A. खिड़की के काँच में
B. प्रयोगशाला में उपयोग किए जाने वाले काँच के उपकरणों में
C. फोटोक्रोमैटिक काँच में
D. हवाई जहाज की बुलेटप्रूफ शीट में
पाइरेक्स काँच एक ऊष्मारोधी काँच है जिसका उपयोग प्रयोगशाला में उपयोग किए जाने वाले काँच के पात्रों को बनाने के लिए किया जाता है। खिड़की का काँच, सोडा काँच से बना होता है। हवाई जहाज की बुलेटप्रूफ शीट सुरक्षा काँच से बनाई जातीहै।
A. B4N3H6
B. B3N3H8
C. B3N3H6
D. B6N6H6
बोराज़ीन को अकार्बनिक बेंज़ीन कहते हैं। इसकी संरचना बेंज़ीन के समान होती है और इसका रासायनिक सूत्र B3N3H6 होता है।
A. Na2O
B. SiO2
C. CO2
D. SnO2
Na2O एक क्षारीय ऑक्साइड है। वर्ग-14 में ऊपर से नीचे जाने पर ऑक्साइडो की क्षारकता बढ़ती है। अतः CO2 और SiO2 अम्लीय ऑक्साइड हैं और SnO2 उभयधर्मी ऑक्साइड है।
प्रयोगशाला में, अमोनियम क्लोराइड के जलीय विलयन को सोडियम नाइट्राइट के साथ उपचारित कराने पर डाइ-नाइट्रोजन बनती है।
NH4Cl+ NaNO2 → N2 + 2H2O + NaCl
समूह 14 के तत्वों की तुलना में समूह 15 के तत्वों की आयनीकरण ऊर्जा अधिक होती है क्योंकि समूह 15 के तत्वों में अतिरिक्त स्थायी अर्ध-भरित p कक्षक विन्यास होता है तथा उनका आकार उच्च नाभिकीय आवेश के कारण छोटा होता है।
(i) हीरा
(ii) ग्रेफाइट
बोरिक अम्ल में परतीय संरचना होती है जिसमें BO3 इकाइयाँ हाइड्रोजन बंधों द्वारा जुड़ी होती हैं।
सिरेवाले चार हाइड्रोजन परमाणु तथा दो बोरॉन परमाणु एक ही तल में होते हैं। इस तल के ऊपर तथा नीचे दो सेतुबंध हाइड्रोजन परमाणु होते हैं। सिरेवाले चार B-H बंध सामान्य द्विकेंद्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (2c-2e) बंध होते हैं और दो सेतुबंध B-H-B त्रिकेंद्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (3c-2e) बंध होते हैं। 3c-2e बंध के विशिष्ट आकार के कारण इसे केलाबंध भी कहते हैं।
समूह 15 में, N से Bi तक जैसे-जैसे परमाणु का आकार बढ़ता है, तत्वों की H के साथ सहसंयोजक बंध के निर्माण की प्रवृत्ति कम होती जाती है।इसलिए समूह में नीचे जाने पर ऊष्मीय स्थायित्व घटता है तथा इनकी हाइड्रोजन मुक्त करने की प्रवृत्ति बढ़ती है। इसलिए, NH3 एक दुर्बल अपचायक है जबकि BiH3 अत्यधिक प्रबल अपचायक है।
ठोस कार्बन डाइऑक्साइड को शुष्क बर्फ (dry ice) कहा जाता है। इसके द्वारा कागज अथवा कपड़ा गीला नहीं होता है क्योंकि यह ऊर्ध्वपतित हो जाती है।
कार्बन मोनोऑक्साइड के शुद्ध नमूने का निर्माण फॉर्मिक अम्ल को सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ 373 केल्विन ताप पर गर्म करके किया जा सकता है।
समूह 15 के पेंटाहैलाइडों में केंद्रीय परमाणु sp3d संकरित होता है। P, PCl5 बना सकता है क्योंकि इसके संयोजकता कोश में रिक्त d-कक्षक होते हैं जबकि N, NCl5 नहीं बना सकता क्योंकि इसकी संयोजकता कोश में रिक्त d-कक्षक नहीं होते हैं। यह 5 क्लोरीन परमाणुओं को समायोजित नहीं कर सकता है।
|
कार्बन के रूप |
उपयोग |
|
हीरा |
रत्न, कटाई, ड्रिलिंग, ग्राइंडिंग, उद्योग |
|
ग्रेफाइट |
अपचायक कारक, पेंसिल लीड, इलेक्ट्रोड |
|
कोक |
स्टील निर्माण, ईंधन |
|
कार्बन स्याही |
रबर उद्योग, स्याही में रंजक, पेंट तथा प्लास्टिक |
|
चारकोल |
ईंधन |
हीरे में, प्रत्येक कार्बन परमाणु sp3 संकरित होता है तथा चतुष्फलकीय ज्यामिति से अन्य चार कार्बन परमाणुओं से जुड़ा रहता है। कार्बन परमाणु त्रिविमीय जालक का निर्माण करते हैं जिन्हें तोड़ना बहुत कठिन होता है। इसलिए, इसका गलनांक उच्च होता है।
दो जगत हैं:
1. जगत पादप- इसमें पौधे शामिल होते हैं।
2. जगत एनीमेलिया - इसमें प्राणी शामिल होते हैं।
