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sक. |
बिहार |
मंगल पाण्डे |
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ख. |
मध्य प्रदेश |
लक्ष्मी बाई |
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ग. |
लखनऊ |
बहादुर शाह जफ़र |
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घ. |
दिल्ली |
बेगम हजरत महल |
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ड़. |
झाँसी |
अवन्ती बाई |
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च. |
मेरठ |
कुँवर सिंह |
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कुँवर सिंह |
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अवन्ती बाई |
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लखनऊ |
बेगम हजरत महल |
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दिल्ली |
बहादुर शाह जफ़र |
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झाँसी |
लक्ष्मी बाई |
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च. |
मेरठ |
मंगल पाण्डे |
क. बैरकपुर
ख. कमल के फूल
ग. 1862
घ. अवन्ती
ड़. राष्ट्रीय भावना
च. चर्बीयुक्त
1857 ई. के विद्रोह के निम्नलिखित कारण थे -
1. राजनीतिक कारण -(i) लार्ड वेलेजली तथा डलहौजी की विस्तारवादी नीतियों से भारतीय जनता समझ चुकी थी कि अंग्रेजों के इरादे भारत के प्रति अच्छे नहीं हैं। भारतीय शासकों में से झाँसी की रानी, नाना साहिब, अवध का नवाब, मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय आदि अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति के शिकार हुए थे।
(ii) अवध को हड़पने और मुगल सम्राट को अंग्रेजों द्वारा लाल किला छोड़ने के लिए कहने पर मुसलमान रूष्ट हो गये।
(iii) उधर हिंदू नरेशों की पेंशने बंद करने और उनके राज्यों को हड़पने के कारण हिंदू भी रूष्ट हो गए थे।
(iv) देशी राज्यों के अंग्रेजी राज्य में विलय के कारण उनकी सेना को भंग कर दिया गया। 1856 ई. में अवध में विलीनीकरण के कारण 60,000 सैनिकों को नौकरी से हटा दिया गया। अतः ऐसी स्थिति में बेकार लोग व शासक विद्रोह फैलाने और लोगों को भड़काने में भरपूर सहायता कर रहे थे।
(v) कई संतानहीन राजाओं से गोद लेने का अधिकार छीन लिया गया तथा उनके राज्यों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया गया।
2. आर्थिक कारण - (i) अंग्रेजों का भारत में व्यापार फैलता जा रहा था, परन्तु इसके विपरीत भारतीय उद्योग-धंधे और व्यापार पतन के गर्त में पहुँचते गए।
(ii) बंगाल और दक्षिण भारत के जागीरदारों की जागीरें छीन ली गई। उपहार भूमि पर भी कर लगा दिया गया। अतः लोग क्रोध से भरे बैठे थे।
(iii) शिक्षित भारतीयों के साथ भेदभाव की नीति के कारण उन्हें उच्च पदों से दूर रखा जाता था। इससे उन्हें भारी हानि उठानी पड़ती थी। साथ ही उनके आत्मसम्मान को भी ठेस लगती थी।
(iv) भारत का धन और साधन (कच्चा माल) इंग्लैण्ड के उद्योगों मे खप जाता था। भारत के साधनों का हर तरह से शोषण होने लगा था। अतः भारतीय उद्योग ठप्प हो गये। लोग कृषि पर बोझ बनने लगे।
3. सामाजिक और धार्मिक कारण - (i) बाल विवाह पर रोक, सती प्रथा तथा पर्दा प्रथा पर रोक, विधवा पुनर्विवाह आदि कुछ ऐसे सामाजिक प्रश्न थे, जिनको लेकर कट्टरपंथी हिन्दू अंग्रेजों के शत्रु बन बैठे। उन्हें ऐसा लगा मानो अंग्रेज उनकी धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं पर प्रहार कर रहे थे।
(ii) पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार के कारण ब्राह्मणों तथा मुल्ला-मौलवियों के पठन-
पाठन पर बुरा प्रभाव पड़ा। अब उनकी पाठशालाओं और मदरसों में कोई भूला-
भटका ही जाता था। अतः उन्हें भी अंग्रेज शत्रु दिखाई देते थे।
(iii) ईसाई मिशनरियों ने धर्म प्रचार और तरह-तरह के लालच देकर धर्म
परिवर्तन कराने के कारण तथा डलहौजी द्वारा पारित कानून के कारण, जिनके अनुसार धर्म परिवर्तन करने पर ही उस व्यक्ति को पैतृक सम्पत्ति में बराबर हिस्सा मिलेगा, यह धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने का खुला संकेत था। इससे हिन्दू समाज में खलबली मच गई। वे अंग्रेजों को अपना कट्टर शत्रु समझने लगे। उन्हें प्रतीत होने लगा कि उनको ईसाई बनाने का षड्यंत्र अब सफल होने वाला है।
4. सैनिक कारण -
(i) भारती एवं यूरोपियन सैनिकों में पद, वेतन, पदोन्नति आदि को लेकर भेदभाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों के साथ बुरा व्यवहार किया जाता था और उन्हें कम महत्त्व दिया जाता था।
(ii) उन पर कई प्रकार के प्रतिबंध थे, जैसे वे तिलक, चोटी, पगड़ी या दाढ़ी आदि नहीं रख सकते थें सामूहिक रसोई<
1857 के विद्रोह की प्रकृतिः विद्रोह की प्रकृति के बारे में अलग-अलग विचार व्यक्त किए गए हैं जिन्हें दो खंडों में विभाजित किया जा सकता है। पहली विचारधारा का यह मानना है कि यह मुख्यतः सिपाहियों का आंदोलन था जबकि दूसरी विचारधारा यह मानती है कि वह विद्रोह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था।
ब्रिटिश इतिहासकार इस बात पर जोर डालते हैं कि यह विद्रोह सिर्फ सिपाहियों का आंदोलन था और इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। उनका कहना है कि सेना का मुख्य स्तंभ सिख थे जो सरकार के प्रति वफादार थे और देशी राज्य इस समय निरपेक्ष भाव से खड़े थे। अंग्रेजों ने चर्बीयुक्त बारूदों तथा विद्रोही सिपाहियों पर ध्यान दिया था। गैर सैनिक लोगों के द्वारा भाग लिए जाने को बिल्कुल नकार दिया।
वी.डी. सावरकर इसे भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम मानते हैं किन्तु स्वाधीनता के लिए एक निश्चित योजना और संस्था की जरूरत होती है। जिस परिस्थिति में बहादुर शाह, नाना साहिब, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई तथा अन्य लोगों का सिपाहियों ने साथ दिया, उससे यह पता लगता है कि उनके पास न तो कोई योजना थी और न ही कोई ऐसी संस्था। इससे इस विचारधारा की कमी का पता चलता है।
जितनी जल्दी और अचानक यह सिपाही विद्रोह देश के कोने-कोने में फैला, उससे तो यही लगता है कि इसके बारे में उनकी कोई योजना पहले से ही बनी हुई थी। चपाती का बड़े स्तर पर वितरण इस बात के प्रमाण को प्रस्तुत करता है किंतु संदेहास्पद स्थिति में चपातियों का वितरण किया गया इसका जवाब नहीं दिया गया। ऐसी स्थिति में यह कहना गलत होगा कि विद्रोह सावधानीपूर्वक बनाई गयी योजना के तहत शुरू हुआ था।
1857 के विद्रोह को राष्ट्र का स्वतंत्रता संग्राम भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह मुख्यतः उत्तरी भारत में केंद्रित था। वर्तमान समय की राष्ट्रीयता वालों भावाना का विकास उस समय नहीं हुआ था। एक बहुत बड़ी संख्या वासतव में अंग्रेजों के साथ मिलकर विद्रोह को दबाने में सफल रही।
यह बात स्पष्ट है कि यह सिपाहियों का सिर्फ छोटा-सा आंदोलन नहीं था और यह राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम भी नहीं था। निः संदेह यह सिपाहियों का ऐसा विद्रोह था जिसमें भारत के लाखों लोगों ने भाग लिया। हमें बहुत से ऐसे साक्ष्य मिले हैं जिसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि यह एक बड़े स्तर पर होने वाली बगावत थी।
यह आंदोलन सभी जगह एक झंडे और एक संप्रभुता के लिए शुरू हुआ। इसे व्यापक जनाधार प्राप्त था। इसका प्रमुख प्रमाण इस समय हुई सांप्रदायिक सद्भावना के विकास से लगाया जा सकता है। जिसके तहत दोनों समुदाय एक दूसरे की सहायता करने के लिए तत्पर थे। यद्यपि विद्रोह का आधार धार्मिक था किंतु इसकी विषय वस्तु राजनैतिक थी। इसके नेता धार्मिक गुरू नहीं बल्कि समाज से आए सामान्य लोग थे।
यह क्रांति एक तरीके से पुराने और परंपरागत संबंधों को प्राप्त करने के लिए की गई थी। वास्तव में यह कहा जा सकता है कि प्रतिक्रियावादी तत्व, असंतुष्ट राजा तथा सामंतवादी शक्तियों ने इस आंदोलन का साथ दिया और इनके साथ जनमानस भी जुट गया क्योंकि


सहायक संधि: सहायक संधि लॉर्ड वेलेजली द्वारा 1798 में तैयार की गई एक व्यवस्था थी। अंग्रेजों के साथ यह संधि करने वालों को कुछ शर्तें माननी पड़ती थीं। मसलन:
(1) अंग्रेज अपने सहयोगी की बाहरी और आंतरिक चुनौतियों से रक्षा करेंगे।
(2) सहयोगी पक्ष के भूक्षेत्र में एक ब्रिटिश सैनिक टुकड़ी तैनात रहेगी।
(3) सहयोगी पक्ष को इस टुकड़ी के रख-रखाव की व्यवस्था करनी होगी। तथा
(4) सहयोगी पक्ष न तो किसी और शासक के साथ संधि कर सकेगा और न ही अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी युद्ध में हिस्सा लेगा।
(5) ब्रिटिश निवासी अधिकारी को हमेशा सहयोगी शासक के दरबार में ही रहना होगा।
शाह मल
शाह मल उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगना के एक बड़े गाँव के रहने वाले थे। वह एक जाट कुटुंब से संबंध रखते थे जो चौरासी देस (चौरासी गाँव) में फैला हुआ था। इस इलाके की जमीन सिंचाई की सुविधाओं से लैस और उपजाउफ थी। यहाँ की मिट्टी काली व नम थी। बहुत सारे ग्रामीण संपन्न थे और लोग ब्रिटिश भूराजस्व व्यवस्था को दमनकारी मानते थे: लगान की दर ज्यादा और वसूली सख़्त थी।
नतीजा यह था कि किसानों की जमीन बाहरी लोगों के हाथ में जा रही थी। इलाके में आने वाले व्यापारी और महाजन जमीन पर कब्जा करते जा रहे थे। शाह मल ने चौरासी देस के मुखियाओं और काश्तकारों को संगठित किया। इसके लिए उन्होंने रात के साए में गाँव-गाँव जाकर बात की और लोगों को अंग्रेजों के खि़लाफ विद्रोह के लिए तैयार किया। बहुत सारे दूसरे स्थानों की तरह यहाँ भी अंग्रेजों के खि़लाफ आंदोलन एक व्यापक विद्रोह में तब्दील हो गया। अब विरोध उत्पीड़न और अन्याय के तमाम चिन्हों के खि़लाफ होने लगा।किसान अपने खेत छोड़कर निकल पड़े और महाजनों व व्यापारियों के घर-बार लूटने लगे।
