यह वो स्थान होता था जहां पर जीवंत चर्चाओं और विवादों की एक झाँकी मिलती है। शिक्षक एक जगह से दूसरी जगह घूम-घूम कर अपने दर्शन या विश्व के विषय में अपनी समझ को लेकर एक-दूसरे से तथा सामान्य लोगों से तर्क-वितर्क करते थे। ये चर्चाएँ कुटागारशालाओं (शब्दार्थ- नुकीली छत वाली झोपड़ी) या ऐसे उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरा करते थे।
राजसूय और अश्वमेध् जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा किया करते थे। इनके अनुष्ठान के लिए उन्हें ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर रहना पड़ता था।
उपनिषदों में पाई गई विचारधराओं से पता चलता है कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे। क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों के कारण होता था? ऐसे मुद्दों पर पुरजोर बहस होती थी। मनीषी परम यथार्थ की प्रकृति को समझने और अभिव्यक्त करने में लगे थे। वैदिक परंपरा से बाहर के कुछ दार्शनिक यह सवाल उठा रहे थे कि सत्य एक होता है या अनेक। लोग यज्ञों के महत्त्व के बारे में भी चिंतन करने लगे।
महावीर और बुद्ध ने वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाए थे। उन्होंने यह भी माना कि जीवन के दुःखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता था।
महर्षि वेदव्यास
स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेखों से इन्हें बनाने और सजाने के लिए राजाओं, श्रेणियों, भिक्षु, भिक्षुणीयों, साधारण महिलाओं और पुरुषों द्वारा दिए गए दान का पता चलता है। स्तूप बुद्ध के परिनिर्वाण का स्थापत्यिक प्रतीक है। स्तूप (संस्कृत अर्थ टीला) का जन्म एक गोलाकार मिट्टी के टीले से हुआ जिसे बाद में अंड कहा गया। धीरे- धीरे इसकी संरचना ज्यादा जटिल हो गई जिसमें कई चौकोर और गोल आकारों का संतुलन बनाया गया। अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी। यह छज्जे जैसा ढाँचा देवताओं के घर का प्रतीक था। हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे जिस पर अक्सर एक छत्री लगी होती थी। टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी।
ईसा पूर्व प्रथम सहस्त्राब्दी का काल विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस काल में ईरान में जरथुस्त्रा जैसे चिंतक, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु और भारत में महावीर, बुद्ध और कई अन्य चिंतकों का उद्भव हुआ। उन्होंने जीवन के रहस्यों को समझने का प्रयास किया। साथ-साथ वे इनसानों और विश्व व्यवस्था के बीच रिश्ते को समझने की कोशिश कर रहे थे। यही वह समय था जब गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे और सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में कई तरह के बदलाव आ रहे थे। ये मनीषी इन बदलते हालात को भी समझने की कोशिश कर रहे थे।
ऋग्वेद 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित किया गया था। इसमें अग्नि, इंद्र, सोम आदि कई देवताओं की स्तुति का संग्रह है। यज्ञों के समय इन स्रोतों का उच्चारण किया जाता था और लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि के लिए प्रार्थना करते थे।
चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कनिष्क के संरक्षण में प्रथम सदी ई. में अश्वघोष की सहायता एवं वसुमित्र की अध्यक्षता में कश्मीर में हुआ था ।

दक्षिण एशिया में पुरालेख के प्राचीनतम चिन्ह, 3 सहस्राब्दी ई.पू. के पूर्वार्द्ध में, सिंधु घाटी सभ्यता ( सिंधु लिपि) , के न पढ़े जा सके शिलालेखों में मिलते हैं, कुछ विद्वानों के अनुसार , प्राचीनतम पढ़े गए उत्कीर्ण लेख प्राकृत और तमिल में लिखित 3 शताब्दी ईसा पूर्व के अशोक शिलालेख हैं, श्रीलंका और दक्षिण भारत में जैन शिलालेख ( तमिल ब्राह्मी , भट्टीप्रोलु लिपि , कदंब लिपि) में लिखे गए हैं, अन्य विद्वानों ने, दक्षिण भारतीय बर्तन के टूटे हुए टुकड़े पर लघु अंश में इससे भी प्राचीन समय के ( 6 से 4 शताब्दी ईसा पूर्व ) तमिल ब्राह्मी शिलालेख की पहचान की है ! संस्कृत ( पुरालेखीय हाइब्रिड संस्कृत , EHS )में लेखन, केवल बाद में , प्रारंभिक शताब्दियों में मिलता है ! भारतीय पुरालेख प्रथम सहस्राब्दी से अधिक व्यापक तौर पर प्राप्त होते हैं, ये , टीलों के ऊपर , स्तम्भों पर, पाषाण के खण्डों पर, गुफाओं में और , चट्टानों पर, उत्कीर्ण किये गए हैं, बाद में वे ताड़ के पत्तों , सिक्कों, ताम्रपत्रों , और मंदिर की दीवारों पर भी उत्कीर्ण किये गए थे ।
इतिहासकार किसी भी ग्रंथ का अध्ययन करते समय उसकी प्रामाणिकता एवं वस्तुनिष्ठता को देखते है कि इतिहास कार ने किस मानसिकता से इतिहास लेखन किया है तथा किन किन स्रोतों से सहायता ली है।वे इस पहलु पर भी गौर करते हैं, कि लेखन पूर्वाग्रहों और काल्पनिक विचारों से मुक्त हो, एवं उसमें कालक्रम का ध्यान रखा गया हो।
(1) एकेश्वरवाद- अधिकांश भक्त संत एकेश्वरवाद में विश्वास रखते थे। उनके अनुसार ईश्वर को चाहे जिस नाम से पुकारा जाए लेकिन वह नहीं बदलता। उन्होंने राम, रहीम, कृष्ण, विष्णु तथा अल्लाह को एक ईश्वर का रूप बताया।
(2) भक्ति मार्ग - भक्ति आन्दोलन ने ईश्वर भक्ति पर अधिक महत्व दिया। रामानुज ने वेदांत दर्शन के अन्तर्गत शक्ति सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। कबीर ने भक्ति मार्ग को ज्ञान तथा कर्म दोनों मार्ग से श्रेष्ठ बताते हुए कहा कि जब तक ईश्वर के प्रति भक्तिभाव नहीं है तब तक जप, तप संयम, ध्यान, स्थान सभी व्यर्थ हैं।
(3) धार्मिक सरलता पर बल- भक्ति आन्दोलन के सभी प्रचारकों ने धर्म से भी आडम्बर, अन्धविश्वास, दिखावे, रूढि़वादी, कर्मकाण्डों तथा ढ़कोसलों को दूर करने पर बल दिया। उनके अनुसार सच्चा धर्म सरल होता है। इस धर्म के प्रचारक मानवीय गुणों एवं नैतिकता पर जोर देते थे। उनके अनुसार वह व्यक्ति अधिक धार्मिक एवं पुण्य आत्मा है, जिसका मन पवित्र है और आचरण शुद्ध। उन्होंने लोगों की सच्चाई, ईमानदारी, न्याय, भाईचारे, सहयोग, दया आदि मानवीय गुण अपनाने का संदेश दिया।
(4) अनेक भक्तों, सन्तों द्वारा मूर्ति पूजा का विरोध- भक्ति आन्दोलन के सभी प्रमुख प्रचारकों ने मूर्तिपूजा का विरोध किया। गुरूनानक तथा कबीर ने खुले आम कहा-
पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते तो चाकि भली, पीस खाय संसार।।
(5) गुरू की भक्ति पर बल- भक्ति आन्दोलन के अनेक प्रचारकों, जैसे- रामानुज, कबीर, नानक तथा चैतन्य ने मोक्ष के लिए गुरू की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार गुरू के समक्ष आत्म समर्पण ही मोक्ष प्राप्ति का सुलभ साधन है। बिना गुरू की कृपा के मोक्ष प्राप्ति असम्भव है। सन्त कबीर ने गुरु को गोबिन्द (ईश्वर से) प्राथमिकता देते हुए कहा-
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागो पायँ।
बलिहारी गुरू आपने, गोविन्द दियो मिलाय।
(6) जनसाधारण की भाषा का प्रयोग - भक्ति आन्दोलन के प्रचारकों ने संस्कृत अथवा अन्य किसी विशेष भाषा को श्रेष्ठ या पवित्र नहीं माना और उन्होंने अपने विचार जनसाधारण की भाषा में रखे। वस्तुतः उनकी यह धारणा थी कि भाषा केवल मात्र विचारो को आदान-प्रदान का साधन मात्र है। भाषा जितनी सरल होगी लोग उतनी ही सरलता से विचारों को समझ सकेंगे। कबीर तो सभी भाषाओं को खिचड़ी भाषा कह देते हैं।
