A. एक्टीनॉइड श्रेणी से
B. क्षार धातुओं से
C. लैन्थैनॉलड श्रेणी से
D. संक्रमण धातु श्रेणी से
अर्बियम (Erbium) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है — (68Er): [54 Xe] 4 f12 5d0 6s2।
A. क्षार वर्ग से
B. क्षारीय वर्ग से
C. हैलोजेन वर्ग से
D. उत्कृष्ट गैसों के वर्ग से
उत्कृष्ट गैसों के कक्षक पूर्णपूरित होने के कारण स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास दर्शाते हैं। अतः ये न्यूनतम अभिक्रियाशीलता प्रदर्शित करते हैं।
A. परमाण्वीय आयतन
B. आयनन एंथैल्पी
C. ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एंथैल्पी
D. परमाणु का आकार
आवर्त में बायीं से दायीं तरफ जाने पर नाभिकीय आवेश बढ़ता है और इसके कारण परमाणु का आकार छोटा होता जाता है, किंतु कोशों की संख्या समान रहती है।
A. Ca
B. Be
C. N
D. Be
Ca = 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 4s2
Zn = 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 3d10 4s2
N = 1s2 2s2 3p3
Be = 1s2 2s2
नाइट्रोजन में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, और इसके अलावा अन्य सभी दिए गए तत्वों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होते है।
A. 18
B. 10
C. 8
D. 6
चौथे आवर्त में p-ब्लॉक के छ: तत्व होते हैं। ये हैं: गैलियम, जर्मेनियम, आर्सेनिक, सेलेनियम, ब्रोमीन, क्रिप्टन।
A. F– की
B. O की
C. O–- की
D. Na+ की
चूँकि O परमाणु का अष्टक अपूर्ण है, अतः वह इलेक्ट्रॉन आसानी से ग्रहण करता है। Na+ और F– का अष्टक पूर्ण है, अतः वे अब इलेक्ट्रॉन ग्रहण नहीं कर सकते हैं। O – में, इलेक्ट्रॉन अभ्र आने वाले इलेक्ट्रॉन को प्रतिकर्षित करता है।
A. बढ़ती है।
B. घटती है।
C. अपरिवर्तित रहती है।
D. पहले घटती है, फिर बढ़ती है।
आवर्त में बायीं से दायीं तरफ जाने पर आकार घटने और नाभिकीय आवेश बढ़ने के करण विद्युत ऋणात्मकता बढ़ती जाती है, विलोमतः दायीं से बायीं तरफ जाने पर विद्युत ऋणात्मकता घटेगी।
A. छोटा आकार
B. कम नाभिकीय आवेश
C. दोनों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में अंतर
D. फ्लुओरीन की उच्चतम अभिक्रियाशीलता
चूँकि फ्लुओरीन (F) का आकार छोटा और इसका 2p-उपकोश का इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण अपेक्षाकृत सघन होता है, वो इसे एक और इलेक्ट्रॉन ग्रहण नहीं करने देता है। जबकि क्लोरीन (Cl) का आकार फ्लुओरीन (F) की तुलना में बड़ा होता है, जो इसे आसानी से एक और इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने देता है।
A. क्षार धातुएँ
B. संक्रमण तत्व
C. हैलोजेन
D. अक्रिय गैसें
अक्रिय गैसें पूर्णपूरित और स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होने के कारण उच्चतम आयनन विभव प्रदर्शित करती हैं।
A. I
B. Br
C. F
D. Cl
क्लोरीन (Cl) की ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एंथैल्पी अधिकतम होती है। जब कोई उदासीन गैसीय परमाणु (X) इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर ऋणायन आयन में परिवर्तित होता है, तो प्रक्रम में हुये एंथैल्पी परिवर्तन को उस तत्व की इलेक्ट्रॉन लब्धि एंथैल्पी कहते हैं ।
A. 10
B. 14
C. 28
D. 30
f-ब्लॉक के तत्वों को आंतरिक संक्रमण तत्व भी कहा जाता है क्योंकि वस्तुतः वे ही संक्रमण श्रेणी बनाते हैं। संक्रमण श्रेणी में, f-ब्लॉक के तत्वों की दो श्रेणी होती हैं, प्रत्येक में 14 तत्व होते हैं। ये f-कक्षक (4f-कक्षक या 5f) की संख्या के उत्तरोत्तर पूरित आधार पर वर्गीकृत किये गये हैं।