पहाड़, महासागरों, जंगल-पर्णपाती या सदाबहार, झीलों, नदियों, तटीय क्षेत्रों, मार्शल स्थानों, तालाबों, रेगिस्तान, गर्म झरनों, जहां कहीं भी हम जाते हैं और बारीकी से निरीक्षण करते हैं, हम पुष्पों, पौधों, जीवों में एक अंतर पाते हैं| विभिन्न प्रकार के पक्षियों और उनके नृत्य हमें बहुत आकर्षित करते हैं। पुष्पों की घाटियाँ उपस्थित हैं। प्रत्येक घाटी में अपने कुछ विशेष प्रकार के पुष्प होते हैं। यह प्राकृतिक सौंदर्य हमें अत्यंत प्रभावित करता है।
यह सुंदरता इतनी स्वाभाविक और हमारे निकट है कि हम मनुष्य इसका हिस्सा बन जाते हैं। हम मन्युष न केवल जैविक विविधता की खोज में रुचि रखते हैं बल्कि उनके बीच विभिन्न संबंधों को प्रकट करने में भी रुचि रखते हैं। इसलिए, विभिन्न जीवों के बीच संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए उनकी पहचान, नामकरण और वर्गीकरण शुरू किया गया।
किसी जीव का दो घटकों में नामकरण करने की मानक पद्धति द्विपद नाम पद्धति कहलाती है। प्रत्येक वैज्ञानिक नाम में दो घटक होते हैं: वंश नाम और जाति नाम। कैरोलस लीनियस ने वर्ष 1735 में अपनी पुस्तक “सिस्टेमा नेचर” में द्विपद पद्धति प्रस्तुत की थी।
द्विपद नाम पद्धति के नियम:
• वैज्ञानिक नाम लैटिन भाषा में दिए जाते हैं।
• प्रत्येक वैज्ञानिक नाम में दो घटक होते हैं:
• वंश नाम- यह जैविक नाम का पहला शब्द है, जो वंश को प्रस्तुत करता है।
• जाति नाम- यह जैविक नाम का दूसरा शब्द है, जो जाति को प्रस्तुत करता है।
उदाहरण:
•आम का वैज्ञानिक नाम मेंगिफेरा इंडिका लिन है। इसमें मेंगिफेरा वंश नाम और इंडिका जाति संकेत पद है। लिन का तात्पर्य वैज्ञानिक लीनियस है, जिन्होंने इसकी सर्वप्रथम खोज की थी। छपाई में इसे तिरछा लिखा जाता है।
आकार के आधार पर बैक्टीरिया चार प्रकार के होते हैं: कोकस-गोलाकार, बैसिलस-छड़ाकार, स्पाइरिलम- सर्पिलाकार और विब्रियम-कॉमा-आकार |
प्रॉटिस्टा जगत को पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है : · क्राइसोफाइट · डायनोफ्लैजिलेट · युग्लीनॉइड · अवपंक कवक · प्रोटोजोआ
A.
केवल स्वपोषी
B.
केवल परपोषी
C.
स्वपोषी और परपोषी
D.
मृतपोषी
युग्लीनॉइड एककोशिक जीव हैं जिन्हें प्रोटोजोआ जगत में शामिल किया गया है| ये स्वपोषी और परपोषी विधियों द्वारा पोषण प्राप्त कर सकते हैं |
A.
मुकुलन
B.
विखंडन
C.
खंडन
D.
कायिक प्रवर्धन
विखंडन सबसे सामान्य प्रकार का अलैंगिक जनन है, जिसके परिणामस्वरूप दो संतति कोशिकाओं का निर्माण होता है। उदाहरण- अमीबा
A.
अलैंगिक जनन
B.
लैंगिक जनन
C.
मुकुलन
D.
कायिक प्रवर्धन
इस जगत में शामिल जीव प्रोकैरियोटिक और अकेन्द्रकी होते हैं । ये अलैंगिक रूप से जनन करते हैं ।
A.
अलैंगिक जनन
B.
लैंगिक जनन
C.
मुकुलन
D.
कायिक प्रवर्धन
बीजाणु निर्माण अलैंगिक जनन का एक प्रकार है जिसमें बीजाणुओं का निर्माण एककोशिकीय और बहुकोशिकीय, दोनों प्रकार के जीवों में होता है। यह प्रक्रिया पौधों में होती है।
A.
ट्रिपैनोसोमा
B.
एंटअमीबा
C.
प्लाज्मोडियम
D.
माइकोप्लाज़्मा
कशाभी प्रोटोजोआ एक या एक से अधिक कशाभ युक्त स्वतंत्र जीवी या परजीवी होते हैं, जिसका एक उदाहरण है ट्रिपैनोसोमा, जो निद्रालु व्याधि का एक कारक है |
A.
प्रोकैरिया अनुक्षेत्र में
B.
यूकैरिया अनुक्षेत्र में
C.
बैक्टीरिया अनुक्षेत्र में
D.
आर्की अनुक्षेत्र में
तीन अनुक्षेत्र पद्धति में बैक्टीरिया, यूकैरिया और आर्की शामिल हैं। जिनमें से यूकैरिया अनुक्षेत्र में एनिमेलिया जगत, कवक जगत, प्रॉटिस्टा जगत तथा प्लांटी जगत शामिल हैं। बैक्टीरिया अनुक्षेत्र में यूबैक्टीरिया शामिल हैं। आर्की अनुक्षेत्र में आद्य बैक्टीरिया शामिल हैं।
A.
विखंडन
B.
खंडन
C.
मुकुलन
D.
