1. सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में महिलाएँ और पुरूष कन्धे से कन्धा मिलाकर खेतों में काम करते थे। महिलाएँ बुआई, निराई व कटाई के साथ-साथ पकी हुई फसल का दाना निकालने का काम करती थीं। 2. पश्चिम भारत में महिलाओं की जैव वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के प्रति अनेक पूर्वाग्रह थे उदाहरणस्वरूप पश्चिम भारत में रजस्वला स्त्रियों को हल या कुम्हार का चाकू छूने की इजाजत नहीं थी। 3. कृषि आधारित अन्य कार्यो में भी महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण था जैसे सूत कातना, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी साफ करना और कपड़ों पर कढ़ाई जैसे दस्तकारी आदि। 4. किसी वस्तु का जितनी वाणिज्यीकरण होता था, उस वस्तु के उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की उतनी अधिक माँग होती थी। जरूरत होने पर किसान व दस्तकार महिलाएँ खेतों में भी जाती थीं व नियोक्ताओं के घरों व बाजार में जाकर भी काम करती थीं।
कृषि इतिहास को लिखने में ‘आइन’ को स्त्रोत रूप में प्रयोग करने में मुख्य समस्याऐंः-1. आंकड़ों के जोड़ में गलतियाँ- आँकड़ो के जोड़ में कई गलतियाँ पाई गई हैं।2. शासक वर्ग का दृष्टिकोण-‘आइन’ से किसानों के बारें में प्राप्त जानकारी शासक वर्ग का दृष्टिकोण मात्र है ना कि किसानों का। 3. संख्यात्मक आँकड़ो में विषमताएँ- सभी प्रान्तों से आँकड़े एक ही मानक के अनुरूप एकत्र नहीं किये गए। कुछ प्रांतो की विस्तृत सूचनाएँ संकलित की गई हैं, जबकि बंगाल व उड़ीसा के लिए सूचनाएँ उपलब्ध नहीं हैं।4. मूल्यों और मजदूरों की दरों की अपर्याप्त सूची-‘आइन’ में मौजूद मूल्यों व मजदूरी की दरें मात्र राजधानी क्षेत्र व उसके आस-पास के क्षेत्रों से ली गई हैं ना कि संपूर्ण देश से। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए इतिहासकार संबंधित सदियों के उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों का प्रयोग कर सकते हैं। इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी के सरकारी दस्तावेजों की मदद ली जा सकती है।
(i)समुदाय के नेताओं के रूप में जनजातियों के सरदार (मुखिया) हुआ करते थे, और उनमें से कई जमींदार बन गए थे और कुछ तो राजा भी बन गए थे, जो जमींदार और राजा बन गए थे उन लोगों को एक सेना रखनी आवश्यक होती थी, सेना के लिए लोगों को एक ही वंश समूह से भर्ती किया जाता था, अथवा उनकी बिरादरी द्वारा सैन्य सेवा उपलब्ध कराने की मांग की जाती थी ।
(ii) स्त्रोतों के अनुसार, सिंध क्षेत्र में जनजातियों के पास 6000 घुड़सवार फ़ौज और 7000 पैदल सेना से युक्त सेना थी, असम के अहोम राजाओं के पास पाइक लोग, जो भूमि के बदले में सैन्य सेवा प्रदान करते थे, हुआ करते थे, हाथियों पर अधिकार को अहोम राजाओं द्वारा एक शाही एकाधिकार घोषित कर दिया गया था।
(iii) आइन-ए-अकबरी के अनुसार, शासकों की महत्वाकांक्षा के कारण युद्ध होना, एक सामान्य घटना हुआ करती थीसोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के दौरान मुगल साम्राज्य, चीन में मिंग, ईरान में सफ़वीद, तुर्की में ऑटोमन (उस्मान राजवंश) की भाँती अपनी शक्ति को मजबूत बनाने और संसाधनों को संचित करने में सक्षम था
(i)समुदाय के नेताओं के रूप में जनजातियों के सरदार (मुखिया) हुआ करते थे, और उनमें से कई जमींदार बन गए थे और कुछ तो राजा भी बन गए थे, जो जमींदार और राजा बन गए थे उन लोगों को एक सेना रखनी आवश्यक होती थी, सेना के लिए लोगों को एक ही वंश समूह से भर्ती किया जाता था, अथवा उनकी बिरादरी द्वारा सैन्य सेवा उपलब्ध कराने की मांग की जाती थी ।
(ii) स्त्रोतों के अनुसार, सिंध क्षेत्र में जनजातियों के पास 6000 घुड़सवार फ़ौज और 7000 पैदल सेना से युक्त सेना थी, असम के अहोम राजाओं के पास पाइक लोग, जो भूमि के बदले में सैन्य सेवा प्रदान करते थे, हुआ करते थे, हाथियों पर अधिकार को अहोम राजाओं द्वारा एक शाही एकाधिकार घोषित कर दिया गया था।
(iii) आइन-ए-अकबरी के अनुसार, शासकों की महत्वाकांक्षा के कारण युद्ध होना, एक सामान्य घटना हुआ करती थीसोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के दौरान मुगल साम्राज्य, चीन में मिंग, ईरान में सफ़वीद, तुर्की में ऑटोमन (उस्मान राजवंश) की भाँती अपनी शक्ति को मजबूत बनाने और संसाधनों को संचित करने में सक्षम था
चूंकि किसान अपने बारे में खुद नहीं लिखा करते थे इसलिए ग्रामीण समाज के क्रियाकलापों की जानकारी हमें उन लोगों से नहीं मिलती जो खेतों में काम करते थे। नतीजतन, सोलहवीं और सत्रहवीं सदियों के कृषि इतिहास को समझने के लिए हमारे मुख्य स्त्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ व दस्तावेज हैं जो मुगल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे। इसके अलावा प्रसिद्ध लेखकों और यात्रियों के विवरण भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथों में एक था आइन-ए-अकबरी (संक्षेप में आइन)जिसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने लिखा था। खेतों की नियमित जुताई की तसल्ली करने के लिए, राज्य के नुमाइंदों द्वारा करों की उगाही के लिए और राज्य व ग्रामीण सत्तापोशों यानी कि जमींदारों के बीच के रिश्तों के नियमन के लिए जो इंतजाम राज्य ने किए थे, उसका लेखा-जोखा इस ग्रंथ में बड़ी सावधानी से पेश किया गया है। आइन का मुख्य उद्देश्य अकबर के सम्राज्य का एक ऐसा खाका पेश करना था जहाँ एक मजबूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बना कर रखता था। आइन के लेखक के मुताबिक, मुगल राज्य के खिलाफ कोई बगावत या किसी भी किस्म की स्वायत्त सत्ता की दावेदारी का असफल होना पहले ही तय था। दूसरे शब्दों में, किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊंचे गलियारों का नजरिया है। खुशकिस्मती से आइन की जानकारी के साथ-साथ हम उन स्त्रोतों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं जो मुगलों की राजधानी से दूर के इलाकों में लिखे गए थे। इनमें सत्रहवीं व अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से मिलने वाले वे दस्तावेज शामिल हैं जो सरकार कीआमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं। इसके अलावा, ईस्ट इंडिया कंपनी के बहुत सारे दस्तावेज भी हैं जो पूर्वी भारत में कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका पेश करते हैं। ये सभी स्त्रोत किसानों, जमींदारों और राज्य के बीच तने झगड़ों को दर्ज करते हैं। लगे हाथ, ये स्त्रोत यह समझने में हमारी मदद करते हैं कि किसान राज्य को किस नजरिये से देखते थे और राज्य से उन्हें कैसे न्याय की उम्मीद थी।
किसान और उनकी जमीन-
मुगल काल के भारतीय-फारसी स्त्रोत किसान के लिए आमतौर पर रैयत (बहुवचन, रिआया ) या मुजरियान शब्द का इस्तेमाल करते थे। साथ ही, हमें किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं। सत्रहवीं सदी के स्त्रोत दो किस्म के किसानों की चर्चा करते हैं–