A. Li.
B. Fe
C. Cu
D. Ag
Li सबसे हल्की धातु है। यह नरम और चाँदी जैसी सफेद धातु है जो एक क्षार धातु है। यह सभी क्षार धातुओं में सबसे अधिक अभिक्रियाशील होती है।
A. Be
B. Mg
C. Ca
D. Sr
वर्ग में नीचे जाने पर तत्वों का गलनांक कम होता जाता है। अतः Sr का गलनांक निम्नतम है।
A. प्रोटॉन पुंज
B. अल्फा किरणें
C. न्यूट्रॉन पुंज
D. न्यूट्रॉन पुंज और प्रोटॉन पुंज
चूँकि न्यूट्रॉन आवेशरहित कण होता है, इसलिए न्यूट्रॉनपुंज विद्युत या चुंबकीय क्षेत्र द्वारा विक्षेपित नहीं होता है।
A. 3d
B. 5p
C. 4s
D. 6d
n+l नियम के अनुसार, जिस कक्षक के n+l का मान अधिकतम होगा, उसकी ऊर्जा उच्च होगी। अतः 6d कक्षक के लिए n+l का मान 8 है इसलिए इसकी ऊर्जा अधिक होगी।
A. केवल परमाणुओं पर
B. केवल इलेक्ट्रॉनों पर
C. केवल नाभिक पर
D. एक तीव्र गतिशील अवपरमाण्विक कण पर
हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत किसी भी गतिशील वस्तु पर लागू होता है।
A. n = 5, l = 3, m = + 1, s = + ½
B. n = 5, l = 4, m = – 4, s = – ½
C. n = 4, l = 3, m = + 4, s = + ½
D. n = 3, l = 2, m = – 2, s = + ½
5f कक्षक के लिए n का मान 5 तथा l का मान 3 होता है। अतः 5f के लिए क्वान्टम संख्याओं के मान n = 5, l = 3, m = + 1, s = + ½ होंगे।
A. 4s
B. 4p
C. 4f
D. 4d
यह कक्षक 4f है। क्वांटम संख्याओं द्वारा परमाणु कक्षकों में अंतर किया जा सकता है। प्रत्येक कक्षक को तीन क्वांटम संख्याओं n, l और m द्वारा दर्शाया जाता है।
A. घटता है।
B. बढ़ता है।
C. स्थिर रहता है।
D. कम Z होने पर घटता है और अधिक Z होने पर बढ़ता है।
A. s–ब्लॉक से
B. p–ब्लॉक से
C. d–ब्लॉक से
D. f–ब्लॉक से
दिया गया इलेक्ट्रॉनिक विन्यास f-ब्लॉक से संबंधित है, क्योंकि f-ब्लॉक के तत्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n-2) f1-14 (n-1) d0-1ns2 होता है।
A. 5 × 10–18 nm
B. 4 × 101 nm
C. 3 × 107 nm
D. 2 × 10–25 nm
(1) प्रतिदीप्त प्रकाश नलिका में
(2) टेलीवीजन चित्र नलिका में
6.62 x 10-34 Js
गेंद का द्रव्यमान अधिक है। अतः, तरंगदैर्ध्य (λ) नगण्य है।
λ ∝ (1 / m)
सम-आयनिक स्पीशीज में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है।
2d संभव नहीं है क्योंकि d उपकोश के लिए l = 2 और n = 2 होता है। l का मान केवल 1 और 0 हो सकता है। अतः 2d के लिए l = 2 संभव नहीं है, अतएव यह कक्षक भी संभव नहीं है।
4f संभव है क्योंकि f, के लिए जब n = 4 होता है, तो l = 3 संभव है।
6d संभव है क्योंकि d के लिए, l = 2, n = 6 संभव है।
3g संभव नहीं है क्योंकि g उपकोश के लिए, l = 4 होता है, जबकि n = 3 है, जो कि संभव नहीं है।
दोनों कक्षकों की ऊर्जा समान हैं और ये समान ऊर्जा स्तर और समान उपकोश से संबंध रखते हैं क्योंकि इनके n और l के मान समान हैं। इनके अभिविन्यास अलग-अलग हैं क्योंकि इनके लिए m के मान भिन्न-भिन्न हैं। चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति में इनकी ऊर्जा भिन्न-भिन्न होती हैं।
