
संप्रेषण की विशेषताऐं हैं:
1. दो या अधिक व्यक्ति: संप्रेषण में कम से
कम दो व्यक्तियों एक प्रेषक तथा एक प्रेषणी को शामिल किया जाता है। यह व्यक्तियों के बीच सूचना का आदान-प्रदान होता है।
2. व्यापक: संप्रेषण सभी संगठनों में और सभी स्तरों पर आवश्यक हेाता है।
3. बहु चैनल: संप्रेषण औपचारिक या अनौपचारिक हो सकता है। औपचारिक संप्रेषण लम्बवत् या क्षैतिज हो सकता है।

वित्तीय प्रोत्साहन के विभिन्न तरीके निम्नलिखित हैं -
1. वेतन एवं भत्ते - किसी भी संगठन में कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए वेतन एवं भत्ते एक आधारिक वित्तीय प्रोत्साहन है क्योंकि वह तो कार्य ही इसलिए करता है कि उसे वेतन/मजदूरी या भत्ते नियमित मिलते हैं। इसी प्रकार वेतन-भत्तों में होने वाले वार्षिक वृद्धि भी उसे प्रोत्साहित करती है।
2. बोनस - बोनस कर्मचारी को उच्च कार्य निष्पादन के फुलस्वरूप दिया जाने वाला अतिरिक्त वित्तीय प्रोत्साहन है। संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त करने अथवा समय से पहले उद्देश्य की प्राप्ति ही उन्हें इस राशि को प्राप्त करने का अधिकारी/हकदरार बनाती है, जिसे बोनस/अधिलाभांश कहते है। बोनस अनेक रूपों में दिया जाता है, जैसे-विदेश भ्रमण, सवेतन अवकाश या तोहफे के रूप में मूल्यवान वस्तु आदि।
3. उत्पादकता मजदूरी प्रोत्साहन - संगठन में कई प्रोत्साहन प्रेरणादायक परिश्रमिक योजनाएँ हैं, जिनमें उत्पादकता मजदूरी प्रोत्साहन योजना भी सम्मिलित है। इसका उद्देश्य पारिश्रमिक के भुगतान को उनकी व्यक्तिगत सामूहिक स्तर की उत्पादकता के साथ जोड़कर उत्पादकता को बढ़ाना है ताकि वे उत्पादन (अधिक) करने के लिए प्रोत्साहित हो अपितु उसक उचित प्रतिफल मजदूरी के रूप में प्राप्त हो।
4. लाभ में हिस्सेदारी - लाभ में हिस्सेदारों का तात्पर्य कर्मचारियों को संगठन के लाभ में हिस्सा देने से है ताकि वे अपना कार्य कुशलता से करने को प्रोत्सहित हो। संगठन में लाभ में हिस्सेदारी एक निश्चित प्रतिशत से प्रदान की जाती है। इस निश्चित प्रतिशत के अतिरिक्त जब संगठन का लाभ बढ़ता है तो उसे अतिरिक्त बोनस के रूप में कर्मचारियों को दिया जाता है।
5. सह-साझेदारी - यह लाभ में हिस्सेदारी का एक विकसित रूप है। इसमें कर्मचारी अपनी सेवा देने के साथ-साथ संगठन की समता पूंजी में सहभागी होते हैं अर्थात उन्हें एक निर्धारित कीमत पर कम्पनी के समता अंश दिये जाते हैं जो बाजार की कीमत से कम होते हैं परिणामस्वरूप वे संगठन में लाभांश प्राप्त करते हैं एवं प्रबन्ध में साझेदार होते हैं।
6. अनुलाभ - बहुत सी कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों को वित्तीय प्रोत्साहन के अनुलाभ भी प्रदान करती है, जैसे - कार भत्ता, घर की सुविधा, चिकित्सा सुविधा, कठिन कार्य भत्ता, यात्रा भत्ता आदि।
निर्देशन में पर्यवेक्षण के महत्व इस प्रकार हैं -
1. पर्यवेक्षक प्रतिदिन कर्मचारियों के सम्पर्क में रहता है तथा उनसे मित्रतापूर्ण संबंध बनाये रखता है।
2. पर्यवेक्षक प्रबंधक तथा श्रमिकों के मध्य एक कड़ी के रूप में कार्य करता है। वह एक तरफ श्रमिकों को प्रबंध के विचारों को बताता है तथा दूसरी तरफ श्रमिकों की समस्याओं को प्रबंध के सामने रखता है।
3. पर्यवेक्षक अपने अधीनस्थ श्रमिकों में जो उसके नियंत्रण में हे उनसे सामूहिक एकता को बनाए रखने में एक मुख्य भूमिका निभाता है।
4. पर्यवेक्षक निर्धारित लक्ष्यों के अनुसार कार्य का निष्पादन सुनिश्चित करता है।
5. पर्यवेक्षक कार्यस्थल / पद कार्य पर ही कर्मचारियों तथा श्रमिकों को प्रशिक्षित करता है।
6. पर्यवेक्षक नेतृत्व संगठन के श्रमिकों को प्रभावित करने में एक मुख्य भूमिका निभाता है।
1. सामाजिक क्रिया - सम्प्रेषण एक सामाजिक क्रिया है क्योंकि इसके लिए न्यूनतम दो व्यक्तियों का होना आवश्यक है। कोई एक व्यक्ति स्वंय अपने आप से सम्प्रेषण नहीं कर सकता है। जो व्यक्ति संदेश देता है उसे प्रेषक कहते हैं तथा संदेश प्रापत करने वाले को प्राप्तकत्र्ता कहते हैं।
2. सम्प्रेषण द्विमार्गीय प्रक्रिया है - सम्प्रेषण की प्रक्रिया तब तक पूर्ण नहीं समझी जाती है जब तक प्राप्तकत्र्ता उसे समझ नहीं ले। प्राप्तकत्र्ता जब संदेश को समझकर उसके अनुसार कार्यवाही करता है एवं प्रेषक को प्रत्युत्तर से अवगत करा देता है, तब सम्प्रेषण की प्रक्रिया पूर्ण समझी जाती है।
3. सम्प्रेषण उद्देश्यप्रद होता है - सम्प्रेषण का प्रमुख उद्देश्य संदेश प्राप्तकर्ता के मस्तिष्क में समझ उत्पन्न करना है। सम्प्रेषण के द्वारा कर्मचारियों को उपयुक्त निर्देश, आदेश एवं सूचनायें प्रदान की जाती हैं, संस्था की नीतियों, योजनाओं कार्यक्रमों एवं प्रगति से अवगत कराया जाता है तथा सुझाव प्राप्त किये जाते हैं। यदि प्राप्तकत्र्ता सम्प्रेषित संदेश को समझ नहीं पाता है, तो सम्प्रेषण को अधूरा कहा जाता है।