खुद-काश्त व पाहि-काश्त-पहले किस्म के किसान वे थे जो उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी जमीन थीं। दूसरे (पाहि-काश्त) वे खेतिहर थे जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे। लोग अपनी मर्जी से भी पाहि-काश्त बनते थे (मसलन, अगर करों की शर्तें किसी दूसरे गाँव में बेहतर मिलें) और मजबूरन भी (मसलन, अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी से)। उत्तर भारत के एक औसत किसान के पास शायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज्यादा कुछ होता था, ज़्यादातर के पास इससे भी कम। गुजरात में जिन किसानों के पास 6 एकड़ के करीब जमीन थी वे समृद्ध माने जाते थे, दूसरी तरफ, बंगाल में एक औसत किसान की जमीन की उपरी सीमा 5 एकड़ थी, 10 एकड़ जमीन वाले आसामी को अमीर समझा जाता था। खेती व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धान्त पर आधारित थी। किसानों की जमीन उसी तरह खरीदी और बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की।
सिंचाई और तकनीक-
जमीन की बहुतायत, मजदूरों की मौजूदगी, और किसानों की गतिशीलता की वजह से कृषि का लगातार विस्तार हुआ। चूंकि खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए रोजमर्रा के खाने की जरूरतें जैसे चावल, गेहूँ, ज्वार इत्यादि फसलें सबसे ज्यादा उगाई जाती थीं। जिन इलाकों में प्रति वर्ष 40 इंच या उससे ज्यादा बारिश होती थी, वहाँ कमोबेश चावल की खेती होती थी। कम और कमतर बारिश वाले इलाकों में क्रमशः गेहूँ व ज्वार-बाजरे की खेती ज्यादा प्रचलित थी।मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, जैसा कि आज भी है। लेकिन कुछ ऐसी फसलें भी थीं जिनके लिए अतिरिक्त पानी की जरूरत थी। इनके लिए सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़े। सिंचाई कार्यों को राज्य की मदद भी मिलती थी। मसलन, उत्तर भारत में राज्य ने कई नयी नहरें व नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे कि शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान पंजाब में शाह नहर ।वैसे तो खेती मेहनतकशी का काम था लेकिन किसान ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल भी करते थे जो अकसर पशुबल पर आधारित होती थीं। ऐसा एक उदाहरण लकड़ी के उस हल्के हल का दिया जा सकता है जिसको एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगाकर आसानी से बनाया जा सकता था। ऐसे हल मिट्टी को बहुत गहरे नहीं खोदते थे जिसके कारण तेज गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी। बैलों के जोड़े के सहारे खींचे जाने वाले बरमे का इस्तेमाल बीज बोने के लिए किया जाता था। लेकिन बीजों को हाथ से छिड़क कर बोने का रिवाज ज्यादा प्रचलित था। मिट्टी की गुड़ाई और साथ-साथ निराई के लिए लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धार काम में लाए जाते थे।
फसलें -
मौसम के दो मुख्य चक्रों के दौरान खेती की जाती थीः एक खरीफ (पतझड़ में) और दूसरी रबी (वसंत में)। यानी सूखे इलाकों और बंजर जमीन को छोड़ दें तो ज़्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फसलें होती थीं। जहाँ बारिश या सिंचाई के अन्य साधन हर वक्त मौजूद थे वहाँ तो साल में तीन फसलें भी उगाई जाती थीं। इस वजह से पैदावार में भारी विविधता पाई जाती थी। उदाहरण के तौर पर, आइन हमें बताती है कि दोनों मौसम मिलाकर, मुगल प्रांत आगरा में 39 किस्म की फसलें उगाई जाती थीं जबकि दिल्ली प्रांत में 43 फसलों की पैदावार होती थी। बंगाल में सिर्फ चावल की 50 किस्में पैदा होती थीं। हालाँकि दैनिक आहार की खेती पर ज्यादा ज़ोर दिया जाता था मगर इसका मतलब यह नहीं था कि मध्यकालीन भारत में खेती सिर्फ गुजारा करने के लिए की जाती थी। स्त्रोतों में हमें अकसर जिन्स-ए-कामिल (सर्वोत्तम फसलें) जैसे लफ़्ज़ मिलते हैं । मुगल राज्य भी किसानों को ऐसी फसलों की खेती करने के लिए बढ़ावा देता था क्योंकि इनसे राज्य को ज्यादा कर मिलता था। कपास और गन्ने जैसी फसलें बेहतरीन जिन्स-ए-कामिल थीं। मध्य भारत और दक्कनी पठार में फैले हुए जमीन के बड़े-बडे़ टुकड़ों पर कपास उगाई जाती थी, जबकि बंगाल अपनी चीनी के लिए मशहूर था। तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन भी नकदी फसलों में आती थीं। इससे पता चलता है कि एक औसत किसान की जमीन पर किस तरह पेट भरने के लिए होने वाले उत्पादन और व्यापार के लिए किए जाने वाले उत्पादन एक दूसरे से जुडे़ हुए थे।
सत्रहवीं सदी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कई नयी फसलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुँचीं। मसलन, मक्का भारत में अफ्रीका और स्पेन के रास्ते आया और सत्रहवीं सदी तक इसकी गिनती पश्चिम भारत की मुख्य फसलों में होने लगी। टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्जियाँ नयी दुनिया से लाई गईं। इसी तरह अनानास और पपीता जैसे फल वहीं से आए।
पंचायत का संगठन-
गाँव की पंचायत में बुजुर्गों का जमावड़ा होता था। आमतौर पर वे गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग हुआ करते थे जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार होते थे। जिन गाँवों में कई जातियों के लोग रहते थे, वहाँ अकसर पंचायत में भी विविधता पाई जाती थी। यह एक ऐसा अल्पतंत्र था जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी। फिर भी इसकी संभावना कम ही है कि छोटे-मोटे और नीच काम करने वाले खेतिहर मजदूरों के लिए इसमें कोई जगह होती होगी। पंचायत का फैसला गाँव में सबको मानना पड़ता था।
मुखिया का चयन-
पंचायत का सरदार एक मुखिया होता था जिसे मुक़द्दम या मंडल कहते थे। कुछ स्त्रोतों से ऐसा लगता है कि मुखिया का चुनाव गाँव के बुजुर्गों की आम सहमति से होता था और इस चुनाव के बाद उन्हें इसकी मंजूरी जमींदार से लेनी पड़ती थी। मुखिया अपने ओहदे पर तभी तक बना रहता था जब तक गाँव के बुजुर्गों को उस पर भरोसा था। ऐसा नहीं होने पर बुजुर्ग उसे बर्खास्त कर सकते थे। गाँव के आमदनी व खर्चे का हिसाब-किताब अपनी निगरानी में बनवाना मुखिया का मुख्य काम था और इसमें पंचायत का पटवारी उसकी मदद करता था।
पंचायत के कार्य-
पंचायत का खर्चा गाँव के उस आम ख़जाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति अपना योगदान देता था। इस ख़जाने से उन कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी का ख़र्चा भी किया जाता था जो समय-समय पर गाँव का दौरा किया करते थे। दूसरी ओर, इस कोष का इस्तेमाल बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी होता था और ऐसे सामुदायिक कार्यों के लिए भी जो किसान खुद नहीं कर सकते थे, जैसे कि मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध बनाना या नहर खोदना। पंचायत का एक बड़ा काम यह तसल्ली करना था कि गाँव में रहने वाले अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों के अंदर रहेंगे । पूर्वी भारत में सभी शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं। यूँ कहा जा सकता है कि जाति की अवहेलना रोकने के लिए लोगों के आचरण पर नजर रखना गाँव के मुखिया की जिम्मेदारियों में से एक था। पंचायतों को जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने जैसे ज्यादा गंभीर दंड देने के अधिकार थे। समुदाय से बाहर निकालना