बेदख़ल भूस्वामियों ने छिन चुकी जमीनों पर दोबारा कब्जा कर लिया। शाह मल के आदमियों ने सरकारी इमारतों पर हमला किया, नदी का पुल ध्वस्त कर दिया और पक्की सड़कों को खोद डाला। इसकी एक वजह यह थी कि वे सरकारी फौजों का रास्ता रोकन चाहते थे। दूसरी वजह यह थी कि पुलों और सड़कों को ब्रिटिश शासन का प्रतीक माना जाता था। उन्होंने दिल्ली में विद्रोह करने वाले सिपाहियों को रसद पहुँचाई और ब्रिटिश हेडक्वार्टर व मेरठ के बीच तमाम सरकारी संचार बंद कर दिया। स्थानीय स्तर पर राजा कहलाने वाले शाह मल ने एक अंग्रेज अफसर के बंगले में डेरा डाला, उसे न्याय भवन का नाम दिया और वहीं से झगड़ों और विवादों का फैसला करने लगे। उन्होंने गुप्तचरी का भी हैरतअंगेज नेटवर्क स्थापित कर लिया था। कुछ समय के लिए लोगों को लगा कि फिरंगी राज ख़त्म हो चुका है और उनका राज आ गया है। जुलाई 1857 में शाह मल को युद्ध में मार दिया गया।
मौलवी अहमदुल्ला शाह-
मौलवी अहमदुल्ला शाह 1857 के विद्रोह में अहम भूमिका निभाने वाले बहुत सारे मौलवियों मे से एक थे। हैदराबाद में शिक्षित शाह काफी कम उम्र में ही उपदेशक बन गए थे। 1856 में उन्हें अंग्रेजों के खि़लाफ जिहाद का प्रचार करते और लोगों को विद्रोह के लिए तैयार करते हुए गाँव-गाँव जाते देखा गया था। वे एक पालकी में बैठकर चलते थे। पालकी के आगे-आगे ढोल और पीछे उनके समर्थक होते थे। इसीलिए उन्हें लोग-बाग डंका शाह कहने लगे थे। ब्रिटिश अफसर इस बात से परेशान थे कि मौलवी के साथ हजारों लोग जुट रहे थे और बहुत सारे मुसलमान उन्हें पैगम्बर मानने लगे थे और समझते थे कि वह इस्लाम के आदर्शों से ओतप्रोत हैं। जब 1856 में वे लखनउ पहुँचे तो पुलिस ने उन्हें शहर में उपदेश देने से रोक दिया। 1857 में उन्हें फैज़ाबाद जेल में बंद कर दिया गया। रिहा होने पर उन्हें 22वीं नेटिव इन्पेंफट्री के विद्रोहियों ने अपना नेता चुन लिया। उन्होंने चिनहाट के विख्यात संघर्ष में हिस्सा लिया जिसमें हेनरी लॉरेंस की अगुवाई वाली टुकडि़यों को मुँह की खानी पड़ी। मौलवी साहब को उनकी बहादुरी और ताकत के लिए जाना जाता था। बहुत सारे लोग मानते थे कि उनको कोई नहीं हरा सकता, उनके पास जादुई शक्तियाँ हैं और अंग्रेज उनका बाल भी बाँका नहीं कर सकते। काफी हद तक इसी विश्वास के कारण उन्हें लोगों में इतना अधिकार प्राप्त था।
10 मई 1857 की दोपहर बाद मेरठ छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। हलचल की शुरुआत भारतीय सैनिकों से बनी पैदल सेना से हुई थी जो जल्द ही घुड़सवार फौज और फिर शहर तक फैल गई। शहर और आसपास के देहात के लोग सिपाहियों के साथ जुड़ गए। सिपाहियों ने शस्त्रागार पर कब्जा कर लिया जहाँ हथियार और गोला-बारूद रखे हुए थे। इसके बाद उन्होंने गोरों पर निशाना साधा और उनके बंगलों, साजो-सामान को तहस-नहस करना और जलाना-फूँकना शुरू कर दिया। रिकॉर्ड दफ्तर, जेल, अदालत, डाकखाने, सरकारी खजाने, जैसी सरकारी इमारतों को लूटकर तबाह किया जाने लगा। शहर को दिल्ली से जोड़ने वाली टेलीग्राफ लाइन काट दी गई। अँधेरा पसरते ही सिपाहियों का एक जत्था घोड़ों पर सवार होकर दिल्ली की तरफ चल पड़ा।
यह जत्था 11 मई को तड़के लाल किले के फाटक पर पहुँचा। रमजान का महीना था। मुगल सम्राट बहादुर शाह नमाज पढ़कर और सहरी (रोज़े के दिनों में सूरज उगने से पहले का भोजन) खाकर उठे थे। उन्हें फाटक पर हो-हल्ला सुनाई दिया। बाहर खड़े सिपाहियों ने जानकारी दी कि हम मेरठ के सभी अंग्रेज पुरुषों को मारकर आए हैं क्योंकि वे हमें गाय और सुअर की चर्बी में लिपटे कारतूस दाँतों से खींचने के लिए मजबूर कर रहे थे। इससे हिंदू और मुसलमान, सबका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। तब तक सिपाहियों का एक और जत्था दिल्ली में दाखिल हो चुका था और शहर के आम लोग उनके साथ जुड़ने लगे थे। बहुत सारे यूरोपियन लोग मारे गए, दिल्ली के अमीर लोगों पर हमले हुए और लूटपाट हुई। दिल्ली अंग्रेजों के नियंत्रण से बाहर जा चुकी थी। कुछ सिपाही लाल किले में दाखिल होने के लिए दरबार के शिष्टाचार का पालन किए बिना बेधड़क किले में घुस गए थे। उनकी माँग थी कि बादशाह उन्हें अपना आशीर्वाद दें। सिपाहियों से घिरे बहादुर शाह के पास उनकी बात मानने के अलावा और कोई चारा न था। इस तरह इस विद्रोह ने एक वैधता हासिल कर ली क्योंकि अब उसे मुगल बादशाह के नाम पर चलाया जा सकता था।
अफवाहों का प्रभाव-
इतिहास में अफवाहों और भविष्यवाणियों की ताकत को सिर्फ इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि वे वाकई में सच थीं या नहीं। हमें देखना यह चाहिए कि जो उन पर यकीन कर रहे थे उनकी मानसिकता के बारे में इनसे क्या पता चलता है, ये अफवाहें और भविष्यवाणियाँ उनके भय, उनकी आशंकाओं, उनके विश्वासों और प्रतिबद्धताओं के बारे में क्या बताती हैं। अफवाह तभी फैलती है जब उसमें लोगों के ज़हन में गहरे दबे डर और संदेह की अनुगूँज सुनाई देती है। अगर 1857 की इन अफवाहों को 1820 के दशक से अंग्रेजों द्वारा अपनाई जा रही नीतियों के संदर्भ में देखा जाए तो उनका मतलब ज्यादा आसानी से समझा जा सकता है। जैसा कि आपको मालूम होगा, गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक के नेतृत्व में उसी समय से ब्रिटिश सरकार पश्चिमी शिक्षा, पश्चिमी विचारों और पश्चिमी संस्थानों के जरिए भारतीय समाज को सुधारने के लिए खास तरह की नीतियाँ लागू कर रही थी। भारतीय समाज के कुछ तबकों की सहायता से उन्होंने अंग्रेजी माध्यम के स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्थापित किए थे जिनमें पश्चिमी विज्ञान और उदार कलाओं के बारे में पढ़ाया जाता था। अंग्रेजों ने सती प्रथा को ख़त्म करने (1829) और हिंदू विधवा विवाह को वैधता देने के लिए व कानून बनाए थे। शासकीय दुर्बलता और दत्तकता को अवैध घोषित कर देने जैसे बहानों के जरिए अंग्रेजों ने न केवल अवध बल्कि झाँसी और सतारा जैसी बहुत सारी दूसरी रियासतों को भी कब्जे में ले लिया था। जैसे ही ऐसी कोई रियासत या इलाका उनके व कब्जे में आता था, वहाँ अंग्रेज अपने ढंग की शासन व्यवस्था, अपने व कानून, भूमि विवादों के निपटारे की अपनी पद्धति और भूराजस्व वसूली की अपनी व्यवस्था लागू कर देते थे। उत्तर भारत के लोगों पर इन सब कार्रवाइयों का गहरा असर हुआ।लोगों को लगता था कि वे अब तक जिन चीजों की कद्र करते थे, जिनको पवित्र मानते थे-चाहे राजे-रजवाड़े हों, सामाजिक-धार्मिक रीति-रिवाज हों या भूस्वामित्व, लगान अदायगी की प्रणाली हो - उन सबको ख़त्म करके एक ऐसी व्यवस्था लागू की जा रही थी जो ज्यादा हृदयहीन, परायी और दमनकारी थी।इस सोच को ईसाई प्रचारकों की गतिविधियों से भी बल मिल रहा था। ऐसे अनिश्चित हालात में अफवाहें रातोंरात फैलने लगती थीं।
तरह-तरह की अफवाहों और भविष्यवाणियों के जरिए लोगों को उठ खड़ा होने के लिए उकसाया जा रहा था। मेरठ से दिल्ली आने वाले सिपाहियों ने बहादुर शाह को उन कारतूसों के बारे में बताया था जिन पर गाय और सुअर की चर्बी का लेप लगा था। उनका कहना था कि अगर वे इन कारतूसों को मुँह से लगाएँगे तो उनकी जाति और मज़हब, दोनों भ्रष्ट हो जाएँगे। सिपाहियों का इशारा एन्फील्ड राइफल के उन कारतूसों की तरफ था जो हाल ही में उन्हें दिए गए थे। अंग्रेजों ने सिपाहियों को लाख समझाया कि ऐसा नहीं है लेकिन यह अफवाह उत्तर भारत की छावनियों में जंगल की आग की तरह फैलती चली गई। इस अफवाह का स्त्रोत ढूँढा जा सकता है। राइफल इंस्ट्रक्शन डिपो के कमांडेंट कैप्टन राइट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि दमदम स्थित शस्त्रागार में काम करने वाले नीची जाति के एक खलासी ने जनवरी 1857 के तीसरे हफ्ते में एक ब्राह्मण सिपाही से पानी पिलाने के लिए कहा था। ब्राह्मण सिपाही ने यह कहकर अपने लोटे से पानी पिलाने से इनकार कर दिया कि नीची जाति के छूने से लोटा अपवित्र हो जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक इस पर खलासी ने जवाब दिया कि (वैसे भी) जल्दी ही तुम्हारी जाति भ्रष्ट होने वाली है क्योंकि अब तुम्हें गाय और सुअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुँह से खींचना पड़ेगा। इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता के बारे में कहना मुश्किल है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि जब एक बार यह अफवाह फैलना शुरू हुई तो अंग्रेज अफसरों के तमाम आश्वासनों के बावजूद इसे ख़त्म नहीं किया जा सका और इसने सिपाहियों में एक गहरा गुस्सा पैदा कर दिया। 1857 की शुरुआत तक उत्तर भारत में यही एक अफवाह नहीं थी। यह अफवाह भी ज़ोरों पर थी कि अंग्रेज सरकार ने हिंदुओं और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने के लिए एक भयानक साजिश रच ली है। अफवाह फैलाने वालों का कहना था कि इसी मकसद को हासिल करने के लिए अंग्रेजों ने बाजार में मिलने वाले आटे में गाय और सुअर की हड्डियों का चूरा मिलवा दिया है। शहरों और छावनियों में सिपाहियों और आम लोगों ने आटे को छूने से भी इनकार कर दिया। चारों तरफ इस आशय का भय और शक बना हुआ था कि अंग्रेज हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाना चाहते हैं। यह बेचैनी बहुत तेजी से फैली। ब्रिटिश अफसरों ने लोगों को अपनी बात का यकीन दिलाने का भरसक प्रयास किया लेकिन नाकामयाब रहे। इन्हीं बेचैनियों ने लोगों को अगला कदम उठाने के लिए झिंझोड़ा। किसी बड़ी कार्रवाई के आह्वान को इस भविष्यवाणी से और बल मिला कि प्लासी की जंग के 100 साल पूरा होते ही 23 जून 1857 को अंग्रेजी राज ख़त्म हो जाएगा।