कायक प्रवर्धन
विखंडन सबसे सामान्य प्रकार का अलैंगिक जनन है, जो मुख्य रूप से एक कोशिकीय जीवों जैसे मोनेरा और प्रोटिस्टा में संपन्न होता है।
A.
विब्रियम
B.
स्टेफायलोकोकस
C.
डिप्लोकोकस
D.
स्ट्रेप्टोबेसिलस
बेसिलाई की व्यवस्था के आधार पर बैक्टीरिया तीन प्रकार के होते हैं: • डिप्लोबेसिलस • स्ट्रेप्टोबेसिलस • स्टेफायलोबेसिलस
A.
रसायन संश्लेषी स्वपोषी बैक्टीरिया
B.
ताप संश्लेषी स्वपोषी बैक्टीरिया
C.
रसायन संश्लेषी परपोषी बैक्टीरिया
D.
ताप संश्लेषी परपोषी बैक्टीरिया
पोषण की विधि के आधार पर बैक्टीरिया दो प्रकार के होते हैं: • स्वपोषी बैक्टीरिया • परपोषी बैक्टीरिया स्वपोषी बैक्टीरिया को आगे निम्न बैक्टीरिया में वर्गीकृत किया गया है: • प्रकाश संश्लेषी स्वपोषी बैक्टीरिया और • रसायन संश्लेषी स्वपोषी बैक्टीरिया
A.
फंजाई जगत में
B.
पादप जगत में
C.
एनिमेलिया जगत में
D.
प्रॉटिस्टा जगत में
पादप जगत से सम्बंधित जीव बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक और क्लोरोफ़िल युक्त होते हैं । कुछ परजीवी और कीटभक्षी पौधों के अतिरिक्त, ये सामान्यतः स्वपोषी होते हैं और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं ।
A.
कैरोलस लिनियस
B.
कार्ल वोइस
C.
जॉन रे
D.
अरस्तु
कुछ जीवों को पांच जगत वर्गीकरण पद्धति के किसी भी वर्ग में शामिल नहीं किया जा सका इसलिए कार्ल वोइस ने छः जगत वर्गीकरण प्रणाली दी जिसमें आद्य बैक्टीरिया को मोनेरा जगत से अलग किया गया था और इसे एक अलग जगत के रूप में माना जाता था।
A.
मलेरिया
B.
डेंगू
C.
हेपेटाइटिस-डी
D.
पीला ज्वर
वायरोइड्स छोटे संक्रामक कारक होते हैं जिनमें आनुवंशिक पदार्थ के रूप में कम आण्विक भार युक्त, गोलाकार और एकल कुंडलित आर.एन.ए पाया जाता है। इनके कारण होने वाला एकमात्र मानव रोग हेपेटाइटिस-डी है।
A.
वायरस द्वारा
B.
बैक्टीरिया द्वारा
C.
कवक द्वारा
D.
प्लाज्मोडियम द्वारा
वायरस द्वारा होने वाले जंतु रोगों के कुछ उदाहरण हैं : चेचक, छोटा चेचक, हर्पीस, इन्फ्लुएंजा, पोलियो, डेंगू ज्वर और एड्स |
A.
माइटोकॉन्ड्रिया
B.
कोशिका भित्ति
C.
कशाभ
D.
आनुवंशिक पदार्थ
माइटोकॉन्ड्रिया जीवाणु कोशिकाओं एवं नील हरित शैवाल को छोड़कर शेष सभी सजीव पादप एवं जंतु कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में अनियमित रूप से बिखरे हुए पाए जाते हैं |
A.
डी.एन.ए अथवा आर.एन.ए.
B.
केवल डी.एन.ए.
C.
केवल आर.एन.ए.
D.
डी.एन.ए तथा आर.एन.ए.
वायरस में या तो एकल कुंडलित आर.एन.ए या द्विकुंडलित डी.एन.ए.पाया जाता है |
कृत्रिम संकरीकरण में तीन चरण सम्मिलित होते हैं:
1) विपुंसन: विपुंसन के अंतर्गत, किसी पुष्प के परागकोश हाथ से एक चिमटी की सहायता से हटा दिए जाते हैं। लेकिन, एकलिंगी पुष्पों की स्थिति में विपुंसन की आवश्यकता नहीं होती है।
2) बोरा-वस्त्रावरण या थैली: इस चरण के अंतर्गत, विपुंसित पुष्प के वर्तिकाग्रों को ढक दिया जाता है, ताकि वाँछित परागों के सिवा किसी दूसरे पराग से उनका परागण न हो पाए। इस चरण में एक विशेष प्रकार के कागज की सहायता से वर्तिकाग्रों को ढीला ढक दिया जाता है।
3) मार्जन: वाँछित पौधे के परागकोश से एकत्र किए गए परागों को वर्तिकाग्र पर झाड़ दिया जाता है और उसे फिर से ढक दिया जाता है, जिससे कि वह फलों के रूप में विकसित हो सके।
अनिश्चित या असीमाक्षी पुष्पक्रम में सबसे निचले या सबसे बाहरी पुष्प पहले खिलते हैं। इस प्रकार के पुष्पक्रम में, पुष्प एक अग्राभिसारी अनुक्रम में पार्श्वीय रूप से उत्पन्न होते हैं|
असीमाक्षी पुष्पक्रम का मुख्य प्रकार असीमाक्ष है, किन्तु असीमाक्षी पुष्पक्रम के कुछ अन्य प्रकार भी हैं, जिनमें शामिल हैं:
कणिश: इस प्रकार के पुष्पक्रम में, पुष्पवृंत से रहित यानी अवृंत असीमाक्ष एक लंबे केंद्रीय अक्ष पर विन्यस्त होता है।