एक कड़ा कदम था जो एक सीमित समय के लिए लागू किया जाता था। इसके तहत दंडित व्यक्ति को (दिए हुए समय के लिए) गाँव छोड़ना पड़ता था। इस दौरान वह अपनी जाति और पेशे से हाथ धो बैठता था। ऐसी नीतियों का मकसद जातिगत रिवाजों की अवहेलना रोकना था। ग्राम पंचायत के अलावा गाँव में हर जाति की अपनी पंचायत होती थी। समाज में ये पंचायतें काफी ताकतवर होती थीं। राजस्थान में जाति पंचायतें अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी के झगड़ों का निपटारा करती थीं। वे जमीन से जुड़े दावेदारियों के झगड़े सुलझाती थीं, यह तय करती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के मुताबिक हो रही हैं या नहीं, और यह भी कि गाँव के आयोजन में किसको किसके उपर तरजीह दी जाएगी। कर्मकांडीय वर्चस्व किस क्रम में होगा। फौजदारी न्याय को छोड़ दें तो ज़्यादातर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फैसलों को मानता था।
पंचायत और न्याय-
पश्चिम भारत -ख़ासकर राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे प्रांतों- के संकलित दस्तावेजों में ऐसी कई अर्ज़ियाँ हैं जिनमें पंचायत से ऊंची जातियों या राज्य के अधिकारियों के खि़लाफ जबरन कर उगाही या बेगार वसूली की शिकायत की गई है। आमतौर पर यह अर्ज़ियाँ ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग लगाते थे। अकसर सामूहिक तौर पर भी ऐसी अर्ज़ियाँ दी जाती थीं। इनमें किसी जाति या संप्रदाय विशेष के लोग संभ्रांत समूहों की उन माँगों के खि़लाफ अपना विरोध जताते थे जिन्हें वे नैतिक दृष्टि से अवैध् मानते थे। उनमें एक थी बहुत ज्यादा कर की माँग क्योंकि इससे किसानों का दैनिक गुजारा ही जोखिम में पड़ जाता था, ख़ासकर सूखे या ऐसी दूसरी विपदाओं के दौरान। उनकी नजरों में जिंदा रहने के लिए न्यूनतम बुनियादी साधन उनका परंपरागत रिवाजी हक था। वे समझते थे कि ग्राम पंचायत को इसकी सुनवाई करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्य अपना नैतिक फर्ज अदा करे और न्याय करे।
नीचली जाति के किसानों और राज्य के अधिकारियों या स्थानीय जमींदारों के बीच झगड़ों में पंचायत के फैसले अलग-अलग मामलों में अलग-अलग हो सकते थे। अत्यधिक कर की माँगों के मामले में पंचायत अकसर समझौते का सुझाव देती थी। जहाँ समझौते नहीं हो पाते थे, वहाँ किसान विरोध के ज्यादा उग्र रास्ते अपनाते थे, जैसे कि गाँव छोड़कर भाग जाना। जोतने लायक खाली जमीन अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध थी जबकि श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी। इस वजह से, गाँव छोड़कर भाग जाना खेतिहरों के हाथ में एक बड़ा प्रभावी हथियार था।
ग्रामीण दस्तकार
अलग-अलग तरह के उत्पादन कार्य में जुटे लोगों के बीच फैले लेन-देन के रिश्ते गाँव का एक और रोचक पहलू था। अग्रेजी शासन के शुरुआती वर्षों में किए गए गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफी अच्छी तादाद में रहते थे। कहीं-कहीं तो कुल घरों के 25 प्रतिशत फीसदी घर दस्तकारों के थे। कभी-कभी किसानों और दस्ताकारों के बीच फर्क करना मुश्किल होता था क्योंकि कई ऐसे समूह थे जो दोनों किस्म के काम करते थे। खेतिहर और उसके परिवार के सदस्य कई तरह की वस्तुओं के उत्पादन में शिरकत करते थे।
मसलन-रँगरेजी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतनों को पकाना, खेती के औजारों को बनाना या उनकी मरम्मत करना। उन महीनों में जब उनके पास खेती के काम से फूरसत होती-जैसे कि बुआई और सुहाई के बीच या सुहाई और कटाई के बीच-उस समय ये खेतिहर दस्तकारी का काम करते थे। कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार जैसे ग्रामीण दस्तकार भी अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे जिसके बदले गाँव वाले उन्हें अलग-अलग तरीकों से उन सेवाओं की अदायगी करते थे। आमतौर पर या तो उन्हें फसल का एक हिस्सा दे दिया जाता था या फिर गाँव की जमीन का एक टुकड़ा, शायद कोई ऐसी जमीन जो खेती लायक होने के बावजूद बेकार पड़ी थी। अदायगी की सूरत क्या होगी ये शायद पंचायत ही तय करती थी। महाराष्ट्र में ऐसी जमीन दस्तकारों की मीरास या वतन बन गई जिस पर दस्तकारों का पुश्तैनी अधिकार होता था।यही व्यवस्था कभी-कभी थोडे़ बदले हुए रूप में भी पायी जाती थी जहाँ दस्तकार और हरेक खेतिहर परिवार परस्पर बातचीत करके अदायगी
की किसी एक व्यवस्था पर राजी होते थे। ऐसे में आमतौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था। उदाहरण के तौर पर,
अठारहवीं सदी के स्त्रोत बताते हैं कि बंगाल में जमींदार उनकी सेवाओं के बदले लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे। इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, हालांकि यह शब्द सोलहवीं व सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था। ये सबूत रूचिकर हैं क्योंकि इनसे पता चलता है कि गाँव के छोटे स्तर पर फेर-बदल के रिश्ते कितने पेचीदा थे। ऐसा नहीं है कि नकद अदायगी का चलन बिलकुल ही नदारद था।
जाति और ग्रामीण माहौल-
जाति और अन्य जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई तरह के समूहों में बँटे थे। खेतों की जुताई करने वालों में एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे, या फिर खेतों में मजदूरी करते थे। हालाँकि खेती लायक जमीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जाति के लोगों को सिर्फ नीच समझे जाने वाले काम ही दिए जाते थे। इस तरह वे गरीब रहने के लिए मजबूर थे। जनगणना तो उस वक्त नहीं होती थी, पर जो थोडे़ बहुत आँकड़े और तथ्य हमारे पास हैं उनसे पता चलता है कि गाँव की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही समूहों का था। इनके पास संसाधन सबसे कम थे और ये जाति व्यवस्था की पाबंदियों से बँधे थे। इनकी हालत कमोबेश वैसी ही थी जैसी कि आधुनिक भारत में दलितों की। दूसरे संप्रदायों में भी ऐसे भेदभाव फैलने लगे थे। मुसलमान समुदायों में हलालख़ोरान जैसे ‘नीच’ कामों से जुड़े समूह गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे, इसी तरह बिहार में मल्लाहजादाओं(शाब्दिक अर्थ, नाविकों के पुत्र), की तुलना दासों से की जा सकती थी।
1. सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में महिलाएँ और पुरूष कन्धे से कन्धा मिलाकर खेतों में काम करते थे। महिलाएँ बुआई, निराई व कटाई के साथ-साथ पकी हुई फसल का दाना निकालने का काम करती थीं। 2. पश्चिम भारत में महिलाओं की जैव वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के प्रति अनेक पूर्वाग्रह थे उदाहरणस्वरूप पश्चिम भारत में रजस्वला स्त्रियों को हल या कुम्हार का चाकू छूने की इजाजत नहीं थी। 3. कृषि आधारित अन्य कार्यो में भी महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण था जैसे सूत कातना, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी साफ करना और कपड़ों पर कढ़ाई जैसे दस्तकारी आदि। 4. किसी वस्तु का जितनी वाणिज्यीकरण होता था, उस वस्तु के उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की उतनी अधिक माँग होती थी। जरूरत होने पर किसान व दस्तकार महिलाएँ खेतों में भी जाती थीं व नियोक्ताओं के घरों व बाजार में जाकर भी काम करती थीं।
