नियंत्रण।
नियंत्रण
यह नियंत्रण है।
नियंत्रण यह विश्लेषण करने की प्रक्रिया है कि कार्य योजना के अनुरूप किये जा रहे हैं या नहीं तथा नियोजन की पुष्टि करने के लिए सुधारात्मक कार्रवाई की गई है या नहीं।
नियंत्रण में, वास्तविक प्रदर्शन की मानक प्रदर्शन के साथ विचलनों का पता लगाने के लिए तुलना की जाती है।
नियंत्रण वास्तविक परिणामों और इच्छित परिणामों को एक साथ करीब लाने के लिए उठाये गये कदमों की प्रक्रिया होती है।
नियंत्रण।
मानक प्रदर्शन के साथ वास्तविक प्रदर्शन की।
विचलन वास्तविक प्रदर्शन और मानक प्रदर्शन के बीच अंतर को संदर्भित करता है।
नियंत्रण की प्रक्रिया में ऐसे चरण निम्नलिखित हैं जो योजना के अनुरूप घटनाओं के सम्मोहक के साथ संबंधित होते हैं:
1. विचलन विश्लेषण।
2. सुधारात्मक कार्रवाई।
नियंत्रण प्रक्रिया में वास्तविक प्रदर्शन की तुलना मानक प्रदर्शन से करके विचलनों का पता लगाया जाता है।
नियंत्रण पूर्व निर्धारित मानकों से विचलन का पता लगाता है, इसलिए, इसे एक पीछे देखने वाला कार्य कहा जाता है।
योजना नियंत्रित करने के लिए मानक प्रदान करती है जिनके बिना नियंत्रण लक्ष्यहीन या निराधार हो जाता है।
तरलता अनुपात :- तरलता अनुपात की गणना व्यवसाय की अल्पकालीन तरलता का निर्धारण करने के लिए किया जाता है। तरलता अनुपात व्यवसाय की अपने लेनेदारों को चुकाने की क्षमता को निष्चित करता है। इसकी गणना इस प्रकार की जा सकती हैः-
तरल सम्पत्तियाँ / चालू दायित्व
उदाहरण :- यदि एक संगठन का तरलता अनुपात 2: 1 है तो वह प्रभाविपूर्ण तरीके से अपने दायित्वों को चुका सकता है।
शोधन क्षमता अनुपात :- वह अनुपात जिसकी गणना व्यवसाय की दीर्घकालीन शोधन क्षमता का पता करने के लिए की जाती है, उसे शोधन क्षमता अनुपात कहते हैं।
उदाहरण के लिए - यदि एक फर्म अपने दीर्घकालीन दायित्वों को चुकाने में सक्षम है या नहीं तो यह अनुपात विष्लेशण में सहायता नहीं करते हैं।
(क.) संगठन व नियंत्रण।
(ख.) (i). संगठन से संबंधित अवधारणाः यहां संगठन प्रकिया के दूसरे चरण विभागीकरण का वर्णन किया गया है।
(ii). नियंत्रण से संबंधित अवधारणा : नियंत्रण से संबंधित निम्नलिखित दो अवधारणाओं का वर्णन किया गया है:
· महत्वपूर्ण बिंदुओं पर नियंत्रणः इसका अभिप्राय प्रबन्ध की उस अवधारणा से है जिसका मानना है कि प्रबन्धकों को सभी क्रियाओं के स्थान पर केवल महत्वपूर्ण क्रियाओं पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
अपवाद द्वारा प्रबन्धः इसका अभिप्राय संगठनात्मक नियंत्रण के उस सिद्धान्त से है जिसका मानना है कि केवल महत्वपूर्ण विचलनों को ही उच्च प्रबन्ध के ध्यान में लाना चाहिए।
A.
पर्यवेक्षण को कम करके।
B.
उत्पादन की लागत बढ़ा कर।
C.
कर्मचारियों के मनोबल को कम करके।
D.
कमजोर संभाल के द्वारा दुर्घटनाओं का कारण बन कर।
एक सुनियोजित और संगठित प्रशिक्षण कार्यक्रम की मदद से, कर्मचारी कार्य प्रक्रियाओं तथा नियमों का पालन करते समय आत्मनिर्भर हो जाते हैं। त्रुटियों में कमीं आती है तथा वे अपने वरिष्ठ को सहायता के लिए बहुत कम स्थितियों में कहते हैं।
A.
नियुक्ति।
B.
साक्षात्कार।
C.
भर्ती।
D.
प्रशिक्षण।
सही उम्मीदवारों को चुनने के बाद, उन्हें जिस विभाग और वग के लिए वे काम पर रखा जाता है उसमें नियुक्त कर दिया जाता है। यह पहली ऐसी गतिविधि होती है जो नए कर्मचारियों के संगठन में शामिल होने पर की जाती है।
A.
भर्ती के आंतरिक स्रोत का।
B.
चयन प्रक्रिया का।
C.
नियुक्ति का।
D.
भर्ती के बाहरी स्रोत का।
श्रम ठेकेदारों के माध्यम से काम पर रखना भर्ती के बाहरी स्रोत का एक हिस्सा है। भर्ती के इस स्रोत को सामान्यतः निर्माण कार्यों में श्रमिकों की भर्ती के लिए प्रयोग किया जाता है।
A.
नियंत्रण।
B.
नियुक्तिकरण।
C.
संगठन।
D.
नियोजन।
निर्देशन अर्थात कार्य करने के लिए लोगों को निर्देश देना तथा नियुक्तिकरण अर्थात संगठन में व्यक्ति उपलब्ध कराना। यदि कार्य के लिए व्यक्ति नहीं है तो निर्देश देना संभव नहीं होता है।
A.
शिक्षुता प्रशिक्षण में।
B.
प्रशिक्षुता प्रशिक्षण में।
C.
प्रकोष्ठ प्रशिक्षण में।
D.
आरंभिक प्रशिक्षण।
प्रशिक्षुता प्रशिक्षण में कोई सेवा अनुबंध नहीं होता है। चयनित उम्मीदवारों को निर्धारित अवधि के लिए रखा जाता है तथा ये नियमित रूप से पढ़ाई के साथ-साथ किसी भी कारखाने या कार्यालय में व्यावहारिक ज्ञान और कौशल प्राप्त करने के लिए कार्य करते हैं।
A.
विज्ञापन के माध्यम से।
B.
सीधी भर्ती के माध्यम से।
C.
श्रम ठेकेदारों के माध्यम से।
D.
कैम्पस भर्ती के माध्यम से।
‘बदली’ या आकस्मिक श्रमिकों को सीधी भर्ती के माध्यम से काम पर रखा है। सीधी भर्ती को अकुशल या अर्ध कुशल श्रमिकों की आकस्मिक रिक्तियों के लिए आम तौर पर काम में लिया जाता है।
A.
नए कर्मियों की प्रेरणा को।
B.
प्रतिस्पर्धा की भावना को।
C.
नयी प्रतिभा को।
D.
कार्यबल स्थानांतरण के लाभ को।
भर्ती के आंतरिक स्रोत कार्यबल स्थानांतरण के लाभ को सुनिश्चित करते हैं। कार्यबल को अधिक कर्मचारियों वाले विभागों से कम कर्मचारियों वाले विभागों में स्थानान्तरित किया जाता है।
A.
