A.
लागत मूल्य
B.
बाज़ार मूल्य
C.
लागत या बाज़ार मूल्य जो भी कम हो
D.
प्रतिस्थापन मूल्य
नियत सम्पत्तियों को व्यापार में दीर्घ अवधि प्रयोग के लिए खरीदा जाता है न कि दोबारा बिक्री के लिए। इन्हें लागत मूल्य के रूप में दिखाया जाता है।
A.
स्टोर और अतिरिक्त पुर्जे
B.
कार्य प्रगति में हैं
C.
खुले उपकरण
D.
उपरोक्त सभी
सूचियों में ये सब सम्मिलित होता है क- कच्चा माल, ख- प्रगति में कार्य, ग- तैयार उत्पाद घ- व्यापार में स्टॉक च- स्टोर और अतिरिक्त पुर्जे च- खुले उपकरण
A.
3 माह
B.
12 माह
C.
दो वर्ष
D.
तीन वर्ष
जब सामान्य परिचालन चक्र को पहंचाना नहीं जा सकता है तो यह माना जाता है कि इसकी अवधि 12 माह है। एक परिचालन चक्र प्रसंस्करण के लिए परिसम्पत्तियों के अधिग्रहण और उन्हें रोकड़ या रोकड़ समतुल्य में भुनाने के बीच का समय है।
A.
गैर चालू दायित्वों के अंतर्गत दीर्घ अवधि उधार
B.
चालू दायित्वों के अंतर्गत अन्य चालू दायित्व
C.
चालू दायित्वों के अंतर्गत लघु अवधि उधार
D.
गैर चालू दायित्वों के अंतर्गत अन्य दीर्घ अवधि दायित्व
12 माह के बाद व्यापार भुगतान योग्य गैर चालू दायित्वों के अंतर्गत अन्य दीर्घ अवधि दायित्व में प्रदर्शित किए जाते हैं।
A.
तरलता
B.
वित्तीय स्थिति
C.
स्थायित्व
D.
राशि में वृद्धि के लिए
किसी भी कम्पनी का चिट्ठा स्थायित्व क्रम में तैयार किया जाता है। नियत संपत्तियों को संपत्ति की तरफ में शीर्ष में दिखाया जाता और शेयर पूंजी को दायित्व की तरफ शीर्ष पर।
A.
वेतन और मजदूरी
B.
प्रोविडेंट फंड में योगदान
C.
कर्मचारी कल्याण व्यय जैसे कैंटीन व्यय
D.
उपरोक्त सभी
कर्मचारी लाभ व्यय, व्यय के अंतर्गत एक मद होता है। इसमें सभी तीन मद सम्मिलित होते हैं।
A.
वह, जिसे हितधारकों के अधिकार के बिना जारी न किया जा सके
B.
वह, जिसे निदेशक मंडल की अनुमति के बिना जारी न किया जा सके
C.
वह, जिसके साथ कम्पनी पंजीकृत है
D.
वह, जिसे कम्पनी के प्रमोटर के लिए जारी किया जाता है
अधिकृत पूंजी वह पूंजी है जिसके साथ कम्पनी पंजीकृत होती है।
A.
प्रदत्त पूंजी में जोड़ा जाएगा
B.
प्रदत्त पूंजी से घटाया जाएगा
C.
पूंजी संचय के रूप में दिखाया जाएगा
D.
संचय और अधिशेष के रूप में दिखाया जाएगा
सम्प्रह्त शेयर खाते में शेष को प्रदत्त पूंजी में जोड़ा जाएगा।
A.
अन्य चालू संपत्तियां
B.
अप्रत्यक्ष व्यय
C.
आकस्मिक दायित्व
D.
गैर चालू दायित्व
आकस्मिक दायित्व वे दायित्व हैं, जो अभी तक तो नहीं आए हैं, मगर वे किसी भी घटना के होने पर उत्पन्न हो सकते हैं। इनमें किसी कम्पनी के खिलाफ किए गए दावे सम्मिलित हैं, जिनकी पुष्टि ऋण के रूप में नहीं हुई है, कंपनी के द्वारा गारंटी दी गयी है और अन्य धन जिसके लिए कम्पनी पूरी तरह से उत्तरदायी है।
A.
शुभेच्छा
B.
पशुधन
C.
प्रारंभिक व्यय
D.
विविध देनदार ।
विविध देनदार चालू संपत्तियां हैं
A.
पत्रिका, लेजर और तलपट
B.
लेखा पुस्तकें
C.
लाभ और हानि विवरण और चिट्ठा
D.
अनुपात विश्लेषण और नकद प्रवाह विवरण
वित्तीय विवरण से आम तौर पर लाभ और हानि विवरण एवं चिट्ठे से अर्थ है। वृहद अर्थ में, इसमें रोकड़ प्रवाह विवरण सम्मिलित है।
A.
नहीं जारी हुई शेयर पूंजी
B.
पूंजी संचय
C.
संचय पूंजी
D.
तरल पूंजी
संचय पूंजी अनापेक्षित पूंजी का वह भाग है जिसका निर्धारण कम्पनी के द्वारा एक ख़ास संकल्प को पारित कर किया जाता है कि उसे तब तक नहीं माँगा जाएगा जब तक कम्पनी ही समाप्त नहीं हो जाती।
A.
शेयर पूंजी
B.
असुरक्षित ऋण
C.
संचय और अधिशेष
D.
निवेश
निवेश चिट्ठे की संपत्ति पक्ष की तरफ प्रदर्शित होता है।
कभी - कभी एक सार्वजनिक कम्पनी के प्रवर्तक को अपने निजी साधनों एवं संपर्कों द्वारा पूँजी एकत्रित करने का विश्वाश होता है। ऐसी दशा में कम्पनी जनता को अपने अंश खरीदने के लिए निमंत्रण नहीं देती है बल्कि अपने अंशों को निजी रूप से प्रवर्तकों, उनके मित्रों, सम्बंधियों, उसी समूह की अन्य कम्पनी के अंशधारियों, सामूहिक कोषों, अप्रवासी भारतीयों, वित्तीय संस्थानों जैसे कि भारतीय जीवन बीमा निगम, भारतीय यूनिट ट्रस्ट, भारतीय औधोगिक साख एवं विनियोग निगम आदि को विक्रय करते हैं।

ऐसे
अंशों के हरण के
समय जिनको प्रीमियम
पर निर्गर्मित
किया गया था, अंश पूँजी
खाते को मांगी
गई राशि के साथ
डेबिट किया जाता
है। जब प्रतिभूति
प्रीमियम की राशि
प्राप्त नहीं
हो तो अप्राप्त
राशि के साथ प्रतिभूति
प्रीमियम खाते
को डेबिट किया
जायेगा। बकाया
मांगों के खातों
को बकाया राशियों
के साथ क्रेडिट
किया जाता है तथा
हरण खाते को प्राप्त
राशि के साथ क्रेडिट
किया जाता है।
समता अंशधारियों को कम्पनी के स्वमियों के रूप में माना जाता है क्योंकि समता अंशधारियों को कम्पनी के समापन पर भुगतान किया जाता है। वे भुगतान में देरी के लिए दावा नहीं करते हैं। समता अंशधारी हमेशा उच्च जोखिम के स्तर पर होते हैं क्योंकि उनको लाभ तथा उनकी पूँजी की पुन: प्राप्ति सुनिश्चित नहीं होती है। ये लक्षण उन्हें कम्पनी के स्वामी के रूप में प्रदर्शित करते हैं।
कम्पनी एक अलग नाम तथा सीमित दायित्व के साथ व्यवसाय करने के उद्देश्य से गठित व्यक्तियों का एक स्वेच्छिक संघ होता है।
भारतीय कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार, “कम्पनी से आशय इस अधिनियम के अधीन निर्मित एवं पंजीकृत हुई कम्पनी से है अथवा ऐसी किसी विद्यमान कम्पनी से है जिसका निर्माण एक समामेलन इस अधिनियम के पूर्व के किसी कम्पनी अधिनियम के अधीन हुआ हो।”
