A. जे.जे. थॉमसन ने
B. इ. गोल्डस्टीन ने
C. चैडविक ने
D. पाउली ने
चैडविक ने (1932) में बेरीलियम की पतली शीट पर अल्फा-कणों से प्रहार किया। इससे विद्युत् उदासीन कण निगर्मित हुए, जिसका द्रव्यमान प्रोटॉन से थोड़ा सा ही अधिक था।
A. इ. गोल्डस्टीन ने
B. जे.जे. थॉमसन ने
C. मिलिकन ने
D. चैडविक ने
जे. जे. थॉमसन ने इलेक्ट्रॉन की खोज विसर्जन नलिका प्रयोग के दौरान की थी। मिलिकन ने इलेक्ट्रॉन का आवेश निर्धारित किया था।
A. पाउली के नियम से
B. हुंड के नियम से
C. अनिश्चता सिद्धांत से
D. ऑफबाऊ के नियम से
फॉस्फोरस, का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न है P (Z=15) = [Ne]3s23px13py13pz1 इसे हुंड के नियम द्वारा समझाया जा सकता है जिसके अनुसार एक ही उपकोश के कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन तब तक नहीं होता है, जब तक उस उपकोश के सभी कक्षकों में एक-एक इलेक्ट्रॉन न आ जाये।
A. द्रव्यमान संख्या समान होती है।
B. परमाणु संख्या समान होती है।
C. प्रोटॉनों की संख्या समान होती है।
D. इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है।
विभिन्न तत्वों के परमाणु जिनकी द्रव्यमान संख्याएँ समान होती हैं परंतु परमाणु संख्याएँ अलग-अलग होती हैं, समभारिक कहलाते हैं।
A. इलेक्ट्रॉन प्रचक्रण क्वांटम संख्या द्वारा
B. दिगंशीय क्वांटम संख्या द्वारा
C. मुख्य क्वांटम संख्या द्वारा
D. चुम्बकीय क्वान्टम संख्या
परमाणु कक्षक का अभिविन्यास चुंबकीय क्वांटम संख्या द्वारा नियंत्रित होता है जिसको m द्वारा दर्शाया जाता है। चुंबकीय क्वांटम संख्या उपकोश के अंदर के ऊर्जा स्तर के बारे में बताती है।
A. जिनके परमाणु द्रव्यमान समान होते हैं ।
B. जिनकी परमाणु संख्या समान होती है ।
C. जिनमें न्यूट्रॉनों की संख्या समान होती है।
D. जिनकी द्रव्यमान संख्या संख्या सामान होती है ।
सस्थानिक एक ही तत्व के परमाणु होते हैं जिनकी परमाणु संख्या तो समान होती हैं, परंतु द्रव्यमान संख्या अलग-अलग होती हैं।
A. मुख्य क्वांटम संख्या द्वारा
B. दिगंशीय क्वांटम संख्या द्वारा
C. चुंबकीय क्वांटम संख्या द्वारा
D. प्रचक्रण क्वांटम संख्या द्वारा
प्रचक्रण क्वांटम संख्या इलेक्ट्रॉन के प्रचक्रण अभिविन्यास को स्पष्ट करती है।
A. हाइड्रोजन
B. कार्बन
C. हीलियम
D. नियॉन
हाइड्रोजन के परमाणु में न्यूट्रॉन नहीं होते हैं, इसमें केवल एक इलेक्ट्रॉन और एक प्रोटॉन होता है।
A. विद्युत् चुंबकीय विकिरण
B. दिखाई देने वाली तरंग
