CBSE - MCQ Question Banks (के. मा. शि. बो . -प्रश्नमाला )

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Q. 161001 1857 के विद्रोह के .............नाममात्र नेता थे।


A. नाना साहब।

B. बहादुर शाह द्वितीय।

C. रानी लक्ष्मी बाई।

D. बेगम हजरत महल।

Right Answer is: B

SOLUTION

मेरठ के सिपाही दिल्ली पहुंचे और मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय से आग्रह किया, विद्रोह का नेतृत्व संभालने के लिए। बूढी उम्र के शासक ने पहले प्रस्ताव को अस्वीकार करना चाहा लेकिन सिपाहियों के दबाव के कारण प्रस्ताव को स्वीकार करना पड़ा।इस तरह इस सिपाहियों के ग़दर ने एक आम विद्रोह का रूप ले लिया।


Q. 161002 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ चौरासी देस का नेतृत्व ...... ने किया था।


A. कुंवर सिंह।

B. गोनू

C. शाह मल।

D. मौलवी अहमदुल्लाह शाह

Right Answer is: C

SOLUTION

शाह मल उत्तर प्रदेश के परगना बरौटमें एक बड़े गांव में रहते थे। वह जाट किसानों के एक क़बीले से सम्बंधित थे जिसकी नातेदारी 84 गांवों तक फैली हुई थी।उन्होंने गांवों के मुख्याओं और किसानों को साथ मिलाया और अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लिया।


Q. 161003 अवध के विलय के बाद, नवाब वाजिद अली शाह को.....निर्वासित किया गया था


A. झांसी

B. कलकत्ता

C. दिल्ली

D. नागपुर

Right Answer is: B

SOLUTION

अवध राज्य पर 1856 में अंग्रेजों द्वारा कब्जा कर लिया गया था, नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों द्वारा  कलकत्ता (कोलकाता) के पड़ोस में मटियाबुर्ज भेज दिया गया था।


Q. 161004 ब्रिटिश शासन काल में 'रेजिडेंट' ....... था।


A. एक राज्य के शासक।

B. एक ब्रिटिश प्रतिनिधि।

C. एक सैनिक।

D. एक कमांडर।

Right Answer is: B

SOLUTION

'रेजिडेंट' गवर्नर-जनरल का एक प्रतिनिधि होता था, जो ऐसे राज्य में रहता था जो सीधे तौर पर अंग्रेजी शासन के तहत नहीं आता हो।रेजिडेंट उस राज्य के शासक को मजबूर करता था कि वह उनकी सलाह के अनुसार कार्य करे।


Q. 161005 सती प्रथा .....द्वारासमाप्तकी गई थी


A. लार्ड कैनिंग।

B. लॉर्ड कर्जन।

C. लार्ड विलियम बेंटिंक।

D. लार्ड वारेन हेस्टिंग्स।

Right Answer is: C

SOLUTION

लार्ड विलियम बेंटिंक भारतीय समाज, जो काफी पिछड़ा और रूढ़िवादी था, में परिवर्तन लाना चाहते थे।लेकिन भारतीय रूढ़िवादियों ने उसे अच्छी नज़र से नहीं देखा।


Q. 161006 कानपूर में, 1857 के विद्रोह का नेतृत्व.....द्वारा किया गया था।


A. नाना साहेब।

B. तात्या टोपे।

C. मौलवी शाह अहमदुल्लाह

D. रानी लक्ष्मी बाई।

Right Answer is: A

SOLUTION

कानपूर में विद्रोह का नेतृत्व संभालने के बाद, नाना साहेब ने अंग्रेजों की एक बड़ी संख्या को पकड़ लिया, उनकी पत्नियों और बच्चों के साथ। हालांकि नाना साहेब ने उनसे सुरक्षित हिरासत का वादा किया था,लेकिन एक नाराज भीड़ ने उन्हें गोली मार दी, जबकि वे गंगा पार कर रहे थे।


Q. 161007 1857 के विद्रोह के सन्दर्भ में, शब्द 'ग़दर' .....के विद्रोह को संदर्भित करता है।


A. सिपाहियों।

B. किसानों।

C. जमींदार।

D. जागीरदारों।

Right Answer is: A

SOLUTION

'गदर' सशस्त्र बलों के भीतर नियमों और विनियमों की एक सामूहिक अवज्ञा करने के लिए संदर्भित करता है। 1857 के विद्रोह के संदर्भ में, शब्द 'गदर' मुख्य रूप से सिपाहियों के विद्रोह को दर्शाता है।


Q. 161008 नाना साहेब, 1857 विद्रोह के एक नेता, सन ....... में नेपाल भाग गए थे
Right Answer is: C

SOLUTION

1858 के अंत में, जब 1857 का विद्रोह ध्वस्त हो गया, नाना साहिब नेपाल के लिए भाग निकले। उनके भागने की कहानी नाना साहब के साहस और वीरता में एक और तमग़ा है।


Q. 161009 "अवध एक चेरी है जो एक दिन हमारे मुंह में गिर जायगी" यह कथन ..........का है।


A. लार्ड बेंटिंक।

B. लॉर्ड हार्डिंग।

C. लार्ड डलहौजी।

D. लार्ड कैनिंग।

Right Answer is: C

SOLUTION

1851 में लार्ड डलहौज़ी ने कहा था "अवध एक चेरी है जो एक दिन हमारे मुंह में गिर जाएगी"। ठीक 5 साल बाद, 1856 में अवध औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो गया।


Q. 161010 मई 1857 के शुरुवात में, जिस ईस्ट इंडिया कंपनी की रेजिमेंट ने नए कारतूस स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, वह थी...


A. 7वीं नेटिव इन्फेंट्री

B. 34 वीं नेटिव इन्फेंट्री

C. 7वीं अवध अनियमित कैवेलरी

D. 17वीं मेरठ नेटिव कैवेलरी

Right Answer is: C

SOLUTION

ईस्ट इंडिया कंपनी ने अलग-अलग नामों से, अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी सेना को संगठन के आधार पर बांटा था। 7 वीं अवध अनियमित कैवेलरी ने नए कारतूसों को इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था क्योंकि अफवाह फैल गई थी कि उनमे गाये व सुवर की चर्बी की परत है जिसे दांतों से काटना पड़ता है। यह लोगों की धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ था।


Q. 161011 मौलवी अहमदुल्लाह शाह 1857 के विद्रोह नेताओं में से एक थे. उन्होंने ने ..........में शिक्षा हासिल की थी
Right Answer is: C

SOLUTION

मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने हैदराबाद में शिक्षा प्राप्त की।वह विदेशी शासन के खिलाफ थे और भारत में दोबारा से मुस्लिम शासन लाना चाहते थे।इसलिए उन्होंने ने लोगों को प्रेरित किया कि अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद के लिए उठ खड़े हों।


Q. 161012 जिस गवर्नर-जनरल की राज्य हड़पने की नीतियों से उत्तर भारत में विद्रोह हुआ, वह था.....


A. लार्ड कैनिंग।

B. लार्ड डलहौजी।

C. लॉर्ड हार्डिंग।

D. लार्ड वेलेस्ले।

Right Answer is: B

SOLUTION

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी (EEIC) ने भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए कई नीतियों को अपनाया। लार्ड डलहौजी की "डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स" एक ऐसी नीति थी। इस नीति के मुताबिक, अगर एक सहायक राज्य के शासक एक स्वाभाविक उत्तराधिकारी होने के बिना मर गया, उसका राज्य EEIC के साम्राज्य में मिला लिया जाएगा।


Q. 161013 इश्तिहार के अलावा, 1857 के विद्रोहियों ने अपने विचार व्यक्त करने के लिए जिस माध्यम का सहारा लिया, वह था.....


A. समाचार पत्र।

B. पत्र।

C. घोषणाओं।

D. भाषण।

Right Answer is: C

SOLUTION

विद्रोहियों ने इश्तिहार और घोषणाओं का सहारा लिया ताकि वह अपने विचार व्यक्त कर सकें और लोगों को प्रेरित करें कि वह विद्रोह में शामिल हों।इन इश्तिहारों और घोषणाओं में लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया जाता था।हर धर्म और हर जाती के लोगों से विनती की जाती थी कि वह विदेशी शासकों के खिलाफ युद्ध में शामिल होकर अपने आप को आज़ाद करा लें।


Q. 161014 नूरपुर के जमींदार ने शारजहाँ के विरुद्ध किन कारणों से विद्रोह किया था ?
Right Answer is:

SOLUTION

नूरपुर का जमींदार जगत सिंह था उसे जहाँगीर ने उत्तराधिकारी के रूप में जमींदारी प्रदान की  जहाँगीर ने 3000 जात और 2000 सवार का मनसब प्रदान किया था जगत सिंह ने राज्य की सेवा तथा भक्ति की परन्तु फिर भी उसकी पद-वृद्धि   हुई जिसके कारण उसने मालगुजारी देना बंद कर दिया तथा पडौसी राज्य पर विजय प्राप्त करके तारागढ़ नामक दुर्ग का निर्माण कराया इस पर शाहजहाँ ने उसे दरबार में उपस्थित होने की आज्ञा दी उसने आज्ञा की अवहेलना की जिससे उसने दमन के लिए शाही सेनाएं भेजी अंत में हारकर मार्च 1642 ई० में जगत सिंह ने क्षमा माँग ली तथा सम्राट ने उसे जागीर लौटा दी


Q. 161015 उत्तराधिकार के संघर्ष के क्या परिणाम हुए थे ?
Right Answer is:

SOLUTION

जहाँगीर की मृत्यु के पश्चात् नूरजहाँ ने शहरयार को लाहौर के बुलवा भेजा तथा अपने समर्थकों को एकत्रित किया आसफ खाँ ने तत्काल शाहजहाँ को बादशाह की मृत्यु की सूचना भेजी और उसने दवारबख्श को राजसिंहासन पर बैठा  दिया  शाहजहाँ ने राजधानी पहुँचकर उसने राजसिहासन पर खुसरो के अल्पवयस्क  पुत्र दवारबख्श, शहरयार तथा उनके समर्थकों की हत्या की आज्ञा दी इस क्रूर व्यवहार से दुखी होकर हरम की अनेक स्त्रियों ने आत्महत्या कर दीशाहजहाँ अपने सभी विरोधियों का सफाया करके 6 फरवरी ई० को आगरा में राजसिंहासन पर बैठा


Q. 161016 मुगलकाल के पद्धति के दोष पर प्रकाश डालिए ?
Right Answer is:

SOLUTION

मुग़लकाल की पद्धि में अनेक प्रकार के दोष थे 

मुग़लकाल की पद्धि में अनेक प्रकार के दोष थे  मुग़ल आरम्भ में बाहर से आए थे तथा भारत के लिए विदेशी थे लेकिन अकबर ने इस विदेशीपन को दूर करने के का प्रयास किया पहले तो उच्च पदों पर मुग़ल सम्राट ने भारतीय को प्रदान नहीं किये तथा ईरान से अनेक व्यक्तियों को आमंत्रित किया लेकिन निम्न पदों पर उन्होंने भारतीयों को ही नियुक्ति करनी पड़ी क्योकि इतने विशाल देश पर शासन करने के लिए बाहर से सभी व्यक्ति नहीं बुलाए जा सकते थे मुग़ल काल में सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति अवरुद्ध हो गयी तथा मुग़ल सम्राटों ने समाज के उत्थान का कोई प्रयास नहीं किया


Q. 161017 जब्ती प्रथा के क्या दोष थे ?
Right Answer is:

SOLUTION

जब्ती प्रथा से मनसबदारी में अनेक दोष उत्पन्न हो गये थे इस कानून के अनुसार मृत्यु के बाद मनसबदार की सम्पूर्ण संपत्ति  पर उसके पुत्रों अथवा सम्बन्धियों के स्थान पर   राज्य का अधिकार हो गया था मनसबदार एक तो अधिक धन के कारण विलासी हो गये   राज्य को सम्पति छोड़ने से अच्छा वे उस  संपत्ति का उपभोग अपने जीवनकाल में ही करने लगे धन व्यय करना उस समय के सामंत वर्ग की एक साधारण बात थी   मनसबदार सैनिकों को उचित सैन्य प्रशिक्षण नहीं देते थे घोड़ों के रखरखाव की समुचित व्ययस्था नहीं कर पते थे राज्य के वेतन का प्रयोग अपने निजी कार्यों के लिए करते थे।


Q. 161018 अकबर के धार्मिक दृष्टिकोण पर एक टिप्पणी लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

धार्मिक ज्ञान के लिए अकबर की तलाश ने फतेहपुर सीकरी के इबादतखाने में विद्वान मुसलमानों, हिंदुओं, जैनों, पारसियों और ईसाइयों के बीच अंतर-धर्मीय वाद-विवादों को जन्म दिया। अकबर के धार्मिक विचार, विभिन्न धर्मों व संप्रदायों के विद्वानों से प्रश्न पूछने और उनके धर्म-सिद्धांतों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने से,परिपक्व हुए। धीरे-धीरे वह धर्मों को समझने के रूढि़वादी तरीकों से दूर प्रकाश और सूर्य पर केन्द्रित दैवीय उपासना के स्व-कल्पित विभिन्न दर्शन ग्राही रूप की ओर बढ़ा। अकबर ने दीन-ए-इलाही मत की भी स्थापना की।


Q. 161019 मुगल किताब खानों में रचित पांडुलिपियों की रचना में किन-किन लोगों का योगदान होता था?
Right Answer is:

SOLUTION

मुगलकाल में एक शाही किताब खाना था, यहाँ बादशाह की पांडुलिपियों का संग्रह रहता था। यह पांडुलिपियों हस्तलिखित होती थीं। इसी किताब खाने में पांडुलिपियों की रचना की जाती थीं। कागज बनाने वाले लोग पांडुलिपियों के पन्ने तैयार करते थे। सुलेखक पाठों की नकल तैयार करते थे। कोफ्तगर पृष्ठों को चमकाते थे। चित्रकार पाठों के अनुरूप दृश्य चित्रित करते थे। जिल्दसाज पाण्डुलिपि को अलंकृत आवरण प्रदान करते थे। इस प्रकार पाण्डुलिपि तैयार होती थी। लिखने के लिए 5 से 10 एमएम सरकण्डे की नोंक वाली कलम का उपयोग किया जाता था। अकबर ने अब्दुल सम्मद को ’सीरी कलम’ की उपाधि दी थी।


Q. 161020 कौनसे सामाजिक कारक वनवासियों के जीवन में परिवर्तन लेकर आये?
Right Answer is:

SOLUTION

(i)समुदाय के नेताओं के रूप में जनजातियों के सरदार (मुखिया) हुआ करते थे, और उनमें से कई जमींदार बन गए थे और कुछ तो राजा भी बन गए थे, जो जमींदार और राजा बन गए थे उन लोगों को एक सेना रखनी आवश्यक होती थी, सेना के लिए लोगों को एक ही वंश समूह से भर्ती किया जाता था, अथवा उनकी बिरादरी द्वारा सैन्य सेवा उपलब्ध कराने की मांग की जाती थी

(ii) स्त्रोतों के अनुसार, सिंध क्षेत्र में जनजातियों के पास 6000 घुड़सवार फ़ौज और 7000 पैदल सेना से युक्त सेना थी, असम के अहोम राजाओं के पास पाइक लोग, जो भूमि के बदले में सैन्य सेवा प्रदान करते थे, हुआ करते थे, हाथियों पर अधिकार को अहोम राजाओं द्वारा एक शाही एकाधिकार घोषित कर दिया गया था

(iii) आइन-ए-अकबरी के अनुसार, शासकों की महत्वाकांक्षा के कारण युद्ध होना, एक सामान्य घटना हुआ करती थी


Q. 161021 सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के दौरान चांदी के प्रवाह पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ।
Right Answer is:

SOLUTION

सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के दौरान मुगल साम्राज्य, चीन में मिंग, ईरान में सफ़वीद, तुर्की में ऑटोमन (उस्मान राजवंश) की भाँती अपनी शक्ति को मजबूत बनाने और संसाधनों को संचित करने में सक्षम थाइतिहासकारों के अनुसार, समुद्री यात्रा की खोज और यूरोप के साथ एशिया के व्यापार की शुरुआत ने मुगल साम्राज्य की सहायता की, इसका परिणाम भारत के विदेशी व्यापार के विकास के रूप में हुआ, व्यापार में यह विकास, भारत से प्राप्त वस्तुओं के लिए भुगतान करने हेतु बुलियन विशेष रूप से चांदी की भारी मात्रा लेकर आया, चांदी के प्रवाह ने भारत की सहायता की क्योंकि उसके पास चांदी का कोई स्रोत नहीं था, सोलहवीं और अठारहवीं शताब्दी के मध्य की अवधि में भारत में धातु मुद्रा विशेष रूप से चांदी रूपया की उपलब्धता देखी गयी थी, इसने सिक्को की ढलाई के विस्तार और पैसो के व्यापक प्रचलन में मदद की


Q. 161022 शेरशाह ने केंद्रीय शासन-व्यवस्था में मंत्री परिषद् और उससे सम्बंधित प्रशासनिक विभाग का किस प्रकार गठन किया था वर्णन कीजिये ?
Right Answer is:

SOLUTION

शेरशाह का केंद्रीय शासन व्यवस्था में पूर्ण विश्वास था राज्य का पूर्ण भार शेरशाह पर ही था।  वह स्वयं राज्य के नियम बनाता था । वह बिना किसी के परामर्श के ही समस्त कार्यों को स्वयं सम्पादित करता था । उसके वजीर उसकी आज्ञा पालन करने वाले कर्मचारी मात्र थे

मंत्रिपरिषद और प्रशासनिक विभाग - शेरशाह ने प्रशासन की सुविधा के लिए निम्नलिखित मंत्री-विभाग की स्थापना की

दीवान--विजारत - राज्य की आय और व्यय का उत्तरदायित्व वजीर का होता था । यह प्रधान वजीर होता था । इसे  दीवान--विजारत भी कहते थे । अर्थव्यवस्था और भूमि कर की व्यवस्था करता था

राज्य की आय और व्यय का उत्तरदायित्व वजीर का होता था । यह प्रधान वजीर होता था । इसे  दीवान--विजारत भी कहते थे ।अर्थव्यवस्था और भूमि कर की व्यवस्था करता था

दीवान--आरिज यह सैन्य विभाग का प्रधान होता था । इसे दीवान--मुमालिक अथवा दीवान--आरिज कहते थे

दीवान--रसालत - बाह्य नीति का उत्तरदायित्व दीवान--रसालत पर होता था इसे दीवान-मुहत्तसिल भी कहा जाता था

दीवान--इंशा - इसका कार्य सुल्तान की आज्ञाओं की घोषणा करना था  प्रान्तों के सूबेदारों  को उनकी सूचना भेजने का कार्य दीवान--ईंशा करता था

दीवान--बारिद  - शेरशाह ने एक सुसंगठित  जासूस विभाग की स्थापना की जिसका प्रधान दीवान--बारिद या बारिद--मुमालिक होता था

दीवान--क़ज़ा - न्याय का प्रधान काजी-उल-कुजात होता था ।यह कुरान का आधार पर न्याय करता था । सुल्तान स्वयं न्याय प्रिय था उसने केंद्र और प्रान्तों में काजी के अधीन न्यायालय स्थापित करवाए थे।

शाही महल का अधिक्षक - इन मुख्य अधिकारियों के अतिरिक्त सुल्तान के परिवार के प्रबंध करने के लिए एक विभाग होता था । इस विभाग का अध्यक्ष सुल्तान के परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था और उनके नौकर को आवश्यक  दिशा-निर्देश देता था सुल्तान के बहार जाने का प्रबंध और उत्सवो का प्रबंध करता था