अयोग्य नौकरी चाहने वालों को समाप्त करना।
B.
आवेदक की जानकारी की पुष्टि करना।
C.
आवेदक की चिकित्सकीय योग्यता सुनिश्चित करना।
D.
कार्य के लिए आवेदक की उपयुक्तता का मूल्यांकन करना।
प्रारंभिक जांच के प्रयोजन का अयोग्य नौकरी चाहने वालों को खत्म करना होता है। यह आवेदनों में उपलब्ध जानकारी के आधार पर अयोग्य नौकरी चाहने वालों को नष्ट करने में प्रबंधक की मदद करता है।
A.
वित्त विभाग का।
B.
मानव संसाधन विभाग का।
C.
उत्पादन विभाग का।
D.
प्रशिक्षण विभाग का।
एक संगठन में शिकायतों से निपटने का मानव संसाधन विभाग के कर्तव्यों का एक अनिवार्य हिस्सा होता है।
A.
मशीनों की।
B.
पद्धतियों की।
C.
मानव संसाधनों की।
D.
उत्पादों की।
मानव संसाधन संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि एक संगठन का मानव संसाधन कुशल है तो यह संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कुशलतापूर्वक अन्य संसाधनों का उपयोग किया जा सकता है।
A.
निर्धारण को।
B.
मूल्यांकन को।
C.
कौशल विकास को।
D.
प्रदर्शन का मूल्यांकन को।
प्रशिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जो विशिष्ट कार्य करने के लिए अभिरुचि, कौशल और कर्मचारियों की क्षमताओं को बढ़ाती है।
A.
संगठन में नई प्रतिभाओं के आगमन को।
B.
कर्मचारियों के बीच प्रतिस्पर्धा की भावना को।
C.
संगठन में योग्य कर्मियों की आगमन को।
D.
मौजूदा कर्मचारियों की पदोन्नति की संभावना को।
भर्ती के बाहरी स्रोत मौजूदा कर्मचारियों की पदोन्नति की संभावना को कम करता है। बाहरी भर्ती मौजूदा कर्मचारियों के बीच असंतोष और निराशा को जन्म दे सकती हैं क्योंकि ये पदोन्नति की संभावना को कम करते हैं।
A.
भर्ती।
B.
प्रशिक्षण।
C.
चयन।
D.
विकास।
विकास कर्मचारियों को बढ़ने के लिए निर्मित सहायक सीखने के अवसरों को दर्शाता है। यह कर्मचारी के समग्र विकास को सक्षम बनाने की एक रोजगार उन्मुख प्रक्रिया होती है।
A.
भर्ती का बाहरी स्रोत।
B.
भर्ती का आंतरिक स्रोत।
C.
कार्य से परे प्रशिक्षण विधि।
D.
कार्य पर प्रशिक्षण विधि।
कई व्यापार संगठन अपने कार्यालयों में अनचाहे आवेदकों का एक डाटाबेस रखते हैं। जब भी आवश्यक हो, तो नौकरी चाहने वालों की एक सूची तैयार की जाती है तथा रिक्त पदों को भरने के लिए आवश्यकतानुसार इसकी जांच की जाती है।
A.
स्थानान्तरण।
B.
पदोन्नति।
C.
आकस्मिक कॉलर्स।
D.
छंटनी।
कई व्यापार संगठन अपने कार्यालयों में अनचाहे आवेदकों का एक डाटाबेस रखते हैं। जब भी आवश्यक हो, तो नौकरी चाहने वालों की एक सूची तैयार की जाती है तथा रिक्त पदों को भरने के लिए आवश्यकतानुसार इसकी जांच की जाती है। भर्ती के इस स्रोत का प्रमुख लाभ यह है कि यह अन्य स्रोतों की तुलना में भर्ती कर्मचारियों की लागत कम कर देता है।
A.
व्यापारिक परीक्षा।
B.
योग्यता परीक्षा।
C.
व्यक्तित्व परीक्षण।
D.
रूचि परीक्षण।
व्यापारिक परीक्षा एक व्यक्ति के मौजूदा कौशल को मापता है। यह पेशे और तकनीकी प्रशिक्षण के क्षेत्र में एक व्यक्ति की योग्यता और ज्ञान के स्तर को मापता है।
A.
व्यापारिक परीक्षा।
B.
योग्यता परीक्षा।
C.
व्यक्तित्व परीक्षण।
D.
रूचि परीक्षण।
योग्यता परीक्षा नए कौशल सीखने के लिए व्यक्ति की क्षमता का मापन करती है। यह परीक्षा व्यक्ति की विकसित करने के लिए क्षमता को इंगित करती है।
A.
विज्ञापन द्वारा।
B.
आकस्मिक कालर्स द्वारा।
C.
रोजगार कार्यालयों द्वारा।
D.
सीधी भर्ती द्वारा।
उद्योग और वाणिज्य के वरिष्ठ पदों को विज्ञापन के माध्यम से भरा जाता है। जब एक व्यापक विकल्प की आवश्यकता होती है तो समाचार पत्र या व्यापार और व्यावसायिक पत्रिकाओं में विज्ञापन को आम तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। रिक्त पदों के विज्ञापन के लाभ यह है कि विज्ञापन में संगठन और कार्य के बारे में अधिक जानकारी दी जा सके।
चयन परीक्षणों के विभिन्न प्रकार जो पवन लिमिटेड द्वारा किये जा सकते हैं:
1. बुद्धि परीक्षण
- यह परीक्षा कार्य प्रदर्शन में कर्मचारियों की दक्षता के स्तर की जाँच करने के लिए आयोजित की जाती है। इसका अर्थ खाली कार्य स्थान को भरना तथा कर्मचारियों की क्षमता का परीक्षण करना है।
2. रुचि परीक्षा
- यह परीक्षा उम्मीदवार की नई कार्य सीखने की क्षमता का परीक्षण करने के लिए आयोजित की जाती है। यह परीक्षा
उम्मीदवार के भविष्य में प्रदर्शन करने का पता करने में मदद करती है।
3. व्यक्तित्व परीक्षण
- यह परीक्षा उम्मीदवार के मानव व्यवहार का पता लगाने के लिए की जाती है। यह परीक्षा बुद्धि,
योग्यता,
दृष्टिकोण और उम्मीदवार के हित से संबंधित होती है।
4. व्यापार परिक्षण
- यह परीक्षा काम की स्थिति से संबंधित उम्मीदवार के बुनियादी ज्ञान और कौशल की जांच करने के लिए आयोजित की जाती है।
भर्ती के आन्तरिक स्त्रोतों (स्थानान्तरण, पदोन्नति, मित्रों एवं रिश्तेदारों द्वारा संतुष्ट कर्मचारियों की सिफारिश आदि) का उपयोग करने से हमें निम्नलिखित चार लाभ होंगे -
(1) कार्य निष्पादन में सुधार - कर्मचारी अपने कार्य-निष्पादन में सुधार के लिए अभिप्रेरित होते हैं क्योंकि ऐसे कर्मचारी संतुष्ट कर्मचारी की सिफारिश पर भर्ती किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त कर्मचारियों को अभ्यास एवं सीखने के द्वारा उनके निष्पादन को सुधारने के लिए प्रेरित भी करते हें क्योंकि इस स्त्रोत में पदोन्नति द्वारा भी भर्ती की जाती है।