कृषि इतिहास को लिखने में ‘आइन’ को स्त्रोत रूप में प्रयोग करने में मुख्य समस्याऐंः-1. आंकड़ों के जोड़ में गलतियाँ- आँकड़ो के जोड़ में कई गलतियाँ पाई गई हैं।2. शासक वर्ग का दृष्टिकोण-‘आइन’ से किसानों के बारें में प्राप्त जानकारी शासक वर्ग का दृष्टिकोण मात्र है ना कि किसानों का। 3. संख्यात्मक आँकड़ो में विषमताएँ- सभी प्रान्तों से आँकड़े एक ही मानक के अनुरूप एकत्र नहीं किये गए। कुछ प्रांतो की विस्तृत सूचनाएँ संकलित की गई हैं, जबकि बंगाल व उड़ीसा के लिए सूचनाएँ उपलब्ध नहीं हैं।4. मूल्यों और मजदूरों की दरों की अपर्याप्त सूची-‘आइन’ में मौजूद मूल्यों व मजदूरी की दरें मात्र राजधानी क्षेत्र व उसके आस-पास के क्षेत्रों से ली गई हैं ना कि संपूर्ण देश से। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए इतिहासकार संबंधित सदियों के उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों का प्रयोग कर सकते हैं। इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी के सरकारी दस्तावेजों की मदद ली जा सकती है।
शाहजहाँ को संगमरमर की सफेद इमारत बनवाने का शौक था जैसे उसने आगरा में ताजमहल तथा मोती मस्जिद का निर्माण करवाया इसके अतिरिक्त उसने लाल पत्थर से
शेरशाह सूरी का बचपन का नाम फरीद था । वह बिहार में सहसराम की जागीर के स्वामी हसन का पुत्र था । अपने पिता हसन की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में सहसराम की जागीर पर बैठा था ।
जलाल की माँ ने शेरशाह को जलाल खाँ के छोटे होने के कारण उसका संरक्षक नियुक्त किया शेरशाह ने बिहार की लिए अच्छी व्यवस्था की जिससे कुछ सरदारों ने युवक जलाल खाँ के कान शेरशाह के विरुद्ध भर दिए। जिस कारण जलाल खाँ ने सत्ता वापस लेने का निश्चय किया। और जलाल खाँ ने शेरशाह से युद्ध किया ।
शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। प्रत्येक ग्राम में एक मुखिया, मुकद्दम, पटवारी और चौकीदार होते थे । ग्राम में शांति व्यवस्था और सुरक्षा का भार स्थानीय जनता और कर्मचारियों पर छोड़ दिया गया था ।
शेरशाह ने जिस समय सुल्तान का पद ग्रहण किया था । वह काल षड्यन्त्रों एवं कुचक्रों का काल था । इन षड्यन्त्रों से बचने के लिए उसने एक गुप्तचर विभाग का गठन किया था ।
शेरशाह ने चार प्रमुख सडकों का निर्माण कराया :-
(1) आगरा से बुरहानपुर तक।
(2) आगरा से मारवाड़ तक।
(3) मुल्तान से लाहौर तक।
(4) बंगाल से सिंध तक ।
स्थानीय शासन में केंद्र की ओर से दो पदाधिकारी नियुक्त किये जाते थे शिकदार-ए-शिकदारान और मुसिफ-ए-मुसिफान स्थानीय शासन में केंद्र की ओर से दो पदाधिकारी नियुक्त किये जाते थे । सरकार में शान्ति स्थापित करने के लिए सर्वोच्च अधिकारी के पास एक सेना रहती थी वह अपने अधीन परगनों के शिकदारों का निरीक्षण एवं नियंत्रण करता था । इन दोनों पदाधिकारों के अधीन अनेक कर्मचारी सरकारों का पूर्ण प्रबन्ध करने के लिए होते थे ।
खुसरो के विद्रोह के साथ ही खुर्रम के उत्थान का काल आरम्भ होता है । खुसरो के विद्रोह का दमन करने के लिए जहाँगीर को राजधानी छोड़कर बहार जाना पड़ा तथा राजधानी की देखभाल का भर उसने खुर्रम पर छोड़ दिया।
शहजादे परवेज के असफल होने पर खुर्रम दक्षिण भारत गया तथा अहमदनगर को पराजित कर । उसने मलिक अम्बर को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया इन विजयों ने शहजादे की शान और प्रतिष्ठा में अभिवृद्धि हुई ।
शाहजहाँ ने जुझार सिंह के पिता की अनुचित ढंग से संपत्ति प्राप्त करने की जाँच की जाये । इस बात से क्रुद्ध होकर जुझार सिंह आगरा से अपने राज्य ओरछा लौट आया तथा शाहजहाँ के विरुद्ध युद्ध किया।
शाहजहाँ ने कूटनीति से काम लिया उसने बड़े-बड़े मराठा सरदारों को उच्च पद तथा जागीर देकर उन्हें अपने सहयोगी बना लिया जिससे वे खानेजहाँ के कोई सहायता न कर सके।
रतनपुर के जमींदार बाबू लक्ष्मण था । उसने शाहजहाँ की अवज्ञा की जिसे अवज्ञा करने का दण्ड देने के लिए अब्दुल्ला खाँ को भेजा गया । बाबू लक्ष्मण ने अमर सिंह की मध्यस्थता से क्षमा माँग ली तथा उसे मुग़ल दरबार में भेज दिया गया ।
खानेजहाँ लोदी के दमन का श्रेय अब्दुल्ला खाँ और सैय्यद मुजफ्फर खाँ को है । इन्हें शाहजहाँ ने क्रमशः फिरोज जंग तथा खानेजहाँ की उपाधि प्रदान की ।
इसका कारण धार्मिक था। तारीख के माध्यम से पैगंबर मोहम्मद, पवित्र ख़लीफ़ाओं और दूसरे धार्मिक नेताओं के जीवन और उनके काल से संबंधित सूचना प्राप्त की जाती थी।
भारतीय ग्रामीण दस्तकारों की स्थिति:-1. गाँवों में बड़ी संख्या में दस्तकारों की उपस्थितिः-अंग्रेजी शासन के सर्वेक्षण दस्तावेज व मराठों के दस्तावेजों से गाँवों में दस्तकारों की बड़ी संख्या का पता चलता हैं। कुछ गाँवों की कुल जनसंख्या का 2.5 प्रतिशत से जयादा दस्तकारों का था।2. ग्रामीण दस्तकारों द्वारा सेवाएँ देनाः- गाँव के अन्य लोग इन दस्तकारों की सेवाओं पर निर्भर थ। कुम्हार, बबंगाल में जमींदार सेवाओं के बदले दस्तकारों को ‘दैनिक 1. चित्र पुस्तक के सौंदर्य में अभिवृद्धि करते थे।2. यह राजा या ताकतवर पद के विरोध में विचारों को सुंदर तरीके से व्यक्त करने का सशक्त माध्यम था। व खाने के लिए नकदी देते थे इस व्यवस्था को ‘‘जजमानी’’ कहते थे। इसके अलावा वस्तु/सेवाओं के विनिमय का प्रचलन भी था।कभी-कभी किसानों व दस्तकारों के मध्य अंतर करना कठिन होता था क्योंकि कई ऐसे समूह भी थे जो दोनों प्रकार के कार्य करते थे। 1. चित्र पुस्तक के सौंदर्य में अभिवृद्धि करते थे।2. यह राजा या ताकतवर पद के विरोध में विचारों को सुंदर तरीके से व्यक्त करने का सशक्त माध्यम था।
हुमायूँ की प्रारम्भिक दो कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैः
1) शेरशाह के पास प्रशिक्षित सेना थी। 2) शेरशाह महान् सेनानायक एवं कूटनीतिक था। 3) हुमायूँ को भाइयों व संबंधियों का सहयोग नहीं मिला।
अकबर द्वारा शुरू की गइ द्वैध मनसब प्रथा थी, ‘जात’ से व्यक्ति के वेतन तथा पद की स्थिति का बोध होता था जबकि ‘सवार’ से घुड़सवार दस्ते की संख्या प्रकट होती थी, और उन्हें दिया जाने वाला वेतन निश्चित होता था।
मुगलों व स्थानीय सरदारों के बीच राजनीतिक-मैत्रियों के जरिए तथा विजयों के जरिए भारत के विविध क्षेत्रीय राज्यों को मिलाकर साम्राज्य की रचना की गई। साम्राज्य के संस्थापक जहीरुद्दीन बाबर को उसके मध्य एशियाई स्वदेश फरगाना से प्रतिद्वंद्वी उजबेकों ने भगा दिया था। उसने सबसे पहले स्वयं को काबुल में स्थापित किया और फिर 1526 में अपने दल के सदस्यों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए क्षेत्रों और संसाधनों की खोज में वह भारतीय उपमहाद्वीप में और आगे की ओर बढ़ा। इसके उत्तराधिकारी नसीरुद्दीन हुमायूँ (1530-40, 1555-56) ने साम्राज्य की सीमाओं में विस्तार किया किन्तु वह अफगान नेता शेरशाह सूर से पराजित हो गया जिसने उसे ईरान के सफावी शासक के दरबार में निर्वासित होने को बाध्य कर दिया। 1555 में हुमायूँ ने सूरों को पराजित कर दिया किन्तु एक वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। कई लोग जलालुद्दीन अकबर (1556-1605) को मुगल बादशाहों में महानतम मानते हैं क्योंकि उसने न वेफवल अपने साम्राज्य का विस्तार ही किया बल्कि इसे अपने समय का विशालतम, दृढ़तम और सबसे समृद्ध राज्य बनाकर सुदृढ़ भी किया। अकबर हिंदुकुश पर्वत तक अपने साम्राज्य की सीमाओं के विस्तार में सफल हुआ और उसने ईरान के सफावियों और तूरान (मध्य एशिया) के उजबेकों की विस्तारवादी योजनाओं पर लगाम लगाए रखी। अकबर के बाद जहाँगीर (1605-27), शाहजहाँ (1628-58) और औरंगजेब (1658-1707) के रूप में भिन्न-भिन्न व्यक्तित्वों वाले तीन बहुत योग्य उत्तराधिकारी हुए। इनके अधीन क्षेत्रीय विस्तार जारी रहा यद्यपि इसकी गति काफी धीमी रही। तीनों शासकों ने शासन के विविध यंत्रों को बनाए रखा और उन्हें सुदृढ़ किया।
