A.
B.
C.
D.
शुद्ध लाभ में पूर्ण परिवर्तन = 20,000 - 16,000 =
4,000
% परिवर्तन = 4,000/16,000 x 100 = 25%
A.
साख का मूल्यांकन
B.
ह्रास
C.
अंतरिम रिपोर्ट
D.
तुलनात्मक विवरण
ICAI के अनुसार परिभाषा: अंतरिम अवधिवह वित्तीय रिपोर्टिंग अवधि होती है जो एक पूरे वित्तीय वर्ष से अधिक होती है अंतरिम वित्तीय रिपोर्ट का अर्थ होता है वह वित्तीय रिपोर्ट जिसमें या तो वित्तीय वक्तव्यों का पूरा सेट है या एक अंतरिम अवधि के लिए संक्षित/एकत्रित वित्तीय वक्तव्यों का सेट. (जैसा इस विवरण में बताया गया है)
A. अंत:फर्म विश्लेषण
B. अंतर्फर्म विश्लेषण
C. ऊर्ध्वाधर विश्लेषण
D. समानाकार विश्लेषण
अगर किसी एकल फर्म के वित्तीय आंकड़े की एक समयावधि में विश्लेषण और तुलना की जाती है, तो इसे अंत:फर्म विश्लेषण कहते हैं. इसे समय श्रंख्ला विश्लेषण या प्रवृत्ति विश्लेषण कहते हैं
A. 11.11%.
B.
88.88%.
C.
25%.
D. 12.50%.
% व्यापार प्राप्तियों में परिवर्तन होगा प्रतिशत/बेस वर्ष आंकड़े x 100 1,10,000/8,80,000 x 100 = 12.50%
समरूप वित्तीय विवरण को संघटक प्रतिशत विवरण के नाम से भी जानते हैं। यह एक कंपनी के वित्तीयपरिणामों (लाभ व हानि खाता), एवं वित्तीय स्थिति (तुलन पत्र) की प्रवृत्ति एवं बदलाव जानने का साधन या उपकरण है। यहाँ पर विवरण में दिए गए प्रत्येक मद को कुल राशि के प्रतिशत के रूप में दर्शाते हैं जोकिउस प्रतिशत का ही एक हिस्सा होता है। इसी प्रकार समरूप आय विवरण में, खर्च मदों को निवल विक्रय के प्रतिशत के रूप में दर्शाया जाता है। यदि ऐसा विवरण लगातार जमाविधि में हुए परिवर्तनों को दर्शाताहै।
सूचना की शृंखला की प्रवृत्तियों के परिकलन द्वारा वित्तीय विवरणों को विश्लेषित किया जा सकता है। प्रवृत्तिविश्लेषण अधेगामी या उफर्ध्वगामी दिशा को निर्धारित करते है तथा इसमें प्रतिशत संबंध् परिगणना सम्मिलितहोती है जिसमें प्रत्येक मद उसी मद के आधार वर्ष को धारण करता है। यदि तुलनात्मक विश्लेषण का मामलाहै तो एक मद को स्वतः ही पूर्व वर्ष से तुलना करके यह जाना जाता है कि क्या उसमें अभिवृद्धि हुई हैया कमी आई है या उसी जगह पर अभी भी स्थित है।
वार्षिक रिपोर्ट में मूल रूप से वित्तीय विवरण शामिल होते है, जैसे तुलन पत्र, लाभ व हानि खाता और रोकड़ प्रवाहविवरण। इसमें अवलोकन हेतु वर्ष के निष्पादन संबंधी प्रबंध् तर्क भी सम्मिलित होते है, साथ ही यह उद्यम के संभावित
भविष्य पर भी प्रकाश डालता है।
एकसमान आकार का स्थिति विवरण एक ऐसा विवरण है जिसमें कुलसम्पत्तियाँ अथवा दायित्वों के योग को 100 मान लिया जाता है और सभीसंख्याओं को इस योग के प्रतिशत के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
समानाकार विवरण एक कम्पनी के परिचालन परिणामों तथा वित्तीय विवरणों की प्रवृत्ती तथा परिवर्तनों का अध्ययन करने का वित्तीय साधन होता है। अतः प्रत्येक मदों को प्रतिशत के रूप में स्पष्ट किया जाता है।
लाभ एवं हानि खाते के लिए कुल विक्रय को आधार के रूप में तथा कुल सम्पत्तियों को चिट्ठे के आधार के रूप में लिया जाता है।
वित्तीय विश्लेषण मद में "विश्लेषण तथा विवेचन" दोनों शामिल होते हैं। विश्लेषण अर्थात वित्तीय विवरणों में दिये गये आंकड़ों का व्यवस्थिति वर्गीकरण द्वारा सरलीकरण। विवेचन अर्थात आंकड़ों के अर्थ तथा महत्व को स्पष्ट करना। ये दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं।
विषयनिष्ठता का अर्थ है विभिन्न विकल्पों में से किसी एक विकल्प का चुनाव करने के लिए व्यक्तिगत निर्णय का प्रयोग करना जैसे कि ह्रास की पद्धति का चुनाव करना अथवा स्टॉक मूल्यांकन की पद्धति का चुनाव करना। व्यक्तिगत निर्णय के कारण वित्तीय विवरण पक्षपात से प्रभावित रहते हैं।
बाह्य अलंकरण से आशय महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के लिए खातों में की गई गड़बड़ी एवं वित्तीय विवरणों को इस प्रकार प्रस्तुत करने से है जिससे कि वास्तविक स्थिति से अच्छी स्थिति प्रतीत हो। ऐसा करने से वित्तीय विश्लेषण से इसके उपयोगकर्ताओं को गलत सूचनाऐं मिल सकती है।
1) आय क्षमता जानने के लिए।
2) वित्तीय सुदृढ़ता का पता लगाने के लिए।
|
प्रशिक्षण |
विकास |
|
यह ज्ञान तथा कौशल में वृद्धी करने वाली प्रक्रिया होती है। यह एक व्यवसायोन्मुख प्रक्रिया होती है। |
यह आय तथा विकास वाली प्रक्रिया होती है। यह एक जीविकोन्मुख प्रक्रिया होती है। |
अनुस्थापन - यह चयनित कर्मचारियों की पदप्राप्ति को दर्शाता है जिसके लिए उनका चयन किया गया है।
अभिविन्यास - यह चयनित कर्मचारी को अन्य कर्मचारियों से तथा संगठन के नियमों तथा नीतियों से परिचित कराना है यह ‘सामाजिकरण’ के रूप में भी जानी जाता है।