4. सम्प्रेषण अनेक प्रकार का हो सकता है - सम्प्रेषण कई प्रकार का होता है, यथा -
(1) मौखिक, लिखत एवं सांकेतिक सम्प्रेषण,
(2) औपचारिक एवं अनौपचारिक सम्प्रेषण, तथा
(3) शीर्ष सम्प्रेषण, अधोगामी सम्प्रेषण एवं समतल सम्प्रेषण।
5. सम्प्रेषण सतत रूप् से चलने वाली प्रक्रिया है - संस्था के प्रारंभ से अंत तक सम्प्रेषण चलता रहता है। सम्प्रेषण में एक पक्ष संदेश प्रेषित करता है, दूसरा पक्ष उसे प्राप्त करता है तथा अपनी प्रतिक्रिया प्रेषक को सूचित करता है। यह क्रम संस्था में निरन्तर चलता रहता है।
6. सम्प्रेषण सर्वव्यापक क्रिया है - व्यवसाय की तरह यह समाज, शासन, संस्कृति, धर्म, राजनीति एवं अर्थव्यवस्था में भी समान रूप् से उपयोगी एवं आवश्यक है।
संगठन में प्रभावी सम्प्रेषण की सांकेतिक बाधाएँ इस प्रकार हैं -
1. संदेश की अनुपयुक्त अभिव्यक्ति - कई बार प्रबंधक अधीनस्थों को निदिष्ट अर्थ नहीं समझा पाता अथवा संप्र षित नहीं कर पाता है।
2. विभिन्न अर्थों सहित संकेतक - एक शब्द के बहुत से अर्थ हो सकते हैं। प्राप्तकर्ता को शब्द के उसी अर्थ को समझना है जो प्रेषक उसे समझाना चाहता है।
3. श्रुतिपूर्ण रूपांतर / अनुवाद - कुछ स्थितियों में, संप्रेषण का मसौदा मूल रूप से किसी एक भाषा में तैयार किया जाता है।
4. अस्प्ष्ट संकल्पनाएँ - कुछ संप्रेशणों की विभिन्न संकल्पनाएँ, भिन्न व्याख्याओं के कारण हो सकती है।
5. तकनीकी विशिष्ट शब्दावली - ऐसा प्रायः पाया जाता है कि विषेशज्ञ तकनीकी शब्दों का अत्यधिक प्रयोग करते हैं उन व्यक्तियों को समझाने में जो उस संबंधित क्षेत्र के विषेशज्ञ नहीं होते। इसलिए वे बहुत से ऐसे शब्दों का वास्तविक अर्थ समझ नहीं पाते।
6. शारीरिक भाषा तथा हाव-भाव की अभिव्यक्ति की डिकोडिंग - शरीर की प्रत्येक गतिविधि कुछ न कुछ अर्थ सम्प्रेषित करती है।
A.
कार्य की एकता को।
B.
आदेश की एकता को।
C.
निर्देशन की एकता को।
D.
कर्मचारियों की एकता को।
आकस्मिक दायित्व वे दायित्व हैं, जो अभी तक तो नहीं आए हैं, समन्वय का उद्देश्य एक आम उद्देश्य की प्राप्ति में कार्य की एकता को सुरक्षित करना होता है। यह विभागों के बीच बाध्यकारी शक्ति के रूप में कार्य करता है और सभी कार्यों को संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से सुनिश्चित करता है।
A.
प्रबंधन के रूप में।
B.
समन्वय के रूप में।
C.
नियुक्तिकरण के रूप में।
D.
निर्देशन के रूप में।
एक प्रक्रिया के रूप में प्रबंधन नियोजन, संगठन, नियुक्तिकरण, निर्देशन और नियंत्रण के रूप में कई कार्य करता है।
A.
एक संगठन में व्यक्तिगत प्रयासों को।
B.
कार्यकर्ताओं के प्रयासों को।
C.
शीर्ष प्रबंधन के कार्यों को।
D.
संगठन के संसाधनों को।
समन्वय के माध्यम से, एक संगठन के अलग-अलग विभागों में काम कर रहे व्यक्तियों को सद्भाव में काम करने में सक्षम बनाता है और संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में उनके प्रयासों को केंद्रित करता है।
A.
मध्यम स्तरीय प्रबंधन पर।
B.
उत्पादन स्तरीय प्रबंधन पर।
C.
शीर्ष स्तर प्रबंधन पर।
D.
परिचालन स्तरीय प्रबंधन पर।
पर्यवेक्षक और फोरमैन दैनिक उत्पादन गतिविधियों के लिए जिम्मेदार होते हैं। यह परिचालन या निम्न स्तरीय प्रबंधन के तहत आता है।
A.
कर्मचारियों को प्रेरित करना।
B.
बाहरी लोगों को बातचीत करना।
C.
बाहरी लोगों के दावों को निपटाना।
D.
सुधारात्मक कार्रवाई करना।
हम नियोजित मानकों से वास्तविक प्रदर्शन की तुलना करके हम उन दोनों के बीच किसी भी प्रकार के विचलन का पता लगा सके। यदि वास्तविक प्रदर्शन के मानक निर्धारित मानक की तुलना में कम है, तो सुधारात्मक कार्रवाई की जाती है जिससके की अगली बार लक्ष्यों को कुशलता से हासिल किया जा सके।
A.
नियोजन कार्य का।
B.
नियुक्तिकरण कार्य का।
C.
नियंत्रण कार्य का।
D.
निर्देशन कार्य का।
संगठन में लोगों को काम पर रखने से संबंधित सभी गतिविधियों को प्रबंधन के नियुक्तिकरण कार्य में बांटा जाता है।
A.
उत्पादन के तरीकों का अध्ययन।
B.
थकान अध्ययन।
C.
कर्मियों के कार्यकाल की स्थिरता।
D.
सही समय पर काम के प्रत्येक भाग के लिए समय सारिणी।
कार्यक्रम अर्थात सही समय पर कार्य के एक भाग को पूरा सुनिश्चित करने के लिए संचालनों की एक समय सारिणी तैयार करना।
A.
संगठन के कार्य घंटो को।
B.
अकुशल कर्मचारी की नौकरी की सुरक्षा को।
C.
कुशल कर्मचारी की आय को।
D.
