा कि पश्चिमी यूरोप में) को रोका जो भूमि के रखरखाव व बेहतरी के प्रति सजग रहते। इसी के चलते कृषि का समान रूप से विनाश, किसानों का असीम उत्पीड़न तथा समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में अनवरत पतन की स्थिति उत्पन्न हुई है, सिवाय शासक वर्ग के ।
इब्नबतूता के अनुसार भारत में दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी।
1.अश्व डाक व्यवस्था जिसे उलुक कहा जाता था, हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों द्वारा चालित होती थी।
2.पैदल डाक व्यवस्था के प्रति मील तीन अवस्थान होते थे, इसे दावा कहा जाता था।हर तीन मील पर घनी आबादी वाला एक गाँव होता था जिसके बाहर तीन मंडप होते थे जिनमें लोग कार्य आरंभ के लिए तैयार बैठे रहते थे। उनमें से प्रत्येक के पास दो हाथ लंबी एक छड़ होती थी जिसके ऊपर ताँबे की घंटियाँ लगी होती थी। जब संदेशवाहक शहर से यात्रा आरंभ करता था तो एक हाथ में पत्र तथा दूसरे में घंटियों सहित छड़ लिए वह क्षमतानुसार तेज भागता था। जब मंडप में बैठे लोग घंटियों की आवाज सुनते थे तो वे तैयार हो जाते थे। जैसे ही संदेशवाहक उनके पास पहुँचता था, उनमें से एक उससे पत्र लेता था और वह छड़ हिलाते हुए पूरी ताकत से दौड़ता था, जब तक वह अगले दावा तक नहीं पहुँच जाता। पत्र के अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचने तक यही प्रक्रिया चलती रहती थी। डाक प्रणाली इतनी कुशल थी कि जहाँ सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे वहीं गुप्तचरों की खबरें सुलतान तक इस डाक व्यवस्था के माध्यम से मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।
फ्रांस का रहने वाला फ्रांस्वा बर्नियर एक चिकित्सक, तथा एक फ्रांसीसी व्यक्ति था। कई और लोगों की तरह ही वह मुगल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया था। वह 1656 से 1668 तक भारत में बारह वर्ष तक रहा और मुगल दरबार से नजदीकी रूप से जुड़ा रहा-पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह का चिकित्सक था।
बर्नियर की यात्रा और यात्रा विवरण: बर्नियर ने देश के कई भागों की यात्रा की और जो देखा उसके विषय में विवरण लिखे। वह सामान्यतः भारत में जो सामाजिक स्थिति देखता था उसकी तुलना यूरोपीय स्थिति से करता था। बर्नियर के कार्य फ्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुए थे, और अगले पाँच वर्षों के भीतर ही अंग्रेजी, डच, जर्मन तथा इतालवी भाषाओं में इनका अनुवाद हो गया। बाद में इसका कईं बार पुनर्मुद्रण किया गया था। उसने अपनी प्रमुख कृति को फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित किया था और उसके कई अन्य कार्य प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों को पत्रों के रूप में लिखे गए थे।
समकालीन शहरी केन्द्रों में जीवन शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्नबतूता का वृत्तांत बहुत सहायक है क्योंकि उसने शहरी केन्द्रों का विस्तृत विवरण दिया है जो उसके सूक्ष्म अवलोकन एवं अध्ययन पर आधारित था। वृत्तांत से निम्न जानकारियाँ प्राप्त होती हैं-1. तत्कालीन नगर घनी आबादी वाले व समृद्ध थे। परंतु कभी-कभी युद्धों वअभियानों के कारण कुछ नगर नष्ट भी हो जाते थे।2. अधिकांश शहरों में बड़े-बड़े बाजार थे जो सामाजिक व आर्थिक गतिविधियों काभी केन्द्र थे। इनमें प्रायः एक मंदिर व मजिस्द होती थी साथ ही नर्तकी, संगीतकारों व गायक के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए स्थान निश्चित थे।3. इब्नबतूता के अनुसार दिल्ली एक बहुत बड़ा शहर था जिसकी आबादी बहुत थी। उसके अनुसार सबसे बड़ा शहर दिल्ली था दौलताबाद भी दिल्ली के बराबर शहर था। 4. दिल्ली के बारे में वर्णन करते हुए उसने बताया कि यह एक घनी आबादी वाला शहर था जिसके चारों और प्राचीर बनी हुई है भीतर रात्रि के पहरेदार व द्वारपालों के कक्ष हैं। अंदर खाद्य सामग्री, हथियार, बारूद, प्रक्षेपास्त्र आदि के भण्डारगृह हैं। शहर में प्रवेश के लिए 28 दरवाजे हैं, जिनमें सबसे बड़ा दरवाजा बदायूँ दरवाजा है। मांडवी दरवाजे के भीतर एक अनाज मण्डी है। तथापि उसकी रूचि शहरी वर्णन में नहीं थी तथापि उसके वृत्तांत इतिहासकारों के लिए सहायक सिद्ध हुए हैं कि शहर अपनी संपति का एक बड़ा भाग गाँवों से अधिशेष के अधिग्रहण से प्राप्त करते हैं।
