उत्पादों
को मोटे तौर पर
दो प्रकारों
में
वर्गीकृत
किया जा सकता
है:
1. उपभोक्ता
उत्पाद - ये
ऐसे उत्पाद
होते हैं जिन्हें
सीधे अंतिम
उपभोक्ताओं
द्वारा
उपयोग किया
जाता है।
अ
- सुविधा माल:
इसमें अक्सर
खरीदी जाने
वाली और और कम
से कम प्रयास
वाली मांग
वस्तुओं को
शामिल किया
जाता है। उदाहरण
- समाचार पत्र, टूथपेस्ट, चाय, साबुन, आदि
ब
- बाज़ार
उत्पाद: ये
तुलनात्मक
ब्रांडों से तुलनात्मक
विश्लेषण के
बाद खरीदे गए
उत्पाद होते
हैं। उदाहरण -
फर्नीचर, टेलीविजन, वाशिंग
मशीन, आदि
स
- विशिष्ट
उत्पाद: इन
उत्पादों को
क्रय करते समय
विशेष
प्रयासों की आवश्यकता
होती है।
उदाहरण -
आभूषण, फैंसी
आइटम, आदि
2. औद्योगिक
उत्पाद - ऐसे
उत्पाद जो
अन्य उत्पादों
के निर्माण
में उपयोग
लिए जाते हैं
औद्योगिक
उत्पाद
कहलाते हैं।
अ
- कच्चा माल:
इसे तैयार
माल में
परिवर्तित
किया जाता
है। उदाहरण -
गन्ना, कपास, आदि
ब
- आपूर्ति: इन
निर्मित माल
का हिस्सा
नहीं होते
हैं परंतु
उत्पादन के
लिए आवश्यक
होते हैं।
उदाहरण - नट, बोल्ट, पेपर
क्लिप, आदि
स
- स्थापना:
इसमें
कारखाने
साइटों,
उत्पादन
लाइनों,
ट्रकों
आदि जैसी
भारी मूल्य
की वस्तुओं
को शामिल
किया जाता
है।
द
- सहायक उपकरण:
इसमें छोटे
संजीमे,
पोर्टेबल
ड्रील आदि
जैसी कम
पूँजी
मूल्यों को
शामिल किया
जाता है।
य
- गढे़ हुए
पार्ट: ये
पूर्व
उत्पादित
पार्ट होते
हैं जो तैयार
उत्पाद का
हिस्सा बनते
हैं। उदाहरण -
कंप्यूटर के
लिए माउस, जूतों
के लिए
डोरियाँ
आदि।
विपणन मिश्रण उद्यम उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए विपणन के विभिन्न तत्वों को डिजाइन और एकीकृत करने की प्रक्रिया है।
विपणन मिश्रण में उत्पाद की उपलब्धता, मूल्य, बाजार के ग्राहकों को बोनस प्रदान करना आदि शामिल है। विपणन मिश्रण के तत्वों को चार शीर्षों उत्पाद, मूल्य, स्थान और संवर्धन के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है।
उत्पाद
मिश्रण
ग्राहकों की
जरूरतों को
पूरा करने के
लिये मूल्य
के लिए
आदान-प्रदान
करने में
सक्षम ‘उत्पाद’ की
मूर्त और
अमूर्त
विशेषताओं
का एक मिश्रण
होता है। इस
मिश्रण के
तहत
गतिविधियों
में उत्पाद
डिजाइन,
ब्रांडिंग, पैकेजिंग
और उत्पाद की
लेबलिंग
शामिल है।
मूल्य
मिश्रण ‘कीमत’ पर
निर्णय से
संबंधित है
क्योंकि
बिक्री उत्पाद
के मूल्य
निर्धारण पर
काफी हद तक
निर्भर करती
है। समान
उत्पाद के
लिए विभिन्न
बाज़ारों से
वसूल समरूप
मूल्य या
वसूल
भिन्न-भिन्न मूल्य
उत्पाद की
कीमत से
संबंधित
निर्णय के उदाहरण
हैं।
स्थान मिश्रण उस ‘स्थान’ या ‘बाज़ार’ के निर्णय से संबंधित होता है जहाँ माल को विक्रय हेतु उलपब्ध कराया जायेगा। इसमें बिचैलियों के नेटवर्क को मिलाकर वितरण की श्रंखला और परिवहन, भंडारण, सूची नियंत्रण आदि जैसी प्रक्रियाओं को मिलाकर भौतिक वितरण को शामिल किया जाता है।
संवर्धन मिश्रण में उत्पादों के बारे में ग्राहकों को जागरूक करने के लिए और उन उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए, विज्ञापन, व्यक्तिगत बिक्री, बिक्री संवर्धन और प्रचार जैसे संवर्धन उपकरणों के उपयोग से जुड़े निर्णय शामिल होते हैं।
पैकेजिंग के स्तर
पैकेजिंग के तीन स्तर होते हैं ये इस प्रकार हैं -
1. प्राथमिक पैकेज - इसका अभिप्राय उत्पाद की सीधी पैकेजिंग से है। कुछ मामलों में प्राथमिक पैकेज में ही वस्तुओं को तब तक रखा जाता है जब तक कि उपभोक्ता उनका उपभोग न करे (जैसे मोजों के लिए प्लास्टिक के पैकेट) जबकि कुछ मामलों में उत्पाद के समाप्त होने तक उसे इन्हीं में रखा जाता है जैसे टूथपेस्ट की ट्यूब, माचिस की डब्बी आदि।
2. द्वितीयक पैकेजिंग - यह सुरक्षित रखने के लिए एक अतिरिक्त परत होती है जिसे उस समय तक रखा जाता है जब तक कि इसका उपयोग प्रारंभ न हो जाए जैसे शेविंग क्रीम ट्यूब साधारणतया गत्ते के बक्से में रखी होती है। जब उपभोक्ता शेविंग क्रीम को प्रयोग करना प्रारंभ करता है तो वह बाॅक्स को तो फेंक देता है लेकिन प्राथमिक ट्यूब को रखे रखता है।
3. परिवहन के लिए पैकेजिंग - इससे अभिप्राय एक और पैकेजिंग से है जो संग्रहण, पहचान अथवा परिवहन के लिए आवश्यक है। उदाहरण के लिए एक टूथपेस्ट निर्माता वस्तुओं को फुटकर विक्रेता को 10, 20 अथवा 30 की इकाई की तह लगाकर बक्सों में भेजता है।
पैकेजिंग के कार्य -
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है पैकेजिंग वस्तुओं के विपणन में कई कार्य करता है। इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य इस प्रकार हैं -
1. उत्पाद की पहचान करना - पैकेजिंग उत्पादों की पहचान करने में बहुत सहायता करता है। उदाहरण के लिए, लाल रंग में कोलगेट या फिर पौंड्स क्रीम का जार इनके पैकेज आसानी से पहचाने जाते हैं।
2. उत्पाद संरक्षण - पैकेजिंग वस्तु को नष्ट होने, रिसने, चोरी चले जाने, नुकसान पहुँचाने, जलवायु के प्रभाव सुरक्षा प्रदान करता है। वस्तुओं के संग्रहण, वितरण एवं परिवहन के दौरान इस प्रकार की सुरक्षा की आवश्यकता होती है।
3. उत्पाद के उपयोग में सरल-पैकेज का आकार एवं स्वरूप।
4. उत्पाद प्रवर्तन - प्रवर्तन के उद्देश्य से भी पैकेजिंग का उपयोग किया जाता है। चकाचैंध करने वाली रंग योजना, फोटा या फिर छपी हुई फोटो का उपयोग क्रय के समय ध्यानाकर्षण के लिए किया जा सकता है। कभी-कभी यह विज्ञापन से अच्छा कार्य कर जाती है। स्वंय सेवी स्टोर में पैकेजिंग की यह भूमिका और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
ब्रांडिंग - अधिकांश उपभोक्ता उत्पादों के विपणन के लिए एक विपणनकर्ता द्वारा एक महत्त्वपूर्ण निर्णय यह लिया जाता है कि इनकी बिक्री किस ब्रांड नाम से की जाये ? ब्रांड का नाम उत्पाद को अन्य उत्पादों से भिन्न बनाता है, जो किसी फर्म के उत्पाद को प्रतियोगी के उत्पाद से अन्तर का आधार बन जाता है, जिससे उत्पाद के लिए उपभोक्ता का लगाव पैदा होता है तथा इससे उसके विक्रय संवर्द्धन में सहायता मिलती है। किसी उत्पाद की सफलता में उसके सही ब्रांड नाम के चयन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। प्रत्येक उत्पाद के लिए अलग - अलग ब्रांड नाम दिये जा सकत हैं या फिर सभी उत्पादों के लिए एक ब्रांड नाम दिया जा सकता है जैसे नोकिया मोइल, टाइटन घडि़याँ, सैमसंग आदि।
ब्रांडिंग से विपणनकर्ताओं को होने वाले लाभ
1. प्रतियोगिता से बचाव - ब्राण्ड वाली वस्तुओं के क्रेताओं में ब्राण्ड के प्रति वफादारी पैदा हो जाती है, जिससे वे उसी ब्राण्ड की वस्तु को क्रय करते हैं। उनकी यह आदत निर्माता को प्रतियोगिता से बचाती है।
2. मध्यस्थों को सहज उपलब्धि - ब्राण्ड वाली वस्तु को बेचने के लिए मध्यस्थ आसानी से मिल जाते हैं। इसी के साथ ही अच्छी ब्राण्ड वाली वस्तु को बेचने के लिए इन मध्यस्थों को परिश्रमिक भी कम देना पड़ता है।