इस प्रकार  शेरशाह ने केंद्रीय शासन-व्यवस्था में मंत्री परिषद्  और उससे सम्बंधित प्रशासनिक विभाग का गठन  किया था


Q. 161023 शेरशाह की सैन्य व्यवस्था का उल्लेख कीजिये?
Right Answer is:

SOLUTION

शेरशाह की सेना में अधिकतर अफगान सैनिक थे ।जो भारत के  विभिन्न भागों और अफगानिस्तान से भर्ती किये गये थे । वह सैनिक पदों का वितरण योग्यता के आधार पर करता था।  शेरशाह की सेना में अधिकतर घुड़सवार थे लेकिन पैदल सैनिकों की संख्या भी पर्याप्त थी । उसकी केन्द्र में रहने वाली सेना - डेढ़ लाख घुड़सवार 25000 पैदल तथा 5000 हाथी एवं तोपखाना थी । इसके अतिरिक्त सुल्तान की आवश्यकता पर अमीर भी उसे सेना की सहायता देते थे । शेरशाह ने अपनी सेना के संगठन के लिए अलाउद्दीन खिलजी की सैन्य व्यवस्था को आदर्श बनाया था । सर्वप्रथम उसने जागीरदारी प्रथा का अंत करके नकद वेतन की व्यवस्था की

उसने एक विशाल स्थायी सेना का निर्माण किया था । इन सैनिकों को वेतन राज्य की ओर से प्राप्त होता था इसलिए सैनिकों का प्रथम स्वामिभक्ति राज्य के प्रति होती थी।

नियुक्ति प्रक्रिया नियुक्ति प्रक्रिया शेरशाह स्वयं ही करता था । सैनिकों के वेतन और पदवृद्धि भी स्वयं ही करता था । शेरशाह ने अपने सैनिकों की शिक्षा की भी व्यवस्था की सैनिकों को शिक्षित करने के साथ-साथ उसने सैनिकों में अनुशासित किया और सैनिकों की अलग-अलग टुकड़ियों का गठन किया । सेना के प्रत्येक भाग को एक फौजदार  के अधीन कर दिया । उसने अपने आमीर और जागीदार के धोखे से बचने के लिए घोड़ों पर दाग की प्रथा पुनः शुरू की शेरशाह ने आमीरों के लिए सेना भी निश्चित की युद्ध के लिए हमेशा घोड़ों की सेना तैयार रहती थी । शेरशाह का अपने सेनिकों के प्रति दयालु व्यवहार था।  लेकिन अनुशासन भंग होने पर कठोर दंड की व्यवस्था थी इसी अनुशासन से वह अपने विशाल साम्राज्य में निरंतर शांति स्थापित रखने में सफल रहा


Q. 161024 खानेजहाँ लोदी कौन था उसके शाहजहाँ के विरुद्ध विद्रोह करने के क्या कारण थे ?
Right Answer is:

SOLUTION

खानेजहाँ लोदी जहाँगीर के राज्यकाल में सम्राट का कृपापात्र रह चुका था और विशेष अधिकारों का उपभोज कर चुका था जहाँगीर की मृत्यु के पश्चात शाहजहाँ उत्तराधिकार  के संघर्ष में फंसा था खानेजहाँ लोदी ने इस अवसर का फायदा उठकर दक्षिण में स्वतंत्र अफगान राज्य की स्थापना करने का प्रयास किया उसने अहमदनगर के सुल्तान  निजामशाह  से मैत्री करके बालाघाट का प्रदेश तीन लाख रूपये में बेच दिया वह मांडू दुर्ग पर अधिकार के लिए आगे बढ़ा वह इसमें असफल रहा शाहजहाँ उत्तराधिकार के युद्ध में विजय होकर अजमेर पहुंचा  इस समय खानेजहाँ की हिन्दू सेना ने उसका साथ छोड़ दिया खानेजहाँ ने शाहजहाँ से क्षमा मांगकर उसे दक्षिण का सूबेदार बना दिया  

वह बालाघाट को जितने में असफल रहा  उसने अपने को स्वतंत्र करने का प्रयास किया शाहजहाँ ने महावत खाँ को दक्षिण का सूबेदार बनाकर भेजा और खानेजहाँ को दरबार में रखा गया एक रात मौखा पाकर वह भाग निकला और अहमदनगर पहुंचा निजामशाही सुल्तान ने उसका स्वागत किया और उसे मुगलों के अधिकार का कुछ भू-भाग जागीर को दे दिया खानेजहाँ ने मुगलों पर आक्रमण कर इस भाग को छीन लिया इस घटना से शाहजहाँ स्वयं दक्षिण की ओर बढ़ा शाहजहाँ ने कूटनीति का सहारा लिया उसने बड़े-बड़े मराठा सरदारों को उच्च पद तथा जागीर देकर उन्हें अपने सहयोगी बना लिया जिससे वे खानेजहाँ की सहायता कर सके शाही सेना ने उसके कई सहयोगी को मार दिया खानेजहाँ हारकर दौलताबाद में शरण लेने के लिए बीजापुर भाग गया वहां उसे कोई सहायता नहीं मिली शाहजी भोंसले ने इस समय मुगलों की काफी सहायता की अहमदनगर के सुल्तान ने भी उसे सहायता नहीं दी शाही सेने ने उसे 1630  में वर्तमान उत्तर प्रदेश में सिहोंदा (बाँदा जनपद ) नामक स्थान पर पकड़ लिया ओर मार दिया


Q. 161025 शाहजहाँ ने अपने विजय अभियान में किन-किन राज्य पर अधिकार किया? इसकी विवेचना कीजिये।
Right Answer is:

SOLUTION

शाहजहाँ ने अपने राज्यारोहण के पश्चात् अनेक छोटे-छोटे राज्यों पर विजय प्राप्त करके मुग़ल साम्राज्य का विस्तार किया जो निम्न प्रकार है -

छोटा तिब्बत :- छोटा तिब्बत एक पहाड़ी का क्षेत्र था यहाँ का शासक अब्दाल था शाहजहाँ ने जफ़र खाँ के सेनापतित्व में एक सेना भेजी जिसने अब्दाल को पराजित किया और छोटा तिब्बत पर मुगलों का आधिपत्य हो गया

असम :- मुगलों की उत्तर-पूर्वी सीमा की दशा सुरक्षित नहीं थी कूच बिहार के प्रदेश लक्ष्मी नारायण के अधिकार में थे तथा कम्रूम पर मुगलों का कोई अधिकार था मुग़ल सेना ने लक्ष्मी नारायण को तो परस्त कर दिया लेकिन वह असम के सम्राट को हरा सके शाही सेना असम से पीछे हट गयी शाहजहाँ के काल में शांति स्थापित रही

मालवा :-  मालवा के उपजाऊ तथा समृद्ध प्रान्त में गोंड तथा भील जातियों ने भागीरथ के नेतृत्व में उपद्रव मचा रखा था 1632 ई० में मालवा के सूबेदार नसीरी खाँ ने साहसपूर्ण इन जातियों का दमन किया तथा शांति स्थापित की

गोंडवाना :- गोंडवाना में भी गोंड जाति उपद्रव मचा रही थी 1643 ई० में मुग़ल सेना ने खान दुर्रान के नेतृत्व में विद्रोहियों  का दमन कर पूर्ण शांति स्थापित का दी

उज्जैनिया :- बक्सर के निकट इज्जैनिया का जमींदार प्रताप विद्रोही हो गया था उसका दमन अब्दुला खाँ ने किया तथा उसकी स्त्री को एक मुसलमान को दे दिया गया

रतनपुर :- रतनपुर के जमींदार बाबू लक्ष्मण ने अवज्ञा की इसे दमन को अब्दुला खाँ को भेजा गया लेकिन बाबू लक्ष्मण ने अमर सिंह की मध्यस्थता से क्षमा माँग ली और उसे मुग़ल दरबार में भेज दिया गया

पालामाऊ :- पालामाऊ का शासक प्रताप था उसने अवज्ञा की इस जिसे दबाने के लिए शाही सेना ने  26   जनवरी 1642 को मुग़ल सेना ने पालामाऊ दुर्ग का घेरा डाला इसपर प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर दरबार में एक छोटा मनसब पद प्रदान किया

कुमायूँ गढ़वाल :- मुग़ल सेना ने 1656 में कुमायूँ गढ़वाल की सेना को हराकर अपनी अधीनता स्वीकार करने को बाध्य किया


Q. 161026 मुग़ल काल के केंद्रीय शासन का वर्णन कीजिये ?
Right Answer is:

SOLUTION

मुग़ल काल के केंद्रीय शासन व्यवस्था  बहुत सुद्रद थी मुग़ल प्रशासन के दो प्रमुख अंग थे - केंद्रीय शासन और प्रांतीय शासन

केंद्रीय शासन व्यवस्था  का केंद्र राजधानी आगरा  दिल्ली थी  इसमें मुग़ल बादशाह उनके मंत्री थे अन्य प्रशासनिक विभाग और उनके अध्यक्ष  अधिकारी, सेना न्याय अधिकारी आदि होते थे

केंद्रीय शासन व्यवस्था  - सम्पूर्ण मुग़ल साम्राज्य का केंद्र सर्वोच्च अधिकारी मुग़ल सम्राट था

राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था - मुग़लों ने निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी राजतंत्रात्मक शासन प्रणाली को अपनाया था जिसके अनुसार राज्य का सर्वोसर्वा बादशाह होता था सम्राट को राजनीतिक तथा धार्मिक दोनों प्रकार के सर्वोच्च अधिकार प्राप्त थे

प्रजा प्रेमीबाबर तथा हुमायूँ ने शासन-व्यवस्था में इस्लाम के आदेशों का पालन किया था लेकिन अकबर अपने पूर्वजों के अलग था उसने केवल आमीर-उल-मोमनी बनने के अतिरिक्ति

अपनी सारी प्रजा का सम्राट बनने का निर्णय किया अकबर धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना में विश्वास रखता था

खलीफाओं से स्वतंत्रमुग़ल सम्राट खलीफाओं की अधीनता स्वीकार नहीं करते थे तथा धर्म का नेतृत्व स्वयं ही धारण करते थे सम्राट बनने पर वे नवीन उपाधि धारण करते थे सम्राट बनने के उपरांत उन्ही के नाम से खुतबा पढ़ा जाता था और सिक्के ढाले जाते थे

शान-शौकतपूर्ण जीवनमुग़ल सम्राट बड़ी शान-शौकत से जीवन व्यतीत करते थे उनकी शान-शौकत तथा गौरवपूर्ण दरबार को देखकर उस काल के विदेशी यात्री चकित रह जाते थे शुक्र के दिन नमाज के लिए सम्राट के अतिरिक्त अन्य किसी को पालकी में बैठकर मस्जिद जाने की अनुमति नहीं थी सम्राट की पालकी के पीछे बड़े से बड़े अमीर पैदल चलकर मस्जिद जा सकते थे

 

प्रधानमंत्री - अकबर ने प्रधानमंत्री को वकील-उल-सल्तनत  नाम दिया था प्रधानमंत्री को वकील मुतलक अथवा वजीरे-आला भी कहते है प्रधानमंत्री प्रमुख रूप से राजस्व विभाग की देखभाल करता था।

मीर बख्शी- मीर बख्शी को अफसर--खजाना भी कहा जाता था मीर बख्शी का मुख्य कार्य सैनिकों को वेतन देना था ।

सद्रे-उल-सुदूर  - सद्रे-उल-सुदूर  का सम्बन्ध धार्मिक धन-सम्बन्धी निर्धारण तथा दान विभाग से था।।

 

मीर आतिश - मीर आतिश को दरोगा--तोपखाना भी कहा जाता था पहले यह मीर बख्शी के अधीन होता था


Q. 161027 मनसबदारी प्रथा की विशेषताओं का वर्णन कीजिये ?
Right Answer is:

SOLUTION

मनसबदारी का अर्थ मनसबदारी अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ पद होता है मुग़लकाल में बड़े-बड़े पदाधिकारियों का पद मनसबदारी प्रथा के द्वारा निश्चित किये जाते थे अकबर ने मनसबदारी प्रथा को ईरान से ग्रहण किया था तथा बाबर एवं हुमायूँ के काल में भी यह प्रथा कुछ अंश तक भारत में प्रचलित थी इस व्यवस्थित रूप देना अकबर का कार्य था

मनसब प्रदान करना - मुग़ल शासन का उच्च पदाधिकारी चाहे वह राजस्व-व्यवस्था का प्रधान हो राज्य के हरम की देखभाल करने वाला हो अथवा सूबेदार हो सर्वप्रथम वह सैनिक होता था तथा उसका सेना में पद होता था समय पड़ने पर उसे सैन्य संचालन भी करना पद सकता था काजी तथा सद्र के अतिरिक्त राज्य के समस्त पदाधिकारी मनसबदार होते थे अकबर के समय में टोडरमल तथा बीरबल को सैन्य-संचालन का भार सँभालना पड़ा था निम्न पदाधिकारियों को मनसबदार के स्थान पर रोजिनदार कहकर संबोधित किया जाता था मनसबदार उच्च सामंत वर्ग के ही व्यक्ति कहलाते थे

निश्चित सेना रखना -  मनसबदारों को अपने पद तथा वेतन के अनुसार सेना रखनी पड़ती थी तथा हाथीघोड़े, ऊँट आदि भी सैनिकों के साथ रखने पड़ते थे परन्तु यह आवश्यक नहीं था कि वे अपने पद का बराबर ही सैनिक रखें  

नगद वेतन की व्यस्था - मनसबदारों के लिए अधिकतर नगद वेतन की व्यवस्ता की गयी थी अकबर ने जागीरदारी प्रथा को समाप्त करके मनसबदारों का वेतन निश्चित कर दिया था

नियुक्ति अधिकार - मनसबदारों की नियक्ति, पदवृद्धि और पद-च्युत करने  का अधिकार मुग़ल सम्राट के पास था सम्राट अपनी इच्छा से किसी भी मनसबदार को छोटी से बड़ी पदवृद्धि कर सकते था और बड़े से बड़े मनसबदार को गलती करने पर कठोर से कठोर दण्ड दे सकता था  


Q. 161028 मुगल प्रशासन के अंतर्गत सूचनाओं का प्रसार करने के लिए क्या व्यवस्था स्थापित की गई थी?
Right Answer is:

SOLUTION

सटीक और विस्तृत आलेख तैयार करना मुगल प्रशासन के लिए मुख्य रूप से महत्त्वपूर्ण था। मीर बख़्शी दरबारी लेखकों (वाकिया नवीस) के समूह का निरीक्षण करता था। ये लेखक ही दरबार में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी अर्जियों व दस्तावेज़ों तथा सभी शासकीय आदेशों (फरमान) का आलेख तैयार करते थे। इसके अतिरिक्त अभिजातों और क्षेत्रीय शासकों के प्रतिनिधि (वकील) दरबार की बैठकों (पहर)की तिथि और समय के साथ उच्च दरबार से समाचार ̧ (अख़बारात-ए-दरबार-ए-मुअल्ला) शीर्षक के अंतर्गत दरबार की सभी कार्यवाहियों का विवरण तैयार करते थे। अख़बारात में हर तरह की सूचनाएँ होती हैं जैसे दरबार में उपस्थिति, पदों और पदवियों का दान, राजनयिक शिष्टमंडलों, ग्रहण किए गए उपहारों अथवा किसी अधिकारी के स्वास्थ्य के विषय में बादशाह द्वारा की गई पूछताछ। राजाओं और अभिजातों के सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन का इतिहास लिखने के लिए यह सूचनाएँ बहुत उपयोगी होती हैं। समाचार वृत्तांत और महत्त्वपूर्ण शासकीय दस्तावेज  शाही डाक के जरिए मुगल शासन के अधीन क्षेत्रों में एक छोर से दूसरे छोर तक जाते थे। बाँस के डिब्बों में लपेटकर रखे कागजों को लेकर हरकारों (कसीद अथवा पथमार) के दल दिन-रात दौड़ते रहते थे। काफी दूर स्थित प्रांतीय राजधानियों से भी वृत्तांत बादशाह को कुछ ही दिनों में मिल जाया करते थे। राजधानी से बाहर तैनात अभिजातों के प्रतिनिधि अथवा राजपूत राजकुमार तथा अधीनस्थ शासक बड़े मनोयोग से इन उद्घोषणाओं की नकल तैयार करते थे व संदेशवाहकों के जरिए अपनी टिप्पणियाँ अपने स्वामियों के पास भेज देते थे। सार्वजनिक समाचार के लिए पूरा साम्राज्य आश्चर्यजनक रूप से तीव्र सूचना तंत्र से जुड़ा हुआ था।


Q. 161029 मुगल काल के अभिजात वर्ग पर एक टिप्पणी लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

सत्रहवीं शताब्दी में 1,000 या उससे उपर जात वाले मनसबदार अभिजात (उमरा जो कि अमीर का बहुवचन है) कहे गए। सैन्य अभियानों में ये अभिजात अपनी सेनाओं के साथ भाग लेते थे तथा प्रांतों में वे साम्राज्य के अधिकारियों के रूप में भी कार्य करते थे। प्रत्येक सैन्य कमांडर घुड़सवारों को भर्ती करता था, उन्हें हथियारों आदि से लैस करता था और उन्हें प्रशिक्षण देता था। घुड़सवारी फौज मुगल फौज का अपरिहार्य अंग थी।

घुड़सवार सिपाही शाही निशान से पार्श्वभाग में दागे गए उत्कृष्ट श्रेणी के घोड़े रखते थे। निम्नतम ओहदों के अधिकारियों को छोड़कर बादशाह स्वयं सभी अधिकारियों के ओहदों,पदवियों और अधिकारिक नियुक्तियों के बदलाव का पुनरीक्षण करता था। मनसब प्रथा की शुरुआत करने वाले अकबर ने अपने अभिजात-वर्ग के कुछ लोगों को शिष्य (मुरीद) की तरह मानते हुए उनके साथ आध्यात्मिक रिश्ते भी कायम किए। अभिजात-वर्ग के सदस्यों के लिए शाही सेवा शक्ति, धन तथा उच्चतम प्रतिष्ठा प्राप्त करने का एक जरिया थी। सेवा में आने का इच्छुक व्यक्ति एक अभिजात के जरिए याचिका देता था जो बादशाह के सामने तजवीज़ प्रस्तुत करता था। अगर याचिकाकर्ता को सुयोग्य माना जाता था तो उसे मनसब प्रदान किया जाता था।दरबार में नियुक्त(तैनात-ए-रकाब) अभिजातों का एक ऐसा सुरक्षित दल था जिसे किसी भी प्रांत या सैन्य अभियान में प्रतिनियुक्त किया जा सकता था। वे प्रतिदिन दो बार सुबह व शाम को सार्वजनिक सभा-भवन में बादशाह के प्रति आत्मनिवेदन करने के कर्तव्य से बँधे थे। दिन-रात बादशाह और उसके घराने की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भी वे उठाते थे।


Q. 161030 राज घराने पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

‘हरम’ शब्द का प्रयोग प्रायः मुगलों की घरेलू दुनिया की ओर संकेत करने के लिए होता है। यह शब्द फारसी से निकला है जिसका तात्पर्य है ‘पवित्र स्थान’। मुगल परिवार में बादशाह की पत्नियाँ और उपपत्नियाँ, उसके नजदीकी और दूर के रिश्तेदार -माता, सौतेली माता व उपमाताएँ, बहन, पुत्री, बहू, चाची-मौसी, बच्चे आदि व महिला परिचारिकाएँ तथा गुलाम होते थे। बहुविवाह प्रथा भारतीय उपमहाद्वीप में विशेषकर शासक वर्गों में व्यापक रूप से प्रचलित थी।