हुंड के नियम के अनुसार, किसी भी उपकोश में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन तभी हो सकता है, जब प्रत्येक कक्षक में समानांतर चक्रण वाले एक-एक इलेक्ट्रॉन उपस्थित हों। उदाहरण के लिए, नाइट्रोजन की परमाणु संख्या 7 है और इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2, 2s2, 2p3 है। तो नाइट्रोजन के कक्षकों को निम्नलिखित रूप से दर्शाया जाता है –
F - 1s2 2s2 2p6
Cr 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 4s1 3d5
Mg2+ 1s2 2s2 2p6
O- 1s2 2s2 2p5
Ca 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 4s2
बोर का सिद्धांत निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पाया था-
(i) बोर का मॉडल एक से अधिक इलेक्ट्रॉन वाले परमाणुओं के स्पेक्ट्रम को समझाने में विफल रहा था।
(ii) यह जीमन प्रभाव (चुंबकीय क्षेत्र में स्पेक्ट्रमी रेखाओं का विपाटन) और स्टार्क प्रभाव (विद्युत् क्षेत्र में स्पेक्ट्रमी रेखाओं का विपाटन) की व्याख्या नहीं कर सका था।
(iii) बोर का मॉडल इलेक्ट्रॉन की द्वैत व्यवहार (कण और तरंग) की व्याख्या नहीं कर पाया था।
(iv) बोर का सिद्धांत हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत को स्पष्ट नहीं कर पाया था, जो बताता है कि किसी इलेक्ट्रॉन की सही स्थिति और वेग का निर्धारण एक साथ करना संभव नहीं है। अतः बोर का वह अभिगृहीत जिसके अनुसार इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर एक निश्चित कक्षा में घूमता है, असत्य हो गया।
(v) बोर का मॉडल ज्यामिति और अणुओं के आकार की व्याख्या नहीं कर सका।
A. Mg
B. Ca
C. Sr
D. Ba
तत्वों की अभिक्रियाशीलता वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ती है।
A. Na
B. Mg
C. Al
D. Cl
निम्नतम आयनन ऊर्जा वाला तत्व प्रबलतम अपचायक होता है। चूँकि, आवर्त में बाईं से दाईं तरफ जाने पर आयनन ऊर्जा बढ़ती जाती है, Na की IE निम्नतम होती है, अतः यह एक प्रबलतम अपचायक होता है।
A. SF6 में
B. BeF2 में
C. BF3 में
D. CH4 में
आबंध कोण अणु के संकरण के प्रकार पर निर्भर करता है। SF6 में सल्फर sp3>d2 संकरित होता है और इसकी आकृति अष्टफलकीय होती है, अतः इसके आबंध कोण 90° होते हैं। BeF2 और BF3 में आबंध कोण क्रमशः180° और 120° होते हैं।
A. NH3
B. CH4
C. BF3
D. PCl5
BF3 में, बोरॉन sp2 संकरित होता है। sp2 संकरित कक्षकों की आकृति त्रिकोणीय समतल होती है। अतः, BF3 में सभी परमाणु एक ही तल में होते हैं।
A. BeH2
B. H2S
C. CO2
D. C2H2
BeH2, CO2 और C2H2 में केंद्रीय परमाणु sp संकरित हैं और दो अन्य परमाणुओं से जुड़ा हुआ है। अतः, इन अणुओं की संरचना रैखिक होती है। H2S में केंद्रीय परमाणु सल्फर, sp3 संकरित होता है अतः इसकी आकृति चतुष्फलकीय होती है, इस आकृति में सल्फर परमाणु पर दो स्थान दो एकाकी युग्म द्वारा अधिग्रहित होते हैं। अतः इसकी संरचना बंकित (मुड़ी हुई) होती है।
A. उपसहसंयोजन पर
B. संयोजकता कोश में इलेक्ट्रॉन युग्मों की संख्या पर