3. पुनः विक्रय को प्रोत्साहन - यह देखा गया है कि यदि ग्राहक ब्राण्ड वाली वस्तु से सन्तुष्ट है तो उसी वस्तु को पुनः खरीदेगा। परिणामस्वरूप पुनः विक्रय को प्रोत्साहन मिलता है। इसके विपरीत यदि वस्तु ब्राण्ड वाली नहीं है तो दुकानदार उस वस्तु के समाप्त होने पर अथवा दूसरी दुकान पर न होने का कारण दूसरी वस्तु उससे अच्छा बताकार दे सकता है और इस प्रकार पहली वस्तु के साथ अन्याय कर सकता है।
4. संवर्द्धन व्ययों में मितव्यायिता - ब्राण्ड वाली वस्तुओं के सम्बन्ध में विज्ञापन, प्रचार-प्रसार, विक्रय संवर्द्धन, वैयक्तिक विक्रय आदि करने पर व्यय कम ही होते हैं क्योंकि ब्राण्ड के नाम से ही काम चल जाता है। इसके अतिरिक्त ऐसे विज्ञापन कम स्थान घेरते हैं।
5. मूल्य नियन्त्रण - एक निर्माता ब्राण्ड निश्चित करने के साथ-साथ उस ब्राण्ड का मूल्य भी निश्चित कर देता है, जिस पर उस वस्तु को उपभोक्ताओं को (अध्यस्थों एवं विक्रेताओं द्वारा) बेचा जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मध्यस्थ एवं विक्रेता मूल्य में मनमानी नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार यह निर्माता अपनी वस्तु के विक्रय पर मूल्य नियन्त्रण कर सकता है।
6. बाजार नियन्त्रण - ब्राण्ड निश्चित होने से बाजार पर नियन्त्रण किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि निर्माता जिन बाजारों में वस्तु को बेचना चाहता है, उन्हीं बाजारों में उसको बेचता है, अन्य में नहीं। यदि उसकी वस्तु पर कोई ब्राण्ड नहीं है तो वस्तु के मध्यस्थों द्वारा कहीं भी बेचा जा सकता है जिसका पता उसको नहीं लग सकता है।
विपणन के कार्य निम्नलिखित हैं -
1. विपणन नियोजन - संगठन के विपणन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए एक विपणनकर्ता का एक और महत्वपूर्ण कार्य अथवा क्षेत्र उचित विपणन योजना का विकास करना है।
2. पैकेजिंग एवं लेबलिंग - पैकेजिंग का अर्थ है उत्पाद के पैकेज का रूपांकन करना। लेबलिंग में पैकेज पर जो लेबल लगाए जाते हैं उनका रूपांकन किया जाता है। लेबल साधारण फीता से लेकर जटिल ग्राफिक्स तक अनेक प्रकार के होते हैं।
3. ग्राहक समर्थन सेवाएँ - विपणन प्रबंध का एक महत्वपूर्ण कार्य ग्राहक समर्थक सेवाओं का विकास करना है जैसे बिक्री के बाद की सेवाएँ ग्राहकों की शिकायत को दूर करना एवं समायोजनों को देखना एवं साख सेवाएँ आदि प्रदान करना।
4. संवर्धन - वस्तु एवं सेवाओं के संवर्धन में उपभोक्ताओं को फर्म के उत्पाद एवं उसकी विशेषताओं को फर्म के उत्पाद एवं उसकी विशेषताओं के संबंध में सूचना देना तथा उन्हें इन उत्पादों को क्रय करने के लिए प्रेरित करना सम्मिलित होता है।
5. वितरण - वस्तु एवं सेवाओं के विपणन का एक और महत्वपूर्ण कार्य भौतिक वितरण का प्रबंधन है। इस कार्य में दो के संबंध में निर्णय लिए जाते हैं (1) वितरण के माध्य एवं (2) उत्पादों को उनके उत्पाद स्थलों से ग्राहक के उपभोग या उपयोग स्थल तक ले जाना।
6. परिवहन - परिवहन का अर्थ है माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाना। सामान्यतः उत्पादों के उपयोगकर्ता विशेषतः उपभोग की वस्तुओं के उपयोगकर्ता दूर-दूर तक फैले हुए होते हैं तथा इनके उत्पादन स्थल से अलग स्थानों पर होते हैं।
विपणन की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं -
1. अपेक्षा एवं आवश्यकता - विपणन प्रक्रिया व्यक्ति एवं समुह को वह जो कुछ चाहते हैं उसे प्राप्त करने में सहायक करता है। अतः लोगों को विपणन प्रक्रिया में लगने के लिए प्रेरित करने का प्राथमिक कारण उनकी कुछ न कुछ आवश्यकताओ की पूर्ति करना है। दूसरे शब्दों में विपणन प्रक्रिया का पूरा ध्यान लोगों की एवं संगठनों की आवश्यकताओं पर होता है।
2. उत्पाद का सृजन - विपणनकर्ता बाज़ार के लिए उत्पाद का निर्माण करता है। बाज़ार उत्पाद से अभिप्राय किसी वस्तु अथवा सेवा की सम्पूर्ण प्रस्तावना से है जिनके लक्षण - आकार, गुणवत्ता, रूचि आदि जो एक निश्चित मूल्य पर, निश्चित दुकान अथवा स्थान पर उपलब्धता है।
3. ग्राहक के योग्य मूल्य - विपणन प्रक्रिया क्रेता एवं विक्रेता के बीच वस्तु एवं सेवाओं के विनिमय को सुगम बनाता है। क्रेता किसी वस्तु के क्रय का निर्णय लेते समय यह देखता है कि वह उनकी लागत की तुलना में उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति कितने मूल्य तक करती है।
4. विनिमय पद्धति - विपणन प्रक्रिया विनिमय पद्धति के माध्यम से कार्य करती है। लोग (क्रेता एवं विक्रेता) विनिमय प्रक्रिया के माध्यम अपनी इच्छित तथा आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त करते हैं।
A.
उच्च लाभांशों का।
B.
बहुत छोटे लाभांशों का।
C.
प्रतिद्वंदी फर्मों की तुलना में उच्च लाभांश का।
D.
अनिवार्य लाभांशों का।
आकस्मिक दायित्व वे दायित्व हैं, जो अभी तक तो नहीं आए हैं, लाभांश चालू तथा विगत आयों में से चुकाया जाता है। इसलिए, लाभांश के निर्णय के लिए आय एक मुख्य निर्धारक होती है।
A.
विपणन प्रबंधन का।
B.
सामग्री प्रबंधन का।
C.
वित्तीय प्रबंधन का।
D.
कारखाना प्रबंधन का।
वित्तीय नियोजन आवश्यकता के लिए या होने पर पर्याप्त कोष तथा यदि कोई हो तो आदर्श कोषों के विनियोग के लिए व्यवस्था को सुनिश्चित करता है। वित्तीय प्रबंधन अर्थात लाभों को बढ़ाने के लिए व्यवसाय में या बाहर किये गये विनियोगों पर आधिक्य कोषों को प्राप्त करना या उपयोग में लेना। वित्तीय नियोजन केवल नियोजन भाग से सम्बंधित होता है जबकि वित्तीय प्रबंधन कोषों के नियोजन के साथ-साथ उनके उपयोग के नियंत्रण से भी सम्बंधित होता है।
A.
सकल कार्यशील पूँजी।
B.
शुद्ध कार्यशील पूँजी।
C.
स्थायी पूँजी।
D.
परिचालन पूँजी।
शुद्ध कार्यशील पूँजी चालू सम्पत्तियों तथा चालू दायित्वों का अंतर होता है। चालू दायित्व चालू सम्पत्तियों का क्रय करने के लिए कोषों के स्त्रोत हैं।
A.
कार्यशील पूँजी के लिए।
B.
चालू पूँजी के लिए।
C.
स्थायी पूँजी के लिए।
D.
चालू सम्पत्तियों के लिए।
ये दीर्घकालीन वित्त के मुख्य स्त्रोत होते हैं। स्थायी सम्पत्तियाँ दीर्घकालीन प्रयोग में ली जाती हैं। यही कारण है कि ये दीर्घकालीन स्त्रोतों से प्राप्त होते हैं।
A.
विनियोग, विपणन तथा कार्मिकी क्षेत्र के।
B.
विपणन, कार्मिकी तथा वित्तीयन क्षेत्र के।
C.
विनियोग, वित्तीयन तथा लाभांश क्षेत्र के।
D.
विपणन लाभांश तथा विनियोग क्षेत्र के।
वित्तीय प्रबंधन में निर्णयन शामिल हैं, विनियोग, वित्तीयन तथा लाभांश क्षेत्र के।
A.
पूँजी बजटन तथा कार्यशील पूँजी निर्णयों से सम्बंधित।
B.
उत्पाद नियोजन।
C.
उत्पाद ढ़ाँचे की डिजाइन।
D.
विनियोगों का विक्रय।
विनियोग निर्णय पूँजी बजटन से सम्बंधित निर्णय होते हैं, जिसमें विनियोग के लिए सही सम्पत्ति का चयन शामिल होता है। कार्यशील पूँजी निर्णय चालू सम्पत्तियों से सम्बंधित होते हैं।
A.
