A. आमिल-गुज़ार
B. दफ्तर
C. दीवान
D. सनद
मुग़ल शासन काल में आमिल-गुज़ार राजस्व वसूली का काम अंजाम देते थे।
A. अकबर
B. बाबर
C. जहांगीर
D. शाह जहाँ
तंबाकू के पौधे शुरुवाती सत्रहवीं शताब्दी में भारत आए। सत्रहवीं सदी के अंत तक, तंबाकू - सेवन, खेती और व्यापर की एक अहम् वस्तु बन गई थी।
A. महाद्वीपीय दुनिया
B. मध्य दुनिया
C. नयी दुनिया
D. पुरानी दुनिया
नई दुनिया विशेष रूप से पृथ्वी के गैर-एफ्रो-यूरेशियाई भागों, ख़ास तौर से अमेरिका के लिए प्रयोग किया जाता है। सत्रहवीं सदी के दौरान, अनानास और पपीता जैसे फल भारत में पहुंचे थे।
A. पहली और दूसरी जिल्द
B. दूसरी और तीसरी जिल्द
C. तीसरी और चौथी जिल्द
D. चौथी और पांचवी जिल्द
चौथी और पांचवी (दफ्तर) किताबों में भारत के लोगों की धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं के बारे में चर्चा है।
A. कपास उत्पादन
B. जूट उत्पादन
C. मक्का उत्पादन
D. धान उत्पादन
ज़मीन की बहुतायत, मजदूरों की मौजूदगी, और किसानों की गतिशीलता की वजह से कृषि का लगातार विस्तार हुआ। चूंकि खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए रोज़मर्रा के खाने की जरूरतें जैसे चावल, गेहूँ, ज्वार इत्यादि फसलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं।
A. मंज़िल -आबादी
B. सिपाह -आबादी
C. मुल्क -आबादी
D. दफ्तर
दूसरी पुस्तक (सिपाह-आबादी) सैन्य और नागरिक प्रशासन और नौकर की स्थापना शामिल हैं। इस में सूचना और शाही अधिकारियों (मनसबदार), विद्वान पुरुषों, कवियों और कलाकारों की लघु जीवनी नमूने भी शामिल है।
A. 33 फीसदी
B. 34 फीसदी
C. 35 फीसदी
D. 36 फीसदी
जनसंख्या वृद्धि की गणना आर्थिक इतिहासकारों द्वारा की गई थी। वे मुगल शासन के दौरान कृषि समृद्धि को इस वृद्धि का ज़िम्मेदार मानते हैं।
A. अफ़ग़ानिस्तान
B. नेपाल
C. रंगून
D. श्रीलंका
अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के खिलाफ अदालत में मुक़द्दमा चला और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उनके पुत्रों की उनके सामने गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। उन्हें व उनकी पत्नी ज़ीनत महल को अक्टूबर 1858 में रंगून जेल भेज दिया गया। बहादुर शाह ज़फर की मृत्यु 1862 में रंगून जेल में हुई।
A. साम्राज्य के प्रशासन
B. साम्राज्य के नागरिक प्रशासन
C. साम्राज्य के सांस्कृतिक परंपराओं
D. साम्राज्य का राजकोषीय पक्ष
मुल्क-आबादी, वह भाग है जो साम्राज्य व प्रांतों के वित्तीय पहलुओं तथा राजस्व की दरों के आँकड़ों की विस्तृत जानकारी देने के बाद "बारह प्रांतों का बयान" देता है।
A. चौदहवीं सदी
B. पन्द्रवीं सदी
C. सोलहवीं सदी
D. सत्रहवीं सदी
सत्राहवीं सदी के स्रोत दो किस्म के किसानों की चर्चा करते हैं - खुद-काश्त व पाहि-काश्त। पहले किस्म के किसान वे थे जो उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थीं। दूसरे (पाहि-काश्त) वे खेतिहर थे जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे।
A. दो -फसला
B. खुद -काश्त
C. पाहि-काश्त
D. रैय्यत
मुग़ल काल के भारतीय-फारसी स्रोत किसान के लिए आमतौर पर रैयत (बहुवचन, रिआया) या मुज़रियान शब्द का इस्तेमाल करते थे। सत्रहवीं सदी में दो क़िस्म के किसान होते थे - खुद-काश्त और पाहि-काश्त।
A. 1853
B. 1854
C. 1856
D. 1858
बहादुर शाह द्वितीय - अंतिम मुगल सम्राट थे। उन्हें 1858 में अंग्रेजों द्वारा अपदस्त करके रंगून(मौजूदा यांगून, म्यांमार) भेज दिया गया था।
A. आगरा
B. बंगाल
C. दिल्ली
D. पंजाब
कुछ इलाक़ों में बारिश या सिचाई के पानी की लगातार उपलब्धि से विविध प्रकार की फसलें उगाई जाती थीं।