फोरमैनों की संख्या को।
विभेदात्मक मजदूरी पद्धति कुशल कर्मचारी की आय को बढ़ाती है। मजदूरी भुगतान की इस प्रणाली में अधिक काम करने के लिए प्रोत्साहन होते हैं।
A.
विकेन्द्रीकरण।
B.
कर्मचारियों से समानता के साथ व्यवहार किया जाता है।
C.
केंद्रीकरण।
D.
लेनदार दीर्घकालीन उधार का लाभ उठाते हैं।
केंद्रीकरण में सभी निर्णय एक व्यक्ति द्वारा लिये जाते हैं। यह शीर्ष प्रबंधन में पूर्ण नियंत्रण निहित हो सकता है लेकिन इस बार निर्णय लेने में देरी हो सकती है। केंद्रीकरण बड़े संगठनों में व्यावहारिक नहीं होता है।
A.
एक मालिक एक अधीनस्थ हो।
B.
दो मालिकों एक अधीनस्थ हो।
C.
एक मुखिया एक योजना हो।
D.
दो मुखिया एक योजना हो।
आदेश की एकता सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि हर कर्मचारी के लिए एक मालिक होना चाहिए। यदि एक कर्मचारी को एक ही समय में दो वरिष्ठ अधिकारियों से आदेश प्राप्त हो तो उसे उलझन हो सकती है कि उसे किसके आदेश का पालन करना चाहिए। इसलिए, संगठन के सुचारू संचालन के लिए संगठन में आदेश की एकता पालन किया जाना चाहिए।
A.
थकान अध्ययन।
B.
कायपद्धति अध्ययन।
C.
समय अध्ययन।
D.
गति अध्ययन।
आराम श्रमिकों को तरो-ताजा कर देता है। वे पुनः अपनी पूरी क्षमता से काम करने लगते हैं। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य श्रमिकों की कार्य-कुशलता के स्तर को बनाए रखना है। थकान के अनेक कारण हो सकते हैं: जैसे - लम्बी कार्य अवधि, घटिया कार्य दशाएं, अनुपयुक्त काम, बॉस के साथ खराब संबंध आदि।
A.
निर्देश देने के लिए।
B.
आदेश के रूप में और व्यवस्थित तरीके से काम के प्रदर्शन के लिए।
C.
काम को समय पर पूरा करने के लिए।
D.
कार्य करने के लिए चरणों के क्रम निर्धारण के लिए।
कार्यमार्ग लिमिक निश्चित करता है कि किसी विशेष कार्य को पूरा करने का क्रम क्या होगा अर्थात् किस-किस मार्ग से होकर कार्य को अंतिम रूप दिया जाएगा। इसके द्वारा यह भी निश्चित किया जाता है कि आज क्या करना है और कहां करना है।
A.
आदेश की एकता का।
B.
निर्देश की एकता का।
C.
अधिकार एवं जिम्मेदारी का।
D.
सौपान श्रंखला का।
यह सौपान श्रंखला के सिद्धांत का अपवाद है। इस अवधारणा का विकास आकस्मिकता के समय समान स्तर के कर्मचारियों द्वारा सीधा सम्पर्क स्थपित करने के लिए किया गया ताकि संदेशवाहन में देरी न हो।
प्रबंधन के सिद्धांत ऐसे दिशा निर्देश हैं जिन्हें प्रबंधकीय निर्णयन और कार्रवाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
प्रबंधन के सिद्धांतों को अवलोकन और प्रायोगिक अध्ययन के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।
प्रबंधन के सिद्धांतों को तथ्यों और अनुभवों पर विकसित किया जाता है, इसलिए इन्हें विकासवादी के रूप में माना जाता है।
विभेदक टुकड़ा मजदूरी प्रणाली।
हाँ, प्रबंधन के सिद्धांतों को एक अस्पताल के लिए लागू किया जा सकता है क्योंकि वे सार्वभौमिक होते हैं अर्थात इन सिद्धांतों को संगठनों के सभी प्रकारों में, सभी स्तरों पर तथा हर समय लागू किया जा सकता है।
समूह प्रमुख
प्रबंधन के सिद्धांत लचीले होते हैं, परंतु वैज्ञानिक सिद्धांत कठोर होते हैं।
कार्य का विभाजन
प्रबंधन के सिद्धांत कठोर नहीं बल्कि लचीले होते हैं। उन्हें अलग-अलग स्थितियों के अनुरूप संशोधित किया जा सकता है।
सार्वभौमिक - प्रबंधन के सिद्धांत संगठनों के सभी प्रकार के लिए लागू किये जाते हैं जैसे: व्यावसायिक एवं गैर-व्यावसायिक संगठन, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के संगठन।
हाँ
सहयोग की भावना का सिद्धांत।
कार्यकाल की स्थिरता का सिद्धांत।
(i). यह सुनिश्चित करना कि संगठन लंबे समय तक जीवित रहे।
(ii). यह सुनिश्चित करना कि संगठन पर्याप्त लाभ अर्जित करे।
इसके अंतर्गत जीवित रहना, लाभ तथा विकास को सम्मिलित किया जाता है।
किसी भी उपक्रम में स्वामी तथा प्रबन्धक सदैव एक ही हों यह जरूरी नहीं क्योंकि प्रबन्धक वर्ग प्रबन्ध करता है जबकि स्वामी वर्ग पूँजी जुटाता है ।
उत्पादन प्रबन्ध द्वारा उत्पादन-नियोजन, कार्य विश्लेषण, गुण नियंत्रण, कार्य सूचीयन, सामग्री प्रबंधन निरीक्षण आदि कार्य किये जाते हैं ।
विपणन प्रबन्ध द्वारा उत्पादित वस्तु का विपणन, विपणन अनुसंधान, मूल्य निर्धारण, विपणन क्षेत्र, विपणन जोखिम तथा उनकी रोकथाम आदि कार्य किये जाते हैं ।
सेवावर्गीय प्रबन्ध को कार्मिक प्रबन्ध के नाम से भी जाना जाता है|
माल के सप्लायर्स से निविदा बुलाना, आर्डर देना, क्रय करना, अनुबंध करना आदि कार्य क्रय प्रबन्ध द्वारा किये जाते हैं ।
कुशलता का अभिप्राय काम को न्यूनतम लागत पर पूरा करने से है, जबकि प्रभावपूर्णत का अभिप्राय काम को समय पर पूरा करने से है चाहे कितनी ही लागत क्यों न आए।
प्रबन्ध की इस विशेषता के अनुसार कि प्रबन्धकीय क्रिया को संपन्न करने वाला कोई एक व्यक्ति अकेला प्रबन्धक नहीं होता है। बल्कि यह तो अनेक व्यक्तियों प्रबन्धकों का समूह होता है। प्रबन्ध को एक सामूहिक क्रिया कहा जाता है।