अनुकूल वित्तीय उत्तोलन।
B.
प्रतिकूल वित्तीय उत्तोलन।
C.
समता पर व्यापार।
D.
पर्याप्त पूँजीगत ढ़ाँचा।
ऋण तथा समता का वह अनुपात जिसके परिणामस्वरूप समता अंशों के मूल्य में वृद्धि होती है जो कि एक पर्याप्त पूँजीगत ढ़ाँचा होता है। अन्य समता अंशधारियों तथा प्रति अंश अर्जन से सम्बंधित होते हैं।
मौसमी कार्यशील पूँजी की आवश्यकता वाले व्यवसायों के 2 उदाहरण हैं:
1. चीनी उद्योग
2. सूती कपड़ा/वस्त्र
3. ऊनी वस्त्र
4. पंखे
5. गेहूं से बने खाद्य उत्पादों
कार्यशील पूँजी की आवश्यकता है:
1. कच्चे माल
और परिचालन आपूर्ति की खरीद करने के लिए।
2. कर्मचारियों को मजदूरी और वेतन का भुगतान करने के लिए।
3. किराया, कर, ईंधन, विज्ञापन और अन्य प्रशासनिक लागत की तरह
प्रतिदिन के खर्चों को पूरा करने के लिए।
कार्यशील पूँजी के घटक हैं:
1. रोकड़
2. कच्चा माल
3. अर्धनिर्मित माल
4. तैयार माल
5. देनदार
वह कार्यशील पूँजी जो एक व्यापार की मौसमी या विशेष जरूरतों को पूरा करने के लिए
आवश्यक होती है अस्थाई कार्यशील पूँजी कहलाती है।
इसकी प्रकृति में
अस्थिर होती है। यह 2 प्रकार की होती है:
1. मौसमी कार्यशील पूँजी - यह मौसमी उत्पादों के साथ कारोबार के मामले में
एक विशेष सत्र के दौरान आवश्यक अतिरिक्त धन होता है।
2. विशेष कार्यशील पूँजी - यह धन मांग में अचानक उछाल, हड़ताल, प्राकृतिक आपदाओं आदि
के रूप
में भविष्य के आकस्मिक व्ययों को पूरा करने के लिए
आवश्यक होती है।
प्रारंभिक व्यय वे व्यय होते हैं जो एक कंपनी के गठन पर किए जाते हैं। प्रारंभिक जांच, कानूनी और तकनीकी सलाह, ड्राफ्िटंग और दस्तावेजों का मुद्रण, कानूनी फीस, प्रमोटरों को पारिश्रमिक, कार्यालय व्ययों आदि पर किये गये व्ययों को इस श्रेणी के अंतर्गत लिखा जाता है।
व्यापार की प्रकृति: वस्तुओं या सेवाओं को उपलब्ध कराने के व्यापार में
लगे व्यवसायों की तुलना में
निर्माण व्यवसायों को अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है क्योंकि उन्हें कच्चे माल
और तैयार माल
को बनाए रखने की आवश्यकता होती है।
व्यवसाय का आकार:
एक व्यवसाय के एक छोटे पैमाने पर उत्पादन या कम मूल्य के सामान के उत्पादन की तुलना में
बड़े पैमाने पर उत्पादन में
लगे हुए
व्यापार या उन के उत्पादन के लिए उच्च मूल्य के सामान या विभिन्न उत्पादों के निर्माण में
शामिल लोगों, बड़ा कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।
‘मताधिकार’ प्रबंधन के निर्णय लेने की प्रक्रिया में
भाग लेने के अधिकार को संदर्भित करता है।
जब मौजूदा प्रबंधन कंपनी पर अपने नियंत्रण को कमजोर नहीं करना चाहे, तो वह समता अंश
जारी करने के अलावा अन्य साधनों के द्वारा पूँजी जुटाने की कोशिश करेंगे।
वह या तो पूर्वाधिकार अंशों या ऋणपत्रों का निर्गमन करेंगे या बैंकों या वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेंगे क्योंकि इनके पास मतदान का अधिकार नहीं होता है।
स्थायी पूँजी वह पूँजी होती है जो एक व्यापार में
भूमि एवं
भवन, संयंत्र और मशीनरी, फर्नीचर और फिक्सचर, उपकरणों और वाहनों जैसी अचल संपत्तियों की खरीद के लिए आवश्यक होती है। इन परिसंपत्तियों इन सम्पत्तियाँ व्यापार के स्थायी संचालन में
उपयोग हेतु होती है।
इनकी प्रकृति दीर्घकालीन होती है तथा
इसलिए, इसके लिए धन दीर्घकालीन संसाधनों के माध्यम से लिया जाता है।
कार्यशील पूँजी अर्थात नकद,
कच्चा माल,
अर्धनिर्मित माल,
तैयार माल
और देनदारों जैसी एक व्यापार की चालू सम्पत्तियों में
निवेशित कोष। कार्यशील पूँजी ऐसा
तरल कोष
होता है जो एक व्यवसाय के प्रतिदिन के परिचालनों के लिए आवश्यक होता है। इनकी प्रकृति अल्पकालीन होती है तथा
इसलिए, इसके लिए धन अल्पकालीन संसाधनों के माध्यम से लिया जाता है।
वित्तीय प्रबंधन का प्राथमिक उद्देश्य अंशधारकों के धन को अधिकतम करना होता है।
एक कंपनी में
वित्तीय प्रबंधक मालिकों के लिए निर्णय करते हैं और यह निर्णय शेयरधारकों की दृष्टि से लाभकारी साबित होना चाहिए।
अंशधारकों को लाभ केवल तब लाभा होता है जब बाजार में
उनके अंशों का मूल्य अधिक हो, जिसके परिणामस्वरूप उनकी पूँजी में
बढ़ोतरी होती है।
अंशों का बाजार मूल्य निवेश निर्णय, वित्तपोषण निर्णय और लाभांश निर्णय जैसे निर्णयों से प्रभावित होता है।
वित्तीय प्रबंधन के अन्य उद्देश्यों में
शामिल हैं:
1. लाभ अधिकतमकरण।
2. धन का प्रभावी उपयोग।
3. तरलता का रखरखाव।
4. बैठक वित्तीय प्रतिबद्धता।
एक व्यापार द्वारा विभिन्न निवेश प्रस्तावों के लिए पूँजी या संसाधनों की खोज का निर्णय पहला और सबसे महत्वपूर्ण निर्णय होता है। इन निवेशों के लाभों को तुरंत प्राप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि भविष्य के लाभों का मूल्य ज्ञात नहीं होता है। इन निवेशों में जोखिम शामिल होता है। इसलिए, जोखिम कारक पर भी विचार किया जाता है। विभिन्न निवेश प्रस्तावों को उनमें शामिल उनके अपेक्षित लाभ तथा जोखिम के आधार पर मूल्यांकित किया जाता है। निवेश का फैसला दीर्घकालीन या अल्पकालीन हो सकता है। एक दीर्घकालिक निवेश के फैसले को पूँजी बजट निर्णयन और लघु अवधि के निवेश के फैसले को पूँजी निर्णयन भी कहा जाता है।
आनंद लिमिटेड के पास विशेष कार्यशील पूँजी होनी चाहिए। यह धन मांग में अचानक उछाल, हड़ताल, प्राकृतिक आपदाओं आदि
के रूप
में भविष्य के आकस्मिक व्ययों को पूरा करने के लिए
आवश्यक होती है।
व्यवसाय को ऐसी आकस्मिकताओं से निपटने के लिए अपनी नियमित कार्यशील पूँजी के अलावा कार्यशील पूँजी के एक संचय की स्थापना करनी चाहिए।
आनंद लिमिटेड अपनी उत्पादन सुविधा में
हड़ताल की अवधि के दौरान अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए
अतिरिक्त कार्यशील पूँजी की स्थापना करके अपनी तरलता पर दबाव से बच सकती है।
नहीं,
अशोक
सिंह
का दृष्टिकोण
सही नहीं है। एक व्यापार
को अपने सुलभ और कुशल संचालन
के लिए पर्याप्त
कार्यशील
पूँजी
की जरूरत
होती
है।
कार्यशील
पूँजी
एक महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाती
है। यह एक व्यवसाय
को निम्नलिखित
में सक्षम
बनाता
है:
1. देनदारियों
का समय पर भुगतान।
2. सुचारू
संचालन।
3. उच्च
ऋण पात्रता।
4. नकद छूट लाभ उठाने
के लिए।
5. व्यापार
के अवसरों
के लाभ उठाने
के लिए।
6. कर्मचारी
मनोबल
को बढ़ाने
के लिए।
एक व्यापार की पूँजी आवश्यकताएँ:
1. प्रारंभिक व्यय - प्रारंभिक जांच, कानूनी और तकनीकी फीस,
कार्यालय व्यय जैसे एक कंपनी के गठन पर हुए व्ययों को चुकाने के लिए।
2. कोषों की खरीद की लागत - जनता से धन की प्राप्ति पर खर्च उठाना। विज्ञापन, प्रविवरण के मुद्रण और प्रकाशन, अभिगोपन कमीशन, दलाली आदि
पर व्यय।
3. चालू संपत्तियाँ - एक व्यवसाय के प्रतिदिन के परिचालनों लिए
नकद, देनदार, कच्चे माल
के स्टॉक, निर्मित माल
की खरीद के लिए।
एक व्यवसाय के स्थाई पूँजी आवश्यकताओं को निर्धारित करने वाले कारक हैं:
1. व्यवसाय की प्रकृति - एक निर्माण व्यवसाय को एक व्यापार या एक सेवा प्रदान करने वाले कारोबार की तुलना में