बात सिर्फ अफवाहों तक ही सीमित नहीं थी। उत्तर भारत के विभिन्न भागों से गाँव-गाँव में चपातियाँ बँटने की भी रिपोर्टें आ रही थीं। बताते हैं कि रात में एक आदमी आकर गाँव के चौकीदार को एक चपाती तथा पाँच और चपातियाँ बनाकर अगले गाँवों में पहुँचाने का निर्देश दे जाता था। और यह सिलसिला यूँ ही चलता जाता था। चपातियाँ बाँटने का मतलब और मकसद न उस समय स्पष्ट था और न आज स्पष्ट है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि लोग इसे किसी आने वाली उथल-पुथल का संकेत मान रहे थे।
उत्तर भारत को दोबारा जीतने के लिए टुकडि़यों को रवाना करने से पहले अंग्रेजों ने उपद्रव शांत करने के लिए फौजियों की आसानी के लिए कई कानून पारित कर दिए थे। मई और जून 1857 में पारित किए गए कई क़ानूनों के जरिए न केवल समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया बल्कि फौजी अफसरों और यहाँ तक कि आम अंग्रेजों को भी ऐसे हिंदुस्तानियों पर मुकदमा चलाने और उनको सजा देने का अधिकार दे दिया गया जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था। कहने का मतलब यह है कि कानून और मुकदमें की सामान्य प्रक्रिया रद्द कर दी गई थी और यह स्पष्ट कर दिया गया था कि विद्रोह की केवल एक ही सजा हो सकती है –सजा-ए-मौत। इन नए विशेष कानूनों और ब्रिटेन से मँगाई गई नयी टुकडि़यों से लैस अंग्रेज सरकार ने विद्रोह को कुचलने का काम शुरू कर दिया। विद्रोहियों की तरह वे भी दिल्ली के सांकेतिक महत्त्व को बखूबी समझते थे। लिहाजा, उन्होंने दोतरफा हमला बोल दिया। एक तरफ कलकत्ते से, दूसरी तरफ पंजाब से दिल्ली की तरफ कूच हुआ हालांकि पंजाब कमोबेश शांत था। दिल्ली को कब्जे में लेने की अंग्रेशों की कोशिश जून 1857 में बड़े पैमाने पर शुरू हुई लेकिन यह मुहिम सितंबर के आखिर में जाकर पूरी हो पाई। दोनों तरफ से जमकर हमले किए गए और दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसकी एक वजह ये थी कि पूरे उत्तर भारत के विद्रोही राजधानी को बचाने के लिए दिल्ली में आ जमे थे। गंगा के मैदान में भी अंग्रेजों की बढ़त का सिलसिला धीमा रहा। अंग्रेज़ टुकडि़यों को हर इलाका गाँव-दर-गाँव जीतना था। आम देहाती जनता और आस-पास के लोग उनके खिलाफ थे। जैसे ही उन्होंने अपनी उपद्रव-विरोधी कार्रवाई शुरू की, अंग्रेजों को अहसास हो गया कि उनका सामना सिर्फ सैनिक विद्रोह से नहीं है, वे ऐसे आंदोलन से जूझ रहे हैं जिसके पीछे बेहिसाब जन-समर्थन मौजूद है। उदाहरण के लिए, अवध में फॉरसिथ नाम के एक अंग्रेज अफसर का अनुमान था कि कम से कम तीन-चौथाई वयस्क पुरुष आबादी विद्रोह में शामिल थी। इन इलाकों को लंबी लड़ाई के बाद मार्च 1858 में जाकर ही अंग्रेज दोबारा अपने नियंत्रण में ले पाए। अंग्रेजों ने सैनिक ताकत का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया।लेकिन यह उनका एकमात्र हथियार नहीं था। वर्तमान उत्तर प्रदेश के एक विशाल भू-भाग में बड़े भूस्वामियों और काश्तकारों ने मिलकर अंग्रेजों का विरोध किया था। अंग्रेजों ने इस एकता को तोड़ने के लिए बड़े जमींदारों को आश्वासन दिया कि उन्हें उनकी जागीरें लौंटा दी जाएँगीं। विद्रोह का रास्ता अपनाने वाले जमींदारों को जमीन से बेदख़ल कर दिया गया और जो वफादार थे उन्हें ईनाम दिए गए। बहुत सारे जमींदार या तो अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते मारे गए या भागकर नेपाल चले गए जहाँ उन्होंने बीमारी व भूख से दम तोड़ दिया।
दहशत का प्रदर्शन:
प्रतिशोध और सबक सिखाने की चाह इस बात में भी प्रतिबिम्बित होती है कि विद्रोहियों को कितने निर्मम ढंग से मौत के घाट उतारा गया। उन्हें तोपों के मुहाने पर बाँधकर उड़ा दिया गया या फाँसी पर लटका दिया। इन सजाओं की तसवीरें आम पत्र-पत्रिकाओं के जरिये दूर-दूर तक पहुँच रही थीं।
दया के लिए कोई जगह नहीं:
जब प्रतिशोध के लिए ही शोर मच रहा हो, ऐसे समय पर नर्म सुझाव मजाक का पात्र बन कर ही रह जाते हैं। जब गवर्नर-जनरल कैनिंग ने ऐलान किया कि नर्मी और दया भाव से सिपाहियों की वफादारी हासिल करने में मदद मिलेगी तो ब्रिटिश प्रेस में उसका मजाक उड़ाया गया।
‘ये गिलास फल (चेरी) एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा’:1851 में गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने अवध की रियासत के बारे में कहा था कि ये ‘गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।‘ पाँच साल बाद, 1856 में इस रियासत को औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य का अंग घोषित कर दिया गया। रियासत पर कब्जे का यह सिलसिला जरा लंबा चला। 1801 से अवध में सहायक संधि थोप दी गई थी। इस संधि में शर्त थी कि नवाब अपनी सेना ख़त्म कर दे, रियासत में अंग्रेज टुकडि़यों की तैनाती की इजाजत दे और दरबार में मौजूद ब्रिटिश रेजीडेंट की सलाह पर काम करे। अपनी सैनिक ताकत से वंचित हो जाने के बाद नवाब अपनी रियासत में व् कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिनोदिन अंग्रेजों पर निर्भर होता जा रहा था। अब विद्रोही मुखियाओं और ताल्लुकदारों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था। अवध पर कब्जे में अंग्रेजों की दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। उन्हें लगता था कि वहाँ की जमीन नील और कपास की खेती के लिए मुफीद है और इस इलाकों को उत्तरी भारत के एक बड़े बाजार के रूप में विकसित किया जा सकता है। 1850 के दशक की शुरुआत तक वे देश के ज़्यादातर बड़े हिस्सों पर जीत हासिल कर चुके थे। मराठा भूमि, दोआब, कर्नाटक, पंजाब और बंगाल, सब अंग्रेजों की झोली में थे। तकरीबन एक सदी पहले बंगाल पर जीत के साथ शुरू हुई क्षेत्रीय विस्तार की यह प्रक्रिया 1856 में अवध के अधिग्रहण के साथ मुकम्मल हो जाने वाली थी।
सहायक संधि: सहायक संधि लॉर्ड वेलेजली द्वारा 1798 में तैयार की गई एक व्यवस्था थी। अंग्रेजों के साथ यह संधि करने वालों को कुछ शर्तें माननी पड़ती थीं। मसलन:
(क) अंग्रेज अपने सहयोगी की बाहरी और आंतरिक चुनौतियों से रक्षा करेंगे।
(ख) सहयोगी पक्ष के भूक्षेत्र में एक ब्रिटिश सैनिक टुकड़ी तैनात रहेगी,
(ग) सहयोगी पक्ष को इस टुकड़ी के रख-रखाव की व्यवस्था करनी होगी। तथा
(घ) सहयोगी पक्ष न तो किसी और शासक के साथ संधि कर सकेगा और न ही अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी युद्ध में हिस्सा लेगा।
विद्रोह का आरंभ: सिपाहियों ने किसी न किसी विशेष संकेत के साथ अपनी कार्यवाही शुरू की। कई जगह शाम के समय तोप का गोला दाग दिया गया तो कहीं बिगुल बजाकर विद्रोह का संकेत दिया गया। सबसे पहले उन्होंने शस्त्रागार पर कब्जा किया और सरकारी ख़जाने को लूटा। इसके बाद उन्होंने जेल, सरकारी ख़जाने, टेलीग्राफ दफ्तर , रिकॉर्ड रूम, बंगलों, तमाम सरकारी इमारतों पर हमला किया और सारे रिकॉर्ड जलाते चले गए। गोरों से संबन्धित हर चीज और हर शख़्स हमले का निशाना था। हिंदुओं और मुसलमानों, तमाम लोगों को एकजुट होने और फिरंगियों का सफाया करने के लिए हिंदी, उर्दू और फारसी में अपीलें जारी होने लगीं। विद्रोह में आम लोगों के भी शामिल हो जाने के साथ-साथ हमलों का दायरा फैल गया। लखनऊ, कानपुर और बरेली जैसे बड़े शहरों में साहूकार और अमीर भी विद्रोहियों के गुस्से का शिकार बनने लगे। किसान इन लोगों को न केवल अपना उत्पीड़क बल्कि अंग्रेजों का पिट्ठू मानते थे। ज्यादातर जगह अमीरों के घर-बार लूटकर तबाह कर दिए गए। सिपाहियों की कतारों में हुए इन छिटपुट विद्रोहों ने जल्दी ही एक चौतरफा विद्रोह का रूप ले लिया। शासन की सत्ता और सोपानों की सरेआम अवहेलना होने लगी।मई-जून के महीनों में अंग्रेजों के पास विद्रोहियों की कार्रवाइयों का कोई जवाब नहीं था। अंग्रेज अपनी जिंदगी और घर-बार बचाने में फंसे हुए थे।
देह से जान जा चुकी थी। लॉर्ड डलहौजी द्वारा किए गए इस अधिग्रहण से तमाम इलाकों और रियासतों में गहरा असंतोष था। लेकिन इतना गुस्सा कहीं नहीं था जैसा उत्तर भारत की शान कहे जाने वाले अवध की रियासत में था। यहाँ के नवाब वाजिद अली शाह को यह कहते हुए गद्दी से हटा कर कलकत्ता निष्कासित कर दिया गया था कि वह अच्छी तरह शासन नहीं चला रहे थे। ब्रिटिश सरकार ने यह निराधार निष्कर्ष भी निकाल लिया कि वाजिदअली शाह लोकप्रिय नहीं थे। मगर सच यह है कि लोग उन्हें दिल से चाहते थे। जब वे अपने प्यारे लखनऊ से विदा ले रहे थे तो बहुत सारे लोग विलाप करते हुए कानपुर तक उनके पीछे गए थे। नवाब के निष्कासन से पैदा हुए दुख और अपमान के इस व्यापक अहसास को उस समय के बहुत सारे प्रेक्षकों ने दर्ज किया है। एक ने लिखा था: ‘ देह से जान जा चुकी थी। शहर की काया बेजान थी...। कोई सड़क, कोई बाजार और घर ऐसा न था जहाँ से जान-ए-आलम से बिछड़ने पर विलाप का शोर न गूँज रहा हो। एक लोक गीत में इस बात पर शोक व्यक्त किया गया कि ‘अंगरेज बहादुर आइन, मुल्क लई लीन्हों। इस भावनात्मक उथल-पुथल को भौतिक क्षति के अहसास से और बल मिला। नवाब को हटाए जाने से दरबार और उसकी संस्कृति भी ख़त्म हो गई। संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, कारीगरों, बावर्चियों, नौकरों, सरकारी कर्मचारियों और बहुत सारे लोगों की रोजी-रोटी जाती रही।
अवध सिपाहीयों का असंतोष : किसानों का असंतोष अब फौजी बैरकों में भी पहुँचने लगा था क्योंकि बहुत सारे किसान अवध के गाँवों से ही भर्ती किए गए थे।