मुगल परिवार में शाही परिवारों से आने वाली स्त्रियों;बेगमों द्ध और अन्य स्त्रिायों (अगहा), जिनका जन्म कुलीन परिवार में नहीं हुआ था, में अंतर रखा जाता था। दहेज (मेहर) के रूप में अच्छा-ख़ासा नकद और बहुमूल्य वस्तुएँ लेने के बाद विवाह करके आई बेगमों को अपने पतियों से स्वाभाविक रूप से अगहाओं की तुलना में अधिक उँचा दर्जा और सम्मान मिलता था। राजतंत्र से जुड़े महिलाओं के पदानुक्रम में उपत्नियों (अगाचा) की स्थिति सबसे निम्न थी। इन सभी को नकद मासिक भत्ता तथा अपने-अपने दर्जे के हिसाब से उपहार मिलते थे।

मूगल परिवार में अनेक महिला तथा पुरुष गुलाम होते थे। अलग-अलग कार्यों का संपादन करते थे। वहाँ विशेष रूप से गुलाम किन्नर (ख़्वाजासर) होते थे जो रक्षक और सेवक के रूप में कार्य करते थे।


Q. 161031 जेसुइट शिष्टमंडल द्वारा मुगल दरबार के दौरे पर एक टिप्पणी लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

सोलहवीं शताब्दी के दौरान भारत आने वाले जेसुइट शिष्टमंडल व्यापार और साम्राज्य निर्माण की इस प्रक्रिया का हिस्सा थे।अकबर के साई धर्म के विषय में जानने को बहुत उत्सुक था। उसने जेसुइट पादरियों को आमंत्रित करने के लिए एक दूतमंडल गोवा भेजा। पहला जेसुइट शिष्टमंडल फतेहपुर सीकरी के मुगल दरबार में 1580 में पहुँचा और वह वहाँ लगभग दो वर्ष रहा। इन जेसुइट लोगों ने ईसाई धर्म के विषय में अकबर से बात की और इसके सद्गुणों के विषय में उलमा से उनका वाद-विवाद हुआ। लाहौर के मुगल दरबार में दो और शिष्टमंडल 1591 और 1595 में भेजे गए।जेसुइट विवरण व्यक्तिगत प्रेक्षणों पर आधारित हैं और वे बादशाह के चरित्र और सोच पर गहरा प्रकाश डालते हैं। सार्वजनिक सभाओं में जेसुइट लोगों को अकबर के सिंहासन के काफी नजदीक स्थान दिया जाता था। वे उसके साथ अभियानों में जाते, उसके बच्चों को शिक्षा देते तथा उसके फूरसत के समय में वे अकसर उसके साथ होते थे। जेसुइट विवरण मुगलकाल के राज्य अधिकारियों और सामान्य जन-जीवन के बारे में फारसी इतिहासों में दी गई सूचना की पुष्टि करते हैं।

जेसुइट शिष्टमंडल के सदस्यों के प्रति अकबर ने जो उच्च आदर प्रदर्शित किया उससे वे बहुत प्रभावित हुए। ईसाई धर्म सिद्धांतों में बादशाह की स्पष्ट दिलचस्पी की व्याख्या उन्होंने अपने मत में बादशाह के धर्म-परिवर्तन के संकेत रूप में की। इसे पश्चिमी यूरोप में हावी धार्मिक असहिष्णुता के माहौल के प्रकाश में समझा जा सकता है। मान्सेरेट ने टिप्पणी की कि, प्रजा ने इस बात की बहुत कम परवाह की कि सभी को उसके धर्म के अनुपालन की अनुमति देकर उसने वास्तव में सबका तिरस्कार किया।

पहले जेसुइट शिष्टमंडल का एक सदस्य मान्सेरेट अपने अनुभवों का विवरण लिखते हुए कहता है:उससे (अकबर से) भेंट करने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए उसकी पहुँच कितनी सुलभ है इसके बारे में अतिशयोक्ति करना बहुत कठिन है। लगभग प्रत्येक दिन वह ऐसा अवसर निकालता है कि कोई भी आम आदमी अथवा अभिजात उससे मिल सके और बातचीत कर सके। उससे जो भी बात करने आता है उन सभी के प्रति कठोर न होकर वह स्वयं को मधुरभाषी और मिलनसार दिखाने का प्रयास करता है। उसे उसकी प्रजा के दिलो-दिमाग से जोड़ने में इस शिष्टाचार और भद्रता का बड़ा असाधारण प्रभाव है।


Q. 161032 शेरशाह के जीवन-चरित का वर्णन कीजिए एवं उसकी उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए।
[2 + 4]
Right Answer is:

SOLUTION

प्रो. एस.आर. शर्मा ने कहा कि, शेरशाह अनेक प्रकार के गुणों से विभूषित था और उसकी प्रतिभा असाधारण थी। यदि हम उसकी तुलना सामन्तों के प्रति व्यवहार में हेनरी आठवें से, सैनिक संगठन तथा प्रशासन की ओर अधिक ध्यान देने में एशिया के महानतम् आन्तरिक शासक फ्रेडरिक विलयम प्रथम से, व्यवहारिक दृष्टिकोण तथा सिद्धान्तों में कौटिल्य और मैकियावली से, उदार विचारों तथा प्रजा के सभी वर्गों के हितचिंतन में अशोक से करें तो उसमें अतिशयोक्ति होगी।’’ अपने राजस्व के सिद्धान्त तथा शासन-प्रबन्ध के लिये एर्सकाइन महोदय के शब्दों में- शेरशाह की गणना भारतीय इतिहास के सबसे असाधारण व्यक्तियों में से है।’’
शासन
-प्रबन्ध की रूपरेखा- शेरशाह के राजस्व के सिद्धान्तों पर उसका शासन-प्रबन्ध आधारित था। इतिहासकार कीन महोदय का कहना है, “किसी भी सरकार ने इतनी योग्यता का परिचय नहीं दिया है, जितना कि इस पठान ने, अंग्रेजों ने भी नहीं ’’ उसके शासन-प्रबन्ध की रूपरेखा निम्न प्रकार से है-
- प्रशासन सम्बन्धी सुधार-
1. केन्द्रीय शासन- शेरशाह एक स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासक था। वह शासन का केन्द्र था। उसकी आज्ञाएँ कानून थी। वह सेनापति और न्यायाधीश स्वयं ही था। शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए उसने केंद्रीय शासन को अनेक भागों में बाँट


Q. 161033 “भू-राजस्व प्रशासन के क्षेत्र में शेरशाह अकबर का पूर्वगामी था।” टिप्पणी कीजिए।
Right Answer is:

SOLUTION

शेरशाह अकबर का अग्रगामीः शेरशाह की महानता का एक उल्लेखनीय कारण, अधिकांश इतिहासकारों द्वारा उसे अकबर का अग्रगामी माना जाता है। उसने प्रशासन के सम्बन्ध में जो सुधार किये, जो आदर्श स्थापित किये उन्हें थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ अकबर ने अपना लिया। अकबर का शासन प्रबन्ध एक सीमा तक शेरशाह के शासन प्रबन्ध पर आधारित था।

भूमि एवं राजस्व व्यवस्था - शेरशाह ने इस क्षेत्र में मौलिक एवं अत्यंत महत्त्वपूर्ण सुधार आरम्भ किये, जिनको कुछ सुधारों के साथ अकबर ने अपनाया था।

भू-राजस्थ्व व्यवस्था के क्षेत्र में तो शेरशाह विशेष रूप से अकबर का मार्गदर्शक था। शेरशाह ने जो भू-राजस्व नीति अपनायी, जो सुधार किये उन्हें अकबर ने अपनी भू-राजस्व नीति में लागू किया। उदाहरणतः (भूमि नापने के लिए शेरशाह ने रस्सी की जरीबे चलाई तो अकबर ने भी भूमि की पैमाइश के लिए बाँस की जरीब चलाई) भूमि की पैमाइश, मूल्य सूची का निर्धारण, भूमि का वर्गीकरण, कर निर्धारण आदि।)

भूमि प्रबन्ध की प्रमुख विशेषताएँ -

1. उसने रय्यैतों से सीधा सम्पर्क किया तथा जागीरदारी प्रथा को समाप्त कर दिया हालांकि सम्पूर्ण राज्य में रैय्यतवाड़ी व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती थी।

2. खेती योग्य भूमि का माप किया गया उसकी उत्पादन क्षमता के आधार पर क्रमशः उत्तम, मध्यम एवं निम्न प्रकार में विभाजन किया गया। अकबर ने इसी आधार पर आगे चलकर भूमि को चार भागों में बाँटा।

3. प्रत्येक प्रकार की भूमि की औसत पैदावार ज्ञात कर उसका 1/3 भाग लगान निश्चित कर दिया गया।

4. किसान को सुविधा के लिए लगान नकद अथवा फसल, दोनों रूप में देने की व्यवस्था थी

5. सरकार की ओर से किसानों को पट्टे जारी किये गये जिनमें भूमि का क्षेत्रफल, उनकाप्रकार एवं लगान

Q. 161034 मध्यकालीन भारत में शाहजहाँ का शासन काल ‘स्वर्ण युग’ क्यों कहा जाता है?
Right Answer is:

SOLUTION

भूमिका- हण्टर महोदय ने कहा है, ’’मुगल साम्राज्य ने शाहजहाँ के शासनकाल में अपने सम्मान और शक्ति के शिखर को स्पर्श कर लिया था।’’ इस काल में मुगल सत्ता अपनी चरम सीमा पर थी। देश ने उस काल में आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक उन्नति की। इसी कारण शाहजहाँ के काल को मुगल-शासन का स्वर्ण युग मानते हैं, अतएव हम इस कथन से पूर्णतया सहमत हैं

तत्कालीन इतिहासकार राय भारमल, खलीफा, मनूसी तथा एलफिंस्टन और लेनपूल आदि यूरोपीय यात्रियों ने इस पक्ष में अपने विचार प्रकट किये हैं। इस सम्बन्ध में निम्न तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं-

1. शान्ति तथा सुव्यवस्था- मुगल साम्राज्य में शाहजहाँ के शासन-काल में ही अधिक शान्ति और व्यवस्था रही। राजपूत वफादार हो गये और दक्षिण के शिया राज्यों ने दिल्ली के सम्राट की अधिनता स्वीकार कर ली।

2. देश की समृद्धि- एलफिंस्टन महोदय का विचार है कि ‘‘शाहजहाँ का शासन काल भारत के इतिहास में एक सबसे अधिक समृद्धि का युग था।’’ डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है, ’’ अकबर के समय में जिस परगने की आमदनी 3 लाख रूपये थी अब 10 लाख रूपये हो गई।’’

3. राजनीतिक श्रेष्ठता- इस काल में साम्राज्य का काफी विस्तार था। इस समय देश में साम्राज्य पूरी तरह जम चुका था। देश में शान्ति थी। खफी खाँ लिखता है, ‘‘अपने राज्य में शान्ति, सुव्यवस्था तथा आर्थिक सुद्रढ़ता में भारत का कोई सम्राट शाहजहाँ की समानता नहीं कर सकता।’’

4. व्यापारिक उन्नति- इस काल में पश्चिमी एशियाई देशों के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्ध बढ़े। यूरोपीय देशों के लिये भी यहाँ से अनेक वस्तुएँ जाती और इस प्रकार विपुल धन भारत में आता। इस कारण अनेक युद्धों में अत्यधिक व्यय होने के कारण भी भव्य निर्माण से कोई कमी आई।

5. शाहजहाँ

Q. 161035 “शाहजहाँ का काल मुगल इतिहास का स्वर्णयुग था।” क्या आप सहमत हैं ? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दीजिए। [4 + 2]
Right Answer is:

SOLUTION

भूमिका- हण्टर महोदय ने कहा है, ’’मुगल साम्राज्य ने शाहजहाँ के शासनकाल में अपने सम्मान और शक्ति के शिखर को स्पर्श कर लिया था।’’ इस काल में मुगल सत्ता अपनी चरम सीमा पर थी। देश ने उस काल में आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक उन्नति की। इसी कारण शाहजहाँ के काल को मुगल-शासन का स्वर्ण युग मानते हैं, अतएव हम इस कथन से पूर्णतया सहमत हैं

तत्कालीन इतिहासकार राय भारमल, खलीफा, मनूसी तथा एलफिंस्टन और लेनपूल आदि यूरोपीय यात्रियों ने इस पक्ष में अपने विचार प्रकट किये हैं। इस सम्बन्ध में निम्न तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं-

1. शान्ति तथा सुव्यवस्था - मुगल साम्राज्य में शाहजहाँ के शासन-काल में ही अधिक शान्ति और व्यवस्था रही। राजपूत वफादार हो गये और दक्षिण के शिया राज्यों ने दिल्ली के सम्राट की अधिनता स्वीकार कर ली।

2. देश की समृद्धि - एलफिंस्टन महोदय का विचार है कि ‘‘शाहजहाँ का शासन काल भारत के इतिहास में एक सबसे अधिक समृद्धि का युग था।’’ डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है, ’’ अकबर के समय में जिस परगने की आमदनी 3 लाख रूपये थी अब 10 लाख रूपये हो गई।’’

3. राजनीतिक श्रेष्ठता - इस काल में साम्राज्य का काफी विस्तार था। इस समय देश में साम्राज्य पूरी तरह जम चुका था। देश में शान्ति थी। खफी खाँ लिखता है, ‘‘अपने राज्य में शान्ति, सुव्यवस्था तथा आर्थिक सुद्रढ़ता में भारत का कोई सम्राट शाहजहाँ की समानता नहीं कर सकता।’’

4. व्यापारिक उन्नति - इस काल में पश्चिमी एशियाई देशों के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्ध बढ़े। यूरोपीय देशों के लिये भी यहाँ से अनेक वस्तुएँ जाती और इस प्रकार विपुल धन भारत में आता। इस कारण अनेक युद्धों में अत्यधिक व्यय होने के कारण भी भव्य निर्माण से कोई

Q. 161036 मुगल काल में शिक्षा एवं साहित्य की उन्नति पर एक निबंध लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

मुगल काल में फारसी, हिन्दी, तुर्की, पंजाबी, आदि भाषाओं में साहित्य की रचना हुई । सभी मुगल सम्राटों ने अपने दरबार में विद्वानों व साहित्यकारों को संरक्षण दिया था जिससे बड़ी संख्या में ऐतिहासिक ग्रन्थ, अनुवादों एवं सुन्दर काव्यों की रचना हुई। फारसी साहित्य की उन्नति:- मुगलों की राजभाषा फारसी होने से सर्वाधिक साहित्य फारसी में ही लिखा गया । बाबर स्वयं फारसी एवं तुर्की का उच्च कोटि का विद्वान था। उसने अपनी आत्मकथा तुजक-ए-बाबरी लिखी । बाबर ने कविता भी लिखी जो “मुबाइयाँ“ कहलाती है । हुमायूँ की बहन बेगम गुलबदन ने “हुमायूँनामा“ की रचना की। गयासुद्धीन मुहम्मद ने हुमायूँ के संरक्षण में “कानूने हुमायूँ“ की रचना की । हुमायूँ के साथ सदा अपना पुस्तकालय चलता था । अकबर के शासन काल में फारसी कविता व गद्य अपने चरमोत्कर्ष पर थे । अबुल फजल एक महान विद्वान एवं इतिहासकार था । उसने “आइने अकबरी, अकबरनामा“ बदायूँनी की ’मुन्तखब-उत्-तवारीख’ विशेष प्रसिद्ध है । अकबर ने अनेक भाषाओं में लिखित प्रसिद्ध ग्रन्थों का फारसी अनुवाद कराया । बदायूँनी ने रामायण का, फैजी ने महाभारत, लीलावती का, सरहिन्द ने अथर्ववेद का फारसी में अनुवाद किया । इसके अलावा पचतंत्र, सिंहासन बत्तीसी आदि का अनुवाद भी किया गया । जंहागीर के काल में भी फारसी साहित्य का विकास जारी रहा । जंहागीरकृत “तुजुके-जहाँगीरी“ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रन्थ है । शाहजहाँ के शासनकाल में शाहजहाँनामा व पादशाहनामा ग्रन्थ रचे गए । औरंगजेब ने स्वयं के संरक्षण मंे इस्लामी कानूनों की पुस्तक ’फतवा-ए-आलमगीरी’ की रचना करवाई । मुस्लिम युवकों को शिक्षा देने के लिए विभिन्न प्रदेशों में अनेक अध्यापकों की नियुक्ति करवाई । हिन्दी साहित्य - मुगलकाल में हिन्दी साहित्य का विकास अकबर के समय से प्रारंभ हुआ । इस समय तुलसीदास ने ’रामचरित मानस’ विनयपत्रिका, जानकी मंगल, पार्वतीमंगल आदि चैबीस ग्रन्थों की रचना की । सूरदास ने ’सूरसागर’ रसखान ने प्रेमवाटिका, रहीमदास जी ने रहीम सतसई की रचना की । बीरबल को अकबर ने ’कविराय’ की उपाधि प्रदान की । जहांगीर एवं शाहजहाँ के काल में हिन्दी साहित्य का बहुत विकास हुआ । सुन्दर कविराज ने ’सुन्दर काव्य’ की सेनापति ने “कवित्त रत्नाकर“ की बिहारी ने श्रृंगार रस से ओतप्रोत ’बिहारी सतसई’ की रचना की । कवि भूषण ने “छत्रसाल दशक, शिवा बावनी“ की रचना की । औरंगजेब के काल में हिन्दी साहित्य को कोई संरक्षण नहीं दिया गया । अकबर के काल में संस्कृत फारसी कोष ’फारसी प्रकाश’ की रचना हुई । रसगंगाधर, गंगालहरी की रचना शाहजहाँ के काल में हुई । जहाँगीर के काल में गुरू अर्जुन देव ने आदि ग्रन्थ की रचना की ।


Q. 161037 भारत में सोलहवीं व सत्रहवी शताब्दियों में ग्रामीण दस्तकारों की स्थिति पर प्रकाश डालिए।
Right Answer is:

SOLUTION

भारतीय ग्रामीण दस्तकारों की स्थिति:-1. गाँवों में बड़ी संख्या में दस्तकारों की उपस्थितिः-अंग्रेजी शासन के सर्वेक्षण दस्तावेज व मराठों के दस्तावेजों से गाँवों में दस्तकारों की बड़ी संख्या का पता चलता हैं। कुछ गाँवों की कुल जनसंख्या का 2.5 प्रतिशत से जयादा दस्तकारों का था।2. ग्रामीण दस्तकारों द्वारा सेवाएँ देनाः- गाँव के अन्य लोग इन दस्तकारों की सेवाओं पर निर्भर थ। कुम्हार, बबंगाल में जमींदार सेवाओं के बदले दस्तकारों को ‘दैनिक भत्ता व खाने के लिए नकदी देते थे इस व्यवस्था को ‘‘जजमानी’’ कहते थे। इसके अलावा वस्तु/सेवाओं के विनिमय का प्रचलन भी था।कभी-कभी किसानों व दस्तकारों के मध्य अंतर करना कठिन होता था क्योंकि कई ऐसे समूह भी थे जो दोनों प्रकार के कार्य करते थे।


