1. आवास : एक्टीनोमाइसिटीज सामान्यतः मृदा (जैसे- एक्टिनोमाइसिस), जल (जैसे- माइक्रोमोनोस्पोरा) और खाद में पाए जाते हैं ।
2. पोषण का प्रकार : अधिकांश जातियाँ मृतपोषी होती हैं, हालांकि कुछ परजीवी भी होती हैं ।
प्रकाश संश्लेषक प्रोटिस्ट पौधों के समान प्रोटिस्ट होते हैं जो सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में स्वयं अपना भोजन बनाने में सक्षम होते हैं । उदाहरण युग्लीना और डायटम ।
प्रकाश संश्लेषक प्रोटिस्ट की तीन विशेषताएँ निम्न हैं :
1. ये यूकैरियोटिक जीव हैं ।
2. इनमें एक संगठित केन्द्रक पाया जाता है ।
3. इनके पोषण का प्रकार स्वपोषी या परपोषी हो सकता है ।
3. कवक ततु लंबे
1.
2.
|
यूबैक्टीरिया |
आद्यबैक्टीरिया |
|
ये सबसे सरल और सबसे छोटे विषमपोषी बैक्टीरिया हैं | |
ये प्राचीन बैक्टीरिया हैं जो ताप और |
|
हैलोफिल्स |
थर्मोएसिडोफिल्स |
|
यह लवण की अतिउच्च सांद्रता युक्त मृदा में विकसित होने वाले बैक्टीरिया का अवायवीय प्रकार है | |
यह अति उच्च तापमान में विकसित होने वाले बैक्टीरिया का वायवीय प्रकार है | |
A. संवहनी
B. मरुद्भिद
C. जलोद्भिद
D. समोद्भिद
मरुद्भिदी वे पौधे होते हैं जो लंबे समय तक चरम ताप, शुष्क और न्यून आर्द्रता की स्थितियों में जीवित रहने के लिए अनुकूलित होते हैं।
A. सायकस
B. पाइनस
C. स्पाइरोगायरा
D. इक्वीस्टिम
सायकस के प्रत्येक स्त्रिधानी में दो ग्रीवा कोशिका और एक अंडाणु होता है। पौधे जगत में सायकस का अंडाणु सबसे बड़ा होता है।
A. टैरीस
B. वॉल्वॉक्स
C. क्लैमाइडोमोनॉस
D. स्पाइरोगायरा
टैरीस में संवहनी ऊतक होते हैं लेकिन बीज नहीं होता है। यह एक प्रकार का टैरिडोफाइट है जो टीरोपसीडा वर्ग में आता है |
निपेंथिस कीटभक्षी पौधे का एक उदाहरण है| निपेंथिस को उष्णकटिबंधीय पिचर प्लांट्स भी कहा जाता है|
A. टैरिडोफाइट
B. शैवाल
C. अनावृत्तबीजी
D. आवृत्तबीजी
संवहनी ऊतक संवहनी पौधों में पाया जाने वाला एक जटिल संचालन ऊतक है, जो एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बना होता है| संवहनी ऊतक के प्राथमिक घटक हैं जायलम और फ्लोएम। शैवाल में सवंहन ऊतक नहीं पाया जाता है |
A. अनावृत्तबीजी
B. आवृतबीजी
C. टेरिडोफाइट
D. ब्रायोफाइट्स
अनावृत्तबीजी पौधे मुख्य रूप से बहुवर्षीय, काष्ठीय तथा सदाहरित वृक्ष या झाड़ियाँ होते हैं |
ब्रायॉफेट्स में स्त्रिधानी मादा जनन अंग होता है| यह स्त्रिधानी एक बहुकोशिकीय संरचना है|
A. संकरीकरण
B. निषेचन
C. द्विनिषेचन
D. त्रयनिषेचन
दो नर युग्मकों का मादा युग्मकोद्भिद की विभिन्न कोशिकाओं के साथ संलयन द्विनिषेचन कहलाता है। इसकी खोज सर्वप्रथम नावाशिचन ने 1898 में की थी।
A. विषमरूपी पुष्प
B. भिन्नकालपक्वता
C. स्वअनिषेच्य उभयलिंगिता