जूझार सिंह बुन्देला के पिता का नाम वीर सिंह बुन्देला था।
नूरजहाँ ने अपनी लाडली बेगम का विवाह शहरयार के साथ किया ।
अकबरनामा की आत्मा आइन-ए-अकबरी की रचना, अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल-फजल द्वारा की गयी थी।
1. सिजदा व कदमबोसी 2. चार तस्लीम
जहीरउद्धीन बाबर।
मुकद्धम
अकबर नामा एवं आइन-ए-अकबरी
अब्दूररज्जाक
महान मुगल शासक अकबर ने, गुजरात पर अपनी विजय के उपलक्ष में, फतेहपुर सीकरी का बुलन्द दरवाजा निर्मित करवाया था।
अकबर द्वारा 1601 ई. में अपनी दक्षिण विजय के बाद फतहपुर सीकरी में इस दरवाजे का निर्माण कराया गया । यह विश्व के विशाल दरवाजों में एक है।
जदुनाथ सरकार ने मुग़ल राज्य को कागजी राज्य कहकर संबोधित करते हैं ।
अकबर ने जल सेना का एक पृथक विभाग स्थापित किया था जल सेना का प्रमुख अधिकारी आमीर-उल-बहर कहलाता था ।
दीवान की नियुक्ति, दीवान-ए-अशरफ सम्राट की अनुमति से करता था |
मीर आतिश को दरोगा-ए-तोपखाना भी कहा जाता था पहले यह मीर बख्शी के अधीन होता था ।
मीर बख्शी को अफसर-ए-खजाना भी कहा जाता था मीर बख्शी का मुख्य कार्य सैनिकों को वेतन देना था ।
सद्रे-उल-सुदूर का सम्बन्ध धार्मिक धन-सम्बन्धी निर्धारण तथा दान विभाग से था।
रडयार्ड किपलिंग की जंगल बुक के युवा नायक मोगली के नाम का व्युत्पन्न भी शब्द मुगल से हुआ माना जाता है।
बहादुरशाह जफर द्वितीय मुगल वंश का अंतिम शासक था।
इतिहासकारों के अनुसार विभिन्न उत्पादकों के मध्य व्यापक तौर पर विनिमय होता था। किसान और दस्तकार -रँगरेजी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतनों को पकाना, खेती के औजारों को बनाना या उनकी मरम्मत करना आदि कार्य करते थे। कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार जैसे ग्रामीण दस्तकार भी अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे जिसके बदले गाँव वाले उन्हें अलग-अलग तरीकों से उन सेवाओं की अदायगी करते थे। आमतौर पर तो उन्हें फसल का एक हिस्सा दे दिया जाता था।
ईरानी यात्री अब्दुर्रज्जाक व इतालवी यात्री डोमिंगो पाएस ने विजयनगर कि यात्रा की थी । इनके यात्रा वृतांत विजयनगर के इतिहास को जानने का एक प्रमुख स्रोत हैं ।
बहमनी राज्य की स्थापना 1347 में हसन गंगू ने की ।
क. गलत ।
ख. गलत ।
ग. सही ।
ध. गलत ।
बहमनी शासकों ने, राज्य के मुख्य धर्म के रूप में इस्लाम को अपनाया था, गुलबर्ग और बीदर के राजधानी शहरों में कई खूबसूरत मस्जिदों का निर्माण किया गया था, शासकों ने, इस्लामी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मदरसों एवं पुस्तकालयों की स्थापना करवाई थी, फारसी और अरबी भाषाओं का प्रयोग दरबार की भाषा के रूप में किया जाता था, ये सभी कारक, दक्षिण में इस्लाम के उदय में सहायक थे।
हम्पी विजयनगर की राजधानी थी,राजधानी शहर, सात दीवारों से घिरा हुआ था, और इसकी परिधि 96 किलोमीटर की थी,शहर में बगीचे, झील,भवन और मंदिर स्थित थे,हम्पी का वीरूपक्ष मंदिर एक प्रसिद्ध मंदिर था। हीरे, माणिक, मोती और पन्ने, का राजधानी के बाजार में विक्रय किया जाता था।
बहमनी राज्य के अमीर एक दूसरे के साथ संघर्षरत रहा करते थे, राज्य में दो प्रकार के अमीर हुआ करते थे, एक तरफ दक्कनी अथवा स्थानीय अमीर तथा दूसरी तरफ परदेसी अथवा विदेशी अमीर हुआ करते थे, अमीरों के मध्य संघर्ष ने बहमनी साम्राज्य के पतन का नेतृत्व किया।
तालीकोटा का युद्ध, विजयनगर और पांच राज्यों-बीजापुर, अहमदनगर, बरार, गोलकुंडा और बीदर की सामूहिक शक्तियों के मध्य लड़ा गया था, बहमनी राज्य के गठजोड़ ने, विजयनगर साम्राज्य को बुरी तरह से परास्त कर दिया, तालीकोटा के युद्ध ने, दक्षिण में हिन्दू साम्राज्य के पतन को चिह्नित किया।