C. आयनन विभव पर
D. विद्युत ऋणात्मकता पर
अणु की आकृति, केंद्रीय परमाणु के संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉन युग्मों (बंधी अथवा आबंधी) की संख्या पर निर्भर करती है। ये VSEPR सिद्धांत की मूलभूत धारणा है।
A. CO2
B. SO2
C. NO
D. H2O
NO अणु के π*(2px) कक्षक में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है, अतः यह अनुचुंबकीय प्रकृति का होता है।
, नाइट्रोजन परमाणु के पास एकाकी युग्म और आबंधी युग्म इलेक्ट्रॉनों की संख्या क्रमशः होती हैं
A. 2, 2
B. 3, 1
C. 1, 3
D. 4, 0

में 4 आबंधी युग्म होते हैं और इसमें एकाकी युग्म नहीं होता है।
A. 2
B. 4
C. 6
D. 8
जल के अणुओं में भी हाइड्रोजन आबंध होते हैं। जल के अणु में ऑक्सीजन दो सहसंयोजक आबंधों (O–H) के अतिरिक्त दो हाइड्रोजन आबंध भी बनाता है। हाइड्रोजन आबंध होने के कारण, प्रत्येक ऑक्सीजन परमाणु चार हाइड्रोजन परमाणुओं से चतुष्फलकीय रूप से घिरा होता है, दो सहसंयोजक आबंध से आबंधित और दो हाइड्रोजन आबंध से आबंधित। संयोजित जल के अणु को (H2O)n के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। अतः एक जल अणु हाइड्रोजन आबंध द्वारा जल के चार अन्य अणुओं से जुड़ा होता है।
A. द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्यक्रिया
B. प्रकीर्णन बल
C. हाइड्रोजन आबंध
D. वांडरवाल्स बल
बेंज़ीन एक अध्रुवीय अणु है तथा अध्रुवीय अणुओं के मध्य प्रकीर्णन बल होता है।
A. क्रमशः 6 और 3
B. क्रमशः 12 और 6
C. क्रमशः 6 और 6
D. क्रमशः 12 और 3
बेंज़ीन की संरचना निम्न होती है:

अतः इसमें 12 सिग्मा और 3 पाई आबन्ध होते हैं।
A. क्रमशः 6 और 8
B. क्रमशः 7 और 4
C. क्रमशः 17 और 4
D. क्रमशः 16 और 4
किन्हीं भी दो परमाणु के मध्य हमेशा पहला आबन्ध सिग्मा आबंध और अन्य सभी आबन्ध पाई आबंध होते हैं। इसलिए, P4O10 में सिग्मा आबंधों की संख्या 16 है और पाई आबंधों की संख्या 4 है।
P4O10 की संरचना निम्न होती है।

A. 1s और 2s
B. 2s और 2s
C. 1s और 2px
D. 2py और 2pz
सिग्मा आबंध हमेशा अंतर्नाभिकीय अक्ष पर बनता है। चूँकि x-अक्ष अंतर्नाभिकीय अक्ष है, अत: 2py और 2pz कक्षक सिग्मा आबंध नहीं बनायेंगे।

A. (क) और (ख)
B. (क), (ख) और (ग)
C. केवल (ङ)
D. केवल (ग)
A. सहसंयोजक गुण
B. हाइड्रोजन आबंधन
C. ऑक्सीजन आबंधन
D. द्विध्रुव अन्योन्यक्रिया
कोई पदार्थ जल में तब विलेय होता, जब वह जल के अणुओं के साथ हाइड्रोजन आबंध बना सकता है। मेथेनॉल और एथेनॉल जल के साथ हाइड्रोजन आबन्ध बना सकते हैं, अतः ये जल में घुलनशील होते हैं।

(यहाँ मेथेनॉल और ऐथेनॉल के लिए R क्रमशः CH3 और C2H5 हैं।)
A. अनंत
B. 2.4 D
C. 1.2 D
D. शून्य
द्विध्रुव आघूर्ण एक सदिश राशि है। चूँकि CCl4 एक सममित अणु है, अतः इसका कुल द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है।
sp3d2
संयोजकता इलेक्ट्रॉन आबन्ध निर्माण में भाग लेते हैं। ये परमाणु के बाह्यतम कोश में उपस्थित होते हैं।