D. परनिषेचन
पुंकेसरों और अंडपों के बीच भौतिक अवरोध उपस्थित होने की स्थिति स्वअनिषेच्य उभयलिंगिता कहलाती है।
कोरछादी पुष्पदल विन्यास में पाँच दलों में से एक दल पूरी तरह बाह्य और एक दल आंतरिक होता है, तथा दल एक-एक के द्वारा अनियमित रूप से ढके हुए होते हैं, जैसे- कैसिया, गुलमोहर।
A. युग्मशाखी
B. एकलशाखी
C. कणिश
D. नतकणिश
एकलशाखी पुष्पक्रम में, शाखाएँ अकेले उत्पन्न होती हैं और केवल एक द्वितीयक अक्ष उपस्थित होता है। यह ससीमाक्षी पुष्पक्रम का एक मुख्य प्रकार हैं|
एकलिंगाश्रयी या पृथकलिंगी पौधे पर अपूर्ण पुष्प होते हैं। किंतु पुंकेसरी और स्त्रीकेसरी पुष्प अलग-अलग पौधों पर उपस्थित होते हैं। उदाहरण: पपीता, कद्दू आदि।
A. आर्किड
B. कैसिया
C. मक्का
D. गुड़हल
पूर्ण पुष्प में दोनों आवश्यक चक्र उपस्थित होते हैं। इन्हें उभयलिंगी या द्विलिंगी पुष्प भी कहा जाता है। उदाहरण: गुड़हल, आर्किड, कैसिया आदि। मक्का अपूर्ण पुष्प का उदाहरण है| जिसमें केवल एक आवश्यक चक्र उपस्थित होता है|
A. नतकणिश
B. स्थूलमंजरी
C. पुष्पछत्र:
D. असीमाक्षी समशिख:
असीमाक्षी समशिख: पुष्पक्रम में, शाखाहीन, छोटे, चपटी ऊपरी सतह वाले बाहरी पुष्पवृंत आंतरिक पुष्पवृन्तों की अपेक्षा क्रमशः लंबे होते हैं। यह असीमाक्षी पुष्पक्रम का का एक प्रकार है।
आलू का जो हिस्सा हम खाते हैं, जमीन में उगता है। यह पौधे की जड़ नहीं है। यह तने का भूमिगत हिस्सा है जो मोटा हो जाता है। तने के इस हिस्से को कंद कहा जाता है।
A. कोरस्पर्शी पुष्पदल विन्यास
B. व्यावर्तित पुष्पदल विन्यास
C. कोरछादी पुष्पदल विन्यास
D. पंचवृक्षी पुष्पदल विन्यास
कोरस्पर्शी पुष्पदल विन्यास में दल या बाह्य दल किनारों द्वारा एक दूसरे को केवल स्पर्श करते हैं और उन्हें ढकते नहीं हैं, जैसे- कैलोट्रोपिस।
A. पुंकेसर
B. वर्तिकाग्र
C. वर्तिका
D. अंडाशय
पुंकेसर एक पुष्पी पौधे का नर जननांग होता है| प्रत्येक पुंकेसर एक तंतु या वृंत और एक परागकोश होता है |
A. स्त्रीकेसर
B. वर्तिकाग्र
C. अंडप
D. पुंकेसर
परागकोश की पालियों में पराग कण बड़ी संख्या में उत्पन्न होते हैं। परागकोश की भित्ति टूटकर पराग कणों का विमोचन करती है। परागकोश से वर्तिकाग्र की ग्रहणशील सतह पर पराग कणों का स्थानांतरण या संचारण परागण कहलाता है।
A. अंडप
B. अंडाशय
C. वर्तिका
D. पुंकेसर
जायांग मादा जननांग होता है, जिसमें अंडप या स्त्रीकेसर उपस्थित होते हैं। प्रत्येक अंडप में एक अंडाशय, एक वर्तिका और एक वर्तिकाग्र होता है। अंडाशय गुरुबीजाणुधानी होता है, जिसमें गुरुबीजाणु या बीजांड होते हैं।
A. तना
B. जड़
C. पत्ती
D. पुष्प
पुष्प अत्यंत संघनित और रूपांतरित प्ररोह होता है। यह लैंगिक जनन के उद्देश्य से पौधे का जननांग होता है। यह फलों और बीजों के विकास में सहायक होता है।