(2) विश्वसनीय तरीका - भर्ती का यह स्त्रोत अधिक विश्वसनीय है क्योंकि इसमें सिफारिश तथा पदोन्नत कर्मचारियों के बारे में कम्पनी पहले से ही अवगत रहती है।
(3) कम्पनी का सौहार्दपूर्ण वातावरण - कार्यरत कर्मचारियों को पदोन्नति का लाभ मिलने से वह कार्य को बेहतर रूप से निष्पादित करते हैं। परिणामस्वरूप् कम्पनी में सौहार्दपूर्ण वातावरण बना रहता है।
(4) मितव्ययी स्त्रोत - कर्मचारियों की भीर्ती का आन्तरिक स्त्रोत मितव्ययी है क्योंकि स्थानान्तरण, कर्मचारियों को उच्च पदो के लिए प्रशिक्षण का एक तरीका है। इसलिए इसमें जिन कर्मचारियों को पदोन्नत किया जाता है, उनके प्रशिक्षण पर अधिक खर्च नहीं करना पड़ता है।
चयन की प्रक्रिया में दो चरण निम्नलिखित हैं रू -
(1) प्रारंभिक जांच: यह अयोग्य व्यक्तियों को आवेदन प्रक्रिया के समय ही हटाने में प्रबंधक की मदद करता है। प्रारंभिक साक्षात्कार अयोग्य व्यक्तियों को हटाता है जिससे अनावश्यक आवेदन पत्र इकठ्ठे नहीं होते हैं।
(2) रोजगार साक्षात्कार :- साक्षात्कार नौकरी के लिए मूल्यांकन अनुप्रयोगों उपयुक्तता करने के लिए आयोजित विभाग बातचीत में एक औपचारिकता होती है। साक्षात्कारकर्ताओं की संख्या कम होती है।
प्रशिक्षण के कुछ प्रमुख लाभ हैं:
1. आर्थिक संचालन
: प्रशिक्षित कर्मचारियों की क्षमता अधिक होती है और इस प्रकार,
प्रशिक्षण संचालन की लागत को कम करने में मदद करता है।
2. उत्पादकता में वृद्धि
: प्रशिक्षण कर्मचारियों के ज्ञान और कौशल में सुधार करने में मदद करता है जिसके बदले में उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा में बढ़ोतरी होती है।
3. पर्यवेक्षण मे कमी
: प्रशिक्षित कर्मचारियों को कम पर्यवेक्षण की जरूरत होती है क्योंकि वे अधिक विश्वास वाले और उन्हें अपने काम को संभालने के लिए अधिक से अधिक स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है।
4. मानक विधि
: काम के प्रदर्शन के तरीके मानकीकृत हो सकते हैं और इन्हें प्रशिक्षण की मदद से सभी कर्मचारियों को सिखाया जाता है।
5. कर्मचारियों का लाभ
: प्रशिक्षण के माध्यम से नए ज्ञान और कौशल में सुधार होता है संगठन के भीतर और बाहर के कर्मचारियों की भविष्य की संभावनाओं को बढ़ाता है।
6. उच्च प्रेरणा और मनोबल
: प्रशिक्षण कार्य संतुष्टि को बढ़ता है तथा कर्मचारी कारोबार और अनुपस्थिति की दर को कम करता है। प्रशिक्षण की मदद से कर्मचारी प्रबंधन के समूह कार्य के दर्शन,
कार्य नैतिकता तथा विकास की भावना को समझने में सक्षम होते हैं। यह कर्मचारियों के मनोबल में सुधार करता है।
प्रशिक्षण निम्नलिखित कारणों से आवश्यक है:
1. प्रशिक्षण विश्वास हासिल करने के लिए और जल्दी से प्रदर्शन के अपेक्षित स्तर को प्राप्त करने के लिए नए कर्मचारियों की मदद करता है।
2. प्रशिक्षण मौजूदा कर्मचारियों को नवीनतम तकनीकों को जानने में और कौशल के अप्रचलन से बचने में मदद करता है।
3. बरोठा के रूप में इस तरह का प्रशिक्षण सुरक्षा के लिए भी आवश्यक होता है। इस तरह का प्रशिक्षण सुरक्षा उपकरणों के समुचित उपयोग से कर्मचारियो को अवगत करता है।
4. प्रशिक्षण कर्मचारियों को नई तकनीक और काम के तरीकों को पढ़ाने के लिए आवश्यक होता है।
5. प्रशिक्षण अधिक जिम्मेदार पद के लिए पदोन्नती के लिए चुने गये कर्मचारियों को अपने दृष्टकोण को व्यापक बनाने और उनके काम से संबंधित नजरिए में सुधार करने के लिए आवश्यक होता है।
नहीं श्रीमान नीतिन की सोच सही नहीं है।
पर्याप्त कर्मचारी बाज़ार में अपना स्थान प्राप्त करने के लिए संगठन की सहायता कर सकते हैं तथा अपर्याप्त कर्मचारी संगठन की ख्याति में कमीं कर सकते हैं। एक संगठन का प्रदर्शन संगठन के कर्मचारियों के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।
नियुक्तिकरण का महत्व:
1. उपयुक्त व्यक्ति प्राप्त कर रिक्त स्थान की पूर्ति करना: नियुक्तिकरण रिक्त पदों को भरने के लिए आवश्यक होता है। जब तक रिक्त स्थान को किसी कर्मचारी द्वारा नहीं भरा जाये तब तक उसका कोई उपयोग नहीं होता है तथा खाली पद को भरना केवल नियुक्तिकरण कार्य द्वारा संभव है।
2. सही स्थान पर सही व्यक्ति: नियुक्तिकरण उचित भर्ती तथा चयन द्वारा सही व्यक्ति को सही कार्य स्थान सौंपकर अच्छे प्रदर्शन को सुनिश्चित करती है। कर्मचारियों को उनकी योग्यता के अनुसार उचित पदभार सौंपा जाता है।
3. उद्यम का विकास: कुशल तथा योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति कर नियुक्तिकरण उद्यम की निरंतरता तथा विकास को सुनिश्चित करता है।
4. मानव संसाधनों का अधिकतम उपयोग: मानव शक्ति नियोजन तथा कार्य विश्लेषण के द्वारा हम संगठन में आवश्यक कर्मचारियों की संख्या तथा प्रकार का पता लगा सकते हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति के निरर्थक होने की कोई स्थिति नहीं होती हैं।
यह कथन नियुक्तिकरण से सम्बंधित है।
नियुक्तिकरण का महत्व इस प्रकार हैं:
1. नियुक्तिकरण विभिन्न कार्यों के लिए उपयुक्त व्यक्तियों को खोजने तथा प्राप्त करने में सहायता करती है।
2. यह सही स्थान पर सही व्यक्ति को कार्य भार सौंपकर प्रदर्शन को बढ़ाता है।