किसी भी संस्था के विकास में उसके विकास प्रबन्ध का अहम् योगदान होता है क्योंकि इसके अन्तर्गत मशीनों तथा उत्पादन प्रक्रियाओं के सम्बन्ध में अनुसंधान किये जाते है, उपभोक्ताओं की मांग के आधार पर वस्तु का विकास किया जाता है जिससे व्यापार में वृद्धि होती है।
प्रबंधन के महत्व:-
1. प्रबंध समूह के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता देता है।
2. प्रबंध एक गतिशील संगठन का निर्माण करता है।
प्रबन्ध एक ऐसी मानवीय क्रिया है जो किसी भी समूह में सामान्य उद्देश्य प्राप्ति के लिए व्यक्तियों से कार्य लेता है तथा प्रशिक्षण, पदोन्नति, कार्य विस्तार, कार्य वृद्धि आदि अपनाकर उनके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है
संस्था के आतंरिक वर्ग में अधिकारी वर्ग तथा कर्मचारी वर्ग सम्मिलित होते हैं तथा बाहरी वर्ग में सप्लायर्स, उपभोक्ता, सरकार तथा निवेशक वर्ग आदि सम्मलित होते हैं कुशल प्रबन्ध के माध्यम से संस्था के आतंरिक तथा बाहरी वर्गों में समन्वय स्थापित होता है
वर्तमान समय में राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय बाजारों का तेजी से विकास हो रहा है जिसके अंतर्गत बहुत सी बड़ी कम्पनियाँ छोटी कंपनियों को मात दे रही हैं ऐसे वक्त में वही कम्पनियाँ सफलतापूर्वक व्यापार कर पाएंगी जो न्यूनतम लागत में बेहतर उत्पादन करने में सक्षम होंगी जो की कुशल प्रबन्धन से ही प्राप्त हो सकता है
प्रबन्ध के स्तर का तात्पर्य किसी भी संस्था विशेष में प्रबन्धक वर्ग में आने वाले पदों में 'अधिकारी और अधीन' सम्बन्ध से है, अर्थात यह इस बात को बताता है कि कौन सा कर्मचारी किस अधिकारी के अधीन कार्य करेगा
हाँ, प्रबन्ध के सिद्धांत समय के साथ साथ परिवर्तित होते रहते हैं क्योंकि प्रबन्ध एक सामाजिक शस्त्र है इस कारण सामाजिक गतिविधियों के साथ साथ प्रबन्ध के सिद्धांतों में परिवर्तन हो पाना सम्भव है ।
प्रबन्ध के सिद्धांत अन्य विज्ञान के सिद्धांतों की तरह स्थायी नहीं हैं वह समय व स्थितिवश बदलते रहते हैं जरूरी नहीं हैं कि एक स्थान पर लागू होने वाले सिद्धांत दूसरे स्थान पर भी उपयोगी हों ।
कला सैद्धांतिक ज्ञान, व्यवहार एवम रचनात्मकता पर आधारित होती है प्रबंध भी उद्देश्य प्राप्ति के लिए नियमों, नीतियों और सिद्धांतों का पालन करता है इसलिए प्रबन्ध कला है ।
इसके अंतर्गत वित्त प्रबन्धक, कर्मचारी प्रबन्धक, उत्पादन प्रबन्धक तथा विपणन प्रबन्धक आदि सम्मलित किये जाते हैं Iइनका मुख्य उद्देश्य दिन-प्रतिदिन के कार्यों को देखना तथा उच्च प्रबन्ध द्वारा निर्धारित नीतियों एवं उद्देश्यों को क्रियान्वित करना है ।
प्रबन्ध की विषय सामग्री में निम्न शामिल हैं ।
1. नियोजन
2. संगठन
3. स्टाफिंग
4. संचालन
5. समन्वय
6. नियंत्रण
7. अभिप्रेरण
प्रक्रिया से तात्पर्य दैनिक गतिविधियों के संचालन से है। कार्य कैसे संपन्न करना है? इसकी विस्तृत विधि, प्रक्रिया ही बतलाती है। ये प्रक्रियाएँ एक विशिष्ट कालानुक्रमिक क्रम में होती है। जैसे उत्पादन से पहले माल मँगाने की कोई प्रक्रिया हो सकती है। विशेष परिस्थितियों में प्रक्रियाओं के चुनाव के विशिष्ट ढंग हैं । वे सामान्यतया आंतरिक लागों के अनुसरण के लिए होते हैं। कार्य जो करता है या कार्य का क्रम सामान्यत-पूर्वनिर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नीति का दवाब ही होता है। नीतियाँ तथा प्रक्रिया दोनों आपस में एक दूसरे से संबंधित हैं। प्रक्रिया, विस्तृत नीतिगत ढाँचे के अंतर्गत कार्य करने से है।
(i). श्रीमती धारीवाल ने यह मानते ............ लक्ष्य को दुगुना कर दिया।
इस पंक्ति में नियोजन प्रक्रिया के दो चरणों का उल्लेख किया गया हैः
· आधार विकसित करना
· उद्देश्य निश्चित करना
(ii). सभी विभागीय प्रबन्धकों .......... आदेश दे दिए गए।
· योजना को लागू करना
(iii). कुछ समय के बाद........... उपाय कर रही है।
समीक्षा करना
नियंत्रण अर्थात नियोजित तथा वास्तविक उत्पादन की तुलना है तथा यदि इन दोनों में कोई अंतर हो तो इसके लिए कारणों का पता लगाना तथा वास्तविक उत्पादन को नियोजित उत्पादन से मिलाने के लिए उपाय करना है।
यदि कोई नियोजित उत्पादन नहीं होता है तो नियंत्रण प्रबंधक के पास वास्तविक उत्पादन की पर्याप्त्ता जानने के लिए तुलना का कोई आधार ही नहीं होता है। नियोजन वास्तविक मानक प्रदान करता है जिसे वास्तविक प्रदर्शन के खिलाफ मानक के रूप में लिया जाता है।
उदाहरण के लिए,
यदि एक सप्ताह के लिए
100 इकाइयों के उत्पादन की योजना बनाई गई और वास्तविक उत्पादन
80 इकाई है तो नियंत्रण प्रबंधक को
80 इकाइयों के उत्पादन को
100 इकाइयों तक लाने के लिए उपाय करने चाहिए,
यदि उसके पास
100 इकाइयों का एक मानक नहीं होगा तो वह