हरण किए गए अंशों का पुनर्निगमन सम-मूल्य, प्रीमियम अथवा बट्टे पर किया जा सकता है। हरण किए गए अंशों को बट्टे पर जारी करने पर छूट किसी भी स्थिति में जब्त अंशों पर प्राप्त राशि से अधिक नहीं होनी चाहिए। जैसे, यदि रु 100 का एक अंश है जिस पर रु 60 प्राप्त हो चुके हैं और जिसे रु 40 प्राप्त न होने के कारण जब्त कर लिया गया है, तो इसके पुनर्निगमन पर रु 60 से अधिक बट्टा नहीं दिया जा सकता है।
संचित पूँजी – कभी-कभी विशेष प्रस्ताव के द्वारा कम्पनी यह निश्चित करती है कि न माँगी हुई पूँजी का कुछ भाग या पूरा भाग, जब तक कम्पनी का व्यापार चल रहा है, नहीं माँगा जाएगा। अन्य शब्दों में, वह पूँजी जो केवल कम्पनी के समापन पर ही माँगी जाएगी, संचित पूँजी कहलाती है।
पूर्वाधिकार अंश वे अंश होते हैं जिन्हें समता अंशों की तुलना में निम्न पूर्वाधिकार प्राप्त होते हैः
1. कम्पनी के लाभ में एक निश्चित दर से लाभांश प्राप्त करने का प्रथम अधिकार होता है।
2. इन अंशों के स्वामियों को कम्पनी के समापन पर प्रदत्त पूँजी वापस करने का प्रथम अधिकार होता है।
कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(84) के अनुसार अंश का तात्पर्य कम्पनी की अंश पूँजी में एक हिस्से से है। जब तक अंश तथा स्टॉक में स्पष्ट या गर्भित अंतर नहीं किया जाए, अंश में स्टॉक को भी सम्मिलित किया जाता है।
कम्पनी अधिनियम, 2013 के अर्न्तगत सार्वजनिक तथा प्राईवेट लिमिटेड कम्पनी के अतिरिक्त एक व्यक्ति कम्पनी का निर्माण भी किया जा सकता है। एक व्यक्ति कम्पनी का अर्थ है एक प्राईवेट लिमिटेड कम्पनी जिसमें केवल एक व्यक्ति ही सदस्य होगा [धारा-2 (62)]
सदस्य - केवल एक प्राकृतिक व्यक्ति ही जो भारत का नागरिक एवं निवासी हो एक व्यक्ति कम्पनी का सदस्य हो सकता है।
न्यूनतम चुकता र्पूजी - इसकी न्यूनतम चुकता पूँजी 1,00,000 रू0 होनी चाहिए।
उद्देश्य - इसका निर्माण व्यावसायिक कार्यों के लिए किया जा सकता है दान कार्यों के लिए नहीं।
संचालकों की संख्याः इसके संचालकों की संख्या कम से कम एक और अधिकतम 15 हो सकती है।
|
अंतर का आधार |
पूर्वाधिकार अंश |
साधारण (समता अंश) |
|
1. लाभांश प्राप्ति का अधिकार |
पूर्वाधिकार अंशो के धारकों को समता अंशों की तुलना में पहले लाभांश मिलता है। |
समता अंशे के धारकों को पूर्वाधिकार अंशों के धारकों को लाभांश का भुगतान होने पर ही लाभांश मिलता है। |
|
2. लाभांश की दर |
इनके लाभांश की दर पूर्व निश्चित होती है। |
इनके लाभांश की दर निश्चित नहीं होती है तथा घटती-बढ़ती रहती है। |
|
3. पूँजी की वापसी |
कम्पनी के समापन की स्थिति में पूर्वाधिकार अंशधारियों को समता अंशधारियों की तुलना में पूँजी वापस प्राप्त करने का पूर्वाधिकार होता है। |
समता अंशधारियों को कम्पनी के समापन की स्थिति में पूँजी सबसे बाद में वापस मिलती है। |
|
4. शोधन |
इनका शोधन पूर्व निर्धारित शर्तों के अनुसार किया जा सकता है। |
इनका शोधन कम्पनी के समापन पर ही होता है। कम्पनी अपने जीवन में अंशों को वापस भी क्रय कर सकती है। |
ऐसा संचय जिसे पूँजीगत लाभों में से बनाया जाता है उसे पूँजी संचय कहा जाता है। पूँजी संचयों को अंशधारियों को लाभांश के वितरण के लिए उपयोग में नहीं लिया जा सकता है।
पूँजी संचय का निर्माण निम्नलिखित पूँजीगत लाभों में से किया जा सकता हैः
1. स्थायी सम्पत्तियों के विक्रय पर लाभ।
2. स्थायी सम्पत्तियों के पुर्नमूल्यांकन पर लाभ।
3. अंशों के हरण तथा पुर्नर्निर्गमन पर लाभ।
4. अंशों तथा ऋणपत्रों के निर्गमन पर प्रीमियम।
5. ऋणपत्रों के शोधन पर लाभ।
6. एक कम्पनी के गठन के दौरान कमाया गया लाभ।



बकाया याचना तथा अग्रिम याचना में अंतरः
|
अंतर का आधार |
बकाया याचना |
अग्रिम याचना |
|
1. अर्थ |
जब कुछ अंशधारी कम्पनी द्वारा याचना की गई राशि का भुगतान नहीं करते तो उसे बकाया याचना कहते हैँ। |
यदि कोई अंशधारी भविष्य में की जाने वाली माँगों का भुगतान पहले ही कर देता है। इस प्रकार प्राप्त राशि को अग्रिम याचना कहते हैं। |
|
2. ब्याज |
इस पर ब्याज चार्ज किया जाता है। |
इस पर ब्याज दिया जाता है। |
|
3. ब्याज की दर |
10 % वार्षिक तालिका एफ के अनुसार। |
12 % वार्षिक तालिका एफ के अनुसार। |
|
4. अन्तर्नियम में प्रावधान |
इस सम्बन्ध में अन्तर्नियमों में कोई प्रावधान नहीं होता। |
एक कम्पनी तभी अग्रिम याचना स्वीकार कर सकती है यदि अन्तर्नियमों में प्रावधान है। |
यदि कोई कम्पनी अपने अंशों का निर्गमन अंकित मूल्य से अधिक मूल्य पर करती है, तो अंशों के ऐसे निर्गमन को अंशों का प्रीमियम पर निर्गमन करना कहते हैं।
प्रीमियम की यह राशि प्रतिभूति प्रीमियम संचय खाते के क्रेडिट में लिखी जाती है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 52(2) के अनुसार प्रीमियम की राशि निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए प्रयोग की जा सकती हैः
1. सदस्यों को पूर्णदत्त बोनस अंश जारी करने के लिए
2. प्रारम्भिक व्यय को कम्पनी की बहियों में से समाप्त करने के लिए
3. अंशों या ऋणपत्रों के जारी करने के व्यय या कमीशन तथा ऋणपत्रों के जारी करने के बट्टे की राशि को अपलिखित करने के लिए
4. पूर्वाधिकार अंशों या ऋणपत्रों के शोधन पर देय प्रीमियम की व्यवस्था करने के लिए तथा
5. कम्पनी द्वारा अपने अंशों को वापस क्रय करने के लिए।
1. पृथक वैधानिक अस्तित्व - कम्पनी एक कानूनी व्यक्ति है और इसका अस्तित्व इसके सदस्यों से पृथक होता है। कम्पनी आने नाम से सम्पत्तियों का क्रय - विक्रय कर सकती है, अपने नाम से बैंक में खाता खोल सकती है और अपने नाम में अनुबंध कर सकती है। क्योंकि इसका पृथक अस्तित्व होता है अतः कम्पनी का कोई भी ऋणदाता अपने ऋण को वसूल करने के लिए केवल कम्पनी पर ही वाद प्रस्तुत कर सकता है इसके किसी सदस्य पर नहीं।