स्थाई परिसंपत्तियों में
अधिक निवेश की आवश्यकता होती है।
2. उत्पादन की विधियाँ - पूँजी गहन
व्यापार को श्रम गहन
व्यापार की तुलना में
अचल पूँजी के अधिक निवेश की आवश्यकता होती है।
3. अचल संपत्तियों के अधिग्रहण की विधि - एक व्यवसाय जो संपत्ति प्राप्त करने के लिए
पट्टे की सुविधा का उपयोग करता है उसे
कम स्थाई पूँजी की आवश्यकता होती है।
4. प्रौद्योगिकी उन्नयन - ऐसा
उद्योग जिसमें परिसंपत्तियाँ तकनीकी उन्नयन के कारण तेजी से अप्रचलित हो जाती है उसमें अन्य व्यवसायों की तुलना में,
अपनी संपत्ति को बदलने के लिए अधिक अचल पूँजी की आवश्यकता होती है।
i ब्याज आवरण अनुपात (आई सी आर) - ब्याज आवरण अनुपात से तात्पर्य है कि कंपनी का ब्याज, तथा कर काटने से पूर्व लाभ की मात्रा ब्याज से कितने गुना अधि है। अर्थात ब्याज के आभार को भुगतान करने के लिए लाभ की मात्रा किनत गुणा अधिक है। इसकी गणना निम्न प्रकार से की जाती है।

ii. निवेश पर आय (आर. ओ. आई.) - यदि कंपनी की निवेश पर आय ऊँची दर की है तो प्रति अंश आय को बढ़ाने के लिए कंपनी समता पर व्यापार के उपयोग का चुनाव कर सकती है। अर्थात् इसकी ऋण उपयोग की योग्यता उच्च श्रेणी की है। हम प्रथम उदाहरण में पहले ही अवलोकन कर चुके हैं कि एक कंपनी, प्रति अंश आय में वृद्धि करने के लिए अधिक ऋणों का उपयोग कर सकती है। जबकि दूसरे उदाहरण में अधिक ऋणों का उपयोग प्रति अंश आय में कमी करता है। यह सब इसलिए कि कंपनी की निवेशों पर आय केवल 6.67 प्रतिशत है जो कि ऋणों की लागत से कम है। उदाहरण एक में निवेशों पर आय 13.3 प्रतिशत है तथा समता पर व्यापार लाभदायक है। इससे यह प्रकट होता है कि निवेशों पर आय कंपनी की समता पर व्यापार की योग्यता का एक महत्त्वपूर्ण निर्णायक है तथा इसी प्रकार पूँजी संरचना में उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।
वित्तीय नियोजन वित्त का अधिकतम उपयोग करने के लिए संस्था की वित्तीय आवश्यकताओं तथा उचित स्त्रोतों का पूर्वानुमान होता हैं।
वित्तीय नियोजन का महत्व:
1. यह इस पुर्वानुमान में सहायक होता है कि विभिन्न व्यावसायिक स्थितियों के तहत भविष्य में क्या हो सकता है।
2. यह स्पष्ट नीतियाँ तथा प्रक्रिया प्रदान करके विक्रय, उत्पादन तथा विपणन आदि जैसे विभिन्न व्यावसायिक कार्यों में समन्वय स्थापित करने में मदद करता है।
3. यह एक निरंतर आधार पर वित्तीय निर्णयों तथा विनियोगों में एक सम्बंध प्रदान करता है।
कार्यशील पूँजी की दो अवधारणाएँ सकल तथा शुद्ध होती है।
(1) सकल कार्यशील पूँजी:- यह गैर-चालू सम्पत्तियों जैसे रोकड़, स्कंध, देनदारों तथा पूर्वदत्त व्ययों में विनियोजित पूँजी को इंगित करता है। इसे कुल कार्यशील पूँजी भी कहा जाता है।
(2) शुद्ध कार्यशील पूँजी:- इसे चालू दायित्वों पर चालू सम्पत्तियों के आधिक्य के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। चालू दायित्व वे दायित्व होते हैं जिन्हें एक लेखांकन वर्ष में चुकाना होता है। इसमें लेनदारों, देय विपत्रों तथा बाह्य व्ययों के जैसे दावों को शामिल किया जाता है।
परिचालन चक्र कच्चे माल के क्रय से देनदारों से रोकड़ के संग्रहण के मध्य की समयावधी होती है।
एक व्यापार के सम्बंध में परिचालन चक्र माल की खरीद से शुरू होता है तथा विक्रय के पश्चात् देनदारों से रोकड़ की प्राप्ति पर समाप्त होता है।
एक निर्माणी कम्पनी के लिए यह चक्र कच्चे माल की खरीद से आरंभ होता है तथा अर्धनिर्मित माल या निर्मित माल का विक्रय (जिसके जरीये कम्पनी आय प्राप्ति करती है।) करने तक समाप्त होता है।
परिचालन चक्र एक व्यवसाय की कार्यशील पूँजी आवश्यकता का मापन करने में सहायता करता है।
परिचालन चक्र जितना लम्बा होता है कार्यशील पूँजी की आवश्यकता उतनी ही अधिक होती है।
अतः व्यापारिक कम्पनियों को कम कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है तथा निर्माणी कम्पनियों को अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।


वित्तीय निर्णय को प्रभावित करने वाले कारक - वित्तीय निर्णय विभिन्न कारकों से प्रभावित होते हैं उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं -
1. लागत - विभिन्न स्त्रोतों से वित्त प्राप्त करने की लागत भिन्न-भिन्न होती है। साधारणतया एक विवेकशील प्रबंधक उसी स्त्रोगत का चुनाव करता है जो सबसे सस्ता होता है।
2. प्रवर्तन लागत - जिस स्त्रोत की प्रवर्तन लागत अधिक होती है उसके प्रति आकर्षण कम होता है।
3. पूँजी बजार की स्थिति - पूँजी बाजार की दशा भी निधि स्त्रोता के विकल्प को प्रभावित करती है। जिस समय स्टॉक मार्केट में प्रतिभूतियों का मूल्य बढ़ रहा होता है, उस समय बहुत से लोग समता में निवेश के लिए तत्पर रहते हैं।
4. जोखिम - विभिन्न स्त्रोतों से सम्बन्धित जोखिमें भी भिन्न-भिन्न होती है।
A.
उत्पादन प्रक्रिया में बाधा।
B.
आदर्श कोष में।
C.
अतिरिक्त सम्पत्तियों के क्रय में।
D.
उधार निधियों के पूनर्भुगतान में।
इसका परिणाम ऐसे आदर्श कोषों में होगा, जिसे बाहर विनियोजित नहीं किया जा सका तथा जो उद्यम के लिए ब्याज प्राप्त करते है।
A.
व्यवसाय की प्रकृति।
B.
परिचालन क्षमता।
C.
परिचालन का पैमाना।
D.
तकनीकी की चयन।
ऐसे विभिन्न कारक होते हैं जो स्थायी पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करते हैं जैसे- व्यवसाय की प्रकृति, परिचालनों का पैमाना, विकास सम्भावना आदि। परिचालन क्षमता एक ऐसा कारक होता है जो संगठन की कार्यशील पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करता है।
A.
एक पूँजी बजट निर्णय।
B.
कार्यशील पूँजी निर्णय।
C.
लाभांश निर्णय।
D.
वित्तीय निर्णय।
एक दीर्घकालीन विनियोग निर्णय को पूँजी बजट निर्णय कहा जाता है। ये निर्णय दीर्घकाल में व्यवसाय के विकास, लाभप्रदता तथा जोखिम को प्रभावित करते हैं।
A.
तकनीकी उन्नयन।
B.
विनियोग सीमा।
C.
स्थायी समपत्तियों का क्रय।
D.
कार्यशील पूँजी आवर्ति।
कार्यशील पूँजी आवर्ति अर्थात कार्यशील पूँजी का वर्तन। कार्यशील पूँजी की आवर्ति उच्च, निम्न कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होगी।
A.
निम्न लाभांशों का।
B.
उच्च लाभांशों का।
C.
किसी प्रकार के लाभांशों का नहीं।
D.
प्रतिद्वंदियों की तुलना में उच्च लाभांशों का।
उच्च विकास वाली कम्पनियाँ कदाचित निम्न लाभांशों का भुगतान करती है, क्योंकि वे अपनी आयों को भविष्य में उपयोग के लिए रखते हैं। इसप्रकार, वे गैर-विकास वाली कम्पनियों की तुलना में कम लाभांश का भुगतान करती हैं।
A.
विनियोग निर्णय से।
B.
वित्तीयन से।
C.
लाभांश के भुगतान से।
D.
देनदारों के वित्तीय साख मूल्यांकन से।
वित्तीय निर्णयन देनदारों के वित्तीय साख मूल्यांकन से सम्बंधित नहीं होता है। देनदारों की वित्तीय साख मूल्यांकन से सम्बंधित निर्णय सामान्य क्रय तथा लेखांकन कार्य का एक भाग होता है।
A.
स्थायी सम्पत्तियों के क्रय में।
B.
व्यवसाय संचालन में।
C.