असीमाक्षी समशिख: इस प्रकार के पुष्पक्रम में, शाखाहीन, छोटे, चपटी ऊपरी सतह वाले बाहरी पुष्पवृंत आंतरिक पुष्पवृन्तों की अपेक्षा क्रमशः लंबे होते हैं।
पुष्पछत्र: पुष्पछत्र पुष्पक्रम में, समान बिंदु से समान लंबाई वाले और छोटे अक्ष वाले अनेक पुष्पवृंत उत्पन्न होते हैं।
स्थूलमंजरी: स्थूलमंजरी पुष्पक्रम में, पुष्पों का गहन रूप से विन्यस्त कणिश होता है, जो छद नामक एक सहपत्र से ढका हुआ होता है।
नतकणिश: यह एक शल्कयुक्त, लटका हुआ कणिश या असीमाक्ष होता है।
शीर्ष या मुंडक: यह एक सघन पुष्पक्रम होता है, एक अत्यंत छोटे अक्ष से निर्मित होता है और इसमें सामान्यतया अवृन्त पुष्प होते हैं।
असंगजनन जनन की एक विशेष विधि है |असंगजनन शब्द विंकलर ने वर्ष 1908 में प्रस्तुत किया था। सामान्य लैंगिक चक्र को असंगजनन के विपरीत उभयमिश्रण कहा जाता है। असंगजनन जनन या प्रवर्धन की अलैंगिक विधि के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला एक सामान्य शब्द है, जिसमें भ्रूण का निर्माण और उसके बाद निषेचन सम्मिलित नहीं होता। अनिषेकबीजता में भ्रूण अभी भी जनन या प्रवर्धन का कारक होता है, लेकिन इसका निर्माण अर्धसूत्री विभाजन और युग्मक संलयन द्वारा नहीं होता।
असंगजनन का महत्त्व:
A. मेटाजाइलम
B. प्रोटोजाइलम
C. मध्यादिदारुक
D. बाह्य आदिदारुक
एकबीजपत्री तने में जाइलम मध्यादिदारुक होता है तथा यह मेटाजाइलम और प्रोटोजाइलम नामक दो भागों में विभाजित होता है।
A. वृक्ष का उत्सर्जी उत्पाद
B. वृक्ष का सुखा हुआ भाग
C. प्राथमिक जाइलम के बाहर उपस्थित ऊतक
D. द्वितीयक जाइलम के बाहर उपस्थित ऊतक
छाल मुख्य रूप से द्वितीयक जाइलम के बाहर उपस्थित ऊतक है, जबकि वातरंध्र परिचर्म पर उपस्थित टूटे हुए भाग हैं। इसमें प्राथमिक और द्वितीयक फ्लोएम, वल्कुट और बाह्य त्वचा शामिल होते हैं।
A. पृष्ठाधार
B. समद्विपार्श्व
C. संपार्श्विक
D. मूलीय
द्विबीजपत्री पौधों में पृष्ठाधार पत्तियाँ होती हैं, जबकि एकबीजपत्री पौधों में समद्विपार्श्व पत्तियाँ होती हैं।
पार्श्वीय मेरिस्टेम की क्रिया से नए ऊतकों के निर्माण के कारण प्ररोह और मूल के अक्ष के व्यास या परिधि में होने वाली वृद्धि द्वितीयक वृद्धि कहलाती है। यह केवल द्विबीजपत्री तनों और मूलों में होती है।
A. संयुक्त, संपार्श्विक और खुले
B. संयुक्त, संपार्श्विक और बंद
C. संयुक्त, द्विसंपार्श्विक और बंद
D. संयुक्त, द्विसंपार्श्विक और खुले
एकबीजपत्री तने का प्रत्येक संवहन बंडल, एक बंडल आच्छद द्वारा घिरा हुआ होता है तथा उसमें फ्लोएम और जाइलम होते हैं। एकबीजपत्री तने के संवहन बंडल संयुक्त, संपार्श्विक और बंद होते हैं।
बाह्य आदिदारुक संवहन बंडल में, प्रोटोजाइलम मेटाजाइलम के बाहर स्थित होता है। इसमें जाइलम के विकास की प्रक्रिया अभिकेंद्रीय रूप से अर्थात बाहर से अन्दर संपन्न होती है।
संकेंद्री संवहन बंडलों में, एक प्रकार का संवहनी ऊतक दूसरे प्रकार के संवहनी ऊतक से घिरा हुआ होता है। इनमें कैंबियम सदैव अनुपस्थित होता है।
B. प्लवन C. सुरक्षा D. खनिज लवण एकबीजपत्री पौधों के तनों में स्कलेरेंकाइमी कोशिकाओं का एक क्षेत्र उपस्थित होता है, जो अधस्त्वचा कहलाता है। यह सुरक्षा का कार्य करती है और इसे बाहरी वल्कुट कहा जाता है।
B. सहचर कोशिकाएँ C. फ्लोएम तंतु D. फ्लोएम पैरेंकाइमा फ्लोएम की चालनी नलिकाओं में कोशिकाद्रव्य उपस्थित होता है परन्तु इनमें केन्द्रक नहीं पाया जाता|
अरीय संवहन बंडलों में, फ्लोएम और जाइलम पृथक बंडलों में पाए जाते हैं और परस्पर एकांतर वाली विभिन्न त्रिज्याओं पर स्थित होते हैं। ये अधिकतर मूलों में उपस्थित होते हैं।
पौधों में त्वचारोम वे उपांग होते हैं, जो बाह्य त्वचीय कोशिकाओं से उत्पन्न होते हैं और पौधे के लगभग सभी भागों पर पाए जाते हैं।