दशकों से सिपाही कम वेतन और वक्त पर छुट्टी न मिलने के कारण असंतुष्ट थे। 1850 के दशक तक आते-आते उनके असंतोष के कई नए कारण पैदा हो चुके थे। 1857 के जनविद्रोह से पहले के सालों में सिपाहियों के अपने गोरे अफसरों के साथ रिश्ते काफी बदल चुके थे। 1820 के दशक में अंग्रेज अफसर सिपाहियों के साथ दोस्ताना ताल्लुकात रखने पर ख़ासा जोर देते थे। वे उनकी मौजमस्ती में शामिल होते थे, उनके साथ मल्ल-युद्ध करते थे, उनके साथ तलवारबाजी करते थे और उनके साथ शिकार पर जाते थे। उनमें से बहुत सारे तो बख़ूबी हिंदुस्तानी बोलना जानते थे और यहाँ के रीति-रिवाजों व संस्कृति से वाकिफ थे। उनमें अफसर की कड़क और अभिवावक का स्नेह, दोनों निहित थे।
1840 के दशक में स्थिति बदलने लगी। अफसरों में श्रेष्ठता का भाव पैदा होने लगा और वे सिपाहियों को कमतर नस्ल का मानने लगे। वे उनकी भावनाओं की जरा-सी भी फिक्र नहीं करते थे। गाली-गलौच और शारीरिक हिंसा सामान्य बात बन गई। सिपाहियों व अफसरों के बीच फासला बढ़ता गया। भरोसे की जगह संदेह ने ले ली। चिकनाई युक्त कारतूसों की घटना इसका एक बढि़या उदाहरण थी। यह भी याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि उत्तर भारत में सिपाहियों और ग्रामीण जगत के बीच गहरे संबंध थे। बंगाल आर्मी के सिपाहियों में से बहुत सारे अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों से भर्ती होकर आए थे। उनमें से बहुत सारे ब्राह्मण या ऊँची जाति के थे। बल्कि अवध को तो बंगाल आर्मी की पौधशाला कहा जाता था। सिपाहियों के परिवार अपने इर्द-र्गिद जिन बदलावों को देख रहे थे और उन्हें जो ख़तरे दिखाई दे रहे थे वे जल्दी ही सिपाही लाइनों में भी दिखाई देने लगे। दूसरी ओर, कारतूसों के बारे में सिपाहियों का भय, छुट्टियों के बारे में उनकी शिकायतें, बढ़ते दुर्व्यवहार और नस्ली गाली-गलौच के प्रति बढ़ता असंतोष गाँवों में भी प्रतिबिम्बित होने लगा था। सिपाहियों और ग्रामीण जगत के बीच मौजूद इन संबंधों से जनविद्रोह के रूप-रंग पर गहरा असर पड़ा। जब सिपाही अपने अफसरों की अवज्ञा करते थे और हथियार उठाते थे तो फौरन ही गाँवों में उनके भाई-बिरादर भी उनके साथ आ जुटते थे। हर कहीं किसान शहरों में पहुँचकर सिपाहियों और शहर के आम लोगों के साथ जुड़ कर विद्रोह के सामूहिक कृत्य में शामिल हो रहे थे।
A. बम्बई, कलकत्ता और दिल्ली।
B. बम्बई, कलकत्ता और मद्रास।
C. लाहौर, दिल्ली और कोलकाता।
D. दिल्ली, पेशावर और बंबई।
1857 में भारत के तीन प्रेसीडेंसी शहरों में विश्वविद्यालय स्थापित किये गए थे।यह भारत में अंग्रेजों द्वारा स्थापित किये गए पहले शिक्षा संसथान थे जो 1854 के सर चार्ल्स वुड्स के आदेश पत्र का पालन था।
माउण्ट आबू, डलहौजी, औपनिवेशिक भारत में स्थापित दो हिल स्टेशनों के नाम हैं।
कानपुर , जमशेदपुर
1911 में,दिल्ली के राजधानी घोषित होने से पूर्व, कोलकाता ब्रिटिश भारत की राजधानी था
ब्रिटिश शासन के अंतर्गत,भारत के प्रदेशों की प्रशासनिक इकाइयों को प्रेसीडेंसी शहर कहा जाता था। औपनिवेशिक भारत, तीन प्रेसीडेंसीयों यथा बम्बई, मद्रास और बंगाल में विभाजित किया गया था, प्रेसीडेंसी शहर, भारत के बौद्धिक और व्यावसायिक केंद्र भी होते थे।
1. मदुरै
2. सूरत
भारत में अंग्रेजों द्वारा स्थापित दो व्यापारिक कोठियों का नाम बताइए निम्न लिखित है -
यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों ने, मुगल काल के पूर्वार्द्ध में ही विभिन्न स्थानों पर अपनी बस्तियाँ स्थापित कर ली थी: पुर्तगालियों ने 1510 में पणजी में, डचों ने 1605 में मछलीपट्नम में, अंग्रेजों ने मद्रास में 1639 में तथा फ़्रांसीसीयों ने 1673 में पांडिचेरी(आज का पुदुचेरी) में।
दक्षिण भारत में मदुरई और काँचीपुरम् महत्वपूर्ण कस्बे थे । दक्षिण भारत के इन नगरों के मुख्य केन्द्र मन्दिर थे । ये नगर महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र भी थे। धार्मिक त्योहार अकसर मेलों के साथ होते थे जिससे तीर्थ और व्यापार जुड़ जाते थे।
पेठ एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है बस्ती, जबकि पुरम शब्द गाँव के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
माउण्ट आबू, डलहौजी, औपनिवेशिक भारत में स्थापित दो हिल स्टेशनों के नाम हैं।
कानपुर , जमशेदपुर
दक्षिण भारत में मदुरई और काँचीपुरम् महत्वपूर्ण कस्बे थे । दक्षिण भारत के इन नगरों के मुख्य केन्द्र मन्दिर थे । ये नगर महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र भी थे। धार्मिक त्योहार अकसर मेलों के साथ होते थे जिससे तीर्थ और व्यापार जुड़ जाते थे।
पेठ एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है बस्ती, जबकि पुरम शब्द गाँव के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
ब्रिटिश शासन के अंतर्गत,भारत के प्रदेशों की प्रशासनिक इकाइयों को प्रेसीडेंसी शहर कहा जाता था
वे विशिष्ट प्रकार की आर्थिक गतिविधियों और संस्कृतियों के प्रतिनिधि बन कर उभरे। लोग ग्रामीण अंचलों में खेती, जंगलों में संग्रहण या पशुपालन के द्वारा जीवन निर्वाह करते थे। इसके विपरीत कस्बों में शिल्पकार, व्यापारी, प्रशासक तथा शासक रहते थे। कस्बों का ग्रामीण जनता पर प्रभुत्व होता था और वे खेती से प्राप्त करों और अधिशेष ले आधार पर फलते-फूलते थे।अकसर कस्बों और शहरों की किलेबन्दी की जाती थी जो ग्रामीण क्षेत्रों से इनकी पृथकता को चिन्हित करती थी।
फिर भी कस्बों और गाँवों के बीच की पृथकता अनिश्चित होती थी। किसान तीर्थ करने के लिए लम्बी दूरियाँ तय करते थे और कस्बों से होकर गुजरते थे, वे अकाल के समय कस्बों में जमा भी हो जाते थे। इसके अतिरिक्त लोगों और माल का कस्बों से गाँवों की ओर विपरीत गमन भी था।जब कस्बों पर आक्रमण होते थे तो लोग अकसर ग्रामीण क्षेत्रों में शरण लेते थे। व्यापारी और फेरीवाले व कस्बों से माल गाँव ले जाकर बेचते थे, जिसके द्वारा बाजारों का फैलाव और उपभोग की नयी शैलियों का सृजन होता था।
यद्यपि हिल स्टेशन अंग्रेज प्रशासन की राजनीतिक आवश्यकताओं की वजह से अस्तित्व में आया था तथापि 18 वीं सदी के जीवन में इसका अपना सामाजिक आर्थिक महत्व था। पर्वतीय स्थानों पर ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय लोग अपने घर जैसी मिलती-जुलती बस्तियाँ बसाना चाहते थे।
सामाजिक दावत, चाय, बैठक, पिकनिक, रात्रिभोज, मेले, रेस और रंगमंच जैसी घटनाओं के रूप में यूरोपीयों का सामाजिक जीवन भी एक ख़ास किस्म का था। रेलवे के आने से ये पर्वतीय सैरगाहें बहुत तरह के लोगों की पहुँच में आ गईं। अब भारतीय भी वहाँ जाने लगे। उच्च और मध्यवर्गीय लोग, महाराजा, वकील और व्यापारी सैर-सपाटे के लिए इन स्थानों पर जाने लगे। वहाँ उन्हें शासक यूरोपीय अभिजन के निकट होने का संतोष मिलता था। हिल स्टेशन औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्त्वपूर्ण थे। पास के हुए इलाकों में चाय और कॉफी बागानों की स्थापना से मैदानी इलाकों से बड़ी संख्या में मजदूर वहाँ आने लगे।
औपनिवेशिक सरकार ने मानचित्रों को बनाने पर इसलिए विचार किया था, कि वे सही रूप से शासन कर सके । आवशयकतानुसार एक उचित एवं सटीक रणनीति को तैयार कर सकें, अपने साधनों का सही प्रकार से प्रसार कर सकें, ताकि विद्रोह को आसानी से कुचला जा सके तथा कभी जरूरत पड़ जाए तो भी वहां पर त्वरित कार्यवाही की जा सके, और आवश्यक रसद, अस्त्र-शस्त्र, यथासमय, यथास्थान पर पहुंचाए जा सकें ।
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में शहर विशिष्ट प्रकार की आर्थिक गतिविधियों और संस्कृतियों के प्रतिनिधि बन कर उभरे। कस्बों में शिल्पकार, व्यापारी,प्रशासक तथा शासक रहते थे। मुगलों द्वारा बनाए गए शहर जनसंख्या के केन्द्रीकरण, अपने विशाल भवनों तथा अपनी शाही शोभा व समृद्धि के लिए प्रसिद्ध थे। आगरा, दिल्ली और लाहौर शाही प्रशासन और सत्ता के महत्त्वपूर्ण केंद्र थे। मनसबदार और जागीरदार जिन्हें साम्राज्य के अलग-अलग भागों में क्षेत्र दिये गए थे, सामान्यतः इन शहरों में अपने आवास रखते थे: इन सत्ता केन्द्रों में आवास एक अमीर की स्थिति और प्रतिष्ठा का संकेतक था। इन केन्द्रों में सम्राट और कुलीन वर्ग की उपस्थिति के कारण वहाँ कई प्रकार की सेवाएँ प्रदान करना आवश्यक था। शिल्पकार कुलीन वर्ग के
परिवारों के लिए विशिष्ट हस्तशिल्प का उत्पादन करते थे। ग्रामीण अंचलों से शहर के बाजारों में निवासियों और सेना के लिए अनाज लाया जाता था। राजकोष भी शाही राजधानी में ही स्थित था। इसलिए राज्य का राजस्व भी नियमित रूप से राजधानी में आता रहता था। सम्राट एक किलेबन्द महल में रहता था और नगर एक दीवार से घिरा होता था जिसमें अलग-अलग द्वारों से आने-जाने पर नियंत्रण रखा जाता था। नगरों के भीतर उद्यान, मस्जिदें, मन्दिर,मकबरे, महाविद्यालय, बाजार तथा कारवाँ सराय स्थिति होती थीं। शहर का केंद्र स्थल महल और मुख्य मस्जिद की ओर उन्मुख किया गया था।