(7) सम्पूर्ण आत्मसमर्पण - भक्ति आन्दोलन के अधिकांश प्रचारकों के अनुसार मानव को अपना सर्वस्व ईश्वर को समर्पण कर देना चाहिए तथा ईश्वरीय इच्छा को ही सर्वोत्तम निर्णय मानना चाहिए। मानव को ईश्वर की आराधना शुरू करने से पूर्व काम, क्रोध, मोह, लोभ, अंहकार आदि विकारों को छोड़ देना चाहिए।
(8) मानववादी दृष्टिकोण - भक्त सन्त मानववाद में विश्वास करते थे। उन्होंने सभी लोगों को समान समझा तथा उन लोगों का विरोध किया जो जन्म, लिंग जाति, धर्म आदि के आधार पर मानव में ऊँच-नीच की भावना का समर्थन करते हैं। कबीर ने जीवन भर लोगों को समझाया कि जन्म से सभी मानव समान हैं। गुरूनानक ने भी सभी जातियों तथा सभी सम्प्रदायों के लोगों को एक ईश्वर की संतान बताया तथा ऊँच-नीच एवं छुआछूत का विरोध किया।
(9) सौहार्दपूर्ण वातावरण या समन्वयवादी - भक्ति आन्दोलन के अधिकांश प्रवर्तक एवं प्रचारकों ने हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायों के मध्य सौहार्दपूर्ण वातावरण पैदा करने का प्रयास किया। बल्लभाचार्य राजनीति से अलग रहकर धर्म एवं संस्कृति के माध्यम से हिन्दू मुसलमानों के बीच सामंजस्य चाहते थे। उनके द्वार शूद्रों, ब्राहम्णों, मुसलमानों तथा गरीब-अमीर सभी के लिए खुला रहता था।
(10) समाज सुधार - अधिकांश भक्त सन्त धर्म सुधारक होने के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। उन्होंने जाति प्रथा का घोर विरोध करने के साथ-साथ अस्पृश्यता को ईश्वर तथा मानव के विरूद्ध अपराध बताया। उन्होंने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए भी प्रयास किये, अनेक संतों ने सती प्रथा, कन्या वध, दास प्रथा आदि का भी विरोध किया। बल्लभाचार्य ने समाज सुधार के लिए अत्यधिक धन संग्रह एवं आर्थिक विषमता का भी विरोध किया। कबीर, नानक, चैतन्य आदि ने भी सभी जाति के लोगों को अपना शिष्य बनाया।
महात्मा कबीर का जन्म सम्वत् 1456 विक्रमी (1399 ई.) में हुआ था। कहते हैं कि किसी विधवा ब्राह्मणी को स्वामी रामानन्द ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था। पुत्र होने पर वह लोक लज्जा से बचने के लिये उसे लहरतारा नामक तालाब के पास छोड गई। नीरू जुलाहा और उसकी पत्नी ने इस शिशु का पालन-पोषण किया। यही बालक कबीर थे। बडे होने पर कबीर ने रामानन्द जी को अपना गुरू मान लिया। उनका विवाह लोई नामक स्त्री से हुआ था। जिससे कमाल नामक पुत्र तथा कमाली नामक कन्या हुई। कबीर कपड़ा बुनते थे, साधु संगति करते थे अतः उन्होंने बहुत ज्ञान प्राप्त कर लिया था। 120 वर्ष की लम्बी आयु पाकर उनकी मगहर में मृत्यु हुई ।
विचारधारा (शिक्षाऐं) कबीर ईश्वर को निर्गुण, निराकार मानते थे। वे जाति-पांति, मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, अन्ध-विश्वासों तथा हिंसा के विरूद्ध थे। वे सभी को समान समझते थे, उन्होंने मानव को प्रेम से रहने का उपदेश दिया। वे कर्मकाण्ड के विरोधी थे। उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमान दोनों को उनकी बुराइयों के लिये फटकारा तथा हिन्दू-मुस्लिम एकात पर बल दिया। उनके स्वतन्त्र विचारों के कारण सिकन्दर लोदी ने उन्हें बंहुत सताया, परन्तु वे सत्य के मार्ग से नहीं डिगे। कबीर के इन उपदेशों का हिन्दू और मुसलमान दोनों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। दोनों के बीच एकता स्थापित हुई। समाज में भाई चारा बढ़ा। यही कारण है कि उनके अनुयायियों में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। उन्होंने कबीर पंथ की स्थापना की।
कृतियाँ - उन्होंने सबदों, साखियों तथा पदों में अपने उपदेश दिये हैं। उनके उपदेशों का संकलन ‘कबीर ग्रन्थावली’ में है जो काशी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित हुई है। वे निर्गुण ब्रह्मा के उपासक थे। हजारों हिन्दु और मुसलमान उनके अनुयायी बन गये थे। कबीर एक सच्चे समाज सुधारक, साहित्यिक और कवि थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर के विषय में लिखा है कि, कबीरदास बहुत कुछ अस्वीकार करने का अपार साहस लेकर अवतीर्ण हुए थे। उन्होंने आजीवन सम्प्रदायवाद, ब्रह्माचार और बाहरी भेदभाव पर कठोरतम आघात किया था। इनके अनुयायी कबीर पंथी कहलाते हैं। कबीरदास जी की वाणियों का संग्रह बीजक नाम से उनके शिष्यों ने किया।
कबीर ने हिन्दू मुस्लिम एकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने सच्चे समाज सुधारक की दृष्टि से भारतीय समाज का अध्ययन किया और अनुभव किया कि हिन्दू और मुसलमान दोनों ही छोटे बडे के नाम पर संघर्षरत हैं। आडम्बरयुक्त उपासना पद्धतियों के कारण अपनी पृथक-पृथक पहचान बनाये हुए हैं। अतएव उन्होंने बडे ही तीखे स्वरों में उपासना पद्धतियों की आलोचना की। मुस्लिमों से कहा -
काँकर पाथर जोरि के, मस्जिद लई बनाय।
ता चढि़ मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।
इसके साथ हिन्दुओं से कहा -
पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते यह चाकी भली पीस खाय संसार।
कबीर ने बाह्य आडम्बरों और मिथ्या विश्वासों का घोर विरोध किया।
कबीरदास जी सम्प्रदाय और जाति प्रथा के घोर विरोधी थे। वे सभी को समान स्वीकार करते थे। हिन्दू और मुसलमान के भेद का खण्डन करते हुए कबीर दास जी का कथन है -
कोई हिन्दू कोई तुरक कहावै, एक जमीं पर रहिये।
A. महमूद हसन
B. महमूद गांवा
C. बख्तियार खान
D. अल बिन अली
बहमनी शासन को महमूद गांवाने चरम पर पहुँचाया|
A. पेगोड़ा
B. हूण
C. टाका
D. रुपया
विजयनगर की मुद्रा का नाम पेगोड़ा था|
A. बहमनी
B. विजयनगर
C. गोलकोंडा
D. मुग़ल
विजयनगरशासन में वर व वधु दोनों से कर लिया जाता था|
A. कृष्णादेव राय
B. हरिहर
C. बुक्का
D. रामराय
तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर का नेतृत्व रामराय ने किया|
A. बंगलुरु
B. हंपी
C. चेन्नई दिल्ली
D. दिल्ली
विजयनगर का प्रसिद्ध विट्ठल मंदिर हंपी में स्थित है|
A. अमरानायक
B. नायक
C. तालुक
D. कदाचार
विजयनगर साम्राज्य में सैनिक विभाग को कदाचार नाम से जाना जाता था|
विट्ठल स्वामी का मंदिर विष्णु देवता का है|
A. 1340
B. 1332
C. 1565
D. 1339
‘तालीकोटा का युद्ध’ 1565 में हुआ|
A. कृष्णादेव राय
B. हरिहर
C. बुक्का
D. अहमदशाह
‘आमुक्तमालाद’ नामक काव्य की रचना कृष्णादेव रायने की|
A. अलाउद्दीन हसन बहमन शाह
B. हरिहर
C. बुक्का
D. अहमदशाह
अलाउद्दीन हसन बहमन शाह
A. मुद्रा
B. व्यापर
C. भू-राजस्व
D. कर
विजयनगर साम्राज्य की वित्तीय विशेषता भू-राजस्व थी|
A. तेलंगाना
B. आंध्र प्रदेश
C. तमिल नाडू
D. कर्नाटका
हंपी का खुला संग्राहालय कर्नाटकामें है|
A. बहमनी
B. मुग़ल
C. बिजापुर
D. गोलकोंडा
विजय नगर का संघर्ष सदैव बहमनी के साथ रहा|
A. देवराय प्रथम
B. हरिहर
C. बुक्का
D. अहमदशाह
संगम वंश का प्रमुख शासक देवराय प्रथम था|
A. शाह जहान
B. जेहंगिर
C. अकबर
D. बाबर
कृष्णदेव राय बाबर के समकालीन थे|
A. बंगलुरु
B. हंपी
C. चेन्नई दिल्ली
D. दिल्ली
विजयनगर साम्राज्य के अवशेष हंपीमें प्राप्त हुए|
A. 1340
B. 1332