2. स्थायी जीवन - कम्पनी के जीवन काल पर इसके सदस्यों के अवकाश ग्रहण, मृत्यू, पागलपन, दिवालियेपन आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अंशधारी आते रहते हैं और जाते रहते हैं परंतु कम्पनी हमेशा के लिए चलती रहती है, जब तक कि कम्नी अधिनियम के अनुसार इसका समापन न कर दिया जाए।
3. सीमित दायित्व - कम्पनी के अंशधारी का दायित्व उसके अंशों के अदत्त मूल्य तक सीमित होता है।
4. सार्वमुद्रा - क्योंकि कम्पनी का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता है अतः यह अपने एजेंटों के माध्यम से कार्य करती है जिन्हें संचालक कहते हैं। संचालकों द्वारा तैयार किए गए सभी प्रलेखों पर कम्पनी की सार्वमुद्रा अंकित होनी चाहिए। सार्वमुद्रा कम्पी के हस्ताक्षर का कार्य करती है।
5. अंशों की हस्तांतरणीयता - कम्पनी की पूँजी हिस्सों में विभाजित होती है और प्रत्येक हिस्से को अंश कहते हैं। यह अंश कुछ शर्तों के अंतर्गत स्वतंत्र रूप से हस्तांतरणीय होते हैं।
6. प्रबंध का स्वामित्व से अलग होना - अंशधारी कम्पनी के वास्तविक स्वामी होते हैं परंतु इनकी संख्या प्रायः बहुत अधिक होने के कारण न तो यह सम्भाव ही है और न ही उचित कि सभी अंशधारी कम्पनी के प्रतिदिन के प्रबंध में भाग ले सकें। अतः कम्पनी का प्रबंध अंशधारियों द्वारा चुने गए ‘संचालक मण्डल’ द्वारा किया जाता है।
अंशों का निम्न में से किसी भी विधि से निर्गमन किया जा सकता हैः-
अंशों का निजी निकायः- कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 42 के अनुसार कोई भी कम्पनी निजी रूप से भी अंशों का विक्रय कर सकती है। कभी-कभी एक सार्वजनिक कम्पनी के प्रवर्तक को अपने निजी साधनों एवं संपर्कों द्वारा पूँजी एकत्रित करने का निश्वास होता है। ऐसी दशा में कम्पनी जनता को अपने अंश खरीदने के लिए निमन्त्रण नहीं देती है बल्कि अपने अंशों को निजी रूप से प्रवर्तकों , उनके मित्रों, सम्बन्धियों, उसी समूह की अन्य कम्पनी के अंशधारियों, सामूहिक कोषों, अप्रवासी भारतीयों, वित्तीय संस्थाओं जैसे कि भारतीय जीवन बीमा निगम, भारतीय यूनिट ट्स्ट, भारतीय औद्योगिक साख एवं विनियोग निगम आदि को विक्रय करते हैं। जब सर्व साधारण को अंश खरीदने के लिए निमन्त्रण नहीं दिया जाता है तो कम्पनी को प्रविवरा निर्गमन करने की आवश्यकता नहीं होतीहै। प्रविवरण निर्ममन करने की बजाये प्रवर्तकों को एक अन्य प्रारूपर तैयार करना होता है जिसे स्थानापन्न प्रविवरण कहा जाता है। इस स्थानापन्न प्रविवरण को अंशों अथवा ऋणपत्रों के प्रथम आबंटन के कम से कम तीन दिन पूर्व रजिस्ट्रार के पास फाइल करना आवश्यक होता है।
अंशों के निजी पक्रिया की दशा में इन अंशों का धारक व्यक्ति इन अंशों को अबंटन की तिथि के कम से कम 3 वर्ष तक नहीं बेच सकता। इस अवधि को प्रतिबन्धित अवधि कहा जाता है।
स्वीट समता अंश
कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 54 के अनुसार कोई भी कम्पनी स्वीट समता अंशों का निगर्मन कर सकती है। स्वीट समता अंशों से आशय ऐसे अंशों से है जो कम्पनी द्वारा अपने कर्मचारियों और संचालकों को कटौती पर अथवा नकदी के अतिरिक्त अन्य प्रतिफल के बदले ज्ञान प्रदान करने अथवा बौद्धिक सम्पत्ति अधिकार उपलब्ध करने के बदले निर्गमित किए जाते हैं। ऐसे अंश इनके धारकों द्वारा इनके आबंटन के 3 वर्ष तक नहीं बेचे जाएंगे जिसे प्रतिबन्धित अवधि कहा जाता है। यह बात नोट करने योग्य है कि स्वीट समता अंशों को अंकित मूल्य से कम पर भी निर्गमित किया जा सकता है।
स्वीट समता अंशों के निर्गमन के लिए वहीं प्रविष्टियां बनाई जाती है। जो अन्य समता अंशों के निर्गमन पर बनाई जाती है।





अंश पूँजी से आशय कम्पनी द्वारा अंश निर्गमन से प्राप्त पूँजी से है। बहुत से व्यक्ति एवं संस्थाएँ कम्पनी की पूँजी में अलग-अलग राशि का योगदान देती है। परन्तु इनमें से प्रत्येक व्यक्ति एवं संस्था के लिए अलग पूँजी खाता नहीं बनाया जाता है। केवल संयुक्त पूँजी खाता ही बनाया जाता है जिसे अंश पूँजी खाता कहा जाता है।
अंश पूँजी के प्रकार - एक कम्पनी की अंश पूँजी के सम्बन्ध में प्रयोग किए जाने वाले विभिन्न शब्द निम्नलिखित हैं-
1. अधिकृत, पंजीकृत या अंकित पूँजी- अधिकृत पूँजी से अर्थ उस पूँजी से है जो पार्षद सीमानियम में लिखी होती है।ये कम्पनी की अधिकतम पूँजी होती है जिससे अधिक के अंश कभी भी कम्पनी अपने जीवनकाल में निर्गमित नहीं कर सकती है।
2. निर्गमित पूँजी- अधिकृत पूँजी का वह भाग जो वास्तम में जनता को जारी किया जाता है निर्गमित पूँजी कहलाता है और जो भाग जारी नहीं किया जाता उसे अनिर्गमित पूँजी कहते हैं जिसे बाद में निर्गमित किया जा सकता है
3. प्रार्थित पूँजी - प्रार्थित पूँजी, निर्ममित पूँजी का वह भाग है जिसके लिए वास्तम में जनता से प्रार्थना पत्र प्राप्त हों। उदाहरण के लिए, यदि जनता को 100 रू0 वाले 13,000 अंश प्रस्तावित किए गए हैं और जनता केवल 12,000 अंशों के लिए प्रार्थनापत्र भेजती है तो प्रार्थित पूँजी 12,00,000 रू0 होगी।
प्रार्थित पूँजी को स्थिति विवरण में निम्न दो शीर्षकों के अर्न्तगत दिखाया जाता हैः-
(अ.) प्रार्थित एवं पूर्ण चुकता
(ब.) प्राथिर्त परन्तु पूर्ण चुकता नहीं
(अ.) प्रार्थित एवं पूर्ण चुकता :- जब कम्पनी द्वारा किसी शेयर का पूर्ण अंकित मूल्य मंगा लिया जाता है और अंशधारी द्वारा चुकता भी कर दिया जाता है तो इसे प्रार्थित एवं पूर्ण चुकता पूँजी कहा जाता है।