80 इकाइयों के उत्पादन को पर्याप्त या अपर्याप्त उत्पादन मानने में असमर्थ हो जायेगा। इसलिए,
नियंत्रित में तुलना करने के लिए आधार या मानक नियोजन कार्य द्वारा दिया जाता है।
i व्यूह रचना - व्यूह-रचना से हमारा आशय उस योजना से है जो संगठन को प्रतिस्पद्धी वातावरण में सफल बनाने के लिए बनायी जाती है। अन्य शब्दों, यह एक साधन जिसके द्वारा प्रबन्धक प्रतिस्पर्द्धियों के द्वारा अपनायी गयी युक्तियों के आधार पर योजनाएँ, नीतियाँ तैयार एवं परिवर्तित की जाती हैं।
ii कार्यक्रम - कार्यक्रम एक परियोजना के सम्बन्ध में विस्तृत विवरण होते हें जो आवश्यक उद्देश्यों, नीतियों, कार्य-विधयों, नियमों, कार्यों, मानवीय तथा भौतिक संसाधनों तथा किसी कार्य को करने में बजट की रूपरेखा बनाते हैं।
यहाँ प्रबंधन के नियोजन कार्य को प्रदर्शित किया गया है।
नियोजन क्या करना है तथा कैसे करना है को अग्रिम में निर्धारित करता है।
नियोजन की विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
1. योजना व्यापक है
- व्यापक सामान्यतः चारों तरफ फैल करने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। उसी प्रकार नियोजन किसी भी उद्यम में फैला रहता है। नियोजन प्रक्रिया सभी संगठनों के लिए सामान्य होती है। यह प्रबंधन के सभी स्तरों पर आवश्यक होता है। चाहे हम छोटे संगठन या एक बड़े संगठन की बात करें नियोजन सभी में आवश्यक होता है।
2. नियोजन हमेशा आगे देखता है
- इसमें कोई संदेह नहीं है कि नियोजन हमेशा आगे देखता है। हम हमेश भविष्य के लिए योजना बनाते हैं। हम भविष्य की मांग का निर्धारण करते
समय संसाधनों के भविष्य की आवश्यकताओं और उपलब्धता की आशा करते हैं। इस तरह से नियोजन आगे देखता है।
3. नियोजन एक प्रक्रिया है जो निर्णयन में मदद करती है
- नियोजन में अनिवार्य रूप से विभिन्न विकल्प और गतिविधियों के बीच में से विकल्प शामिल होता है। इस प्रकार,
नियोजन में पूरी तरह से प्रत्येक विकल्प की परीक्षा एवं मूल्यांकन और सबसे उपयुक्त विकल्प को चुनना शामिल होता है।
4. नियोजन सभी प्रबंधन गतिविधियों में व्याप्त है
- नियोजन व्यावसायिक गतिविधियों के हर प्रकार के लिए आवश्यक होता है। प्रत्येक विभाग को व्यापार के वांछित लक्ष्य की दिशा में नियोजन पर निर्भर व्यवस्थित योजना,
विभिन्न विभागीय योजनाओं और अपनी एकीकृत ऊर्जा की दिशा में समन्वय की आवश्यकता होती है,
चाहे वह क्रय,
विक्रय,
लेखा,
लेखा परीक्षा,
विपणन आदि हो। इस प्रकार प्रभावी संगठन,
नियुक्तिकरण,
निर्देशन और नियंत्रण सभी में नियोजन की आवश्कता होती है।
5. नियोजन उद्देश्य प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है
- यह भविष्य की मांगों एवं मौजूदा और भावी संसाधनों का मूल्यांकन करता है। यह भौतिक और मानव प्रयासों के बीच समन्वय को प्रभावी बनाता है और व्यापार के वांछित लक्ष्य की दिशा में उन्हें अग्रसर करता है।
हाँ,
मैं इस कथन से सहमत हूँ। नियोजन निम्न कारणों से एक संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक होता है:
1. नियोजन दिशा प्रदान करता है
- यह भविष्य की मांगों एवं मौजूदा और भावी संसाधनों का मूल्यांकन करता है। यह भौतिक और मानव प्रयासों के बीच समन्वय को प्रभावी बनाता है और व्यापार के वांछित लक्ष्य की दिशा में उन्हें अग्रसर करता है।
2. नियोजन भविष्य की अनिश्चितताओं को कम करता है
- नियोजन भविष्य की अनिश्चितताओं का पूर्व आकलन करता है और संसाधनों के न्यूनतम अपव्यय के साथ इन अनिश्चितताओं से निपटने के लिए संगठन को सक्षम बनाता है।
3. नियोजन अतिव्यापी और फालतू गतिविधियों को कम करता है
- यह व्यापार के लिए उपलब्ध और भावी संसाधनों के वैकल्पिक उपयोग का मूल्यांकन करता है और सबसे उपयुक्त तरीके से उनका इस्तेमाल करता है।
4. योजना निर्णयन को सुविधाजनक और रचनात्मकता को बढ़ावा देता है
- यह भविष्य में देखकर प्रबंधक को सबसे अच्छे विकल्प का चयन करने के लिए तथा कार्रवाई के विभिन्न वैकल्पिक पाठ्यक्रमों में से एक का चयन करने में मदद करता है। उपयुक्त अवसरों का लाभ उठाने के क्रम में ठोस प्रयास किये जाते हैं और इससे नए विचारों,
तरीकों और तकनीकों को उभारा जाता है।
A.
अदिश श्रंखला।
B.
आदेश की श्रंखला।
C.
अंगूरीलता।
D.
उल्टा वी।
आकस्मिक दायित्व वे दायित्व हैं, जो अभी तक तो नहीं आए हैं, अनौपचारिक संप्रेषण को अंगूरीलता भी कहा जाता है क्योंकि इसके मूल और पथ का आसानी से पता नहीं किया जा सकता है।
A.
वित्तीय प्रोत्साहन का।
B.
कार्यावर्तन का।
C.
नौकरी विनिर्देश का।
D.
गैर-वित्तीय प्रोत्साहन का।
नौकरी की सुरक्षा कर्मचारियों की सुरक्षा जरूरतों को पूरा करती है। कर्मचारियों की जरूरतों की पूर्ति उन्हें प्रेरित करने में मदद करती है। यह गैर-वित्तीय प्रोत्साहन का एक प्रकार है, क्योंकि इससे संगठन के लिए मौद्रिक खर्च नहीं होता है।
A.
इसके स्त्रोतों को देखा जा सकता है।
B.
यह विश्वसनीय नहीं है।
C.