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों के दौरान शाही संस्थाओं के ढाँचे का निर्माण हुआ। इनके अंतर्गत प्रशासन और कराधान के प्रभावशाली तरीके शामिल थे। मुगल शक्ति का सुस्पष्ट केंद्र दरबार था।
यहाँ राजनीतिक संबंध गढ़े जाते थे, साथ ही श्रेणियाँ और हैसियतें परिभाषित की जाती थीं। मुगलों द्वारा शुरू की गई राजनीतिक व्यवस्था सैन्य शक्ति और उपमहाद्वीप की भिन्न-भिन्न परंपराओं को समायोजित करने की चेतन नीति के संयोजन पर आधारित थी।
1707 के बाद औरंगजेब की मृत्योपरांत राजवंश की शक्ति घट गई। दिल्ली, आगरा अथवा लाहौर जैसे भिन्न राजधानी नगरों से नियंत्रित एक विशाल साम्राज्य तंत्र की जगह क्षेत्रीय शक्तियों ने अधिक स्वायत्तता अर्जित कर ली। फिर भी सांकेतिक रूप में ही सही पर मुगल शासक की प्रतिष्ठा ने अभी अपनी आभा नहीं खोई थी। 1857 में इस वंश के अंतिम वंशज बहादुरशाह ज़फर द्वितीय को अंग्रेजों ने उखाड़ फेंका।
A. 1816
B. 1815
C. 1818
D. 1813
फ्रांसिस बुकानन 1815 में भारत से इंग्लैंड लौट गए। वे पहरी राजमहल की पहाड़ियों में रहने वाले की जीवन शैली के बारे में वृत्तांत लिखा था।
A. संथाल विद्रोह
B. पहरी विद्रोह
C. कोल विद्रोह
D. कोल विद्रोह
1868 में हथियारों की एक कोट के अनुदान के साथ उनको पुरस्कृत किया गया था, और 1877 में 13 तोपों की सलामी के साथ उनको नवाज़ा गाया था।
A. हवालदार
B. मंडल
C. जोतेदार
D. लाथ्यल
लाथ्यल का शाब्दिक अर्थहै, जो लाठी या छड़ी ताकतें है। वह जमींदार के एक दिग्गज के रूप में कार्य किया करता था।
A. कपास उत्पादन
B. चाय बाग़ान
C. रबर बागान
D. चावल उत्पादन
भारत में कपास की उत्पादन भरी मात्र में 1861 में हुई थी,उसी दौरान अमेरिकी नागरिक युद्ध छिड़ गई थी। बंबई से कई कपास विशेषज्ञों ने कई कपास जिलों का दौरा किया और उनको प्रोत्साहित किया ।
A. जमींदार
B. सांगत
C. गांव के चयनित रैयतों
D. जोतेदार
अम्लाह जमींदार का एक अधिकारी था,जिसको किराए के संग्रह करने के लिए गांवों का दौरा करना पड़ता था।
A. कलाकार
B. किसान
C. पंडित
D. जमींदार
जोतेदार अन्य रैयतों को ऋण के तौर पर अपनी उपज बेच दिया करते थे । वे उत्तर बंगाल में सबसे अधिक शक्तिशाली थे।
A. पहाड़ी लोग
B. कोल
C. खासिस
D. भिल्स
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, अठारहवीं सदी के दौरान पहाड़ी लोग राजमहल की आसपास की पहाडियों में रहते थे, वे जीवित रहना के लिए वन उपज एवं झूम कृषि का आभास करते थे।
A. अवध
B. ह्य्द्राबाद
C. बंगाल
D. हरयाणा
औपनिवेशिक शासन पहली बार 1757 में, बंगाल में स्थापित किया गया था। जब अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के वित्त पोषित सैनिकों ने सिराज-उद-दौला को प्लासी की लड़ाई मेंहराया था।
A. मद्रास
B. बॉम्बे
C. बंगाल
D. डेक्कन
1760 में, बंगाल (बर्दवान, मिदनापुर और चटगांव) के तीन बड़े और संसाधनों जिलों हासिल किया गया। बंगाल, बिहार और ओडिशा के राजस्व प्रशासन की दीवानी 1765 में अधिग्रहण कर लिया गाया था।
A. साहूकार
B. जमींदार
C. जोतेदार
D. तालुकदार
साहूकार हमेशा रैयतों के लिए लंबी अवधि के ऋण का विस्तार करने के लिए तैयार रहते थे।
A. महताब चाँद
B. सिधु मांझी
C. अंदुल राज
D. तेज्चंद
सिद्धू मांझी संथाल विद्रोह के नेता थे। 30 वीं जून 1855 पर, सिद्धू और कान्हू मुर्मू दस हजार संथाल जुटाए और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के खिलाफ एक विद्रोह की घोषणा की।
A. 1793-1815.
B. 1794-1815.
C. 1795-1815.
D. 17961815.
वे एक चिकिशक थे। उन्होंने कलकत्ता चिड़ियाघर का आयोजन किया था।
A. अमेरिका
B. इंग्लैंड
C. फ्रांस
D. जर्मनी
औपनिवेशिक अधिकारियों ने अपने कॉलेज के वर्षों के दौरान रिकार्डियन विचारों से प्रभावित थे।
A. जमींदार
B. रैयत
C. जोतेदार
D. साहूकार
रैयतवारी राजस्व प्रणाली बॉम्बे डेक्कन द्वारा शुरू की गई थी। इसका पुन: सर्वेक्षण हर ३० वर्ष के बाद होती थी।
A. 1770के दशक
B. 1760के दशक
C. 1750के दशक
D. 1740के दशक
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी (E.E.I.C.) बंगाल के ग्रामीण इलाकों में अपने राज स्थापित किया और वहां अपने राजस्व नीतियों को लागू किया।
A. दरबारियों
B. न्यायालय
C. राजस्व
D. मंदिरों
ईस्ट इंडिया कंपनीज़मींदारो को नियंत्रित करने और विनियमित करना चाहती थी।
A. असम
B. बंगाल
C. चेन्नई
D. डेक्कन
रेलवे के तेजी विकास से पुराने पारंपरिक व्यापारिक केंद्रों में से अर्थव्यवस्था हिल गई। मिर्जापुर, पूर्वी उत्तर प्रदेश में, कच्चे कपास की एक मशहूर संग्रह केंद्र था।
A. 10 वर्ष
B. 20 वर्ष
C. 30 वर्ष
D. 40 वर्ष
रैयतवारी प्रणाली ब्रिटिश भारत के कुछ भागों में स्थापित किया गया था। इस प्रणाली को कृषि भूमि के कृषकों से राजस्व इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल किया गया था। इस प्रणाली के तहत भूमि हर 30 साल का सर्वेक्षण किया जाता था।
A. चार्ल्स कोर्न्वाल्लिस
B. फ्रांसिस बुचानन
C. लार्ड ऐक्टन
D. लार्ड वेल्लेस्ले
फ्रांसिस बुचानन बॉटनिकल गार्डन के प्रभारी थे। वे एक चिकिशक थे। वे सन 1794 से सन 1815 के बीच बंगाल मेडिकल सेवा में कार्य किया था।
A. बर्दवान
B. कर्नाटक
C. मालवा
D. राजमहल पहाड़िया
यह बंगाल के प्रांत में सबसे अमीर और सबसे बड़ा सामंती सम्पदा में से एक था।
भारतीय कारीगरों को कम कीमत पर कंपनी को अपना माल बेचने के लिए बाध्य किया गया था।
जब एक देश दूसरे देश पर अधिकार कर लेता है, इसकी संप्रभु स्थिति अपने हाथों में ले लेता है, और उसकी राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था का निर्देशन करता है, तब यह प्रक्रिया औपनिवेशीकरण के रूप में जानी जाती है
उन्नीसवीं सदी में, निर्धन लोगों ने अपने गावों को छोड़ दिया था और वे नव निर्मित कारखानों और नगर पालिकाओं में रोजगार की तलाश में शहरों की ओर चले गए थे।
किसान के पास उत्पादन के मुख्य साधन के रूप में पशु होते थे। ऋण का भार उतारने हेतु ऋणदाता को अपने पशु देने के बाद उसे जमीन और पशु भाड़े पर लेने पड़े। अब उसे उन पशुओं के लिए, जो मूल रूप से उसके अपने ही थे, भाड़ा चुकाना पड़ता था।
एलेक्ज़ेंडर रीड और थॉमस मुनरो रैयतवाड़ी प्रणाली के विस्तार में सम्मिलित दो व्यक्ति थे, इस प्रणाली को मुनरो व्यवस्था के रूप में भी जाना जाता है।
भारतीय कारीगरों को कम कीमत पर कंपनी को अपना माल बेचने के लिए बाध्य किया गया था।
1770 के दौरान बंगाल में एक भीषण अकाल पड़ा था,जिसमें आबादी के एक-तिहाई हिस्से का सफाया हो गया था।
राजा और तालुकदारों को स्थायी बंदोबस्त अधिनियम के तहत जमींदार के रूप में मान्यता दी गई थी ।
फ्रांसिस बुकानन के उत्तरी बंगाल के दिनाजपुर जिले के सर्वेक्षण में हमें धनी किसानों के इस वर्ग का, जिन्हें ‘जोतदार’ कहा जाता था। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक आते-आते, जोतदारों ने जमीन के बड़े-बड़े रकबे, जो कभी-कभी तो कई हजार एकड़ में फैले थे,अर्जित कर लिए थे। स्थानीय व्यापार और साहूकार के कारोबार पर भी उनका नियंत्रण था और इस प्रकार वे उस क्षेत्र के गरीब काश्तकारों पर व्यापक शक्ति का प्रयोग करते थे।