यह सब अठारहवीं शताब्दी में बदलने लगा। राजनीतिक तथा व्यापारिक पुनर्गठन के साथ पुराने नगर पतनोन्मुख हुए और नए नगरों का विकास होने लगा। मुगल सत्ता के क्रमिक चरण के कारण ही उसके शासन से सम्बद्ध नगरों का अवसान हो गया। मुगल राजधानियों, दिल्ली और आगरा ने अपना राजनीतिक प्रभुत्व खो दिया। नयी क्षेत्रीय ताकतों का विकास क्षेत्रीय राजधानियों-लखनऊ, हैदराबाद, सेरिंगपट्म, पूना (आज का पुणे), नागपुर, बड़ौदा तथा तंजौर (आज का तंजावुर)- के बढ़ते महत्त्व में परिलक्षित हुआ। व्यापारी, प्रशासक, शिल्पकार तथा अन्य लोग पुराने मुगल केन्द्रों से इन नयी राजधानियों की ओर काम तथा संरक्षण की तलाश में आने लगे। नए राज्यों के बीच निरंतर लड़ाइयों का परिणाम यह था कि भाड़े के सैनिकों को भी यहाँ तैयार रोजगार मिलता था। कुछ स्थानीय विशिष्ट लोगों तथा उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य से सम्बद्ध अधिकारियों ने भी इस अवसर का उपयोग ‘कस्बे’ और ‘गंज’ जैसी नयी शहरी बस्तियों को बसाने में किया। परंतु राजनीतिक विकेन्द्रीकरण के प्रभाव सब जगह एक जैसे नहीं थे। कई स्थानों पर नए सिरे से आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ीं, कुछ अन्य स्थानों पर युद्ध, लूट-पाट तथा राजनीतिक अनिश्चितता आर्थिक पतन में परिणत हुई।व्यापार तंत्रों में परिवर्तन शहरी केन्द्रों के इतिहास में परिलक्षित हुए। यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों ने, मुगल काल के पूर्वार्द्ध में ही विभिन्न स्थानों पर अपनी बस्तियाँ स्थापित कर ली थी: पुर्तगालियों ने 1510 में पणजी में, डचों ने 1605 में मछलीपट्नम में, अंग्रेजों ने मद्रास में 1639 में तथा फ़्रांसीसीयों ने 1673 में पांडिचेरी(आज का पुदुचेरी) में। व्यापारिक गतिविधियों में विस्तार के साथ ही इन व्यापारिक केन्द्रों के आस-पास नगर विकसित होने लगे। अठारहवीं शताब्दी के अंत तक स्थल-आधारित साम्राज्यों का स्थान शक्तिशाली जल-आधारित यूरोपीय साम्राज्यों ने ले लिया। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, वाणिज्यवाद तथा पूँजीवाद की शक्तियाँ अब समाज के स्वरूप को परिभाषित करने लगी थीं। मध्य-अठारहवीं शताब्दी से परिवर्तन का एक नया चरण आरंभ हुआ। जब व्यापारिक गतिविधियाँ अन्य स्थानों पर केन्द्रित होने लगीं तो सत्रहवीं शताब्दी में विकसित हुए सूरत, मछलीपट्नम तथा ढाका पतनोन्मुख हो गए। 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद जैसे-जैसे अंग्रेजों ने राजनीतिक नियंत्रण हासिल किया, और इंग्लिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का व्यापार फैलाए मद्रास, कलकत्ता तथा बम्बई जैसे औपनिवेशिक बंदरगाह शहर तेजी से नयी आर्थिक राजधानियों के रूप में उभरे। ये औपनिवेशिक प्रशासन और सत्ता के केन्द्र भी बन गए। नए भवनों और संस्थानों का विकास हुआए तथा शहरी स्थानों को नए तरीकों से व्यवस्थित किया गया। नए रोजगार विकसित हुए और लोग इन औपनिवेशिक शहरों की ओर उमड़ने लगे। लगभग 1800 तक ये जनसंख्या के लिहाज से भारत के विशालतम शहर बन गए थे।
औपनिवेशिक शहर नए शासकों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रतिबिम्बित करते थे। राजनीतिक सत्ता और संरक्षण भारतीय शासकों के स्थान पर ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारियों के हाथ में जाने लगा। दुभाषिए, बिचौलिये, व्यापारी और माल आपूर्तिकर्ता के रूप में काम करने वाले भारतीयों का भी इन नए शहरों में एक महत्त्वपूर्ण स्थान था। नदी या समुद्र के किनारे आर्थिक गतिविधियों से गोदियों और घाटियों का विकास हुआ। समुद्र किनारे गोदाम, वाणिज्यिक कार्यालय, जहाजरानी उद्योग के लिए बीमा एजेंसियाँ, यातायात डिपो और बैंकिंग संस्थानों की स्थापना होने लगी। कंपनी के मुख्य प्रशासकीय कार्यालय समुद्र तट से दूर बनाए गए। कलकत्ता में स्थित राइटर्स बिल्डिंग इसी तरह का एक दफ्तर हुआ करती थी। यहाँ राइटर्स का आशय क्लर्कों से था। यह ब्रिटिश शासन में नौकरशाही के बढ़ते कद का संकेत था। किले की चारदिवारी के आस-पास यूरोपीय व्यापारियों और एजेंटों ने यूरोपीय शैली के महलनुमा मकान बना लिए थे। कुछ ने शहर की सीमा से सटे उपशहरी इलाकों में बगीचा घर बना लिए थे। शासक वर्ग के लिए नस्ली विभेद पर आधरित क्लब, रेसकोर्स और रंगमंच भी बनाए गए। अमीर भारतीय एजेंटों और बिचौलियों ने बाजारों के आस-पास ब्लैक टाउन में परंपरागत ढंग के दालानी मकान बनवाए। उन्होंने भविष्य में पैसा लगाने के लिए शहर के भीतर बड़ी-बड़ी जमीनें भी ख़रीद ली थीं। अपने अंग्रेज स्वामियों को प्रभावित करने के लिए वे त्योहारों के समय रंगीन दावतों का आयोजन करते थे। समाज में अपनी हैसियत साबित करने के लिए उन्होंने मंदिर भी बनवाए। मजदूर वर्ग के लोग अपने यूरोपीय और भारतीय स्वामियों के लिए ख़ानसामा, पालकीवाहक, गाड़ीवान, चैकीदार, पोर्टर और निर्माण व गोदी मजदूर के रूप में विभिन्न सेवाएँ उपलब्ध् कराते थे। वे शहर के विभिन्न इलाकों में कच्ची झोंपडि़यों में रहते थे। उन्नीसवीं सदी के मध्य में औपनिवेशिक शहर का स्वरूप और भी बदल गया। 1857 के विद्रोह के बाद भारत में अंग्रेजों का रवैया विद्रोह की लगातार आशंका से तय होने लगा था। उनको लगता था कि शहरों की और अच्छी तरह हिफाजत करना जरूरी है और अंग्रेजों को देशी लोगों के ख़तरे से दूर, ज्यादा सुरक्षित व पृथक बस्तियों में रहना चाहिए। पुराने कस्बों के इर्द-गिर्द चरागाहों और खेतों को साफ कर दिया गया। सिविल लाइन्स के नाम से नए शहरी इलाके विकसित किए गए। सिविल लाइन्स में केवल गोरों को बसाया गया। छावनियों को भी सुरक्षित स्थानों के रूप में विकसित किया गया। छावनियों में यूरोपीय कमान के अंतर्गत भारतीय सैनिक तैनात किए जाते थे। ये इलाके मुख्य शहर से अलग लेकिन जुड़े हुए होते थे। चौड़ी सड़कों, बड़े बगीचों में बने बंगलों, बैरकों, परेड मैदान और चर्च आदि से लैस ये छावनियाँ यूरोपीय लोगों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल तो थीं ही, भारतीय कस्बों की घनी और बेतरतीब बसावट के विपरीत व्यवस्थित शहरी जीवन का एक नमूना भी थीं। अंग्रेजों की नजर में काले इलाके न केवल अराजकता और हो-हल्ले का केंद्र थे, वे गंदगी और बीमारी का स्त्रोत भी थे। काफी समय तक अंग्रेजों की दिलचस्पी गोरों की आबादी में सफाई और स्वच्छता बनाए रखने तक ही सीमित थी लेकिन जब हैजा और प्लेग जैसी महामारियाँ फैली और हजारों लोग मारे गये तो औपनिवेशिक अफसरों को स्वच्छता व सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए ज्यादा कड़े कदम उठाने की जरूरत महसूस हुई। उनको भय था कि कहीं ये बीमारियाँ ब्लैक टाउन से व्हाइट टाउन में भी न फैल जाएँ। 1860-70 के दशकों से साफ-सफाई के बारे में कड़े प्रशासकीय उपाय लागू किए गये और भारतीय शहरों में निर्माण गतिविधियों पर अंकुश लगाया गया। लगभग इसी समय भूमिगत पाइप आधारित जलापूर्ति, निकासी और नाली व्यवस्था भी निर्मित की गई। इस प्रकार भारतीय शहरों को नियमित व नियंत्रित करने के लिए स्वच्छता निगरानी भी एक अहम तरीका बन गया।
A. खेड़ा।
B. बारडोली।
C. पूना।
D. तुमकुर।
टैक्स छूट के लिए सभी याचिकाओं को सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया था।
A. आर्थिक सुधार।
B. राजनीतिक सुधार।
C. राष्ट्रीय आंदोलन।
D. समाज सुधार।
1924 के बाद गांधी जी ने इस तरह की अस्पृश्यता और बाल विवाह के उन्मूलन के रूप में सामाजिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया।
A. बिपिन चन्द्र।
B. S.
A.A रिजवी।
C. शाहिद अमीन।
D. अख्तर हुसैन।
शाहिद अमीन ने महात्मा गांधी की चमत्कारी शक्तियों के बारे में विभिन्न कहानियों को एकत्र किया।
A. बस्ती।
B. भटनी।
C. गोरखपुर।
D. देवरिया।
ऐसे कई किस्से हैं जो महात्मा गांधी के पास अलौकिक शक्तियों के बारे में सुनने में आए थे।
A. कार्ल लुइस।
B. इम्पी
C. वेब मिलर।
D. C.N ब्र्रोम्फ़िल्इ
C.N Broomfield ने 1922 में महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद उनके परीक्षण की अध्यक्षता की
A. पान-अरबी आंदोलन।
B. पान स्लाव आंदोलन।
C. अखिल भारतीय आंदोलन।
D. पान-इस्लामिक मूवमेंट।
खलीफा वैश्विक इस्लामी समुदाय कामुखिया था। अपनी शक्ति और साम्राज्य विश्व युद्ध के बाद विजयी सहयोगी दलों पर अतिक्रमण किया गया था, अखिल इस्लामिक मूवमेंट खलीफा की सत्ता की बहाली के लिए दुनिया के विभिन्न भागों में शुरू किया गया था।
A. क्लीमेंट एटली।
B. जेम्स रामसे मैकडोनाल्ड।
C. नेविले चेम्बरलिन।
D. विंस्टन चर्चिल।
विंस्टन चर्चिल साम्राज्यवाद के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने कहा कि भारत को स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं थे।
A. पंजाब की ओर
B. पाकिस्तान की ओर
C. उत्तर प्रदेश की ओर
D. गुजरात की ओर
पंजाब में राजनीतिक माहौल रोलेट सत्याग्रह के कारण गरम था। गांधीजी को रास्ते में ही हिरासत में लिया गया था।
A. भारत सरकार 1919अधिनियम।
B. जलियांवाला बाग नरसंहार।
C. खिलाफत मुद्दा।
D. रोलेट एक्ट।
रोलेट एक्ट के प्रावधानों में से एक यह है कि यह परीक्षण के बिना किसी व्यक्ति को हिरासत में ले सकता है
A. मार्च 30, 1947
B. अगस्त 30, 1947
C. 30 जनवरी, 1948
D. 30 अप्रैल, 1948
महात्मा गांधी की हत्या जनवरी 1948 को,को नाथूराम गोडसे द्वारा कर दी गयी।
A. अलीगढ़, भारत में
B. लाहौर, पाकिस्तान में
C. दिल्ली, भारत में
D. लंदन, ब्रिटेन में
मोहम्मद अली जिन्ना सबसे कम उम्र के भारतीय थे जो इंग्लैंड में बार के लिए बुलाये जा रहेथे।
A. इल्बर्ट बिल।
B. सांप्रदायिक अधिनिर्णय।
C. शस्त्र अधिनियम।
D. रोलेट अधिनियम।
रोलेट एक्ट की सिडनी रोलेट ने सिफारिश की थी। यह अधिनियम भारत के लोगों के नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा गया था।
A. चंपारण आंदोलन।
B. असहयोग आन्दोलन।
C. अहमदाबाद मिल हड़ताल।
D. खेड़ा सत्याग्रह।
असहयोग आंदोलन का तथ्य यह था कि ब्रिटिश का शासन केवल भारतीयों के समर्थन की वजह से भारत में मौजूद था और यदि भारतीयों का समर्थन नहीं मिलातो वे भारत पर राज नहीं कर सकते
A. 1906-1907.
B. 1905-1906.
C. 1905-1907.
D. 1907-1908.
स्वदेशी आंदोलन 1905-1907)से कांग्रेस ने मध्यम वर्ग के बीच अपनी अपील को विस्तृत किया