Q. 161038 नूरजहाँ ने जहाँगीर के प्रशासन को किस सीमा तक प्रभावित किया?
Right Answer is:

SOLUTION

नूरजहाँ का अपने पति के ऊपर बड़ा व्यापक प्रभाव था। विवाह के समय

जहाँगीर की आयु 43 वर्ष तथा नूरजहाँ की आयु 35 वर्ष थी। जहाँगीर की विलासिता इस समय अपनी चरम सीमा पर थी, अतः नूरजहाँ को अपनी महत्वाकांक्षायें पूर्ण करने का स्वर्ण अवसर प्राप्त हुआ। नूरजहाँ का यह शासन प्रभाव काल दो भागों में विभक्त किया जा सकता है।

नूरजहाँ का प्रभाव - नूरजहाँ का जहाँगीर के शासनकाल में बहुत अधिक प्रभाव रहा।

(1) प्रथम काल - 1611 0 से 1622 0 तक।

(2) द्वितीय काल - 1622 0 से 1627 0 तक।

(1) प्रथम काल - इस समय नूरजहाँ ने अपने सम्बन्धियों के सहयोग से दरबार में एक शक्तिशाली गुट का निर्माण किया। शहजादा खुर्रम भी इसमें सम्मिलित था। उसके भाईआसफ खाँतथा पिताग्यास बेगने उस पर नियंत्रण रखा तथा उसे पूर्ण सहयोग प्रदान किया। नूरजहाँ ने अपने प्रभाव को स्थायी करने के लिए आसफ खाँ की पुत्रीअर्जुमन्द बानुका विवाह शाहजहाँ से कर दिया। इस काल में जहाँगीर स्वयं भी राज्य के कार्यों को देखता था नूरजहाँ ने अपने सम्बन्धियों को महत्वपूर्ण पदों पर स्थापित कराया तथा खुर्रम के प्रभाव के विकास में भी पर्याप्त सहायता दी खुर्रम ने कई महत्वपूर्ण विजयें प्राप्त की तथा उसे अनेक सम्मानित उपाधियाँ मिलीं। नूरजहाँ के बढ़ते हुये प्रभाव को देखकर, महावत खाँ ने जहाँगीर को सचेत किया, किन्तु नूरजहाँ के प्रेम में फँसे सम्राट ने उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। महावत खाँ खुसरो को खुर्रम के स्थान पर भावी सम्राट बनाना चाहता था, किन्तु नूरजहाँ ने खुर्रम के साथ साजिश करके उसका वध करा दिया। खुसरों के उपरान्त महावत खाँ शहजादे परवेज का समर्थक बन गया था

(2) द्वितीय काल - यह काल नूरजहाँ की स्वेच्छाचारी नीतियों तथा षड्यंत्रों का काल था, इसके परिणाम राज्य के लिये घातक सिद्ध हुए।

इस काल

Q. 161039 क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि हुमायूँ स्वयं अपना दुश्मन था?
Right Answer is:

SOLUTION

(1) भाइयों में साम्राज्य का बँटवारा - हुमायूँ को अपने साम्राज्य का बँटवारा नहीं करना चाहिये था। यदि समस्त मुगल साम्राज्य की बागडोर उसके पास होती तो वह बाहृा, आन्तरिक शत्रुओं से डटकर मुकाबला कर सकता था। कामरान को काबुल पंजाब देना हुमायूँ के लिये हानिकारक सिद्ध हुआ क्योंकि उसे वहाँ से वीर और लडाकू सैनिकों का मिलना बन्द हो गया जिससे उसकी सैनिक शक्ति कमजोर हो गई।

(2) भारतीय प्रजा का असहयोग - हुमायूँ ने अपनी भारतीय प्रजा को अपनी ओर आकर्षित करने के लिये कोई प्रयास नहीं किया। उसने अपने साम्राज्य में तो कोई सुधार ही किया और कोई रचनात्मक कार्य। उसने कालिंजर के राजा पर इसलिये आक्रमण किया क्योंकि वह अफगानों का समर्थक था। अपनी परिस्थितियों को देखते हुये हुमायूँ को उसे कूटनीति द्वारा अपने पक्ष में करना चाहिये था। इस आक्रमण से उसकी प्रतिष्ठा को आघात ही लगा।

(3) भाइयों और सम्बन्धियों द्वारा विश्वासघात - हुमायूँ ने सदा अपने भाइयों और सम्बन्धियों पर विश्वास किया। उसका भाई कामरान उसका सबसे भयंकर शत्रु सिद्ध हुआ जो उसे अन्त तक धोखा देता रहा और हुमायूँ उसे सदा क्षमा करता रहा। उसके सम्बन्धी मिर्जाओं ने भी विद्रोह किया और उन्होंने गुजरात के शासक बहादुरशाह के यहाँ शरण ली तथा उसे दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये प्रोत्साहित किया।

(4) शेरशाह की बढ़ती हुई शक्ति की उपेक्षा - हुमायूँ ने शेरशाह की बढ़ती हुई शक्ति की उपेक्षा की। वह यही विश्वास किये रहा था कि वह उसे जब चाहेगा नष्ट कर देगा। यह उसकी सबसे बड़ी मूर्खता एवं भूल थी। यदि वह प्रारम्भ में ही शेरशाह के प्रति सतर्क हो जाता और 1532 में चुनार के किले के बारे में उससे सन्धि करता तथा उस किले को छीन लेता<


Q. 161040 हुमायूँ एवं शेरशाह के मध्य संघर्ष का वर्णन कीजिये। इसमें शेरशाह क्यों सफल हुआ। [3 +3]
Right Answer is:

SOLUTION

बाबर की मृत्यु के उपरान्त उसका सबसे बड़ा पुत्र हुमायूँ मुगल बादशाह बना। उसका समस्त जीवन काल संघर्षो में व्यतीत हुआ। उसका सबसे बड़ा संघर्ष शेरखाँ (शेरशाह) से हुआ। उसके शेरशाह से दो युद्ध हुये जिनका विवरण इस प्रकार है।

कन्नौज का युद्ध- सन 1540 . में हुमायूं और शेरशाह के मध्य कन्नौज में युद्ध हुआ, इस युद्ध में हुमायूं की हार शेरशाह ने उसका पीछा किया और उसे भारत से भागने पर मजबूर किया, इस प्रकार शेरशाह समस्त उत्तरी भारत का शासक बन गया।

चौसा का युद्ध (1539) - शेरशाह की सफलता से हुमायूं भयभीत था और इसीलिये उसने बंगाल की ओर प्रस्थान किया जहाँ चौसा नामक स्थान पर शेरशाह और उसके बीच भयंकर युद्ध हुआ, हुमायूं अपनी जान बचाने के लिए नदी में कूद गया, जहाँ एक भिश्ती ने उसकी जान बचाई।

शेरशाह की सफलता के कारण -

(1) भाइयों में साम्राज्य का बँटवारा - हुमायूँ को अपने साम्राज्य का बँटवारा नहीं करना चाहिये था। यदि समस्त मुगल साम्राज्य की बागडोर उसके पास होती तो वह बाहृा, आन्तरिक शत्रुओं से डटकर मुकाबला कर सकता था। कामरान को काबुल पंजाब देना हुमायूँ के लिये हानिकारक सिद्ध हुआ क्योंकि उसे वहाँ से वीर और लडाकू सैनिकों का मिलना बन्द हो गया जिससे उसकी सैनिक शक्ति कमजोर हो गई।

(2) भारतीय प्रजा का असहयोग - हुमायूँ ने अपनी भारतीय प्रजा को अपनी ओर आकर्षित करने के लिये कोई प्रयास नहीं किया। उसने अपने साम्राज्य में तो कोई सुधार ही किया और कोई रचनात्मक कार्य। उसने कालिंजर के राजा पर इसलिये आक्रमण किया क्योंकि वह अफगानों का समर्थक था। अपनी परिस्थितियों को देखते हुये हुमायूँ को उसे कूटनीति द्वारा अपने पक्ष में करना चाहिये था। इस आक्रमण से उसकी प्रतिष्ठा को आघात ही लगा।

(3) भाइयों

Q. 161041 “वह (हुमायूँ) जीवन भर ठोकरें खाता रहा व ठोकर खाकर ही उसके जीवन का अंत हुआ।“ इस कथन की व्याख्या कीजिए ।
Right Answer is:

SOLUTION

बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ मुगल बादशाह बना उसका समस्त जीवन काल संघर्षों में व्यतीत हुआ। उसका सबसे बड़ा संघर्ष शेर खां से हुआ जिसमें उसकी अपनी गलतियों से पूर्ण पराजय हुई व उसे भारत से पलायन करना पड़ा । हुमायूँ की असफलता के कारण - 1) भाइयों में साम्राज्य का बंटवारा - काबुल, कन्धार व सिन्ध के क्षेत्र कामरान को सौंपने से हुमायूँ का मध्य एशिया से संपर्क टूट गया । अस्करी को संभल व हिंदाल को मेवात का प्रदेश प्रदान किया । इसके अतिरिक्त मिर्जा सुलेमान को बदख्शां प्रदान कर दिया । इस विकेन्द्रीकरण से हुमायूँ का शासन पर नियंत्रण कम हो गया व मुगल अधिकारी स्वेच्छाचारी हो गए । 2) भारतीय प्रजा का असहयोग - हुमायूँ ने अपनी भारतीय प्रजा को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया ना ही उसने अपने साम्राज्य में कोई सुधार ही किया जिसने भारतीय प्रजा को उसका विरोधी बना दिया । 3) भाइयों व संबन्धियों द्वारा विश्वासघात - सदा हुमायूँ ने अपने भाइयों व संबधियों पर अंधा विश्वास किया व उन्हें सदा क्षमा किया जबकि भाइयों व संबन्धियों ने हमेशा विश्वासघात । 4) शेरशाह की बढ़ती हुई शक्ति की उपेक्षा - शेरशाह की बढ़ती शक्ति की उसने सदा उपेक्षा की । वह यही मानता रहा कि वह उसे कभी भी नष्ट कर देगा । यही उसकी सबसे बड़ी मूर्खता थी । उसे शुरू में ही शेरशाह की शक्ति नष्ट कर देना चाहिए था। 5) समय का सदुपयोग न करना - हुमायूँ ने कभी भी समय का सदुपयोग नहीं किया, बल्कि महत्वपूर्ण समय में आमोद-प्रमोद में लीन रहा । जबकि इस समय का उपयोग शेरशाह ने अपनी शक्ति को बढ़ाने में किया व बाद में हुमायँू को चैसा के मैदान में बुरी तरह पराजित किया । समय के सदुपयोग ना करने के कारण हुमायूँ को अनेक बार असफलता का मुँह देखना पड़ा । 6) हुमायूँ के गुप्तचर विभाग की अकर्मण्यता - हुमायूँ का गुप्तचर विभाग मुस्तैद नहीं था । उसने किसी महत्वपूर्ण घटना की खबर हुमायूँ को समय पर नहीं दी इस कारण हुमायूँ सदा अपने विरोधियों के उद्धेश्य व तरीकों से अनभिज्ञ रहा । 7) हुमायूँ में नेतृत्व का अभाव - हुमायूँ अच्छा नेतृत्व कर्ता नहीं था । वह न अच्छा सेनापति साबित हुआ ना हीं उसमें प्रतिभा ही थी । वह सैनिक व पदाधिकारियों में प्रिय भी नहीं था । कुशल नेतृत्व शक्ति के अभाव में अपने सेनापतियों पर नियंत्रण नहीं रख पाया । 8) हुमायूँ स्वयं अपना सबसे बड़ा शत्रु था - हुमायूँ में अनेक दुर्गुण थे । वह आरामतलब, आमोद-प्रमोद प्रिय व समय के मूल्यों को न जानने वाला व्यक्ति था। लेनपूल ने उसके बारे में कहा कि वह क्षणिक विजयोल्लास में ही अपने को अंतःपुर की विलासिता में डुबो दिया करता था । जब उसे युद्ध स्थल पर होना चाहिए था उस समय वह महल में रंगरेलियों में मस्त रहता था । निष्कर्ष:- इस प्रकार हम देखते हैं कि हुामायूँ को अनेक कठिनाइयों एवं कमजोरियों के कारण अपने जीवन में कदम-कदम पर असफलता का मूँह देखना पड़ा । इसी कारण लेनपूल का मत “कि वह जीवन पर्यन्त लड़खड़ाता रहा व लड़खड़ाकर ही उसकी मृत्यु हुई“ बिल्कुल ठीक है।


Q. 161042 उत्तराधिकार युद्ध में औरंगजेब की सफलता के कारण बताइए ।
Right Answer is:

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उत्तराधिकार युद्ध में औरंगजेब की सफलता के कारण 1) औरंगजेब की सैनिक योग्यता - औरंगजेब एक वीर योद्धा एवं कुशल सेनापति था । वह सैन्य-संचालन में बड़ा निपुण था । वह अपनी सेना को सैन्य सामग्री तथा अस्त्र-शस्त्रों से पूर्णतया सुसज्जित रखता था । अतः उसकी सुव्यवस्थित सेना की दारा की अव्यवस्थित सेना पर विजय निश्चित थी । 2) शाहजहाँ की दुुर्बलता और भूलें - शाहजहाँ के अचानक बीमार पड़ जाने तथा उसकी मृत्यु की खबर से उत्तराधिकार का युद्ध शुरू हो गया था । किन्तु रोग मुक्त होने पर शाहजहाँ ने प्रशासन नहीं सम्भाला, अपनी मृत्यु की अफवाह का भी खण्डन नहीं किया और न ही अपने जीवित रहने का विश्वास ही दिलाया । यदि वह युद्ध क्षेत्र में उपस्थित हो जाता तो औरंगजेब के बहुत से सैनिक साथ छोड़कर शाहजहाँ के पक्ष में हो जाते । इस सम्बन्ध में डाॅ0 ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है कि “शाहजहाँ की दुर्बलता तथा उसकी भूलों ने औरंगजेब की सफलता में सबसे अधिक योगदान दिया ।“ 3) दारा की अयोग्यता - उत्तराधिकार के युद्ध में औरंगजेब का सबसे बड़ा शत्रु दारा था जो एक अयोग्य राजकुमार था । शाहजहाँ के लाड-प्यार और दरबारियों की चापलूसी ने उसे कुछ अंहकारी बना दिया था । वह स्वयं को अन्य राजकुमारों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली तथा बुद्धिमान समझता था । इसके अतिरिक्त वह युद्ध कौशल में भी प्रवीण नहीं था । जिसके कारण उसने कदम-कदम पर भूलें की । सर्वप्रथम वह अपनी सारी सेना के बिना ही धरमत के युद्ध में कूद पड़ा । सामूगढ़ का युद्ध लड़ने से पहले अपने पुत्र सुलेमान शिकोह के आने की प्रतीक्षा नहीं की थी और युद्ध के दौरान हाथी से उतरकर घोड़े पर से युद्ध संचालन करना उसकी महान् भूल थी । दारा की इन सब भूलों ने औरंगजेब की सफलता में सहायता प्रदान की थी । 4) दारा का दोषपूर्ण सैन्य संगठन - दारा एक कुशल और अनुभवी सैनिक नहीं था उसमें एक कुशल सेनानायक के गुणों का अभाव था । मुस्लिम सैनिक विश्वासघाती थे जबकि राजपूत सैनिकों से भी पूर्ण सहयोग की आशा नहीं की जा सकती थी । उसके पास कोई योग्य सेनानायक नहीं था । वह स्वयं भी औरंगजेब की तुलना में एक निम्न कोटि का सेनानायक था । 5) औरंगजेब की चारित्रिक विशेषताएँ - औरंगजेब एक साहसी, पराक्रमी और दृढ़निश्चयी व्यक्ति था । वह प्रत्येक समस्या का समाधान परिस्थितियों के अनुकूल करने में दक्ष था । चालाकी और कूटनीति में भी निपूण था । प्रो0एस0आर0 शर्मा लिखते हैं कि “चारों भाई ही प्रसिद्ध सैनिक थे, परन्तु चरित्र, बल, कौशल, धैर्य और सैन्य संचालन में औरंगजेब तीनों से बढ़कर था ।“


Q. 161043 अकबर की धार्मिक नीति का वर्णन कीजिये। इसके क्या परिणाम हुए? [3 + 3]
Right Answer is:

SOLUTION

अकबर की धार्मिक नीति के निम्नलिखित परिणाम हुए

अकबर की धार्मिक नीति-

अकबर भारत का प्रथम मुसलमान शासक था, जिसने अपनी समस्त प्रजा के साथ धार्मिक उदारता तथा सहिष्णुता की नीति अपनाई

अकबर की धार्मिक नीति को प्रभावित करने वाले तत्व - अकबर की धार्मिक नीति को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित तत्व थे। -

(1) परिवारजनों का प्रभाव - अकबर का पिता हुमायूँ धर्मान्ध नहीं था। अकबर की माता हमीदा बानू भी उदार विचारों वाली महिला थी।

(2) शिक्षकों का प्रभाव - अकबर की संरक्षक बैराम खाँ शिया मुसलमान था। अकबर का शिक्षक अब्दुल लतीफ भी बड़े उदार विचारों का व्यक्ति था। अब्दुल लतीफ ने ही अकबर कोसुलह--कुल (पूर्ण शांति) का पाठ पढ़ाया था, जिसे अकबर ने कभी नहीं भुलाया।

(3) सूफी विद्धानों का प्रभाव - अकबर के दरबार में अनेक सूफी विद्धान थे जिनमें

शेख मुबारक, अबुल फज़ल और फेंजी उल्लेखनीय थे। अकबर इन सूफी विद्वानों के उदार विचारों से बड़ा प्रभावित हुआ।

(4) भक्ति आन्दोलन का प्रभाव - अकबर के विचारों पर तत्लकालीन भक्ति

आन्दोलन का भी काफी प्रभाव पड़ा। भक्ति आन्दोलन के सन्तों ने धार्मिक

कट्टरता का विरोध किया और धार्मिक उदारता तथा सहिष्णुता पर बल दिया।

(5) हिन्दू अधिकारियों का प्रभाव - अकबर के दरबार, प्रशासन और सेना में अनेक

हिन्दू अधिकारी और सेनानायक थे। इनके सम्पर्क में आने से अकबर हिन्दू धर्म

की उदार प्रवृत्तियों से प्रभावित हुआ।

(6) हिन्दू रानियों का प्रभाव - अकबर ने अनेक राजपूत राजकुमारियों से विवाह

किया था। अतः अकबर पर हिन्दू रानियों के उदार धार्मिक विचारों का प्रभाव

पड़ा।

(7) अकबर की दूरदर्शिता - अकबर एक दूरदर्शी व्यक्ति था। उसने यह अनुभव कर

किया था कि भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओं की सदभावना और सहयोग प्राप्त किए बिना, मुगल-साम्राज्य को दृढ़तापूर्वक जमाए रखना संभव नहीं था। अतः अकबर ने


Q. 161044 “अकबर एक राष्ट्रीय शासक था।” समस्त भारत के एकीकरण के संदर्भ में अकबर के प्रयासों के आलोक में इस कथन की विवेचना कीजिए।
Right Answer is:

SOLUTION

भूमिका- एच.जी. वेल्स महोदय का कथन है, ‘‘ अकबर सब प्रकार के पक्षपातों से शून्य था। वही प्रथम सम्राट था जिसने सर्वप्रथम यह निश्चिय किया कि मेरा साम्राज्य मुसलमानों का होगा, द्रविड़ों का और हिन्दुओं का, मेरा साम्राज्य भारतीय साम्राज्य होगा।’’ अकबर अपनी प्रजा को पुत्रवत् समझता था। उसने सदैव उनके सुख और सुविधा का ध्यान किया। इसलिये निम्नलिखित कारणों के आधार पर अकबर को एकराष्ट्रीय शासककहा जा सकता है।