किरायाजीवी शब्द ऐसे लोगों का द्योतक है जो अपनी संपत्ति के किराए की आय पर जीवनयापन करते हैं।
किसान को अपने कृषि के मुख्य साधन जमीन,गाडि़याँ, पशुधन देने पड़े।
बागान मालिकों के खिलाफ किसानों के विद्रोह को स्थानीय जमींदार और गांव के मुखिया द्वारा समर्थित किया गया था, गांव के मुखिया ने लाठियों के साथ जमकर लड़ाई लड़ी थी, जमींदारों ने रैयतों से बागान मालिकों का विरोध करने का आग्रह किया।
1) साहूकारों (दीकू) द्वारा ऊंची ब्याज दर पर कर्ज देना व कर्ज न चुका पाने पर भूमि पर बलात् अधिकार ।2) ब्रिटिश सरकार द्वारा संथालों की कृषि भूमि पर भारी कर लगाना ।
1857 में, ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना हुई और 1859 में मैनचेस्टर कॉटन कंपनी बनाई गई। उनका उद्देश्य दुनिया के हर भाग में कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित करना था जिससे कि उनकी कंपनी का विकास हो सके।
बॉम्बे प्रेजिडेंसी में पूना एवं अहमदनगर जीले में, अनेक गाँवों में 1875 में हुए दंगों के कारणों की खोज-बीन करने हेतु भारत में नियुक्त किये गए दक्कन दंगा आयोग की रिपोर्ट थी । इसके अनुसार रैय्यत विद्रोह का कारण किसानों की ऋणग्रस्तता थी ।
ब्रिटिश काल में दक्कन में दंगा होने का मुख्य कारण - महाराष्ट्र के सतारा, पुणे व नगर जिले के कुछ भागों में किसानों द्वारा साहुकारों के विरूद्ध ऊँची ब्याज पर ऋण देने व ऋण बंध पत्र व अन्य दस्तावेजों को नष्ट करने के लिए हुआ था ।
जमींदार राज्य को निश्चित राजस्व का भुगतान करने में असफल रहे थे।
इस असफलता के कई कारण थे:
1)प्रारंभिक माँगें बहुत ऊंची थी।
2) यह ऊंची माँग उस समय में लागू की गई थी जब कृषी की उपज की कीमतें नीची थीं, जिससे रैयत (किसानों) के लिए, जमींदार को उनकी देय राशियाँ चुकाना मुश्किल था।
3) राजस्व असमान था, फसल अच्छी हो या ख़राब राजस्व का ठीक समय पर भुगतान जरूरी था।
4) सूर्यास्त विधि कानून के अनुसार, यदि निश्चित तारीख़ को सूर्य अस्त होने तक भुगतान नहीं आता था तो जमींदारी को नीलाम किया जा सकता था।
1)बुकानन की पत्रिका से हमें पहाड़ीया लोगों के बारे में जानकारी के स्त्रोत प्राप्त होते हैं। उसने अपनी पत्रिका,उन स्थानों जिनका उसने भ्रमण किया था के बारे में एक डायरी के रूप में लिखी थी।
2) अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पहाड़ीया लोग राजमहल की पहाडि़यों के इर्द-गिर्द रहा करते थे। वे राजमहल की पहाडि़यों के जंगल की उपज से अपनी गुजर-बसर करते थे और झूम खेती किया करते थे।
3) उन्होने अपने मुख्य औज़ार कुदाल से जंगल को साफ कर उसे खेती योग्य बनाया।जमीन पर ये पहाडि़या लोग अपने खाने के लिए तरह-तरह की दालें और ज्वार-बाजरा उगा लेते थे।
गाँवों में, जोतदारों की शक्ति, जमींदारों की ताकत की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती थी। जमींदार के विपरीत जो शहरी इलाकों में रहते थे, जोतदार गाँवों में ही रहते थे और गरीब ग्रामवासियों के काफी बडे़ वर्ग पर सीधे अपने नियंत्रण का प्रयोग करते थे। जमींदारों द्वारा गाँव की जमा (लगान) को बढ़ाने के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों का वे घोर प्रतिरोध् करते थे, जमींदारी अधिकारियों को अपने कर्तव्यों का पालन करने से रोकते थे, जो रैयत उन पर निर्भर रहते थे उन्हें वे अपने पक्ष में एकजुट रखते थे और जमींदार को राजस्व के भुगतान में जान-बूझकर देरी करा देते थे। सच तो यह है कि जब राजस्व
का भुगतान न किए जाने पर जमींदार की जमींदारी को नीलाम किया जाता था तो अकसर जोतदार ही उन जमीनों को ख़रीद लेते थे।उत्तरी बंगाल में जोतदार सबसे अधिक शक्तिशाली थे, हालांकि धनी किसान और गाँव के मुखिया लोग भी बंगाल के अन्य भागों के देहाती इलाकों में प्रभावशाली बनकर उभर रहे थे। कुछ जगहों पर उन्हें ‘हवलदार ’ कहा जाता था और कुछ अन्य स्थानों पर वे गाँटीदार या ‘ मंडल ’ कहलाते थे।
दरबार लगाते समय एक विशाल
1) सूरत से आगरा मार्ग जो प.राजस्थान से होकर गुजरता था । दूसरा मार्ग मालवा व खानदेश होता हुआ सूरत व आगरा को जोड़ता था। 2) आगरा से मध्य एशिया तक - यह मार्ग दिल्ली लाहौर व काबुल होता हुआ कंधार तक जाता था।
दीवान की नियुक्ति सम्राट करता था यह सूबेदार के बाद सबसे बड़ा अधिकारी था दीवान सूबेदार पर नियंत्रण रखता था दीवान समस्त सूचनाएँ दीवान-ए-अशरफ को भेजता था दीवान भूमि-कर वसूलता था दीवान दीवानी के मुकदमों का निर्णय करता था तथा कृषि में सुधार करना पड़ता था सूबे के कोष पर उसका नियंत्रण होता था उसकी अनुमति के बिना धन व्यय नहीं किया जाता था ।
यह सेना सम्राट की अंगरक्षक सेना थी इसके सैनिकों की नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती थी इस सेना का अपना एक पृथक विभाग था इसका प्रत्येक सैनिक अपना घोड़ा स्वयं लाता था सम्राट इस सेना को नगद वेतन देता था सम्राट का कोई विश्वस्त आमीर इस सेना का प्रधान होता था ।
मुग़ल सम्राट ने अपनी सेना को चार भागों में विभाजित किया था इन चार सैन्य विभागों के नाम थे -
1-अहदी सेना
2- दाखिली सेना
3- स्थायी सेना
4- मनसबदारी सेना।
ग्राम के प्रबंध का भार ग्राम पंचायतों के हाथों में था ग्राम का मुकद्दम ग्राम पंचायत की बैठक की अध्यक्षता करता था ग्राम पंचायत के निर्णय को सरकारी अधिकारी भी मान्यता देते थे ग्रामीणों के विवाद का निर्णय पंच करते थे ।
मनसब अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है पद मुग़लकाल में बड़े-बड़े पदाधिकारियों के पद मनसबदारी प्रथा के द्वारा निश्चित किये जाते थे उनके पद, वेतन और मुग़ल दरबार में उनके स्थान का पता उनके मनसब के द्वारा ही लगाया जा सकता था ।
अकबर ने मनसबदारों में जात और सवार का नवीन पद का आरम्भ किया
जात पद का अर्थ है पैदल सैनिक
सवार पद का अर्थ है घुड़सवार ।
जहीरुद्दीन बाबर मुगल साम्राज्य का संस्थापक था। उसने सबसे पहले स्वयं को काबुल में स्थापित किया और फिर 1526 में अपने दल के सदस्यों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए क्षेत्रों और संसाधनों की खोज में वह भारतीय उपमहाद्वीप में और आगे की ओर बढ़ा क्योंकि उसका पहला उद्देश्य अपने पैतृक प्रदेशों को पुनः प्राप्त करने के लिए संसाधनों को पुनः प्राप्त करना था।
जलालुद्दीन अकबर को मुगल बादशाहों में महानतम माना है क्योंकि उसने न केवल अपने साम्राज्य का विस्तार ही किया बल्कि इसे अपने समय का विशालतम, दृढ़तम और सबसे समृद्ध राज्य बनाकर सुदृढ़ भी किया। अकबर हिंदुकुश पर्वत तक अपने साम्राज्य की सीमाओं के विस्तार में सफल हुआ और उसने ईरान के सफावियों और तूरान (मध्य एशिया) के उजबेकों की विस्तारवादी योजनाओं पर लगाम लगाए रखी। इसके अलावा उसने कई सांस्कृतिक तत्वों का भी विस्तार किया।
मुगल नाम का व्युत्पन्न मंगोल से हुआ है। यद्यपि आज यह नाम एक साम्राज्य की भव्यता का अहसास कराता है लेकिन राजवंश के शासकों ने स्वयं के लिए यह नाम नहीं चुना था। उन्होंने अपने को तैमूरी कहा क्योंकि पितृपक्ष से वे तुर्की शासक तिमूर के वंशज थे। सोलहवीं शताब्दी के दौरान यूरोपियों ने परिवार की इस शाखा के भारतीय शासकों का वर्णन करने के लिए मुगल शब्द का प्रयोग किया।