3. यह प्रबंधकों के लिए नियोजन कर उद्यम के सतत् कार्य तथा विकास को सुनिश्चित करता है।
4. यह मानव संसाधनों को के अधिकतम उपयोग को सुनिश्चित करता है। यह संसाधनों के कम उपयोग तथा उच्च श्रम लागत से बचाव करता है।
5. यह कर्मचारियों के कार्यों का सही सर्वेक्षण तथा उचित लाभांश देकर उनकी संतुष्टि तथा शिक्षा में बढ़ोतरी करता है।
आन्तरिक संसाधनो से कर्मचारी भर्ती के लाभ इस प्रकार है:
1. आर्थिक:
यह विधि किफायती होती है। इससे एक व्यक्ति का चयन करने में लागत खर्च को बचाया जा सकता है।
2. वफादारी मे बढ़ोतरी:
यह कर्मचारियों के बीच वफादारी को बढ़ावा देता है। उच्च पदों को भरने के समय कर्मचारियों को पसंद किया जाता है। वे अपनेआप को संगठन का एक हिस्सा समझते हैं।
3. मनोबल मे बढ़ोतरी:
यह कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाने में मदद करता है। इसमें कर्मचारियों को उच्च पदों का आश्वासन दिया गया है।
आंतरिक स्रोतों से भर्ती कर्मचारियों की हानियाँ इस प्रकार हैं:
1. सीमित विकल्प:
भर्ती संगठन की आंतरिक उम्मीदवारों से की जाती है। कभी-कभी कर्मचारी उच्च पदों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।
2. स्थिर:
वर्तमान कर्मचारी नए विचारों को लाने में सक्षम नहीं हो सकते है। पुराने कर्मचारियों के बीच विचारों का ठहराव हो सकता है।

मानव संसाधन विभाग द्वारा नियुक्तिकरण की प्रक्रिया में निम्न चरण शामिल हैं:
1. जनशक्ति आवश्यकताओं का आकलन:
नियुक्तिकरण प्रक्रिया में जनशक्ति का अनुमान लगाने के साथ,
निकट भविष्य में संगठन द्वारा आवश्यक कर्मचारियों की संख्या और प्रकार का पता लगाना भी आवश्यक होता है।
2. भर्ती:
यह संगठन में नौकरी के लिए आवेदन करने के लिए लोगों मंे उत्प्रेरण की प्रक्रिया है। सभावित उम्मीदवारों को आकर्षित करने के लिए भर्ती के आंतरिक के साथ-साथ बाहरी स्रोतों का भी उपयोग किया जा सकता है।
3. चयनरू यह कार्य के रिक्त स्थान को भरने के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया है।
4. स्थानन और अभिविन्यास:
स्थानन चयनित उम्मीदवार द्वारा उस स्थान को प्राप्त करने को दर्शाता है जिसके लिए उसका चयन किया गया है। अभिविन्यास मौजूदा कर्मचारियों का नए कर्मचारियों से परिचय तथा उन्हें संगठनात्मक कार्य से परिचित करने को संदर्भित करता है।
5. प्रशिक्षण और विकास:
प्रशिक्षण एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी कार्य को करने के लिए कर्मचारियों के ज्ञान,
कौशल,
योग्यता और क्षमताओं में वृद्धि होती है। विकास कर्मचारियों को विकसित करने मे
मदद करने के लिए निर्मित शिक्षा के अवसरों को संदर्भित करता है।
6. मुआवजा:
यह सभी रूपों में एक कर्मचारी को किये गये भुगतानों को संदर्भित करता है अर्थात संगठन के लिए उसके पारिश्रमिक के साथ उसके योगदान का मिलान करना।
7. पदोन्नति और भविष्य योजना:
इसमें व्यक्ति के प्रदर्शन पर आधारित पदोन्नति,
स्थानांतरण और पदावनति का निर्धारण शामिल है।
A.
नीतियों की तरफ।
B.
नियमों की तरफ।
C.
उद्देश्यों की तरफ।
D.
बजटों की तरफ।
आकस्मिक दायित्व वे दायित्व हैं, जो अभी तक तो नहीं आए हैं, उद्देश्य मुख्य योजना होते हैं जो नीतियों, प्रक्रियाओं, कार्यक्रमों, नियमों तथा बजटों के निर्माण के लिए आधार प्रदान करते हैं। ये विभिन्न योजनाएँ मुख्य उद्देश्यों के साथ होनी चाहिए।
A.
सामग्री बजट।
B.
क्रय बजट।
C.
उत्पादन बजट।
D.
विक्रय बजट।
वे सभी गतिविधियाँ जो संगठन के विक्रय को बढाने से सम्बंधित होती हैं लाभों को भी बढ़ाती हैं। इसलिए, विक्रय बजट सभी बजटों का आधार होता है। एक बार एक संगठन जान ले कि उसे कितना विक्रय करना है, तो यह पता लगाना आसान होगा कि कितना क्रय करना होगा तथा कितना उत्पादन करना होगा।
A.
यह योजना बनाने के लिए एक पूर्व अपेक्षित है।
B.
नियोजन नियंत्रण को सार्थक बनाता है।
C.
नियोजन को नियंत्रित करने की लागत कम कर देता है।
D.
योजनाओं को नियंत्रित करने में सहायता करने के लिए जल्दी से तैयार की जा सकती है।
नियोजन वे मानक प्रदान करता है जिसके विरूद्ध नियंत्रण के समय वास्तविक प्रदर्शन को मापा जा सकता है। अतः नियोजन नियंत्रण को सार्थक बनाता है।
A.
विक्रय बजट।
B.
उत्पादन बजट।
C.
मास्टर बजट।
D.
सामग्री बजट।
मास्टर बजट सभी कार्यात्मक बजटों का संयोजन होता है।
A.
नीतियाँ।
B.
उद्देश्य।
C.
प्रक्रिया।
D.
रणनीति।
प्रक्रियाएँ दैनिक गतिविधियों को सम्भालने के लिए अनावश्यक कार्यों को हटाने के लिए गठित की जाती हैं।
A.
यह निर्णयन के लिए प्रबंधकों को प्रोत्साहित करे।
B.
समय पर योजना क्रियान्वित न हो।
C.
यह अतिव्यापी गतिविधियों को कम करे।
D.
यह प्रबंधकीय पर्यवेक्षण के लिए आवश्यकता को करे।
नियोजन एक समय लेने वाली प्रक्रिया है। हालांकि, यदि इसकी तैयारी में समय कारक पे विचार नहीं किया जाये तो नियोजन व्यर्थ हो सकता है।
A.
इसकी लागत इसके लाभों से अधिक हो।
B.
इसे संगठन कार्य के बाद किया जाये।
C.
इसे कर्मचारियों द्वारा तैयार किया जाये।
D.
इसके लाभ इसकी लागत से अधिक हो।
नियोजन में कार्य के निर्धारण के लिए समय तथा कौशल शामिल होता है। यदि नियोजन की लागत इसके लाभों से अधिक होती है, तो यह अन्य गतिविधियों की तरह उनुपयोगी होती है।
A.
लंबी, सरल और जटिल है।
B.
सरल, विशिष्ट और लचीली।
C.