B. एलब्यूमिनी कोशिकाएँ और सहचर कोशिकाएँ C. चालनी नलिकाएँ और फ्लोएम तंतु D. चालनी नलिकाएँ और फ्लोएम पैरेंकाइमा अनावृतबीजी पौधों के फ्लोएम में चालनी नलिकाओं और सहचर कोशिकाओं के स्थान पर एलब्यूमिनी कोशिकाएँ और चालनी कोशिकाएँ पाई जाती हैं।
B. फ्लोएम C. भरण उतक D. मेरिस्टेम उतक जाइलम जल का संवहन करने वाला ऊतक होता है, जो मुख्य रूप से पौधों के मूलों से शीर्ष भाग तक जल और खनिजों के संवहन के लिए उत्तरदायी होता है।
दृढ़ कोशिकाएँ सामान्यतया पौधे के कठोर भागों में पाई जाती हैं, उदाहरण के लिए, कुछ फलों जैसे: अखरोट, नारियल आदि की अंतः फलभित्ति में।
वायूतक (एरेनकाईमा) अनेक जलीय पादपों की पत्तियों में पाया जाता है। यह मुख्य रूप से प्लवन में सहायता करता है।
B. शीर्षस्थ मेरिस्टेम C. पार्श्वीय मेरिस्टेम D. स्थायी मेरिस्टेम शीर्षस्थ या शिखाग्री मेरिस्टेम मूल, तने के शीर्षों और शाखाओं पर पाया जाता है। यह लंबाई में वृद्धि के लिए उत्तरदायी होता है |
B. संवहन ऊतक C. मेरिस्टमी उतक D. जाइलम मेरिस्टमी उतक की कोशिकाओं का आकार समव्यासीय होता है। इनमें छोटी रसधानियों से युक्त सघन कोशिका द्रव्य होता है। मेरिस्टमी कोशिकाएँ एक-दूसरे से सटी हुई होती हैं और उनके बीच स्थान बहुत कम होता है।
हरे शैवाल के सामान्य लक्षण हैं: अनावृत्तबीजियों के जीवन चक्र में एक प्रभावी बीजाणु उद्भिद और एक न्यूनीकृत युग्मकोद्भिद होता है। युग्मकोद्भिदों का स्वतंत्र मुक्तजीवी अस्तित्व नहीं होता। ये विषमबीजाणुक होते हैं, क्योंकि ये अगुणित लघुबीजाणुओं और गुरुबीजाणुओं को उत्पन्न करते हैं। इसलिए बीजाणुधानी के अन्दर उत्पन्न दो प्रकार के बीजाणु, जो सघन संरचनाओं में सर्पिल रूप में व्यवस्थित होते हैं, शंकु कहलाते हैं। इनके लिंग पृथक होते हैं। जब नर और मादा दोनों बीजाणुधानी समान पौधे पर उत्पन्न होते हैं, तो उन्हें उभयलिंगाश्रयी कहा जाता है। लेकिन जब नर और मादा दोनों बीजाणुधानी पृथक पौधों पर उत्पन्न होते हैं, तो उन्हें एकलिंगाश्रयी कहा जाता है। नर युग्मकोद्भिद संतति अत्यधिक न्यूनीकृत और कोशिकाओं की एक सीमित संख्या तक सीमित होती है। इस न्यूनीकृत युग्मकोद्भिद को पराग कण कहा जाता है। पराग शंकु में अनेक बीजाणुधानी होते हैं, जिनमें पराग मातृ कोशिकाएँ होती हैं, जिन्हें लघु बीजाणु मातृ कोशिकाएँ कहा जाता है। ये कोशिकाएँ अर्धसूत्री विभाजन द्वारा पराग कण उत्पन्न करती हैं, जो नर युग्मकोद्भिद होते हैं। अगुणित सपक्ष परागकण अनेक अनावृत्तबीजियों में उपस्थित होता है। यह एक विशेष लक्षण है, जो वायु के संचरण को सुगम बनाता है। अधिकांश अनावृत्तबीजी वायु परागित होते हैं, केवल साइकैस को छोड़कर, जो भृंग परागित होते हैं। टैरिडोफाइट के चार वर्ग हैं: पहला वर्ग है- साइलोप्सीडा, उदाहरण- साइलोटम। दूसरा वर्ग है- टीरोप्सीडा, उदाहरण- ड्रायोप्टैरीस, टैरीस। तीसरा वर्ग है-लाइकोप्सीडा, उदाहरण- सेलैजिनैला, लाइकोपसीडा। चौथा वर्ग है- स्फीनोपसीडा, उदाहरण- इक्वीस्टिम। टैरिडोफाइट आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं: B. मछली C. सर्प D. पक्षी पक्षियों की अस्थियाँ वायवीय यानी वायु कोषों के साथ खोखली होती हैं जो इनको हवा में उड़ने में सहायता प्रदान करती हैं |
B. पिन्ना की अनुपस्थिति C. स्तन ग्रंथियां D. पंखों की उपस्थिति स्तनधारी वर्ग की मादाओं में अपने शिशुओं को दुग्धपान कराने के लिए स्तन ग्रंथियाँ उपस्थित होती हैं।
B. प्लैटीहेल्मेन्थीस C. ऐस्केलमिंथीज D. ऐनेलिडा ऐनेलिडा संघ के प्राणी स्वच्छ जलीय, समुद्री और स्थलीय आवासों में पाए जाते हैं। इस संघ में केंचुए, पॉलिकीटा, जोंक (हीरुडिनेरिया) शामिल हैं।