भारत की डाक व्यवस्था की कार्यकुशलता को देखकर इब्नबूतता बड़ा चकित हुआ। वह लिखता है कि सिंध से दिल्ली की यात्रा में जहाँ 50 पचास दिन लगते थे वहीं गुप्तचरों की सूचनाएँ सुल्तान तक उस डाक व्यवस्था द्वारा मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।वह दो प्रकार की डाक व्यवस्था का उल्लेख करता हैः-1. अश्व डाक व्यवस्था 2. पैदल डाक व्यवस्था;1द्ध अश्व डाक व्यवस्थाः-यह व्यवस्था ‘उलुक’ कहलाती थी। हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों द्वारा संचालित होती थी।;2द्ध पैदल डाक व्यवस्थाः- इस व्यवस्था में प्रति मील तीन चैकियाँ होती थीं जिन्हें ‘दावा’ कहा जाता था। हर एक तिहाई मील पर घनी आबादी वाला गाँव होता था, जिसके बाहर तीन मण्डप होते थे जहाँ लोग कार्य करने के लिए तैयार बैठे रहते थे। प्रत्येक के पास एक घंटी वाली दो हाथ लंबी छड़ी होती थी। जब संदेशवाहक एक शहर से यात्रा शुरू करता था तो वह एक हाथ में पत्र व दूसरे हाथ में घंटी वाली छड़ी लेकर यथाशक्ति तेज भागता था। घंटियों की आवाज से आगे वाले मंडप के लोग तैयार हो जाते थे। जैसे ही सन्देश वाहक उनके निकट पहुँचता था, मण्डप में से एक पत्र वाहक वह पत्र लेकर आगे प्रस्थान करता था। इस प्रकार गंतव्य तक पहुँचने तक यह प्रक्रिया सतत चलती रहती थी। यह पैदल व्यवस्था अश्व डाक व्यवस्था से अधिक तीव्र होती थी।
सांची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूप बिना अलंकरण के हैं सिवाए इसके कि उनमें पत्थर की वेदिकाएँ और तोरणद्वार हैं। ये पत्थर की वेदिकाएँ किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वार पर खूब नक्काशी की गई थी। उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाईं तरफ रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों। बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी।
बहुत प्राचीन काल से ही लोग कुछ जगहों को पवित्र मानते थे।अक्सर जहाँ खास वनस्पति होती थी, अनूठी चट्टाने थीं या विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य था, वहाँ पवित्र स्थल बन जाते थे। ऐसे कुछ स्थलों पर एक छोटी-सी वेदी भी बनी रहती थीं जिन्हें कभी-कभी चैत्य कहा जाता था।
टीलों पर निर्मित स्तूपों का बौद्ध धर्म में बहुत महत्व है, क्योंकि इन जगहों पर बुद्ध से जुड़े कुछ पवित्र अवशेष जैसे उनकी अस्थियाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए गए थे। इन टीलों को स्तूप कहते थे।ये स्तूप महत्वपूर्ण तीर्थस्थल माने जाते हैं।
साँची का स्तूप, मध्य प्रदेश में विदिशा के पास स्थित हैं। शुंग काल में इस स्तूप के आकार में वृद्धि की गई तथा कई नवीन निर्माण किये गये। अशोक के समय में यह स्तूप ईंटों का बनवाया गया था। शुंग काल में उस पर पाषाण की शिलाओं का आवरण लगाया गया।
भरहुत, मध्य भारत में मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित एक स्थान है, यह, बौद्ध स्तूप के अपने प्रसिद्ध अवशेषों के लिए जाना जाता है, भरहुत मूर्तियां, भारतीय और बौद्ध कला के कुछ प्राचीनतम उदाहरणों का प्रतिनिधित्व करती हैं !
बाघ पहाड़ी मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित है, इसमें नौ गुफायें प्राप्त होती हैं। इनमें कुछ गुप्तकालीन हैं। बाघ की गुफायें बौद्ध धर्म से सम्बन्धित हैं। ये सभी भिक्षुओं के निवास के लिये बनायी गयी थीं।