विशिष्ट, लचीली लेकिन लंबी।
D.
लंबी, जटिल और लचीली।
एक योजना अनावश्यक गतिविधियों के बिना सटीक, समझने के लिए आसान होना चाहिए। इसमें लचीलेपन के लिए स्थान होना चाहिए जिससे कि इसे भविष्य में स्थिति परिवर्तन के साथ समायोजित किया जा सके।
A.
पद्धति।
B.
रणनीति।
C.
लक्ष्य।
D.
नीतियाँ।
लक्ष्य वे दिशाएँ हैं जहाँ एक संगठन प्रयास करना चाहता है। लक्ष्य दिशाओं का मापन नहीं करते हैं। बिक्री बढ़ाना एक लक्ष्य है और 20ः से बिक्री बढ़ाना एक उद्देश्य है। लक्ष्य वांछित दिशा के बारे में कोई ना कोई विचार देता है।
A.
लागत को कम करना या पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को कम करना।
B.
कीमतों में वृद्धि या पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को कम करना।
C.
कीमतों को कम करना या बढ़ती लागतें।
D.
कीमतों में वृद्धि या लागत को कम करना।
कीमतों में वृद्धि या लागत को कम करना एक संगठन के लिए लाभों को बढ़ाने में सहायक होता है।
A.
भर्ती।
B.
चयन।
C.
नियुक्ति।
D.
उन्मुखीकरण।
भर्ती अर्थात संगठन में विभिन्न रिक्त पदों को भरने के लिए व्यक्तियों की उपलब्धता बनाना। संगठनों द्वारा प्रयास यह सुनिश्चित करने के लिए किए जाते हैं कि अधिक से अधिक लोग अपना आवेदन पत्र प्रस्तुत करे जिससे कि चयन आसान हो जाये।
A.
श्रम ठेकेदार।
B.
वेब प्रकाशन।
C.
कैम्पस भर्ती।
D.
आकस्मिक कॉलर्स।
प्रबंधन और प्रौद्योगिकी संस्थान तथा कॉलेज भर्ती का एक लोकप्रिय स्रोत बन गये हैं। संगठनों द्वारा उम्मीदवारों को सीधे उनके कॉलेजों और संस्थानों से नियुक्त किया जाता है।
दो व्यापक श्रेणियाँ जिनमे प्रशिक्षण के तरीकों को वर्गीकृत किया जा सकता है,
1. जॉब द जॉब प्रशिक्षण विधियाँ
2. ऑफ द जॉब प्रशिक्षण विधियाँ
प्रभावी प्रशिक्षण नौकरी के नजरिए और कर्मचारियों के आत्मविश्वास में सुधार करता है। प्रशिक्षित कर्मचारी बेहतर कार्य और पुरस्कार अर्जित कर सकते है।
प्रशिक्षण के लिए एक पहल कर्मचारी से ही आती है जबकि विकास के लिए पहल नियोक्ता से आती है।
चलचित्र - यह जानकारी प्रदान करती हैं और उन कौशल का प्रदर्शन करती है जिनका कि अन्य तकनीकों के द्वारा आसानी से प्रतिनिधित्व नहीं किया जाता है।
नियुक्तिकरण
चयन को एक नकारात्मक प्रक्रिया इसलिए माना जाता है क्योंकि यह एक कार्य के लिए बहुत से सम्भावित उम्मीदवारों में से सबसे अच्छे उम्मीदवार की पहचान तथा चयन करने की प्रक्रिया होती है।
भर्ती संगठन में कार्य के लिए संभावित कर्मचारियों की पहचान तथा उन्हें उनके कार्य के लिए नियमित करने की प्रक्रिया होती है।
फ्रेंच वेंडेल के अनुसार, ‘‘मानव संसाधन प्रबंधन संगठन के मानव संसाधन की भर्ती, चयन, विकास, उपयोग, क्षतिपूर्ति तथा अभिप्रेरण होता है।’’
फ्रैंच वैन्डेल के अनुसार, ‘‘मानव संसाधन प्रबंध संगठन के मानव संसाधनों की भर्ती चयन, विकास, उपयोग, क्षतिपूर्ति और उत्प्रेरण है।’’
संगठन में विभिन्न पदों के लिए आवेदकों को अधिक से अधिक प्रोत्साहित और आकर्षित करना ही भर्ती का प्रयोजन होता है।
बाहरी भर्ती के तरीकें निम्नलिखित हैं:
1. रोजगार कार्यालय
2. कैम्पस भर्ती
व्यक्तित्व परीक्षण एक उम्मीदवार के गुण और नैतिक मूल्यों के बारे में पता करने में मदद करता है।
प्रारंभिक जांच का उद्देश्य एक नौकरी के लिए अकुशल और अयोग्य उम्मीदवारों को निश्कासित करना होता है।
योग्यता परीक्षण एक विशिष्ट कार्य मे संभावित उम्मीदवार के भविष्य में सीखने की क्षमता और प्रतिभा का पता लगाने के लिए आयोजित किया जाता है।
बुद्धिमता परीक्षण एक व्यक्ति की बुद्धि का स्तर मापने के लिए इस्तेमाल महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक परीक्षण में से एक है।
विकास में एक व्यक्ति की सभी मामलों में वृद्धि शामिल है। यह एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा अधिकारियों और प्रबंधकों के लिए वर्तमान के साथ ही भविष्य के कार्यों के लिए कौशल और योग्यता हासिल की जाती है।

प्रशिक्षण कर्मचारियों की नौकरी के लिए ज्ञान और कौशल में सुधार की प्रक्रिया है जिससे उन्हें अच्छा प्रदर्शन करने के लिए सक्षम बनाया जाता है। यह एक संगठित गतिविधि है जिसमें लोगों को एक विशिष्ट कार्य के लिए ज्ञान और कौशल प्राप्त होता है।
प्रो.मोइनकेयर के अनुसार "विज्ञान तथ्यों से इस प्रकार बना है जिस प्रकार पत्थरों से एक मकान बनाया जाता है परन्तु केवल तथ्यों का एकत्रीकरण उसी प्रकार विज्ञान नहीं है जिस प्रकार पत्थरों का ढेर मकान नहीं होता है” साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि प्रबन्ध शास्त्र के भी कुछ निश्चित सिद्धांत हैं जिनके आधार पर हम पूर्व-निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति करते हैं अर्थात प्रबन्ध विज्ञान हैं I प्रबन्ध के सिद्धांत अन्य विज्ञान के सिद्धांतों की तरह स्थायी नहीं हैं वह समय व स्थितिवश बदलते रहते हैं अत: प्रबन्ध एक विज्ञान तो है पर पूर्ण विज्ञान नहीं।
सामाजिक उद्देश्य में समाज के लिए लाभ का निर्माण शामिल होता है। सभी प्रकार के संगठनों को सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करना होता है चाहे वह व्यापारिक हो या गैर व्यापारिक हो। इसमें उत्पादन के पर्यावरण के अनुकूल तरीकों का उपयोग, समाज के रोजगार वंचित लोगों के लिए रोजगार के अवसर देने और कर्मचारियों के लिए स्कूल आदि शामिल हैं।