(ब.) प्रार्थित परन्तु पूर्ण चुकता नहीं :- अंशों को प्रार्थित परन्तु पूर्ण चुकता नहीं निम्नलिखित दो दशाओं में कहा जाता हैः-
(i) जब कम्पनी ने अंश का पूर्ण अंकित मूल्य मंगा लिया है परनतु अंशधारी ने इसमें से कुछ राशि नहीं चुकाई है।
(ii) जब कम्पनी ने अंश का पूर्ण अंकित मूल्य नहीं मंगाया है।
4. याचित पूंजीः- याचित पूंजी से आशय प्रार्थित पूँजी के उस भाग से है जो संचालकों द्वारा अंशधारियों से मंगाया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि 100 रू0 वाले 12,000 अंशों पर संचालक 60 रू0 प्रति अंश मांगते हैं तो याचित पूंजी 7,20,000 रू0 होगी। शेष 40 रू0 प्रति अंश को आयाचित पूंजी कहा जागा।
5. चुकता पूँजीः- चुकता पूँजी से आशय याचित पूँजी के उस भाग से है जो अंशधारी से प्राप्त हो गया है। प्रायः मांगी गई पूँजी और चुकता पूँजी की राशि बराबर ही होती है सिवा इसके कि कुछ अंशधारी मांगी गई राशि न चुकाएँ न चुकाई गई राशि अदत्त याचना कहलाती है। यदि चुकता पूँजी 8 रू0 प्रति अंश है और किसी अंशधारी ने 5 रू0 प्रति अंश चुकाए हैं तो 5 रू0 चुकता राशि कहलाएगी। मांगी गई पूँजी में से अदत्त याचना की राशि घटाने से चुकता पूँजी बच जाती है।
6. आरक्षित या संचित पूँजीः- कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 65 के अनुसार केवल एक अंश पूँजी वाली असीमित कम्पनी सीमित कम्पनी में परिवर्तित होते समय संचित पूँजी रख सकती है। ऐसी दशा में, कम्पनी एक प्रस्ताव पास करके
(i). प्रत्येक अंश के अंकित मूल्य में वृद्धि करके अपनी अंकित पूंजी में वृद्धि कर सकती है और यह निर्धारित कर सकती है कि बढी हुई पूँजी के किसी भी भाग को, समापन को छोडकर अन्य किसी भी दशा में, मंगाया ही नहीं जाएगा।
(ii) यह निर्धारित कर सकती है कि न मॉगी गई पूँजी के किसी निश्चित भाग को, समापन को छोडकर अन्य किसी भी दशा में, मंगाया ही नहीं जाएगा।
ऐसी दशा में नम्बर (i) दशा में बढी हुई पूँजी और नम्बर (ii) दशा में न मॉगी गई पूँजी के निश्चित भाग को संचित पूँजी कहा जाता है। यह केवल कम्पनी के समापन के समय लेनदारों के लिए उपलब्ध रहती है।







A.
रु 12,000
B.
रु 1,20,000
C.
रु 12,00,000
D.
इनमें से कोई नहीं।
ब्याज = 1,00,00,000 (1,00,000 x100) का 12%
A.
रु 10,00,000
B.
रु 6,00,000
C.
रु 16,00,000
D.
रु 4,00,000
हानि = 4% बट्टा + 6% प्रीमियम
A.
रु 4,00,000
B.
रु 4,50,000
C.
रु 5,00,000
D.
रु 5,75,000
ऋण-पत्र खाता हमेशा अंकित मूल्य पर क्रेडिट किया जाता है।
A.
ऋण की राशि पर ब्याज
B.
ऋण
C.
कोई ब्याज नहीं
D.
या तो
ब्याज केवल ऋण की राशि पर दिया जाता है ऋण-पत्रों पर पृथक् से कोई ब्याज नहीं दिया जाता।
A.
यह रोकड़ हेतु निर्गमित किए जा सकते हैं
B.
यह रोकड के अतिरिक्त अन्य प्रतिफल हेतु निर्गमित किए जा सकते हैं
C.
एक कम्पनी स्वयं के ऋण.पत्रों का क्रय कर सकती है
D.
यह लाभांश के प्रतिफल में निर्गमित किए जा सकते हैं
ऋण-पत्रों से प्राप्त धन कम्पनी के लिए ऋण स्वरूप होता है। इनका भुगतान कम्पनी के जीवनकाल में ही कर दिया जाता है। कम्पनी के समापन की दशा में इनका भुगतान अंशों के भुगतान से पूर्व किया जाता है।
A.
रोकड़ खाता डेबिट तथा ऋण
B.
ऋण
C.
ऋण
D.
ऋण खाता डेबिट तथा ऋण पत्र उचन्त खाता क्रेडिट
ऋण-पत्र उचन्त खाते का शेष चिट्ठे में सम्पत्ति पक्ष में तथा ऋण-पत्र खाते का शेष दायित्व पक्ष में दिखाया जाता है।
A.
ऋण
B.
ऋण
C.
ऋण.पत्रों के निर्गमन पर हानि खाता
D.
ऋण.पत्रों के निर्गमन पर छूट खाता
ऋण-पत्रों के निर्गमन पर बट्टे तथा हानि का लेखांकन व्यवहार एक समान है।
A.
एक निश्चित राशि का भुगतान ब्याज के रूप में किया जाता है
B.
ऋण-पत्रों के अंकित मूल्य पर ब्याज दिया जाता है
C.
ऋण-पत्रों के निर्गमित मूल्य पर ब्याज दिया जाता है
D.
कोई ब्याज नहीं दिया जाता
ब्याज केवल ऋण की राशि पर दिया जाता हैए ऋण-पत्रों पर पृथक् से कोई ब्याज नहीं दिया जाता।
A.
लाभ-हानि खाता
B.
ख्याति खाता
C.
सामान्य संचय खाता
D.
पूँजी संचय खाता
यह लाभ को प्रदर्शित करता है।
A.
ऋण पत्र उचन्त खाता डेबिट तथा ऋण.पत्र खता क्रेडिट
B.
कोई लेखा नहीं होगा
C.
1 तथा 2 दोनों
D.
उपर्युक्त में से कोई नहीं
पुस्तकों में इसके लेखे करने की दो रीतियाँ हैं।
A.
बैंक खाता
B.
ऋण-पत्र उचन्त खाता
C.
ऋण-पत्र खाता
D.
उपर्युक्त में से कोई नहीं
इस विधि में ऋण-पत्रों का लेखा किए जाने पर ऋण-पत्र उचन्त खाता डेबिट तथा ऋण-पत्र खाता क्रेडिट किया जाता है।
A.
पूँजीगत हानियों को समापत करने में
B.
भूतकालीन हानियों को समापत करने में
C.
भावी हानियों को समापत करने में
D.
उपर्युक्त सभी
ऋण-पत्रों के निर्गमन पर प्राप्त प्रीमियम पूँजीगत लाभ होता हैए अतः इसे या तो किसी पूँजीगत या आयगत हानिए ख्याति एवं प्रारम्भिक व्ययों को अपलिखित करने में प्रयोग किया जा सकता है।
A.
अंकित मूल्य पर
B.
क्रय मूल्य पर
C.
बाजार मूल्य पर
D.
निर्गमन मूल्य पर
ऋण-पत्रों पर देय ब्याज की दर को ऋण-पत्रों से पहले लिखा जाता हैए जैसे. यदि ब्याज की दर 6 प्रतिशत हैए तो लिखते समय 6 प्रतिशत ऋण-पत्र लिखा जाएगा।
A.
कम्पनी में संचालकों की भागीदारी
B.
कम्पनी में दीर्घकालीन दायित्व
C.
कम्पनी में अंशधारियों द्वारा किए गए विनियोग
D.
कम्पनी के ग्राहकों की अग्रिम राशि
ऋण-पत्र कम्पनी की सार्वमुद्रा के अन्तर्गत निर्गमित दस्तावेज है जिसका मूल.तत्त्व ऋण की स्वीकृति है।
A.
नकदी के द्वारा
B.