A. मदन मोहन मालवीय।
B. रवीन्द्रनाथ टैगोर।
C. बाल गंगाधर तिलक।
D. गोपाल कृष्ण गोखले।
गोपाल कृष्ण गोखले महात्मा गांधी के राजनीतिक संरक्षक थे।
A. रहमत अली और जिन्ना ।
B. मुहम्मद अली और शौकत अली।
C. सैयद अली।
D. महात्मा गांधी।
खिलाफत आंदोलन तुर्की के सुल्तान को बहाल करने के लिए किया गया था
A. लार्ड वेवेल।
B. लॉर्ड लिनलिथगो।
C. लार्ड विलिंग्डन।
D. लॉर्ड इरविन।
लार्ड वेवेल लार्ड माउंटबेटन से पहले भारत के वाइसराय थे
A. 1935.
B. 1938.
C. 1940.
D. 1939.
द्वितीय विश्व युद्ध १९३९ में हुआ था और १९४५ तक चला था
यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों ने, मुगल काल के पूर्वार्द्ध में ही विभिन्न स्थानों पर अपनी बस्तियाँ स्थापित कर ली थी: पुर्तगालियों ने 1510 में पणजी में, डचों ने 1605 में मछलीपट्नम में, अंग्रेजों ने मद्रास में 1639 में तथा फ़्रांसीसीयों ने 1673 में पांडिचेरी(आज का पुदुचेरी) में।
1857 के विद्रोह के बाद औपनिवेशिक शहर का स्वरूप और भी बदल गया। यह महसूस किया गया कि शहरों की और अच्छी तरह हिफाजत करना जरूरी है और और इसलिए यह योजना बनाई गई कि अंग्रेजों को देशियों (नेटिव) के ख़तरे से दूर, ज्यादा सुरक्षित व पृथक बस्तियों में रहना चाहिए। पुराने कस्बों के इर्द-गिर्द चरागाहों और खेतों को साफ कर दिया गया। सिविल लाइन्स के नाम से नए शहरी इलाके विकसित किए गए।
सिविल लाइन्स में केवल गोरों को बसाया गया। ये इलाके मुख्य शहर से अलग लेकिन भारतीय शहरों से जुड़े हुए होते थे। ये चौड़ी सड़कों, बड़े बगीचों में बने बंगलों, बैरकों, परेड मैदान और चर्च आदि से लैस थे। ये स्थान यूरोपीय लोगों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल तो थे ही साथ ही भारतीय कस्बों की घनी और बेतरतीब बसावट के विपरीत व्यवस्थित शहरी जीवन का एक नमूना भी थीं।
ब्रिटिश एवं ब्लैक टाउन:
अंग्रेजों की नजर में काले इलाके न केवल अराजकता और हो-हल्ले का केंद्र थे, वे गंदगी और बीमारी का स्त्रोत भी थे। काफी समय तक अंग्रेजों की दिलचस्पी गोरों की आबादी में सफाई और स्वच्छता बनाए रखने तक ही सीमित थी लेकिन जब हैजा और प्लेग जैसी महामारियाँ फैली और हजारों लोग मारे गये तो औपनिवेशिक अफसरों को स्वच्छता व सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए ज्यादा कड़े कदम उठाने की जरूरत महसूस हुई। उनको भय था कि कहीं ये बीमारियाँ ब्लैक टाउन से व्हाइट टाउन में भी न फ़ेल जाएँ। 1860-70 के दशकों से साफ-सफाई के बारे में कड़े प्रशासकीय उपाय लागू किए गये और भारतीय शहरों में निर्माण गतिविधियों पर अंकुश लगाया गया। लगभग इसी समय भूमिगत पाइप आधरित जलापूर्ति, निकासी और नाली व्यवस्था भी निर्मित की गई। इस प्रकार भारतीय शहरों को नियमित व नियंत्रित करने के लिए स्वच्छता निगरानी भी एक अहम तरीका बन गया।
दक्षिण भारत के नगरों जैसे मदुरई और काँचीपुरम् में मुख्य केन्द्र मन्दिर होता था। ये नगर महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र भी थे। धार्मिक त्योहार अकसर मेलों के साथ होते थे जिससे तीर्थ और व्यापार जुड़ जाते थे। सामान्यतः शासक धार्मिक संस्थानों का सबसे ऊँचा प्राधिकारी और मुख्य संरक्षक होता था। समाज और शहर में अन्य समूहों और वर्गों का स्थान शासक के साथ उनके संबंधों से तय होता था।मध्यकालीन शहरों में शासक वर्ग के वर्चस्व वाली सामाजिक व्यवस्था में हरेक से अपेक्षा की जाती थी कि उसे समाज में अपना स्थान पता हो। उत्तर भारत में इस व्यवस्था को बनाए रखने का कार्य कोतवाल नामक राजकीय अधिकारी का होता था जो नगर में आंतरिक मामलों पर नजर रखता था और कानून-व्यवस्था बनाए रखता था।
शहरों में नए सामाजिक समूह बने तथा लोगों की पुरानी पहचानें महत्त्वपूर्ण नहीं रहीं। तमाम वर्गों के लोग बड़े शहरों में आने लगे। क्लर्कों, शिक्षकों, वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, अकाउंटेंट्स की माँग बढ़ती जा रही थी। नतीजा, मध्यवर्ग ̧ बढ़ता गया। उनके पास स्कूल , कॉलेज और लाइब्रेरी जैसे नए शिक्षा संस्थानों तक अच्छी पहुँच थी। शिक्षित होने के नाते वे समाज और सरकार के बारे में अख़बारों, पत्रिकाओं और सार्वजनिक सभाओं में अपनी राय व्यक्त कर सकते थे। बहस और चर्चा का एक नया सार्वजनिक दायरा पैदा हुआ। सामाजिक रीति-रिवाज, कायदे-कानून और तौर-तरीकों पर सवाल उठने लगे।
बीसवीं सदी की शुरुआत में एक नयी मिश्रित स्थापत्य शैली विकसित हुई जिसमें भारतीय और यूरोपीय, दोनों तरह की शैलियों के तत्व थे। इस शैली को इंडो-सारासेनिक शैली का नाम दिया गया था। सार्वजनिक वास्तु शिल्प में भारतीय शैलियों का समावेश करके अंग्रेज यह साबित करना चाहते थे कि वे यहाँ के वैध और स्वाभाविक शासक हैं। राजा जॉर्ज पंचम और उनकी पत्नी मेरी के स्वागत के लिए 1911 में गेटवे ऑफ़ इंडिया बनाया गया। यह परंपरागत गुजराती शैली का प्रसिद्ध उदाहरण है। उद्योगपति जमशेदजी टाटा ने इसी शैली में ताजमहल होटल बनवाया था।
बीसवीं सदी की शुरुआत में एक नयी मिश्रित स्थापत्य शैली विकसित हुई जिसमें भारतीय और यूरोपीय, दोनों तरह की शैलियों के तत्व थे। इस शैली को इंडो-सारासेनिक शैली का नाम दिया गया था। सार्वजनिक वास्तु शिल्प में भारतीय शैलियों का समावेश करके अंग्रेज यह साबित करना चाहते थे कि वे यहाँ के वैध और स्वाभाविक शासक हैं। राजा जॉर्ज पंचम और उनकी पत्नी मेरी के स्वागत के लिए 1911 में गेटवे ऑफ़ इंडिया बनाया गया। यह परंपरागत गुजराती शैली का प्रसिद्ध उदाहरण है। उद्योगपति जमशेदजी टाटा ने इसी शैली में ताजमहल होटल बनवाया था।
औपनिवेशिक सरकार ने मानचित्रों को बनाने पर इसलिए विचार किया था, कि वे सही रूप से शासन कर सके । आवशयकतानुसार एक उचित एवं सटीक रणनीति को तैयार कर सकें, अपने साधनों का सही प्रकार से प्रसार कर सकें, ताकि विद्रोह को आसानी से कुचला जा सके तथा कभी जरूरत पड़ जाए तो भी वहां पर त्वरित कार्यवाही की जा सके, और आवश्यक रसद, अस्त्र-शस्त्र, यथासमय, यथास्थान पर पहुंचाए जा सकें ।
अट्ठारहवीं सदी में औपनिवेशक शहरों में समस्त वर्गो के लोग रोजगार की तलाश में आने लगे थे। शहरों में क्लर्क, डाॅक्टरों, वकीलों, शिक्षकों, इंजीनियरों आदि की मांग बढ़ती जा रही थी। इनका ही परिणाम था कि शहरों में ‘मध्य वर्ग’ का विकास हुआ। यह लोग सुशिक्षित थे व समाज और सरकार के बारे में समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में अपने विचार व्यक्त कर सकते थें।
नगर-नियोजन का काम सरकार की मदद से लॉटरी कमेटी (1817) ने जारी रखा। लॉटरी कमेटी का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि नगर सुधार के लिए पैसे की व्यवस्था जनता के बीच लॉटरी बेचकर ही की जाती थी। इसका मतलब है कि उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों तक शहर के विकास के लिए पैसे की व्यवस्था करना अभी भी केवल सरकार की नहीं बल्कि संवेदनशील नागरिकों की जिम्मेदारी ही माना जाता था। लॉटरी कमेटी ने शहर का एक नया नक्शा बनवाया जिससे कलकत्ता की एक मुकम्मल तसवीर सामने आ सके। कमेटी की प्रमुख गतिविधियों में शहर के हिंदुस्तानी आबादी वाले हिस्से में सड़क-निर्माण और नदी किनारे से अवैध कब्जे हटाना शामिल था। शहर के भारतीय हिस्से को साफ-सुथरा बनाने की मुहिम में कमेटी ने बहुत सारी झोंपडि़यों को साफ कर दिया और मेहनतकश गरीबों को वहाँ से बाहर निकाल दिया। उन्हें कलकत्ता के बाहरी किनारे पर जगह दी गई।बार-बार आग लगने की घटना के चलते फूंस की झोंपडि़यों को अवैध घोषित कर दिया गया और मकानों में ईंटों की छत को अनिवार्य बना दिया गया।
वे विशिष्ट प्रकार की आर्थिक गतिविधियों और संस्कृतियों के प्रतिनिधि बन कर उभरे। लोग ग्रामीण अंचलों में खेती, जंगलों में संग्रहण या पशुपालन के द्वारा जीवन निर्वाह करते थे। इसके विपरीत कस्बों में शिल्पकार, व्यापारी, प्रशासक तथा शासक रहते थे। कस्बों का ग्रामीण जनता पर प्रभुत्व होता था और वे खेती से प्राप्त करों और अधिशेष ले आधार पर फलते-फूलते थे।अकसर कस्बों और शहरों की किलेबन्दी की जाती थी जो ग्रामीण क्षेत्रों से इनकी पृथकता को चिन्हित करती थी।
फिर भी कस्बों और गाँवों के बीच की पृथकता अनिश्चित होती थी। किसान तीर्थ करने के लिए लम्बी दूरियाँ तय करते थे और कस्बों से होकर गुजरते थे, वे अकाल के समय कस्बों में जमा भी हो जाते थे। इसके अतिरिक्त लोगों और माल का कस्बों से गाँवों की ओर विपरीत गमन भी था।जब कस्बों पर आक्रमण होते थे तो लोग अकसर ग्रामीण क्षेत्रों में शरण लेते थे। व्यापारी और फेरीवाले व कस्बों से माल गाँव ले जाकर बेचते थे, जिसके द्वारा बाजारों का फैलाव और उपभोग की नयी शैलियों का सृजन होता था।
छावनियों की तरह हिल स्टेशन (पर्वतीय सैरगाह)भी औपनिवेशिक शहरी विकास का एक ख़ास पहलू थी। हिल स्टेशनों की स्थापना और बसावट का संबंध् सबसे पहले ब्रिटिश सेना की जरूरतों से था। ये हिल स्टेशन फौजियों को ठहराने, सरहद की चौकसी करने और दुश्मन के खि़लाफ हमला बोलने के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान थे। भारतीय पहाड़ों की मृदु और ठंडी जलवायु को फायदे की चीज माना जाता था, ख़ासतौर से इसलिए कि अंग्रेज गर्म मौसम को बीमारियाँ पैदा करने वाला मानते थे। सेना की भारी-भरकम मौजूदगी के कारण ये स्थान पहाडि़यों में एक नयी तरह की छावनी बन गये। इन हिल स्टेशनों को सेनेटोरियम के रूप में भी विकसित किया गया था। क्योंकि हिल स्टेशनों की जलवायु यूरोप की ठंडी जलवायु से मिलती-जुलती थी इसलिए नये शासकों को वहाँ की आबो-हवा काफी लुभाती थी। वायसराय अपने पूरे अमले के साथ हर साल गर्मियों में हिल स्टेशनों पर ही डेरा डाल लिया करते थे। 1864 में वायसराय जॉन लॉरेंस ने अधिकृत रूप से अपनी काउंसिल शिमला में स्थानांतरित कर दी और इस तरह गर्म मौसम में राजधानियाँ बदलने के सिलसिले पर विराम लगा दिया। शिमला भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ (प्रधान सेनापति) का भी अधिकृत आवास बन गया।
यद्यपि हिल स्टेशन अंग्रेज प्रशासन की राजनीतिक आवश्यकताओं की वजह से अस्तित्व में आया था तथापि 18 वीं सदी के जीवन में इसका अपना सामाजिक आर्थिक महत्व था। पर्वतीय स्थानों पर ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय लोग अपने घर जैसी मिलती-जुलती बस्तियाँ बसाना चाहते थे।
सामाजिक दावत, चाय, बैठक, पिकनिक, रात्रिभोज, मेले, रेस और रंगमंच जैसी घटनाओं के रूप में यूरोपीयों का सामाजिक जीवन भी एक ख़ास किस्म का था। रेलवे के आने से ये पर्वतीय सैरगाहें बहुत तरह के लोगों की पहुँच में आ गईं। अब भारतीय भी वहाँ जाने लगे। उच्च और मध्यवर्गीय लोग, महाराजा, वकील और व्यापारी सैर-सपाटे के लिए इन स्थानों पर जाने लगे। वहाँ उन्हें शासक यूरोपीय अभिजन के निकट होने का संतोष मिलता था। हिल स्टेशन औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्त्वपूर्ण थे। पास के हुए इलाकों में चाय और कॉफी बागानों की स्थापना से मैदानी इलाकों से बड़ी संख्या में मजदूर वहाँ आने लगे।