ऐस्केलमिंथीज में उत्सर्जन एकल रेनेट कोशिका द्वारा होता है। इनमे परिसंचरण और उत्सर्जन तंत्र अनुपस्थित होते हैं।
B. जेली फिश C. समुद्री व्यंजन D. टीनोफोरा ओरेलिया को जेली फिश भी कहा जाता है | यह नाइडेरिया संघ का जीव है|
द्विपार्श्व सममिति में, शरीर को किसी एकल मध्य रेखा द्वारा दाएँ और बाएँ समरूप भागों में विभाजित किया जा सकता है, उदाहरण- रज्जुकी।
B. ऐनेलिडा C. नाइडेरिया D. टीनोफोरा विखंडावस्था ऐनेलिडा, आर्थोपोडा और रज्जुकी संघ का विशिष्ट लक्षण है।
कीट में रुधिर परिसंचरण तंत्र खुले प्रकार का होता है| मनुष्य, सरीसृप और पक्षी में बंद रुधिर परिसंचरण तंत्र उपस्थित होता है|
कीटों को अन्य आर्थ्रोपोडों से अलग किया जा सकता है क्योंकि वयस्क कीट में पैरों के 3 जोड़े होते हैं।
B. पार्श्वक्लोम C. ओरेलिया D. एप्लाइसिया टीनोफोरा संघ में केवल समुद्री और मांसाहारी प्राणी होते हैं। पार्श्वक्लोम टिनाफोरा का एक उदाहरण है
प्लैटीहेल्मेन्थीस का शरीर पृष्ठाधर रूप से चपटा होता है, इसलिए ये चपटे कृमियों के रूप में जाने जाते हैं, जिनमें वास्तविक खंडीभवन अनुपस्थित होता है।
B. नेफ्रिडिया C. ज्वाला कोशिका D. दंश कोशिका प्लैटीहेल्मेन्थीस में कंकाल तंत्र अनुपस्थित होता है, किन्तु परिसंचरण और श्वसन तंत्र उपस्थित होते हैं| उत्सर्जन और परासरण नियमन ज्वाला कोशिकाओं द्वारा होते हैं।
मोलस्का यह एनिमेलिया जगत का दूसरा सबसे बड़ा संघ है। इस संघ के प्राणी स्थलीय और जलीय दोनों आवासों में पाए जाते हैं। ये द्विपार्श्व रूप से सममिति वाले, त्रिकोरकी, प्रोटोस्टोम प्रगुही प्राणी होते हैं।
B. निडेरिया C. अर्थ्रोपोडा D. एकाइनोडर्मेटा संघ: एकाइनोडर्मेटा में सम्मलित प्राणी केवल समुद्री आवास वाले, धीमे गति करने वाले,स्थावर प्राणी होते हैं। एकाइनोडर्मेटा संघ के प्राणियों के कुछ उदाहरण हैं: एस्टेरियस (तारा मीन), ओफीयूरा (भंगुर तारा) और एंटीडोन (समुद्री लिली)|
B. अर्थ्रोपोडा C. मोलस्का D. प्लैटीहेल्मेन्थीस मोलस्का संघ में विशिष्ट सिर, पेशीय पाद और एक अंतरंग ककुद उपस्थित होता है। अंतरंग ककुद प्रावार नामक ऊतक की एक सतह से ढका हुआ होता है, जो कैल्सियमी कवच को स्रावित करता है।
B. अर्थ्रोपोडा C. ऐनेलिडा D. प्लैटीहेल्मेन्थीस आर्थ्रोपोडिया एनिमिया का सबसे बड़ा संघ है। इसमें कीट शामिल होते हैं। पृथ्वी पर सभी नामित प्रजातियों में से दो तिहाई से अधिक आर्थ्रोपोडा में सम्मिलित हैं।
B. कैरोलस लिनेयस C. जॉन रे D. जे.बी. लेमार्क वर्गीकरण में 'संघ' शब्द जी.एल. क्यूवियर द्वारा दिया गया था| संघ जानवरों और पौधों का प्रमुख वर्गिकी समूह होता है|
मेरिस्टमी ऊतक अपरिपक्व और अविभेदित कोशिकाओं से बना होता है, जिसमें कोशिका विभाजन की क्षमता होती है।
B. सामान्य कार्य को संपन्न करने वाला कोशिकाओं का समूह C. दो कार्यों को संपन्न करने वाला विभिन्न कोशिकाओं का समूह D. दो या दो से अधिक कार्यों को संपन्न करने वाला विभिन्न कोशिकाओं का समूह संरचनात्मक रूप से समान या भिन्न कोशिकाओं का एक समूह, जो किसी सामान्य कार्य को संपन्न करता है या संपन्न करने में सहायता करता है और जिनका उद्भव एक ही होता है, ऊतक कहलाता है।
B. उत्सर्जित उत्पाद। C. ग्रंथि संबंधी उत्पाद। D. सेलुलर उत्पाद। पौधे के उत्पाद जो किसी क्रिया में भाग नहीं लेते हैं और उत्सर्जित कर दिये जाते हैं, उन्हें उत्सर्जित उत्पाद कहते हैं| जैसे- लेटेक्स|