प्रबन्ध एक व्यापक अवधारणा है, जिसे कई रूपों में समझाया जा सकता है। प्रबन्ध की प्रकृति की विवेचना निम्नलिखित प्रकार से की जा सकती हैं
१. जन्मजात और अर्जित प्रतिभा के रूप में
२. प्रक्रिया के रूप में
३. सार्वभौमिक प्रक्रिया के रूप में
४. पेशा के रूप में
५. समग्र विचार के रूप में
६. सामूहिक क्रिया के रूप में
७. प्रणाली के रूप में
आदि
सार्वभौमिक प्रक्रिया के रूप में :- बिना नियोजन, निर्देशन, नियंत्रण तथा समन्वय आदि के लक्ष्यों को पाना कठिन होता है । इसलिए प्रबन्ध की उपयोगिता केवल कार्यालय में ही नहीं अपितु धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक क्षेत्रों में भी है इसलिए हम कह सकते हैं की प्रबन्ध एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है ।
प्रक्रिया के रूप में :- प्रबन्ध निर्दिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सामूहिक प्रयासों के नियोजन, संगठन, निर्देशन, समन्वय तथा नियंत्रण करने की प्रक्रिया है ।
प्रबन्ध के महत्त्व
1. राष्ट्र के विकास के लिए : किसी भी राष्ट्र की खुशहाली उसकी प्रबन्ध व्यवस्था पर निर्भर करती है क्योंकि प्रबन्ध एक ऐसा घटक है जो सभी साधनों को संशोधित करता है, कार्यकुशलता बढ़ाता है और उत्पादक बनाता है
2. साधनों के सर्वोत्तम उपयोग हेतु: उत्पादन
के विभिन्न
साधन
जैसे-भूमि,
पूँजी, श्रम,
यन्त्र व
सामग्री आदि
का अधिकतम
उपयोग करने
में प्रबन्ध
का महत्वपूर्ण
योगदान
रहता है
3. न्यूनतम प्रयत्न से सर्वोत्तम परिणाम: प्रत्येक राष्ट्र अथवा समाज में संसाधन सीमित होते हैं बेहतर प्रबन्ध की सहायता से सीमित साधनों का कुशल उपयोग कर सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं
4.
निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु: प्रत्येक व्यवसाय अथवा व्यवसायी के कुछ उद्देश्य होते हैं प्रबन्ध की सहायता से उनकी प्राप्ति सरल हो जाती है
प्रबन्ध का स्तर
१. उच्च स्तरीय प्रबन्ध : इसके अंतर्गत संचालक मंडल, प्रबंध संचालक तथा जनरल मैनेजर आदि आते हैं | इनका मुख्य कार्य संस्था के उद्देश्यों की व्याख्या करना, नीति निर्धारित करना और निर्देशन करना है |
२. उच्च मध्य स्तरीय प्रबन्ध : इसके
अंतर्गत
वित्त
प्रबन्धक,
कर्मचारी
प्रबन्धक,
उत्पादक
प्रबन्धक
तथा विपणन
प्रबन्धक
आदि सम्मलित
किये जाते है I
इनका मुख्य
उद्देश्य
दिन-प्रतिदिन
के कार्यों को देखना
तथा उच्च
प्रबन्ध
द्वारा
निर्धारित
नीतियों एवं
उद्देश्यों
को क्रियान्वित
करना |
३. मध्य स्तरीय प्रबन्ध : इसके
अंतर्गत
उपविभागीय
प्रबन्धक
आते हैं जैसे-सहायक
उत्पादक
प्रबन्धक,
विपणन
प्रबन्धक
आदि, इनका
मुख्य
उद्देश्य
दैनिक कार्यों के
परिणामो की
जानकारी
रखना,
तात्कालिक
समस्याओ का
समाधान करना | होता
है
४. निम्न स्तरीय प्रबन्ध : इसके अंतर्गत कार्यकारी नेतृत्व के वह सभी पद आते हैं जिनका मुख्य कार्य कर्मचारियों के कार्य का निरिक्षण व निर्देशन करना होता
है
५. क्रियाशील कर्मचारी : इसके अंतर्गत लिपिक वर्ग, श्रमिक वर्ग तथा विक्रेता वर्ग आदि सम्मलित होतें हैं जिनका मुख्य उद्देश्य उच्च वर्ग द्वारा दिए गए निर्देशों की पालना करना होता
है।
प्रबन्ध उपयोगी होने के साथ साथ सीमाओं से वंचित नहीं हैं प्रबन्ध की सीमाएं निम्न हैं |
परिस्थिति के आधार पर परिवर्तन आवश्यक है : विभिन्न देशों की व्यापारिक परिस्थितयों के साथ-साथ विभिन्न इकाइयों की परिस्थितियां भी भिन्न होती हैं कारणवश प्रबन्ध की नीतियों एवं यंत्र विधियों को देश एवं परिस्थिति के आधार पर बदलना पड़ता है |
मानवीय आचरण से प्रभावित : समूह और समूह के विभिन्न व्यक्तियों द्वारा विभिन्न स्थितियों में विभिन्न आचरण अपेक्षित हैं उनका व्यवहार किसी ठोस नियम पर आधारित नहीं होता इसी कारण मानवीय आचरण को प्रबन्ध शास्त्र कि सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है |
मौद्रिक प्रणाली से प्रभावित : प्रबन्ध का मुख्य तात्पर्य लाभ कमाने से है अत: प्रबंधक को वह सभी क्रियाएँ करनी पड़ती हैं जो लाभ कमाने के उद्देश्य से की जाती है और वह वहीँ तक सीमित रह जाती हैं |
जटिलता : प्रतिस्पर्धा के दौर में प्रबन्धक को लाभ कमाने के लिए कई बार प्रबन्ध के सिद्धांतों की अवहेलना करनी पड़ती है |
प्रबन्ध एक व्यापक शब्द है, जिसका उद्देश्य किसी उपक्रम में कार्य करने वाले व्यक्तियों को नियन्त्रित के विभिन्न साधनों की सहायता से इस प्रकार कार्य कराना होता है, जिससे संगठन का न्यूनतम लागत अधिकतम उत्पादन करने के उद्देश्य को पूरा किया जा सके। प्रबन्ध वास्तव में एक प्रक्रिया है, जिसके आधारभूत अंग हैं- नियोजन, संगठन, अभिपे्ररणा तथा नियंत्रण। यह व्यवसाय के लक्ष्यों को इनकी प्राप्ति की योजना बनाकर निर्देशित, नियन्त्रित तथा समन्वित प्रयासों के द्वारा प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है इस प्रकार ‘प्रबन्ध’ से तात्पर्य अन्य व्यक्तियों से कार्य कराने की विधि से है।
प्रो0 थियो हेमैने के अनुसार, ”प्रबन्ध व्यक्तियों से कार्यो को कराने की क्रिया एवं व्यक्तियों प्रयासों को सामान्य उद्देश्य की दिशा में निर्देशित करना है।“
प्रबन्ध का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसे हम अध्ययन की दृष्टि से दो भागों में बाँट सकते हैं-