C. 1509
D. 1339
कृष्णदेव राय 1509 में शासक बना|
A. कृष्णादेव राय
B. हरिहर
C. बुक्का
D. अहमदशाह
विजयनगर साम्राज्य का सबसे प्रभावशाली शासक कृष्णादेव राय था|
जैन धर्म अनुशासित जीवन के माध्यम से आध्यात्मिक पवित्रता और ज्ञान का मार्ग सिखाता है कि एक धर्म है। अहिंसा का सिद्धांत जैन धर्म के अनुयायियों का मौलिक नैतिक गुण है। ऐसा माना जाता है कि जैन भिक्षुओं और भिक्षुणीयों को आत्मा या आत्मज्ञान की शुद्धता प्राप्त करने के लिए शारीरिक इंद्रियों और भावनाओं के खिलाफ लड़ना चाहिए। मोक्ष प्राप्ति हेतु जैन धर्म के तीन (त्रिरत्न) और अनिवार्य सिद्धान्त सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन एवं सम्यक चरित्र हैं । इसकी प्राप्ति के लिए जैन साधु और साधवी के लिए पाँच व्रत करने अनिवार्य थे: हत्या न करना, चोरी नहीं करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य (अमृषा) और धन संग्रह न करना।
साँची में उत्कीर्ण बहुत सी अन्य मूर्तियाँ शायद बौद्ध मत से सीधी जुड़ी नहीं थीं। इनमें कुछ सुंदर स्त्रिायाँ भी मूर्तियों में उत्कीर्ण हैं जो तोरणद्वार के किनारे एक पेड़ पकड़ कर झूलती हुई दिखती हैं। शुरू-शुरू में विद्वान इस मूर्ति के महत्त्व के बारे में थोड़े असमंजस में थे। इस मूर्ति का त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नजर नहीं आता था लेकिन साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से वे समझ पाए कि यह संस्कृत भाषा में वर्णित शालभंजिका की मूर्ति है। लोक परंपरा में यह माना जाता था कि इस स्त्री द्वारा छुए जाने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल होने लगते थे। ऐसा लगता है कि यह एक शुभ प्रतीक माना जाता था और इस कारण स्तूप के अलंकरण में प्रयुक्त हुआ। शालभंजिका की मूर्ति से पता चलता है कि जो लोग बोद्ध धर्म में आए उन्होंने बुद्ध पूर्व और बोद्ध धर्म से इतर दूसरे विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया। साँची की मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीक या चिर् निश्चय ही इन्हीं परंपराओं से उभरे थे। उदाहरण के लिए, जानवरों के कुछ बहुत ख़ूबसूरत उत्कीर्णन यहाँ पर पाए गए हैं।इन जानवरों में हाथी, घोड़े, बंदर और गाय-बैल शामिल हैं। हालाँकि साँची में जातकों से ली गई जानवरों की कई कहानियाँ हैं, ऐसा लगता है कि यहाँ पर लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्णन किया गया था। साथ ही जानवरों को मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। उदाहरण के लिए, हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।इन प्रतीकों में कमल दल और हाथियों के बीच एक महिला की मूर्ति प्रमुख है। ये हाथी उनके ऊपर जल छिड़क रहे हैं जैसे वे उनका अभिषेक कर रहे हों। जहाँ कुछ इतिहासकार उन्हें बुद्ध की माँ माया से जोड़ते हैं तो दूसरे इतिहासकार उन्हें एक लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं। गजलक्ष्मी सौभाग्य लाने वाली देवी थीं जिन्हें प्रायः हाथियों के साथ जोड़ा जाता है। यह भी संभवहै कि इन उत्कीर्ण मूर्तियों को देखने वाले उपासक इसे माया और गजलक्ष्मी दोनों से जोड़ते थे। कई स्तंभों पर दिखाए गए सर्पों को भी देखिए । यह प्रतीक भी ऐसी लोक परंपराओं से लिया गया प्रतीत होता है जिनका ग्रंथों में हमेशा जिक्र नहीं होता था।
पत्थर में गढ़ी कथाएँ-
सांची स्तूप के उत्तरी प्रवेश द्वार के मूर्तिकला अंश में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य का चित्रण दिखता है। परंतु वे कला इतिहासकार जिन्होंने साँची की इस मूर्तिकला का गहराई से अध्ययन किया है, इसे वेसान्तर जातक से लिया गया एक दृश्य बताते हैं। यह कहानी एक ऐसे दानी राजकुमार के बारे में है जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया और स्वयं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया। जैसा कि इस उदाहरण से स्पष्ट है अक्सर इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं।
उपासना के प्रतीक –
बौद्ध मूर्तिकला को समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुद्ध के चरित लेखन के बारे में समझ बनानी पड़ी। बोध चरित लेखन अनुसार एक वृक्ष नीचे ध्यान करते हुए बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई। कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया। उदाहरणतः, रिक्त स्थान बुद्ध के ध्यान की दशा तथा स्तूप महापरिनिब्बान के प्रतीक बन गए। चक्र का भी प्रतीक के रूप में प्रायः इस्तेमाल किया गया। यह बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक था। जैसा कि स्पष्ट है ऐसी मूर्तिकला को अक्षरशः नहीं समझा जा सकता है। उदाहरणतः, पेड़ का तात्पर्य केवल एक पेड़ नहीं था वरन वह बुद्ध के जीवन की एक घटना का प्रतीक था। ऐसे प्रतीकों को समझने के लिए यह जरूरी है कि इतिहासकार कलाकृतियों के निर्माताओं की परंपराओं को जानें।

चौदहवीं शताब्दी तक सांची एक सुनसान स्थल मात्र था जिसका किसी को भी ज्ञात नहीं था तब वर्ष 1818 में जनरल टेलर ने इसके पुरावशेषों की खोज कर जनसाधारण का ध्यान इसकी और आकर्षित किया। इसकी मरम्मत और संरक्षण के सवाल पर 1881 के बाद ही ध्यान दिया गया था। भोपाल के शासकों, शाहजहां बेगम और उसके उत्तराधिकारी सुल्तान जहां बेगम ने भी प्राचीन स्थल के संरक्षण के लिए धन उपलब्ध कराया था। सर जॉन मार्शल ने वर्ष 1912 और 1919 के बीच स्मारक के संरक्षण का काम अपने हाथों में लिया और स्मारक को उसकी वर्तमान अवस्था में लेकर आए। आज यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इस महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल की सफल पुनर्स्थापना और संरक्षण की गवाही देता है। लेकिन 1796 में अन्वेषित अमरावती स्तूप के मामले में स्तूप के महत्व को नहीं समझा गया था जिसका परिणाम यह हुआ था कि स्थानीय लोगों और अंग्रेजों दोनों ने इसके टुकड़ों को हटाकर अपने घरों या दफ्तरों में सजावट के रूप में इनका प्रयोग कर लिया गया।
यूरोप के विद्वानों ने उन्नीसवीं सदी में जब देवी-देवताओं की मूर्तियाँ देखीं तो वे उनकी पृष्ठभूमि और महत्त्व को नहीं समझ पाए। कई सिरों, हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूपों को मिलाकर बनाई गई मूर्तियाँ उन्हें विकृत लगती थीं और कई बार वे घृणा से भर जाते थे। इन शुरू-शुरू के विद्वानों ने ऐसी अजीबोगरीब मूर्तियों की समझ बनाने के लिए उनकी तुलना एक ऐसी परंपरा से की जिससे वे परिचित थे। यह थी प्राचीन यूनान की कला परंपरा। हालाँकि वे प्रारंभिक भारतीय मूर्तिकला को यूनान की कला से निम्न स्तर का मानते थे,ऐसा इसीलिए था क्योंकि उन्होने भारतीय मूर्तिकला की तुलना ग्रीस की पौराणिक प्रतिमाओं से की थी जिनसे वे परिचित थे। एक और समस्या यह थी कि किसी मूर्ति का महत्त्व और संदर्भ समझने के लिए कला के इतिहासकार अक्सर लिखित ग्रंथों से जानकारी एकत्र करते हैं। भारतीय मूर्तियों की यूनानी मूर्तियों से तुलना कर निष्कर्ष निकालने की अपेक्षा यह निश्चय ही ज्यादा बेहतर तरीका है। लेकिन व्याख्याओं के बारे में विवादों की वजह से यह कार्य बहुत आसान नही था।