संवहनी ऊतक तंत्र में जटिल ऊतक अर्थात जाइलम और फ्लोएम प्रायः बंडलों में पाए जाते हैं, जिन्हें संवहन बंडल कहा जाता है। परिरंभ मुख्य रूप से पौधे को यांत्रिक सहारा प्रदान करता है। जलपादपों के तने में वायूतक (ऐरेनकाईमा) उपस्थित होता है| पार्श्वीय मेरिस्टेम की क्रिया से नए ऊतकों के निर्माण के कारण प्ररोह और मूल के अक्ष के व्यास या परिधि में होने वाली वृद्धि द्वितीयक वृद्धि कहलाती है। यह केवल द्विबीजपत्री तनों और मूलों में होती है। संपार्श्विक संवहन बंडल में, जाइलम, पिथ के अन्दर की ओर स्थित होता है और फ्लोएम वल्कुट के बाहर की ओर स्थित होता है। द्विसंपार्श्विक संवहन बंडल में जाइलम के दोनों ओर फ्लोएम उपस्थित होता है। कैंबियम जाइलम के अन्दर और बाहर दोनों ओर उपस्थित होती है| परिचर्म तीन परतों से बना होता है: कागजन, काग तथा द्वितीयक वल्कुट अथवा काग अस्तर | (अ) चालनी नलिकाएँ - ये एक विशिष्ट रैखिक पंक्ति में एक के ऊपर एक व्यवस्थित होती हैं। इन नलिकाओं की अंतःभित्तियों पर अनुप्रस्थ या तिर्यक रूप से छिद्रित पट होता है। ये सहचर कोशिकाओं से जुड़ी होती हैं। ये मुख्य रूप से भोजन के परिवहन में सहायता करती हैं। (आ) सहचर कोशिकाएँ - ये लंबी, संकरी और पतली भित्तियों वाली कोशिकाएँ होती हैं। ये सामान्यतया चालनी नलिका के पार्श्व भागों से जुड़ी होती हैं। ये चालनी नलिकाओं में दाब प्रवणता बनाए रखने में सहायता करती हैं। वातरंध्र परिचर्म पर टूटे हुए भाग होते हैं, जहाँ आंतरिक ऊतक बाहर निकलते हैं। (अ) बसंत दारु तथा शरद दारु में अंतर- बसंत दारु शरद दारु इसका निर्माण वसंत के मौसम में होता है, जब कैंबियम अधिक सक्रिय होता है। इसका निर्माण शरद या ठंड के मौसम में होता है, जब कैंबियम कम सक्रिय होता है। इनमें बड़ी संख्या में काष्ठीय अवयव होते हैं, जिनमें चौड़ी गुहिकाओं वाली वाहिकाएँ होती हैं। इसमें कुछ कम काष्ठीय अवयवों का निर्माण होता है। इसका रंग हल्का होता है। इस काष्ठ का रंग अधिक गहरा होता है। इसका घनत्व कम होता है| यह वसंत दारु की अपेक्षा, अधिक घनी होती है| (आ) पैरेंकाइमा तथा कॉलेंकाइमा में अंतर- पैरेंकाइमा कॉलेंकाइमा यह सजीव कोशिकाओं से बना होता है, जिनमें सेल्युलोज से बनी हुई कोशिका भित्तियाँ होती हैं। यह सजीव कोशिकाओं से बना होता है, इनकी कोशिका भित्तियों के कोनों पर सेल्युलोज और पेक्टीन उपस्थित होता है | इनके ढीले गठन के कारण, इनमें कोशिकाओं के बीच में अधिक अंतराकोशिकीय स्थान उपस्थित होते हैं | इस ऊतक में अंतराकोशिकीय स्थान अनुपस्थित होते हैं । यह पौधे के सभी भागों में उपस्थित होता है, जैसे: मूल, तना, पत्तियाँ, फूल, फल और बीज। यह शाकीय द्विबीजपत्री तने में प्रायः 3 से 4 परतों वाली अधस्त्वचा के रूप में उपस्थित होता है। यह मुख्य रूप से भंडारण में सहायता करता है। यह पौधे के वृद्धि कर रहे भाग, जैसे: शैशव तने और पत्ती के पर्णवृंत को यांत्रिक सहारा और लोच प्रदान करते हैं | (अ) (आ) संरचना और कार्य के आधार पर, पौधों में तीन प्रकार के ऊतक तंत्र पाए जाते हैं: बाह्य त्वचीय ऊतक तंत्र: यह पादप काय के बाह्य आवरण का निर्माण करता है| यह तंत्र मुख्य रूप से बाह्य त्वचा, रंध्र और त्वचारोम से बना होता है। यह अनेक प्रकार के कार्य संपन्न करती हैं, जैसे सुरक्षा, अवशोषण, उत्सर्जन, स्रवण, गैसीय विनिमय और वाष्पोत्सर्जन का नियंत्रण, आदि। भरण ऊतक तंत्र: यह भरण ऊतक मेरिस्टेम से विकसित होता है। इसमें सरल ऊतक जैसे: पैरेंकाइमा, कॉलेंकाइमा और स्कलेरेंकाइमा शामिल होते हैं। इसकी घटक कोशिकाएँ वल्कुट अधस्त्वचा अंतस्त्वचा, परिरंभ और पिथ जैसे भागों का निर्माण करने के लिए व्यवस्थित होती हैं। यह तंत्र मुख्य रूप से प्रकाश संश्लेषण और भंडारण के लिए सहायता एवं स्थल प्रदान करता है। संवहनी ऊतक तंत्र: यह ऊतक तंत्र शीर्षस्थ या शिखाग्री मेरिस्टेम के प्रोकैंबियम से उत्पन्न होता है। इसमें जटिल ऊतक अर्थात जाइलम और फ्लोएम पाए जाते हैं, जो प्रायः बंडलों में पाए जाते हैं, जिन्हें संवहन बंडल कहा जाता है। प्रोटीन के विघटन के लिए B. डी.एन.ए. संश्लेषण के लिए C. ग्लाइकोप्रोटीन का फॉस्फोरिलीकरण करने के लिए D. ऑक्सीकरण-अपचयन प्रतिक्रियाएँ के लिए माइटोकॉन्ड्रिया के क्रिस्टे में छोटे कण पाए जाते हैं जिन्हें मूल कण कहा जाता है जिसमें ए.टी.पीएस होता है। इसलिए, ये ऑक्सीकृत- फॉस्फोरिलीकरण के दौरान ए.टी.पी. संश्लेषण का केंद्र हैं।