मुहम्मद बिन- तुगलक काल में दक्षिण में विद्रोह हो गया उन्होंने सुल्तान की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया और दो नये राज्यों का उदय हुआ ये निम्न प्रकार है –
1 - विजय नगर राज्य ।
2 - बहमनी राज्य ।
हालाँकि विजयनगर शहर के विध्वंस के लिए सुल्तानों की सेनाएँ उत्तरदायी थीं, फिर भी सुलतानों और रायों के संबंध धार्मिक भिन्नताएँ होने पर भी हमेशा या अपरिहार्य रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं रहते थे। उदाहरण के लिए कृष्णदेव राय ने सल्तनतों में सत्ता के कई दावेदारों का समर्थन किया और यवन राज्य की स्थापना करने वाला विरुद धारण करके गौरव महसूस किया। इसी प्रकार, बीजापुर के सुल्तान ने कृष्णदेव राय की मृत्यु के पश्चात विजयनगर में उत्तराधिकार के विवाद को सुलझाने के लिए हस्तक्षेप किया। वास्तव में विजयनगर शासक और सल्तनतें दोनों ही एक-दूसरे के स्थायित्व को निश्चित करने की इच्छुक थीं। यह रामराय की जोखिम भरी नीति थी, जिसके अनुसार उसने एक सुलतान को दूसरे के विरुद्ध करने की कोशिश की किन्तु वे सुल्तान एक हो गए और उन्होंने उसे निर्णायक रूप से पराजित कर किया।
विजयनगर मसालों, वस्त्रों तथा रत्नों के अपने बाजारों के लिए प्रसिद्ध था। ऐसे शहरों के लिए व्यापार एक प्रतिष्ठा का मानक माना जाता था। यहाँ की समृद्ध जनता मँहगी विदेशी वस्तुओं की माँग करती थी विशेष रूप से रत्नों और आभूषणों की। दूसरी ओर व्यापार से प्राप्त राजस्व राज्य की समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान देता था।
अक्सर मध्यकालीन घेराबंदियों का मुख्य उद्देश्य प्रतिपक्ष को खाद्य सामग्री से वंचित कर समर्पण के लिए बाध्य करना होता था।ये घेराबंदियाँ कई महीनों और यहाँ तक कि वर्षों तक चल सकती थीं।आम तौर पर शासक ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए किलेबंद क्षेत्रों के भीतर ही विशाल अन्नागारों का निर्माण करवाते थे। विजयनगर के शासकों ने पूरे कृषि भूभाग को बचाने के लिए कृषि-क्षेत्रों को किलेबंद भूभाग में समाहित करने के रूप में एक अधिक मँहगी तथा व्यापक नीति को अपनाया।
क) कमल महल ख) विरूपाक्ष मंदिर ग) हजार राम मंदिर घ) कल्याण मंडप
बहमनी व विजय नगर राज्यों की आय का प्रमुख स्रोत भूमि लगान था । कृषकों से उत्पादन का एक भाग निर्धारित दर से लिया जाता था जो की 1 /10 से 1 /2 हो सकता था । अतिरिक्त कर भी लगाये गए थे जिनमें सिंचाई कर प्रमुख था । इसके अलावा व्यापार भी राज्य की आय का एक प्रमुख साधन था । व्यापारियों को अपनी वस्तुओं के मूल्य के अनुपात में निर्धारित कर देना पड़ता था ।
रायचूर दोआब कृष्णा व तुंगभद्रा नदी के मध्य स्थित था । यह बहुत ही उपजाऊ क्षेत्र था । दोनों ही राज्य इस पर अपना आधिपत्य करना चाहते थे । अपने अधिक उर्वरता के कारण यह आय का धनी स्रोत था । क्योंकि भूमि लगान राजस्व का एक प्रमुख स्रोत था, इसलिए इस दोआब के लिए दोनों राज्यों में कई बार युद्ध हुए ।
सामाजिक व्यवस्था- विजयनगर में प्राचीन वैदिक प्रथाओं का अनुसरण किया जाता था, समाज रूढ़िवादी था और प्राचीन धार्मिक मानदंडों का अनुसरण करता था, समाज में जाति व्यवस्था विद्यमान थी, जो प्रकृति में कठोर थी, अधिकाँश उच्च पदों पर उच्च जाति के लोग अथवा ब्राह्मण पदासीन थे।
महिलाओं की स्थिति - महिलाओं की समाज में एक सम्मानजनक स्थिति थी, अधिकाँश महिलाएं, स्वतंत्रता का उपभोग नहीं करती थी,बाल विवाह, बहुविवाह और सती जैसी प्रथाओं का विजयनगर के लोगों द्वारा सामान्यतः पालन किया जाता था, उच्च वर्गीय महिलाएं, समाज में उच्च पदों पर आसीन हो सकती थीं।