संगठन संरचना में।
D.
उद्यम के उद्देश्य परिभाषित करने में।
कार्यशील पूँजी व्यवसाय के दैनिक कार्य संचालन में प्रयोग होती है, जिसे व्यवसाय का संचालन भी कहा जा सकता है।
A.
ऐसी सभी मदों का पूर्वानुमान जो परिवर्तन से गुजरना होता है।
B.
कोषों के भण्डारण या उनके आधिक्यों जैसी उम्मीद।
C.
कोषों की आवश्यकता की उम्मीद।
D.
भविष्य के परिवर्तनों का पूर्वानुमान तथा कोषों की आवश्यकता की उम्मीद।
वित्तीय नियोजन का मुख्य उद्देश्य भविष्य के परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाना तथा कोषों की आवश्यकता की उम्मीद के लिए प्रबंधन को सक्षम बनाना होता है। वित्तीय नियोजन अर्थात कोषों की स्त्रोतों के साथ-साथ आवश्यकताओं का अग्रिम में निर्णयन।
A.
आयें।
B.
सम्पत्तियाँ।
C.
ख्याति।
D.
पूँजी बाज़ार की सम्पत्ति।
लाभांश चालू तथा विगत आयों में से चुकाये जाते हैं। यदि आय ज्यादा होती है तो कम्पनी लाभांश की उच्च दर की घोषणा करती है जबकि कम आयों की अवधि में लाभांश की दर भी कम होती है।
A.
समता पूँजी प्राप्त करने की लागत।
B.
वितरण के लिए रखा गया कर पश्चात् लाभ।
C.
समता पूँजी पर अपेक्षित प्रत्याय की दर।
D.
प्रति अंश अर्जन
समता की लागत अर्थात समता पूँजी पर अपेक्षित प्रत्याय की दर। यह अंशों पर लाभांश की दर होती है।
A.
ऋण ढाँचा।
B.
वित्तीय उत्तोलन।
C.
अंशधारियों का कोष।
D.
विनियोगों पर प्रत्याय।
वित्तीय उत्तोलन कुल पूँजी में ऋण के अनुपात को संदर्भित करता है। इसे समता पर ऋण के द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।
A.
निर्गमन कठिन होता है।
B.
निर्गमन आसान होता है।
C.
कम मूल्य पर बेचे जाते हैं।
D.
सेबी द्वारा इनका व्यापार बंद होता है।
यदि स्टॉक बाज़ार अनुकूल प्रवाह दिखाते हैं, तो इसका अर्थ तेजी होता है। तब समता अंशों का निर्गमन आसान होता है क्योंकि विनियोगकर्ता अपने विनियोगों में वृद्धि की आशा से विनियोग करने के लिए उत्सुक होते हैं।
A.
स्थायी पूँजी।
B.
अस्थायी पूँजी।
C.
कार्यशील पूँजी।
D.
अर्धअस्थायी पूँजी।
सभी आवर्ति व्ययों के लिए आवश्यक पूँजी को कार्यशील पूँजी कहा जाता है। यह चालू सम्पत्तियों तथा चालू दायित्वों का अंतर होता है। यह आवृति प्रकृति के सभी वित्तीय व्ययों का योग होता है।
वित्तीय प्रबंधन की मुख्य चिंता का विषय अधिकतम खरीद और संसाधनों का उपयोग है।
निवेश निर्णय, वित्तीय निर्णय और लाभांश निर्णय।
1. धन जुटाने की लागत;
2. रोकड़ प्रवाह स्थिति।
एक संयुक्त पूँजी कंपनी नीचे दिये गये
में से कोई भी 2 तरीकों के माध्यम से धन जुटा सकती हैं:
1. अंशों का निर्गमन - समता या पूर्वाधिकार।
2. ऋणपत्र जारी करना।
3. वाणिज्यिक बैंकों से उधार।
4. वित्तीय संस्थानों से उधार।
अचल संपत्तियों की कोई भी 2 श्रेणियाँ है:
1. भूमि एवं
भवन
2. कारखाना और मशीनरी
3. कार्यालय उपकरण
4. फर्नीचर तथा
फिक्सचर
5. मोटर वाहन
स्थायी कार्यशील पूँजी के प्रकार हैं:
1. आरंभिक कार्यशील पूँजी।
2. नियमित रूप
से कार्यशील पूँजी।
साझेदारी कोष
निम्न माध्यमों से प्राप्त किये जा सकते हैं:
1. साझेदारों द्वारा पूँजी में
ला कर।
2. वाणिज्यिक बैंकों से उधार।
3. वित्तीय संस्थानों से उधार।
एक ब्रांड नाम का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी उत्पादों से उत्पाद में भेद करना है ताकि उपभोक्ताओं को इसकी पहचान आसानी से हो सके। ब्रांड एक उत्पाद को एक नाम या एक प्रतिक देता है जिसके द्वारा इसे उपभोक्ताओं द्वारा जाना जाता है। इस तरह, ब्रांड नाम उत्पाद के लिए ग्राहकों को आकर्षित करता है। उदाहरण के लिए, नाइकी, लिवाइस आदि जैसे प्रसिद्ध ब्रांड नाम।
पैकेजिंग
अर्थात
उत्पाद के
लिए पैकेज
डिजाइन करना
और प्रदान
करना होता
है। एक पैकेज
उत्पाद को
सुरक्षित और
आकर्षक
बनाने के लिए
एक कंटेनर या
एक आवरण होता
है।
पैकेजिंग
महत्वपूर्ण
होती है
क्योंकि:
1. यह
उत्पाद को
टिकाऊ बनाता
है।
2. यह
उत्पाद के
उपयोग तथा
लाभों के
बारे में
जानकारी
प्रदान करता
है।
3. यह
आत्म
विज्ञापन के
रूप में
कार्य करता
है।
4. यह
माल की नष्ट
होने से
सुरक्षा
करता है।
5. यह
उत्पाद के
रखरखाव को
सुविधाजनक
बनाता है।

शशांक
द्वारा
प्रदर्शित
किये जाने
वाले एक विक्रेता
के गुण हैं:
1. मनोवैज्ञानिक
गुण - उसे
ग्राहकों की
आवश्यकताओं
को सम्भालते
समय
धैर्यवान, लचीला, बुद्धिमान
तथा विनम्र
होना चाहिए।
2. तकनीकी
गुण - उसे
उत्पाद,
ग्राहकों, कंपनी
और
प्रतियोगियों
के बारे में
पूरी जानकारी
होनी चाहिए।
3. सामाजिक
गुण - उसे
विभिन्न
प्रकार के
ग्राहको से
सौदा करते
हुए विनम्र, स्वयं
अनुशासित
तथा शिष्ट
होना चाहिए।
4. संचार
कौशल - उसे एक
विश्वास
वक्ता, एक
अच्छा
श्रोता और
ग्राहक के
विश्वास को जीतने
के लिए सक्षम
होना चाहिए।
समाज
के लिए
विक्रयकार्य
के लाभ हैं:
1. रोजगार
अवसर:
विक्रयकार्य
बेरोजगार
युवाओं को
अच्छी आय तथा
रोजगार के
अवसर प्रदान
करता है।
2. कैरियर
के अवसर: यह
उन्नति,
नौकरी
से संतुष्टि, नौकरी
की सुरक्षा
और
स्वतंत्रता, आदि के
लिए अधिक से
अधिक अवसर
प्रदान करता
है।
3. अर्थव्यवस्था
को बढ़ावा:
व्यक्तिगत
विक्रय खपत
को बढ़ाता है
जिससे
उत्पादन में
वृद्धि होती
है और इस
प्रकार
अर्थव्यवस्था
की स्थिति में
सुधार होता
है।
4. राष्ट्रीय
आय में
बढोतरी: विक्रयकार्य
व्यवसाय तथा
विक्रेता की
आय को बढ़ाता
है जिससे
उनके जीवन
स्तर में
बढ़ोतरी होती
है।
विक्रेता
के गुण हो
सकते हैं:
1. भौतिक
गुण -
विक्रेता
अच्छे
स्वास्थ्य
और आकर्षक
व्यक्तित्व
वाला होना
चाहिए। वह
अच्छी तरह से
तैयार और
हंसमुख होना
चाहिए।
2. सामाजिक
गुण -
विक्रेता को
विभिन्न
प्रकार के ग्राहकों
साथ सौदा
करने के लिए, सामाजिक, विनम्र, स्वयं
अनुशासित, शिष्ट
तथा
बहिर्मुखी
हो चाहिए।
3. मानसिक
गुण -
विक्रेता को
ग्राहकों को
उनकी आवश्यकताओं
के अनुसार
संभालने के
लिए
बुद्धिमान, लचीला, आत्म
विश्वासी, विनम्र, धैर्यवान
होना चाहिए।
4. व्यावसायिक
गुण - विक्रेता
को उत्साही, महत्वाकांक्षी
होने के
साथ-साथ
रचनात्मक क्षमता, नेतृत्व
के गुण वाला
होना चाहिए।
विक्रयकार्य
के उद्देश्य
हैं:
1. मांग
का निर्माण -
विक्रयकार्य
का मुख्य उद्देश्य
एक उत्पाद के
लिए मांग
निर्मित करना
होता है।
विक्रयकर्मी
ग्राहकों से
सीधे सम्पर्क
करता है तथा
उत्पाद को
क्रय करने के
लिए
उपभोक्ताओं
को प्रेरित
करते हैं।
2. आपत्तियों
को संभालना -
विक्रयकर्मी
ग्राहकों की