नवीन ऋण-पत्रों के निर्गमन द्वारा
C.
समता अंशों के निर्गमन द्वारा
D.
उपर्युक्त सभी
प्रायः ऋण-पत्रों के निर्गमन की शर्तों में ऋण-पत्रों के शोधन की शर्तें दी होती हैं अर्थात् ऋण-पत्रों का शोधन किस प्रकार किया जाएगाए यह ऋण-पत्रों का निर्गमन करते समय निश्चित कर लिया जाता है। ऋण-पत्रों का शोधन सम-मूल्य पर या प्रीमियम पर किसी भी प्रकार से किया जा सकता है।
A.
सममूल्य पर
B.
अधिमूल्य पर
C.
अंशों में परिवर्तन द्वारा
D.
ये सभी
प्रायः ऋण-पत्रों के निर्गमन की शर्तों में ऋण-पत्रों के शोधन की शर्तें दी होती हैं अर्थात् ऋण-पत्रों का शोधन किस प्रकार किया जाएगाए यह ऋण-पत्रों का निर्गमन करते समय निश्चित कर लिया जाता है। ऋण-पत्रों का शोधन सम.मूल्य पर या प्रीमियम पर किसी भी प्रकार से किया जा सकता है।
A.
कम्पनी के लेनदार
B.
कम्पनी के ग्राहक
C.
कम्पनी के स्वामी
D.
उपर्युक्त में से कोई नही।
कम्पनियों के लिए ऋण.पत्र दीर्घकालीन ऋण प्राप्त करने का एक अच्छा साधन है। वर्तमान समय में ऋण.पत्र का आशय उस पत्र से है जो ऋण की स्वीकृति होती है तथा जिसके द्वारा ऋण प्राप्त किया जाता है तथा जिसमें मूलधन का भुगतान न होने तक किसी निश्चित सामयिक अवधि में निश्चित ब्याज देने की प्रतिज्ञा होती है।
A. ब्याज व्याप्ति अनुपात
B. तरलता अनुपात
C. स्थायी सम्पत्तियाँ आवर्त अनुपात
D. परिचालन अनुपात
दायित्वों से अंशधारियों के कोषों की गणना करते समय, हम शुद्ध आस्थगित कर सम्पत्तियाँ तथा काल्पनिक सम्पत्तियों को घटाते हैं।
A. तरलता
B. शोधन क्षमता
C. गतिविधि
D. लाभप्रदत्ता
चालू दायित्वों में से अल्पकालीन ऋणों को चुकाने की योग्यता को तरलता कहा जाता है।
A. शोधन क्षमता अनुपात में
B. लाभप्रदत्ता अनुपात में
C. तरलता अनुपात में
D. गतिविधि अनुपात में
ब्याज व्याप्ति अनुपात को शोधन क्षमता अनुपात के तहत शामिल किया जाता है। ब्याज व्याप्ति अनुपात का सूत्र है:-
ब्याज तथा कर पूर्व शुद्ध लाभ / दीर्घकालीन ऋणों पर ब्याज
A. पारंपरिक तथा कार्यात्मक
B. कार्यात्मक तथा परिचालन
C. पारंपरिक तथा परिचालन
D. गणना एवं विश्लेषण
पारंपरिक वर्गीकरण अनुपातों के अनुसार आय विवरण अनुपात, चिट्ठा अनुपात तथा मिश्रित अनुपात होते हैं। कार्यात्मक वर्गीकरण में इनको तरलता अनुपातों, शोधन क्षमता अनुपातों, गतिविधि अनुपातों तथा लाभप्रदत्ता अनुपातों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
A. 4 गुना
B. 25%
C. 2.4 गुना
D. 3.2 गुना
ब्याज व्याप्ति अनुपात = ब्याज तथा कर पूर्व शुद्ध लाभ / दीर्घकालीन ऋणों पर ब्याज
A. चालू दायित्व का पूनर्भुगतान
B. कार्यालय उपकरण का विक्रय
C. रोकड़ पर माल का क्रय
D. लाभांश का भुगतान
रोकड़ पर माल का क्रय इस अनुपात को परिवर्तित नहीं करेगा, इससे न तो कुल चालू सम्पत्तियाँ और न ही कुल चालू दायित्व प्रभावित होते हैं क्योंकि यह केवल एक चालू सम्पत्ति का अन्य चालू सम्पत्ति में एक परिवर्तन होता है।
A. ब्याज व्याप्ति अनुपात
B. तरलता अनुपात
C. आवर्त अनुपात
D. परिचालन अनुपात
ब्याज व्याप्ति अनुपात ऋणपत्रधारियों तथा दीर्घकालीन साख के प्रदाताओं के लिए अर्थपूर्ण होता है। इस अनुपात की गणना करने का उद्देश्य ब्याज प्रभार के लिए उपलब्ध लाभ की राशि को सुनिश्चित करना होता है। एक उच्च अनुपात ऋणदाताओं के लिए अच्छा माना जाता है क्योंकि यह उनके लिए उच्च लाभ इंगित करता है।
A. 2:3
B. 1:1
C. 3:1
D. 1:2
तरल अनुपात का 1: 1 होना उचित माना जाता है। यदि अनुपात से कम आता है, तो संस्था की वित्तीय स्थिति को संदिग्ध माना जाता है।
A. लाभदायक अनुपात
B. चालू अनुपात
C. सरल अनुपात
D. शोधन क्षमता अनुपात
चालू अनुपात का नीचा होना संस्था की जोखिमपूर्ण स्थिति में उपस्थिति बताता है, जबकि चालू अनुपात ऊँचा होने पर संस्था के लेनदारों की स्थिति सुदृढ़ मानी जाती है।
A. 1:1 हो
B. 2:1 हो
C. 3:1 हो
D. 4:1 हो
तरल अनुपात का 1: 1 होना उचित माना जाता है। यदि अनुपात से कम आता है, तो संस्था की वित्तीय स्थिति को संदिग्ध माना जाता है।
A. कुल विक्रय में से सकल लाभ घटाकर
B. उधार विक्रय में से सकल लाभ घटाकर
C. कुल विक्रय में से शुद्ध लाभ घटाकर
D. उपर्युक्त में से कोई नहीं
किसी व्यावसायिक संस्था द्वारा उपलब्ध साधनों के सर्वोत्तम उपयोग से लाभ कमाने की क्षमता को लाभदायिकता कहते हैं। लाभदायक अनुपात प्रतिशत में व्यक्त किए जाते हैं।
A. गुणात्मक रुप में,
B. प्रतिशत में
C. भिन्न में
D. उपर्युक्त में से कोई नहीं
किसी व्यावसायिक संस्था द्वारा उपलब्ध साधनों के सर्वोत्तम उपयोग से लाभ कमाने की क्षमता को लाभदायिकता कहते हैं। लाभदायक अनुपात प्रतिशत में व्यक्त किए जाते हैं।
A. चालू सम्पत्तियाँ- चालू दायित्व
B. तरल सम्पत्तियाँ- चालू दायित्व
C. स्थायी सम्पत्तियाँ- कुल दायित्व
D. उपर्युक्त में से कोई नहीं
चालू सम्पत्तियों का चालू दायित्वों पर आधिक्य कार्यशील पूँजी कहलाता है, अर्थात कार्यशील पूँजी = चालू सम्पत्तियाँ - चालू दायित्व
A. 1:1 हो
B. 2:1 हो
C. 3:1 हो
D. 4:1 हो
आदर्श ऋण समता अनुपात 2:1 सन्तोषजनक माना जाता है अर्थात कुल दीर्घकालीन दायित्व अंशधारियों के कोष से दो गुना होना चाहिए।
A. 5:1
B. 4:1
C. 2:1
D. 3:1
सामान्य दशा में यह नियम है कि चल सम्पत्तियों एवं चालू दायित्वों का अनुपात (चालू अनुपात) 2: 1 का सम्बन्ध रखने वाला होना चाहिए। अर्थात चालू सम्पत्तियाँ चालू दायित्वों की दोगुनी होनी चाहिए। इस दशा में भुगतान व्यापार पर कोई विपरीत प्रभाव डालने वाले नहीं होते हैं।