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों के दौरान शाही संस्थाओं के ढाँचे का निर्माण हुआ। इनके अंतर्गत प्रशासन और कराधान के प्रभावशाली तरीके शामिल थे। मुगल शक्ति का सुस्पष्ट केंद्र दरबार था। यहाँ राजनीतिक संबंध गढ़े जाते थे, साथ ही श्रेणियाँ और हैसियतें परिभाषित की जाती थीं। मुगलों द्वारा शुरू की गई राजनीतिक व्यवस्था सैन्य शक्ति और उपमहाद्वीप की भिन्न-भिन्न परंपराओं को समायोजित करने की चेतन नीति के संयोजन पर आधारित थी।
गुलबदन बेगम बाबर की पुत्री, तथा हूमायूँ की बहन थी उसने राजाओं और राजकुमारों के बीच चलने वाले संघर्षों और तनावों के साथ ही इनमें से कुछ संघर्षों को सुलझाने में परिवार की उम्रदराज स्त्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं के बारे में विस्तार से लिखा।
उस अवधि के भारत-फारसी स्रोतों द्वारा किसानों के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द रैयत (बहुवचन,रियाया) अथवा मुज़ारियन था, हम किसान अथवा असामी शब्द भी प्राप्त करते हैं, 17 वी शताब्दी के स्त्रोत दो प्रकार के किसानों का वर्णन करते हैं- खुदकाश्त एवं पाहीकाश्त, खुदकाश्त, गाँव का निवासी होता था, जिसमें उनकी भूमी होती थी,पाहीकाश्त अनिवासी कृषक होते थे, जो किसी अन्य गाँव से संबंद्ध रखते थे, एवं अनुबंध के आधार पर भूमि जोतते थे। अकाल के संकट का सामना करने के कारण, लोग अपनी स्वेच्छा से पाहीकाश्त बन गए। किसानों के पास बैल की एक जोड़ी और दो हल से अधिक नहीं होता था। गुजरात में छह एकड़ जमीन रखने वाले किसानों को धनवान समझा जाता था, और बंगाल में, एक औसत किसान के पास अधिकतम 5 एकड़ जमीन होती थी, और 10 एकड़ जमीन एक किसान को समृद्ध असामी बनाती थी। खेती व्यक्तिगत स्वामित्व के सिद्धांत पर आधारित थी और किसान की भूमि को उसी तरह से खरीदा और बेचा जाता था जैसे कि अन्य संपत्ति के मालिक की भूमि को।
अकबर को सुदृढ़ता की ज़रूरत थी। इसके लिए अकबर ने अपने सैनिक-अधिकारियों और सिपाहियों को सुगठित किया । उसने इन लक्ष्यों की पूर्ति मनसबदारी प्रणाली से की। शासन का काम चलाने वाले कई अधिकारी और करमचारियों को मनसबदार कहा जाता था। पुरे मुग़ल साम्राज्य में हजारों छोटे-बड़े मनसबदार यानी शासकीय अधिकारी व कर्मचारी थे। मनसबदार साम्राज्य में बादशाह के कानून और आदेश लागू करते थे। बादशाह के खिलाफ अगर कोई विद्रोह करे तो मनसबदार विद्रोह दबाते थे। मुग़ल साम्राज्य की रक्षा करना और दूसरे क्षेत्रों में मुग़ल वंश का राज्य फैलाना भी मनसबदारों का काम था। यह मनसबदार सम्राट के लिए घुड़सवारों की सेना बनाते थे एवं ज़रूरत पड़ने पर सम्राट के साथ युद्ध में भी जाते थे ।
शेरशाह एक कुशल प्रशासक था वह धर्म-निरपेक्ष और उदार ह्रदय वाला सम्राट था । उसने जिस नवीन प्रशासनिक व्यवस्था की योजना बनाई। वह उनकी योग्यता को दर्शाता है उसने इन योजनाओं को बिना किसी भेदभाव के सम्पूर्ण राज्य में क्रियान्वित कराया । उसने अपनी अर्थव्यस्था को भी सुधारने में अपनी बुद्धि का परिचय दिया। भूमि कर एवं जन-कल्याण से सम्बंधित कार्यों को बिना किसी भेदभाव के पूर्ण किया । उसने न्याय तथा नियुक्ति के मामलों को भी निष्पक्ष रखा । इस प्रकार हम कहा सकते है कि शेरशाह एक राष्ट्रीय सम्राट था।
शेरशाह ने धार्मिक सहिष्णुता का सिद्धांत अपनाया था । वह प्रथम मुस्लिम शासक था। जिसकी दृष्टि में उसकी सम्पूर्ण प्रजा समान थी । चाहे वह किसी भी धर्म के अनुयायी क्या न हो एक दूरदर्शी राजनीतिय होने के नाते वह इस बात को समझ चुका था कि हिन्दुओं के देश भारत में, जहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू है, उसका विचार था कि धार्मिक अत्याचारों के आधार पर राज्य को स्थायी नहीं बनाया जा सकता ।
जो राजस्व प्रणाली बम्बई दक्कन में लागू की गई उसे रैयतवाड़ी कहा जाता है। बंगाल में लागू की गई प्रणाली के विपरीत, इस प्रणाली के अंतर्गत राजस्व की राशि सीधे रैयत के साथ तय की जाती थी। भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमि से होने वाली औसत आय का अनुमान लगा लिया जाता था। रैयत की राजस्व अदा करने की क्षमता का आकलन कर लिया जाता था और सरकार के हिस्से के रूप में उसका एक अनुपात निर्धारित कर दिया जाता था। हर 30 साल के बाद जमीनों का फिर से सर्वेक्षण किया जाता था और राजस्व की दर तदनुसार बढ़ा दी जाती थी। इसलिए राजस्व की माँग अब चिरस्थायी नहीं रही थी।
1860 के दशक से पहले, ब्रिटेन में कच्चे माल के तौर पर आयात की जाने वाली समस्त कपास का तीन-चौथाई भाग अमेरिका से आता था ब्रिटेन के सूती वस्त्रों के विनिर्माता काफी लंबे अरसे से अमेरिकी कपास पर अपनी निर्भरता के कारण बहुत परेशान थे उनकी चिंता का विषय यह था कि अगर यह स्त्रोत बंद हो गया तो उनका क्या होगा। इस प्रश्न से विचलित होकर, वे बड़े उत्सुकता से कपास की आपूर्ति के वैकल्पिक स्त्रोत खोज रहे थे।
1857 में, ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना हुई और 1859 में मैनचेस्टर कॉटन कंपनी बनाई गई। उनका उद्देश्य दुनिया के हर भाग में कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित करना था जिससे कि उनकी कंपनी का विकास हो सके। भारत को एक ऐसा देश समझा गया जो अमेरिका से कपास की आपूर्ति बंद हो जाने की सूरत में, लंकाशायर को कपास भेज सकेगा। भारत की भूमी और जलवायु दोनों ही कपास की खेती के लिए उपयुक्त थे और यहाँ सस्ता श्रम उपलब्ध था।
जब सन् 1861 में अमेरिकी गृहयुद्ध छिड़ गया तो ब्रिटेन के कपास क्षेत्र (मंडी तथा कारखानों) में तहलका मच गया। अमेरिका से आने वाली कच्ची कपास वेफ आयात में भारी गिरावट आ गई। वह सामान्य मात्रा का 3 प्रतिशत से भी कम हो गयाः 1861 में जहाँ 20 लाख गाँठें (हर गाँठ 400 पाउंड की) आई थीं वहीं 1862 में केवल 55 हजार गाँठों का आयात हुआ। भारत तथा अन्य देशों को बड़ी व्यग्रता के साथ यह संदेश भेजा गया कि ब्रिटेन को कपास का अधिक मात्रा में निर्यात करें।
जून, 1875 में, महाराष्ट्र के किसानों ने पुणे, सतारा और नागर जिलों के कुछ हिस्सों में बढ़ते कृषि संकट के खिलाफ विद्रोह कर दिया।
1875 के दंगों ने साहूकारों के अधीन ऋणदासों की दयनीय स्थिति को अपना निशाना बनाया। दंगा करने वालों का मुख्य उद्देश्य साहूकारों से उनके बही-खातों और ऋणबंधों को प्राप्त कर उन्हें नष्ट कर देना था।
क्योंकि भारतीय कृषि को विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया गया था अतः ऋण, वाणिज्य, असमानता और विकास परस्पर संबद्ध थे। किसानों के संकट की उत्पत्ति कृषि कीमतों में गिरावट, भारी कराधान, और राजनीतिक दुर्बलता की भावना की वजह से हुई थी। ब्रिटिश भू-राजस्व की नीतियों के अंतर्गत कृषि के वाणिज्यीकरण के तहत भूमि में उत्पादक निवेश का वित्तपोषण करने हेतु ऋण लेने पर उसके साथ सूद जोड़ने की व्यवस्था से छोटे किसानों पर बोझ बढ़ गया।
यूरोपीय व्यापारियों द्वारा अग्रिम पूंजी निवेश से स्थानीय साहूकारों ने उनके लेनदारों की संपत्ति और श्रम पर असीमित अधिकार प्राप्त कर लिए; इससे उन्हें लेनदारों को पूरी तरह से बर्बाद करने और अपना गुलाम बनाने की शक्ति दे दी।
वासुदेव बलवंत फड़के ने 1879 में ब्रिटिश शासन को खदेड़ कर एक भारतीय गणतंत्र की स्थापना करने के लिए उनके खिलाफ एक हिंसक अभियान छेड़ दिया। लेकिन, उनके विद्रोह को सीमित सफलता ही हाथ लगी।