अमर-नायक प्रणाली विजयनगर साम्राज्य की एक प्रमुख राजनीतिक खोज थी। ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रणाली के कई तत्त्व दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लिए गए थे। अमर-नायक सैनिक कमांडर थे जिन्हें राय द्वारा प्रशासन के लिए राज्य-क्षेत्र दिये जाते थे। वे किसानों, शिल्पकर्मियों तथा व्यापारियों से भू राजस्व तथा अन्य कर वसूल करते थे। वे राजस्व का कुछ भाग व्यक्तिगत उपयोग तथा घोड़ों और हाथियों के निर्धारित दल के रख-रखाव के लिए अपने पास रख लेते थे। ये दल विजयनगर शासकों को एक प्रभावी सैनिक शक्ति प्रदान करने में सहायक होते थे जिसकी मदद से उन्होंने पूरे दक्षिणी प्रायद्वीप को अपने नियंत्रण में किया। राजस्व का कुछ भाग मन्दिरों तथा सिचाई के साधनों के रख-रखाव के लिए खर्च किया जाता था। अमर-नायक राजा को वर्ष में एक बार भेंट भेजा करते थे और अपनी स्वामिभक्ति प्रकट करने के लिए राजकीय दरबार में उपहारों के साथ स्वयं उपस्थित हुआ करते थे। राजा कभी-कभी उन्हें एक से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर उन पर अपना नियंत्रण दर्शाता था पर सत्रहवीं शताब्दी में इनमें से कई नायकों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए। इस कारण केंद्रीय राजकीय ढाँचे का विघटन तेजी से होने लगा।
विजयनगर के सबसे प्रसिद्ध शासक कृष्णदेव राय (शासनकाल 1509-29) ने शासनकला के विषय में अमुक्तमल्यद नामक तेलुगु भाषा में एक कृति लिखी। व्यापारियों के विषय में उसने लिखाः एक राजा को अपने बन्दरगाहों को सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात किया जा सके... उसे प्रबंध करना चाहिए कि उन विदेशी नाविकों जिन्हें तूफानों, बीमारी या थकान वेफ कारण उनके देश में उतरना पड़ता है, की भली-भाँति देखभाल की जा सके... सुदूर देशों के व्यापारियों, जो हाथियों और अच्छे घोड़ों का आयात करते हैं, को रोज बैठक में बुलाकर, तोहफे देकर तथा उचित मुनाफे की स्वीकृति देकर अपने साथ संबद्ध करना चाहिए। ऐसा करने पर ये वस्तुएँ कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुँचेंगी।
दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य (1336-1546 ई.) ने बड़े और छोटे भंडारण टैंक के निर्माण में गहरी रुचि ली थी । अनंतराज सागर टैंक, मालदेवी नदी के पार 1.37 किलोमीटर लंबे मिट्टी के बांध के साथ बनाया गया था, प्रसिद्ध कोरंगल बांध का निर्माण, राजा कृष्णदेवराय के अधीन बनाया गया था । बहमनी शासकों ने (1388-1422 ई.) दक्कन के पूर्वी प्रांतों में पहली बार, नहर सिंचाई की शुरुआत की थी, सुल्तान जैनउद्दीन (1420-1470 ई.) ने उत्पलपुर , नादशैला , बिजबिहार और कश्मीर के कुछ क्षेत्रों में नहरों का व्यापक संजाल बिछाया था ।
कृष्णदेव राय विजयनगर के सबसे महत्त्वपूर्ण व शक्तिशाली शासक था ।
क. अपने प्रशासन के लिए प्रसिद्ध थे । उनहोंने राज्य को सल्तनत की भांति प्रान्तों में विभक्त किया व प्रशासनिक अधिकारी जिन्हें नायक कहा जाता है नियुक्त किये । उन्होंने विजयनगर का विस्तार दक्षिण पूर्वी दिशा में किया व उड़ीसा के गजपति शासकों को हराया ।
ख. कृष्णदेव राय ने पुर्तगालियों के साथ अरबी घोड़ों के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित किया । इस प्रकार दक्षिण के अन्य राज्य इससे वंचित रह गए ।
ग. कला व अर्थव्यवस्था का विकास हुआ । स्वयं लेखक थे - आमुक्त माल्यद नामक ग्रन्थ कि रचना की । मुग़ल शासक बाबर कि आत्मकथा तुजूक ए बाबरी में इनका वर्णन मिलता है ।
ध. ऐतिहासिक स्रोतों से ज्ञात होता है कि कृष्णदेव राय ने बहमनी शासक को राज्य पाने में मदद की थी । उसने इसके उपरांत यवनराजस्थापनाचार्य की उपाधि धारण की ।