1. हिन्दू-मुस्लिम एकता की स्थापना - शेरशाह को छोड़कर अधिकांश मुस्लिम शासकों ने अपनी धार्मिक नीति का उद्देश्य केवल मुसलमानों को संरक्षण प्रदान करना था और उन्होंने उनके हितों पर विशेष ध्यान दिया। उनकी इस धार्मिक नीति के कारण ही मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच दुश्मनी पैदा करा दी। परनतु अकबर ने अपनी धार्मिक नीति के तहत दीन--इलाही तथा सुलहकूल के द्वारा दोनों सम्प्रदायों के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये और उनमें सौहार्द की भावना पैदा की। अकबर ने स्वयं हिन्दू रीति-रिवाजों और त्यौहारों को अपनाकर हिन्दू समाज में एक सम्मान प्रदान करने वाला स्थान बनाया जिसने उसे राष्ट्रीय होने में एक पहचान दी।

2. धर्मान्धता से दूर - अकबर ने इस्लाम धर्म के साथ-साथ जैन धर्म, बौद्ध धर्म ईसाई धर्म के साथ समन्वय स्थापित किया उनके अनुयायियों को प्रोत्साहित किया गया। उसने कट्टर इस्लाम धर्म का परित्याग करके सभी धर्मों के साथ उदार एवं समान व्यवहार किया।

3. धर्म-निरपेक्ष - अकबर धार्मिक पक्षपात से कोसों दूर था। उसने सारे धर्मों के अनुयायियों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान कर दी। उसकी धर्म निरपेक्षता की नीति से साम्राज्य में राष्ट्रीय सद्भावना का विकास हुआ। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी कहा है- ‘‘अकबर राष्ट्रवाद का

Q. 161045 अकबर को अपने शासन काल के प्रारम्भिक वर्षों में किन समस्याओं का सामना करना पड़ा? इन समस्याओं के समाधान के लिए अकबर ने क्या प्रयत्न किए? [ 3 + 3]
Right Answer is:

SOLUTION

अकबर की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ-

14 फरवरी, 1556 . को जब अकबर का कलानोर में राज्याभिषेक हुआ था तब अकबर के समक्ष अनेक कठिनाइयाँ मौजूद थी।

1. असुरक्षित साम्राज्य - राज्याभिषेक के समय अकबर का राज्य अत्यन्त सीमित था। उसका अधिकार केवल पंजाब के कुछ भू-भाग पर ही था। उस समय दिल्ली पर अधिकार करने के लिए अनेक शक्तियाँ लालायित थी। हुमायूँ की मृत्यु के बाद हेमू ने दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार कर लिया था। शेरशाह सूरी के वंशज सिकन्दर शाह, इब्राहीम सूरी और मुहम्मद आदिल शाह अभी जीवित थे। देश की आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गयी थी। कई जगह अकाल अपनी चरम सीमा पर फैला हुआ था। मालवा, गुजरात और राजस्थान स्वतंत्र थे। पूर्वी भारत में विद्रोह अफगानों का अधिकार था। इस प्रकार अकबर पूरी तरह से असुरक्षित था।

2. असंगठित सेना- अकबर के पास एक सीमित राज्य के साथ-साथ एक सीमित सेना थी, जो असुरक्षित राज्य पर अधिकार स्थापित करने में सक्षम नहीं थी। केवल बैराम के नेतृत्व में एक छोटी सी सैनिक टुकड़ी ही थी। बाबर और हुमायूँ की अपव्ययता के कारण शाही कोष रिक्त हो चुका था इसलिए एक शक्तिशाली सेना का गठन करना भी अकबर के लिए सरल नहीं था।

3. प्राकृतिक विपदाएँ- जब अकबर का राज्याभिषेक हुआ तो उस वर्ष, अर्थात् 1556 . में भारत में भीषण अकाल एवं दुर्भिक्ष पड़ा। जिससे उपजाऊ भूमि बरबाद हो गई थी। दिल्ली और आगरा के सूबों में तो अकाल ने बड़ा ही उग्र

Q. 161046 मुगल काल में कृषि की दशा का वर्णन कीजिये।
Right Answer is:

SOLUTION

“आइन-ए-अकबरी“ द्वारा मुगल कालीन कृषि संबंधी इतिहास की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है । 1) मुगल काल में भू-राजस्व व्यवस्था बहुत ही वैज्ञानिक थी लगान वसूली हेतू दहसाला प्रथा प्रचलित थी । इसके द्वारा भूमि कर दोषों का निवारण किया गया व उत्पादन का दसवाँ भाग वार्षिक भूमि कर के रूप में निश्चित किया गया ।2) आइन-ए-अकबरी से जानकारी प्राप्त होती है कि भूमि को चार भागों में बाँटा गया था - 1) पोलज 2) परती 3) चाचर व 4) बंजर भूमि प्रथम तीन श्रेणियों की पैदावार के आधार पर प्रत्येक फसल की प्रति बीघा पैदावार का औसत निकाला जाता था सामान्यतः सरकार पैदावार का 1/3 कर के रूप में वसूल करती थी ।3) खेती से जुड़े सभी विवरण पटवारी के पास लेखाकिंत रहते थे । हर किसान को उसकी भूमि का पट्टा दिया जाता था । लगान दस वर्षो के औसत के आधार पर निश्चित किया जाता था जो नकद लिया जाता था ।4) भूमि कर की राशि कानूनगो व पटवारी के द्वारा प्राप्त लेखे-जोखे के आधार पर अमलगुजार, सहायक अमलगुजार व अन्य अधिकारी निश्चित करते थे ।5) जिस भूमि से साल में दो बार उपज ली जाती थी उस पर कर भी दो बार देना पड़ता था । कर एकत्र करने के लिये आमिल, अमलगुजार, मुकद्धम, कानूनगो, पटवारी आदि अधिकारी नियुक्त किये जाते थे ।6) कृषि पर कर का दबाव कम करने हेतू जरीवान व महासिलाना जैसे करों को खत्म कर दिया गया ।7) कर निर्धारण की तीन प्रणालियाँ थी - गल्ला बख्शी (बँटाई), जब्ती एवं नस्क थी। इस प्रकार मुगल काल में कृषि की दशा उन्नत थी ।


Q. 161047 मुगल मुगलकाल में प्रचलित सिंचाई साधनों की वर्तमान कृषि में उपयोगिता को समझाइये।
Right Answer is:

SOLUTION

मुगल काल में शासन की स्थिरता, मुगल शासकों के प्रयास, किसानों की गतिशीलता व मजदूरों की उपलब्धता से कृषि का सतत् विकास हुआ । खेती के लिये आवश्यक संसाधनों में पानी की उपलब्धता एक महती जरूरत थी । वह क्षेत्र जहाँ 40 इँच से ज़्यादा बारिश होती थी वहाँ की मुख्य फसल चावल थी, अन्य क्षेत्रों में गेहूँ व ज्वार बाजरे की खेती का प्रचलन था । सामान्यतः भारत में मानसून आधारित कृषि का प्रचलन था पर कुछ फसलों के लिए अतिरिक्त पानी की आवश्यकता होती थी इस हेतू मुगल शासकों ने सिंचाई के साधनों का विस्तार किया । यथा उत्तर भारत राज्य में कई नहरों, नालों की निर्माण कराया व शाहजहाँ कालीन नहरकृषि कार्यो के विकास के लिये रहट आदि का प्रयोग आम था । सिंचाइ्र हेतू सरोवर व कुँओं की खुदाई कराई गई। बालटियों व रहट के जरिए क्यारियों तक पानी पहुँचाया जाता था । कुओं व नालों की मरम्मत करवाई जैसे कि पंजाब में शाह नहर । वर्तमान समय में भी भारत में कृषि मानसून आधारित है । वर्षा के पानी के संरक्षण एवं उपयोग द्वारा ही कृषि का विकास किया जा सकता है । पानी के संरक्षण के जो उपाय मुगल काल में प्रचलित थे वही आज भी प्रासंगिक हैं । आज भी भारत में कृषि के लिए आवश्यक पानी के कृत्रिम संसाधन कुएं, बावड़ी, नहरें, रहट आदि ही हैं, इनके बिना कृषि उत्पादन नामुमकिन हैं । तथापि वर्तमान युग में वैज्ञानिक विकास के कारण सिंचाई साधनों में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है ।


Q. 161048 अवध (वर्तमान उत्तर प्रदेश का हिस्सा) के सूबे में पहाड़ी जनजातियों और मैदानी जनजातियों के बीच लेनदेन किस प्रकार हुआ करता था, का अबुल-फजल द्वारा जिस तरह वर्णन किया गया है, वो इस प्रकार है: उत्तर की पहाड़ियों से वस्तुओं जैसे कि - सोना, तांबा, सीसा, कस्तूरी, कुटास गाय की पूंछ (याक), शहद, चक ( एक साथ उबाले हुए संतरे और नींबू से निर्मित अम्ल ) अनार के बीज, अदरक, लंबी काली मिर्च, मजीठ (लाल रंग उत्त्पन्न करने वाला एक पौधा) जड़, बोरेक्स, ज़दोरी (हल्दी जैसी एक जड़ ), मोम, ऊनी वस्त्र, लकड़ी के बर्तन, बाज़ पक्षी, स्येनपक्षी, काले स्येनपक्षी, मर्लिन ( छोटा बाज-एक प्रकार का पक्षी ), एवं अन्य वस्तुओं, की मात्रा को आदमी, हृष्ट-पुष्ट टट्टू, और बकरी की पीठ पर ले जाया जाता था, इसके बदले में वे वापस सफेद और रंगीन कपडे, तृणमणि, नमक, हींग, गहने, कांच और मिट्टी के बर्तन ले जाते थे ।
ऊपर दिए गए गद्यांश को पढ़िए और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिये:
क) उत्तर के पहाड़ों से सामान को मैदानों तक कैसे लाया जाता था और इसके बदले में वे वापस क्या ले जाते थे? ख) उन वन्य उत्त्पादों का उल्लेख कीजिये जिनकी अत्यधिक मांग थी? ग) पंजाब में कौनसी जनजाति थलचर व्यापार में सलंग्न थी? घ) पाइक कौन थे? [2 + 2 + 2 +2 = 8]
Right Answer is:

SOLUTION

क) उत्तर के पहाड़ों से सामान की मात्रा को मैदानों तक आदमी, हृष्ट-पुष्ट टट्टू, और बकरी की पीठ पर ले जाया जाता था, इसके बदले में वे वापस सफेद और रंगीन कपडे, तृणमणि, नमक, हींग, गहने, कांच और मिट्टी के बर्तन ले जाते थे

ख) शहद, मधुमोम और गोंद लाख के रूप में वन उत्पादों की भारी मांग थी, सत्रहवीं सदी में कुछ जैसे कि गोंद लाख भारत से विदेशों में निर्यात की प्रमुख मद बन गए थे, हाथीयों को भी पकड़ा और बेचा जाता था, व्यापार में वस्तु-विनिमय के माध्यम से वस्तुओं की अदला-बदली भी शामिल थी

ग) पंजाब में लोहानी नामक जनजाति भारत और अफगानिस्तान के बीच थलचर व्यापार में, और पंजाब ही में, शहर से देशीय व्यापार में सलंग्न थीं

घ) पाइक, वे लोग थे जो असम में अहोम राजाओं को भूमि के बदले में सैन्य सेवा प्रदान करने के लिए बाध्य किये गए थे


Q. 161049 पहले जेसुइट शिष्टमंडल का एक सदस्य मान्सेरेट अपने अनुभवों का विवरण लिखते हुए कहता है:उससे (अकबर से) भेंट करने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए उसकी पहुँच कितनी सुलभ है इसके बारे में अतिशयोक्ति करना बहुत कठिन है। लगभग प्रत्येक दिन वह ऐसा अवसर निकालता है कि कोई भी आम आदमी अथवा अभिजात उससे मिल सके और बातचीत कर सके। उससे जो भी बात करने आता है उन सभी के प्रति कठोर न होकर वह स्वयं को मधुरभाषी और मिलनसार दिखाने का प्रयास करता है। उसे उसकी प्रजा के दिलो-दिमाग से जोड़ने में इस शिष्टाचार और भद्रता का बड़ा असाधारण प्रभाव है। ऊपर उल्लेखित गद्यांश को पढ़िये और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिये- क) जेसुइट विवरण का क्या महत्व है?
ख) अकबर को उसकी जनता द्वारा महान क्यूँ समझा जाता था?
ग) सम्राट ने जेसुइट के साथ किस प्रकार के संबंध स्थापित किए थे? [3 + 3 + 2 = 8]
Right Answer is:

SOLUTION

(अ)जेसुइट विवरण व्यक्तिगत प्रेक्षणों पर आधारित हैं और वे बादशाह के चरित्र और सोच पर गहरा प्रकाश डालते हैं। सार्वजनिक सभाओं में जेसुइट लोगों को अकबर के सिंहासन के काफी नजदीक स्थान दिया जाता था। वे उसके  साथ अभियानों में जाते, उसके बच्चों को शिक्षा देते तथा उसके  फूरसत के  समय में वे अकसर उसके साथ होते थे। जेसुइट विवरण मुगलकाल के राज्य अधिकारियों और सामान्य जन-जीवन के बारे में फारसी इतिहासों में दी गई सूचना की पुष्टि करते हैं। यूरोप को भारत के बारे में जानकारी जेसुइट धर्म प्रचारकों, यात्रियों, व्यापारियों और राजनयिकों के विवरणों से हुई।

ब) उससे जो भी बात करने आता उन सभी के प्रति कठोर न होकर वह स्वयं को मधुरभाषी और मिलनसार दिखाने का प्रयास करता था। वह उन्मुक्त व्यवहार करता था और उसकी ओर से इस बात की स्वीकृति थी कि कोई भी आम आदमी अथवा अभिजात उससे मिल सके और बिना किसी भय के उससे बातचीत कर सके। उसे उसकी प्रजा के दिलो-दिमाग से जोड़ने में इस शिष्टाचार और भद्रता का बड़ा असाधारण प्रभाव है।

स) सार्वजनिक सभाओं में जेसुइट लोगों को अकबर के  सिंहासन के काफी नजदीक स्थान दिया जाता था। वे उसके  साथ अभियानों में जाते, उसके बच्चों को शिक्षा देते तथा उसके  फूरसत के  समय में वे अकसर उसके साथ होते थे।


Q. 161050 कृषि प्रधान समाज में महिलाओं की स्थिति पर एक टिप्पणी लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

महिलाओं और पुरुषों को खेतों में कंधे से कंधा मिलाकर काम करना होता था, पुरुष खुदाई और जुताई करते थे जबकि महिलाएं फसल की बुवाई, निराई , पीट कर दानों को भूसे से अलग करने एवं पछोरने का कार्य करती थींएकल गांवों के विकास और किसानों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर खेती के विस्तार, जो मध्यकालीन भारतीय कृषि की विशेषता होती थी, के साथ उत्पादन का आधार पूरे घर का श्रम और संसाधन होता था, स्वाभाविक रूप से, घर (महिलाओं के लिए) और विश्व (पुरुषों के लिए)के मध्य लिंग अलगाव इस संदर्भ में संभव नहीं था

हालांकि, महिलाओं के जैविकीय कार्यों, से संबंधित भेदभाव जारी रहा, उदाहरणस्वरूप, पश्चिमी भारत में मासिक धर्म अवस्था से गुजर रही महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक स्पर्श करने की स्वीकृति नहीं थी, और उन्हें बंगाल में उन उद्यानों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी जहाँ पान के पत्तों को उगाया जाता था कारीगरी कार्य जैसे कि सूत कताई, मिट्टी के बर्तनों के लिए मिट्टी को छानना और सानना, और कढ़ाई आदि उत्त्पादन के कई पहलु थे जो महिला श्रम पर निर्भर करते थे, उत्पाद जितना अधिक वाणिज्यिक होता था, इसके उत्त्पादन हेतु महिलाओं के श्रम की उससे कहीं अधिक मांग होती थी वास्तव में, किसान और कारीगर महिलाएँ केवल खेतों में ही कार्य नहीं करती थी बल्कि यदि आवश्यक हो तो नियोक्ताओं के घर एवं बाजार में भी जाया करती थीं महिलाओं को कृषि प्रधान समाज में एक महत्वपूर्ण संसाधन माना जाता था, क्योंकि वो समाज में बच्चों की जन्मदायीनी होती थी, जो श्रम पर निर्भर करता था, इसी समय, महिलाओं की मृत्यु दर भी उच्च थी, कुपोषण, बार बार गर्भधारण, एवं बच्चे के जन्म के समय महिलाओं की मृत्यु, से प्रायः पत्नियों की संख्या में कमी हो जाती थी, कई ग्रामीण समुदायों में विवाह में दुल्हन के परिवार को दहेज के स्थान पर दुल्हन की कीमत का भुगतान करने की आवश्यकता होती थी, पुनर्विवाह, तलाकशुदा और विधवा महिलाओं दोनों के के लिए वैध माना जाता था एक प्रजनन शक्ति के रूप में महिलाओं के साथ एक महत्ता जुड़ी हुई थी, इसके अलावा उन पर से नियंत्रण खोने का डर भी बड़ा होता था, स्थापित सामाजिक मानदंडों के अनुसार एक पुरुष, घर का मुखिया होता था इस प्रकार महिलाओं को, परिवार और समुदाय के पुरुष सदस्यों द्वारा सख्त नियंत्रण में रखा जाता था यदि महिलाओं की ओर से बेवफाई (दाम्पत्य विश्वासघात) किये जाने का संदेह होता था तो उन्हें कठोर दण्ड दिया जा सकता था पश्चिमी भारत से प्राप्त दस्तावेज़ में, महिलाओं द्वारा निवारण और न्याय की मांग हेतु ग्राम पंचायत को भेजी गई याचिकाएं आलेखबद्ध हैं, पत्नीयाँ अपने पति की बेवफाई या घर (गृहस्थी) के पुरुष मुखिया, द्वारा पत्नी और बच्चों की उपेक्षा के खिलाफ प्रत्यापत्ति व्यक्त किया करती थीं, पुरुष द्वारा बेवफाई हमेशा दंडित नहीं की जाती थी, जबकि राज्य और "श्रेष्ठतर" जाति समूहों द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिए कि परिवार को पर्याप्त रूप से सुविधाएं प्रदान की गई हैं, अथवा नहीं, हस्तक्षेप किया जाता था,अधिकाँश मामलों में जिनमें महिलाओं द्वारा पंचायत को याचिका दी गई थी, महिलाओं के नाम दस्तावेज़ों में सम्मिलित नहीं किये गए थे: याचिकाकर्ता को घर के पुरुष मुखिया की मां, बहन अथवा पत्नी के रूप में संदर्भित किया गया था

संपत्तिवान कुलीन वर्ग में, महिलाओं को संपत्ति का वारिस होने का अधिकार था पंजाब से प्राप्त उदाहरण दर्शाते हैं कि विधवाओं सहित महीलाएँ, उन्हें विरासत में प्राप्त हुई संपत्ति के विक्रेता के रूप में ग्रामीण क्षेत्र के बाजार में सक्रिय रूप से भाग लिया करती थीं,हिन्दू और मुस्लिम महीलाएँ, उन्हें विरासत में प्राप्त जमींदारी को बेचने अथवा गिरवी रखने के लिए स्वतंत्र थीं, महिला जमींदार अठारहवीं सदी के बंगाल में पहचानी जाती(विख्यात) थीं, वास्तव में, अठारहवीं सदी की जमींदारीयों में से एक सबसे बड़ी और सर्वाधिक विख्यात जमींदारी जो कि राजशाही की थी, के शीर्ष पर एक महिला थी