किसी पौधे पर पुष्पों के विन्यास अर्थात उनका रूपों और स्थिति को पुष्पक्रम कहा जाता है।
परागकोश से वर्तिकाग्र की ग्रहणशील सतह पर पराग कणों का स्थानांतरण या संचारण परागण कहलाता है।
सेम लिलिएसी कुल का एक पौधा है|
आवृतबीजी दो प्रकार के होते हैं:
1) द्विबीजपत्री: इन आवृतबीजियों के बीज में दो बीजपत्र होते हैं।
2) एकबीजपत्री: इन आवृतबीजियों के बीज में एक बीजपत्र होता है।

परागण को व्यापक रूप से निम्न दो भागों में विभाजित किया जाता है:
स्वयुग्मन या स्वपरागण: यह एक पुष्प के पराग कणों का उसी पुष्प के वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण या संचारण है।
परानिषेचन या पर-परागण: यह एक पुष्प के पराग कणों का दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण या संचारण है।
पुष्पदल विन्यास समान चक्र के अन्य सदस्यों के संबंध में पुष्प कलिका के अन्दर दलों और बाह्य दलों के विन्यास की विधि है। यह अनेक प्रकार का होता है, जिनमें सम्मिलित हैं: कोरस्पर्शी, व्यावर्तित, कोरछादी, पंचवृक्षी और ध्वजिक।
कोरस्पर्शी पुष्पदल विन्यास: जब किसी चक्र में दल या बाह्य दल किनारों द्वारा एक दूसरे को केवल स्पर्श करते हैं और उन्हें ढकते नहीं हैं, जैसे- कैलोट्रोपिस।
व्यावर्तित पुष्पदल विन्यास: प्रत्येक दल या बाह्य दल एक ओर से ढकता है और दूसरी ओर से ढका हुआ होता है। इस प्रकार, प्रत्येक दल या बाह्य दल एक किनारे पर अपने निकटवर्ती से बाहर और दूसरे किनारे पर अपने निकटवर्ती के अन्दर होता है, जैसे- हिबिस्कस का दल पुंज।
कोरछादी पुष्पदल विन्यास: पाँच दलों में से एक दल पूरी तरह बाह्य और एक दल आंतरिक होता है, तथा दल एक-एक के द्वारा अनियमित रूप से ढके हुए होते हैं, जैसे- कैसिया, गुलमोहर।
A. दीमक
B. रेशम कीट
C. तिलचट्टा
D. टिड्डी।
रेशम कीट का वैज्ञानिक नाम बॉम्बेक्स मोरी है। यह रेशम के धागों को उत्पन्न करते हैं| जिनका उपयोग मनुष्यों द्वारा रेशम के वस्त्र बनाने में किया जाता है|
A. पक्ष्माभ
B. खण्डयुक्त उपांगो
C. श्वसन अंग
D. बाह्यकंकाल
आर्थोपोडा एनिमेलिया जगत का सबसे बड़ा संघ है। इस संघ के प्राणी अलवण जलीय, समुद्री और स्थलीय आवासों में पाए जाते हैं। इनमे पक्ष्माभ अनुपस्थित होते हैं।
A. उभयचर
B. पक्षी
C. सरीसृप
D. मछली
पक्षी स्तनधारियों के समान समतापी होते हैं और उच्च और स्थिर शरीर के तापमान को बनाए रखते हैं। उभयचर, सरीसृप और मछली असमतापी होते हैं|
मोलस्का प्राणी जगत का दूसरा सबसे संघ है |
द्विपक्षीय सममिति में, शरीर को किसी एकल मध्य रेखा द्वारा दाएँ और बाएँ समरूप भागों में विभाजित किया जा सकता है|
एकाइनोडर्म में अरीय सममिति होती है |