यह धीमा है।
D.
यह तेज है।
अनौपचारिक संचार आदेश और संचार की औपचारिक श्रंखला के माध्यम से प्रवाहित नहीं होता है। यह एक मौखिक जानकारी है, जो टेलीफोन या आमने-सामने के माध्यम से जल्दी से अपने गंतव्य तक पहुँच जाती है। औपचारिक संचार सामान्यतः लिखित रूप में होते हैं तथा लिखित दस्तावेज को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए समय लगता है।
A.
अधिनस्थों के प्रकारों पर।
B.
संगठन के प्रकार पर।
C.
कार्यस्थल की स्थितियों पर।
D.
वरिष्ठ के व्यक्तित्व तथा अनुभव पर।।
नेतृत्व शैली अधिनस्थों के प्रकारों, कार्यस्थल की स्थितियों और वरिष्ठ के व्यक्तित्व और अनुभव पर निर्भर करता है।
A.
अनौपचारिक सम्प्रेषण।
B.
अंगूरीलता।
C.
सम्भाव्यता जाल।
D.
औपचारिक सम्प्रेषण।
ये वरिष्ठ अधिकारियों के माध्यम से मातहत को पहूँचायी हुई औपचारिक सूचाना का एक हिस्सा है या ठीक इसके विपरीत। सम्प्रेषण की औपचारिक श्रंखला अधीनस्थों को आदेश तथा निर्देश देने के लिए प्रयोग में ली जाती है। मातहत इसका उपयोग अपने वरिष्ठ अधिकारियों को रिपोर्ट, सुझाव और फीडबैक देने के लिए करते हैं।
A.
यह वरिष्ठ पर कार्यभार बढ़ाता है।
B.
यह अफवाओं को बढ़ाता है।
C.
इसके स्त्रोत का पता नहीं लगाया जा सकता है।
D.
कर्मचारी आलोचना के डर से तथ्यों को छुपा सकता है।
एक औपचारिक सम्प्रेषण में, वाहक उन तथ्यों को छुपा सकता है जिसके लिए वह सोचता है कि उसकी आलोचना होगी। वे संचार में अपनी गलतियों को छिपा सकते हैं।
A.
सही कार्य पर सही व्यक्ति की नियुक्ति।
B.
भविष्य में किये जाने वाले कार्य का निर्धारण।
C.
लोगों को निर्देश देना।
D.
मानक प्रदर्शन की वास्तविक प्रदर्शन से तुलना करना।
निर्देशन संगठन में लोगों को निर्देश देने, संप्रेषण करने तथा अभिप्रेरित करने को संदर्भित करता है।
A.
सम्प्रेषण।
B.
नेतृत्व।
C.
पर्यवेक्षण।
D.
अभिप्रेरण।
पर्यवेक्षण अर्थात संगठन में कार्य के दौरान कर्मचारियों को निर्देश देना, मार्गदर्शन करना, निगरानी रखना और अवलोकन करना।
A.
भूख।
B.
सुरक्षा।
C.
रक्षा।
D.
आत्म सम्मान।
भूख बुनियादी मनोवैज्ञानिक जरूरत होती है। शारीरिक जरूरत वे जरूरतें होती हैं जो एक आदमी को जिंदा रखने के लिए आवश्यक होती हैं। इन जरूरतों में भोजन, आवास, कपड़े और नींद आदि शामिल हैं।
A.
भूख।
B.
प्यास।
C.
पेंशन योजना।
D.
आत्म सम्मान।
सुरक्षा की जरूरतों में शारीरिक और आर्थिक जरूरतें शामिल होती हैं। शारीरिक सुरक्षा दुर्घटनाओं, हमलों, बीमारियों, आदि के खिलाफ रक्षा को संदर्भित करती हैं। आर्थिक सुरक्षा अर्थात बुढ़ापे के लिए आजीविका और व्यवस्था की सुरक्षा। उदाहरण के लिए, पेंशन योजना, आदि।
A.
बोनस।
B.
भत्ते।
C.
अनुलाभ।
D.
मजदूरी प्रोत्साहन।
अनुलाभ वे सुविधाएँ हैं जो एक कर्मचारी को नियोक्ता से मुक्त करती हैं, जैसे - मुक्त आवास, कार, नौकर, आदि। ये सुविधाएँ कर्मचारियों को प्रेरित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
A.
कर्मचारियों को निर्णय लेने के लिए अधिक स्वतंत्रता देना।
B.
प्रबंधकीय कार्यों में भाग लेने के लिए कर्मचारियों को प्रोत्साहित करना।
C.
कर्मचारियों को नौकरी की सुरक्षा प्रदान करना।
D.
कर्मचारियों के लिए बेहतर संगठनात्मक वातावरण प्रदान करना।
कर्मचारी सशक्तिकरण का अर्थात कर्मचारियों को निर्णय लेने के लिए अधिक स्वतंत्रता देना। जब कर्मचारियों की निर्णयन क्षमता बढ़ती है तो वे समझते हैं कि वे संगठन में कुछ जरूरी कार्य कर रहे हैं, जो उन्हें कुशलता से काम करने के लिए प्रेरित करता है।
A.
नौकरी संवर्धन का।
B.
नौकरी की सुरक्षा का।
C.
कर्मचारी सशक्तिकरण का।
D.
कर्मचारी मान्यता कार्यक्रम का।
एक संगठन में काम कर रहा हर कर्मचारी संगठन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने की इच्छा रखता है। उसे विशेष और विशिष्ट अनुभव करवाने के लिए संगठन स्मृति चिन्ह देते हैं, अच्छे कार्य प्रदर्शन के लिए कर्मचारी को बधाई देते हैं, सूचना बोर्ड पर योग्यता के पुरस्कार प्रमाण पत्र, कर्मचारी की उपलब्धियों का प्रदर्शन आदि करते हैं।
A.
ग्रेच्युटी।
B.
बोनस।
C.
अनुलाभ।
D.