सहसंयोजक आबंध बनाने के लिए विपरीत प्रचकरण इलेक्ट्रॉनों वाले अर्ध-पूरित परमाणु कक्षक अतिव्यापन कर सकते हैं।
तथा
की आबंध कोटि ज्ञात कीजिए तथा इन स्पीशीज को आबंध लंबाई के घटते क्रम को व्यवस्थित कीजिए।

अष्टक नियम- प्रत्येक परमाणु अपने संयोजकता कोश में आठ इलेक्ट्रॉन करने के लिए इलेक्ट्रॉन ग्रहण, मुक्त अथवा सहभाजित करने की प्रवृति रखता है।
PCl5 (P के संयोजकता कोश में 10e–) तथा BF3 (B के संयोजकता कोश में 6e–) इस प्रकार के दो यौगिक हैं, जो अष्टक नियम का पालन नहीं करते हैं।
किसी अणु में दो आबंधित परमाणुओं के नाभिकों के बीच साम्य दूरी आबंध लंबाई कहलाती है।
किसी अणु के केंद्रीय परमाणु के चारों ओर उपस्थित आबंध इलेक्ट्रॉन युग्म युक्त कक्षकों के बीच बनने वाले कोण को आबंध कोण कहते हैं।
लुइस के अनुसार, अम्ल वह स्पीशीज़ है, जो इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण करती है और क्षारक वह स्पीशीज़ है, जो इलेक्ट्रॉन युग्म को दान करती है।
रासायनिक अभिक्रिया में, जब अग्र अभिक्रिया की दर प्रतीप अभिक्रिया की दर के बराबर हो जाती है, तो अभिक्रिया एक प्रकार की साम्यावस्था प्राप्त करती है, इस प्रकार की साम्यावस्था को रासायनिक साम्यावस्था कहते हैं।
pH = 7 + [pKa–pKb]/2
= 7 + [4.82-4.72]/2
= 7 + 0.005
= 7.005
दुर्बल विद्युत्अपघट्य की आयनन मात्रा उसकी सांद्रता के व्युत्क्रमानुपाती होती है। एकल क्षारीय अम्ल के लिए,
Ka अम्ल वियोजन स्थिरांक है, c सांद्रता है, α वियोजन की मात्रा है।
इसे ओस्टवाल्ड तनुता नियम कहा जाता है।
समान आयन रखने वाले प्रबल विद्युत अपघट्य की उपस्थिति में दुर्बल विद्युत अपघट्य का वियोजन कम हो जाता है, यह प्रभाव समआयन प्रभाव कहलाता है।
यह परिघटना पूर्ण रूप से ला-शातेलिये सिद्धांत पर आधारित है।
pH = -log[H+ ]
pH = -log (0.0038)
pH = -log (3.8) -3
pH = - (0.58 -3.0)
= 2.42
क्योंकि हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का पीएच मान 2.42 है ,अतः यह विलयन अम्लीय है।
ताप का प्रभाव: ताप बढ़ने पर साम्यावस्था स्थिरांक ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया में बाईं ओर तथा ऊष्माशोषी अभिक्रिया में दाई ओर स्थापित हो जाता है।
दाब का प्रभाव: दाब परिवर्तन का प्रभाव केवल गैसों में देखा जा सकता है। जब दाब बढ़ता है तो अभिक्रिया उस दिशा में होती है, जहाँ गैस के मोलों की संख्या कम होती है।
सांद्रता का प्रभाव: जब एक अभिक्रिया में साम्यावस्था में अभिकारक या उत्पादों की सांद्रता में परिवर्तन होता है, तो साम्यावस्था मिश्रण के संघटन में इस प्रकार परिवर्तन होता है कि सांद्रता में परिवर्तन का प्रभाव कम हो जाए।
अम्ल एवं क्षारक के ब्रान्सटेड-लॉरी सिद्धांत के अनुसार, अम्ल प्रोटॉन दाता तथा क्षारक प्रोटॉन ग्राही हैं।
जल में अमोनिया की घुलनशीलता में, जल अणु प्रोटॉन दाता के रूप में कार्य करता है तथा अमोनिया अणु प्रोटॉन ग्राही के रूप में कार्य करता है। इसलिए जल, अम्ल तथा अमोनिया क्षारक है।
(क) Kp = Kc(RT)Δn