प्रशिक्षण एक विनिर्दिष्ट कार्य को करने के लिए समझदारी, कौशल तथा व्यवहार को बढ़ाने की गतिविधि होती है।

सुधार करने के लिए कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण प्रदान करके उन्हें मशीनरी का उपयोग सीखाना।
इस स्थिति में उपयुक्त प्रशिक्षण विधि
‘शिक्षुता प्रशिक्षण’
होगी।
शिक्षुता प्रशिक्षण कार्यक्रम में,
एक पर्यवेक्षक या एक प्रशिक्षक कार्य के कौशल के बारे में कार्यकर्ताओं या शिक्षार्थी को मार्गदर्शन देता है। प्रशिक्षक कार्य करता है तथा प्रशिक्षु उसे यह करते हुए निरीक्षण करते हैं।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए समय अवधि
1-2 साल के बीच भिन्न होता है और कुशल या योग्य कार्यकर्ता की तुलना में प्रशिक्षु को कम भुगतान किया जाता है।
प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं:
1. आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान करके सही काम के लिए कर्मचारियों को तैयार करने के लिए
2. नवीनतम अवधारणाओं के लिए उन्हें उजागर करके कुशलता से अधिक काम करने के लिए कर्मचारियों को सक्षम करने के लिए
3. उच्च पदों पर कब्जा करने के लिए कर्मचारियों की तैयारियों द्वारा सक्षम अधिकारियों की एक दूसरी पंक्ति का निर्माण करने के लिए।

नियुक्तिकरण में निम्नलिखित कार्य सम्मिलित किये जाते हैं:
1. भर्ती - भर्ती संगठन में कार्य के लिए संभावित कर्मचारियों की पहचान तथा उन्हें उनके कार्य के लिए नियमित करने की प्रक्रिया होती है।
2. चयन - चयन एक कार्य के लिए बहुत से सम्भावित उम्मीदवारों में से सबसे अच्छे उम्मीदवार की पहचान तथा चयन करने की प्रक्रिया होती है। इसलिए इसको एक नकारात्मक प्रक्रिया भी माना जाता है।
3. प्रशिक्षण - प्रशिक्षण एक विनिर्दिष्ट कार्य को करने के लिए समझदारी, कौशल तथा व्यवहार को बढ़ाने की गतिविधि होती है। यह कार्य आधारित प्रक्रिया होती है जो कार्य कौशल को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रीत करती है।
मानव संसाधन प्रबंधन द्वारा बहुत सी गतिविधियाँ की जाती है जिनमें शामिल हैं:
1. भर्ती अर्थात योग्य व्यक्तियों की खोज
2. विश्लेषण कार्य
3. प्रतिपूर्ति विकास तथा कमीशन योजना
4. विकास तथा कुशल प्रदर्शन के लिए कर्मचारियों का विकास तथा प्रशिक्षण
5. श्रम संबंधों तथा संघ प्रबंधन संबंधों को बनाये रखना
6. शिकायतों का निपटारा
7. कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा तथा कल्याण प्रदान करना
8. कानूनी दावों से कम्पनी का बचाव करना
मानव शक्ति को निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण माना जाता है:
(अ) भविष्य की व्यक्तिगत आवश्यकताएँ - मानव शक्ति नियोजन भविष्य की मानव शक्ति आवश्यकताओं का निर्धारण करता है। बिना मानव शक्ति एक संगठन में सही समय पर सेवा को सुरक्षित नहीं किया जा सकता है।
(ब) परिवर्तन का सामना - मानव शक्ति नियोजन एक संगठन को बाजार स्थितियों, बलों, तकनीकियों, उत्पादों तथा सरकारी नीतियों आदि में परिवर्तनों का सामना करने में सक्षम बनाता है।
(स) कुशल व्यक्ति - ज्यादा तकनीकी विशेषज्ञ व्यक्ति सामान्यतः कम होते है तथा इसलिए, यह संगठन के लिए समस्या हो सकती है। तकनीकी कुशल व्यक्तियों की कमीं से बचाव के लिए मानव शक्ति नियोजन आवश्यक होता है।
प्रतिपूर्ति वेतन, कमीशन आदि का प्रारूप होती है यह आमतौर पर नौकरियों, आवश्यकताओं, कौशल, शिक्षा के स्तर, सुरक्षा के लिए खतरा आदि पर बंधी होती है। यह अच्छा काम करने के लिए काम करने और अच्छे कार्य के लिए कर्मचारियों को प्रेरित करने के लिए कर्मचारियों को आकर्षित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक प्रमुख तरीका हो सकता है। कर्मचारी अपनी सेवा तीन प्रकार की प्रतिपूर्ति के लिए करते हैं: वेतन, लाभ तथा कमीशन।
विक्रम संगठन के भीतर से कर्मचारियों की भर्ती इस प्रकार कर सकता हैः
1. स्थानांतरण:
इसका अर्थ प्राधिकरण के एक ही स्तर पर एक कर्मचारी का एक कार्य से दूसरे कार्य में स्थानांतरण है। स्थानान्तरण में मुआवजे के स्तर में और अधिकारों के स्तर में कोई बदलाव नहीं आता है।
2. संवर्धन:
यह प्राधिकरण के उच्च स्तर पर एक कर्मचारी का एक दूसरे कार्य के साथ स्थानान्तरण को दर्शाता है। पदोन्नति में प्राधिकरण स्तर,
रैंक,
जिम्मेदारियों के साथ-साथ प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होती है।
अभिनव को कर्मचारियों के चयन के लिए निम्न चरणो का पालन करने की जरूरत है:
1. प्रारंभिक जांच
2. चयन परीक्षण
3. रोजगार साक्षात्कार
4. संदर्भ और पृष्ठभूमि की जाँच
5. चयन निर्णय
6. चिकित्सा परीक्षा
7. नौकरी की पेशकश
8. रोजगार का अनुबंध
हाँ,