वेतन और भत्ते।
सेवानिवृत्ति लाभ वित्तीय प्रोत्साहन का एक प्रकार होता है। हर कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद अपने भविष्य के बारे में चिंतित रहता है। उसे वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के लिए भविष्य निधि और ग्रेच्युटी जैसे कई लाभ दिये जाते हैं।
संगठनात्मक बाधा ऐसी बाधा होती है जो संगठनात्मक संरचना और नियमों एवं विनियमों से संबंधित होती है।
कूट लेखन प्रेषणी के लिए द्वारा संदेश को समझ योग्य बनाने के लिए शब्दों, प्रतीकों, इशारों में संदेश के अनुवाद को संदर्भित करता है।
संप्रेषण को दो तरह की प्रक्रिया के रूप में माना जाता है क्योंकि इसमें प्रेषक की सूचना और प्रेषणी की समझ को शामिल किया जाता है। यह तब तक पूरा नहीं होता है जब तक कि प्रेषणी को संदेश समझ में नहीं आ जाये तथा उसकी प्रतिक्रिया प्रेषक के समझ में नहीं आ जाये।
नेतृत्व प्रबंधन के कार्यों को निर्देशित करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। प्रबंधक के पास अधीनस्थों को आदेश देने का अधिकार होता है। लेकिन नेतृत्व यह सुनिश्चित करने के लिए प्रबंधकों को सक्षम बनाता है कि अधिनस्थ स्वेच्छा से उनके निर्देशों का पालन कर रहें हैं तथा उनकी सलाह और मार्गदर्शन को स्वीकार करते हैं।
प्रबंधकों का ध्यान संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने पर केंद्रित होता है,
लेकिन नेता अनुयायियों की उम्मीदों और आकांक्षाओं से संबंधित होते हैं।
एक प्रबंधक अपने तथा अपने अधीनस्थों के व्यवहार के लिए जवाबदेह होता है,
जबकि एक नेता केवल अपने व्यवहार के लिए जवाबदेह होता है।
एक अच्छा नेता स्पष्ट और ठीक रूप से लक्ष्यों और अपनायी जाने वाली प्रक्रियाओं को सम्प्रेषित करने में सक्षम होना चाहिए। यह लोगों को समझाने और राजी करने के लिए आवश्यक होता है। धैर्य और सहानुभूति के साथ सुनने के लिए भी यह कौशल आवश्यक होता है। संचार कौशल अनुयायियों को समझने और उन्हें प्रेरित करने में नेता को सक्षम बनाता है।
निर्देशन प्रत्येक और हर प्रबंधक की जिम्मेदारी होती है। इसे प्रबंधन के सभी स्तरों पर प्रदर्शित किया जाता है तथा यह सभी प्रबंधकों का कार्य होता है। इसका प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होता है।
पर्यवेक्षण अपने कार्यों के प्रदर्शन में अधीनस्थों के प्रत्यक्ष और तत्काल मार्गदर्शन और नियंत्रण को संदर्भित करता है। पर्यवेक्षण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अधिनस्थ कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से कार्य करे।
कुशल निर्देशन एक उद्यम को जीवित रखने और विकसित करने में मदद करता है। जब इसे सही दिशा प्रदान की जाती है तो यह यह विकसित हो सकता है। प्रबंधक प्रभावी नेतृत्व, प्रेरणा और पारस्परिक संचार के माध्यम से कर्मचारियों की क्षमता का पूर्ण उपयोग करते हैं।
अ- कर्मचारियों को प्रेरित करना
- अच्छा संप्रेषण कर्मचारियों के व्यवहार को बदलता है और सौहार्दपूर्ण औद्योगिक संबंधों का निर्माण करता है। यह अपने कर्तव्यों में कर्मचारियों की दिलचस्पी बनाये रखना चाहते हैं जिससे वे प्रदर्शन करें और संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करें।
ब - निर्णय कार्यान्वित करना
- संप्रेषण जल्दी से निर्णयों को लागू करने में मदद करता है। संप्रेषण के माध्यम से कर्मचारी प्रबंधन के निर्णय को समझते हैं और उन पर अमल करने के लिए कदम उठाते हैं।
औपचारिक संप्रेषण संगठन में तैयार किये गये आधिकारिक चैनलों के माध्यम से सूचना के प्रवाह को दर्शाता है। यह संप्रेषण एक वरिष्ठ और अधीनस्थ,
एक अधीनस्थ और वरिष्ठ के बीच या एक ही संवर्ग के कर्मचारियों के बीच हो सकता है।
औपचारिक संप्रेषण के दो गुण हैं:
1. यह वरिष्ठ के अधिकारों और स्थितियों को बनाए रखने में मदद करता है।
2. यह कर्मचारियों के प्रदर्शन के बारे में प्रबंधन को सूचित करने में मदद करता है।
औपचारिक संप्रेषण के दो दोष हैं:
1. यह धीमी और समय लेने वाली प्रक्रिया है।
2. इसमें श्रमिक स्वतंत्र रूप से अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकते हैं।
1. शारीरिक बाधाएँ
- यह उन बाधाओं को दर्शाता है जिनमें ध्वनि,
शोर या पर्यावरण रूकावटें शामिल होती हैं जो एक व्यक्ति को सुनने से रोकती हैं।
2. स्थिति बाधाएँ
- यह उन बाधाओं को दर्शाता है जो एक औपचारिक संगठन में वरिष्ठों तथा अधिनस्थों के ऐसे संबंधों से पैदा होती हैं जो निस्पंदन का निर्माण करती हैं। यह तब उत्पन्न होती हैं जब एक जागरूक प्रबंधक अपने अधीनस्थों को स्वतंत्र रूप से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की अनुमति नहीं देता हो।
तेज और कुशल संप्रेषण निम्न कारणों के चलते आवश्यक होता है:
1. बड़ा आकार
- संगठनों का आकार बड़ा होता है,
इसलिए व्यक्तिगत संपर्क रखने के लिए दूरसंप्रेषण आवश्यक होता है।
2. वैश्वीकरण
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कार्य दुनिया भर में होता है,
प्रभावी संप्रेषण विभिन्न शाखाओं और सहायक कंपनियों के बीच समन्वय ला सकता है।
3. प्रतियोगिता
- प्रभावी संप्रेषण एक अत्यंत प्रतिस्पर्धी माहौल में नवीनतम रुझानों का पता करने के लिए और त्वरित निर्णय लेने के लिए आवश्यक होता है।
4. जनसंपर्क