Δ n = np – nr
= 2– 3
= –1
इस प्रकार, Kp = Kc(RT)–1
(ख) अम्ल तथा क्षार के युग्म, जो केवल एक एच प्लस आयन के कारण एक दूसरे से भिन्न हैं, संयुग्मी अम्ल-क्षारक युग्म कहलाते हैं।
उदाहरण:- HCl + H2O, H3O+ + Cl-
∴ Cl- , HCl का संयुग्मी क्षारक है।
A. कार्बन
B. हाइड्रोजन
C. नाइट्रोजन
D. सिलिकॉन
हाइड्रोजन ब्रह्मांड में अतिबाहुल्य तत्व (ब्रह्मांड के संपूर्ण द्रव्यमान का 70 प्रतिशत) है|
A. एथेन
B. एथेनॉल
C. ऐथेनल
D. एथिलीन ग्लाइकॉल
हाइड्रोजन परॉक्साइड एल्केनों से अभिक्रिया करके ग्लाइकॉल बनाता है|
A. ऑक्सीजन
B. नाइट्रोजन
C. हाइड्रोजन
D. हिलीयम
वनस्पति तेलों 473K ताप पर सूक्ष्म चूर्णित निकैल की उपस्थिति में डायहाइड्रोजन प्रवाहित करने पर, ठोस वसा में परिवर्तित हो जाते है|
A. CaCO3 मिलाकर
B. Ca(OH)2 मिलाकर
C. CaSO4 मिलाकर
D. H2SO4 मिलाकर
कठोर जल में जब बुझे चूने की परिकलित मात्रा को मिलाया जाता है तो यह जल में उपस्थित कैल्सियम कार्बोनेट और मैग्नीशियम कार्बोनेट को अवक्षेपित कर देता है, जिसे छानकर अलग कर लिया जाता है।
A. H2S
B. H2O
C. H2O2
D. एथेनॉल
लेड पेंटिंग, लेड सल्फाइड के बनने के कारण काला हो जाती हैं। हाइड्रोजन परॉक्साइड अम्लीय और क्षारीय माध्यम में एक प्रबल ऑक्सीकारक है। अम्लीय माध्यम में यह लेड सल्फाइड को सफ़ेद रंग के लेड सल्फेट में ऑक्सीकृत कर देता और पेंटिंग का रंग पहले जैसा हो जाता है।
A. Cl2
B. Na2CO3
C. Ca(OCl)Cl
D. KOH
धावन सोडा (सोडियम कार्बोनेट) को जल में मिलाने पर, यह कैल्शियम और मैग्नीशियम के क्लोराइड और सल्फेट को उनके कार्बोनेट में परिवर्तित कर देता है।
A. 4°C
B. 3.82°C
C. - 3.82°C
D. - 4°C
भारी जल का उपयोग विस्तृत रूप से नाभिकीय रिएक्टरों में मंदक के रूप में तथा विनिमय अभिक्रियाओं की क्रियाविधियों के अध्ययन में किया जाता है।
A. कॉप प्रक्रम
B. सर्पेक प्रक्रम
C. बॉश प्रक्रम
D. पार्क प्रक्रम
A. रैखिक
B. समतलीय
C. असमतलीय
D. गोलाकार
हाइड्रोजन परॉक्साइड में H के दो परमाणु दो दिशाओं में एक दूसरे के लगभग लंबवत और दो ऑक्सीजन परमाणुओं के साथ अक्षरेखा के साथ व्यवस्थित होते हैं| अतः यह एक असमतलीय संरचना है।
A. Ca
B. Fe
C. Pt
D. Na
लोहे (iron)जैसी कम अभिक्रियाशील धातु ठंडे जल से अभिक्रिया नहीं करती है, परंतु वाष्प के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोजन निर्मुक्त करती है।
A. ऑक्सीकरण
B. अपचयन
C. निर्जलीकरण
D. जलयोजन
हाइड्रोजन परॉक्साइड नवजात ऑक्सीजन बनाता है; अत:, यह ऑक्सीकरण के कारण विरंजन करता है।
A. जम्मू
B. लखनऊ
C. कोलकाता
D. मैसूर
भारत का पहला प्राणी उपवन या चिड़ियाघर कोलकाता में स्थित है। यह कोलकाता इंडियन संग्रहालय एशियाई सोसाइटी बिल्डिंग में 1814 में स्थापित हुआ था। इसकी स्थापना डेनमार्क के वनस्पतिविद डॉ. नथनील वालिच ने की थी। यह दुनिया में स्थापित सबसे शुरुआती प्राणी उपवनों में से एक है और देश में सबसे बड़ा माना जाता है।