A. सकल लाभ अनुपात
B. शुद्ध लाभ अनुपात
C. व्यय अनुपात
D. उपर्युक्त सभी
इन अनुपातों की गणना करने से यह ज्ञात हो जाता है कि वह – (1) बिक्री पर कितने प्रतिशत लाभ कमा रहे हैं, (2) लाभ घट रहा है या बढ़ रहा है तो उसका क्या कारण है तथा (3) पूँजी पर लाभ का प्रतिशत कितना है आदि।
A. विक्रय के बीच
B. क्रय के बीच
C. सकल लाभ के बीच
D. अन्तिम रहतिया के बीच
यह अनुपात अन्तिम खातों के लाभ-हानि खाते से प्राप्त शुद्ध लाभ एवं शुद्ध विक्रय के मध्य निकाला जाता है।
A. चालू अनुपात
B. शोधन क्षमता अनुपात
C. स्थायी सम्पत्ति अनुपात
D. उपर्युक्त सभी
यह अनुपात इस बात का निर्णय करता है कि चालू सम्पत्तियाँ चालू दायित्वों के भुगतान के लिए पर्याप्त है या नहीं।
A. चालू अनुपात
B. लाभांश दर अनुपात
C. संचालन अनुपात
D. उपर्युक्त में से कोई नहीं
इस अनुपात से पूर्वाधिकार अंशधारियों को दिए गए लाभांश व शुद्ध लाभ के मध्य सम्बन्ध स्पष्ट होता है। यह अनुपात भी जितना ऊँचा होगा, पूर्वाधिकार अंशधारियों के लिए उतना ही हितकर होगा।
ऋण समता अनुपात दीर्घकालीन ऋणों तथा समता के मध्य सम्बंध को मापता है।
ऋण समता अनुपात = दीर्घकालीन ऋण / अंषधारी को दीर्घकालीन ऋण = दीर्घकालीन उधार + अन्य गैर-चालू दायित्व + दीर्घकालीन प्रावधान।
अंषधारी कोश = अंष पूँजी (समता तथा पूर्वाधिकार दोनों) + संचय एवं आधिक्य + अंध अधिपत्रों के विरूद्ध प्राप्त राशि + बकाया आवंटन अंश आवेदन राशि - काल्पनिक सम्पत्तियाँ (गैर-चालू सम्पत्तियाँ तथा अन्य चालू सम्पत्तियों के तहत अपरिशोधित अंश निर्गमन व्यय, ऋणपत्रों के निर्गमन पर अपरिशोधित हानि, आदि)।
यह एक ऐसा अनुपात होता है जो ऋण पर ब्याज की सेवा के साथ कार्य करता है। यह दीर्घकालीन ऋण पर देय
ब्याज की सुरक्षा का मापन करता है।
ब्याज व्याप्ति अनुपात = दीर्घकालीन ऋणों पर ब्याज तथा कर पूर्व शुद्ध लाभ अतः यह अनुपात कर तथा ब्याज पूर्व शुद्ध लाभ तथा दीर्घकालीन ऋणों पर देय ब्याज के बीच संबंध स्थापित करता है।
स्वामित्व अनुपात स्वामियों (अंशधारियों) के कोष से कुल सम्पत्तियों के संबंध को प्रदर्शित करता है। स्वामित्व कोष में अंश पूँजी, संचय एवं आधिक्य, अंश अधिपत्रों के विरूद्ध प्राप्त धन को शामिल किया जाता है। स्वामित्व अनुपात = स्वामित्व अनुपात/कुल सम्पत्तियाँ जहाँ- स्वामित्व कोष = अंशधारियों का कोष काल्पनिक सम्पत्तियों के अलावा कुल सम्पत्तियाँ।
हाँ, यदि व्यवसाय में कोई स्टाक तथा पूर्वदत्त व्यय नहीं हो।
प्रत्येक व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य अधिक.से.अधिक लाभोपार्जन होता है। अतः किसी भी व्यवसाय के लाभ विनियोजित पूँजी एवं जोखिम की तुलना में पर्याप्त होने चाहिए। व्यवसायिक क्रियाओं की लाभदायकता मापने के लिए लाभदायकता अनुपातों की गणना की जाती है। महत्वपूर्ण लाभदायकता अनुपात निम्नलिखित हैः-
1. सकल लाभ अनुपात।
2. परिचालन अनुपात।
3. परिचालन लाभ अनुपात।
4. शुद्ध लाभ अनुपात।
5. विनियोग पर लाभ दर अनुपात।
6. प्रति अंश अर्जन।
ये अनुपात यह बताते हैं कि कोई संस्था अपने व्यवसाय में लगी हुई सम्पत्तियाँ ;स्टॉकए व्यापारिकए प्राप्योंए स्थायी सम्पत्तियों आदिद्ध का कितनी कार्यकुशलता के साथ प्रयोग कर रही है। यह अनुपात प्रायः विक्रय अर्थात् संचालन क्रियाओं से आगम अथवा संचालन क्रियाओं से आगम की लागत के रूप में व्यक्त किए जाते हैं। इन अनुपातों में कुछ प्रमुख हैः
1. स्टॉक आवर्त अनुपात
2. व्यापारिक प्राप्य आवर्त अनुपात
3. व्यापारिक देयता आवर्त अनुपात
4. स्थायी सम्पत्ति आवर्त अनुपात
5. कार्यशील पूँजी आवर्त अनुपात
स्कंध आवर्त अनुपात यह निर्धारित करता है कि एक लेखा अवधि के दौरान स्कंध विक्रय में परिवर्तित हुआ है। यह अनुपात बेचे गये माल की लागत तथा स्टॉक के मध्य संबंध को व्यक्त करता है।
स्कंध आवर्त अनुपात = परिचालनों से आय की लागत (बेचे गये माल की लागत) / औसत स्कंध (या स्टॉक)
परिचालनों से आय की लागत (बेचे गये माल की लागत) = प्रयुक्त माल की लागत + व्यापार में स्टॉक का क्रय + निर्मित माल, अर्धनिर्मित माल तथा व्यापार स्कंध में परिवर्तन + प्रत्यक्ष व्यय या प्रारंभिक रहतिया + क्रय + प्रत्यक्ष व्यय - अंतिम रहतिया या विक्रय (परिचालनों से आय) - सकल लाभ
| विवरण | |
| परिचालनों से उधार आय | 1,50,000 |
| परिचालनों से रोकड़ आयः | |
| परिचालनों से कुल आय का 25 % | |
| क्रय | 1,60,000 |
| प्रारंभिक रहतिये पर अंतिम रहतिये का आधिक्य | 20,000 |
यदि परिचालनों से कुल आय
100 है;
तो परिचालनों से रोकड़ आय
25 होगी; तथा
परिचालनों से उधार आय
75 होती है।
अतः यदि परिचालनों से उधार आय
75 है तो
कुल विक्रय =
100 होगा।
यदि परिचालनों से उधार आय
1,50,000 है तो
परिचालनों से आय =
परिचालनों से आय की लागत :
= क्रय - प्रारंभिक रहतिये पर अंतिम रहतिये का आधिक्य
= (1,60,000) - (20,000) =
1,40,000
सकल लाभ = परिचालनों से कुल आय - परिचालनों से आय की लागत
= (2,00,000) - (1,40,000) =
60,000
सकल लाभ अनुपात =
यह अनुपात प्राथमिक अंश पूँजी तथा ऋण-पत्रों के मध्य सम्बन्ध को दर्शाता है। जब संस्था अपमे वित्त को
अंशधारियों के अतिरिक्त अन्य स्थायी स्त्रोतों, जैसे- पूर्वाधिकारी अंशधारी एवं ऋण-पत्रधारी आदि से प्राप्त करके
पूँजी बढ़ाती है, तो इसे पूँजी-दन्तीकरण कहते हैं। पूँजी मिलान अनुपात स्वामित्व पूँजी एवं पूर्वाधिकारी अंश,