A. बाबर
B. जहांगीर
C. शाह जहाँ
D. अकबर
1571 में अकबर ने फतेहपुर सीकरी का निर्माण किया था। यह आगरा में स्थित है। इसके परिसर में कई इमारतें हैं।
A. अबुल फ़ज़ल
B. फ़ैज़ी
C. टोडर मल
D. अकबर
'आईन-ए-अकबरी' अबुल फ़ज़ल द्वारा लिखी गई अकबरनामा की तीसरी जिल्द है।
A. प्रांत
B. ज़िला
C. तालुक़
D. गाँव
आईन-ए-अकबरी में मुगल साम्राज्य के प्रशासनिक तंत्र की जानकारी विस्तार से दी गई है। इसमें दर्ज है कि साम्राज्य को कई प्रांतों में बांटा गया था जिन्हें सूबा कहा जाता था।
A. जजिया था ।
B. खम्स था।
C. जकात था।
D. खिराज था।
जजिया कर उन हिन्दुओं पर लगता था जो इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं करते थे । राज्य की आय में इस कर से पर्याप्त वृद्धि होती थी। धनिक वर्ग से 48 टंका, माध्यम वर्ग से 24 टंका और साधारण लोगों से 12 टंका जजिया कर लिया जाता था।
A. बाबर ने की थी ।
B. हुमायूँ ने की थी ।
C. अकबर ने की थी ।
D. औरंगजेब ने की थी ।
मुग़ल वंश का संस्थापक बाबर तुर्की एवं फारसी का बड़ा विद्वान था बाबरनामा उसकी प्रसिद्द रचना है मुग़ल-काल में फारसी ग्रंथों की रचनाओं का बाहुल्य रहा इस काल में अनेक हिंदी एवं संस्कृत के ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद किया गया ।
A. दिल्ली के लाल किले का ।
B. दिल्ली के पुराने किले का।
C. दिल्ली के सीरी किले का ।
D. आगरा के लाल किले का ।
शेरशाह ने दिल्ली के पुराने किले का निर्माण अपने शासन काल में कराया था । 1538 ई० से 1547 ई० के बीच कराया था । पुराना किला नई दिल्ली में यमुना नदी के किनारे स्थित प्राचीन दीन-पनाह नगर का आंतरिक किला है । किले के तीन बड़े द्वार है तथा इसकी विशाल दीवार है । इसके अंदर एक मस्जिद है जिसमे दो तलीये अष्टभुजी स्तम्भ है ।
A. शांति व्यवस्था करना था।
B. बाह्य नीति की व्यवस्था करना था।
C. सुल्तान की आज्ञाओं की घोषणा करना था।
D. न्याय व्यवस्था करना था ।
सरकार में शांति स्थापित करने के लिए सर्वोच्च अधिकारी के पास एक सेना रहती थी । वह अपने अधीन परगनों के शिकदारों का निरिक्षण एवं नियंत्रण करना था तथा सम्पूर्ण सरदार की व्यस्था का भार उसपर ही रहता था ।
A. आगरा से बुरहानपुर तक।
B. आगरा से मारवाड़ तक।
C. मुल्तान से लाहौर तक।
D. बंगाल से सिंध तक ।
यह प्राचीन भारत की सड़क थी जो बंगाल में ताम्रलिप्ति बन्दरगाह से होती हुई । पाटलिपुत्र से पुरुषपुर (पेशावर) तक जाती थी । इसकी लम्बाई लगभग ४००० किलोमीटर थी। शेरशाह ने इसी सड़क को ठीक करवाया ब्रिटिश शासनकाल में यही सड़क कलकत्ता से पेशावर तक कर दी गयी और इसका नाम ग्राण्ड ट्रंक रोड रखा गया ।
A. दीवान-ए-विजरत होता था ।
B. दीवान-ए-आरिज होता था ।
C. दीवान-ए-रसालत होता था ।
D. दीवान-ए-बरीद होता था ।
दीवान-ए-विजरत प्रधान वजीर होते था इसका कार्य अर्थ-व्यस्था एवं भूमि कर की व्यवस्था करना होता था । अन्य मंत्रियों के कार्यों की देखभाल करना भी इसका दायित्व था।
A. अपनी सत्ता वापिस पाने के लिए।
B. गुरु को दीक्षा देने के लिए।
C. सूरजगढ़ पर अधिकार करने के लिए ।
D. सूरजगढ़ को लूटने के लिए।
जलाल खाँ का पिता बाहर खाँ की मृत्यु होने पर जलाल की माँ ने शेरशाह को जलाल खाँ के छोटे होने के कारण उसका संरक्षक नियुक्त किया । शेरशाह ने बिहार की लिए अच्छी व्यवस्था की। जिससे कुछ सरदारों ने युवक जलाल खाँ के कान शेरशाह के विरुद्ध भर दिए । जिस कारण जलाल खाँ ने सत्ता वापस लेने का निश्चय किया और जलाल खाँ ने शेरशाह से युद्ध किया ।
A. व्यापार से ।
B. सेना से ।
C. राजस्व से ।
D. धर्म से ।