सुश्री यामिनी सही है।
निम्न कारणों से बाहरी भर्ती आंतरिक भर्ती की तुलना में बेहतर हैरू
1. नई प्रतिभा:
बाहरी भर्ती से संगठन के लिए नयी प्रतिभा नए विचारों के साथ आ सकती है।
2. नवीनतम तकनीकी ज्ञान:
संगठन को कैंपस भर्ती के माध्यम से नवीनतम तकनीकी ज्ञान के साथ कर्मचारी मिल सकते हैं।
3. प्रतिस्पर्धा की भावना:
जब संगठन के बाहर से कर्मचारियों को भर्ती किया जाता है तो यह संगठन के मौजूदा कर्मचारियों में प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करता है।
हाँ,
प्रशिक्षण कर्मचारियों और कंपनी दोनों के लिए फायदेमंद होगा।
प्रशिक्षण के लाभ हैं:
1) प्रशिक्षण एक व्यवस्थित अध्ययन है जो समय और प्रयास की बर्बादी को कम करता है।
2) यह गुणवत्ता और मात्रा दोनो में कर्मचारी की उत्पादकता को बढ़ाता है।
3) इसका उद्देश्य कर्मचारियो कीं ढलाई करना है ताकि वे संगठन के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास कर सके।
4) यह तेजी से बदलते पर्यावरण के लिए प्रभावी प्रतिक्रिया प्राप्त करने में मदद करता है।
5) प्रशिक्षण कर्मचारी मनोबल बढ़ता है और अनुपस्थिति और कर्मचारी कार्य को कम कर देता है।
नहीं,
प्रबंधक सही नहीं है।
प्रशिक्षण अच्छे संगठन के साथ-साथ कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। संगठन के लिए प्रशिक्षण का महत्व है:
1) प्रशिक्षण एक व्यवस्थित अध्ययन है जो समय और प्रयास की बर्बादी को कम करता है।
2) यह गुणवत्ता और मात्रा दोनो में कर्मचारी की उत्पादकता को बढ़ाता है।
3) इसका उद्वेष्य कर्मचारियो कीं ढलाई करना है ताकि वे संगठन के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास कर सके।
कर्मचारी के लिए प्रशिक्षण का महत्व है
:
1) प्रशिक्षण की वजह से विकसित कौशल तथा ज्ञान व्यक्ति के बेहतर भविष्य का नेतृत्व करता है।
2) प्रशिक्षण मशीनों से निपटने में कर्मचारी को अधिक सक्षम बनाता है।
3) यह कर्मचारियों की संतुष्टि और मनोबल को बढाता़ है।
अवधारणाओं को ऊपर बताया गया है:
1. प्रशिक्षण और
2. विकास,
क्रमशः
1. प्रशिक्षण:
यह ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा कर्मचारियों की विशिष्ट कार्यों को करने की अभिरुचि,
कौशल और क्षमताओं को बढ़ाया जाता है। यह मौजूदा कार्य पर उनके प्रदर्शन को बेहतर बनाता है या किसी इरादातन कार्य के लिए उन्हें तैयार करता है। संगठन या तो घर में प्रशिक्षण केंद्र रखते हैं या अपने कर्मचारियों को निरंतर सीखाने के लिए प्रशिक्षण और शैक्षिक संस्थानों के साथ गठबंधन करते हैं। यह एक कार्योन्मुख प्रक्रिया है।
2. विकास:
यह कर्मचारियों के बढ़ने में मदद करने के लिए तैयार शिक्षा के अवसरों को दर्शाता है। यह न केवल उन गतिविधियों को शामिल करता है जो काम के प्रदर्शन को बेहतर बनाती है बल्कि कर्मचारियों की वास्तविक संभावित क्षमता की दिशा में प्रगति में मदद करती है ताकि वे न केवल अच्छे कर्मचारी बने बल्कि बेहतर इंसान बने। यह एक भविष्योन्मुख प्रक्रिया है।
नियुक्तिकरण को संगठन में विभिन्न पदों पर कर्मियों की व्यवस्था तथा विभिन्न पदों को भरने के लिए आवश्यक कर्मियों को विकसित करने के प्रबंधकीय कार्य के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। नियुक्तिकरण संगठन में रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया होती है। नियुक्तिकरण कार्य अन्य प्रबंधकीय कार्यों अर्थात, योजना, आयोजन, निर्देशन और नियंत्रण आदि के लिए एक प्रमुख कार्य है। अन्य प्रबंधकीय कार्यों की प्रभावशीलता स्टाफ कार्य के प्रभाव पर आधारित होती है। यदि संगठन में सही काम के लिए सही लोगों को रोजगार दिया गया है तो एक संगठन, जटिल बाहरी वातावरण में अधिक गतिशील हो जाता है।
नियुक्तिकरण में पर्याप्त तथा प्रभावी मानव शक्ति द्वारा संगठनात्मक ढांचे का प्रबंधन शामिल होता है। नियुक्तिकरण मे निम्नलिखित शामिल हैं:
1. उन व्यक्तियों की पहचान करना जो कौशल, व्यवहार तथा रूचियों का सही सामान्जस्य रखता है।
2. उन्हें संगठन से जोड़ना तथा
3. उनके अधिकतम समन्वय को सुरक्षित करने के लिए संगठन के साथ उनकी संधी के लिए परिस्थितियों का निर्माण करना।
ये सभी एक स्वस्थ्य मानव संगठन निर्माण के लिए समानरूप से कठिन होते हैं।
समय पर आदेश को पूरा करने के लिए कंपनी को तुरंत अधिक लोगों की भर्ती करने की जरूरत है और इस मामले में सबसे उपयुक्त विधि श्रम ठेकेदार है।
श्रम ठेकेदारो गांवों और ग्रामीण क्षेत्रों के श्रमिकों से संपर्क रखते हैं और जब कभी भी कारखाने में या निर्माण स्थल पर श्रमिकों की आवश्यकता होती है,