उत्पाद से
संबंधित
आपत्तियों
तथा शंकाओं
को संभालने
में मदद करते
हैं। इसका
उद्देश्य मौजूदा
ग्राहकों को
बनाये रखने
तथा नये
ग्राहक बनाने
के लिए
ग्राहकों की
शिकायतों को
सम्भालना
होता है।
3. छिपी
हुई इच्छाओं
की खोज -
विक्रयकार्य
विक्रय को
बढ़ाने के
लिए
ग्राहकों की
वरीयताओं
तथा इच्छाओं
को प्रभावी
मांग में
परिवर्तित
करता है। यह
उत्पाद और
इसकी उपयोगिता
को
प्रदर्शित
करके
संभावित
ग्राहकों के
साथ
व्यक्तिगत
संबंधों को
विकसित करता
है।
जब
माल के वितरण
के लिए
निर्माता एक
या एक से अधिक
मध्यस्थ को
शामिल करता
है तो इस
वितरण नेटवर्क
को ‘वितरण
की
अप्रत्यक्ष
श्रंखला’ कहा
जाता है।
वितरण
की दो
अप्रत्यक्ष
श्रंखला हैं:
1. निर्माता-खुदरा
व्यापारी-ग्राहक
(एक स्तर श्रंखला):
इस प्रकार के
वितरण में, फर्म
सीधे खुदरा
व्यापारी को
माल की
आपूर्ति देती
है तथा खुदरा
व्यापारी
सीधे माल को
ग्राहक को
बेचता है।
2. निर्माता-थोक
व्यापारी-खुदरा
व्यापारी-ग्राहक
(दो स्तर
श्रंखला): इस
प्रकार के
वितरण में, फर्म
द्वारा माल
के विक्रय
हेतु दो
मध्यस्थों
अर्थात थोक
विक्रेता
तथा खुदरा
विक्रेता को
लिया जाता
है। इन दो
मध्यस्थों
की मदद से
निर्माता एक
बड़ा बाज़ार
क्षेत्र कवर
करता है।
‘बाज़ारी
उत्पाद’
ऐसे
उपभोक्ता
उत्पाद होते
हैं जिसकी
खरीद में
क्रेता खरीद
करने से पहले
गुणवत्ता, शैली, मूल्य, उपयुक्तता, आदि की
तुलना करने
के लिए काफी
समय समर्पित
करते हैं।
बाज़ारी
उत्पाद की
विशेषताऐं
हैं:
1. ये
उत्पाद
प्रकृति में
टिकाऊ होते
हैं, अर्थात
इन्हें कई
तरीके से
इस्तेमाल
किया जाता
है।
2. इस
तरह के
उत्पादों का
इकाई मूल्य
अधिक होता है।
3. इस
तरह के
उत्पादों की
खरीद की
पूर्वनियोजित
होती है।
4. इस
तरह के
उत्पाद
खुदरा
विक्रेता
द्वारा बेचे
जाते हैं।
लेबलिंग
के कार्य
निम्नलिखित
हैं:
1. उत्पाद
का वर्णन - यह
उत्पाद की
विशेषताओं, इसके
उपयोग, उपयोग
में सावधानी
के साथ-साथ
इसके तत्वों
को भी
निर्दिष्ट
करता है।
2. वस्तु
की पहचान
करना - यह
उत्पाद या
ब्रांड की आसानी
से पहचान में
मदद करता है।
यह निर्माता का
नाम और पता, पैक
करते समय
शुद्ध वजन, निर्माण
तिथि, अधिकतम
खुदरा मूल्य
और बैच
संख्या आदि
के रूप में
जानकारी
प्रदान करता
है।
3. ग्रेडिंग
- यह उत्पाद की
गुणवत्ता या
विभिन्न विशेषताओं
को इंगित
करने के लिए
विक्रेताओं को
विभिन्न
श्रेणियाँ
देने की
सुविधा
प्रदान करता
है।
वितरण
के चैनलों के
कार्य
निम्नलिखित
हैं:
1. छंटनी
- प्रकृति, आकार या
गुणवत्ता के
आधार पर
समरूप
समूहों में
विभिन्न
स्रोतों से
प्राप्त माल
की छँटाई।
2. संचय
- आपूर्ति का
एक सतत
प्रवाह बनाए
रखने के लिए
बड़े समरूप
स्टाॅक में
माल का संचय।
3. आवंटन
- समरूप
स्टाॅक को
छोटे और
विपणन योग्य हिस्सों
में तोड़ना।
4. वर्गीकरण
- विभिन्न
स्रोतों से
माल की कई
किस्मों का
क्रय करना और
संयोजन में
उन्हें
बेचना।

सामाजिक विपणन अवधारणा आधुनिक विपणन अवधारणा का एक विस्तार है। सामाजिक विपणन अवधारणा फर्म और उसके ग्राहकों के हितों के साथ-साथ सामाजिक कल्याण पर जोर देती है। यह अवधारणा निर्णय लेने की प्रक्रिया में सामाजिक प्रभाव को शामिल करती है। इस अवधारणा के अनुसार, कंपनियों को समाज के कल्याण के साथ ही उपभोक्ता की संतुष्टि पर ध्यान देना चाहिए।

बिक्री
बढ़ाने के
लिए विपणक
द्वारा
प्रयुक्त
बिक्री
संवर्धन
तकनीकें हैं:
1. छूट:
यह एक विशेष
कीमत पर
उत्पाद के
बेचान को संदर्भित
करता है जो
समय की एक
सीमित अवधि
के लिए मूल
कीमत से भी कम
होता है। यह
प्रस्ताव आम
तौर पर
स्टाॅक या
अतिरिक्त
सकंध को खाली
करने के लिए
दिया जाता
है। उदाहरण
के लिए, एयर
कंडीशनर
निर्माता
दिसंबर के
महीने में एयर
कंडीशनर
बेचने के लिए 5000 रुपये
की छूट
प्रदान करता
है।
2. मात्रा
उपहार: यह एक
कम कीमत पर एक
विशेष पैकेज
में
अतिरिक्त
मात्रा की पेशकश
या अतिरिक्त
खरीद पर
मुफ्त कुछ
मात्रा की
पेशकश को
संदर्भित
करता है।
उदाहरण के
लिए, साबुन
पर प्रस्ताव ‘तीन के
साथ एक मुक्त
पाओ’।
मच्छरों
को मारने के
लिए एक नये
उपकरण के
विपणन के लिए
प्रयुक्त
किये जाने
वाले प्रचार
के साधन हैं:
1. विशेष
छूट: इसमें एक
विशेष अवधि
को शामिल
किया जाता है
जिसमें इस
अवधि के
दौरान की गई
खरीद पर
विशेष छूट
प्रदान की
जाती है। ये
प्रस्ताव
मच्छरों को
मारने के लिए
उपकरण की बड़ी
मात्रा में
खरीदने के
लिए खुदरा और
थोक विक्रेताओं
को
प्रोत्साहित
करने के लिए
तैयार किया
गया है।
विशेष छूट
खुदरा
विक्रेताओं
या थोक
व्यापारी के
संभावित लाभ
को बढ़ाती
है। कभी कभी
डीलरों अधिक
विक्रय के
लिए ग्राहकों
पर इन छूटों
को लागू करता
है।
2. भत्ता:
भत्ते कुछ
संबंध या
अन्य में
आपूर्तिकर्ता
की सहायता के
लिए खरीदार
की ओर से
समझौते के
रूप में आते
हैं। उदाहरण
के लिए, एक
भत्ता
मच्छरों को
मारने के लिए
नए उपकरण के
विशेष
प्रदर्शन
देने के लिए
फुटकर
विक्रेता को
दिया जा सकता
है। इस भत्ते
का प्रयोजन
विशेष
प्रदर्शन की
व्यवस्था
करने के लिए
फुटकर
विक्रेता की
भरपाई करना
होता है जो एक
प्रभावी
तरीके से उत्पाद
का विपणन
करने में
निर्माता की
मदद करेगा।
व्यक्तिगत
बिक्री एक
उत्पाद या
सेवा की बिक्री
के प्रयोजन
के लिए एक या
एक से अधिक
संभावित
खरीदारों के
साथ एक निजी
सम्प्रेषण
होता है।
व्यापार
संभावित
उपभोक्ताओं
से संपर्क
करने के लिए
और उत्पाद के
बारे में
जागरूकता
पैदा करने के
लिए
विक्रयकर्मियों
की नियुक्ति
करता है।
यह
विक्रय का एक
व्यक्तिगत
प्रारूप
होता है क्योंकि
इसमें
खरीदार और
विक्रेता के
बीच आमने-सामने
बातचीत
शामिल होती
है। यह उन
दोनों के बीच
संबंध को
विकसित करता
है।
व्यक्तिगत
विक्रय को
इसकी
विशेषताओं
के कारण सबसे
प्रभावी
उपकरण के रूप
में माना
जाता है जिन्हें
नीचे
सूचीबद्ध
किया गया है:
1. इसमें
व्यक्तिगत
संपर्क
शामिल होता
है इसलिए
इसमें
प्रतिक्रिया
तुरंत
प्राप्त हो
जाती है।
2. यह
काफी लचीला
होता है
क्योंकि
विक्रेता
ग्राहक के
स्तर के
अनुसार अपने
संचार को
समायोजित कर
सकते हैं।
3. यह
अधिक प्रेरक
होता है
क्योंकि
खरीदार उत्पाद
की उपयोगिता
के बारे में
आश्वस्त हो
सकते हैं।

हाँ, व्यक्तिगत
विक्रय एक
शक्तिशाली
संचार उपकरण
होता है जिसे
निम्न कारणों
से, प्रचारक
प्रयोजनों
के लिए एक
संगठन
द्वारा इस्तेमाल
किया जाता है:
1. प्रत्यक्ष
प्रतिक्रिया:
जैसा कि
इसमें आमने-सामने
सम्प्रेषण
होता है, तो
यह प्रभावी
ढंग से मांग
पैदा करने के