लायन टेल मकाउ सबसे दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों में से एक है। आईयूसीएन के अनुमानों के अनुसार, इन जानवरों में से केवल 2,500 दक्षिण पश्चिम भारत के कई क्षेत्रों में पाये जाते हैं। उनके निवास के विनाश से उनकी आबादी में भारी कमी आई है। कई चिड़ियाघर प्रजनन कार्यक्रमों में भाग लेते हैं जो इस प्रजाति के अस्तित्व को सुरक्षित रखने में मदद करते हैं।
A. उचित देखभाल का आह्वान।
B. बड़े पैमाने पर शिकार।
C. प्राकृतिक आवासों का विनाश।
D. प्राकृतिक आपदाएं।
प्राकृतिक आवासों का विनाश वन्य जीवन के विनाश का मुख्य कारण है। वनों की कटाई और औद्योगिकीकरण के मनुष्य के लालची रवैये के कारण प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए हैं। जनसंख्या विस्फोट जंगली जीवों के प्राकृतिक आवास के विनाश के कारणों में से एक है।
A. लिनिअस
B. मेंडेल
C. डार्विन
D. लैमार्क
किसी जीव का दो घटकों में नामकरण करने की मानक पद्धति द्विपद नाम पद्धति कहलाती है। प्रत्येक वैज्ञानिक नाम में दो घटक होते हैं: वंश नाम और जाति नाम। कैरोलस लीनियस ने वर्ष 1735 में अपनी पुस्तक “सिस्टेमा नेचर” में द्विपद नाम पद्धति प्रस्तुत की थी।
A. बेंटहम और हूकर।
B. जॉन रे
C. लैमार्क।
D. लिनिअस।
कैरोलस लीनियस ने वर्ष 1735 में अपनी पुस्तक “सिस्टेमा नेचर” में द्विपद नाम पद्धति प्रस्तुत की थी।
A. हरबेरियम
B. वनस्पति उद्यान
C. संग्रहालय
D. वर्गिकीय कुंजी
प्रत्येक मार्गदर्शन में विपर्यासी लक्षणों का एक समुच्चय होता है। इस प्रकार के विपर्यासी लक्षणों का प्रत्येक जोड़ा युग्मित कहलाता है। दोनों कथनों में से एक को मान्यता और दूसरे को अमान्यता प्रदान की जाती है। भिन्न-भिन्न टैक्सा के लिए पृथक कुंजियों की आवश्यकता होती है।
A. आर्थ्रोपोड
B. रज्जुकी
C. आवृतबीजी
D. अनावृतबीजी
आम (मेंगिफेरा इंडिका) आवृतबीजी संघ से संबंधित है। इन पौधों में पुष्प व् बीज उत्पन्न होते हैं|
A. पारिस्थितिकीय
B. संकरण
C. वर्गिकी
D. जतिवृत
जीवों का वर्गीकरण करने के सिद्धांतों का निर्माण वर्गिकी के अंतर्गत किया जाता है। वर्गिकी जीवों की पहचान, वर्गीकरण और नाम पद्धति निर्धारित करने का अध्ययन है।
ट्रिटिकम एस्थिवम गेहूं का वैज्ञानिक नाम है। जिसमें ट्रिटिकम वंश है और एस्टीवम जाति है।
फॉर्मलिन, जो जल में फॉर्मल्डेहाइड का 40% विलयन है, का प्रयोग संग्रहालयों या प्रयोगशालाओं में अध्ययन के लिए जीवों को संरक्षित करने के लिए किया जाता है।
A. जाति
B. वंश
C. कुल
D. वर्ग
मेंढक का वैज्ञानिक नाम राणा टिग्रीना है, इस नाम में, टिग्रीना जाति का प्रतिनिधित्व करता है।
A. वनस्पति संग्रहालय
B. डिब्बा
C. एल्बम
D. पैकेट
सभी पौधों को वनस्पति संग्रहालय में संरक्षित करना चाहिए| इसमें शुद्ध और अनुप्रयुक्त दोनों प्रकार के अध्ययनों के लिए जीवित पौधों का संग्रह होता है। प्रत्येक पौधे पर इसके वैज्ञानिक नाम और कुल को प्रदर्शित करने वाला लेबल लगा हुआ होता है।