वे गाँवों से श्रमिकों को बुला कर संगठनों में लगा देते हैं। वे इसके लिए कमीशन लेते हैं। यह विधि मजदूरों और अकुशल श्रमिकों की आपूर्ति के लिए उपयुक्त होती है।
बजटीय नियंत्रण - इस तकनीक के अंतर्गत व्यवसाय की विभिन्न क्रियाओं के लिए अग्रिम रूप से अलग-अलग बजट बना लिए जाते हैं। ये बजट, वास्तविक निष्पादन की तुलना करने के लिए और संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक कार्य करने हेतु मानकों का कार्य करते हैं।
मानको की यर्थाथता को ऑंकना - एक अच्छी नियंत्रण प्रणाली द्वारा प्रबन्ध निर्धारित मानकों की यथार्थता तथा उद्देश्य पूर्णता को सत्यापित कर सकता है। एक दक्ष नियंत्रण प्रणाली से वातावरण तथा संगठन में होने वाले परिवर्तनों की सावधानी से जॉच पड़ताल की जाती है तथा इन्हीं परिवर्तनों के संदर्भ में उनके पुनरावलोकन तथा संशोधन में सहायता करता है।
(क.) प्रगति प्रमापों का निर्धारण
(ख.) विचलन सहन सीमाएं
संगठनात्मक लक्ष्यों की निष्पत्ति - नियंत्रण संगठन के लक्ष्यों की ओर प्रगति का मापन करके विचलनों का पता लगाता है। यदि कोई विचलन प्रकाश में आता है तो उसके सुधार का मार्ग प्रशस्त करता है। इस प्रकार नियंत्रण संस्थान का मार्गदर्शन करता है तथा सद्मार्ग पर चलाकर संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करता है।
(क.) नियंत्रण
(ख.) नियत्रण का महत्व
(1.) कर्मचारी अभिप्रेरणा में सुधार करना - नियंत्रण के माध्यम से कर्मचारियों को अभिप्रेरित करने का प्रयास किया जाता है। नियंत्रण व्यवस्था के लागू होने की जानकारी होने पर सभी कर्मचारी पूरी लगन से काम करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उनके कार्य का मूल्यांकन होगा और प्रगति रिपोर्ट अच्छी आने पर उनकी संस्था में पहचान बनेगी।
(2.) संसाधनों का कुशलतम उपयोग करना- नियंत्रण मानवीय व भौतिक साधनों के अनुकूलतम उपयोग को संभव बनाता है। नियंत्रण के अंतर्गत यह देखा जाता है कि कोई भी कर्मचारी कार्य निष्पादन में जानबूझ कर देरी न करें। इसी प्रकार सभी भौतिक साधनों के उपयोग में हाने वाली बर्बादी को रोका जाता है।
यह कहा जाता है कि नियोजन भविष्य में झॉंकता है तो नियंत्रण पीछे की क्रिया का अवलोकन करता है। यद्यपि यह वाक्य आंशिक रूप से ही ठीक है। नियोजन भविष्य के लिए किया जाता है जिसका आधार भविष्य की दशाओं के विषय में भविष्यवाणी करना होता है। अतः नियोजन में आगे भविष्य देखना सन्निहित है और इसलिए यह प्रबन्ध का दूरदर्शी कार्य कहलाता है। इसके विपरीत नियंत्रण भूतपूर्व क्रियाओं की शव-परीक्षा (पोस्टमार्टम) है जो इस बात का पता लगाती है कि कहॉं-कहॉं विचलन है। इस आधार पर नियंत्रण पीछे देखने वाला कार्य है।
किसी भी संगठन के पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए यह महत्वपूर्ण होता है। जैसे ही एक योजना को कार्यान्वित किया जाता है इसे विभिन्न गतिविधियों और कार्यक्रमों के माध्यम से लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में निर्देशित किया जाता है। इन गतिविधियों और कार्यक्रमों को नियंत्रित करने के माध्यम से निगरानी रखी जाती है।
इसे इन चरणों के माध्यम से किया जाता है:
1. प्रदर्शन मानकों की स्थापना।
2. वास्तविक प्रदर्शन का मापन।
3. मानकों के साथ वास्तविक प्रदर्शन की तुलना।
4. विचलन विश्लेषण।
5. सुधारात्मक कार्रवाई करना।
इस तरह,
नियंत्रित संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है।
नियंत्रण गुणवत्ता बनाए रखने और इसमें सुधार लाने में मदद करता है: नियंत्रण प्रक्रिया को आरंभ से ही शुरू करना होता है अर्थात कच्चे माल की गुणवत्ता की जाँच फिर कच्चे माल के निर्मित माल के रूपांतरण की प्रक्रिया पर जाँच तथा फिर निर्मित उत्पाद की जाँच। एक प्रभावी गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली के परिणामस्वरूप गुणवत्ता के उत्पाद निर्माण होगा, अंततः जिससे बिक्री और मुनाफे में वृद्धि होगी।
नियंत्रण भविष्य में कार्यों के लिए निर्णय लेने में प्रबंधन को सक्षम बनाता है। उदाहरण के लिए, एक विक्रेता को प्रति सप्ताह 50 लेख बेचने की उम्मीद है। यदि सप्ताह के अंत में इसका वास्तविक प्रदर्शन, मानक से कम होता है, तो बिक्री प्रबंधक को तुरंत इसके कारणों का पता लगाना चाहिए। केवल तब ही वह प्रासंगिक फैसलों और शीघ्र उपचारात्मक कार्रवाई करने में सक्षम होगा।
अपने प्रारंभिक चरण में एक संगठन के पास संसाधन, कर्मचारी और बाजार होते हैं। जब एक संगठन फैलता है, तो इसे संगठनात्मक जटिलताओं के लिए खुद को अनुकूल करना पड़ता है। नियंत्रण उत्पादन, विपणन, वित्त और मानव संसाधन से संबंधित विविध गतिविधियों के साथ मुकाबला करने में संगठन की मदद करता है।
मानकों का निर्धारण करते समय निम्न कारकों को ध्यान में रखना चाहिए:
1. मानक आसानी से प्राप्त करने योग्य होने चाहिए।
2. इन्हें औसत दर्जे का होना चाहिए।
3. ये लचीले होने चाहिए अर्थात पर्यावरण में परिवर्तन के साथ मानकों में भी तदनुसार परिवर्तन किया जा सके।
‘‘विचलन’’
शब्द को मानक प्रदर्शन और वास्तविक प्रदर्शन के बीच अंतर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसलिए,
विचलन
= वास्तविक प्रदर्शन
- मानक प्रदर्शन
उदाहरण के लिए,
यदि उत्पादन विभाग में
100 इकाइयों का उत्पादन करने की योजना है और वास्तविक में केवल
90 इकाइयों का उत्पादन ही हुआ,
तो विचलन
100-90 = 10 इकाइयों का होगा।
इस विचलन जानने के बाद संगठन इस विचलन के कारणों का पता लगाती है और यह सुनिश्चित करने के लिए कि विचलन भविष्य में फिर से न हो,
इसके लिए सुधारात्मक उपाय करेगी।
महत्वपूर्ण बिंदु नियंत्रण विश्वास पर आधारित विचलन का विश्लेषण करने के एक नियंत्रण तकनीक है जिससे प्रबंधन को ऐसे महत्वपूर्ण परिणाम क्षेत्रों
(केआरए)
पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो एक संगठन की सफलता के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि इन महत्वपूर्ण परिणाम क्षेत्रों
में कुछ भी गलत होता है तो इसका परिणाम पूरे संगठन को भुगतना पड़ता है।
उदाहरण:
एक विनिर्माण इकाई में,
श्रम लागत में वृद्धि,
किराये में
15% वृद्धि की तुलना में अधिक परेशान कर सकती है।
प्रदर्शन को मापने की कुछ तकनीकें हैं:
1. व्यक्तिगत अवलोकन
- लगातार काम के प्रदर्शन के दौरान पर्यवेक्षक द्वारा अवलोकन। इसे अधिकतर ऐसे कोडांतरण उद्योगों में इस्तेमाल किया जाता है जहाँ प्रत्येक भाग कोडांतरण के दौरान चेक किया जाता है।
2. नमूना जाँच
- बड़े संगठनों में,
उत्पादन की भयावहता के कारण एक छोटे से संगठन के विपरीत होने के कारण उत्पादन की संपूर्णता से जाँच नहीं की जा सकती है। इसलिए,
उत्पादन की गुणवत्ता की जाँच के लिए उत्पादन को यादृच्छिक माना जाता है।
3. प्रदर्शन रिपोर्ट
- वरिष्ठ अपने अधिनस्थों के प्रदर्शन की रिपोर्ट तैयार करते हैं। ये दैनिक,
साप्ताहिक,
मासिक आदि हो सकती हैं।
प्रबंधन के नियंत्रण कार्य पूर्व निर्धारित मानकों के साथ वास्तविक प्रदर्शन की तुलना करता है तथा यदि कोई विचलन हो तो विचलन के लिए उपाय और सुधारात्मक कार्य करके इन्हें ठीक करता है। भविष्य की योजनाओं को ऐसी समस्याओं के आलोक में तैयार किया जाता है जो पहचाने हुए होते हैं। इस प्रकार, नियंत्रण के माध्यम से सूचनाओं को अतीत के अनुभवों से प्राप्त किया जा सकता है जो भविष्य में प्रभावी योजना बनाने में प्रबंधन को सक्षम बनाता है।
महत्वपूर्ण बिंदु नियंत्रण अर्थात महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना तथा इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में यदि कोई विचलन हो, तो उसमें तुरंत भाग लिया जाना चाहिए। ये महत्वपूर्ण क्षेत्र ऐसे क्षेत्र होते हैं जिनका पूरे संगठन पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, यदि श्रम लागत में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है डाक लागत में 20 रु की वृद्धि हुई है तो श्रम लागत में वृद्धि पर अधिक ध्यान देना चाहिए क्योंकि इसका संगठन के लाभ पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।
(क.) यहां नियंत्रण प्रकिया के तीसरे चरण वास्तविक प्रगति की प्रमापों से तुलना की चर्चा की गई है।
वास्तविक प्रगति की प्रमापों से तुलनाः इस चरण पर वास्तविक प्रगति की तुलना प्रमापों से की जाती है। इससे वास्तविक प्रगति एवं प्रमापों में विचलन की जानकारी प्राप्त होती है।
विचलन दो प्रकार के हो सकते हैं। (1) नकारात्मक विचलन तथा (2) धनात्मक विचलन नियंत्रण प्रक्रिया में ऋणात्मक विचलन अर्थात् प्रमापित कार्य से कम कार्य होने के कारणों का पता लगाना तो जरूरी है ही, लेकिन धनात्मक विचलनों के कारणों की जानकारी प्राप्त करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। धनात्मक विचलन का अभिप्राय वास्तविक कार्य प्रमापित कार्य से अधिक होना है। यदि यह जानकारी मिल जाए कि वास्तविक प्रगति अधिक होने के क्या कारण हैं तो उनमें और अधिक सुधार करके भविष्य में कार्यकुशलता को बढ़ाया जा सकता है।
मूल्य
(ख.) * अच्छा स्वास्थ्य
* उपयुक्त मूल्य
(क.) नियोजन एंव नियंत्रण
(ख.) (1.) लव का उत्तर एंव प्रबन्ध के कार्यो में संबंधः नियोजन आगे देखना है जबकि नियंत्रण पीछे देखना। योजनाएं हमेशा भविष्य के लिए बनाई जाती हैं और निर्दिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए भविष्य में की जाने वाली कार्यवाही को निर्धारित करती है। इसके विपरीत नियंत्रण को पीछे देखने की प्रक्रिया कहा जाता है क्योंकि इसके अंतर्गत प्रबन्धक, कुछ कार्य पूरा हो जाने के बाद ही यह देखता है कि कार्य प्रमापों के अनुसार हुआ था अथवा नहीं। अतः स्पष्ट है कि नियोजन आगे अर्थात् भविष्य में देखता है और नियंत्रण पीछे अर्थात् भूतकाल में देखता है।