लिए, संभावित
ग्राहकों को
प्रभावित
करने में मदद करता
है।
2. लचीला:
विक्रयकार्य
अन्य प्रचार
साधनों की
तुलना में
अधिक लचीला
होता है और
व्यापारियों
को खरीद
स्थितियों
के अनुसार
उनके
प्रस्ताव को
अनुकूलित करने
में मदद करता
है।
3. प्रयासों
के नाश को कम
करना: यह
उत्पादन और
विपणन में
मितव्य्यता
लाने में
व्यापारियों
की मदद करता
है।
4. परिचय
चरण में
भूमिका: यह
उत्पादों के
गुणों को बताकर
ग्राहकों के
लिए नए
उत्पाद शुरू
करने में
मददगार होता
है।

| विग्रहाः |
| न आगतम्, अनागतम् ________ _______ |
| बहवः मत्स्याः यस्मिन् सः ________ ________ |
| सन्ध्यायाः समयः _________ __________ |
| प्रभातस्य समयः, तस्मिन् __________ _________ |
| मत्स्यानां संक्षयः, तम् ________ ___________ |
| कुलस्य क्षयः, तम् _________ ___________ |
| दैवेन रक्षितम् __________ ____________ |
| न अस्ति नाथः यस्य सः __________ ____________ |
| कृतः प्रयत्नः येन सः __________ ____________ |
| जलस्य आशयः तम् ___________ ____________ |
|
विग्रहाः |
समस्तपदानि |
समास-नाम |
|
न आगतम्, अनागतम् |
अनागतविधाता |
नञ् तत्पुरुषः |
|
बहवः मत्स्याः यस्मिन् सः |
बहुमत्स्यः |
बहुव्रीहिः |
|
सन्ध्यायाः समयः |
सन्ध्यासमयः |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
प्रभातस्य समयः |
प्रभातसमये |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
मत्स्यानां संक्षयः |
मत्स्यसंक्षयम् |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
कुलस्य क्षयः |
कुलक्षयम् |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
दैवेन रक्षितम् |
दैवरक्षितम् |
तृतीया तत्पुरुषः |
|
न अस्ति नाथः यस्य सः |
अनाथः |
बहुव्रीहिः |
|
कृतः प्रयत्नः येन सः |
कृतप्रयत्नः |
बहुव्रीहिः |
|
जलस्य आशयः तम् |
जलाशयम् |
षष्ठी तत्पुरुषः |
1. धवलाः
2. हिमालय:
3. छत्रवत्
4. बौद्धानाम्
5. श्वेतस्तूपः
6. सप्तसप्ततिः
7. पर्यटकानाम्
8. शीते
1. नीलवर्णा
2. गिरिभ्यः
3. प्रख्याताः
4. बौद्धमठेभ्यः
5. संग्रहालयाय
6. ग्रीष्मपर्वाणि
7. सामाजिकजीवनम्
8. इन्दुः
1. ‘उत्तुंगपर्वतानाम् उपत्यकाभूमिः’ इत्येव अर्थः अस्ति।
2. उच्चपर्वतानाम् उपत्यकायाः भूमिः लद्दाखः इति उच्यते।
3. लद्दाख प्रदेशे आस्तृतः नीलाकाशः छत्रवत् प्रतीयते।
4. श्वेतस्तूपः भव्यम् प्रकाशम् वितरति शान्तिम् च सन्दिशति।
5. सिन्धुनद्याः पूर्वतः प्रख्याताः बौद्धमठाः इमे सन्ति-शे धिक्शे, हेमिस, स्तावना, माठो इति।
6. राजप्रसादस्य आन्तरिके भागे एकः विशालः स्टाकपैलेस-संग्रहालयः अस्ति।
7. बौद्धानां ग्रीष्मपर्वाणि भगवन्तं बुद्धं प्रति भक्तिभावं दर्शयन्ति।
8. हिमं हिमालयस्य सौभाग्यं न विलुम्पति।
| विग्रहाः | |
| 1. स्थानम् अनतिक्रम्य | |
| 2. उपत्यकायाः भूमिः | |
| 3. नीलः आकाशः | |
| 4. नीलः वर्णः यस्याः सा | |
| 5. श्वेतः स्तूपः | |
| 6. बौद्धानां मठाः | |
| 7. विशालः कायः यस्या: सा | |
| 8. आकर्षणस्य केन्द्रम् | |
| 9. लद्दाखे स्थितः | |
| 10. महान् चासौ कविः |
|
विग्रहाः |
समस्तपदानि |
|
1. स्थानम् अनतिक्रम्य |
यथास्थानम् |
|
2. उपत्यकायाः भूमिः |
उपत्यकाभूमिम् |
|
3. नीलः आकाशः |
नीलाकाशः |
|
4. नीलः वर्णः यस्याः सा |
नीलवर्णा |
|
5. श्वेतः स्तूपः |
श्वेतस्तूपः |
|
6. बौद्धानां मठाः |
बौद्धमठाः |
|
7. विशालः कायः यस्या: सा |
विशालकाया |
|
8. आकर्षणस्य केन्द्रम् |
आकर्षणकेन्द्रम् |
|
9. लद्दाखे स्थितः |
लद्दाखस्थित: |
|
10. महान् चासौ कविः |
महाकविः |
1. सदयम्
2. परोपकरणम्
3. कनकम् / पुरुषः
4. चतुर्भिः
5. मूढ़धियः
6. रतिम्
7. सद्विद्या
8. सत्यम्
1.वाचः इति विशेष्यम्।
2. सुबद्धमूलाः इति विशेषणम्।
3. पादपाः इति कर्तृपदम्।
4. कनकम्।
5. त्यागेन।
6. मूढ़धियः।
7. किंसखायै (कुमन्त्रिणे)।
8. 'सौजन्यम्' इति पदम्।
1. येषां वदनं प्रसादसदनम् हृदयं सदयम् वाचः सुधामुचः, करणं परोपकरणम् ते खलु जनैः वन्दनीयाः।
2. सदैव हुतं च दत्तं च तिष्ठति।
3. कनकं निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः चतुर्भिः परीक्ष्यते|
4. निशिताः इषवः (बाणाः) कवचादिभिः अनावृतशरीरेषु प्रविश्य मारयन्ति।
5. शठाः सरलस्वभावान् वञ्चयित्वा घ्नन्ति विनाशयन्ति वा।
6. सर्वसम्पदः सदानुकूलेषु अमात्येषु नृपेषु च रतिम् कुर्वन्ति।
7. यः अधिपम् साधु न शास्ति स किंसखा|
8. यः हितान् न संश्रृणुते स किंप्रभुः|
| 1. लोभः+ चेत् | लोभश्चेत् | श् |
| 2. सत् + विद्या | ............ | ............ |
| 3. इव + इषवः | ............ | ............ |
| 4. किम् + प्रभुः | ............ | ............ |
| 5. सदा + अनुकलेषु | ............ | ............ |
| 6. यदि + अस्ति | ............ | ............ |
| 7. धनैः + अपयशः | ............ | ............ |
| 8. सम् + श्रृणुते | ............ | ............ |
| 9. शठाः + तथाविधान् | ............ | ............ |
| 10. नृपेषु + अमात्येषु | ............ | ............ |
| 1. लोभः+ चेत् | लोभश्चेत्ः | : - श् | |||
| 2. सत् + विद्या | सद्विद्या | त् – द् | |||
| 3. इव + इषवः | इवेषवः | अ +इ = ए | |||
| 4. किम् + प्रभुः | किंप्रभुः | म– ं | |||
| 5. सदा + अनुकलेषु | सदानुकूलेषु | आ+अ=आ | |||
| 6. यदि + अस्ति | यद्यस्ति | इ-य् | |||
| 7. धनैः + अपयशः | धनैरपयशः | विसर्ग: - र् | |||
| 8. सम् + श्रृणुते | संशृणुते | म् - ं | |||
| 9. शठाः + तथाविधान् | शठास्तथाविधान् | ः - स् | |||
| 10. नृपेषु + अमात्येषु | नृपेष्वमात्येषु | उ – व् |
1. सूत्रधारः
2. सूत्रधारम्
3. कार्यान्तरे
4. चारुदत्तस्य
5. सुखम्
6. दीपदर्शनम्
7. स्फीताः (विशालाः, बहुलाः)
8. समदुःखसुखः
1. दरिद्रम्।
2. सम्पन्नम्।
3. बहुलपक्षस्य इति पदम्।
4. विपन्नम्।
5. माम् (चारुदत्तम्)।
6. नष्टः।
7. आपदः।
8. चारुदत्ताय।
1. गेहनिष्क्रान्तस्य सूत्रधारस्य अक्षिणी पुष्करपत्रपतितजलबिन्दु इव चञ्चालयते।
2. आः अनार्ये। मम इव तत्र अपि अभिलाषः भग्नः भवेत्।
3. नटी कथयति-त्रस्तः मा भव। धैर्यं न त्यज। क्षणम् प्रतीक्षताम् भवान्। सर्वम् सज्जम् भविष्यति।
4. मैत्रेयः चारुदत्तस्य दरिद्रता-कारणेन परेषाम् आमन्त्रकानि स्वीकरोति।
5. पूर्वम् मैत्रेयः चारुदत्तस्य गृहे अहोरात्रम् आकण्ठम् भुक्त्वा वसान् अनयत्।
6. चारुदत्तस्य दरिद्रभावः दानेन विपन्न विभवस्य बहुल पक्ष चन्द्रस्य-ज्योत्सना इव रमणीयाः वर्णितः।