C. तरंग संख्या
D. विद्युत्-चुंबकीय स्पेक्ट्रम
प्रति इकाई लंबाई में, तरंगदैर्ध्य की संख्या को तरंग-संख्या कहते हैं। इसका मात्रक तरंगदैर्ध्य के मात्रक का व्युत्क्रम अर्थात्, m-1 होता है|
A. प्रोटॉन पुंज होती हैं।
B. चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा विक्षेपित हो सकती हैं।
C. दृश्य होती हैं।
D. कैथोड किरण नलिका में उपस्थित गैस की प्रकृति पर निर्भर करती है।
ये किरणें स्वयं दिखाई नहीं देतीं, परंतु इनके व्यवहार को कुछ निश्चित प्रकार के पदार्थों (स्फुरदीप्त तथा प्रतिदीप्त) की उपस्थिति में देखा जा सकता है। ये पदार्थ इनसे टकरा कर चमकते हैं। टेलीवीजन चित्र नलिका, कैथोड किरण नलिका होती है। टी.वी. पर्दा, जो स्फुरदीप्त एवं प्रतिदीप्त पदार्थों से लेपित होता है, पर चित्र प्रतिदीप्त होते हैं।
A. 40 प्रोटॉन और 20 इलेक्ट्रॉन
B. 20 प्रोटॉन और 40 इलेक्ट्रॉन
C. 20 प्रोटॉन और 20 न्यूट्रॉन
D. 20 प्रोटॉन और 40 न्यूट्रॉन
परमाणु द्रवयमान (A) = 40, परमाणु क्रमांक/संख्या (Z) = 20, n= A – Z = 40 – 20 = 20
A. इलेक्ट्रॉन से अधिक
B. इलेक्ट्रॉन से कम
C. न्यूट्रॉन से अधिक
D. यह भेदन नहीं कर सकता है
प्रोटॉन की भेदन शक्ति इलेक्ट्रॉन से कम होती है, क्योंकि प्रोटॉन इलेक्ट्रॉन से भारी होता है, इसलिए इसका वेग इलेक्ट्रॉन से कम होता है।
A. इलेक्ट्रॉन संख्या पर
B. न्यूट्रॉन की संख्या पर
C. संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर
D. नाभिकीय आवेश पर
नाभिकीय आवेश बढ़ने पर, इलेक्ट्रॉन लब्धि एंथैल्पी अत्यधिक ऋणात्मक हो जाती है।
(i) 103-लॉरेनशियम
(ii) 110-डर्मस्टेटियम
Ar, K+ , Cl– और S2–
इलेक्ट्रॉन-बंधुता आने वाले इलेक्ट्रॉन और नाभिक के मध्य का आकर्षण की माप है। इसलिए, विद्युत्-ऋणात्मक परमाणुओं में एक इलेक्ट्रॉन संयोजित करते समय, ऊर्जा मुक्त होती है और विद्युत्-ऋणात्मकता का मान हमेशा ऋणात्मक होता है। परंतु, पहले से ही ऋणात्मक आयन में एक इलेक्ट्रॉन संयोजित करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, अतः, द्वितीय इलेक्ट्रॉन-बंधुता का मान धनात्मक होता है।
(i) सहसंयोजक त्रिज्या– यह एकल सहसंयोजी आबंध से आबंधित दो परमाणुओं के मध्य की दूरी का आधा होती है।
(ii) वांडरवाल त्रिज्या– यह दो निकटस्थ अनाबंधित परमाणुओं के मध्य की दूरी का आधा होती है।
(iii) धात्विक त्रिज्या - यह धात्विक क्रिस्टल में स्थित धातु कोरों की अंतरा नाभिकीय दूरी का आधा होता है।