(A) प्रबन्ध की विषय सामग्री तथा ;(B) प्रबन्ध का क्रियात्मक क्षेत्र।
(A) प्रबन्ध की विषय सामग्री - प्रबन्ध की विषय सामग्री के अन्तर्गत निम्नलिखित शामिल हैं, जिनका विस्तृत वर्णन पृथक-पृथक अध्यायों में यथास्थान किया गया है-
(1) नियोजन
(2) संगठन
(3) स्टाफिंग
(4) संचालन
(5) समन्वय
(6) नियंत्रण
(7) अभिपे्ररण
(B) प्रबन्ध का क्रियात्मक क्षेत्र -
(1) वित्तीय प्रबन्ध
(2) उत्पादन प्रबन्ध
(3) सेविवर्गीय या कार्मिक प्रबन्ध
(4) वितरण अथवा विपणन प्रबन्ध
(5) परिवहन प्रबन्ध
(6) क्रय प्रबन्ध
(7) अनुरक्षण या देखभाल प्रबन्ध
(8) कार्यालय प्रबन्ध
(9) विकास प्रबन्ध
(10) वातावरण प्रबन्ध
(11) अन्य क्षेत्र - उपर्युक्त के अतिरिक्त, आधुनिक प्रबन्धक निम्नलिखित को भी प्रबन्ध के क्षेत्र शामिल करते हैं - (अ) समय प्रबन्ध, (ब) पर्यावरण प्रबन्ध, (स) आयात-निर्यात प्रबन्ध, (द) प्रतिरक्षा प्रबन्ध, (इ) चिकित्सा प्रबन्ध, (ई) तकनीकी प्रबन्ध (उ) शिक्षण-प्रशिक्षण प्रबन्ध आदि।
प्रबन्ध का महत्व - प्रबन्ध के महत्व को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा और भी अधिक स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) न्यूनतम प्रयत्नों से अधिकतम परिणामों को प्राप्त करने के लिए- प्रत्येक देश या समाज के संसाधन सीमित होते हैं और आवश्यकताएँ अधिक। इन सीमित साधनों के अधिकतम सदुपयोग द्वारा आवश्यकताओं की पूर्ति प्रबन्ध के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है।
(2) प्रतिस्पद्र्धा का सामना करने हेतु - आज बाजार में विस्तार के साथ-साथ प्रतिस्पद्र्धा का क्षेत्र भी अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है। बड़ी एवं सुदृढ़ इकाइयों द्वारा छोटी एवं कमजोर इकाइयों को हटाया जा रहा है। ऐसी गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा का वहीं इकाई सफलतापूर्वक सामना कर सकती है, जो श्रेष्ठ किस्म की वस्तुओं का न्यूनतम लागत पर उत्पादन कर सके।
(3) औद्यौगिक समाज के लिए एवं एक प्रभावी समूह के लिए - वर्तमान समय में प्रबन्ध एक प्रभावी समूह के रूप में कार्य कर रहा है, जिसके कारण इसका महत्व बढ़ता ही जा रहा है।
(4) आन्तरिक एवं बाह्य पक्षों में समन्वय हेतु - संस्था के आन्तरिक पक्ष में संस्था के कर्मचारी और अधिकारी सम्मिलित होते हैं और बाह्य पक्ष में विनियोजक, अंशधारी, श्रम-संघ क्रेता-विक्रेता तथा सरकार सम्मिलित किये जाते हैं।
(5) वृहत इकाइयों के सुगम संचालन हेतु - आज बड़े आकार की व्यावसायिक इकाईयों की स्थापना को प्राथमिकता दी जा रही है। कुछ संस्थाओं का विस्तार राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होता है।
(6) श्रम समस्याओं के समाधान हेतु - वर्तमान औद्योगिक जगत में श्रम और पूँजी का आपस में जबरदस्त टकराव हो रहा है। कभी यह हड़ताल, कभी प्रदर्शन, कभी घेराबंदी, कभी तालाबंदी के रूप में दिखाई देता है। इनका दूरगामी परिणाम देश के लिए अहितकर होता है।
(7) साधनों के अधिकतम उपयोग हेतु - उत्पादन के विभिन्न साधनों, जैसे-भूमि, पूँजी, श्रम, यंत्र व सामग्री आदि का अधिकतम उपयोग करने में प्रशासन व प्रबन्ध का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
(8) व्यक्तित्व के विकास हेतु - प्रबन्ध एक मानवीय क्रिया है। यह किसी विशेष समूह के सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उसकी क्रियाओं का मार्ग-दर्शन एवं नियंत्रण करता है।
(9) राष्ट्र के विकास के लिए - प्रबन्धकों को आजकल आर्थिक विकास का जनक कहा जाता है। प्रबन्ध ही एक ऐसा घटक है, जो सभी साधनों को संशोधित करता है, कार्यकुशलता बढ़ाता है और उत्पादक बनाता है, जिस पर राष्ट्र की समृद्धि और खुशहाली निर्भर करती है।
A.
सहयोग।
B.
पहल।
C.
कर्मियों की स्थिरता।
D.
समता।
कर्मियों की स्थिरता के सिद्धांत के अनुसार, संगठन में कर्मचारियों का एक अवधि तक स्थायित्व होना चाहिए जिससे कार्य कुशलतापूर्वक निरंतर रह सके।
A.
संगठन में श्रमिकों की संख्या बढ़ाना।
B.
श्रमिकों की दक्षता बढ़ाना।
C.
कर्मचारियों के कार्य घंटे बढ़ाना।
D.
अधिक ग्राहकों को आकर्षित करना।
विभेदात्मक मजदूरी पद्धति उन श्रमिकों को प्रोत्साहन प्रदान करती है जिनके काम की गुणवत्ता और मात्रा उम्मीदों के ऊपर होती है। इस प्रकार, यह कार्यकर्ताओं को अधिक तथा वांछित मानक प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करती है।
A.
कर्मचारियों की संख्या कम करना।
B.
उद्यम में मानव शक्ति बढ़ाना।
C.
प्रत्येक परिचालन के लिए मानक समय निर्धारित करना।
D.
कर्मचारियों के कार्य स्थिति में वृद्धि करना।
समय अध्ययन का उद्देश्य प्रत्येक परिचालन के लिए मानक समय निर्धारित करना होता है।
A.
निर्देश की एकता का सिद्धांत।
B.
अनुशासन का सिद्धांत।
C.
कार्य विभाजन का सिद्धांत।
D.
केंद्रीकरण का सिद्धांत।
यहाँ कार्य विभाजन के सिद्धांत का उल्लंघन किया जा रहा है। एक व्यापार में विभिन्न कार्यों को एक विशेषज्ञ या प्रशिक्षित कर्मचारी द्वारा किया जाना चाहिए। इसका परिणाम दक्षता और प्रभावशीलता है।
A.
सौपान श्रंखला।
B.
आदेश।
C.
विकेंद्रीकरण।
D.
अनुसाशन।
संगठन में फेयॉल के सौपान श्रंखला सिद्धांत को छोड़ा गया है क्योंकि यहाँ आदेश तथा सूचना की श्रंखलाओं के बारे में कोई स्पष्ट सूचना नहीं है।
A.
सौपान श्रंखला।
B.
आदेश।
C.