जात और सवार का सम्बन्ध सेना से होता है । मनसबदारी प्रथा में जात और सवार होते है जात और सवार का अर्थ
1. जात पद का अर्थ है पैदल सैनिक ।
2. सवार पद का अर्थ है घुड़सवार ।
A. 1506 ई० में हुआ था ।
B. 1656 ई० में हुआ था ।
C. 1658 ई० में हुआ था ।
D. 1660 ई० में हुआ था ।
7 नवम्बर, 1627 ई० को जहाँगीर की मृत्यु के पश्चात् उत्तराधिकारी के लिए युद्ध हुआ । इस युद्ध में शाहजहाँ ने अपने सभी विरोधियों का सफाया करके 6 फ़रवरी 1628 ई० को आगरा में सिंहासनारूढ़ हुआ ।
A. वीर सिंह बुन्देला था ।
B. अब्दुल्ला खाँ था ।
C. प्रताप था ।
D. शाइस्ता खाँ था।
जहाँगीर का मित्र वीर सिंह बुन्देला था। वीर सिंह बुन्देला के मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र जुझार सिंह बुन्देला को 1627 ई० में उत्तराधिकारी के रूप में गद्दी पर बैठा था ।
A. बाबू लक्षमण था ।
B. खान दुर्रान था ।
C. अब्दुल्ला खाँ था ।
D. अमर सिंह था ।
रतनपुर का जमींदार बाबू लक्षमण था जिसे अवज्ञा करने का दण्ड देने के लिए अब्दुल्ला खाँ को भेजा गया । बाबू लक्ष्मण ने भयभीत होकर अमर सिंह की मध्यस्थता से क्षमा माँग ली तथा उसे मुग़ल दरबार में भेज दिया गया ।
A. अरजुमंद बेगम था ।
B. मह्रुनिस्सा था ।
C. हरकाबाई था ।
D. गुलबदन बेगम था।
नूरजहाँ का वास्तविक नाम मह्रुनिस्सा था । सन 1611 ई० में जहाँगीर ने मह्रुनिस्सा से विवाह करके सम्पूर्ण राज्य के कार्य मह्रुनिस्सा को सौंप दिए और मह्रुनिस्सा का नाम सम्राट जहाँगीर ने बदल कर नूरजहाँ रखा था ।
A. सूबें में सेना की व्यवस्था करना था ।
B. आमिल की शक्ति पर नियंत्रण करना था।
C. दान दी गयी भूमि का निरिक्षण करना था।
D. घटित घटनाओं का विवरण करना था ।
वितिक्ची का पद आमिल के पद का समान होता था और वह आमिल की शक्ति पर अंकुश का कार्य करता था वह प्रत्येक मौसम में लगान की दर निश्चित करता था वह अपने कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट प्रतिवर्ष केंदीय सरकार का पास भेजता था ।
A. हलकह कहलाते थे ।
B. खास कहलाते थे।
C. तैनतिया कहलाते थे।
D. हाजिरे रिकाब कहलाते थे।
अकबर ने हस्ति सेना के संगठन की ओर विशेष ध्यान दिया था क्योकि उसे हाथियों का विशेष शौक था सम्राट द्वारा प्रयोग किये जाने वाले हाथी खास कहलाते थे अन्य हाथियों की श्रेणियों को हलकह कहा जाता था।
A. फैज्दारों के लिए था।
B. जागीरदारों के लिए था ।
C. मनसबदारों के लिए था
D. काजी के लिए था।
ज़ब्ती प्रथा मुग़ल सम्राटों ने मनसबदारों के लिए अपनाई थी मृतक मनसबदारों की सम्पत्ति पर उसके पुत्रों अथवा संबंधियों के स्थान पर राज्य का अधिकार माना जाता था ।
A. कोतवाल करता था ।
B. वाकायानवीस करता था ।
C. पोतदार करता था ।
D. फौजदार करता था।
पोतदार का कार्य कृषकों से नगद धन वसूल करके शाही कोष में एकत्रित करना होता था कृषकों के धन देने पर उसे रसीद देनी पड़ती थी तथा उसका पूरा हिसाब रखना पड़ता था दीवान के हस्ताक्षर के बिना वह रूपये का भुगतान नहीं कर सकता था।
A. वकील-उल-सल्तनत होता था।
B. अफसर-ए-खजाना होता था।
C. मेरे-ए-समाँ होता था।
D. मेरे-ए-बहर होता था।
अकबर ने प्रधानमंत्री को वकील-उल-सल्तनत नाम दिया था प्रधानमंत्री को वकील मुतलक अथवा वजीरे-आला भी कहते है प्रधानमंत्री प्रमुख रूप से राजस्व विभाग की देखभाल करता था।
A. किसान
B. ज़मींदार
C. पटवारी
D. गाँव का मुख्या
मुग़ल काल के भारतीय-फ़ारसी स्रोतों में किसानों को निरूपित करने के लिए अक्सर रैय्यत या मुज़रियान का इस्तेमाल किया गया है।
A. निवासी किसान
B. अनिवासी किसान
C. भूमिहीन मजदूर
D. राजस्व अधिकारी
पाहि-काश्त दूसरे गाँवों के रहने वाले होते थे और अनुबंध के तहत खेतों में काम करने आते थे।