केंद्रिका में B. क्लोरोप्लास्ट में C. केन्द्रक में D. ल्यूकोप्लास्ट में बाह्य आवरण झिल्ली केंद्रिका के आसपास अनुपस्थित होती है। इसकी आकृति को बनाए रखने के लिए कैल्शियम आवश्यक होता है। लिपोप्रोटीन से B. विटामिन से C. फॉस्फोलिपिड्स से D. पॉलीसैकेराइड्स से लिपोप्रोटीन एक जैव रासायनिक संयोजन है जिसमें प्रोटीन और लिपिड दोनों होते हैं। गोल्जीकाय का प्राथमिक कार्य कोशिका द्वारा संश्लेषित प्रोटीन और लिपिड जैसे वृहद अणुओं को संसाधित और पैकेज करना है।
हरित लवक में वर्णक पाए जाते हैं जो प्रकाश को अवशोषित करते हैं और शर्करा के उत्पादन के लिए जल और कार्बन डाइऑक्साइड के साथ इसका उपयोग करते हैं।
केंद्रिका B. राइबोसोम C. माइटोकॉन्ड्रिया D. केन्द्रक केन्द्रक कोशिका का एक भाग है जो इसके कार्यों को नियंत्रित करता है और इसमें अनुवांशिक सामग्री उपस्थित होती है। ल्यूवेन्हॉक B. रुडोल्फ C. रोबर्ट ब्राउन D. रोबर्ट हुक रोबर्ट हुक ने जीवन की मूल इकाई का वर्णन करने के लिए "कोशिका" शब्द दिया था। प्रोटोजोआ B. बैक्टीरिया C. माइकोप्लाज़्मा D. वायरस अमीबा प्रोटोजोआ वर्ग के अंतर्गत आता है| ये अनियमित आकृति वाले एककोशिकीय जीव हैं | अस्टिलैगो B. म्यूकर C. आल्टर्नेरिया D. पक्सीनिया गेहूँ के किट्ट रोग का कारक जीव पक्सीनिया है जो बेसिडियोमाइसिटीज़ के अंतर्गत आता है | जॉन रे B. जॉन हचिन्सन C. कैरोलस लिनियस D. बेन्थम और हुकर ‘द्विपद नामकरण पद्धति’ जातियों के नामकरण की एक औपचारिक पद्धति है जिसे सर्वप्रथम कैरोलस लिनियस नामक एक स्वीडिश जीव वैज्ञानिक ने प्रस्तुत किया | वर्गीकरण पदानुक्रम में सबसे निचली श्रेणी “जाति” है । मोनेरा जगत को निम्न दो समूह में वर्गीकृत किया गया है: · यूबैक्टीरिया · आद्यबैक्टीरिया वर्गिकी जीवों की पहचान, नामकरण और वर्गीकरण का अध्ययन करना है |
A. बाह्य आदिदारुक संवहन बंडल मेंSOLUTION
Right Answer is: D
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A. जलSOLUTION
A. चालनी नलिकाएँSOLUTION
A. पृथक बंडलों में विभिन्न त्रिज्याओं परSOLUTION
A. संवहन उतक की कोशिकाओं सेSOLUTION
A. एलब्यूमिनी कोशिकाएँ और चालनी कोशिकाएँSOLUTION
A. जाइलमSOLUTION
Right Answer is: D
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A. अंतर्वेशी मेरिस्टेमSOLUTION
A. भरण ऊतकSOLUTION
Right Answer is:
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A. मनुष्यSOLUTION
A. कार्टिलाजिनस कशेरुकाSOLUTION
A. मोलस्काSOLUTION
Right Answer is: C
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A. समुद्र ऐनीमोनSOLUTION
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A. पोरीफेराSOLUTION
Right Answer is: D
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Right Answer is: B
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A. बैलैनोग्लोससSOLUTION
Right Answer is: D
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A. अन्तरालSOLUTION
Right Answer is: C
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A. टेरीडोफायटाSOLUTION
A. निडेरियाSOLUTION
A. निडेरियाSOLUTION
A. जी. एल. क्यूवियरSOLUTION
Right Answer is: A
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A. सामान्य कार्य को संपन्न करने वाला विभिन्न कोशिकाओं का समूहSOLUTION
A. गुप्त उत्पाद।SOLUTION
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