भूमिका - ईसा से छठी शताब्दी पूर्व का काल बौद्धिक हलचल एवं धार्मिक क्रांति का काल था। उस काल में भारत में अनेक राज्य थे।
बुद्ध काल में गंगाघाटी में कई गणराज्यों के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं जो इस प्रकार हैं -
(1) कपिलवस्तु के शाक्य - यह गणराज्य नेपाल की तराई में स्थित था, जिसकी राजधानी कपिलवस्तु थी। शाक्य गणराज्य के उत्तर में हिमालय पर्वत, पूर्व में रोहिणी नदी तथा दक्षिण और पश्चिम में राप्ती नदी स्थित थी। कपिलवस्तु की पहचान नेपाल में स्थित आधुनिक तिलौराकोट से की जाती है। कुछ विद्वान इसकी पहचान सिद्धार्थनगर जिले के पिपरहवा नामक स्थान से करते हैं, जहाँ से बौद्ध स्तूप तथा उसकी धातुगर्भ-मंजूषा के अवशेष प्राप्त किये गये हैं। इसे शाक्यवंशी सुकीर्ति ने प्रतिस्थापित करवाया था। कपिलवस्तु के अतिरिक्त इस गणराज्य में अन्य अनेक नगर थे – चातुमा, सामगाम, खोमदुस्स, सिलावती, नगरक, देवदह, सक्कर आदि। बुद्ध की माता देवदह की ही कन्या थीं। शाक्य गणराज्य में लगभग 80 हजार परिवार थे। शाक्य लोग अपने रक्त पर बड़ा अभिमान करते थे और इसी कारण वे अपनी जाति के बाहर वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहीं करते थे। गौतम बुद्ध का जन्म इसी गणराज्य में हुआ था। बुद्ध से सम्बन्धित होने के कारण इस गणराज्य का महत्व काफी बढ़ गया। किन्तु राजनेतिक शक्ति के रूप में शाक्य गणराज्य का कोई महत्व नहीं था और यह कोशल राज्य की अधीनता स्वीकार करता था। जैसा कि पीछे बताया जा चुका है इस राज्य का विनाश कोशल नरेश विडूडभ द्वारा किया गया।
(2) सुमसुमार पर्वत के भग्ग- सुमसुमार पर्वत का समीकरण मिर्जापुर जिले में स्थित वर्तमान चुनार से किया गया है। ऐसा लगता है कि भग्ग ऐतरेय ब्राह्मण में उल्लिखित ‘भर्ग’ वंश से सम्बन्धित थे। भग्ग गणराज्य के अधिकार-क्षेत्र में विन्ध्य क्षेत्र की यमुना तथा सोन नदियों के बीच का प्रदेश सम्मिलित था। भग्ग लोग वत्सों की अधीनता स्वीकार करते थे। ज्ञात होता है कि सुमसुमार पर्वत पर वत्सराज उदयन का पुत्र बोधि निवास करता था।
(3) अलकप्प के बुलि - यह गणराज्य आधुनिक बिहार प्रान्त के शाहाबाद आरा और मुजफ्फरपुर जिलों के बीच स्थित था। बुलियों का वेठद्वीप (वेतिया) के साथ घनिष्ट सम्बन्ध था। यही संभवतः उनकी राजधानी थी। बुलि लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। महापरिनिर्वाण सूत्र के अनुसार बुद्ध की मृत्यु के बाद उन्होंने उनके अवशेषों का एक भाग प्राप्त किया तथा उस पर स्तूप का निर्माण करवाया था।
(4) केसपुत्त के कालाम - केसपुत्त का निश्चित रूप से समीकरण स्थापित कर सकना कठिन है। यह गणराज्य कोशल के पश्चिम में स्थित था। संभवतः यह राज्य सुल्तानपुर जिले के कुंड़वार से लेकर पालिया नामक स्थान तक फैला हुआ था। वैदिक साहित्य से ज्ञात होता है कि कालामों का सम्बन्ध पान्चाल जनपद के केशियों के साथ था। इसी गणराज्य के आलारकालाम नामक आचार्य से जो उरूवेला के समीप रहते थे, महात्मा बुद्ध ने गृह-त्याग करने के बाद सर्वप्रथम उपदेश ग्रहण किया था। कालाम लोग कोशल की अधीनता स्वीकार करते थे।
(5) रामगाम (रामग्राम) के कोलिय - यह शाक्य गणराज्य के पूर्व में स्थित था। दक्षिण में यह गणराज्य सरयू नदी तक विस्तृत था। शाक्य और कोलिय राज्यों के बीच रोहिणी नदी बहती थी। दोनों राज्यों के लोग सिंचाई के लिए इसी नदी के जल पर निर्भर करते थे। नदी के जल के लिए उनमें प्रायः संघर्ष भी हो जाता था । एक बार गौतम बुद्ध ने ही इसी प्रकार के एक संघर्ष को शान्त किया था। कोलिय गण के लोग अपनी पुलिस-शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। कोलियों की राजधानी रामग्राम की पहचान वर्तमान गोरखपुर जिले में स्थित रामगढ़ ताल से की गयी है।
(6) कुशीनारा के मल्ल - कुशीनारा की पहचान देवरिया जिले में स्थित वर्तमान कसया नामक स्थान से की जाती है। बाल्मीकि रामायण में मल्लों को लक्ष्मण के पुत्र चन्द्रकेतु मलल का वंशज कहा गया है।
(7) पावा के मल्ल - पावा आधुनिक देवरिया जिले में स्थित पडरौना नामक स्थान था। मल्ल लोग सैनिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। जैन साहित्य सो पता चलता है कि मगध नरेश अजातशत्रु के भय से मल्लों ने लिच्छवियों के साथ मिलकर एक संघ बनाया था। अजातशत्रु ने लिच्छवियों को पराजित करने के बाद मल्लों को भी जीत लिया था।
(8) पिप्पलिवन के मोरिय - मोरिय गणराज्य के लोग शाक्यों की ही एक शाखा थे। महावंशटीका से पता चलता है कि कोशल नरेश विडूडभ के अत्याचारों से बचने के लिए वे हिमालय प्रदेश में भाग गये जहाँ उन्होंने मोरों की कूक से गुंजायमान स्थान में पिप्पलिवन नामक नगर बसा लिया। मोरों के प्रदेश का निवासी होने के कारण ही वे मोरिय कहे गये। मोरिय शब्द से ही मौर्य शब्द बना है। चन्द्रगुप्त मौर्य इसी परिवार में उत्पन्न हुआ था। पिप्पलिवन का समीकरण गोरखपुर जिले में कुसुम्हीं के पास स्थित राजधानी नामक ग्राम से किया जाता है।
(9) वैशाली के लिच्छवि - यह बुद्ध काल का सबसे बड़ा तथा शक्तिशाली गणराज्य था। लिच्छिवि वज्जिसंघ में सर्वप्रमुख थे। उनकी राजधानी वैशाली मुजफ्फरपुर जिले के बसाढ़ नामक स्थान में स्थित थी। महावग्ग जातक में वैशाली को एक धनी समृद्धशाली तथा घनी आबादी वाला नगर कहा गया है। यहाँ अनेक सुन्दर भवन, चैत्य तथा विहार थे।
एकपण्ण जातक से पता चलता है कि वैशाली नगर चारों ओर से तीन दीवारों से घिरा हुआ था। प्रत्येक दीवार एक दूसरी से एक योजन दूर थी और उसमें पहरे की मीनारों वाले तीन द्वारा बने हुए है। लिच्छवियों ने महात्मा बुद्ध के निवास के लिए महावन में प्रसिद्ध कूट्टागारशाला का निर्माण करवाया था जहाँ रहकर बुद्ध ने अपने उपदेश दिये थे। लिच्छवि लोग अत्यन्त स्वाभिमानी तथा स्वतन्त्रता-प्रेमी हुआ करते थे। उनकी शासन व्यवस्था संगठित थी। बुद्ध काल में यह राज्य अपनी समृद्धि की पराकाष्ठा पर था। यहाँ का राजा चेटक था। उसकी कन्या छलना का विवाह मगधनरेश बिम्बिसार के साथ हुआ था। महावीर की माता त्रिशला उसकी बहन थी। जैन साहित्य से पता चलता है कि अजातशत्रु के विरूद्ध चेटक ने मल्ल, काशी तथा कोशल के साथ मिलकर एक सम्मिलित मोर्चा बनाया था।
(10) मिथिला के विदेह - बिहार के भागलपुर तथा दरभंगा जिलों के भू भाग मे विदेह गणराज्य स्थित था। प्रारम्भ में यह राजतन्त्र था। यहां के राजा जनक अपनी शक्ति एवं दार्शनिक ज्ञान के लिए विख्यात थे। परन्तु बुद्ध के समय में यह संघ राज्य बन गया। विदेह लोग भी वज्जि संघ के सदस्य थे। उनकी राजधानी मिथिला की पहचान वर्तमान जनकपुर से की जाती है। बुद्ध के समय मिथिला एक प्रसिद्ध व्यापारिक नगर था जहाँ श्रावस्ती के व्यापारी अपना माल लेकर आते थे।
बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध का जन्म शाक्यकुल में हुआ था । उनके पिता शाक्य गणराज्य के प्रधान थे । आपकी माता का नाम महामाया व पिता का नाम शुद्धोधन था । आप बचपन से ही अंतर्मुखी एवं चिन्तनशील स्वभाव के थे आपकी साँसारिकता से विरक्ति देखकर आपके पिता ने सोलह वर्ष की आयु में आपका विवाह राजकुमारी यशोधरा से कर दिया पर समस्त सांसारिक बंधन भी आपको नहीं रोक पाए व 29 वर्ष की आयु में एक दिन आप अपने पत्नी, पिता व बेटे को छोड़कर ज्ञान की खोज में निकल गए । यह घटना महाभिनिष्क्रमण कहलाती है । संन्यासी हो जाने के बाद बुद्ध कठोर तप व साधना में लीन हो गए । लगभग 6 वर्षों की कठोर तप-साधना के बाद भी उन्हें सफलता हासिल नहीं हुई, तब उन्होंने कठोर साधना का मार्ग छोड़कर मध्य मार्ग को अपनाया सात दिन तक ध्यान के बाद वैसाख पूर्णिमा की रात उन्हंे “बोध“ हुआ । साक्षात् सत्य के दर्शन के बाद बुद्ध नाम से ख्याति प्राप्त हुई । पीपल के जिस वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ वह “बोधिवृक्ष“ कहलाया व वह स्थान बोधगया हो गया । धर्मचक्रप्रर्वतन - ज्ञान प्राप्ति के बाद सर्वप्रथम बुद्ध ने ’बोध गया’ में ही ज्ञान उपदेश तपस्यु व मल्लिक नामक बन्जारों को दिया व वहाँ से आगे चलकर ’सारनाथ’ पहुंच गये। यहाँ उन्हें अपने पाँचों ब्राहम्ण साथी मिल गए जो उन्हें पूर्व में छोड़ गये थे । उन्हें बुद्ध ने अपने ज्ञान की धर्म रूप में दीक्षा दी । यह घटना धर्मचक्र प्रर्वतन कहलाती है बाद में बुद्ध ने संघ की स्थापना की जिसके द्वारा उन्होंने अपने शिष्यों के साथ रहते हुए 45 वर्षों तक धर्म का प्रचार किया । कालांतर में अपने शिष्य आंनद के कहने पर भिक्षुणियों के संघ की भी स्थापना की । महापरिनिर्वाण - 80 वर्ष की आयु तक वह अपने धर्म का प्रचार करते रहे । मल्ल जनपद की राजधानी पावा में भोजन के बाद उन्हें अतिसार हो गया । यहाँ से आप इसी अवस्था में कुशीनगर (गोरखपुर) पहुंचे । यहां पर 483 ई.पू. में उन्होंने शरीर को त्याग दिया । बौद्ध साहित्य में यह घटना महापरिनिर्वाण कहलाती है । बुद्ध की शिक्षाएँ - महात्मा बुद्ध ने जगत् व जीवन को सत्य माना । वह विश्व या मनुष्य की अमरता, नश्वरता, सीमितता या असीमितता के विवाद में नहीं पड़े । बुद्ध ने सत्ता संबंधी किसी प्रश्न पर अपने विचार व्यक्त नहीं किए । उनका आधार मानव मात्र का कल्याण था । उनके प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार थे ।(1) चार आर्य सत्य - यह चार सत्य बौद्ध धर्म की आधारशिला हैं इसके अनुसार - 1) दुःख - समस्त मानव जीवन दुःखमय है । प्रत्येक व्यक्ति किसी ना किसी बात से दुखी है इस प्रकार-सर्वत्र दुःख ही दुःख है । 2) दुःख समुदय - संसार में सर्वत्र व्याप्त दुःखों का कारण बुद्ध की दृष्टि में तृष्णा (इच्छा) है । 3) दुःख निरोध - बुद्ध ने इन दुखों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए “दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा“ नामक मार्ग बतलाया । यह मार्ग अष्टांगिक मार्ग भी कहलाता है । (2) अष्टांगिक मार्ग - इसके आठ अंग हैं - 1) सम्यक दृष्टि 2) सम्यक संकल्प 3) सम्यक् वाणी4) सम्यक् कर्मान्त 5) सम्यक् आजीव 6) सम्यक् प्रयत्न 7) सम्यक-स्मृति 8) सम्यक् - समाधिइसे मध्यमा - प्रतिपदा या मध्यम मार्ग भी कहा जाता है । (3) दस शील - अपनी शिक्षाओं में बुद्ध ने नैतिकता या शील पर अधिक बल दिया। अपने शिष्यों को उन्होंने दस शील का पालन करने को कहा । भिक्षु जीवन पालन करने वालों केा दसों शील का पालन करना अनिवार्य था जबकि गृहस्थों को पाँच नियमों का पालर्न करना अनिवार्य था । (4) वेदों की प्रामाणिकता में अविश्वास - उन्होंने वेदों में लिखी प्रत्येक बात को सत्य नहीं माना व ज्ञान को असीम माना । 5) कर्मवाद - उनका कहना था कि मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है । 6) पुर्नजन्म - आपने आत्मा के अस्तित्व के विषय में कुछ नहीं कहा । आपका विचार था कि कर्मों के अनुसार ही मनुष्य अच्छा-बुरा जन्म पाता है । 7) निर्वाण - बौद्ध धर्म का अंतिम लक्ष्य निर्वाण (मोक्ष) है जिसका अर्थ जन्म- मरण के चक्र से मुक्ति है । 8) प्रतीत्य समुत्पाद - इसके अनुसार संसार की हर वस्तु या घटना किसी कारण-विशेष से उत्पन्न होती है । बिना कारण या अचानक कोई घटना नहीं घटती है । इसके अलावा महात्मा बुद्ध परिवर्तन व क्षणिकता में विश्वास करते थे व ब्राहम्णवादी जाति व्यवस्था के विरोधी थे । उनकी मान्यतानुसार प्रत्येक ग्र्र्रहस्थ को माता-पिता, आचार्य, पत्नी, मित्र, सेवक व साधु-सन्यासियों की सेवा अनिवार्यतः करनी चाहिए ।
(अ)ऋग्वेद के मंत्र विभिन्न देवी-देवताओं को समर्पित किए गए हैं, जिनका प्रधान देवता इंद्र हैं जिनकी प्रशंसा उनके शत्रुओं का नाश करने के लिए की जाती है। याज्ञीक-अग्नि, बलि; और सोम, पवित्र औषधि या पौधा जिससे यह बनाया जाता है। आदित्य अथवा असुर देवता मित्र:वरुण और उषा (भोर): समान रूप से महत्वपूर्ण देवता हैं।
(ब)राजसूय और अश्वमेध् कुछ जटिल यज्ञ। राजा जटिल कर्मकांडों में अपना भाग्य आजमाते थे। जिसमें कभी कभी सैकड़ों ब्राह्मण पुरोहितों की आवश्यकता पड़ती थी और इसे सम्पन्न करने में एक समय में कई हफ्तों का समय लग जाता था।
(स) लोग बुराई के कलंक को दूर करने और वांछित फल की प्राप्ति हेतु आश्वस्त होने के लिए शुद्धि एवं जीवनदायक प्रक्रिया के रूप में यज्ञ का आयोजन किया करते थे। ब्राह्मण पुरोहित की सहायता से यज्ञ का आयोजन प्रचूर मात्र में भोजन, धन, अच्छा स्वास्थ्य एवं जीवन, पुत्र एवं गाय की प्राप्ति हेतु किया जाता था। इन्हें एक सफ़ाई और जीवन देने की प्रक्रिया के रूप में यज्ञ किया। बलिदान प्रचुर मात्रा में भोजन और धन के लिए ब्राह्मण पुजारी की मदद से किया गया था; अच्छे स्वास्थ्य और जीवन; बेटे और गायों। इन्हें नश्वर देवताओं को ताकतवर और परोपकारी बनाए रखने के लिए उन्हें जीवन और शक्ति का हस्तांतरण करने के सामान्य साधन के रूप में माना जाता था।
पत्थर में गढ़ी कथाएँ-
सांची स्तूप के उत्तरी प्रवेश द्वार के मूर्तिकला अंश में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य का चित्रण दिखता है। परंतु वे कला इतिहासकार जिन्होंने साँची की इस मूर्तिकला का गहराई से अध्ययन किया है, इसे वेसान्तर जातक से लिया गया एक दृश्य बताते हैं। यह कहानी एक ऐसे दानी राजकुमार के बारे में है जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया और स्वयं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया। जैसा कि इस उदाहरण से स्पष्ट है अक्सर इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं।
उपासना के प्रतीक –
बौद्ध मूर्तिकला को समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुद्ध के चरित लेखन के बारे में समझ बनानी पड़ी। बोध चरित लेखन अनुसार एक वृक्ष नीचे ध्यान करते हुए बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई। कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया। उदाहरणतः, रिक्त स्थान बुद्ध के ध्यान की दशा तथा स्तूप महापरिनिब्बान के प्रतीक बन गए। चक्र का भी प्रतीक के रूप में प्रायः इस्तेमाल किया गया। यह बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक था। जैसा कि स्पष्ट है ऐसी मूर्तिकला को अक्षरशः नहीं समझा जा सकता है। उदाहरणतः, पेड़ का तात्पर्य केवल एक पेड़ नहीं था वरन वह बुद्ध के जीवन की एक घटना का प्रतीक था। ऐसे प्रतीकों को समझने के लिए यह जरूरी है कि इतिहासकार कलाकृतियों के निर्माताओं की परंपराओं को जानें।
लोक परंपराएँ –