A. श्रमिकों की उपलब्धि
B. पहाड़ी भूमि की उपलब्धता
C. किसानों की गतिहीनता
D. अकाल का न पड़ना
श्रम की उपलब्धता कृषि के विस्तार के लिए प्राथमिक कारकों में से एक था।
A. लोगों को खिलाना
B. अधिकतम लाभ कमाना
C. दूर देशों में खाद्यान का निर्यात करना
D. नकदी फसलों को महत्व देना
कृषि का मूल उद्देश्य लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना था। प्रधान अनाज जैसे चावल, गेंहू या मोठे अनाज की खेती की जाती थी।
A. एक फसल
B. दो फसलें
C. तीन फसलें
D. चार फसलें
कृषि का आयोजन दो प्रमुख मौसमी चक्रों, खरीफ (शरद) और रबी (वसंत) के आसपास किया जाता था।
A. बाल विवाह
B. तम्बाकू
C. शराब
D. अफीम
जहांगीर ने तंबाकू की लत के कारण उस पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। लेकिन सत्रहवीं सदी के अंत तक, तम्बाकू की खपत के कारण यह प्रतिबन्ध अप्रभावी हो गया था।
A. आमिल गुज़ार
B. मुक़द्दम
C. आसामी
D. मुज़रियान
उसके कार्य में उसे गाँव का मुनीम या पटवारी सहायता प्रदान करता था।
उत्तर के पहाड़ों से सामान की मात्रा को मैदानों तक आदमी, हृष्ट-पुष्ट टट्टू, और बकरी की पीठ पर ले जाया जाता था, इसके बदले में वे वापस सफेद और रंगीन कपडे, तृणमणि, नमक, हींग, गहने, कांच और मिट्टी के बर्तन ले जाते थे ।
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी की अवधि के दौरान, जो लोग जंगलों में रह रहे थे, उनको जंगली कहकर बुलाया जाता था। यह शब्द उन लोगों का वर्णन करता है, जिनकी आजीविका वन उपज के संग्रहण, शिकार और स्थान्तरित कृषि पर निर्भर करती थी, वे जंगल की जनजातियाँ होती थीं।
अठारहवीं सदी के स्त्रोत बताते हैं कि बंगाल में जमींदार उनकी सेवाओं के बदले लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे। इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे। एक विस्तृत प्रणाली थी जो आवश्यकता और विनिमय के आधार पर कार्य करती थी; मुख्य रूप से भू-खंड या अनाज को मुआवजे के रूप में निर्धारित किया जाता था ।
सत्रहवीं सदी के स्रोत, भारत में मुख्य रूप से तीन प्रकार के किसानों 1. खुदकाश्त 2. पाहिकाश्त एवं 3. मुजारियन का उल्लेख करते हैं ।
मुगल काल में कपास, गन्ना जैसी नकदी फसलों को जिन्स-ए-कामिल अथवा जिन्स-ए-आला के रूप में जाना जाता था।
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी की अवधि के दौरान, जो लोग जंगलों में रह रहे थे, उनको जंगली कहकर बुलाया जाता था। यह शब्द उन लोगों का वर्णन करता है, जिनकी आजीविका वन उपज के संग्रहण, शिकार और स्थान्तरित कृषि पर निर्भर करती थी, वे जंगल की जनजातियाँ होती थीं।
चूंकि किसान अपने बारे में खुद नहीं लिखा करते थे इसलिए ग्रामीण समाज के क्रियाकलापों की जानकारी हमें उन लोगों से नहीं मिलती जो खेतों में काम करते थे। नतीजतन, सोलहवीं और सत्राहवीं सदियों के कृषि इतिहास को समझने के लिए हमारे मुख्य स्त्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ व दस्तावेज हैं जो मुगल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे। इसके अलावा प्रसिद्ध लेखकों और यात्रियों के विवरण भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
अठारहवीं सदी के स्त्रोत बताते हैं कि बंगाल में जमींदार उनकी सेवाओं के बदले लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे। इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे। एक विस्तृत प्रणाली थी जो आवश्यकता और विनिमय के आधार पर कार्य करती थी; मुख्य रूप से भू-खंड या अनाज को मुआवजे के रूप में निर्धारित किया जाता था ।