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था जो भारत आया और बंगाल चिकित्सा सेवा में (1794 से 1815 तक ) कार्य किया। कुछ वर्षों तक, वह भारत के गर्वनर जनरल लार्ड वेलेजली का शल्य-चिकित्सक रहा। कलकत्ता (वर्तमान में कोलकत्ता) के अपने प्रवास के दौरान उसने कलकत्ता में एक चिडि़याघर की स्थापना की, जो कलकत्ता अलीपुर चिडि़याघर कहलाया। वे थोड़े समय के लिए वानस्पतिक उद्यान के प्रभारी रहे। बंगाल सरकार के अनुरोध पर उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार क्षेत्र में आने वाली भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण किया। 1815 में वह बीमार हो गए और इंग्लैण्ड चले गए।
वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एक कर्मचारी था। उसकी यात्राएँ केवल भूदृश्यों के प्यार और अज्ञात की खोज से ही प्रेरित नहीं थीं। वह नक्शा नवीसों, सर्वेक्षकों, पालकी उठाने वालों कुलियों आदि के बड़े दल के साथ सर्वत्र यात्रा करता था। उसकी यात्राओं का खर्च ईस्ट इंडिया कंपनी उठाती थी क्योंकि उसे उन सूचनाओं की आवश्यकता थी जो बुकानन प्रत्याशित रूप से इकट्ठी करता था। बुकानन को यह साफ-साफ हिदायत दी जाती थी कि उसे क्या देखना, खोजना और लिखना है। वह जब भी अपने लोगों की फौज के साथ किसी गाँव में आता तो उसे तत्काल सरकार के एक एजेंट के रूप में ही देखा जाता था।जब कंपनी ने अपनी शक्ति को सुदृढ़ बना लिया और अपने व्यवसाय का विकास कर लिया तो वह उन प्राकृतिक साधनों की खोज में जुट गई जिन पर कब्जा करके उनका मनचाहा उपयोग कर सकती थी। उसने परिदृश्यों तथा राजस्व स्त्रोतों का सर्वेक्षण किया, खोज यात्राएँ आयोजित कीं, और जानकारी इकट्ठी करने के लिए अपने भूविज्ञानियों, भूगोलवेत्ताओं, वनस्पति विज्ञानियों और चिकित्सकों को भेजा। निस्संदेह असाधारण प्रेक्षण शक्ति का धनी बुकानन ऐसा ही एक व्यक्ति था।बुकानन जहाँ कहीं भी गया, वहाँ उसने पत्थरों तथा चट्टानों और वहाँ की भूमि के भिन्न-भिन्न स्तरों तथा परतों को ध्यानपूर्वक देखा। उसने वाणिज्यिक दृष्टि से मूल्यवान पत्थरों तथा खनिजों को खोजने की कोशिश की, उसने लौह खनिज और अभ्रक, ग्रेनाइट तथा साल्टपीटर से संबंधित सभी स्थानों का पता लगाया। उसने सावधानीपूर्वक नमक बनाने और कच्चा लोहा निकालने की स्थानीय पद्धतियों का निरीक्षण किया। जब बुकानन किसी भूदृश्य के बारे में लिखता था तो वह अकसर इतना ही नहीं लिखता था कि उसने क्या देखा है और भूदृश्य कैसा था, बल्कि वह यह भी लिखता था कि उसमें फेरबदल करके उसे अधिक उत्पादक कैसे बनाया जा सकता है- वहाँ कौन-सी फसलें बोई जा सकती हैं, कौन-से पेड़ काटे जा सकते हैं और कौन-से उगाए जा सकते हैं और हमें यह भी याद रखना होगा कि उसकी सूक्ष्म दृष्टि और प्राथमिकताएँ स्थानीय निवासियों से भिन्न होती थीं:
क्या आवश्यक है इस बारे में उसका आकलन कंपनी के वाणिज्यिक सरोकारों से और प्रगति के संबंध में आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा से निर्धारित होता था। वह अनिवार्य रूप से वनवासियों की जीवन-शैली का आलोचक था और यह महसूस करता था कि वनों को कृषी भूमि में बदलना ही होगा।
संथाल 1780 के दशक के आस-पास बंगाल में आने लगे थे। जमींदार लोग खेती के लिए नयी भूमि तैयार करने और खेती का विस्तार करने के लिए उन्हें भाड़े पर रखते थे और ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जंगल महालों में बसने का निमंत्राण दिया। जब ब्रिटिश लोग पहाडि़यों को अपने बस में करके स्थायी कृषि के लिए एक स्थान पर बसाने में असफल रहे तो उनका ध्यान संथालों की ओर गया। पहाडि़या लोग जंगल काटने के लिए हल को हाथ लगाने को तैयार नहीं थे और अब भी उपद्रवी व्यवहार करते थे। जबकि,इसके विपरीत, संथाल आदर्श बाशिंदे प्रतीत हुए, क्योंकि उन्हें जंगलों का सफाया करने में कोई हिचक नहीं थी और वे भूमि को पूरी ताकत लगाकर जोतते थे।संथालों को जमीनें देकर राजमहल की तलहटी में बसने के लिए तैयार कर लिया गया। 1832 तक, जमीन के एक काफी बड़े इलाके को दामिन-इ-कोह के रूप में सीमांकित कर दिया गया। इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया गया। उन्हें इस इलाके के भीतर रहना था, हल चलाकर खेती करनी थी और स्थायी किसान बनना था। संथालों को दी जाने वाली भूमि के अनुदान-पत्र में यह शर्त थी कि उनको दी गई भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को साफ करके पहले दस वर्षों के भीतर जोतना था। इस पूरे क्षेत्र का सर्वेक्षण करके उसका नक्शा तैयार किया गया। इसके चारों ओर खंबे गाड़कर इसकी परिसीमा निर्धारित कर दी गई और इसे मैदानी इलाके के स्थायी कृषकों की दुनिया से और पहाडि़या लोगों की पहाडि़यों से अलग कर दिया गया। दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद, संथालों की बस्तियाँ बड़ी तेजी से बढ़ीं, संथालों के गाँवों की संख्या जो 1838 में 40 थी, तेजी से बढ़कर 1851 तक 1,473 तक पहुँच गई। इसी अवधि में, संथालों की जनसंख्या जो केवल 3,000 थी, बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। जैसे-जैसे खेती का विस्तार होता गया, वैसे-वैसे कंपनी की तिजोरियों में राजस्व राशि में वृद्धि होती गई। उन्नीसवीं शताब्दी वेफ संथाल गीतों और मिथकों में उनकी यात्रा के लंबे इतिहास का बार-बार उल्लेख किया गया हैः उनमें कहा गया है कि संथाल लोग अपने लिए बसने योग्य स्थान की खोज में बराबर बिना थके चलते ही रहते थे। अब यहाँ दामिन-इ-कोह में आकर मानो उनकी इस यात्रा को पूर्ण विराम लग गया। जब संथाल राजमहल की पहाडि़यों पर बसे तो पहले पहाडि़या लोगों ने इसका प्रतिरोध किया पर अंततोगत्वा वे इन पहाडि़यों में भीतर की ओर चले जाने के लिए मजबूर कर दिए गए। उन्हें निचली पहाडि़यों तथा घाटियों में नीचे की ओर आने से रोक दिया गया और ऊपरी पहाडि़यों के चट्टानी और अधिक बंजर इलाकों तथा भीतरी शुष्क भागों तक सीमित कर दिया गया। इससे उनके रहन-सहन तथा जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा और आगे चलकर वे गरीब हो गए। झूम खेती नयी-से-नयी जमीनें खोजने और भूमि की प्राकृतिक उर्वरता का उपयोग करने की क्षमता पर निर्भर रहती है। अब सर्वाधिक उर्वर ज़मीनें उनके लिए दुर्लभ हो गईं क्योंकि वे अब दामिन का हिस्सा बन विरुद्ध विद्रोह करने का समय अब आ गया है। 1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद संथाल परगने का निर्माण कर दिया गया, जिसके लिए 5,500 वर्गमील का क्षेत्र भागलपुर और बीरभूम जिलों में से लिया गया। औपनिवेशिक राज को आशा थी कि संथालों के लिए नया परगना बनाने और उसमें कुछ विशेष कानून लागू करने से संथाल लोग संतुष्ट हो जाएँगे।
A. 1829.
B. 1830.
C. 1831.
D. 1832.
सती प्रथा भारत में प्रचलित सामाजिक बुराइयों में से एक थी।इसके अनुसार हिन्दू विधवा को अपने मृत पति की चिता पर खुद को जलाना पड़ता था।लार्ड विलियम बेंटिंक ने राजा राममोहन रॉय की मदद से इस प्रथा को समाप्त कराया।लेकिन इसे भारतियों के धार्मिक विश्वासों में ईस्ट इंडिया कंपनी के हस्तक्षेप के रूप में देखा गया।
A. लखनऊ।
B. मेरठ।
C. बरेली।
D. कानपुर।
1857 का विद्रोह मेरठ से शुरू हुआ था।10 मई 1857 को मेरठ छावनी के सिपाहियों ने हथियार और गोला बारूद पर क़ब्ज़ा कर लिया और फिर गोरों पर हमला कर दिया। उनके घरों को लूटा व उनमें आग लगा दी।सभी सरकारी इमारतों को लूटा व तबाह किया गया।दिल्ली के लिए टेलीग्राफ लाइन को काट दिया गया।