धनायन ऋणायन से छोटे होते हैं। समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज में से, अधिक धनावेशित स्पीशीज का आकार छोटा होगा। अतः, इनके आकार का घटता क्रम निम्न होगा-
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N (7) 1s2,2s2,2p3
O (8) 1s2,2s2,2p4
आयनन ऊर्जा विलगित गैसीय परमाणु से सर्वाधिक शिथिलता से बंधे इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा की मात्रा होती है। आवर्त में बाएं से दाएं जाने पर इसका मान बढ़ता है। नाइट्रोजन के संयोजी कोश में p-कक्षक अर्धपूरित होता है अतएव ये अधिक स्थायी होता है। ऑक्सीजन के p-कक्षक में ऐसा नहीं होता है। अतः नाइट्रोजन (N) की प्रथम आयनन ऊर्जा ऑक्सीजन (O) की प्रथम आयनन ऊर्जा की तुलना में अधिक होती है।
तत्व A की परमाणु संख्या 13 है, अतः इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
1s2,2s 2,2p6,3s 2,3p1 होगा।
यह तीसरे आवर्त, p-ब्लॉक और तेरहवें वर्ग का तत्व है।
तत्व B की परमाणु संख्या 27 है, अतः इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
1s2, 2s 2, 2p6, 3s 2, 3p6,4s 2,3d7 होगा।
यह चौथे आवर्त, d-ब्लॉक और नौवें वर्ग का तत्व है।
d-ब्लॉक के तत्व को संक्रमण तत्व कहलाते हैं। अतः तत्व B जो d-ब्लॉक का सदस्य है संक्रमण तत्व है।
विद्युत् ऋणात्मकता परमाणु के रासायनिक यौगिक में सहसंयोजक आबंध के इलेक्ट्रॉन युग्म को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता की गुणात्मक माप होती है। आवर्त में परमाणु का आकार घटने पर विद्युत् ऋणात्मकता बढ़ती है। फ्लुओरीन की विद्युत् ऋणात्मकता पॉलिंग पैमाने पर सर्वाधिक है।
(क) परमाणु संख्या 23 वाले तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है:
1s2,2s2,2p6,3s2,3p6,4s2,3d3
अतः यह चौथे आवर्त और पाँचवें वर्ग का तत्व है।
(ख) परमाणु संख्या 35 वाले तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है:
1s2,2s2,2p6,3s2,3p6,4s2,3d10,4p5
अतः यह चौथे आवर्त और सत्रहवें वर्ग का तत्व है।
(ग) परमाणु संख्या 55 वाले तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है: 1s2,2s2,2p6,3s2,3p6,4s2,3d10,4p6,5 s2,4d10,5p6,6s1
अतः यह छठे आवर्त और प्रथम वर्ग का तत्व है।
(i) परमाणु त्रिज्या B से Tl की ओर बढ़ती है। Ga परमाणु की परमाणु त्रिज्या में अचानक कमी का कारण इसके d-कक्षक में इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति है जो d-कक्षक के बड़े आकार और d-कक्षक के कम स्क्रीनिंग प्रभाव के कारण नाभिक को कम प्रभावित करता है।
(ii) इलेक्ट्रॉनग्राही लूइस अम्ल की तरह कार्य करते हैं। चूँकि BF3 में B के संयोजी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं, अतः यह 2 इलेक्ट्रॉन और ग्रहण कर सकता है और लूइस अम्ल की तरह कार्य करता है।
(iii) CCl4 के संयोजी कोश पूर्णपूरित होते हैं और इसलिए यह एकाकी युगल इलेक्ट्रॉन ग्रहण नहीं कर सकता है। अतः CCl4 का जल-अपघटन नहीं होता है।
(iv) Pb2+ अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण Pb4+ से अधिक स्थायी होता है। अतः, PbCl2, Cl2 से अभिक्रिया नहीं करता है एवं PbCl4 नहीं बनाता है।
(v) कार्बन मोनोऑक्साइड ऑक्सीजन से संयुक्त होकर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है। यह अभिक्रिया अनुत्क्रमणीय होती है और कार्बोक्सीहामोग्लोबिन, ऑक्सीहोमोग्लोबिन संकुल से लगभग 300 गुना अधिक स्थायी होता है। फलतः हीमोग्लोबिन नष्ट हो जाता है और घुटन होने लगती है।
A. SF6
B. LiCl
C. BCl3
D. CO2
SF6 की संरचना निम्न है:

A. NH3
B. PCl5
C. BeCl2
D. H2O
ऐसे यौगिक जिनमें केंद्रीय परमाणु के संयोजकता कोश में 8 से कम इलेक्ट्रॉन होते हैं, उन्हें इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक कहते हैं। BeCl2 में, Be के संयोजकता कोश में 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं और यह Cl के साथ 2 इलेक्ट्रॉन का साझा करता है। अतः, इसके संयोजकता कोश में केवल 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं और इसे अपने संयोजकता कोश को पूरा करने के लिए 4 और इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होती है।
A. sp संकरित
B. sp2 संकरित
C. sp3 संकरित
D. sp3d संकरित
हीरे में, प्रत्येक कार्बन परमाणु चार अन्य कार्बन परमाणुओं से एकल आबंध द्वारा जुड़ा होता है। अतः, प्रत्येक कार्बन परमाणु sp3 संकरित होता है
A. यह यौगिकों के ऊष्मागतिक और गतिक स्थायित्व की मात्रात्मक व्याख्या करता है।
B. यह चुम्बकीय गुणों की मात्रात्मक व्याख्या करता है।
C. इसमें अभिगृहीत नहीं होते हैं।
D. यह प्रबल और दुर्बल लिगन्डों के मध्य अंतर नहीं बताता है।
संयोजकता आबंध सिद्धांत न ही यौगिकों के ऊष्मागतिक और गतिज स्थायित्व की मात्रात्मक व्याख्या करता है और न चुंबकीय गुणों की। यह कुछ अभिगृहितों पर आधारित है।
A. ऐथेन में
B. एथीन में
C. एथाइन में
D. बेंज़ीन में
आबंध लंबाई का क्रम निम्न होता है एकल आबंध > द्विआबंध > त्रिआबंध ऐथेन, एथीन तथा एथाइन में दो कार्बन परमाणु क्रमशः एकल आबंध, द्विआबंध और त्रिआबंध से जुड़े होते हैं। अतः, सबसे अधिक कार्बन–कार्बन आबंध लंबाई एथेन में होगी।
A. अमोनिया में
B. डाइएथिल ईथर में
C. एथेनॉल में
D. ऐसीटिक अम्ल में
हाइड्रोजन आबंध उन अणुओं में बनते हैं जिनमें हाइड्रोजन O, N या F से जुड़ा होता हैं। डाइएथिल ईथर (CH3-O-CH3) में ऑक्सीजन परमाणु कार्बन परमाणुओं से बंधे होते हैं और O-H आबंध नहीं पाया जाता है। अतः डाइएथिल ईथर में हाइड्रोजन आबन्ध अनुपस्थित होते हैं।
A. BCl3
B. SF6
C. PF5
D. ClF3
BCl3 में, केंद्रीय परमाणु बोरॉन sp2 संकरित होता है। अतः इसकी आकृति त्रिकोणीय समतल होती है।
A. H और Cl के मध्य
B. Ca और Cl के मध्य
C. Cs और Cl के मध्य
D. Al और Cl के मध्य
तत्वों की विद्युतऋणात्मकता में अंतर जितना अधिक होगा,आयनिक गुण उतना ही अधिक होगा। Cs और Cl के मध्य विद्युतऋणात्मकता का अंतर सबसे अधिक है। अतःCs और Cl के मध्य के आबंध में आयनिक गुण सर्वाधिक होंगे।
A. इनके क्वथनांक निम्न होते हैं।
B. ये गलित अवस्था में विद्युत के सुचालक होते हैं।
C. ये ध्रुवीय विलायकों में अविलेय होते हैं।
D. इनके गलनांक निम्न होते हैं।
आयनिक यौगिक आयनों के बने होते हैं। ये आयन गलित अवस्था में स्वतंत्रतापूर्वक गमन करते हैं जिसके कारण आयनिक यौगिक गलित अवस्था में विद्युत के सुचालक होते हैं।
A. 
B. 
C. 
D. 
A. CO का आंशिक दाब = N2 का दोगुना आंशिक दाब
B. CO का आंशिक दाब = N2 का आंशिक दाब
C. CO का आंशिक दाब = N2 का आधा आंशिक दाब
D. CO का आंशिक दाब = N2 का एक-चौथाई आंशिक दाब
गैसों के आंशिक दबाव का अनुपात = गैसों के मोलों का अनुपात CO के मोल = N2 के मोल (क्योंकि उनके आणविक द्रव्यमान बराबर अर्थात 28 हैं )।
A. V/3
B. V/6
C. 6 V
D. 9 V
A. शहद
B. काँच
C. चीनी का विलयन
D. जल
श्यानता अधिक होने पर द्रव का प्रवाह बहुत धीरे होता है। हाइड्रोजन आबंध तथा वांडरवाल्स बल के कारण श्यानता बढ़ जाती है। काँच एक अत्याधिक गाढ़ा द्रव है। यह इतना गाढ़ा होता है कि इसके अधिकांश गुण ठोसों से मिलते हैं। हालाँकि, पुरानी इमारतों की खिड़की के मोटाई को मापकर काँच के प्रवाह गुण का अनुभव किया जा सकता है। ये शीर्ष की तुलना में तल में मोटे होते जाते हैं।
A. आदर्श गैसों के लिये
B. वास्तविक गैसों के लिये
C. अक्रिय गैसों के लिये
D. केवल द्वि-परमाणविक गैसों के लिये
वान्डरवाल्स समीकरण वास्तविक गैसों के लिए लागू होता है। अंतरा-आण्विक आकर्षण-बलों को वांडरवाल्स बल कहते हैं। वांडरवाल्स बल का नाम जोहानन वांडरवाल्स (1837-1923) के सम्मान में रखा गया था। इन्होंने वांडरवाल्स बलों द्वारा आदर्श व्यवहार से वास्तविक गैसों के विचलन के विषय में समझाया था।
A. द्रव्यमान के
B. घनत्व के
C. परम ताप के
D. मोलों की संख्या के
A. 273 K
B. 240 K
C. 540 K
D. 400 K
वांडरवाल समीकरण:
(P + a/V2 ) (V – b) = RT
आवोगाद्रो के नियम के अनुसार: V ∝ n
अतः आयतन भी दोगुना हो जाएगा।
(क) हाइड्रोजन आबंध
(ख) द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्य क्रिया क्योंकि H2S ध्रुवीय है।
(ग) लंडन प्रकीर्णन बल क्योंकि दोनों अध्रुवी हैं।
(घ) द्विध्रुव-प्रेरित द्विध्रुव बल क्योंकि HCl ध्रुवीय है, जबकि He परमाणु सममित इलेक्ट्रॉन अभ्र है।
गैसों में विसरण का गुण होता है जो गुरुत्वाकर्षण बल से स्वतंत्र होता है। विसरण के कारण, गैसें एक दूसरे में मिश्रित हो जाती हैं और वायुमंडल में लगभग समान रूप से वितरित रहती हैं।
(i) दाब और आयतन के मध्य का ग्राफ [P Vs V]