Q. 161051 सोलहवीं और सत्रहवीं सदियों के कृषि इतिहास एवं इसकी जानकारी के स्त्रोतों पर प्रकाश डालिए।
Right Answer is:

SOLUTION

चूंकि किसान अपने बारे में खुद नहीं लिखा करते थे इसलिए ग्रामीण समाज के क्रियाकलापों की जानकारी हमें उन लोगों से नहीं मिलती जो खेतों में काम करते थे। नतीजतन, सोलहवीं और सत्रहवीं सदियों के कृषि इतिहास को समझने के लिए हमारे मुख्य स्त्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ व दस्तावेज हैं जो मुगल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे। इसके अलावा प्रसिद्ध लेखकों और यात्रियों के विवरण भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथों में एक था आइन-ए-अकबरी (संक्षेप में आइन)जिसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने लिखा था। खेतों की नियमित जुताई की तसल्ली करने के लिए, राज्य के नुमाइंदों द्वारा करों की उगाही के लिए और राज्य व ग्रामीण सत्तापोशों यानी कि जमींदारों के बीच के रिश्तों के नियमन के लिए जो इंतजाम राज्य ने किए थे, उसका लेखा-जोखा इस ग्रंथ में बड़ी सावधानी से पेश किया गया है। आइन का मुख्य उद्देश्य अकबर के सम्राज्य का एक ऐसा खाका पेश करना था जहाँ एक मजबूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बना कर रखता था। आइन के लेखक के मुताबिक, मुगल राज्य के खिलाफ कोई बगावत या किसी भी किस्म की स्वायत्त सत्ता की दावेदारी का असफल होना पहले ही तय था। दूसरे शब्दों में, किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन  से पता चलता है वह सत्ता के ऊंचे गलियारों का नजरिया है। खुशकिस्मती से आइन की जानकारी के साथ-साथ हम उन स्त्रोतों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं जो मुगलों की राजधानी से दूर के इलाकों में लिखे गए थे। इनमें सत्रहवीं व अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से मिलने वाले वे दस्तावेज शामिल हैं जो सरकार कीआमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं। इसके अलावा, ईस्ट इंडिया कंपनी के बहुत सारे दस्तावेज भी हैं जो पूर्वी भारत में कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका पेश करते हैं। ये सभी स्त्रोत किसानों, जमींदारों और राज्य के बीच तने झगड़ों को दर्ज करते हैं। लगे हाथ, ये स्त्रोत यह समझने में हमारी मदद करते हैं कि किसान राज्य को किस नजरिये से देखते थे और राज्य से उन्हें कैसे न्याय की उम्मीद थी।

किसान और उनकी जमीन-

 मुगल काल के भारतीय-फारसी स्त्रोत किसान के लिए आमतौर पर रैयत (बहुवचन,  रिआया ) या मुजरियान शब्द का इस्तेमाल करते थे। साथ ही, हमें किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं। सत्रहवीं सदी के स्त्रोत दो किस्म के किसानों की चर्चा करते हैं–

खुद-काश्त व पाहि-काश्त-पहले किस्म के किसान वे थे जो उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी जमीन थीं। दूसरे (पाहि-काश्त) वे खेतिहर थे जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे। लोग अपनी मर्जी से भी पाहि-काश्त बनते थे (मसलन, अगर करों की शर्तें किसी दूसरे गाँव में बेहतर मिलें) और मजबूरन भी (मसलन, अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी से)। उत्तर भारत के एक औसत किसान के पास शायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज्यादा कुछ होता था, ज़्यादातर के पास इससे भी कम। गुजरात में जिन किसानों के पास 6 एकड़ के करीब जमीन थी वे समृद्ध माने जाते थे, दूसरी तरफ, बंगाल में एक औसत किसान की जमीन की उपरी सीमा 5 एकड़ थी, 10 एकड़ जमीन वाले आसामी को अमीर समझा जाता था। खेती व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धान्त पर आधारित थी। किसानों की जमीन उसी तरह खरीदी और बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की।

सिंचाई और तकनीक-

जमीन की बहुतायत, मजदूरों की मौजूदगी, और किसानों की गतिशीलता की वजह से कृषि का लगातार विस्तार हुआ। चूंकि खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए रोजमर्रा के खाने की जरूरतें जैसे चावल, गेहूँ, ज्वार इत्यादि फसलें सबसे ज्यादा उगाई जाती थीं। जिन इलाकों में प्रति वर्ष 40 इंच या उससे ज्यादा बारिश होती थी, वहाँ कमोबेश चावल की खेती होती थी। कम और कमतर बारिश वाले इलाकों में क्रमशः गेहूँ व ज्वार-बाजरे की खेती ज्यादा प्रचलित थी।मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, जैसा कि आज भी है। लेकिन कुछ ऐसी फसलें भी थीं जिनके लिए अतिरिक्त पानी की जरूरत थी। इनके लिए  सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़े।  सिंचाई कार्यों को राज्य की मदद भी मिलती थी। मसलन, उत्तर भारत में राज्य ने कई नयी नहरें व नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे कि शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान पंजाब में शाह नहर ।वैसे तो खेती मेहनतकशी का काम था लेकिन किसान ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल भी करते थे जो अकसर पशुबल पर आधारित होती थीं। ऐसा एक उदाहरण लकड़ी के उस हल्के हल का दिया जा सकता है जिसको एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगाकर आसानी से बनाया जा सकता था। ऐसे हल मिट्टी को बहुत गहरे नहीं खोदते थे जिसके कारण तेज गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी। बैलों के जोड़े के सहारे खींचे जाने वाले बरमे का इस्तेमाल बीज बोने के लिए किया जाता था। लेकिन बीजों को हाथ से छिड़क कर बोने का रिवाज ज्यादा प्रचलित था। मिट्टी की गुड़ाई और साथ-साथ निराई के लिए लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धार काम में लाए जाते थे।

फसलें -

मौसम के दो मुख्य चक्रों के दौरान खेती की जाती थीः एक खरीफ (पतझड़ में) और दूसरी रबी (वसंत में)। यानी सूखे इलाकों और बंजर जमीन को छोड़ दें तो ज़्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फसलें होती थीं। जहाँ बारिश या  सिंचाई के अन्य साधन हर वक्त मौजूद थे वहाँ तो साल में तीन फसलें भी उगाई जाती थीं। इस वजह से पैदावार में भारी विविधता पाई जाती थी। उदाहरण के तौर पर, आइन हमें बताती है कि दोनों मौसम मिलाकर, मुगल प्रांत आगरा में 39 किस्म की फसलें उगाई जाती थीं जबकि दिल्ली प्रांत में 43 फसलों की पैदावार होती थी। बंगाल में सिर्फ चावल की 50 किस्में पैदा होती थीं। हालाँकि दैनिक आहार की खेती पर ज्यादा ज़ोर दिया जाता था मगर इसका मतलब यह नहीं था कि मध्यकालीन भारत में खेती सिर्फ गुजारा करने के लिए की जाती थी। स्त्रोतों में हमें अकसर जिन्स-ए-कामिल (सर्वोत्तम फसलें) जैसे लफ़्ज़ मिलते हैं । मुगल राज्य भी किसानों को ऐसी फसलों की खेती करने के लिए बढ़ावा देता था क्योंकि इनसे राज्य को ज्यादा कर मिलता था। कपास और गन्ने जैसी फसलें बेहतरीन जिन्स-ए-कामिल थीं। मध्य भारत और दक्कनी पठार में फैले हुए जमीन के बड़े-बडे़ टुकड़ों पर कपास उगाई जाती थी, जबकि बंगाल अपनी चीनी के लिए मशहूर था। तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन भी नकदी फसलों में आती थीं। इससे पता चलता है कि एक औसत किसान की जमीन पर किस तरह पेट भरने के लिए होने वाले उत्पादन और व्यापार के लिए किए जाने वाले उत्पादन एक दूसरे से जुडे़ हुए थे।

सत्रहवीं सदी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कई नयी फसलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुँचीं। मसलन, मक्का भारत में अफ्रीका और स्पेन के रास्ते आया और सत्रहवीं सदी तक इसकी गिनती पश्चिम भारत की मुख्य फसलों में होने लगी। टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्जियाँ  नयी दुनिया से लाई गईं। इसी तरह अनानास और पपीता जैसे फल वहीं से आए।


Q. 161052 पंचायत और मुखिया पर एक टिप्पणी लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

पंचायत का संगठन-

गाँव की पंचायत  में बुजुर्गों का जमावड़ा होता था। आमतौर पर वे गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग  हुआ करते  थे जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार होते थे। जिन गाँवों में कई जातियों के लोग रहते थे, वहाँ अकसर पंचायत में भी विविधता पाई जाती  थी। यह एक ऐसा अल्पतंत्र था जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी। फिर भी इसकी संभावना कम ही है कि छोटे-मोटे और नीच काम करने वाले खेतिहर मजदूरों के  लिए इसमें कोई जगह होती होगी। पंचायत का फैसला गाँव में सबको मानना पड़ता था।

 

मुखिया का चयन-

पंचायत का सरदार एक मुखिया होता था जिसे मुक़द्दम या मंडल कहते थे। कुछ स्त्रोतों से ऐसा लगता है कि मुखिया का चुनाव गाँव के बुजुर्गों की आम सहमति से होता था और इस चुनाव के बाद उन्हें इसकी मंजूरी जमींदार से लेनी पड़ती थी। मुखिया अपने ओहदे पर तभी तक बना रहता था जब तक गाँव के बुजुर्गों को उस पर भरोसा था। ऐसा नहीं होने पर बुजुर्ग उसे बर्खास्त कर सकते थे। गाँव के आमदनी व खर्चे का हिसाब-किताब अपनी निगरानी में बनवाना मुखिया का मुख्य काम था और इसमें पंचायत का पटवारी उसकी मदद करता था।

पंचायत के कार्य-

पंचायत का खर्चा गाँव के उस आम ख़जाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति अपना योगदान देता था। इस ख़जाने से उन कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी का ख़र्चा भी किया जाता था जो समय-समय पर गाँव का दौरा किया करते थे। दूसरी ओर, इस कोष का इस्तेमाल बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी होता था और ऐसे सामुदायिक कार्यों के लिए भी जो किसान खुद नहीं कर सकते थे, जैसे कि मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध बनाना या नहर खोदना। पंचायत का एक बड़ा काम यह तसल्ली करना था कि गाँव में रहने वाले अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों के अंदर रहेंगे । पूर्वी भारत में सभी शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं। यूँ कहा जा सकता है कि जाति की अवहेलना रोकने के लिए लोगों के आचरण पर नजर रखना गाँव के मुखिया की जिम्मेदारियों में से एक था। पंचायतों को जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने जैसे ज्यादा गंभीर दंड देने के अधिकार थे। समुदाय से बाहर निकालना

एक कड़ा कदम था जो एक सीमित समय के लिए लागू किया जाता था। इसके तहत दंडित व्यक्ति को (दिए हुए समय के लिए) गाँव छोड़ना पड़ता था। इस दौरान वह अपनी जाति और पेशे से हाथ धो बैठता था। ऐसी नीतियों का मकसद जातिगत रिवाजों की अवहेलना रोकना था। ग्राम पंचायत के अलावा गाँव में हर जाति की अपनी पंचायत होती थी। समाज में ये पंचायतें काफी ताकतवर होती थीं। राजस्थान में जाति पंचायतें अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी के झगड़ों का निपटारा करती थीं। वे जमीन से जुड़े दावेदारियों के झगड़े सुलझाती थीं, यह तय करती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के मुताबिक हो रही हैं या नहीं, और यह भी कि गाँव के आयोजन में किसको किसके उपर तरजीह दी जाएगी। कर्मकांडीय वर्चस्व किस क्रम में होगा। फौजदारी न्याय को छोड़ दें तो ज़्यादातर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फैसलों को मानता था।

 

पंचायत और न्याय-

पश्चिम भारत -ख़ासकर राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे प्रांतों- के संकलित दस्तावेजों में ऐसी कई अर्ज़ियाँ हैं जिनमें पंचायत से ऊंची जातियों या राज्य के अधिकारियों के खि़लाफ जबरन कर उगाही या बेगार वसूली की शिकायत की गई है। आमतौर पर यह अर्ज़ियाँ ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग लगाते थे। अकसर सामूहिक तौर पर भी ऐसी अर्ज़ियाँ दी जाती थीं। इनमें किसी जाति या संप्रदाय विशेष के लोग संभ्रांत समूहों की उन माँगों के खि़लाफ अपना विरोध जताते थे जिन्हें वे नैतिक दृष्टि से अवैध् मानते थे। उनमें एक थी बहुत ज्यादा कर की माँग क्योंकि इससे किसानों का दैनिक गुजारा ही जोखिम में पड़ जाता था, ख़ासकर सूखे या ऐसी दूसरी विपदाओं के दौरान। उनकी नजरों में जिंदा रहने के लिए न्यूनतम बुनियादी साधन उनका परंपरागत रिवाजी हक था। वे समझते थे कि ग्राम पंचायत को इसकी सुनवाई करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्य अपना नैतिक फर्ज  अदा करे और न्याय करे।

 

नीचली जाति के किसानों और राज्य के अधिकारियों या स्थानीय जमींदारों के बीच झगड़ों में पंचायत के फैसले अलग-अलग मामलों में अलग-अलग हो सकते थे। अत्यधिक कर की माँगों के मामले में पंचायत अकसर समझौते का सुझाव देती थी। जहाँ समझौते नहीं हो पाते थे, वहाँ किसान विरोध के ज्यादा उग्र रास्ते अपनाते थे, जैसे कि गाँव छोड़कर भाग जाना। जोतने लायक खाली जमीन अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध थी जबकि श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी। इस वजह से, गाँव छोड़कर भाग जाना खेतिहरों के हाथ में एक बड़ा प्रभावी हथियार था।


Q. 161053 निम्नलिखित के विशेष संदर्भ में मुगल समाज में कृषि संबंधों की संरचना के प्रभाव की व्याख्या कीजिये- (I) ग्रामीण दस्तकार (ii) जाति और ग्रामीण माहौल ।
Right Answer is:

SOLUTION

ग्रामीण दस्तकार

अलग-अलग तरह के उत्पादन कार्य में जुटे लोगों के बीच फैले  लेन-देन के रिश्ते गाँव का एक और रोचक पहलू था। अग्रेजी शासन के शुरुआती वर्षों में किए गए गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफी अच्छी तादाद में रहते थे। कहीं-कहीं तो कुल घरों के 25 प्रतिशत फीसदी घर दस्तकारों के थे। कभी-कभी किसानों और दस्ताकारों के बीच फर्क करना मुश्किल होता था क्योंकि कई ऐसे समूह थे जो दोनों किस्म के काम करते थे। खेतिहर और उसके  परिवार के सदस्य कई तरह की वस्तुओं के उत्पादन में शिरकत करते थे।

मसलन-रँगरेजी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतनों को पकाना, खेती के औजारों को बनाना या उनकी मरम्मत करना। उन महीनों में जब उनके पास खेती के काम से फूरसत होती-जैसे कि बुआई और सुहाई के बीच या सुहाई और कटाई के बीच-उस समय ये खेतिहर दस्तकारी का काम करते थे। कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार जैसे ग्रामीण दस्तकार भी अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे जिसके  बदले गाँव वाले उन्हें अलग-अलग तरीकों से उन सेवाओं की अदायगी करते थे। आमतौर पर या तो उन्हें फसल का एक हिस्सा दे दिया जाता था या फिर गाँव की जमीन का एक टुकड़ा, शायद कोई ऐसी जमीन जो खेती लायक होने के बावजूद बेकार पड़ी थी। अदायगी की सूरत क्या होगी ये शायद पंचायत ही तय करती थी। महाराष्ट्र में ऐसी जमीन दस्तकारों की  मीरास या वतन बन गई जिस पर दस्तकारों का पुश्तैनी अधिकार होता था।यही व्यवस्था कभी-कभी थोडे़ बदले हुए रूप में भी पायी जाती थी जहाँ दस्तकार और हरेक खेतिहर परिवार परस्पर बातचीत करके  अदायगी

की किसी एक व्यवस्था पर राजी होते थे। ऐसे में आमतौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था। उदाहरण के तौर पर,

अठारहवीं सदी के स्त्रोत बताते हैं कि बंगाल में जमींदार उनकी सेवाओं के बदले लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को रोज़  का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे।  इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, हालांकि यह शब्द सोलहवीं व सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था। ये सबूत रूचिकर हैं क्योंकि इनसे पता चलता है कि गाँव के छोटे स्तर पर फेर-बदल के रिश्ते कितने पेचीदा थे। ऐसा नहीं है कि नकद अदायगी का चलन बिलकुल ही नदारद था।

 

जाति और ग्रामीण माहौल-

जाति और अन्य जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई तरह के समूहों में बँटे थे। खेतों की जुताई करने वालों में एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे, या फिर खेतों में मजदूरी करते थे। हालाँकि खेती लायक जमीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जाति के लोगों को सिर्फ नीच समझे जाने वाले काम ही दिए जाते थे। इस तरह वे गरीब रहने के लिए मजबूर थे। जनगणना तो उस वक्त नहीं होती थी, पर जो थोडे़ बहुत आँकड़े और तथ्य हमारे पास हैं उनसे पता चलता है कि गाँव की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही समूहों का था। इनके पास संसाधन सबसे कम थे और ये जाति व्यवस्था की पाबंदियों से बँधे थे। इनकी हालत कमोबेश वैसी ही थी जैसी कि आधुनिक भारत में दलितों की। दूसरे संप्रदायों में भी ऐसे भेदभाव फैलने लगे थे। मुसलमान समुदायों में हलालख़ोरान जैसे  ‘नीच’ कामों से जुड़े समूह गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे, इसी तरह बिहार में मल्लाहजादाओं(शाब्दिक अर्थ, नाविकों के पुत्र), की तुलना दासों से की जा सकती थी।


Q. 161054 पेशवा बाजीराव द्वितीय के पुत्र .... थे


A. तात्या टोपे।

B. दामोदर राव।

C. गंगाधर राव।

D. नाना साहब।

Right Answer is: D

SOLUTION

नाना साहब का असली नाम धोंडू  पंत था। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया क्योंकि उनके लिए पेशवा की पेंशन बंद कर दी गई थी। ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि वह पेशवा के मुंहबोले बेटे थे।


Q. 161055 ....... तक अवध उन चन्द भारतीय राज्यों में से था जिनपे अंग्रेजी क़ब्ज़ा नहीं था
Right Answer is: C

SOLUTION

अवध अंग्रेजों का एक मित्र राज्य था जिसका कंपनी के शासन के विस्तार में बड़ा योगदान था।लेकिन कंपनी की लालची नज़रें इस पर गड़ी हुई थीं। लार्ड डलहौज़ी ने एक बार कहा था 'अवध एक चेरी है जो एक दिन हमारे मुंह में गिर जाएगी"।अंग्रेजों ने कुशासन का बहाना बनाकर अवध पर क़ब्ज़ा कर लिया।अवध के लोगों ने इसे विश्वासघात के रूप में देखा।


Q. 161056 गाँवों में, अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का दायरा बढ़ा और लोगों ने ...... के ऊपर भी हमला किया
Right Answer is: C

SOLUTION

साहूकारों पर हमला किया गया क्योंकि उन्हें न केवल उत्पीड़कों के रूप में बल्कि अंग्रेजों के सहयोगी के रूप में भी देखा गया था। उनके बहीखातों को लोगों ने आग में डाल दिया था।