साँची में उत्कीर्ण बहुत सी अन्य मूर्तियाँ शायद बौद्ध मत से सीधी जुड़ी नहीं थीं। इनमें कुछ सुंदर स्त्रिायाँ भी मूर्तियों में उत्कीर्ण हैं जो तोरणद्वार के किनारे एक पेड़ पकड़ कर झूलती हुई दिखती हैं। शुरू-शुरू में विद्वान इस मूर्ति के महत्त्व के बारे में थोड़े असमंजस में थे। इस मूर्ति का त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नजर नहीं आता था लेकिन साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से वे समझ पाए कि यह संस्कृत भाषा में वर्णित शालभंजिका की मूर्ति है। लोक परंपरा में यह माना जाता था कि इस स्त्री द्वारा छुए जाने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल होने लगते थे। ऐसा लगता है कि यह एक शुभ प्रतीक माना जाता था और इस कारण स्तूप के अलंकरण में प्रयुक्त हुआ। शालभंजिका की मूर्ति से पता चलता है कि जो लोग बोद्ध धर्म में आए उन्होंने बुद्ध पूर्व और बोद्ध धर्म से इतर दूसरे विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया। साँची की मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीक या चिर् निश्चय ही इन्हीं परंपराओं से उभरे थे। उदाहरण के लिए, जानवरों के कुछ बहुत ख़ूबसूरत उत्कीर्णन यहाँ पर पाए गए हैं।इन जानवरों में हाथी, घोड़े, बंदर और गाय-बैल शामिल हैं। हालाँकि साँची में जातकों से ली गई जानवरों की कई कहानियाँ हैं, ऐसा लगता है कि यहाँ पर लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्णन किया गया था। साथ ही जानवरों को मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। उदाहरण के लिए, हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।इन प्रतीकों में कमल दल और हाथियों के बीच एक महिला की मूर्ति प्रमुख है। ये हाथी उनके ऊपर जल छिड़क रहे हैं जैसे वे उनका अभिषेक कर रहे हों। जहाँ कुछ इतिहासकार उन्हें बुद्ध की माँ माया से जोड़ते हैं तो दूसरे इतिहासकार उन्हें एक लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं। गजलक्ष्मी सौभाग्य लाने वाली देवी थीं जिन्हें प्रायः हाथियों के साथ जोड़ा जाता है। यह भी संभवहै कि इन उत्कीर्ण मूर्तियों को देखने वाले उपासक इसे माया और गजलक्ष्मी दोनों से जोड़ते थे। कई स्तंभों पर दिखाए गए सर्पों को भी देखिए । यह प्रतीक भी ऐसी लोक परंपराओं से लिया गया प्रतीत होता है जिनका ग्रंथों में हमेशा जिक्र नहीं होता था।
ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं। प्रारंभिक बौद्ध मत में निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास को विशेष महत्त्व दिया गया था। बुद्ध को भी एक मनुष्य समझा जाता था जिन्होंने व्यक्तिगत प्रयास से प्रबोधन और निब्बान या निर्वाण प्राप्त किया। परंतु धीरे–धीरे एक मुक्तिदाता की कल्पना उभरने लगी। यह विश्वास किया जाने लगा कि वे मुक्ति दिलवा सकते थे। साथ-साथ बोधिसत्व की अवधारणा भी उभरने लगी। बोधिसत्व को परम करुणामय जीव माना गया जो अपने सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे। लेकिन वे इस पुण्य का प्रयोग दुनिया को दुखों में छोड़ देने के लिए और निब्बान प्राप्ति के लिए नहीं करते थे। बल्कि वे इससे दूसरों की सहायता करते थे। बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग बन गई।चिंतन की इस नयी परंपरा को महायान के नाम से जाना गया।जिन लोगों ने इन विश्वासों को अपनाया उन्होंने पुरानी परंपरा को हीनयान नाम से संबोधित किया।महायान के अनुयायी दूसरी बौद्ध परंपराओं के समर्थकों को हीनयान के अनुयायी कहते थे। लेकिन, पुरातन परंपरा के अनुयायी खुद को थेरवादी कहते थे। इसका मतलब है वे लोग जिन्होंने पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (जिन्हें थेर कहते थे) के बताए रास्ते पर चलने वाले। थेरवाद और महायान बौद्ध धर्मावलम्बी जीवन के परम लक्ष्य और उस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु अपनाए जाने वाले मार्ग हेतु उनके दृष्टिकोण में भिन्नता रखते हैं। थेरवाद बौद्ध आत्मज्ञान और निर्वाण प्राप्त अर्हत, अथवा सिद्ध संत बनने के लिए प्रयास करते हैं। थेरवाद बौद्ध संप्रदाय के अनुयायियों के अनुसार, ऐसा कर पाना केवल भिक्षुओं और भिक्षुणीओं जो इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अपनी पूरी जिंदगी को समर्पित कर देते हैं, के लिए संभव होता है। उन्होने भगवान बुद्ध की मूल शिक्षाओं को यथासंभव लिखित सामग्री के रूप में संरक्षित करने का प्रयास किया। महायान बौद्ध धर्म जो थेरवाद बौद्ध धर्म अथवा रूढ़िवादी संप्रदाय जिसे हीनयान भी कहा जाता है की तुलना में अधिक लचीला और अभिनव है । यह समाज में बदलाव लाने की दिशा में एक बहुत अधिक नैतिक और सक्रिय भूमिका का चुनाव करता है।
महायान बौद्ध धर्म सिर्फ बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणीओ तक ही सीमित नहीं है वरन यह जीवन के सभी क्षेत्रों से आए लोगों के लिए उपलब्ध है और यह जो एक मार्ग है। महायान बौद्ध धर्म में प्रायः विभिन्न नियमों का समावेश किया गया है, जैसे कि दिव्य प्राणी की आराधना, उदाहरणार्थ गौतम बुद्ध और बोधिसत्व, विभिन्न समारोहों, धार्मिक अनुष्ठान, तंत्र-मंत्र, कर्मकांड का आयोजन करना आदि ।
बुद्ध उस युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे। सैकड़ों वर्षों के दौरान उनके संदेश पूरे उपमहाद्वीप में और उसके बाद मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान, श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार,थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैले। बुद्ध की शिक्षाओं की पुनर्रचना का आधार था बोद्ध ग्रंथों का बहुत परिश्रम से संपादन, अनुवाद और विश्लेषण किया जाना। इतिहासकारों ने उनके जीवन के बारे में चरित लेखन से जानकारी एकत्र की। इनमें से कई ग्रंथ बुद्ध के जीवन काल से लगभग सौ वर्षों वेफ बाद लिखे गए। इनमें इस महान धर्मोपदेशक की याद को बनाए रखने की कोशिश की गई थी। इन परंपराओं के अनुसार सिद्धार्थ (बुद्ध के बचपन का नाम) शाक्य कबीले के सरदार के बेटे थे। जीवन के कटु यथार्थों से दूर उन्हें महल की चारदीवारी के अंदर सब सुखों के बीच बड़ा किया गया। एक दिन उन्होंने अपने रथकार को उन्हें शहर घुमाने के लिए मना लिया। बाहरी दुनिया की उनकी पहली यात्रा काफी पीड़ादायक रही। एक वृद्ध व्यक्ति को, एक बीमार को और एक लाश को देखकर उन्हें गहरा सदमा पहुँचा। उसी क्षण उन्हें यह अनुभूति हुई कि मनुष्य के शरीर का क्षय और अंत निश्चित है। उन्होंने एक गृहत्याग किए संन्यासी को भी देखा उसे मानो बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु से कोई परेशानी नहीं थी और उसने शांति प्राप्त कर ली थी। सिद्धार्थ ने निश्चय किया कि वे भी संन्यास का रास्ता अपनाएँगे। कुछ समय के बाद महल त्याग कर वे अपने सत्य की खोज में निकल गए।सिद्धार्थ ने साधना के कई मार्गों का अन्वेषण किया। इनमें एक था शरीर को अधिक से अधिक कष्ट देना जिसके चलते वे मरते-मरते बचे। इन अतिवादी तरीकों को त्यागकर, उन्होंने कई दिन तक ध्यान करते हुए अंततः ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद से उन्हें बुद्ध अथवा ज्ञानी व्यक्ति के नाम से जाना गया है। बाकी जीवन उन्होंने धर्म या सम्यक जीवनयापन की शिक्षा दी।