(2.) कुश का उत्तर एवं प्रबन्ध के कार्यो में संबंधः नियोजन पीछे देखना है जबकि नियंत्रण आगे देखना : नियोजन को पीछे देखना इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि योजनाओं का निर्माण भूतकाल में हुई घटनाओं अथवा प्राप्त अनुभवों के आधार पर ही किया जाता है। दूसरी ओर नियंत्रण भूतकाल में किए गए कार्य का मूल्यांकन करना तो है लेकि इसमें सुधारात्मक कार्यवाही भविष्य के लिए ही की जाती है। अतः यह कहनें में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि नियोजन पीछे देखना है जबकि नियंत्रण आगे देखना।
नियोजन एवं नियंत्रण प्रबंध के अपृथ्क्करणीय यमज -जुडवा - हैं। नियंत्रण प्रणाली में कुछ मानकों को पहले से ही अस्तित्व में स्वीकार कर लिया जाता है। निष्पादन के यही मानक जो नियंत्रण के लिए आधार प्रदान करते हैं, ये नियोजन द्वारा ही सुलभ कराए जाते हैं यदि एक बार नियोजन सक्रियात्मक हो जाता है तो नियंत्रण के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि प्रगति की मॉनीटरिंग करें तथा विचलनों को खोजें तथा इस बात को निश्चित करें कि जो भी कार्यवाही हुई है वह नियोजन के अनुरूप ही है। यदि विचलन है तो उसकी सुधारात्मक कार्यवाही करें। इस प्रकार नियोजन बिना नियंत्रण अर्थहीन हैं उसी तरह नियंत्रण बिना नियोजन दृष्टिहीन है। यदि मानकों का पहले सह ही निर्धारण न कर लिया जाए तो प्रबंधक को नियंत्रण क्रिया में लिया जाए तो प्रबंधक को नियंत्रण क्रिया में करने के लिए कुछ भी नहीं है। यदि नियोजन नहीं है तो नियंत्रण का कोई आधार ही नहीं है।
ऋण समता अनुपात की गणना कुल पूँजी में से ऋण के रूप में की जाती है अर्थात:- (ऋण/ऋण $ समता)
ऋण और इक्विटी फर्म के लिए अपनी लागत और जोखिम के तात्पर्य से भिन्न होते हैं। ऋण की लागत समता की लागत की तुलना में कम होती है क्योंकि ऋणदाताओं की जोखिम समताधारियों की जोखिम से कम होती है, क्योंकि ऋणदाता को प्रत्याय एक स्थायी दर पर प्राप्त होता है परंतु समता धारी को लाभ की स्थिति में लाभ की प्राप्ति होती है। इस अनुपात की गणना पूंजी संरचना का पता करने के लिए की जाती है।
A.
उत्पादन प्रबंधक के पद का कार्य विवरण।
B.
एक कम्पनी के उत्पादों के लिए मांग।
C.
कम्पनी के उत्पादों का विक्रय मूल्य।
D.
आवश्यक कच्चे माल की मात्रा।
नियोजन के दौरान बनायी गई एक संकल्पना प्रबंधन के नियंत्रण से परे बाह्य कारको का पूर्वानुमान है जैसे - उत्पाद की मांग, सरकार की नीति, कर की दर आदि।
A.
संगठन।
B.
नियुक्तिकरण।
C.
नियोजन।
D.
नियंत्रण।
नियोजन प्रबंधन का प्रथम कार्य होता है। नियोजन कार्य के लिए योजना प्रदान करता है। नियोजन कोई कार्य करने से पहले का प्राथमिक कार्य होता है।
A.
संगठन के साथ।
B.
नियुक्तिकरण के साथ।
C.
निर्देशन के साथ।
D.
नियोजन के साथ।
नियोजन प्रबंधन का पहला कार्य होता है। प्रबंधन के इस कार्य में उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न गतिविधियाँ विनिर्दिष्ट होती हैं।
A.
दो प्रकारों में।
B.
सात प्रकारों में।
C.
आठ प्रकारों में।
D.
दस प्रकारों में।
एक नियोजन सभी विशेष परिणामों की प्राप्ति के लिए आवश्यक गतिविधियों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्धता का एक प्रकार है। नियोजन हम जहाँ हैं और हम कहाँ जाना चाहते हैं के बीच की दूरी को पाटने का प्रयास है। नियोजन को निम्न आठ प्रकारों में बाँटा जा सकता हैः उद्देश्य, रणनीति, नीति, प्रक्रिया, पद्धति, नियम, कार्यक्रम और बजट।
A.
रणनीति।
B.
योजना।
C.
उद्देश्य।
D.
नीति।
एक नई परियोजना में निवेश करके, एबीसी लिमिटेड अपने कारोबार का विस्तार कर रही है। प्रबंधन, पूरी तरह से संगठन के विकास की संभावनाओं का फायदा उठा रही है जिससे इसके आर्थिक उद्देश्य पूरे हो रहे हैं।
A.
परिसर का विकास।
B.
लक्ष्य निर्धारित करना।
C.
कार्रवाई के वैकल्पिक पाठ्यक्रमों की पहचान।
D.
एक विकल्प का चयन।
नियोजन की प्रक्रिया संगठन के लक्ष्यों के निर्धारण से आरंभ होती है। एक बार लक्ष्यों के निर्धारण होने पर संकल्पनाओं या परिसर का विकास किया जाता है।
A.
पद्धति।
B.
नीति।
C.
प्रक्रिया।
D.
लक्ष्य।
पद्धति दैनिक या आवर्ति कार्यों को करने का एक व्यवस्थित या औपचारिक तरीका है। एक उचित पद्धति का चयन समय, धन और प्रयासों को बचाता है, इस प्रकार, दक्षता बढ़ती है।
A.
नियम।
B.
प्रक्रिया।
C.