ऋण-पत्र, स्थायी ब्याज की प्रकृति वाले ऋणों को मध्य निकाला जाने वाला अनुपात है। समता अंश पूँजी की
राशि प्राथमिक अंश पूँजी व ऋण-पत्रों की राशि के योग से अधि होनी चाहिए। स्वामित्व पूँजी में साधारण अंश
पूँजी, संचय एवं अवितरित लाभ को सम्मिलित किया जाता है।
| विवरण | |
| रहतिया | 50,000 |
| देनदार | 40,000 |
| प्राप्य विपत्र | 10,000 |
| अग्रिम कर | 4,000 |
| रोकड़ | 30,000 |
| लेनदान | 60,000 |
| देय विपत्र | 40,000 |
| बैंक अधिविकर्ष | 4,000 |
चालू अनुपात = चालू सम्पत्तियाँ / चालू दायित्व
चालू सम्पत्तियाँ = (50,000 +40,000 + 10,000 + 4,000 + 30,000)
=
1,34,000
चालू दायित्व = (60,000 + 40,000 + 4,000)
=
1,04,000
इसलिए, चालू अनुपात = 1,34,000 / 1,04,000 = 1.29 : 1
(1) तरलता अनुपात की गणना व्यवसाय की अल्पकालीन शोधन क्षमता देखने के लिए की जाती है।
(2) तरलता अनुपात के तहत चालू अनुपात तथा तरल अनुपात का अध्ययन किया जाता है।
| मदें |
|
| स्टाक | 50,000 |
| देनदार | 40,000 |
| प्राप्य विपत्र | 10,000 |
| अग्रिम कर | 4,000 |
| रोकड़ | 30,000 |
| लेनदार | 60,000 |
| देय विपत्र | 40,000 |
| बेंक अधिविकर्ष | 4,000 |
त्वरित अनुपात = त्वरित सम्पत्तियाँ/चालू दायित्व
त्वरित सम्पत्तियाँ = (40,000 + 10,000 + 30,000)
=
80,000
चालू दायित्व = (60,000 + 40,000 + 4,000)
=
1,04,000
इसलिए त्वरित अनुपात = 80,000 / 1,04,000 = 0.77:1
त्वरित सम्पत्तियों को उन सम्पत्तियों के रूप में परिभाषित किया जाता है जिनको अल्पसमय में कम जोखिम के साथ रोकड़ की राशि में परिवर्तित किया जा सकता है। त्वरित सम्पत्तियों की गणना करते समय हम चालू सम्पत्तियों में से अंतिम स्कंध तथा पूर्वदत्त व्ययों को अलग रखते हैं।
त्वरित सम्पत्तियाँ = चालू सम्पत्तियाँ - (स्कंध + पूर्वदत्त व्यय)
त्वरित अनुपात की गणना फर्म की अल्पकालीन तरलता का पता लगाने के लिए तथा तरल सम्पत्तियों के साथ चालू दायित्वों के संबंध को प्रदर्शित करने के लिए की जाती है।
त्वरित अनुपात = त्वरित सम्पत्तियाँ/चालू दायित्व
किसी संस्था की क्रियाशीलता व संचालन की जानकारी लेना आवश्यक होता है। व्यवसाय की क्रियाशीलता इस तथ्य पर भी आधारित होती है कि वर्ष के दौरान कितनी बार बिक्री हुई। बिक्री अनुपात का ऊँचा होना व्यवसाय के कुशलतम उपयोग की ओर इशारा करता है। संस्था की क्रियाशीलता व संचालन की जानकारी हेतु जिन अनुपातों का प्रयोग किया जाता है, वे विक्रय क्रियाशीलता अथवा निष्पादन अनुपात कहलाते हैं। इन अनुपातों के द्वारा विश्लेषक को इस बात का पता चलता है कि संस्था द्वारा उपलब्ध विभिन्न संसाधनों जैसे – कुल पूँजी, कार्यशील पूँजी, सम्पत्तियों व रहतिया आदि का किस सीमा तक प्रयोग किया गया है, इसी के आधार पर वह निष्कर्ष निकलता है कि इन साधनों का उपयोग कुशलतापूर्वक एवं लाभदायकता हेतु किया गया है अथवा नहीं।
| Details |
|
Details |
|
| Bills payable | 10,000 | Cash | 1,000 |
| Creditors | 15,000 | Bills Receivables | 4,000 |
| 10% Loan | 10,000 | Debtors | 20,000 |
| P/L A/c | 5,000 | Stock | 9,000 |
| Reserves | 5,000 | Investment | 1,000 |
| Share Capital | 10,000 | Net Fixed Assets | 20,000 |
तरल अनुपात = तरल सम्पत्तिया / चालू दायित्व
= प्राप्य विपत्र + देनदार + रोकड़ / लेनदार + देय विपत्र
= 25,000 / 25,000 = 1 : 1
न्यायालय आदेश को मानने के पश्चात चालू दायित्व होंगे -
25,000 + 4,000 =
29,000
तरल अनुपात = 25,000 / 29,000 = 0.86 : 1
यह स्पश्ट है कि न्यायालय आदेश की पालना के पश्चात तरल अनुपात में कमीं हुई है।
न्यायालय आदेश के पहले चालू अनुपात = चालू सम्पत्तियाँ / चालू दायित्व
= तरल सम्पत्तियाँ + स्टॉक / चालू दायित्व
= 34,000 / 25,000 = 1.36 : 1
न्यायालय आदेश की पालना के पश्चात
चालू अनुपात = 34,000 / 29,000 = 1.17 : 1
यह स्पष्ट है कि न्यायालय आदेष की अनुपालना के पश्चात चालू अनुपात मे कमीं हुई है।
| विवरण | |
| रोकड़ विक्रय | 25,000 |
| उधार विक्रय | 75,000 |
| रोकड़ क्रय | 15,000 |
| उधार क्रय | 60,000 |
| आवक भाड़ा | 2,000 |
| वेतन | 25,000 |
| स्टॉक में कमीं | 10,000 |
| क्रय वापसी | 2,000 |
| मजदूरी | 5,000 |
सकल लाभ अनुपात =
सकल लाभ = शुद्ध विक्रय - बिके माल की लागत
शुद्ध विक्रय = 25,000 +75,000 =
1,00,000
बिके माल की लागत =
73,000 + 2,000 +5,000 + 10,000 =
90,000
इस प्रकार सकल लाभ = 1,00,000 - 90,000 =
10,000
इसलिए सकल लाभ अनुपात =
नोट : स्टॉक में कमीं होना अर्थात अंतिम रहतिया प्रारंभिक रहतिये से 10,000 रु कम है। इसलिए बिके माल की लागत ज्ञात करते समय
10,000 जोड़े जायेंगे।
कार्यात्मक वर्गीकरण के आधार पर अनुपातों के विभिन्न प्रकार निम्न प्रकार हैं :
1. तरलता अनुपातः तरलता से आश्य कम्पनी की अपने चालू दायित्वों को शोधन करने की क्षमता से होता है। अतः तरलता अनुपातों को अल्पकालीन शोधन क्षमता अनुपात भी कहते हैं।
2. शोधन क्षमता अनुपातः अंशधारियोंए ऋणदाताओं आदि के लिए कम्पनी के दीर्घकालीन ऋणों के भुगतान करने की क्षमता को ज्ञात करने के लिए निकाले जाने वाले अनुपात शोधन क्षमता अनुपात कहलाते हैं।
3. क्रियाशीलता अनुपातः यह अनुपात विक्रय की लागत अर्थात् संचालन क्रियाओं से आगम की लागत अथवा विक्रय अर्थात् संचालन क्रियाओं से आगम के आधार पर गणना किए जाते हैं।