Q. 161057 भारतीय राष्ट्रवादियों के बीच, 1857 के विद्रोह को यूँ वर्णित किया गया था


A. आजादी का सबसे पहला युद्ध।

B. मुस्लिम द्वारा हिंदू शिकायतों का शोषण।

C. मध्युगीन सामंती प्रणाली की गुज़री हुई महिमा को लौटाने की कोशिश।

D. शुद्ध रूप से सैन्य प्रकोप।

Right Answer is: A

SOLUTION

बीसवीं सदी का राष्ट्रवादी आंदोलन 1857 की घटनाओं से प्रेरित था।राष्ट्रवादी कल्पनाओं की एक पूरी दुनिया विद्रोह के आस-पास बुनी गई थी।यह आज़ादी की पहली लड़ाई थी जिसमे भारत के सभी वर्गों के लोग साथ आये और शाही शासन के खिलाफ प्रतिरोध किया।


Q. 161058 रानी लक्ष्मीबाई को.... में मारा गया


A. मार्च 1858

B. अप्रैल 1858

C. 1858 मई

D. जून 1858

Right Answer is: D

SOLUTION

रानी लक्ष्मीबाई 1857 के विद्रोह की सबसे लोकप्रिय महिला महिला विद्रोही थीं।उन्होंने झाँसी में विद्रोह का नेतृत्व किया।उन्हें जून 1858 में अंग्रेजों द्वारा युद्ध में मारा गया।


Q. 161059 मई और जून 1857 में पारित किए गए विभिन्न क़ानूनों का क्या प्रभाव पड़ा था?
Right Answer is:

SOLUTION

मई और जून 1857 में पारित किए गए कई क़ानूनों के जरिए न केवल समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया बल्कि फौजी अफसरों और यहाँ तक कि आम अंग्रेजों को भी ऐसे हिंदुस्तानियों पर मुकदमा चलाने और उनको सजा देने का अधिकार दे दिया गया जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था।


Q. 161060 उस वायसराय का नाम बताइये जिसने 1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया के उद्घोषणा पत्र को पढ़ा था ?
Right Answer is:

SOLUTION

लार्ड कैनिंग ने 1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद में आयोजित एक भव्य दरबार में महारानी विक्टोरिया के उद्घोषणा पत्र को पढ़ा था।


Q. 161061 ब्रिटिश भारत के प्रथम वायसराय कौन थे ?
Right Answer is:

SOLUTION

ब्रिटिश भारत के प्रथम वायसराय वारेन हेस्टिंग्स (1774 1785) थे।


Q. 161062 भारत में रेलवे की शुरूआत कब हुई?
Right Answer is:

SOLUTION

भारत में रेलवे की शुरूआत 1853 AD में हुई।


Q. 161063 नाना साहब का सहयोगी कौन था ?
Right Answer is:

SOLUTION

नाना साहब का सहयोगी अजीम उल्ला खां था |


Q. 161064 भारतीय अंतिम सम्राट बहादुरशाह जफ़र की मृत्यु कहाँ हुई थी ?
Right Answer is:

SOLUTION

भारतीय अंतिम सम्राट बहादुरशाह जफ़र की मृत्यु सन 1862 ई० में रंगून में हुई थी


Q. 161065 लार्ड डलहौजी भारत के गवर्नर कब बने थे ?
Right Answer is:

SOLUTION

सन 1848 ई० में


Q. 161066 1857 ई० की क्रांति से पहले दो विद्रोह के नाम बताओं इनके असफल होने के क्या कारण थे ?
Right Answer is:

SOLUTION

विद्रोह के असफल होने के निम्न कारण थे -
1. स्थानीय विद्रोह थे
2. इनमे संगठन का आभाव था


Q. 161067 सन 1858 ई० के अधिनियम के पारित होने के दो मुख्य कारण लिखिए?
Right Answer is:

SOLUTION

1858 ई० के अधिनियम के पारित होने के दो मुख्य कारण
1. दोहरी शासन प्रणाली के दोष
2. 1858 ई० का महान विद्रोह


Q. 161068 1857 ई० की क्रांति के दो प्रमुख सैनिक कारणों को बताओं
Right Answer is:

SOLUTION

भारत सैनिकों को दिए गये कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी लगी होने की अफवाह भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश सैनिकों की अपेक्षा कम वेतन दिया जाता था


Q. 161069 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में लखनऊ का नेतृत्व किसने किया था इसके क्या परिणाम हुए?
Right Answer is:

SOLUTION

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में लखनऊ का नेतृत्व वाजिद अलीशाह की बेगम हजरत महल ने सम्भाला क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी का घेराव कर लिया अंत में अंग्रेजों का लखनऊ पर आधिपत्य हो गया बाद में बेगम हजरत महल नेपाल चली गयी


Q. 161070 निम्न लिखित कथन सही है या गलत, बताएं -
अंग्रेजों ने सिक्ख फ़ौज की मदद से 1857 ई० की क्रांति को दबाया।
Right Answer is:

SOLUTION

सही


Q. 161071 मई और जून 1857 में पारित किए गए विभिन्न क़ानूनों का क्या प्रभाव पड़ा था?
Right Answer is:

SOLUTION

मई और जून 1857 में पारित किए गए कई क़ानूनों के जरिए न केवल समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया बल्कि फौजी अफसरों और यहाँ तक कि आम अंग्रेजों को भी ऐसे हिंदुस्तानियों पर मुकदमा चलाने और उनको सजा देने का अधिकार दे दिया गया जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था।


Q. 161072 सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में राज्य द्वारा जंगलों में घुसपैठ के क्या कारण थे?
Right Answer is:

SOLUTION

16वीं एवं 17वीं सदी में किसानों एवं जनजातियों द्वारा अनेक विद्रोह किए गए थे, जिन्हें कुचलने के लिए राज्य द्वारा जंगलों में घुसपैठ की गयी थी।


Q. 161073 1857 की क्रांति के लिए राजनैतिक एवं सैनिक कारणो की विवेचना कीजिए। [1+1]
Right Answer is:

SOLUTION

1857 की क्रांति के लिए राजनैतिक कारण -

(1) अंग्रेजी की साम्राज्यवादी नीति से भारतीय शासक अप्रसन्न थे।

(2) देशी राजाओं के ऊपर अंगेजों के द्वारा अनेक प्रतिबन्ध लगाये जाने के कारण उनमें असंतोष था।

(3) सहायक संधि द्वारा देशी राजाओं को अंग्रेजों ने पंगु बना दिया था।

(4) अपहरण नीति द्वारा देशी राज्यों को छीनना।

(5) अंग्रेजों ने नाना साहब आदि भारतीय नरेशों की पेंशनें छीन ली थी जिससे वे अंग्रेजों से अप्रसन्न थे।

(6) उच्च वर्ग के लोगों के साथ अंग्रेजों का व्यवहार बड़ा अपमानजनक था जिससे वे अंग्रेजों के विरूद्ध हो गये।

सैनिक कारण -

(1) भारतीय एवं यूरोपियन सैनिकों में पद, वेतन, पदोन्नति आदि को लेकर भेदभाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों के साथ बुरा व्यवहार किया जाता था और उन्हें कम महत्व दिया जाता था।

(2) उन पर कई प्रकार के प्रतिबंध थे, जैसे वे तिलक, चोटी, पगड़ी या दाढ़ी आदि नहीं रख सकते थे। सामूहिक रसोई घर से भी उच्च् वर्ग के (ब्राह्मण और ठाकुर) लोग निम्न वर्ग के लोगों से प्रसन्न थे।

(3) तात्कालिक कारण कारतूसों में लगी सूअर और गाय की चर्बी (चिकना पदार्थ) थी। नयी एनफील्ड बन्दूकों में गोली भरने से पूर्व कारतूस को दाँत से छीलना पड़ता था। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही गाय और सूअर की चर्बी से अपने-अपने धर्म पर आघात समझते थे। अतः उनका भड़कना स्वाभाविक था।


Q. 161074 1857 के विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों द्वारा तत्काल क्या कदम उठाए गए थे?
Right Answer is:

SOLUTION

विद्रोह को कुचलना अंग्रेजों के लिए बहुत आसान साबित नहीं हुआ। मई और जून 1857 में पारित किए गए कई क़ानूनों के जरिए न केवल समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया बल्कि फौजी अफसरों और यहाँ तक कि आम अंग्रेजों को भी ऐसे हिंदुस्तानियों पर मुकदमा चलाने और उनको सजा देने का अधिकार दे दिया गया जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था।


Q. 161075 1857 की क्रांति ने राष्ट्रीय एकता को किस प्रकार पुष्ट किया?
Right Answer is:

SOLUTION

“1857 को विद्रोह से अधिक भाग्यशाली घटना अन्य कोई नहीं घटी । इसने भारतीय गगन मण्डल को अनेक शंकाओं से मुक्त कर दिया । “असफल होकर भी इस स्वतंत्रता संघर्ष ने भावी स्वतंत्रता संघर्ष के लिए पे्ररणादायक वातावरण तैयार किया । विशेषकर क्रांतिकारी तो इसे अपना प्रकाश स्तंभ मानते थे । दिल्ली चलों का नारा अनवरत रूप से 1947 ई. तक चलता रहा । इस आंदोलन में हिंदुओं व मुसलमानों ने समान रूप से भाग लिया व दोनों ही जातियों के नेताओं ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया व कन्धे से कन्धा मिलाकर युद्ध किया ।


Q. 161076 निम्न लिखित कथनों में से सही व गलत बताएं -
क. अंग्रेज शासकों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया ।
ख. अंग्रेजों ने विधवा पुनर्विवाह पर प्रतिबन्ध लगाया ।
ग. रायफलों में गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों का प्रयोग होता है ।
घ. भारतीयों को सेना में ऊँचे पद प्राप्त होते थे ।
Right Answer is:

SOLUTION

क.  गलत
ख. गलत
ग. सही 
घ. गलत


Q. 161077 निम्न लिखित कथनों में से सही व गलत बताएं -
क. लार्ड डलहौजी ने विलय नीति चलायी ।
ख. अंग्रेजों की नीति के कारण भारतीय शिल्प की दशा बिगडती गयी ।
ग. अंगेजों ने बहादुरशाह द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र को पदवी देने की घोषणा की ।
घ. अंग्रेज हमारे देश से कच्चा माल सस्ते दामों में ले जाते थे ।
Right Answer is:

SOLUTION

क. सही 
ख. सही 
ग. गलत   
घ. सही


Q. 161078 मध्य भारत में अंग्रेजों ने विद्रोह का दमन किस प्रकार किया ?
Right Answer is:

SOLUTION

मध्य भारत में अंग्रेजों ने विद्रोह का दमन सर हयूरोज की सेना ने किया उन्होंने रानी लक्ष्मी बाई को झाँसी में हरा  दिया कालपी में तात्यां टोपे के साथ मिलकर सिंधिया पर आक्रमण कर किले को अधिकार में ले लिया लेकिन बाद में सर हयूरोज ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया रानी बहादुरी से लड़ते हुए मरी गयी तात्यां टोपे को फाँसी दी गयी इस प्रकार मध्य भारत में विद्रोहियों का दमन हुआ 


Q. 161079 नाना साहब के बाद कानपुर की क्रांति किस प्रकार शांत हो गयी थी ?
Right Answer is:

SOLUTION

जनरल हैवलॉक ने कानपुर पर कब्जा करके  नाना साहब को नेपाल भेज दिया । नाना साहब के बाद तात्यां टोपे ने कानपुर की कमान सँभाली लेकिन उनके साथियों ने उनके साथ विश्वासघात किया।  जिससे उन्हें 1859 ई० में  फाँसी दे दी गयी और कानपुर की क्रांति शांत को गयी।


Q. 161080 बैरकपुर की घटना भारतीय इतिहास में क्यों याद की जाती है
Right Answer is:

SOLUTION

लार्ड कैनिंग ने चर्बीयुक्त कारतूस के प्रयोग के लिए भारतीय सैनिकों के साथ धोखा धड़ी की  29 मार्च 1857  को बंगाल छावनी के सिपाही मंगल पण्डे ने कारतूस के प्रयोग से मना कर दिया । इसके परिणाम स्वरुप मंगल पण्डे को फाँसी दे दी गयी इसलिए इस घटना को भारतीय इतिहास में याद रखा जाता है


Q. 161081 निम्न लिखित कथनों में से सही व गलत बताएं -
क. महारानी विक्टोरिया ने 1885 ई० में घोषणापत्र की कुछ नीतियों का उल्लेख किया।
ख. यह क्रांति सम्पूर्ण भारत में फ़ैल गयी थी। ग. कुँवर सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष छोड़ दिया था।
घ. अंग्रेजों के लखनऊ पर आधिपत्य हो जाने पर बेगम हजरत महल नेपल चली गयी।
Right Answer is:

SOLUTION

क.  गलत

ख. गलत

ग. गलत  

घ. सही


Q. 161082 1857 की क्रांति के लिए राजनैतिक एवं सैनिक कारणो की विवेचना कीजिए।
Right Answer is:

SOLUTION

1857 की क्रांति के लिए राजनैतिक कारण -

 

(1) अंग्रेजी की साम्राज्यवादी नीति से भारतीय शासक अप्रसन्न थे।

(2) देशी राजाओं के ऊपर अंगेजों के द्वारा अनेक प्रतिबन्ध लगाये जाने के कारण उनमें असंतोष था।

(3) सहायक संधि द्वारा देशी राजाओं को अंग्रेजों ने पंगु बना दिया था।

(4) अपहरण नीति द्वारा देशी राज्यों को छीनना।

(5) अंग्रेजों ने नाना साहब आदि भारतीय नरेशों की पेंशनें छीन ली थी जिससे वे अंग्रेजों से अप्रसन्न थे।

(6) उच्च वर्ग के लोगों के साथ अंग्रेजों का व्यवहार बड़ा अपमानजनक था जिससे वे अंग्रेजों के विरूद्ध हो गये।

सैनिक कारण -

(1) भारतीय एवं यूरोपियन सैनिकों में पद, वेतन, पदोन्नति आदि को लेकर भेदभाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों के साथ बुरा व्यवहार किया जाता था और उन्हें कम महत्व दिया जाता था।

(2) उन पर कई प्रकार के प्रतिबंध थे, जैसे वे तिलक, चोटी, पगड़ी या दाढ़ी आदि नहीं रख सकते थे। सामूहिक रसोई घर से भी उच्च् वर्ग के (ब्राह्मण और ठाकुर) लोग निम्न वर्ग के लोगों से प्रसन्न थे।

(3) तात्कालिक कारण कारतूसों में लगी सूअर और गाय की चर्बी (चिकना पदार्थ) थी। नयी एनफील्ड बन्दूकों में गोली भरने से पूर्व कारतूस को दाँत से छीलना पड़ता था। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही गाय और सूअर की चर्बी से अपने-अपने धर्म पर आघात समझते थे। अतः उनका भड़कना स्वाभाविक था।


Q. 161083 1857 के विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों द्वारा तत्काल क्या कदम उठाए गए थे?
Right Answer is:

SOLUTION

विद्रोह को कुचलना अंग्रेजों के लिए बहुत आसान साबित नहीं हुआ। मई और जून 1857 में पारित किए गए कई क़ानूनों के जरिए न केवल समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया बल्कि फौजी अफसरों और यहाँ तक कि आम अंग्रेजों को भी ऐसे हिंदुस्तानियों पर मुकदमा चलाने और उनको सजा देने का अधिकार दे दिया गया जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था।


Q. 161084 जोज़फ नोएल पेटन द्वारा बनाई गई पेंटिंग ‘इन मेमोरियम’ क्या वर्णन करती है?
Right Answer is:

SOLUTION

“इन मेमोरियम” में भीषण हिंसा नहीं दिखती: यह उसकी तरफ सिर्फ एक इशारा है। यह दर्शक की कल्पना को झिंझोड़ती है और उसमें गुस्से और बेचेनी का भाव पैदा करती है। इसमें विद्रोहियों को हिंसक और बर्बर बताया गया है हलांकि वे चित्र में अदृश्य हैं। पृष्ठभूमि में आप ब्रिटिश टुकडि़यों को रक्षक के तौर पर आगे बढ़ते देख सकते हैं।


Q. 161085 1857 की क्रांति ने राष्ट्रीय एकता को किस प्रकार पुष्ट किया?
Right Answer is:

SOLUTION

“1857 को विद्रोह से अधिक भाग्यशाली घटना अन्य कोई नहीं घटी । इसने भारतीय गगन मण्डल को अनेक शंकाओं से मुक्त कर दिया । “असफल होकर भी इस स्वतंत्रता संघर्ष ने भावी स्वतंत्रता संघर्ष के लिए पे्ररणादायक वातावरण तैयार किया । विशेषकर क्रांतिकारी तो इसे अपना प्रकाश स्तंभ मानते थे । दिल्ली चलों का नारा अनवरत रूप से 1947 ई. तक चलता रहा । इस आंदोलन में हिंदुओं व मुसलमानों ने समान रूप से भाग लिया व दोनों ही जातियों के नेताओं ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया व कन्धे से कन्धा मिलाकर युद्ध किया ।


Q. 161086 अवध पर अपना कब्जा करने में अंग्रेजों की दिलचस्पी क्यों थी?
Right Answer is:

SOLUTION

अवध पर कब्जे में अंग्रेजों की दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। उन्हें लगता था कि वहाँ की जमीन और मिट्टी नील और कपास की खेती के लिए उपयुक्त है और इस इलाके को उत्तरी भारत के एक बड़े बाजार के रूप में विकसित किया जा सकता है।


Q. 161087 लार्ड डलहौजी की विलय नीति ने किस प्रकार भारतीय रियासतों को अपने अधिकार में लिया ?
Right Answer is:

SOLUTION

लार्ड  डलहौजी ने भारतीय देश राज्य को ब्रिटिश राज्य में मिलाने के लिए एक विलय नीति अपनाई थी इससे सभी देशी राज्य आतंकित हो गये इन देशी राज्य का अस्तित्व संकट में पड़ गया अंग्रेजी शासन एक पक्षीय निर्णय लेता था उसने इस नीति से सतारा, झाँसी, नागपुर और दुसरे राज्य अपने कब्जे में ले लिए थे । डलहौजी ने पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्र नाना साहब की वार्षिक पेंशन भी बंद कर दी थी।


Q. 161088 ब्रिटिश सेना में रायफलों में कारतूसों के प्रयोग से भारतीय सिपाहियों में रोष क्यों व्याप्त हुआ?
Right Answer is:

SOLUTION

अंग्रेजों ने नई रायफलों का प्रयोग किया । इससे सेना में अफवाह फ़ैल गयी कि इसमें गाय और सूअर कि चर्बी लगी कारतूसों का प्रयोग होता है । बंदूकों में कारतूसों को दाँत से खींचना पड़ता था । हिन्दुओं में गाय की पूजी जाती है और मुसलमानों में सूअर को अशुद्ध माना जाता है । अतः सेना में रोष व्याप्त हो गया इससे दोनों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का षड्यंत्र समझा यह बात बहुत तेजी से फ़ैल गयी और देश स्वतंत्रता संघर्ष के रस्ते पर चले गये