नीति।
D.
उद्देश्य।
नियम वह विनिर्दिष्ट कथन होते हैं जो यह सूचित करते हैं कि क्या किया जाना है। नियमों में किसी भी प्रकार के अंतर की गुंजाइश नहीं होती है। नियमों का सख्ती से पालन किया जाना होता है। यदि कोई इन नियमों का पालन करने में विफल होता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाती है।
A.
कार्यक्रमों से।
B.
नियमों से।
C.
रणनीतियों से।
D.
प्रक्रियाओं से।
नीतियाँ और प्रक्रिया एक दूसरे के साथ आपस में जुड़ी होती हैं क्योंकि प्रक्रिया एक व्यापक नीतिगत ढांचे के भीतर चलती हैं।
A.
पद्धती।
B.
नियम।
C.
प्रक्रिया।
D.
लक्ष्य।
नियमों को प्रकृति में आधिकारिक तथा प्राधिकृत माना जाता है क्योंकि एक बार नियमों का गठन करने के बाद उनका सख्ती से पालन किया जाना होता है। यदि कोई इन नियमों का पालन करने में विफल होता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाती है।
यह एक एकल उपयोग योजना है। इसका अभिप्राय एक ऐसी योजना से है जो एक विशेष परिस्थिति सी आवश्यकता को पूरा करने के लिए बनाई जाती है।
उद्देश्य
इसका अभिप्राय विनिन्न विकल्पों का मूल्यांकन करके सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करने से है।
पद्धति।
रणनीति।
इसका अभिप्राय अनिश्चित भविष्य में सफलता को सुनिश्चित करने के लिए योजनाओं की प्रगति को लगातार देखते रहना है।
नियोजन एर्वव्यपाक कार्य है क्योंकि इसकी आवश्यकता सभी संगठनों में तथा सभी प्रबन्धकीय स्तरों पर होती है।
तीनों प्रबन्धकीय स्तरों पर।
समय की एक निश्चित अवधि के लिए उद्यम की गतिविधियों को पूरा करने के लिए एक व्यवस्थित आधार के अनुसार भविष्य की जरूरतों का अनुमान बजट के रूप में जाना जाता है।
निर्दिष्ट स्थितियों के लिए सम्मान के साथ की जाने वाली विशिष्ट और निश्चित कार्रवाई को नियम कहा जाता है।
कार्यक्रम
नियम
नियोजन सभी स्तरों पर आवश्यक होता है।
नियोजन परिसर की स्थापना
व्यूह-रचना
उद्देश्य
नियोजन, नव-प्रवर्तन विचारों को प्रोत्साहित करता है क्योंकि नियोजन क्या करना है इसका पूर्व निर्धारण है। इसमें विकल्पों में से उद्देश्यों, नीतियों, प्रक्रियाओं और कार्यक्रमों का चयन शामिल होता है।
नियोजन दी गई समयावधि के लिए लक्ष्यों तथा उद्देश्यों के निर्धारण तथा उन्हें प्रभावपूर्ण तथा कुशलतापूर्वक प्राप्त करने के लिए योजना बनाने की प्रक्रिया है। यह प्रारंभ तथा अंत दोनों से सम्बंधित है अर्थात क्या किया जाना है तथा कैसे किया जाना है।
कभी कभी नियोजन काफी समय ले लेता है जिस कारण उसके क्रियान्वयन के लिए समय ही नहीं बचता है। इसलिए नियोजन एक समय लेने वाली प्रक्रिया है।
नियोजन एक मानसिक व्यायाम है क्योंकि इसमें बुद्धिमान कल्पनाए दूरदर्षिता तथा सुदृढ़ फैसले की आवश्यकता शामिल होती है।
विधियाँ आवृति तथा नियमित गतिविधियों को औपचारिक रूप तथा मानकीकृत तरीके से पूरा करने के तरीके हैं। इन्हें किफायत और दक्षता सुनिश्चित करने, भ्रम की स्थिति को रोकने के लिए और वांछित तथा नियोजित तर्ज पर चल रहे परिचालनों को चालू रखने के लिए बनाया जाता है।
(क.) यहां नियोजन प्रक्रिया के तीसरे चरण वैकल्पिक कार्यवाहियों की पहचान करना का वर्णन किया गया है।
(ख.) विकल्पों की अधिकतम लागत सीमा के निर्धारित करने का न्यूनतम प्रारंभिक मापदण्ड कहा जाता है।
यह एक स्थायी योजना है। इसका अभिप्राय एक ऐसी योजना से है जो लगतार चलती है तथा एक संगठन में बार-बार होने वाली क्रियाओं का मार्गदर्शन करती है।
इसका अभिप्राय उस योजना से है जिसके अन्तर्गत अपेक्षाकृत बड़ी संगठनात्मक क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है और मुख्य पदों, उनके क्रम व समय तथा उत्तरदायी विभागों का उल्लेख किया जाता है।
नियोजन व्यावसायिक गतिविधियों के हर प्रकार के लिए आवश्यक होता है। प्रत्येक विभाग को व्यापार के वांछित लक्ष्य की दिशा में नियोजन पर निर्भर व्यवस्थित योजना, विभिन्न विभागीय योजनाओं और अपनी एकीकृत ऊर्जा की दिशा में समन्वय की आवश्यकता होती है, चाहे वह क्रय, विक्रय, लेखा, लेखा परीक्षा, विपणन आदि हो। इस प्रकार प्रभावी संगठन, नियुक्तिकरण, निर्देशन और नियंत्रण सभी में नियोजन की आवश्कता होती है।
इस कथन का अर्थ है कि नियोजन भविष्योन्नमुख गतिविधि है जिसमें आगे देखना तथा भविष्य के लिए तैयार होना शामिल है। यह भविष्य में झांकता है,
विश्लेषण करता है और अनुमान लगाता है।
नियोजन को एक अवधि के लिए उद्देश्य और लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें सर्वोत्तम संभव तरीके से प्राप्त करने के लिए एक कार्य योजना तैयार करने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