सत्रहवीं सदी के स्रोत, भारत में मुख्य रूप से तीन प्रकार के किसानों 1. खुदकाश्त 2. पाहिकाश्त एवं 3. मुजारियन का उल्लेख करते हैं ।
मुगल काल में कपास, गन्ना जैसी नकदी फसलों को जिन्स-ए-कामिल अथवा जिन्स-ए-आला के रूप में जाना जाता था।
शहद, मधुमोम और गोंद लाख के रूप में वन उत्पादों की भारी मांग थी, सत्रहवीं सदी में कुछ जैसे कि गोंद लाख भारत से विदेशों में निर्यात की प्रमुख मद बन गए थे, हाथीयों को भी पकड़ा और बेचा जाता था, व्यापार में वस्तु-विनिमय के माध्यम से वस्तुओं की अदला-बदली भी शामिल थी।
चूंकि किसान अपने बारे में खुद नहीं लिखा करते थे इसलिए ग्रामीण समाज के क्रियाकलापों की जानकारी हमें उन लोगों से नहीं मिलती जो खेतों में काम करते थे। नतीजतन, सोलहवीं और सत्राहवीं सदियों के कृषि इतिहास को समझने के लिए हमारे मुख्य स्त्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ व दस्तावेज हैं जो मुगल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे। इसके अलावा प्रसिद्ध लेखकों और यात्रियों के विवरण भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
इतिहासकारों के अनुसार विभिन्न उत्पादकों के मध्य व्यापक तौर पर विनिमय होता था। किसान और दस्तकार -रँगरेजी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतनों को पकाना, खेती के औजारों को बनाना या उनकी मरम्मत करना आदि कार्य करते थे। कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार जैसे ग्रामीण दस्तकार भी अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे जिसके बदले गाँव वाले उन्हें अलग-अलग तरीकों से उन सेवाओं की अदायगी करते थे। आमतौर पर तो उन्हें फसल का एक हिस्सा दे दिया जाता था।
19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में, जोतदार गाँव में धनी किसानों का वर्ग होता था उनका ग्रामीण किसानों, साहूकारी स्थानीय व्यापार पर सीधा नियंत्रण था, जबकि जमींदार शहरी क्षेत्र में रहते थे। जोतदार जमींदारों के कार्य में बाधा उत्पन्न करते थे।
इतिहासकारों के अनुसार विभिन्न उत्पादकों के मध्य व्यापक तौर पर विनिमय होता था। किसान और दस्तकार -रँगरेजी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतनों को पकाना, खेती के औजारों को बनाना या उनकी मरम्मत करना आदि कार्य करते थे। कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार जैसे ग्रामीण दस्तकार भी अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे जिसके बदले गाँव वाले उन्हें अलग-अलग तरीकों से उन सेवाओं की अदायगी करते थे। आमतौर पर तो उन्हें फसल का एक हिस्सा दे दिया जाता था।
उस अवधि के भारत-फारसी स्रोतों द्वारा किसानों के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द रैयत (बहुवचन,रियाया) अथवा मुज़ारियन था, हम किसान अथवा असामी शब्द भी प्राप्त करते हैं, 17 वी शताब्दी के स्त्रोत दो प्रकार के किसानों का वर्णन करते हैं- खुदकाश्त एवं पाहीकाश्त, खुदकाश्त, गाँव का निवासी होता था, जिसमें उनकी भूमी होती थी,पाहीकाश्त अनिवासी कृषक होते थे, जो किसी अन्य गाँव से संबंद्ध रखते थे, एवं अनुबंध के आधार पर भूमि जोतते थे। अकाल के संकट का सामना करने के कारण, लोग अपनी स्वेच्छा से पाहीकाश्त बन गए। किसानों के पास बैल की एक जोड़ी और दो हल से अधिक नहीं होता था। गुजरात में छह एकड़ जमीन रखने वाले किसानों को धनवान समझा जाता था, और बंगाल में, एक औसत किसान के पास अधिकतम 5 एकड़ जमीन होती थी, और 10 एकड़ जमीन एक किसान को समृद्ध असामी बनाती थी। खेती व्यक्तिगत स्वामित्व के सिद्धांत पर आधारित थी और किसान की भूमि को उसी तरह से खरीदा और बेचा जाता था जैसे कि अन्य संपत्ति के मालिक की भूमि को।