- व्यवसाय के हितधारकों के साथ संपर्क में रहने के लिए और एक अच्छी सार्वजनिक छवि बनाने के लिए।
अ- फैक्स
(प्रतिकृति)
- यह एक स्थायी रूप में तस्वीरों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए एक दृश्य के साथ स्थायी छवियों के प्रसारण के लिए दूरसंप्रेषण की व्यवस्था को संदर्भित करता है। यह संप्रेषण की एक त्वरित और सस्ती विधा है। इसमें प्रेषक की मशीन संदेश को स्कैन करती है और डिजिटल कोड में धर्मान्तरित करती है तथा संदेश को प्राप्तकर्ता की मशीन पर मुद्रित किया जाता है।
ब- ई-मेल (इलेक्ट्रॉनिक मेल)
- इसमें,
कंप्यूटर टर्मिनलों के एक नेटवर्क के माध्यम से जुड़े हुए होते हैं। एक छोर पर एक कंप्यूटर स्क्रीन पर टाइप किया गया संदेश इलेक्ट्रॉनिक आवेगों के माध्यम से दूसरे छोर पर प्रकट हो जाता है। यह प्रसारण की सबसे तेज विधि होती है। संदेश को गोपनीय रखा जा सकता है।
लिखित संप्रेषण के लाभ हैं:
1. यह एकरूपता सुनिश्चित करता है क्योंकि प्रत्येक के पास एक ही जानकारी होती है।
2. यह भविष्य में संदर्भ के लिए एक स्थायी रिकार्ड प्रदान करता है।
3. इसे एक कानूनी साक्ष्य के रूप में उद्धृत किया जा सकता है।
4. यह व्यक्तियों की बड़ी संख्या के लिए लंबा संदेश संवाद स्थापित करने के लिए एक आदर्श तरीका है।
संप्रेषण का मुख्य उद्देश्य मानव व्यवहार को प्रभावित करना होता है। यह पारस्परिक संबंध बनाने का एक साधन होता है। एक प्रबंधक अपने अधिनस्थों के साथ जानकारी, विचारों और भावनाओं का साझा करके उनके बीच प्रेरणा और वफादारी का निर्माण करता है।
व्यवसाय फर्में कार्यकर्ताओं और उपभोक्ताओं को शिक्षित करने के लिए संप्रेषण के विभिन्न तरीकों का उपयोग करती हैं। वे कर्मचारियों को आदेश और निर्देश जारी करते हैं जिससे वे कुशलता से अपने कार्य का प्रदर्शन कर सकते हैं। उपभोक्ताओं को नए उत्पादों और उनके उपयोग के बारे में जानकारी प्रदान की जाती हैं।
अंगूरीलता संप्रेषण के दो तंत्र इस प्रकार हैं:-
1. इकहरी श्रृंखला:- इस तंत्र में प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से केवल एक क्रम में संप्रेषण कर सकता है। यहाँ A उच्चाधिकारी है।

2. संभाव्यता:- संभाव्यता संचार तंत्र में एक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों से बेतरतीब ढंग से संप्रेषण करता है। यहाँ । उच्चाधिकारी है।

1. चक्र- इस नेटवर्क में, सभी अधीनस्थ अपने उच्च स्तरीय लोगों के द्वारा संप्रेशित आदेषों पर कार्य करते हैं इसमें वह व्यक्ति जो जो संवाद का माध्यम होता है वह एक पहिया के रूप में कार्य करता है। इसमें अधीनस्थों की आपस में बात करने की अनुमति नहीं होती है।
2. विलोम V :- इस नेटवर्क में, एक अधीनस्थ को बेहतर करने के लिए अपने वरिश्ठ अधिकारी तथा उसके वरिश्ठ अधिकारी से संप्रशण करने की अनुमती दी जाती है।
नेतृत्व शैली को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. निरंकुश नेतृत्व:
इस शैली में,
एक नेता आदेश देता है और यह कहता है कि उनकी बात मानी जाये। वह उनसे परामर्श किये बिना समूह के लिए नीतियों को निर्धारित करता है।
2. लोकतंत्रात्मक नेतृत्व:
इसमें एक नेता केवल समूह से परामर्श के बाद आदेश देता है और समूह की स्वीकृति के साथ नीतियों को निर्धारित करता है।
3. अहस्तक्षेप नेतृत्व:
इस शैली में,
एक नेता अपने अधिनस्थों को पूरी स्वतंत्रता देता है। इस तरह के नेता अपनी शक्ति का उपयोग नहीं करता है। वह अपने अधीनस्थों की गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं करता है।
A.
आधिकारिक नेतृत्व।
B.
सहभागी नेतृत्व।
C.
खुला नेतृत्व।
D.
स्वतंत्र नेतृत्व।
नेतृत्व की लोकतांत्रिक या सहभागी शैली ऊपर और नीचे दोनों संचार की अनुमति देती है।
A.
संगठनात्मक बाधा का।
B.
मनोवैज्ञानिक बाधा का।
C.
अर्थ सम्बंधी बाधा का।
D.
व्यक्तिगत बाधा का।
कभी कभी लोग संदेश वाहक द्वारा संदेश पूरा करने से पूर्व ही संदेश का मूल्यांकन कर लेते हैं। यह सूचना के आदान प्रदान में एक बड़ी बाधा के रूप में कार्य करता है।
A.
कार्य समृद्धी।
B.
स्थिति।
C.
कर्मचारी की भागीदारी।
D.
अनुलाभ।
अनुलाभ वे सुविधाएँ होती हैं जो नियोक्ता द्वारा मुक्त करने के लिए कर्मचारी को दी जाती हैं। उदाहरण के लिए, निः शुल्क आवास, कार की सुविधा आदि यह वित्तीय प्रोत्साहन का एक उदाहरण है।
A.
चक्र संचार।
B.
परिपत्र संचार।
C.
मुक्त प्रवाह संचार।
D.
गपशप श्रंखला।
संचार के इस रूप में, एक व्यक्ति गपशप के दौरान कई व्यक्तियों से संचार करता है। संगठन में एक विशेष व्यक्ति कुछ जानता है और अपने समूह के सभी सदस्यों को बताता है और कुछ अन्य लोग उस बात को आगे बताते हैं। आम तौर पर इस तरह की सूचना कार्य सम्बंधी नहीं होता है।
A.
भावनात्मक बाधाएँ।
B.
संगठनात्मक बाधाएँ।
C.
व्यक्तिगत बाधाएँ।
D.
भाषा की बाधाएँ।
अर्थ सम्बंधी बाधा शब्दों या भावों में संदेश को रूपांतरित करने की प्रक्रिया में समस्याओं और अवरोधों से संबंधित होती है। आम तौर पर, इस तरह के अवरोध गलत शब्द, दोषपूर्ण अनुवाद, विभिन्न व्याख्याओं आदि के उपयोग के कारण होती हैं।
A.
दोषपूर्ण अनुवाद
B.
अस्पष्ट मान्यताएँ
C.
कम स्मृति।
D.
अधिकार के लिए चुनौती का डर।
भावनात्मक या मानसिक कारक संचार के लिए बाधा के रूप में कार्य करता है। कम स्मृति शक्ति मनोवैज्ञानिक बाधाओं के प्रकारों में से एक है।