केंद्रीकरण तथा विकेंद्रीकरण।
D.
कार्य विभाजन।
श्री शर्मा को हेनरी फेयॉल के द्वारा व्यक्त केंद्रीकरण तथा विकेंद्रीकरण के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।
A.
समय अध्ययन के आधार पर।
B.
थकान अध्ययन के आधार पर।
C.
कार्यपद्धति अध्ययन के आधार पर।
D.
गति अध्ययन के आधार पर।
कार्यपद्धति अध्ययन का उद्देश्य एक कार्य को करने के लिए सबसे अच्छे तरीके की खोज करना है। यह उद्देश्य उत्पादन की लागत को कम और संतुष्टि को अधिकतम करता है।
A.
समता और पहल।
B.
कर्मियों और समता के पारिश्रमिक।
C.
आदेश और सौपान श्रृंखला।
D.
समता और सहयोग की भावना।
समता के सिद्धांत के अनुसार कार्य के समान प्रकार के लिए समान पारिश्रमिक का भुगतान किया जाना चाहिए और कर्मियों के पारिश्रमिक के सिद्धांत के अनुसार एक कर्मचारी का वेतन संगठन के लिए सस्ता होना चाहिए और दूसरी तरफ कर्मचारियों को जीने का एक उचित मानक प्रदान करना चाहिए।
A.
आदेश की एकता।
B.
सहयोग की भावना।
C.
निर्देश की एकता।
D.
अधिकार एवं उत्तरदायित्व।
निर्देश की एकता के सिद्धांत में कहा गया है कि एक टीम के सदस्यों को एक समय में केवल एक ही लक्ष्य पर कार्य करना चाहिए और वे सभी लक्ष्य की दिशा में कार्य करने चाहिए।
A.
समय और लागत बाबू।
B.
दुकान अनुशासन।
C.
गति बॉस।
D.
निरीक्षक।
समय और लागत बाबू विभिन्न कार्य करने के लिए समय सारणी तैयार करता है तथा कार्य की लागत को रिकॉर्ड करता है।
A.
आदेश के सिद्धांत।
B.
आदेश की एकता का सिद्धांत।
C.
सौपान श्रृंखला का सिद्धांत।
D.
काम विभाजन का सिद्धांत।
सौपान श्रृंखला का सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि आदेश तथा संचार की स्पष्ट श्रंखला होनी चाहिए। वहाँ एक कार्यकारी के मन में ऐसा कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि वह किसे रिपोर्ट करे और इसका उल्टा।
A.
उलझा हुआ।
B.
दिलचस्प।
C.
नीरस।
D.
बहुत समय लगेगा।
विशेषज्ञता अर्थात एक कार्य को करने का एक वांछित तरीका। जब एक व्यक्ति को बार-बार एक ही तरीके से एक विशेष कार्य को करता है, तो यह नीरस बन सकता है।
A.
समय की बर्बादी को हटाना।
B.
दिन के उचित कार्य का निर्धारण।
C.
श्रमिकों के लिए आराम अंतराल का निर्धारण।
D.
प्रबंधकों के लिए आराम अंतराल का निर्धारण।
थकान अध्ययन का उद्देश्य श्रमिकों में थकान हटाने के लिए उनके आराम अंतराल का निर्धारण करना होता है।
नेतृत्व की विशेषताएं हैं:
1. अंतर्वैयक्तिक सम्बन्ध:
नेतृत्व में नेता और उनके अनुयायियों के बीच पारस्परिक संबंध सम्मिलित होते हैं।
2. अनुयायी:
नेतृत्व अर्थात अनुयायियों का अस्तित्व। बिना अनुयायियों के कोई भी नेता नहीं हो सकता।
3. सतत प्रक्रिया:
यह एक सतत प्रक्रिया है और इसमें नेता और उनके समूहों के बीच नियमित रूप से संचार आवश्यक होता है।
सम्मान की आवश्यकताओं में आवश्यकताओं के दो अलग-अलग समूह शामिल होते हैं:
(1) आत्म सम्मान:
आत्म सम्मान की जरूरतों में आत्म सम्मान,
आत्म विश्वास,
क्षमता,
स्वायत्तता और ज्ञान की आवश्यकताओं को शामिल किया जाता है। आत्म सम्मान को अच्छे प्रदर्शन की पहचान करके,
कर्मचारियों को चुनौतीपूर्ण कार्य देकर तथा अवसर उपलब्ध कराकर संतुष्ट किया जा सकता है।
(2) दूसरों से सम्मान:
अन्य सम्मान आवश्यकताऐं प्रतिष्ठा,
शक्ति,
स्थिति,
मान्यता और दूसरों का सम्मान करने से संबंधित होता है।
पर्यवेक्षण अर्थात अधीनस्थों के काम पर निगरानी रखना। पर्यवेक्षण अधिनस्थों पर निगरानी और मार्गदर्शन के द्वारा अनुशासन के रखरखाव की सुविधा प्रदान करता है। कर्मचारियों के प्रदर्शन और समय पर मार्गदर्शन पर कड़ी और सख्त रखकर अनुशासन को सतत बनाया जाता है। काम पर विशेष ध्यान, पहले उदाहरण में ही हर समस्या का लगभग समाधान है, अनुशासन बनाए रखने के लिए कर्मचारियों के मन पर एक दबाव बनाता है। एक पर्यवेक्षक बेहतर काम के प्रदर्शन के प्रति कर्मचारियों को प्रेरित करता है।
एक पर्यवेक्षक के कार्य हैं:
1. आदेश और निर्देश जारी करना:
पर्यवेक्षक कार्य के निष्पादन के लिए आदेश और निर्देश जारी करता है। एक आदेश का प्रयोजन आरंभ करना,
संशोधित करना या अधीनस्थों की ओर से किसी भी कार्रवाई को रोकना होता है।
2. अधिनस्थों को निर्देशित करना:
एक पर्यवेक्षक का प्राथमिक कार्य अपने अधिनस्थों को निर्देश एवं सलाह देना होता है।
3. अनुशासन बनाए रखना:
पर्यवेक्षक अपने अधिनस्थों के बीच नियमों और विनियमों को लागू करता है।
अनौपचारिक संप्रेषण की विशेषताऐं हैं:
1. यह मौखिक होता है।
2. यह प्रामाणिक और अधिकृत नहीं होता है।
3. यह सहज अंतर्निहित और लचीला होता है।

अनौपचारिक संप्रेषण अर्थात एक ही
संगठन में काम कर रहे लोगों के बीच सामाजिक संबंधों या अव्यक्तिगत संबंधों के माध्यम से सूचना का
प्रवाह। यह अनौपचारिक होता है और
विचारों और आकर्षक प्रतिक्रियाओं की सहज अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। यह महत्वपूर्ण होता है क्योंकि:
1. औपचारिक संप्रेषण की तुलना में सूचना तेजी से प्रवाहित होती है।
2. यह औपचारिक संप्रेषण में दूरी को कम
करने का कार्य करता है।
3. यह मानसिक बल प्रदान करके काम के तनाव को
कम कर देता है।
4. यह कर्मचारियों के रवैये का
पता करने के लिए प्रबंधन को सक्षम बनाता है।