पारंपरिक विवरण के अनुसार, पैंतालीस साल की लंबी अवधि तक अपने संदेश का प्रचार करने के बाद, गौतम बुद्ध का कुशीनगर में अस्सी साल की आयु में निधन हो गया।बुद्ध की पार्थीव देह का अंतिम संस्कार कर दिया गया और और उनके अवशेषों के हिस्से उनके अनुयायियों के समूहों में बाँट दिये गए। पवित्र अवशेषों को एक बड़े अर्धगोलाकार जीवाश्म टीले (स्तूप) में प्रतिष्ठापित कर दिया गया। निहित थे जिनमें से कईं महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल बन गए जैसे कि सांची, अमरावती, भरहुत और शाहजी-की-ढ़ेरी (पाकिस्तान में पेशावर में)।
बुद्ध की शिक्षाओं को सुत्त पिटक में दी गई कहानियों के आधार पर पुनर्निर्मित किया गया है। हालाँकि कुछ कहानियों में उनकी अलौकिक शक्तियों का वर्णन है, दूसरी कथाएँ दिखाती हैं कि अलौकिक शक्तियों की बजाय बुद्ध ने लोगों को विवेक और तर्क के आधार पर समझाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए, जब एक मरे हुए बच्चे की शोकमग्न माँ बुद्ध के पास आई तो उन्होंने बच्चे को जीवित करने के बजाय उस महिला को मृत्यु के अवश्यंभावी होने की बात समझायी। ये कथाएँ आम जनता की भाषा में रची गई थीं जिससे इन्हें आसानी से समझा जा सकता था।
बुद्ध ने अपने दर्शन को व्यावहारिक बनाया। उन्होने सभी प्राणियों के सुखद जीवन को अपना लक्ष्य बनाया।बोद्ध दर्शन के अनुसार विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है, यह आत्माविहीन (आत्मा) है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है। इस क्षणभंगुर दुनिया में दुख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्व है। घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुनिया के दुखों से मुक्ति पा सकता है।
बौद्ध दर्शन अनेक परंपरागत धारणाओं यथा- अनीश्वरवाद, ईश्वरवाद, अद्वैतवाद, और द्वैतवाद का विरोध करता है। बौद्ध धर्म की प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था। बुद्ध मानते थे कि समाज का निर्माण इनसानों ने किया था न कि ईश्वर ने। इसीलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह दी। ऐसा माना जाता था कि व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश को बदला जा सकता था।
बुद्ध ने जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति, आत्म-ज्ञान और निर्वाण के लिए व्यक्ति-केन्द्रित हस्तक्षेप और सम्यक कर्म की कल्पना की।
बौद्ध परंपरा ने निर्वाण पर बल दिया जीसका मतलब था अहं और इच्छा का खत्म हो जाना जिससे गृहत्याग करने वालों के दुख के चक्र का अंत हो सकता था। बौद्ध परंपरा के अनुसार अपने शिष्यों के लिए उनका अंतिम निर्देश था, ‘तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है’।
नैतिकता और एक अच्छा जीवन जीने पर बुद्ध की शिक्षाओं का सामाजिक और राजनीतिक दायरे में भी प्रसार हुआ। वे कई मायनों में अपने समय से आगे थे; सभी लोगों को समान मानते हुए उन्होने जाति-प्रथा का बहिष्कार किया और महिलाओं को शिष्या एवं शिक्षिका बनने हेतु सार्वजनिक रूप से प्रेरित किया। बोद्ध परंपरा की मुख्य शिक्षाओं में अष्टांगिक मार्ग सम्मिलित है। ये अष्टांगिक मार्ग हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि।
उस समय जब सांची और भरहुत (दोनों वर्तमान के भारतीय राज्य मध्य प्रदेश में स्थित हैं )अमरावती(वर्तमान के आधुनिक भारतीय राज्य आंध्र प्रदेश में स्थित)और शाह जी की ढेरी (वर्तमान में पाकिस्तान के जिले पेशावर में स्थित) जैसे स्थल अपना वर्तमान स्वरूप प्राप्त कर रहे थे, तब देवी-देवताओं को प्रतिष्ठापित करने हेतु प्रथम हिन्दू मंदिरों का भी निर्माण किया जा रहा था।दोनों उत्तर एवं दक्षिण भारत में मंदिरों का निर्माण अनिवार्यतः एक ही शैली में किया गया था।शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था। इनमें एक दरवाजा होता था जिससे उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए भीतर प्रविष्ट हो सकता था। धीरे – धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा जिसे शिखर कहा जाता था।
समय व्यतीत होने के साथ-साथ प्राचीन भारत में मंदिरों का स्वरूप और अधिक जटिल रूप लेने लगा। लघु मंदिर विशाल मंदिर परिसर का रूप लेने लगे। नई विशेषताओं के रूप में मंदिर की दीवारों पर अक्सर भित्ति चित्र उत्कीर्ण किए जाते थे। बाद के युगों में मंदिरों के स्थापत्य का काफी विकास हुआ। अब मंदिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी जुड़ गए। जल आपूर्ति का इंतजाम भी किया जाने लगा। पांचवीं शताब्दी के दौरान देवगढ़ (आधुनिक भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में निर्मित एक मंदिर) इस शैली का विशिष्ट उदाहरण है।
शुरू-शुरू के मंदिरों की एक खास बात यह थी कि इनमें से कुछ पहाडि़यों को काट कर खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे। कृत्रिम गुफाएँ बनाने की परंपरा काफी पुरानी थी। सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में अशोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं। यह संप्रदाय बौद्ध और जैन धर्मों का समकालीन संप्रदाय था। एक तक्षण मंदिर का सबसे अच्छा उदाहरण एलोरा(वर्तमान भारतीय राज्य महाराष्ट्र में स्थित)में स्थित है जो भगवान कैलाशनाथ(भगवान शिव का एक नाम) को समर्पित है।
इसका सबसे विकसित रूप हमें आठवीं सदी के कैलाशनाथ (शिव का एक नाम) के मंदिर में नजर आता है जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर उसे मंदिर का रूप दे दिया गया था।
भगवान शिव के हिमालय- कैलाश पर्वत का प्रतिनिधित्व करता यह मंदिर उत्कृष्टता के साथ गढ़ा गया है और यह प्राचीन भारतीय वास्तुकला के इतिहास में सबसे आश्चर्यजनक 'इमारतों में से एक माना जाता है।
एक ताम्रपत्र अभिलेख एलोरा के प्रमुख तक्षक द्वारा इसका निर्माण समाप्त करने के बाद उसके आश्चर्य को व्यक्त करता है ‘हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया!
A. शेख अली हाज़िन
B. महमूद वाली बल्खी
C. शेख इतिसमुद्दीन
D. मिर्ज़ा अबु तालिब
महमूद वाली बल्खी, जो बल्ख से आया था, भारत में 1626-31 ईस्वी तक रहा|
A.
अल-बिरूनी
B.
सयदी अली रेइस
C.
अब्दुर रज्जाक समरकंदी
D.
इब्न बत्तुता
मुहम्मद बिन तुग़लक, जो इब्न बत्तुता की विद्वता से प्रभावित हुए, उसे अपने साम्राज्य में काज़ी नियुक्त किया|
A.
डेनिस लौरेंदो
B. फ्रांस्वा रू
C. फ्रांस्वा बर्नीयर
D. मार्क-फ्रांस्वा बर्नीयर
फ्रांस्वा बर्नीयर, एक फ्रांसीसी यात्री, अवसर पाने हेतु, भारत आया| वह 12 साल तक (1656-68 ईस्वी) भारत में रहा, और मुग़ल दरबार से, नजदीकी रूप से, जुडा हुआ था|
A.
प्राकृत ग्रन्थ
B.
पाली ग्रन्थ
C.
संस्कृत ग्रन्थ
D.
तमिल ग्रन्थ
अल-बिरूनी ने अन्य समुदायों में प्रतिरूपों की खोज के माध्यम से जाति व्यवस्था को समझने और व्याख्या करने का प्रयास किया। उसने लिखा कि प्राचीन ़ाफारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थीः घुड़सवार और शासक वर्ग, भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक, खगोल शास्त्राी तथा अन्य वैज्ञानिक और अंत में कृषक तथा शिल्पकार।
A.
अमेरिका
B.
इंग्लैंड
C.
फ्रांस
D.