योजना हमेशा एक निश्चित समय अवधि के लिए विकसित की जाती है।
इस स्थिति में वर्णित सीमा में नियोजन कठोरता की ओर जाता है।
एक निश्चित समय के भीतर उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किसी भी संगठन में एक अच्छी तरह से परिभाषित योजना तैयार की जाती है। हालांकि,
कभी कभी लचीलापन परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक होता है,
लेकिन प्रबंधक इसे संशोधित करने में सक्षम नहीं होते हैं क्योंकि योजनाएँ इसकी अनुमति नहीं देते हैं। इस प्रकार,
योजनाएँ बदली हुई परिस्थितियों से निपटने के लिए सक्षम होने के लिए लचीली नहीं होती है,
भले ही,
यह संगठन के हित में हो।
(क.) प्रमापीकरण
(ख.) यहां नियोजन की निम्न सीमाएं प्रकाशित हो रही हैं
(i) नियोजन अलोचकता पैदा करता है।
(ii) नियोजन रचनात्मकता को कम करता है।
(ग) यहां निम्न मूल्यों का हनन हो रहा है।
(i) पहल क्ष्मता का हनन।
(ii) कुशल श्रमिकों के उत्पादन में कमी।
नियोजन अर्थात अग्रिम में सोचना इसलिए यह आगे देखने की एक गतिविधि होती है जिसे भुतकाल के लिए नहीं की जा सकता है। इसमें अग्रिम में देखना शामिल है कि भविष्य में क्या कार्य और कैसे किया जायेगा। इसके वातावरण में अवसरों और खतरों की आशंका होती है। इस प्रकार,
योजना में पूर्वानुमान शामिल होता है।
नियोजन का उद्देश्य एक संगठन के लाभ के लिए प्रभावी ढंग से भविष्य की घटनाओं को पूरा करना होता है। सभी प्रबंधक अतीत के अनुभवों और सूचना के आधार पर भविष्य की भविष्यवाणी करने का प्रयास करते हैं।
उदाहरण के लिए,
एक व्यापार बिक्री के पूर्वानुमान के आधार पर इसके उत्पादन और संबंधित कार्यों की योजना तैयार करता है।
योजना के विभिन्न प्रकार हैं:
1) उद्देश्य
2) व्यूह-रचना
3) नीति
4) प्रक्रिया
5) विधि
6) नियम
7) बजट
8) कार्यक्रम
विधि:
विधियाँ आवृति तथा नियमित गतिविधियों को औपचारिक रूप तथा मानकीकृत तरीके से पूरा करने के तरीके हैं। इन्हें किफायत और दक्षता सुनिश्चित करने,
भ्रम की स्थिति को रोकने के लिए और वांछित तथा नियोजित तर्ज पर चल रहे परिचालनों को चालू रखने के लिए बनाया जाता है।
A.
मानको का निर्धारण।
B.
वास्तविक प्रदर्शन का मापन।
C.
मानकों से वास्तविक प्रदर्शन की तुलना।
D.
अंतर के कारण की बारीकी से जांच यदि कोई हो तो।
विचलनों की पहचान के पश्चात्, इन विचलनों के कारणों के लिए विश्लेषण की आवश्यकता होती है। एक विचलन के उत्पन्न होने के कई कारण हो सकते हैं।
A.
मानकों की स्थापना से।
B.
प्रदर्शन के मापन से।
C.
सुधारात्मक उपाय करने से।
D.
पीछा करने से।
नियंत्रण प्रक्रिया प्रदर्शन मानकों की स्थापना से आरंभ होती है। वह मानक मापदंड जिसके खिलाफ वास्तविक प्रदर्शन मापा जाएगा।
A.
मानव संसाधन प्रबंधन पर।
B.
निर्णयन पर।
C.
संगठनात्मक संरचना के निर्माण पर।
D.
मानकों से वास्तविक प्रदर्शन की तुलना पर।
नियंत्रण मानकों से वास्तविक प्रदर्शन की तुलना पर अपना ध्यान केंद्रीत करता है। नियंत्रण एक संगठन की योजनानुसार गतिविधियों को सुनिश्चित करता है।
A.
अर्थव्यवस्था के प्रबंधन की मूल बातें।
B.
अपवाद द्वारा प्रबंधन।
C.
कर्मचारियों पूर्व बाज़ार।
D.
बाज़ार आधारित मूल्यांकन।
एम बी ई का पूरा नाम अपवाद द्वारा प्रबंधन है, जिसके अनुसार प्रबंधकों को केवल उन विचलनों का ध्यान रखना चाहिए जो एक निश्चित सीमा से परे होते हैं।
A.
संगठन तथा नियंत्रण।
B.
नियोजन तथा नियंत्रण।
C.
नियुक्तिकरण तथा नियंत्रण।
D.
निर्देशन तथा नियंत्रण।
प्रबंधन का अविभाज्य जोड़ा नियोजन तथा नियंत्रण होता है। नियोजन प्रबंधन की प्रक्रिया को शुरू करता है तथा नियंत्रण प्रक्रिया को पूरा करता है। योजना नियंत्रण का आधार होती है तथा बिना किसी नियंत्रण के योजनाएँ बेकार होती है।
A.
मुख्य परिणाम क्षेत्र।
B.
मुख्य समीक्षा क्षेत्र।
C.
मुख्य उपाय क्षेत्र।
D.
मुख्य अनुपात क्षेत्र।
एक संगठन की सभी क्रियाओं पर नियंत्रण रखना न तो बचतपूर्ण है और न ही सरल। अतः उन क्रियाओं पर को पहले से ही निश्चित कर लेना चाहिए जिनकी संगठन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। इन्हें मुख्य परिणाम क्षेत्र कहते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि प्रबंधकों को छोटी-छोटी कम महत्वपूर्ण क्रियाओं में न उलझ कर उन क्रियाओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए जिनके विपरीत परिणाम आने पर संस्था को भारी नुकसान हो सकता है।
A.
योजनाओं का निष्पादन और लक्ष्यों की प्राप्ति
B.
मानवशक्ति आवश्यकता।
C.
संगठनात्मक ढाँचा।
D.
निर्णयन।