7. चारुदत्तस्य कथनानुसारम् एतादृशपुरुषस्य दशा मरणमिव प्रतीयते।
8. यत् पापमयं कर्म परैः अपि कृतम् तत् दरिद्रस्य सम्भाव्यते।
| (विग्रहाः) | (समस्तपदानि) | (समास नाम) |
| 1. पुष्करस्य पत्रम् | पुष्करपत्रम् | षष्ठी तत्पुरुषः |
| 2. आर्यः चासौ मैत्रेयः | ............ | ............ |
| 3. अहः च रात्रिः च एतयोः समाहारः | ............ | ............ |
| 4. विभवम् अनतिक्रम्य | ............ | ............ |
| 5. गृहस्य दैवतानि | ............ | ............ |
| 6. उच्छ्वासेन सह विद्यमानम् | ............ | ............ |
| 7. विपन्नः विभवः यस्य तस्य | ............ | ............ |
| 8. बहुलपक्षस्य चन्द्रः, तस्य | ............ | ............ |
| 9. दीपस्य दर्शनम् | ............ | ............ |
| 10. नष्टे धनश्रियौ यस्य तस्य | ............ | ............ |
|
(विग्रहाः) |
(समस्तपदानि) |
(समास नाम) |
|
1. पुष्करस्य पत्रम् |
पुश्करपत्रम् |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
2. आर्यः चासौ मैत्रेयः |
आर्यमैत्रेयः |
कर्मधारयः |
|
3. अहः च रात्रिः च एतयोः समाहारः |
अहोरात्रम् |
द्वन्द्वः |
|
4. विभवम् अनतिक्रम्य |
यथाविभवम् |
अव्ययीभावः |
|
5. गृहस्य दैवतानि |
गृहदैवतानि |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
सोच्छ्रवासम् |
बहुव्रीहिः |
|
|
7. विपन्नः विभवः यस्य तस्य |
विपन्नविभवस्य |
बहुव्रीहि |
|
8. बहुलपक्षस्य चन्द्रः, तस्य |
बहुलपक्षचन्द्रस्य |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
9. दीपस्य दर्शनम् |
दीपदर्शनम् |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
10. नष्टे धनश्रियौ यस्यतस्य |
नष्टधनश्रियः |
बहुव्रीहिः |
1. सचिवः
2. अभिनवः
3. विमानशास्त्रे
4. विमानशास्त्रे
5. सुश्रुतसंहितायाम्
6. प्रशंसनीया
7. तालिकावादनेन सह
8. नागार्जुनः
1. आकाशे
2. अदृश्यताम्
3. लेपाय
4. भगवतः
5. विषयाः
6. वैज्ञानिकः
7. स्वर्णम्
8. नागार्जुनाय
1. त्रिपुरविमानस्य प्रथमः भागः पृथ्वीतले, द्वितीय भागः जलस्य अन्तः बहिः, तृतीय भागः च अन्तरिक्षे सञ्चरति।
2. अस्य तृतीय भागः अन्तरिक्षे सञ्चरति।
3. विमानशास्त्रे एतादृशः लेपः वर्णितः यस्य प्रयोगेण विमानम् अदृश्यम् भवति।
4. छेद्यम्, भेद्यम, लेख्यम्, वेध्यम्, एष्यम्, आहार्यम्, विस्राव्यम् सीव्यम् च।
5. वृक्षस्य दक्षिणदिशि पुरुषद्वये स्वादु जलं भविष्यति इति ज्ञायते।
6. संगणकस्य कृते एकं शून्यञ्च द्वे एव संख्ये महत्वपूर्णे।
7. अशुद्धं स्वर्णं चतुर्गुणेन सीसेन शोधनीयम्।
8. तापेन रसायनक्रिया सम्भवति।
|
समस्तपदानि |
विग्रहाः |
समास-नाम |
|
विज्ञानजगत् |
विज्ञानस्य जगत् |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
भागत्रयम् |
भागानाम् त्रयम् |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
यथाक्रमम् |
क्रमम् अनतिक्रम्य |
अव्ययीभावः |
|
नासिकाप्रत्यारोपणम् |
नासिकायाः प्रत्यारोपणम् |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
त्वक्-प्रत्यारोपणम् |
त्वचः प्रत्यारोपणम् |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
दक्षिणपार्श्वे |
दक्षिणस्य पार्श्वे |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
तालिकावादनेन |
तालिकानां वादनम् तेन |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
समयाभावात् |
समयस्य अभावः, तस्मात् |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
दिल्लीस्थः |
दिल्ल्याम् तिष्ठति इति |
उपपद तत्पुरुषः |
|
भारतीयवैज्ञानिकानाम् |
भारतीयाः वैज्ञानिकाः तेषाम् |
कर्मधारयः |
|
गौरवगाथाम् |
गौरवस्य गाथा |
षष्ठी तत्पुरुषः |
|
प्रार्थनासभायाम् |
प्रार्थनायै सभा, तस्याम् |
चतुर्थी तत्पुरुषः |
रेखिय संवेग संरक्षण के नियम के अनुसार, बाह्य बल की अनुपस्थिति में, एक निकाय की रेखिय संवेग संरक्षित रहती है तथा
कोणीय संवेग संरक्षण के नियम के अनुसार, यदि निकाय पर आरोपित कुल बाह्य बलाघूर्ण शून्य है, तो उस निकाय की कोणीय संवेग, संरक्षित होता है|
रेखीय संवेग तथा कोणीय संवेग दोनों सदिश राशि है|
ऊर्जा एक संरक्षित अदिश राशि है। जबकि किसी वियुक्त निकाय का कुल रैखिक संवेग एवं कुल कोणीय संवेग संरक्षित राशियाँ हैं तथा दोनों सदिश हैं।
तीन क्वार्क से मिलकर प्रोटॉन और न्यूट्रॉन बनाते है|
नाभिक में प्रबल नाभिकीय बल प्रोटोनों तथा न्यूट्रोनों को बांधे रखता है यह आवेश के प्रकार पर निर्भर नहीं करता तथा प्रोटॉन-प्रोटॉन के बीच, न्युट्रान-न्युट्रान के बीच, तथा प्रोटॉन-न्युट्रान के बीच समान रूप से कार्य करता है।
बादलों के टकराव के दौरान वातावरण में परमाणु आयनीकृत होते हैं जो आवेशित कणों को उत्पन्न करते हैं, जोकि तड़ित के लिए उत्तरदायी होते हैं।
द्रव्य अधिकांशतः विद्युत उदासीन (नेट आवेश शून्य होता है) होता है| इस प्रकार वैद्युत बल अधिकांश रूप में शून्य होता है| अन्य दो बल, अर्थात दुर्बल बल तथा नाभिकीय बल, केवल नाभिकीय पैमाने पर सक्रिय होते हैं|
चूँकि पृथ्वी का द्रव्यमान चंद्रमा से बहुत अधिक है, इसलिए इसका गुरुत्वाकर्षण बल भी चंद्रमा से अधिक अधिक है।
B. चुम्बकीय प्रभाव तथा विद्युत क्षेत्र गतिशीत आवेशों पर बल आरोपित करता है। C. विद्युत प्रभाव तथा चुम्बकीय क्षेत्र गतिशीत आवेशों पर बल आरोपित करता है। D. चुम्बकीय प्रभाव तथा चुम्बकीय क्षेत्र गतिशीत आवेशों पर बल आरोपित करता है। व्यापक रूप से, वैद्युत तथा चुम्बकीय प्रभाव अविच्छेद्य हैं – इसलिए इस बल को विद्युत-चुम्बकीय बल कहते हैं।
गुरुत्वाकर्षण बल किन्ही दो पिंडों के बीच उनके द्रव्यमानों के कारण लगने वाला आकर्षण बल है| यह एक सार्वत्रिक बल है|
A. कुल ऊर्जा तथा किसी वियुक्त निकाय का कुल रैखिक संवेगSOLUTION
Right Answer is: A
SOLUTION
A. क्वार्क कहते हैंSOLUTION
A. केवल प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन के बीच उपस्थित हैSOLUTION
Right Answer is: B
SOLUTION
A. गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभुत्व रहता हैSOLUTION
A. तथा विद्युत चुम्बकीय बल काफी लम्बी दूरी तक कार्य नहीं करते हैंSOLUTION
A. विद्युत प्रभाव तथा विद्युत क्षेत्र गतिशीत आवेशों पर बल आरोपित करता है।SOLUTION
A. वस्तुओं के द्रव्यमान के कारण उपस्थित हैSOLUTION