(ii) दाब और आयतन के व्युत्क्रम के मध्य ग्राफ [P Vs 1/V]

(iii) दाब आयतन का गुणनफल और दाब के मध्य ग्राफ [PV Vs P]


ठोस – यदि पदार्थ का गलनांक वायुमंडलीय दाब पर कमरे के ताप से अधिक होता है, तो पदार्थ ठोस होगा।
द्रव - यदि पदार्थ का गलनांक कमरे के ताप से कम और क्वथनांक कमरे के ताप से अधिक होता है, तो पदार्थ द्रव होगा।
गैस - पदार्थ गैस होगा यदि इसका क्वथनांक वायुमंडलीय दाब पर कमरे के ताप से कम हो।


माना कि गैस का प्रारंभिक ताप T1 0 C है, प्रारंभिक दाब P1 mm और प्रारंभिक आयतन V1 mL है।
बॉयल के नियम के अनुसार (स्थिर ताप T1पर) जब, हम प्रारंभिक दाब को P1 से P2 तक परिवर्तित करते हैं तो प्रारंभिक आयतन V1 से V हो जाता है

अब, चार्ल्स के नियम के अनुसार (स्थिर दाब P2 पर) जब प्रारंभिक ताप T1 से T2 होता है तो आयतन V से V2 हो जाता है

समीकरण (i) और (ii) की तुलना करने पर

A. ताप बढ़ने से
B. ताप घटने से
C. दाब घटने से
D. उत्कृष्ट गैस मिलाने से
ताप में वृद्धि होने से जल के आयनन की मात्रा बढ़ जाती है। इसलिए, हाइड्रोनियम आयनों और हाइड्रॉक्साइड आयनों की सांद्रता बढ़ जाती है, परिणामतः आयनिक गुणनफल भी बढ़ जाता है।
A. इलेक्ट्रॉन युग्म दाता
B. प्रोटॉन दाता
C. इलेक्ट्रॉन युग्म ग्राही
D. प्रोटॉन ग्राही
लूइस संकल्पना के अनुसार, अम्ल एक ऐसी स्पीशीज़ (आवेशित या अनावेशित) है, जो इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर सकती है और क्षार ऐसी स्पीशीज़ (आवेशित या अनावेशित) है, जो इलेक्ट्रॉन युग्म निष्कासित कर सहसंयोजक बंध बनाती है। अतः लूइस अम्ल इलेक्ट्रॉनरागी तथा लूइस क्षार नाभिकरागी होते हैं।
A. 1
B. 4
C. 10
D. 12
A. BF3
B. NH3
C. SnCl4
D. B2H6
BF3 एक इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक है, अतः यह एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके लूइस अम्ल बनाता है।
A. 
B. 
C. 
D. 

A. (HSO4)-
B. Na2CO3
C. NH3
D. OH-
A. 10-2
B. 10-4
C. 10-3
D. 10-5

A. दाब में वृद्धि
B. ताप में वृद्धि
C. दाब में कमी
D. बाहर से अमोनिया मिलाना
चूँकि अग्र अभिक्रिया में मोलों की संख्या घटती जाती है अतः दाब बढ़ाने पर अमोनिया की अधिक मात्र का निर्माण होगा।