संग्रहालय के शैक्षणिक और मनोरंजनात्मक- दोनों प्रकार के उद्देश्य होते हैं। इसकी स्थापना सामान्यतः शैक्षणिक संस्थानों में प्रत्यक्ष ज्ञान प्रदान करने के लिए की जाती है। इसमें पौधों और प्राणियों के परिरक्षित नमूनों का संग्रह होता है।
आम का वैज्ञानिक नाम मेंगिफेरा इंडिका है| जैविक विविधता पृथ्वी पर उपस्थित जीवन के सभी तरह के रूपों को संदर्भित करती है। जीवों के चार विशिष्ट अभिलक्षण इस प्रकार हैं: वनस्पति उद्यानों में शुद्ध और अनुप्रयुक्त दोनों प्रकार के अध्ययनों के लिए जीवित पौधों का संग्रह किया जाता है। प्राणी उपवन वे स्थान हैं, जहाँ प्राणियों का परिरक्षण किया जाता है।इन उपवनों के पर्यावरण में जंतुओं को प्राकृतिक वास स्थानों के समान परिस्थितियाँ उपलब्ध कराई जाती हैं और उनकी देखभाल मनुष्य करते हैं। जनन को एक ऐसी जैविक प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसके अंतर्गत कोई जीव स्वयं के समान शिशुओं को उत्पन्न करता है। जीवों में जनन की मुख्य रूप से दो विधियाँ होती हैं: वृद्धि सजीवों का एक विशिष्ट अभिलक्षण है। यह जीवों के अन्दर संपन्न होती है। यह सजीवों में घटक कोशिकाओं की संख्या या आकार में अनुत्क्रमणीय वृद्धि को प्रदर्शित करती है। पौधे अपने पूरे जीवन काल में वृद्धि कर सकते हैं। परन्तु पशु केवल एक निश्चित उम्र तक वृद्धि करते हैं। जीवों का वर्गीकरण करने के सिद्धांतों का निर्माण वर्गिकी के अंतर्गत किया जाता है। वर्गिकी जीवों की पहचान, वर्गीकरण और नाम पद्धति निर्धारित करने का अध्ययन है। वर्गिकीय अध्ययन के लिए आवश्यक सूचना: B. एथनॉइक अम्ल C. ऐथेनॉल D. एथीन B. एथाइन C. प्रोपीन D. हेक्सीन एल्काइन और एल्कीन समूह के प्रथम तीन सदस्य गैस हैं, उसके अगले आठ सदस्य द्रव हैं और उच्चतर सदस्य ठोस होते हैं।
B. मेथेन और एथेन C. हाइड्रोजन, मेथेन और एथेन D. ब्यूटेन और आइसोब्यूटेन एलपीजी ब्यूटेन और आइसोब्यूटेन का द्रवीकृत मिश्रण है।
B. ग्रस्त संरूपण से कम स्थायी होता है। C. ग्रस्त संरूपण के समान ही स्थायी होता है। D. अस्तित्व संभव नहीं है। एथेन के संरूपणीय समावयव निम्न हैं:
सांतरित, ग्रस्त, विषमतलीय
सांतरित संरूपण में त्रिविमीय प्रतिकर्षण न्यूनतम होता है, अतः यह अधिक स्थायी होता है।
B. क्लोरोबेंज़ीन C. फीनॉल D. मेथिलबेंज़ीन
A. जीव और वनस्पति को अपने प्राकृतिक वास में रखा जाता हैSOLUTION
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Right Answer is:
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औद्योगिक स्तर पर कार्बन मोनोऑक्साइड का निर्माण लाल गर्म कोक पर भाप प्रवाहित करके किया जाता है। इस प्रकार CO तथा H2 का प्राप्त मिश्रण वाटर गैस अथवा संश्लेषण गैस कहलाता है।SOLUTION
षट्कोणीय वलय में प्रत्येक कार्बन परमाणु sp2 संकरित होता है तथा तीन निकटवर्ती कार्बन परमाणुओं के साथ तीन सिग्मा बंध बनाता है और चौथा इलेक्ट्रॉन (2pz) विस्थानीकृत होता है।
A. मेथेनॉलSOLUTION
A. एथीनSOLUTION
A. मेथेन SOLUTION
A. ग्रस्त संरूपण से अधिक स्थायी होता है। SOLUTION
A. बेंज़ीन