Q. 161089 दिल्ली की घटना से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर क्या प्रभाव पड़ा था?
Right Answer is:

SOLUTION

मेरठ वासियों ने जेल में धावा बोलकर उन्हें छुड़ा लिया और कई अंग्रेज अधिकारीयों को मार डाला।  इसके बाद उन्होंने दिल्ली की और कूच किया। ये क्रन्तिकारी एक साथ मिलकर लाल किले पहुंचे । वहाँ बहादुरशाह  द्वितीय को भारत का शासक घोषित किया गया परन्तु चार महीने के बाद अंग्रेजों ने पुनः दिल्ली पर अधिकार कर लिया। बहादुरशाह  द्वितीय को रंगून भेज दिया गया।  वहाँ पर 1862 ई० में उनकी मृत्यु हो गयी यह घटना मध्य भारत तथा रूहेलखण्ड  में आग की तरह फ़ैल गयी।  इसके कारण बरेली, कानपुर, लखनऊ, वाराणसी तथा झाँसी के सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध हधियर उठा लिये।


Q. 161090 नाना साहब को किस घटना के पश्चात् नेपाल भेजा गया ?
Right Answer is:

SOLUTION

नाना साहब कानपुर में पेशवा घोषित हुए नाना साहब ने अंग्रेजों की सारी फैज को कानपुर से खदेड़ दिया । नाना साहब ने आत्म समर्पण करने वाले सिपाहियों को छोड़ दिया।  इन सिपाहियों को नाव द्वारा भेजा जा रहा था । इन्हें नाना साहब सुरक्षित इलाहबाद भेज रहे थे । जब ये सिपाही नाव में बैठे उसी समय नाना साहब के आदमियों ने उन सिपाहियों की हत्या कर दी और महिलायाओ और बच्चों को छोड़ दिया । इस घटना से क्रोधित होकर जनरल हैवलॉक ने कानपुर पर कब्ज़ा कर अधिकार  कर लिया और भविष्य  में ऐसी घटना न हो इसलिए  नाना साहब को नेपाल भेज दिया।


Q. 161091
1857 ई की क्रांति के स्वरूप की समीक्षा कीजिए ।
Right Answer is:

SOLUTION

1857 ई. में हुआ विद्रोह चर्बी युक्त कारतूसों के प्रयोग न करने की घटना से प्रारंभ होकर उत्तर भारत के विभिन्न भागों में फैल गया जिसमें सैनिकों व गैर सैेनिकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया । इस व्यापक संघर्ष का स्वरूप क्या था इस प्रश्न पर इतिहासकारों ने भिन्न-भिन्न मत प्रकट किए । प्रमुख मत इस प्रकार हैं - 1) सैनिक विद्रोह लाॅरेन्स व सीले के अनुसार यह मात्र सैनिक विद्रोह था जो केवल सेना तक सीमित था इसे जनसाधारण का कोई समर्थन प्राप्त नहीं था । पर इस मत को स्वीकार इसलिए नहीं किया जा सकता कि अनेक सैनिक अंग्रेजों के पक्ष में थे सभी सैनिकों ने विद्रोह नहीं किया था । 2) बर्बरता व सभ्यता के मध्य संघर्ष - यह मत टी.आर.होम्ज ने दिया था पर इस मत को इसलिए नहीं स्वीकार किया जा सकता कि इस संघर्ष को दबाने में जितने अत्याचार अंग्रेजों ने किये वह सभ्यता पर कलंक था । 3) श्वेत-अश्वेत लोगों के मध्य संघर्ष - इस मत को इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि प्रत्येक अंग्रेजी शिविर में एक अंग्रेज के साथ 20 काले अश्वेत लोग थे । 4) मुस्लिम षडयंत्र - सर जाॅन आउट्रम के मतानुसार यह भारतीय मुसलमानों द्वारा अंग्रेजों के विरूद्ध किया गया षडयंत्र था जो अंगेजी सत्ता का उन्मूलन कर पुनः मुगल साम्राज्य की स्थापना करना चाहते थे पर इस मत को इसलिए खारिज किया जा सकता है कि संघर्ष में हिन्दुओं ने अधिक संख्या में भाग लिया था व क्रांति के अधिकतर संचालक भी हिन्दू थे । 5) प्रथम स्वतंत्रता संग्राम राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में - अनेक भारतीय इतिहासकारों ने इसे ’महान् विद्रोह’, ’स्वतंत्रता संग्राम’ या राष्ट्रीय संग्राम कहा हैं। अशोक मेहता इसे महान् विद्रोह कहते हुए हिन्दू-मुसलमानों की समान भागीदारी को व्यक्त करते हैं । दोनो जातियों के नेतृत्व कत्र्ताओं का उल्लेख करते हुए वह इसे स्वतंत्रता संग्राम सिद्ध करते हैं । अधिकांश भारतीयों की हार्दिक सहानुभूति विद्रोहियों के पक्ष में थी । एस.एन. सेन एवं आर.सी.मजूमदार इसे राष्ट्रीय संग्राम स्वीकार नहीं करते । उनके अनुसार यह युद्ध न तो राष्ट्रीय था न ही प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष क्यांेकि उस समय तक राष्ट्रीयता की भावना ही नहीं थी । फिर भी सेन ने मजूमदार के मत से सहमत होते हुए कहा कि “यह विद्रोह राष्ट्रीयता के अभाव में भी स्वतंत्रता संघर्ष था । इसमें विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया गया । इस कारण इसे स्वतंत्रता संघर्ष कहना उचित होगा।“ स्वयं इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध नेता डिजरैली ने भी इसकी व्यापकता व उद्धेश्य को देखते हुऐ इसे राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में स्वीकार किया था । इन विभिन्न मतों के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि 1857 का संघर्ष सही मायनों ने भारत का स्वतंत्रता संघर्ष था । यद्यपि इसका स्वरूप राष्ट्रीय नहीं था तथापि लक्ष्य एक ही था।


Q. 161092 मौलवी अहमदुल्ला शाह पर एक टिप्पणी लिखिए।
Right Answer is:

SOLUTION

मौलवी अहमदुल्ला शाह 1857 के विद्रोह में अहम भूमिका निभाने वाले बहुत सारे मौलवियों मे से एक थे। हैदराबाद में शिक्षित शाह काफी कम उम्र में ही उपदेशक बन गए थे। 1856 में उन्हें अंग्रेजों के खि़लाफ जिहाद का प्रचार करते और लोगों को विद्रोह के लिए तैयार करते हुए गाँव-गाँव जाते देखा गया था। वे एक पालकी में बैठकर चलते थे। पालकी के आगे-आगे ढोल और पीछे उनके समर्थक होते थे, इसीलिए उन्हें लोग-बाग डंका शाह कहने लगे थे। ब्रिटिश अफसर इस बात से परेशान थे कि मौलवी के साथ हजारों लोग जुट रहे थे और बहुत सारे मुसलमान उन्हें पैगम्बर मानने लगे थे और समझते थे कि वह इस्लाम के आदर्शों से ओतप्रोत हैं। जब 1856 में वे लखनउ पहुँचे तो पुलिस ने उन्हें शहर में उपदेश देने से रोक दिया। 1857 में उन्हें फैज़ाबाद जेल में बंद कर दिया गया। रिहा होने पर उन्हें 22वीं नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोहियों ने अपना नेता चुन लिया। उन्होंने चिनहाट के विख्यात संघर्ष में हिस्सा लिया जिसमें हेनरी लॉरेंस की अगुवाई वाली टुकडि़यों को मुँह की खानी पड़ी। मौलवी साहब को उनकी बहादुरी और ताकत के लिए जाना जाता था।


Q. 161093
1857 ई0 की क्रांति में शाहमल के कार्यों का मूल्यांकन कीजिए ।
Right Answer is:

SOLUTION

शाहमल उ0प्र0 के बड़ौत परगने के एक बड़े गाँव के रहने वाले थे। 1857 की क्रांति के दौरान शाहमल ने चैरासी देश के मुखियाओं व काश्तकारों को संगठित किया। इसके लिए उन्होंने रात के साये में गाँव-गाँव जाकर बात की व उस क्षेत्र के जाट व गुर्जरों को एक साथ लेकर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के लिए तैयार किया। अंग्रेजों व साहूकारों के उत्पीड़न व अन्याय के खिलाफ संगठित होकर किसानों ने महाजनों व व्यापारियों के घर-बार लूटे। सरकारी इमारतों पर हमला किया, नदी पर बनाये पुलों व सड़कों को ध्वस्त कर दिया जिससे सरकारी फौजों का रास्ता रोका जा सके। दिल्ली में विद्रोही सिपाहियों को रसद पहुंचाई व ब्रिटिश हेडक्वार्टर व मेरठ के मध्य समस्त संचार तंत्र को नष्ट कर दिया। सिंचाई विभाग के अंग्रेज अफसर के बंगले को छीन उसे न्याय भवन नाम दिया व उसे अपना मुख्यालय बनाया। गुप्तचरी का सशक्त नेटवर्क कायम किया व लोगों को एक बार यह महसूस करा दिया कि अंग्रेजी राज्य का अंत हो चुका है। जुलाई 1857 में उन्हें ब्रिटिश सरकार ने क्रूरता पूर्वक मार डाला। इस प्रकार शाहमल की भूमिका 1857 की क्रांति में अतुलनीय है।


Q. 161094 अवध के विलय का संक्षेप में वर्णन कीजिए ?
Right Answer is:

SOLUTION

1801 से अवध में सहायक संधि थोप दी गई थी। इस संधि में शर्त थी कि नवाब अपनी सेना ख़त्म कर दे, रियासत में अंग्रेज टुकडि़यों की तैनाती की इजाजत दे और दरबार में मौजूद ब्रिटिश रेजीडेंट की सलाह पर काम करे। अपनी सैनिक ताकत से वंचित हो जाने के बाद नवाब अपनी रियासत में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिनोदिन अंग्रेजों पर निर्भर होता जा रहा था। अब विद्रोही मुखियाओं और ताल्लुकदारों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था। अंततः कुशासन के आरोप में 1856 में अवध का विलय कर लिया गया।


Q. 161095 1857 ई० की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के राजनीतिक कारणों का उल्लेख कीजिये ।
Right Answer is:

SOLUTION

अंग्रेजों ने 150 वर्षों में भारत की सभी संस्थाओं पर राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक न्यायिक दखल दिया इससे भारत में प्रभुत्व वर्ग वालों को सीधे ठेस पँहुची और शासक एवं जनता के बीच शक संशय का माहौल बन गया
1. इसमें 1857 ई० की क्रांति के राजनैतिक कारण निम्न प्रकार है :- 
2. इस समय भारत की राजनीतिक सत्ता वास्तविक रूप में अंग्रेजों के हाथों में थी फिर भी शासन दिल्ली के मुग़ल बादशाह के नाम पर ही चलता था देश में इस नामधारी मुग़ल सम्राट के लिए सम्मान था वह देश की एकता का प्रतिक था अंग्रेजों ने तत्कालीन मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र के साथ अपमानजनक व्यहार किया 1835 ई० में कम्पनी के सिक्कों से मुग़ल सम्राट का नाम हटा दिया।  
3. अंग्रेजों ने बहादुरशाह की मृत्यु का बाद लाल किले को खाली करा मुग़ल सम्राट का पद समाप्त की घोषणा की इससे बहादुरशाह  अंग्रेजों के शत्रु हो गये । 
4. लार्ड डलहौजी की विलय नीति के कारण सतारा, झाँसी, नागपुर और दूसरे राज्य अंग्रेजों के कब्जे में गये थे डलहौजी ने पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्र नाना साहब की वार्षिक पेंशन भी बन्द कर दी थी जिससे नाना साहब तथा अन्य राज्य अंग्रेजों के कट्टर शत्रु हो गये । 
5. अंग्रेजों द्वारा जमींदारों तथा तालुकेदारों को भूमि का मालिक बनाया गया उन्होंने मनमाने लगान वसूलने की छूट दी गयी जिसके कारण किसानों में असंतोष था । 
6. ब्रिटिश न्याय प्रणाली भारतीय कानून की अनदेखी की यह प्रणाली भारतीयों के लिए बड़ी खर्चीली, पेचीदी और लम्बी प्रक्रिया थी । 
7. इसके आलावा भारतीय शासन में ऊँचे पद प्राप्त नहीं हो सकते थे जिससे भारतीयों के बीच अविश्वास असंतोष बढ़ता गया


Q. 161096 1857 ई० की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय किसानों और शिल्पकारों पर क्या आर्थिक प्रभाव पड़ा था ।
Right Answer is:

SOLUTION

अंग्रेजों ने 150 वर्षों में भारत की सभी संस्थाओं पर राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक न्यायिक दखल दिया इससे भारत में प्रभुत्व वर्ग वालों को सीधे ठेस पँहुची और शासक एवं जनता के बीच शक संशय का माहौल बन गया

सन 1857 ई० की क्रांति के निम्नलिखित कारण थे - ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्ति भारतीय उपनिवेशों की अर्थव्यवस्था को अपनी अर्थव्यवस्था का पूरक बना रही थी भारतीय उपनिवेश से इंग्लैंड अपनी आवश्यकतानुसार कच्चा माल ले जाते थे

अंग्रेज हमारे देश से कच्चे माल को सस्ते दामों पर ले जाते थे और मशीनों से तैयार माल को भारत में लाकर ऊँचे दामों पर बेचते थे

अंग्रेजों के ऊँची दरों पर करों के कारण भारतीय वस्त्र उद्योग निर्यात बहुत प्रभावित हुआ

भारतीय शिल्प की दशा बिगडती गयी और शिल्पकार बेरोजगार होते चले गये

अंग्रेज शासकों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया इससे भारत के उद्योग की स्थिति शीघ्र क्षीण हो गयी

भारतीय कारीगरों की दशा ख़राब होती चली गयी

आकाल के कारण गरीबों, किसानो की स्थिति बिगड़ रही थी लगान वसूलने के कारण किसान क्षुब्ध थे 

ब्रिटिश सरकार ने सेना से सैनिकों को हटाकर कोई अन्य रोज्जर नहीं दिया 

शिक्षित भारतीयों को उच्च पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता था उन्हें अंग्रेज कर्मचारियों की  तुलना में भारतीय कर्मचारियों को कम  वेतन दिया जाता था


Q. 161097 निम्नलिखित को सुमेलित कीजिये ।
क. कम्पनी के सिक्कों से मुग़ल सम्राट का नाम हटा 1757 ई० में
ख. प्लासी का युद्ध 1835 ई० में
ग. विलय नीति लार्ड डलहौजी
घ. सहायक नीति बहादुरशाह जफ़र
ड़. अंतिम मुग़ल बादशाह लार्ड वेलेजली
च. अंतिम अंग्रेजों का गवर्नर लार्ड कैनिंग
Right Answer is:

SOLUTION

 

क.

कम्पनी के सिक्कों से मुग़ल सम्राट का नाम हटा

1835

ख.

प्लासी का युद्ध

1757

ग.

विलय नीति

लार्ड डलहौजी

घ.

सहायक नीति

लार्ड वेलेजली

ड़.

अंतिम मुग़ल बादशाह

बहादुरशाह जफ़र

च.

अंतिम अंग्रेजों का गवर्नर

लार्ड कैनिंग


Q. 161098 निम्न लिखित में रिक्त स्थानों की पूर्ती कीजिये -
क. सन्यासियों एवं ................फकीरों द्वारा धार्मिक पुनरुत्थान के लिए बंगाल विद्रोह हुआ ।
ख. ऊँची दरों पर ................करों के कारण भारतीय वस्त्र उद्योग निर्यात बहुत प्रभावित हुआ।
ग. 1835 ई० में कंपनी के सिक्कों से ................मुग़ल सम्राट का नाम हटा दिया।
घ. डलहौजी ने नाना साहब की वार्षिक पेंशन बन्द कर दी ।
ड़. लार्ड कैनिंग भारत में अंग्रेजों का अंतिम गवर्नर था।
च................. ब्रिटिश न्याय प्रणाली भारत कानून की अनदेखी करता था।
Right Answer is:

SOLUTION

क. फकीरों
ख. करों
ग. मुग़ल सम्राट
घ. नाना साहब
ड़. अंतिम गवर्नर
च. न्याय प्रणाली


Q. 161099 1857 ई० की क्रांति के क्या परिणाम हुए ।
Right Answer is:

SOLUTION

1857 ई० का प्रथम स्वतंत्रता भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी।  इसने एक युग का अंत कर दिया और एक नवीन युग की शुरआत  हुई  परदेशिक विस्तार के स्थान पर आर्थिक शोषण का युग प्रारंभ हुआ । अंग्रेजों के लिए सामंतवादी युग का भय हमेशा के लिए समाप्त को गया।

इस क्रांति में भारतीयों को सफलता तो नहीं प्राप्त हुई लेकिन भारत से कंपनी का शासन समाप्त हो गया और ब्रिटिश सरकार का भारत पर प्रत्यक्ष शासन स्थापित हो गया।  इससे अंग्रेजों के अत्याचारों में कमी हो गयी तथा भारतीयों को और अनेक लाभ हुए।  सबसे प्रमुख लाभ इस क्रांति में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत हो गयी

इसने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य को जड़ से हिला दिया था।  दोबारा 1857 जैसी घटना हो तथा ब्रिटिश शासन को व्यवस्थित और सुदृढ़ करने के लिए महारानी विक्टोरिया ने 1858 ई० में अपने घोषणा पत्र में कुछ महत्वपूर्ण नीतियों का उल्लेख किया । इस घोषणा से दोहरा नियंत्रण समाप्त हो गया  और ब्रिटिश सरकार सीधे तौर पर भारतीय मामलों के लिए उत्तरदायी हो गयी  इस क्रांति ने भारतियों ने राष्ट्रीय भावना का संचार किया और उन्हें अपनी मातृभूमि को विदेशी शासकों से मुक्त दिलाने के लिए प्रेरित किया


Q. 161100 1857 ई० की क्रांति की असफलता के कारणों की विवेचना कीजिये ।
Right Answer is:

SOLUTION

1857 ई० की क्रांति की  में भारतीय क्रांतिकारियों ने बड़ी वीरता से लड़ाई छेदी थी परन्तु फिर भी उन्हें आशातीत सफलता प्राप्त नहीं हुई इसके मुख्य कारण थे  :- इस संग्राम में असफलता का  कारण भारतीय क्रांतिकारियों में राष्ट्रीयता का आभाव था 

कुछ प्रान्तों के शासकों ने अपने राज्य की सुरक्षा के लिए अंग्रेजों का साथ दिया   रियासतों के राजाओं के असहयोग एक मुख्य कारण था    

यदि इंदौर, ग्वालियर और हैदराबाद के नरेश क्रांतिकारियों का साथ देते तो शायद स्थिति में कुछ और परिवर्तन होता

क्रांतिकारियों के प्रारंभ और प्रगति दोनों में संगठित योजना एवं तालमेल का आभाव था स्वतंत्रता संग्राम के सैनिकों की अपेक्षा अंग्रेजों की सेना संगठित थी इस क्रांति में योग्य और कुशल नेतृत्व का पूर्णतः आभाव था क्रांति के नेता अपने अपने ढंग से क्रांति का संचालन  कर रहे थे

इस स्वतंत्रता संग्राम में क्रांति केवल उत्तर भारत में ही केन्द्रित थी  दूसरे राज्य सिंध, पंजाब, राजपूताना, कश्मीर तथा अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों ने इस में हिस्सा नहीं लिया था

अंग्रेजों के पास अच्छे किस्म के हथियार थे एवं वे प्रशिक्षित सैनिक भी थे

अंग्रेजी सेना ने नयी रायफल का प्रयोग बड़े अच्छे ढंग से किया था भारतीय सैनिकों के पास गोला-बारूद की कमी थी

अंग्रेजों ने डाक-तार व्यवस्था का भी पूर्ण सहयोग प्राप्त किया क्रांतिकारियों ने निर्धारित तिथि 31 मई 1857 से पहले ही क्रांति प्रारंभ की जिससे पूरा देश एक साथ संगठित नहीं हो पाया था


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