A. उच्च ताप और निम्न दाब
B. उच्च ताप और उच्च दाब
C. निम्न ताप और उच्च दाब
D. निम्न ताप और निम्न दाब
यह एक ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है, जिसमें गैसों के मोलों की संख्या घटती है। अतः अधिकतम लब्धि के लिए सबसे अनुकूल स्थिति उच्च दाब और निम्न ताप होगी।
A. अधिक बर्फ बनेगी।
B. अधिक बर्फ पिघलेगी।
C. अधिक जल वाष्पित हो जाएगा।
D. जल और बर्फ की मात्रा उतनी ही रहेगी।
A. प्रबल वैद्युतअपघट्य पर
B. दुर्बल वैद्युतअपघट्य पर
C. विद्युतअनपघट्य पर
D. प्रबल और दुर्बल वैद्युतअपघट्य दोनों पर
केवल दुर्बल वैद्युतअपघट्य ही साम्यावस्था प्राप्त करते हैं। प्रबल विद्युत अपघट्य के लिए
होता है।
A. O2
B. H2O
C. O2-
D. O1-
OH- का संयुग्मी क्षार O2- है।

A. B2H6
B. LiAlH4
C. AlH3
D. NH3
क्षार ऐसा पदार्थ होता है, जो एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म त्याग कर सकता है। चूँकि, NH3 एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म दान कर सकता है, इसलिए यह लूइस क्षार की तरह व्यवहार करता है।
A. प्रोटोफोबिक विलायक
B. प्रोटोफिलिक विलायक
C. एम्फिप्रोटिक विलायक
D. एप्रोटिकविलायक
जल एम्फिप्रोटिक विलायक होता है क्योंकि यह प्रोटॉन ग्रहण भी कर सकता है और त्याग भी कर सकता है।
A. ताप में वृद्धि करने पर
B. आयतन में वृद्धि करने पर
C. गैस के दाब में वृद्धि करने पर
D. गैस के दाब में कमी करने पर
हेनरी के नियमानुसार, किसी ताप पर विलायक की एक दी गई मात्रा में घुली हुई गैस की मात्रा, विलायक के ऊपर गैस के दाब के समानुपाती होती है।
A. 50
B. 200
C. 600
D. 1000
साम्य स्थिरांक पात्र के आयतन पर निर्भर नहीं करता है।
A. CHCl2COOH का
B. CH2ClCOOH का
C. CH3COOH का
D. CCl3COOH का
क्लोरीन प्रतिस्थापियों के ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव के कारण क्लोरीन इलेक्ट्रॉन घनत्व को बाहर की ओर खींचता है, अतः हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि CH3COOH का वियोजन स्थिरांक न्यूनतम होगा, क्योंकि इसमें हाइड्रोजन का प्रेरणिक प्रभाव धनात्मक होता है।
A. एसीटेट आयनों की सांद्रता में वृद्धि होती है ।
B. H+आयनों की सांद्रता में वृद्धि होती है ।
C. OH–आयनों की सांद्रता में वृद्धि होती है ।
D. H+ आयन अपरिवर्तित रहते हैं ।
तनुकृत करने पर बफर का pH या [H+] अपरिवर्तित रहते हैं।
A. गैसों के संयोजन की दर को बढ़ाना
B. गैसों में उपस्थित अशुद्धियों को दूर करना
C. उत्प्रेरक वर्धक के रूप में कार्य करना और आयरन की क्रियाशीलता को बढ़ाना
D. प्रतिकूल ताप की क्षतिपूर्ति करना
किसी भी अभिक्रिया में उत्प्रेरक अभिक्रिया के वेग को बढ़ाता है एवं उत्प्रेरकवर्धक उत्प्रेरक की क्रियाशीलता में वृद्धि करता है।
A. अभिकारकों की सांद्रता में वृद्धि होती है।
B. नियमित अंतराल पर कम से कम एक उत्पाद निकाल लिया जाता है ।
C. एक या एक से अधिक उत्पादों की सांद्रता में वृद्धि होती है।
D. अभिक्रिया में उत्प्रेरक डाला जाता है।
ला-शातेलिए सिद्धांत के अनुसार यदि उत्पाद की सांद्रता बढ़ती है, तो साम्यावस्था प्रतीप दिशा में स्थापित हो जाती है तथा उत्पाद की सांद्रता घटने लगती है।
A. 7 से कम
B. 7 और 8 के मध्य
C. 8 और 9 के मध्य
D. 9 से अधिक
रक्त एक बफर विलयन है। रक्त में अम्ल-क्षार साम्य को बनाए रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बफर कार्बनिक अम्ल बाइकार्बोनेट बफर है, जो रक्त के pH को 7.36-7.42 के मध्य बनाए रखता है।
BF3 एक लुइस अम्ल है क्योंकि यह अमोनिया के साथ एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके अभिक्रिया करता है।