4. लाभदायकता अनुपातः सभी व्यावसायिक संस्थानों का मुख्य उद्देश्य लाभार्जन होता है। लाभ किसी व्यवसाय की कार्यकुशलता का मापदण्ड है।
अनुपात विश्लेषण वित्तिय विश्लेषण की एक महत्वपूर्ण तकनीकी है जिसमें वित्तीय विश्लेषण की मदों तथा समूहों के सम्बंधों की गणनाए निर्धारण तथा प्रस्तुतीकरण शामिल है।
अनुपात विश्लेषण के उद्देश्य:
1. व्यवसाय के ऐसे कमजोर स्थानों का पता लगाना जिन पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है ;
2. व्यवसाय की तरलताए शोधन क्षमताए क्रियाशीलता तथा लाभप्रदता का गहन विश्लेषण करना ;
3. क्रॉस.वर्गीय विश्लेषण अर्थात् किसी फर्म के अनुपातों की तुलना उसी उद्योग की कुछ चुनी हुई फर्मों के अनुपातों से करने के लिए सूचना प्रदान करना ;
4. समय.श्रेणी विश्लेषण अर्थात् किसी फर्म के वर्तमान अनुपातों की इसी फर्म के पिछले अनुपातों से तुलना करने के लिए सूचना प्रदान करना ;
5. पूर्वानुमान लगाने एवं भविष्य के लिए योजना बनाने के लिए सूचना प्रदान करना।
चालू अनुपात की गणना फर्म की अल्पकालीन वित्तीय स्थिति को देखने के लिए की जाती है तथा यह चालू सम्पत्तियों तथा चालू दायित्वों के मध्य सम्बंध को दर्शाता है।
चालू अनुपात = चालू सम्पत्तियाँ (काल्पनिक सम्पत्तियों के अलावा) / चालू दायित्व
चालू सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ होती है जो निम्नलिखित परिमापों को पूरा करती है -
1. ऐसी सम्पत्तियाँ जिनका क्रयए विक्रय करने के उद्देश्य से या कम्पनी के साधारण परिचालन चक्र में उपयोग करने के उद्देश्य से किया जाता है।
2. यह प्रारंभिक तौर पर व्यापार करने के लिए रखी जाती है।
3. ऐसी सम्पत्तियाँ जिन्हें एक वर्ष के भितर वसूल कर लिया जाता है।
4. यह रोकड़ तथा रोकड़ समतुल्य हो सकती हैं।
चालू दायित्व वे दायित्व होते हैं जो निम्नलिखित परिमापों को पूरा करते हैं :-
1. इनका निपटारा कम्पनी के सामान्य परिचालन चक्र में करना होता है।
2. यह प्रारंभिक तौर पर व्यापार करने के उद्देश्य के लिए होती है।
3. इनका निपटारा कम्पनी द्वारा एक वर्ष के भितर करना होता है।
4. कम्पनी के पास इन दायित्वों की तारीख से कम से कम 12 माह के लिए भुगतान को स्थगित करने का कोई शर्त रहित अधिकार नहीं होता है।
|
आधार |
चालू अनुपात |
त्वरित अनुपात |
|
अर्थ |
यह चालू सम्पत्तियों तथा चालू दायित्वों में संबंध स्थापित करता है। |
यह त्वरित सम्पत्तियों तथा चालू दायित्वों में संबंध स्थापित करता है। |
|
मूल्यांकन |
यह एक वर्ष में चालू दायित्वों को चुकाने की योग्यता का मूल्यांकन करता है। |
यह तुरंत चालू दायित्वों को चूकाने की योग्यता का मूल्यांकन करता है। |
|
आदर्श अनुपात |
2 : 1 को एक आदर्श अनुपात के रूप में माना जाता है। |
1 : 1 को एक आदर्श अनुपात के रूप में माना जाता है। |
शोधन क्षमता अनुपात दीर्घकालीन ऋणों को चुकाने के लिए एक उद्यम की योग्यता को संदर्भित करता है। यह अनुपात व्यवसाय की दीर्घकालीन दायित्वों को चुकाने की योग्यता को प्रदर्शित करता है।
वह अनुपात जो व्यवसाय की शोधन क्षमता का मूल्यांकन करने के लिए प्रयुक्त होते हैं :
1. ऋण-समता अनुपात।
2. स्वामित्वता अनुपात।
3. कुल सम्पत्ति ऋण अनुपात।
4. पूँजीकरण अनुपात।
5. ब्याज व्याप्ति अनुपात
6. शूद्ध कार्यशील पूँजी दीर्घकालीन ऋण अनुपात।
A.
परिचालन गतिविधि
B.
विनियोग गतिविधि
C.
वित्तीय गतिविधि
D.
गैर –रोकड़ गतिविधि
वे उस उपक्रम की मुख्य गतिविधि से सम्बन्धित हैं
A.
कराधान
के लिए
प्रावधान
B. विविध लेनदार
C. देय बिल
D. बकाया व्यय
कराधान के लिए प्रावधान चालू दायित्वों से हटा दिए जाएंगे क्योंकि करों का भुगतान और कराधान के लिए प्रावधान रोकड़ प्रवाह विवरण में अलग से दिखाए जाने चाहिए
A.
लाभ
और हानि के
बारे में
सूचना
प्रदान करना
B. किसी फर्म की वित्तीय स्थिति के बारे में जानकारी प्रदान करना
C. व्यापार प्राप्य और व्यापार देय के बारे सूचना प्रदान करना
D. किसी फर्म में रोकड़ के अंतर्वाह और बहिर्वाह के बारे में जानकारी प्रदान करना
रोकड़ प्रवाह विवरण का मुख्य उद्देश्य है तीन मदों के अंतर्गत एक विशेष अवधि के दौरान किसी उपकर्म के रोकड़ प्रवाह के विषय में उपयोगी सूचनाएं प्रदान करना।
A.
परिचालनों से राजस्व की लागत- प्रारम्भिक स्कंध+अंतिम स्कंध
B.
परिचालनों से राजस्व की लागत + प्रारम्भिक स्कंध + अंतिम स्कंध
C.
परिचालनों से राजस्व की लागत - प्रारम्भिक स्कंध - अंतिम स्कंध
D.
परिचालनों से राजस्व की लागत + प्रारम्भिक स्कंध - अंतिम स्कंध
परिचालनों से राजस्व की लागत-= प्रारम्भिक स्कंध+शुद्ध खरीद+प्रत्यक्ष व्यय-अंतिम स्कंध। इसलिए शुद्ध खरीद = परिचालनों से राजस्व की लागत- प्रारम्भिक स्कंध+अंतिम स्कंध
A.
क्षरण
B.
उत्पादन
C.
रोकड़ प्रवाह विवरण
D.
चिट्ठा
रोकड़ प्रवाह विवरण रोकड़ प्रवाह के परिचालन, विनियोग और वित्तीय गतिविधियों में रोकड़ प्रवाह को वर्गीकृत करने के द्वारा किसी उपक्रम के रोकड़ या उसके समतुल्य में ऐतिहासिक परिवर्तनों के बारे जानकारी प्रदान करता है।
A.
क्षरण
एवं परिशोधन
व्यय
B.
कर्मचारी लाभ व्यय
C.
वित्तीय लागतें
D. अन्य व्यय
क्षरण एवं परिशोधन व्यय गैर रोकड़ व्यय होते हैं। वे किसी भी बाहरी व्यक्ति/संस्थान के लिए भुगतान योग्य नहीं होते हैं।
A.
विनियोग
गतिविधियों
से अंतर्वाह
B. विनियोग गतिविधियों से बहिर्वाह
C. परिचालन गतिविधियों से बहिर्वाह
D.
वित्तीय गतिविधियों से बहिर्वाह