शहरों में नए सामाजिक समूह बने तथा लोगों की पुरानी पहचानें महत्त्वपूर्ण नहीं रहीं। तमाम वर्गों के लोग बड़े शहरों में आने लगे। क्लर्कों, शिक्षकों, वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, अकाउंटेंट्स की माँग बढ़ती जा रही थी। नतीजा, मध्यवर्ग ̧ बढ़ता गया। उनके पास स्कूल , कॉलेज और लाइब्रेरी जैसे नए शिक्षा संस्थानों तक अच्छी पहुँच थी। शिक्षित होने के नाते वे समाज और सरकार के बारे में अख़बारों, पत्रिकाओं और सार्वजनिक सभाओं में अपनी राय व्यक्त कर सकते थे। बहस और चर्चा का एक नया सार्वजनिक दायरा पैदा हुआ। सामाजिक रीति-रिवाज, कायदे-कानून और तौर-तरीकों पर सवाल उठने लगे।
औपनिवेशिक शहरों के विकास के साथ पश्चिमी विचारों का प्रसार हुआ जिसने भारतीय शहरों और समाज को प्रभावित किया। शहरों में औरतों के लिए नए अवसर थे। पत्र-पत्रिकाओं, आत्मकथाओं और पुस्तकों के माध्यम से मध्यवर्गीय औरतें ख़ुद को अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रही थीं। परंपरागत पितृसत्तात्मक कायदे-कानूनों को बदलने की इन कोशिशों से बहुत सारे लोगों को असंतोष था। रूढि़वादियों को भय था कि अगर औरतें पढ़-लिख गईं तो वे दुनिया को उलट कर रख देंगी और पूरी सामाजिक व्यवस्था का आधर ख़तरे में पड़ जाएगा। यहाँ तक कि महिलाओं की शिक्षा का समर्थन करने वाले सुधारक भी औरतों को माँ और पत्नी की परंपरागत भूमिकाओं में ही देखते थे और चाहते थे कि वे घर की चारदीवारी के भीतर ही रहें। समय बीतने के साथ सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी। वे नौकरानी और फैक्ट्री मजदूर, शिक्षिका, रंगकर्मी और फिल्म कलाकार के रूप में शहर के नए व्यवसायों में दाखि़ल होने लगीं। लेकिन ऐसी महिलाओं को लंबे समय तक सामाजिक रूप से सम्मानित नहीं माना जाता था जो घर से निकलकर सार्वजनिक स्थानों में जा रही थीं।
जैसे -जैसे बम्बई की अर्थव्यवस्था फैली, उन्नीसवीं सदी के मध्य से उस समय बहुत सारी नयी इमारतें बनाई गईं। इन इमारतों में शासकों की संस्कृति और आत्मविश्वास झलकता था। इनकी स्थापत्य या वास्तु शैली यूरोपीय शैली पर आधरित थी। यूरोपीय शैलियों के इस आयात में शाही दृष्टि कई तरह से दिखाई देती थी। पहली बात, इसमें एक अजनबी देश में जाना-पहचाना सा भूदृश्य रचने की और उपनिवेश में भी घर जैसा महसूस करने की अंग्रेजों की चाह प्रतिबिंबित होती है। दूसरा, अंग्रेजों को लगता था कि यूरोपीय शैली उनकी श्रेष्ठता, अधिकार और सत्ता का प्रतीक होगी। तीसरा, वे सोचते थे कि यूरोपीय ढंग की दिखने वाली इमारतों से औपनिवेशिक स्वामियों और भारतीय प्रजा के बीच फर्क और फासला साफ दिखने लगेगा।
सार्वजनिक भवनों के लिए मौटे तौर पर तीन स्थापत्य शैलियों का प्रयोग किया गया। दो शैलियाँ उस समय इंग्लैंड में प्रचलित चलन से आयातित थीं। इनमें से एक शैली को नवशास्त्रीय या नियोक्लासिकल शैली कहा जाता था। बड़े-बड़े स्तंभों के पीछे रेखागणितीय संरचनाओं का निर्माण इस शैली की विशेषता थी। यह शैली मूल रूप से प्राचीन रोम की भवन निर्माण शैली से निकली थी जिसे यूरोपीय पुनर्जागरण के दौरान पुनर्जीवित, संशोधित और लोकप्रिय किया गया। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए उसे ख़ास तौर से अनुकूल माना जाता था। अंग्रेजों को लगता था कि जिस शैली में शाही रोम की भव्यता दिखाई देती थी उसे शाही भारत के वैभव की अभिव्यक्ति के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है।
एक और शैली जिसका काफी इस्तेमाल किया गया वह नव-गोथिक शैली थी। ऊंची उठी हुई छतें, नोकदार मेहराबें और बारीक साज-सज्जा इस शैली की खासियत होती है। गोथिक शैली का जन्म इमारतों, ख़ासतौर से गिरजों से हुआ था जो मध्यकाल में उत्तरी यूरोप में काफी बनाए गए। नव- गोथिक शैली को इंग्लैंड मेंउन्नीसवीं सदी के मध्य में दोबारा अपनाया गया। यह वही समय था जब बम्बई में सरकार बुनियादी ढाँचे का निर्माण कर रही थी। उसके लिए यही शैली चुनी गई।
नव- गोथिक शैली का सबसे बेहतरीन उदाहरण विक्टोरिया टर्मिनस है जो ग्रेट इंडियन पेनिन्स्युलर रेलवे कंपनी का स्टेशन और मुख्यालय हुआ करता था।अंग्रेजों ने शहरों में रेलवे स्टेशनों के डिजाइन और निर्माण में काफी निवेश किया था क्योंकि वे एक अखिल भारतीय रेलवे नेटवर्क के सफल निर्माण को अपनी एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानते थे। मध्य बम्बई के आसमान पर इन्हीं इमारतों का दबदबा था और उनकी नव- गोथिक शैली शहर को एक विशिष्ट चरित्र प्रदान करती थी।
बीसवीं सदी की शुरुआत में एक नयी मिश्रित स्थापत्य शैली विकसित हुई जिसमें भारतीय और यूरोपीय, दोनों तरह की शैलियों के तत्व थे। इस शैली को इंडो-सारासेनिक शैली का नाम दिया गया था। सार्वजनिक वास्तु शिल्प में भारतीय शैलियों का समावेश करके अंग्रेज यह साबित करना चाहते थे कि वे यहाँ के वैध और स्वाभाविक शासक हैं। राजा जॉर्ज पंचम और उनकी पत्नी मेरी के स्वागत के लिए 1911 में गेटवे ऑफ़ इंडिया बनाया गया। यह परंपरागत गुजराती शैली का प्रसिद्ध उदाहरण है।
नगर-नियोजन का काम सरकार की मदद से लॉटरी कमेटी (1817) ने जारी रखा। लॉटरी कमेटी का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि नगर सुधार के लिए पैसे की व्यवस्था जनता के बीच लॉटरी बेचकर ही की जाती थी। इसका मतलब है कि उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों तक शहर के विकास के लिए पैसे की व्यवस्था करना अभी भी केवल सरकार की नहीं बल्कि संवेदनशील नागरिकों की जिम्मेदारी ही माना जाता था। लॉटरी कमेटी ने शहर का एक नया नक्शा बनवाया जिससे कलकत्ता की एक मुकम्मल तसवीर सामने आ सके। कमेटी की प्रमुख गतिविधियों में शहर के हिंदुस्तानी आबादी वाले हिस्से में सड़क-निर्माण और नदी किनारे से अवैध कब्जे हटाना शामिल था। शहर के भारतीय हिस्से को साफ-सुथरा बनाने की मुहिम में कमेटी ने बहुत सारी झोंपडि़यों को साफ कर दिया और मेहनतकश गरीबों को वहाँ से बाहर निकाल दिया। उन्हें कलकत्ता के बाहरी किनारे पर जगह दी गई।बार-बार आग लगने की घटना के चलते फूंस की झोंपडि़यों को अवैध घोषित कर दिया गया और मकानों में ईंटों की छत को अनिवार्य बना दिया गया।
छावनियों की तरह हिल स्टेशन (पर्वतीय सैरगाह)भी औपनिवेशिक शहरी विकास का एक ख़ास पहलू थी। हिल स्टेशनों की स्थापना और बसावट का संबंध् सबसे पहले ब्रिटिश सेना की जरूरतों से था। ये हिल स्टेशन फौजियों को ठहराने, सरहद की चौकसी करने और दुश्मन के खि़लाफ हमला बोलने के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान थे। भारतीय पहाड़ों की मृदु और ठंडी जलवायु को फायदे की चीज माना जाता था, ख़ासतौर से इसलिए कि अंग्रेज गर्म मौसम को बीमारियाँ पैदा करने वाला मानते थे। सेना की भारी-भरकम मौजूदगी के कारण ये स्थान पहाडि़यों में एक नयी तरह की छावनी बन गये। इन हिल स्टेशनों को सेनेटोरियम के रूप में भी विकसित किया गया था। क्योंकि हिल स्टेशनों की जलवायु यूरोप की ठंडी जलवायु से मिलती-जुलती थी इसलिए नये शासकों को वहाँ की आबो-हवा काफी लुभाती थी। वायसराय अपने पूरे अमले के साथ हर साल गर्मियों में हिल स्टेशनों पर ही डेरा डाल लिया करते थे। 1864 में वायसराय जॉन लॉरेंस ने अधिकृत रूप से अपनी काउंसिल शिमला में स्थानांतरित कर दी और इस तरह गर्म मौसम में राजधानियाँ बदलने के सिलसिले पर विराम लगा दिया। शिमला भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ (प्रधान सेनापति) का भी अधिकृत आवास बन गया।
औपनिवेशिक शहरों के विकास के साथ पश्चिमी विचारों का प्रसार हुआ जिसने भारतीय शहरों और समाज को प्रभावित किया। शहरों में औरतों के लिए नए अवसर थे। पत्र-पत्रिकाओं, आत्मकथाओं और पुस्तकों के माध्यम से मध्यवर्गीय औरतें ख़ुद को अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रही थीं। परंपरागत पितृसत्तात्मक कायदे-कानूनों को बदलने की इन कोशिशों से बहुत सारे लोगों को असंतोष था। रूढि़वादियों को भय था कि अगर औरतें पढ़-लिख गईं तो वे दुनिया को उलट कर रख देंगी और पूरी सामाजिक व्यवस्था का आधर ख़तरे में पड़ जाएगा। यहाँ तक कि महिलाओं की शिक्षा का समर्थन करने वाले सुधारक भी औरतों को माँ और पत्नी की परंपरागत भूमिकाओं में ही देखते थे और चाहते थे कि वे घर की चारदीवारी के भीतर ही रहें। समय बीतने के साथ सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी। वे नौकरानी और फैक्ट्री मजदूर, शिक्षिका, रंगकर्मी और फिल्म कलाकार के रूप में शहर के नए व्यवसायों में दाखि़ल होने लगीं। लेकिन ऐसी महिलाओं को लंबे समय तक सामाजिक रूप से सम्मानित नहीं माना जाता था जो घर से निकलकर सार्वजनिक स्थानों में जा रही थीं।
कस्बों को सामान्यतः ग्रामीण इलाकों के विपरीत परिभाषित किया जाता था।वे विशिष्ट प्रकार की आर्थिक गतिविधियों और संस्कृतियों के प्रतिनिधि बन कर उभरे। लोग ग्रामीण अंचलों में खेती, जंगलों में संग्रहण या पशुपालन के द्वारा जीवन निर्वाह करते थे। इसके विपरीत कस्बों में शिल्पकार, व्यापारी, प्रशासक तथा शासक रहते थे। कस्बों का ग्रामीण जनता पर प्रभुत्व होता था और वे खेती से प्राप्त करों और अधिशेष ले आधार पर फलते-फूलते थे।अकसर कस्बों और शहरों की किलेबन्दी की जाती थी जो ग्रामीण क्षेत्रों से इनकी पृथकता को चिन्हित करती थी।
फिर भी कस्बों और गाँवों के बीच की पृथकता अनिश्चित होती थी। किसान तीर्थ करने के लिए लम्बी दूरियाँ तय करते थे और कस्बों से होकर गुजरते थे, वे अकाल के समय कस्बों में जमा भी हो जाते थे। इसके अतिरिक्त लोगों और माल का कस्बों से गाँवों की ओर विपरीत गमन भी था।जब कस्बों पर आक्रमण होते थे तो लोग अकसर ग्रामीण क्षेत्रों में शरण लेते थे। व्यापारी और फेरीवाले व कस्बों से माल गाँव ले जाकर बेचते थे, जिसके द्वारा बाजारों का फैलाव और उपभोग की नयी शैलियों का सृजन होता था।
मध्यकालीन शहरों में शासक वर्ग के वर्चस्व वाली सामाजिक व्यवस्था में हरेक से अपेक्षा की जाती थी कि उसे समाज में अपना स्थान पता हो। उत्तर भारत में इस व्यवस्था को बनाए रखने का कार्य कोतवाल नामक राजकीय अधिकारी का होता था जो नगर में आंतरिक मामलों पर नजर रखता था और कानून-व्यवस्था बनाए रखता था।
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में मुगलों द्वारा बनाए गए शहर जनसंख्या के केन्द्रीकरण, अपने विशाल भवनों तथा अपनी शाही शोभा व समृद्धि के लिए प्रसिद्ध थे। आगरा, दिल्ली और लाहौर शाही प्रशासन और सत्ता के महत्त्वपूर्ण केंद्र थे। मनसबदार और जागीरदार जिन्हें साम्राज्य के अलग-अलग भागों में क्षेत्र दिये गए थे, सामान्यतः इन शहरों में अपने आवास रखते थे: इन सत्ता केन्द्रों में आवास एक अमीर की स्थिति और प्रतिष्ठा का संकेतक था।