सिग्मा आबंध |
पाई आबंध |
|
1. ये s-s या s-p या p-p अथवा किसी भी संकर कक्षकों के सिरेवार अतिव्यापन से बनते हैं। |
1. ये असंकरित p- कक्षकों के पार्श्व अतिव्यापन से बनते हैं । |
|
2. किन्हीं दो परमाणुओं के बीच प्रथम आबंध हमेशा सिग्मा होता है। |
2. शेष पाई आबंध होते हैं। |
|
3. सिग्मा आबंध प्रबल आबंध होते हैं। |
3. पाई आबंध दुर्बल आबंध होते हैं। |
|
4. ये अणु के तल में होते हैं। |
4. ये अणु के तल के लंबवत होते हैं। |
आकर्षण बल, जो एक अणु के हाइड्रोजन परमाणु को दूसरे अणु के विद्युत् ऋणात्मक परमाणु (F, O अथवा N) से जोड़ता है, हाइड्रोजन आबंध अथवा हाइड्रोजन आबंधन कहलाता है। हाइड्रोजन आबंध दो प्रकार के होते हैं:
(i) अंतर-अणुक हाइड्रोजन आबंध (समान अथवा विभिन्न यौगिकों के दो अलग-अलग अणुओं के बीच बनता है)
(ii) अंतरा-अणुक हाइड्रोजन आबंध (एक ही अणु में उपस्थित हाइड्रोजन परमाणु तथा अधिक विद्युत् ऋणात्मक परमाणु के बीच बनता है)
जब एक अणु को एक से अधिक इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्थाओं द्वारा दर्शाया जा सकता है और इनमें से कोई भी व्यवस्था यौगिक के सभी गुणों की व्याख्या नहीं करती है, तो वास्तविक संरचना विभिन्न इलेक्ट्रॉन व्यवस्थाओं के मध्यवर्ती होती है, यह संरचना अनुनाद संकर कहलाती है। ये विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्थायें अनुनादी संरचनाएँ कहलाती हैं। वास्तविक संरचना की ऊर्जा और सबसे स्थायी अनुनादी संरचना की ऊर्जा के मध्य का अंतर अनुनाद ऊर्जा कहलाता है। संकर संरचना किसी भी अनुनादी संरचना की तुलना में अधिक स्थायी होती है।