जर्मनी
बाद में, बर्नियर के कार्य को अन्य भाषाओँ में अनुवाद किया गया – अंग्रेजी, डच, जर्मन और इतावली| उसने अपने प्रमुख कार्य लुई 14वां को समर्पित किया|
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी की अवधि के दौरान, जो लोग जंगलों में रह रहे थे, उनको जंगली कहकर बुलाया जाता था। यह शब्द उन लोगों का वर्णन करता है, जिनकी आजीविका वन उपज के संग्रहण, शिकार और स्थान्तरित कृषि पर निर्भर करती थी, वे जंगल की जनजातियाँ होती थीं।
चूंकि किसान अपने बारे में खुद नहीं लिखा करते थे इसलिए ग्रामीण समाज के क्रियाकलापों की जानकारी हमें उन लोगों से नहीं मिलती जो खेतों में काम करते थे। नतीजतन, सोलहवीं और सत्राहवीं सदियों के कृषि इतिहास को समझने के लिए हमारे मुख्य स्त्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ व दस्तावेज हैं जो मुगल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे। इसके अलावा प्रसिद्ध लेखकों और यात्रियों के विवरण भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
अठारहवीं सदी के स्त्रोत बताते हैं कि बंगाल में जमींदार उनकी सेवाओं के बदले लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे। इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे। एक विस्तृत प्रणाली थी जो आवश्यकता और विनिमय के आधार पर कार्य करती थी; मुख्य रूप से भू-खंड या अनाज को मुआवजे के रूप में निर्धारित किया जाता था ।
सत्रहवीं सदी के स्रोत, भारत में मुख्य रूप से तीन प्रकार के किसानों 1. खुदकाश्त 2. पाहिकाश्त एवं 3. मुजारियन का उल्लेख करते हैं ।
मुगल काल में कपास, गन्ना जैसी नकदी फसलों को जिन्स-ए-कामिल अथवा जिन्स-ए-आला के रूप में जाना जाता था।
शाहजहां वर्ष 1628 ई. में मुगल बादशाह बना था।
सम्राट जहांगीर ने 1605 से 1627 ईसवी तक शासन किया था
मुकद्धम
मनसबदारी प्रथा का प्रचलन मुग़ल काल में था ।
मुग़ल वंश का संस्थापक बाबर था |
शेरशाह द्वारा प्रचलित की गयी ताँबे की मुद्रा का नाम दाम था ।
कृषकों को भूमि के पट्टों पर मालगुजारी की दर लिखी जिससे सरकारी कर्मचारी उन्हें लूट न सके ।
दीवान-ए-बरीद जासूस विभाग को कहते थे |
शेरशाह ने भूमि की पैमाइश के लिए सर्वप्रथम सिकन्दरी गज से भूमि की पैमाइश कराई ।
न्याय के प्रधान को काजी-उल-कुजात कहते है । यह कुरान के आधार पर न्याय करता था।
सुल्तान-ए-आदिल का अर्थ है न्यायकारी सम्राट से है शेरशाह ने सुल्तान-ए-आदिल की उपाधि धारण की थी ।
जहाँगीर ने नूरजहाँ से 1611 ई० में विवाह किया था।
दवारबख्श, खुसरो का अल्पवयस्क पुत्र था ।
अब्दाल छोटा तिब्बत एक पहाड़ी क्षेत्र का शासक था।
तारागढ़ दुर्ग का निर्माण जगत सिंह ने कराया था ।
A. यमुना नदी
B. गंगा नदी
C. कावेरी नदी
D. तुंगभद्रा नदी
विजयनगर तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित है|
विजयनगर साम्राज्य 1336 में स्थापित किया गया था|
विजय नगर
1. संगम वंश 2. तुलुव वंश
हरिहर एवं बुक्का।
तेलुगू भाषा में।
विजय नगर के राजकीय केन्द्र हम्पी में।
1. गोपुरम (प्रवेश द्वारों) की मौजदूगी।2. विशाल मण्डपों व लंबे गलियारों की उपस्थिति।
डोमिंगो पेस, विजयनगर साम्राज्य की यात्रा करने वाला पुर्तगाली यात्री था।
बहमनी राज्य के मुहम्मद शाह III के वजीर का नाम, महमूद गवां था।
बहमनी राज्य की स्थापना अलाउद्दीन हसन द्वारा, अलाउद्दीन बहमन शाह की उपाधि के साथ की गई थी
तालीकोटा का युद्ध, विजयनगर साम्राज्य के पतन के कारण के रूप में चिन्हित है
रायचूर दोआब, विजयनगर और बहमनी राज्यों के मध्य विवाद का स्थायी विषय था।
हरिहर और बुक्का नामक भाइयों ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की थी।
उसने शासनकला के विषय में अमुक्तमल्यद नामक तेलुगु भाषा में एक कृति लिखी थी।
विजयनगर का सबसे प्रसिद्ध शासक कृष्णदेव राय (शासनकाल 1509-29) था ।
यवन संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका प्रयोग यूनानियों तथा उत्तर-पश्चिम से उपमहाद्वीप में आने वाले अन्य लोगों के लिए किया जाता था।
विजयनगर साम्राज्य में राजा को राय कहा गया जो सैनिकों व असैनिक अधिकारियों को विशिष्ट सेवाओं के बदले भूमि प्रदान करते थे । यह अधिकारी नायक कहलाते थे।
सन् 1800 में कर्नल कालिन मैकेन्जी जो एक अभियंता थे तथा एक पुराविद ने हम्पी की खोज की।
कृष्णदेव राय ने विद्रोही सरदारों का दमन किया। रायचूर दोआब पर अधिकार स्थापित किया। उड़ीसा के शासकों व बीजापुर के सुल्तान को भी पराजित किया।
बहमनी व विजयनगर राज्य के बीच मतभेद के निम्नलिखित कारण थे -
दोआब पर आधिपत्य
कारण – बहुत उपजाऊ क्षेत्र था ।
सिंचाई व जल समस्या का समाधान हो सकता था ।
अधिक लगान प्राप्त हो सकता था ।
हीरे की खानों पर अधिकार – गोलकुंडा में हीरे की खानें स्थित थीं । गोलकुंडा बहमनी राज्य की सीमा में आता था। विजय नगर के शासक इस पर अधिकार करना चाहते थे ।
शासकों कि महत्वाकांक्षा – दोनों ही राज्य के शासक प्रायदीप पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे
कृष्णदेव राय के शासनकाल के दौरान, विजयनगर अपनी कीर्ति के शिखर पर पहुंच गया और दक्षिण भारत में स्वयं को सबसे सशक्त सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित किया,वह एक प्रतिभाशाली सेनापति था, उसने कईं उल्लेखनीय विजय प्राप्त की थी, एवं साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया था, उसने रायचूर दोआब, का विलय किया था, रायचूर दोआब, विजयनगर और बहमनी राज्यों के मध्य विवाद का स्थायी विषय था।
कृष्णदेव राय ने पुर्तगालीयों के साथ विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित किया था,उसने, विदेशी व्यापार पर सीमा शुल्क और अन्य करारोपण कर राजस्व में वृद्धि की थी, उसने सिंचाई सुविधाओं का विस्तार कर कृषि को बढ़ावा दिया था, ऐसा बांधों और नहरों के निर्माण द्वारा किया गया था ।
कृष्णदेव राय कला और साहित्य का महान संरक्षक था, वह स्वयं एक उत्कृष्ट तेलगु कवि एवं संस्कृत का विद्वान था, उसने कवियों एवं विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया था एवं प्रोत्साहित किया था ।
कृष्णदेव राय ने कई खूबसूरत मंदिरों एवं प्रभावशाली भवनों का निर्माण करवाया था, उसने विठ्ठलस्वामी मंदिर और हजार स्तंभ मंदिर ( हज़ार राम मंदिर ) का निर्माण करवाया था।
उन यात्रियों का विवरण दीजिए जिंहोने विजयनगर साम्राज्य का दौरा किया था।
कईं यात्रियों ने विजयनगर की यात्रा की और अपना यात्रा विवरण लिखा। इनमें सबसे उल्लेखनीय वृत्तांत निकोलो दे कॉन्ती नामक इतालवी व्यापारी, अब्दुर रज़्ज़ाक नामक फारस के राजा का दूत, अफानासी निकितिन नामक रूस का एक व्यापारी, जिन सभी ने पंद्रहवीं शताब्दी में शहर की यात्रा की थी, और दुआर्ते बरबोसा, डोमिंगो पेस तथा पुर्तगाल का फर्नावो नूनिज़, जो सभी सोलहवीं शताब्दी में आए थे, के हैं। फ्रेडरिक सीज़र एक यात्री था जिसने तालिकोट के युद्ध के तुरंत बाद ही विजयनगर साम्राज्य का दौरा किया था और अपने विवरण में सभी प्रचलित घटनाक्रम का विवरण दिया था।
विजयनगर अथवा विजय का शहर एक शहर और एक साम्राज्य दोनों के लिए प्रयुक्त होने वाला नाम था। विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई. में दो भाइयों हरिहर तथा बुक्का ने की थी। इस साम्राज्य में अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले तथा अलग-अलग धार्मिक परम्पराओं को मानने वाले लोग रहते थे। अपने चरमोत्कर्ष पर वह उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला हुआ था। 1565 में विजयनगर पर आक्रमणकारियों ने आक्रमण किया और उसे लूटकर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया। यद्यपि सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दियों तक यह पूरी तरह से विनष्ट हो गया था। परन्तु फिर भी कृष्णा-तुगभद्रा दोआब क्षेत्र के लोगों की यादों में यह जीवित रहा। उन्होंने इसे हंपी नाम से याद रखा। इस नाम का प्रचलन यहाँ की स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से हुआ था। इन मौखिक परम्पराओं के साथ-साथ पुरातात्विक खोजों, स्थापत्य के नमूनों, अभिलेखों तथा अन्य दस्तावेजों ने विजयनगर साम्राज्य को पुनः खोजने में विद्वानों की सहायता की।