इन केन्द्रों में सम्राट और कुलीन वर्ग की उपस्थिति के कारण वहाँ कई प्रकार की सेवाएँ प्रदान करना आवश्यक था। शिल्पकार कुलीन वर्ग के परिवारों के लिए विशिष्ट हस्तशिल्प का उत्पादन करते थे। ग्रामीण अंचलों से शहर के बाजारों में निवासियों और सेना के लिए अनाज लाया जाता था। राजकोष भी शाही राजधानी में ही स्थित था। इसलिए राज्य का राजस्व भी नियमित रूप से राजधानी में आता रहता था। सम्राट एक किलेबन्द महल में रहता था और नगर एक दीवार से घिरा होता था जिसमें अलग-अलग द्वारों से आने-जाने पर नियंत्रण रखा जाता था। नगरों के भीतर उद्यान, मस्जिदें, मन्दिर,मकबरे, महाविद्यालय, बाजार तथा कारवाँ सराय स्थिति होती थीं। 16 वीं और 17 वीं शताब्दी के दौरान उत्तर भारत में शहर का केंद्र, महल और मुख्य मस्जिद की ओर उन्मुख किया गया था।
अवध के अधिग्रहण से सिर्फ नवाब की ही गद्दी नहीं छिनी थी। इसने इलाके के ताल्लुकदारों को भी लाचार कर दिया था। अवध के समूचे देहात में ताल्लुकदारों की जागीरें और किले बिखरे हुए थे। ये लोग पीढि़यों से अपने इलाकों में जमीन और सत्ता पर नियंत्रण रखते आए थे। अंग्रेजों के आने से पहले ताल्लुकदारों के पास हथियारबंद सिपाही होते थे। उनके अपने व किले थे। अगर वे नवाब की संप्रभुता को स्वीकार कर लें और अपने ताल्लुकदार का राजस्व चुकाते रहें तो उनके पास काफी स्वायत्तता भी होती थी। कुछ बड़े ताल्लुकदारों के पास तो 12,000 तक पैदल सिपाही होते थे। छोटे-मोटे ताल्लुकदारों के पास भी 200 सिपाहियों की टुकड़ी तो होती ही थी। अंग्रेज इन ताल्लुकदारों की सत्ता को बरदाश्त करने के लिए कतई तैयार नहीं थे। अधिग्रहण के फौरन बाद ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं। उनके दुर्ग ध्वस्त कर दिए गए।
ब्रिटिश भूराजस्व नीति ने ताल्लुकदारों की हैसियत व सत्ता को और चोट पहुँचाई। अधिग्रहण के बाद 1856 में एकमुश्त बंदोबस्त के नाम से ब्रिटिश भूराजस्व व्यवस्था लागू कर दी गई। यह बंदोबस्त इस मान्यता पर आधारित था कि ताल्लुकदार बिचौलिए थे जिनके पास जमीन का मालिकाना नहीं था। उन्होंने बल और धोखाधड़ी के जरिए अपना प्रभुत्व स्थापित किया हुआ था। एकमुश्त बंदोबस्त में ताल्लुकदारों को उनकी जमीनों से बेदखल किया जाने लगा। आंकड़ों से पता चलता है कि अंग्रेजों के आने से पहले ताल्लुकदारों के पास अवध के 67 प्रतिशत गाँव थे। एकमुश्त बंदोबस्त के लागू होने के बाद यह संख्या घटकर 38 प्रतिशत रह गई। दक्षिण अवध के ताल्लुकदारों को सबसे बुरी मार पड़ी। कुछ के तो आधे से ज्यादा गाँव हाथ से जाते रहे। ब्रिटिश भूराजस्व अधिकारियों का मानना था कि ताल्लुकदारों को हटाकर वे जमीन असली मालिकों के हाथ में सौंप देंगे जिससे किसानों के शोषण में कमी आएगी और राजस्व वसूली में इजाफा होगा। वास्तव में ऐसा नहीं हुआ। भूराजस्व वसूली में तो इजाफा हुआ लेकिन किसानों के बोझ में कमी नहीं आई। अधिकारियों को जल्दी ही समझ में आने लगा कि अवध के बहुत सारे इलाकों का मूल्य निर्धारण बहुत बढ़ा-चढ़ा कर किया गया था। कुछ स्थानों पर तो राजस्व माँग में 30 से 70 प्रतिशत तक इजाफा हो गया था। यानी न तो ताल्लुकदारों के पास और न ही काश्तकारों के पास इस अधिग्रहण पर ख़ुशी जताने का कोई कारण था। ताल्लुकदारों की सत्ता छिनने का नतीजा यह हुआ कि एक पूरी सामाजिक व्यवस्था भंग हो गई। निष्ठा और संरक्षण के जिन बंधनों से किसान ताल्लुकदारों के साथ बँधे हुए थे वे अस्त-व्यस्त हो गए। अंग्रेजों से पहले ताल्लुकदार ही जनता का उत्पीड़न करते थे लेकिन जनता की नजर में बहुत सारे ताल्लुकदार दयालु अभिभावक की छवि भी रखते थे। वे किसानों से तरह-तरह के मद में पैसा तो वसूलते थे लेकिन बुरे वक्त में किसानों की मदद भी करते थे। अब अंग्रेजों के राज में किसान मनमाने राजस्व आकलन और गैर-लचीली राजस्व व्यवस्था के तहत बुरी तरह पिसने लगे थे। अब इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि कठिन वक्त में या फसल खराब हो जाने पर सरकार राजस्व माँग में कोई कमी करेगी या वसूली को कुछ समय के लिए टाल दिया जाएगा। ना ही किसानों को इस बात की उम्मीद थी कि तीज-त्यौहारों पर कोई कर्जा और मदद मिल पाएगी जो पहले ताल्लुकदारों से मिल जाती थी। अवध जैसे जिन इलाकों में 1857 के दौरान प्रतिरोध बेहद सघन और लंबा चला था वहाँ लड़ाई की बागडोर असल में ताल्लुकदारों और उनके किसानों के ही हाथों में थी। बहुत सारे ताल्लुकदारों अवध के नवाब के प्रति निष्ठा रखते थे इसलिए वे अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए लखनउ जाकर बेगम हजरत महल (नवाब की पत्नी) के खेमे में शामिल हो गए। उनमें से कुछ तो बेगम की पराजय के बाद भी उनके साथ डटे रहे।
प्लासी की लड़ाई 23 जून 1757 को पश्चिम बंगाल के पलाशी में भागीरथी नदी के तट पर हुई थी ।
A. डच।
B. फ्रेंच।
C. अंग्रेज़ी।
D. पुर्तगाली।
मसुलीपट्नम को मछलीपट्नम भी कहा जाता है। इस शहर का नाम इसके दरवाज़े से पड़ा जिसे मछली की आँखों से सजाया गया था।आज यह शहर आंध्र प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी या कोरामंडल तट पर स्थित है।
A. 1676.
B. 1675.
C. 1674.
D. 1673.
1498 में जब वास्को डा गामा ने भारत के समुद्री मार्ग की खोज की, बहुत से यूरोपीय देशों ने यहाँ अपने व्यापर स्थल स्थापित करने की कोशिश की।फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी को वहां के सम्राट ने अधिकार पत्र दिया।यह कंपनी एक सरकारी उद्यम थी।जब यह भारत पहुंचे, अधिकांश यूरोपीय कंपनियां यहाँ अपने ठिकानों की स्थापना कर चुके थे।
1857 के बाद दिल्ली सीधे तौर पर अंग्रेजी सम्राट के तहत आ गई थी।सन 1911 में दिल्ली को औपनिवेशिक भारत की राजधानी घोषित कर दिया गया था और एक नई राजनीतिक और प्रशासनिक राजधानी की योजना वास्तुकारों द्वारा तय्यार की जाने लगी।
1854 के वुड्स डिस्पैच का नतीजा था कि भारत में विश्वविद्यालय स्थापित किये गए|इस डिस्पैच ने भारत में शिक्षा के माध्यम को लेकर विवाद को ख़त्म कर दिया था|
अंग्रेजों ने कलकत्ता, मद्रास और बंबई के लिए योजनाएं बनाना शुरू कर दीं क्योंकि वह भारतीय लोगों से सुरक्षित दूरी पर रहना चाहते थे। शहरों की बढ़ती आबादी ने उन्हें मजबूर किया कि वह योजनाएं बनाएं ताकि भीड़ को कम किया जा सके। लाटरी समिति को यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि शहरों के योजनाबद्ध विकास के लिए धन जुटाने के लिए सार्वजनिक लाटरी को माध्यम बनाया गया था।
A. 1870.
B. 1871.
C. 1872.
D. 1873.
सन 1881 से, हर 10 वर्ष पर भारत में जनगणना औपनिवेशिक सरकार की विशेषता बन गई थी।जमा किये गए आंकड़े एक बहुमूल्य स्रोत थे शहरीकरण की प्रक्रिया के विकास के अध्ययन के लिए
A. मद्रास।
B. पांडिचेरी।
C. मसुलिपत्नम
D. पणजी।
हॉलैंड के लोगों को डच कहा जाता है। डच लोगों का एक जातीय समूह है जिनकी एक ख़ास संस्कृति है और वह डच भाषा बोलते हैं। डच लोग और उनके वंशज दुनिया भर में प्रवासी समुदायों में पाए जाते हैं, जैसे - सूरीनाम, चिली, ब्राजील, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, और संयुक्त राज्य अमेरिका में विशेष रूप से।
A. 1818
B. 1881
C. 1971
D. 1991
मद्रास चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स के आग्रह से मद्रास बंदरगाह का निर्णाम सन 1876 में शुरू हुआ और सन 1881 में पूरा हुआ।
A. हिंदू।
B. मुस्लिम।
C. यहूदी।
D. पारसी।
सारासेन शब्द का प्रयोग अरब मुसलमानों के लिए यूरोपियों द्वारा किया जाता था।ईसाई साहित्य में इसका मतलब होता था 'जो लोग सारा से नहीं हैं'।सारा इब्राहीम की पत्नी थीं जिनका वर्णन क़ुरान में है।
A. डच।
B. डेनिश।
C. पुर्तगाली।
D. फ्रेंच।
फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी से प्रतिद्वंदिता के कारण अँगरेज़ असुरक्षित महसूस करते थे, इसलिए उन्होंने मद्रास को किलेबंद कर दिया। 1761 में फ्रांसीसियों की पराजय के बाद मद्रास ज़्यादा सुरक्षित हो गया और एक महत्त्वपूर्ण व्यापर नगरी के रूप में विकसित हुआ।
A. तमिल।
B. कन्नड़।
C. बंगाली।
D. तेलुगु
‘पेट’ तमिल भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है बस्ती ।
A. 1510.
B. 1511.
C. 1512.
D. 1513.
अलफोंसो डी अलबकुरक के नेतृत्व में पोर्तुगालियोँ ने 1510 में गोवा पर क़ब्ज़ा कर लिया था।उन्होंने पणजी में पोर्तुगालियों का केंद्र स्थापित किया।यह एक विडम्बना है कि जिस इलाक़े को भारत ने सबसे पहले खोया था, आज़ादी के 14 साल बाद उसे वापस हासिल कर सका।
A. बंबई।
B. कोलकाता।
C. मद्रास।
D. मिर्जापुर।
स्वतंत्र भारत की न्याय प्रणाली 19वीं सदी के मध्य में अंग्रेजों द्वारा स्थापित न्याय प्रणाली पर आधारित है।अंग्रेजों के आने से पहले भारत में कोई समान न्याय प्रणाली या न्यायपालिका नहीं थी।
A. बोनोदिनी की राख।
B. किस्मत की एक लकीर।
C. अमर कथा।
D. पुरानी लेकिन अद्भुत।
बिनोदिनी दासी पहली दक्षिणी एशियाई अभिनेत्री थीं जिन्होंने अपनी आत्म कथा लिखी। उनकी आत्म कथा का शीर्षक था 'अमर कथा' यानी मेरी कहानी।
A. कोलकाता।
B. बंबई।
C. मद्रास।
D. मसुलिपतनम
मद्रासपटम में एक व्यापर पोस्ट का निर्माण करने के बाद, ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेंट 1639 में मद्रास में बस गए थे।इस बस्ती को वहां के स्थानीय लोग चेन्नापट्टनम के नाम से जानते थे, जो आज चेन्नई कहलाता है।
A. बस्ती
B. गंज।
C. क़स्बह
D. सरसं
गंज उपनिवेशिक भारत में एक निश्चित बाजार को कहा जाता था, जहाँ स्थानीय लोगों की ज़रूरतें पूरी होती थीं और वह अपना माल बेच सकते थे।
सन 1661 में इंग्लैंड के राजा ने बंबई ईस्ट इंडिया कंपनी को दिया था, जिसने खुद बंबई को पुर्तगाल के राजा से अपनी पत्नी के दहेज़ के तौर पर प्राप्त किया था।
A. शिमला।
B. बंबई।
C. मद्रास।
D. दिल्ली।
1864 में सर जॉन लॉरेंस ने लार्ड एल्गिन के बाद भारत के वाइसरॉय की गद्दी संभाली।वाइसरॉय बनने के बाद सर जॉन लॉरेंस ने अपने परिषद् को शिमला स्थानांतरित कर दिया था।
A. दिल्ली में
B. अमृतसर में
C. लाहौर में
D. अहमदाबाद में
नरसंहार,जोअमृतसर नरसंहार के रूप में जाना जाता है, 13 अप्रैल को हुआ था
A. लॉर्ड कर्जन।
B. लॉर्ड लिनलिथगो।
C. लार्ड विलिंग्डन।
D. लार्ड वेवेल।
लार्ड विलिंग्डन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए कोई सहानुभूति नहीं रखता था
महात्मा गाँधी ने निम्न जातियों के लिए पृथक निर्वाचिका की मांग का विरोध किया। उनका मानना था कि ऐसा करने पर समाज की मुख्यधारा में उनका एकीकरण नहीं हो पाएगा और वे सवर्ण हिंदुओं से हमेशा के लिए अलग रह जाएगे।
अंग्रेजों द्वारा आंदोलनकारियों पर गोली चलाये जाने के विरोध में अमृतसर के जालियाँ वाला बाग में 13 अप्रेल 1919 को सार्वजनिक सभा बुलाई गई। जहाँ पर जनरल डायर ने निहत्थे नागरिकों पर अपने सैनिक द्वारा गोलियाँ बरसाई।
कांग्रेस ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था ।
भारत में केवल मद्रास की जस्टिस पार्टी ने साइमन कमीशन का स्वागत किया था ।