A. कैरोसिन
B. ऐथिल ऐल्कोहॉल
C. ऐथलीन ग्लाइकोल
D. ग्लिसरॉल
ग्लिसरॉल, कैरोसिन, ऐथलीन ग्लाइकोल और ऐथिल ऐल्कोहॉल की तुलना में प्रति अणु अधिकतम हाइड्रोजन आबंध बनाता है। फलतः, ग्लिसरॉल के अणुओं के मध्य आकर्षण बल सबसे प्रबल होता है और श्यानता भी अधिकतम होती है।
A. H2 और Cl2
B. NH3 और HCl
C. NH3 और HBr
D. He और Ne
डाल्टन का आंशिक दाब नियम, केवल अक्रियाशील गैसों के मिश्रण पर लागू होता है। H2 और Cl2 अभिक्रिया करके HCl बनाती हैं। NH3 और HCl अभिक्रिया करके NH4Cl बनाती हैं। NH3 और HBr अभिक्रिया करके NH4Br बनाती हैं।
A. केशिका क्रिया
B. द्रव की श्यान प्रकृति
C. पृष्ठ तनाव
D. द्रवों के उच्च अपवर्तनांक
द्रव की निम्नतम ऊर्जा अवस्था तब होती है, जब इसका पृष्ठीय क्षेत्रफल न्यूनतम होता है। पृष्ठ तनाव द्रव के पृष्ठीय क्षेत्रफल को कम करके न्यूनतम करने की कोशिश करता है। द्रव की बूँदें गोलाकार इसलिए होती हैं, क्योंकि स्थिर आयतन के लिए गोले का पृष्ठीय क्षेत्रफल न्यूनतम होता है।
A. बॉयल का नियम
B. चार्ल्स का नियम
C. ग्राहम का नियम
D. डाल्टन का नियम
बॉयल के नियम के अनुसार, स्थिर ताप पर गैस की निश्चित मात्रा का दाब उसके आयतन के व्युत्क्रमानुपाती होता है। समुद्रतल पर, वायुमंडलीय परतों के कारण दाब अधिक होता है। अतः, वायु का आयतन और घनत्व कम हो जाता है।
A. विसरण की दर समान होगी।
B. अणुओं की संख्या समान होगी।
C. द्रव्यमान समान होंगे।
D. आण्विक संरचना समान होगी।
ताप तथा दाब की समान परिस्थितियों में समान आयतनवाली गैसों में समान संख्या में अणु होते हैं।
A. गैसों के दाब और ताप
B. गैसों के घनत्व और ताप
C. गैसों के दाब और आयतन
D. गैसों के घनत्व और विसरण की दर
गै-लुसैक नियम के अनुसार, स्थिर आयतन पर किसी निश्चित मात्रा वाली गैस का दाब उसके ताप के समानुपाती होता है।
A. PV =RT/n
B. PT/n=RV
C. P/T = nR/V
D. P/n=RT
PV = nRT अतः, P/T = nR/V होगा।
A. 273°C ताप पर
B. 0°C ताप पर
C. 273 K ताप पर
D. -273.15°C ताप पर
गैस का आयतन, -273.15° C ताप पर शून्य हो जाता है। इस ताप पर पहुँचने से पहले ही प्रत्येक गैस द्रवित हो जाती है। वह न्यूनतम काल्पनिक ताप, जिसपर गैस शून्य आयतन घेरती है, को परम शून्य कहते हैं।
A. द्रव का ताप बढ़ेगा।
B. द्रव का ताप घटेगा।
C. द्रव का ताप अपरिवर्तित रहेगा।
D. घट या बढ़ सकता है यह द्रव की प्रकृति पर निर्भर करता है।
वाष्पीकरण के दौरान, उच्च ऊर्जा वाले अणु द्रव के पृष्ठ को छोड़ देते हैं। फलतः, द्रव की ऊर्जा घटती है। अतः द्रव का ताप घटेगा।
A. 0.1 atm
B. 0.2 atm
C. 0.4 atm
D. 0.5 atm
A. 
B. 
C. 
D. 
चार्ल्स नियम के अनुसार, स्थिर दाब पर एक गैस की निश्चित मात्रा का आयतन उसके परम ताप के समानुपाती होता है।
A. उनके आंशिक दाब के अंतर के
B. उनके आंशिक दाब के योग के
C. उनके आंशिक दाब के वर्ग के योग के
D. उनके आंशिक दाब के वर्गमूल के योग के
डाल्टन के आंशिक दाब के नियम के अनुसार, अन्योन्य क्रिया से विहीन गैसों के मिश्रण का स्थिर ताप और निश्चित आयतन का कुल दाब प्रत्येक गैस के आंशिक दाब के योग के बराबर होता है, जहाँ प्रत्येक गैस स्थिर ताप पर समान आयतन घेरती है।
A. M/V
B. RT/PM
C. PM/RT
D. P/RT
A. L-atm K-1 mol-1
B. erg K-1
C. mole-atm K-1
D. L mole
A. तीसरा आवर्त
B. चौथा आवर्त
C. पाँचवा आवर्त
D. छट्ठा आवर्त
आवर्त सारणी के छठे आवर्त में धातुओं की संख्या अधिकतम होती है।
A. 13
B. 14
C. 32
D. 33
सिलिकॉन (Z = 14) एक उपधातु है।
A. बोरॉन
B. ऐलुमिनियम
C. मैग्नीशियम
D. गैलियम
बोरॉन, वर्ग-13 तथा दूसरे आवर्त का सदस्य है। तेरहवें वर्ग के अन्य सदस्य हैं- ऐलुमिनियम, गैलियम, इंडीयम, थैलियम।
A. Cl2O7
B. KO2
C. SeO3
D. As2O3.
आवर्त सारणी के मध्य के तत्वों के ऑक्साइड प्रायः उभयधर्मी होते हैं।
A. क्षारीय ऑक्साइड है।
B. उदासीन ऑक्साइड है।
C. उभयधर्मी ऑक्साइड है।
D. अम्लीय ऑक्साइड है।
धातुओं के ऑक्साइड प्रायः क्षारीय होते हैं।
A. 4th
B. 5th
C. 6th
D. 7th
छठे आवर्त में 32 तत्व होते हैं। चौथे और पाँचवें आवर्त में 18 तत्व होते हैं और सातवाँ अपूर्ण होता है।
A. क्षार धातुएँ
B. हैलोजेन
C. चल्कोजेन
D. अक्रिय गैसें