नाइडेरिया दो प्रकार के शरीर रूपों में पाए जाते हैं- पॉलिप और मेडुसा।
पृष्ठरज्जु एक लचीली और शलाका के आकार की संरचना होती है, जो सभी रज्जुकी प्राणियों के भ्रूणों में पाई जाती है। पृष्ठरज्जु की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर, प्राणियों को रज्जुकी और अरज्जुकी में वर्गीकृत किया जाता है।
संघ टीनोफोरा के दो उदाहरण हैं- बेरोई और पार्श्वक्लोम |
मोलस्का एनिमेलिया जगत का दूसरा सबसे बड़ा संघ है।
इस संघ की विशेषताएँ इस प्रकार हैं :
सममिति तीन प्रकार की होती हैं: अरीय सममिति, द्विपार्श्व सममिति और द्विअरीय सममिति|
अरीय सममिति: इस सममिति के अंतर्गत, शरीर को किसी पहिए की तीलियों की तरह अनेक अरीय रेखाओं में विभाजित किया जा सकता है, उदाहरण- नाइडेरिया, एकाइनोडर्म।
द्विपार्श्व सममिति: इस सममिति में , शरीर को किसी एकल मध्य रेखा द्वारा दाएँ और बाएँ समरूप भागों में विभाजित किया जा सकता है, उदाहरण- रज्जुकी।
द्विअरीय सममिति: इस सममिति में, शरीर को केवल दो अरीय रेखाओं द्वारा समरूप भागों में विभाजित किया जा सकता है, उदाहरण- टेनोफोरा।
स्तनधारी की महत्वपूर्ण विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
स्तनधारी जीव के उदाहरण हैं : फेलिस (बिल्ली) और बैलेनिप्टेरा (ब्लू व्हेल)
शरीर की दीवार और आंत की दीवार के बीच जो गुहा उपस्थित होती है, उसे प्रगुहा कहते हैं |
प्रगुहा के प्रकारों के आधार पर प्राणियों का वर्गीकरण तीन प्रमुख समूहों में किया जाता है:
अगुहीय- इन प्राणियों में पाचन तंत्र के अतिरिक्त कोई भी शरीर गुहा नहीं होती, उदाहरण- चपटे कृमि/प्लेटीहैल्मिंथीज। बाह्य त्वचा और अंतः त्वचा के बीच के स्थान को मध्य त्वचा मृदुतक द्वारा भरा जाता है।

कूटगुहिक- इन प्राणियों की कूटगुहिक नामक शरीर गुहा मध्य त्वचा द्वारा पूरी तरह आच्छादित नहीं होती, उदाहरण- रोटीफर्स और निमेटोड।

प्रगुही- इन प्राणियों में एक ‘वास्तविक प्रगुहा’ होती है, जो मध्य त्वचा पर्युदर्या गुहा द्वारा आच्छादित होती है, उदाहरण- ऐनेलिडा, मोलस्का, आर्थोपोडा, एकाइनोडर्म, रज्जुकी।

A. चना
B. एरंड
C. मटर
D. सेम
खाद्य पदार्थों का संचय करने वाला ऊतक भ्रूणपोष भ्रूणपोषी बीजों में उपस्थित होता है, जैसे-एरंड| चना, मटर, सेम में भ्रूणपोष उपस्थित नहीं होता है |
A. फैबेसी
B. सोलैनेसी
C. लिलिएसी
D. पोएसी
यह लिलिएसी कुल का पुष्प आरेख है| लिलिएसी कुल सभी एकबीजपत्री पौधों को प्रस्तुत करता है, जो विश्वव्यापी रूप से फैले हुए हैं।
A. फैबेसी
B. सोलैनेसी
C. लिलिएसी
D. पोएसी
फैबेसी कुल को फली कुल, मटर कुल, सेम कुल या दाल कुल भी कहा जाता है। आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अनेक प्रजातियाँ इस कुल में शामिल हैं।
बीज चोल एक कठोर और चर्मिल बाहरी बीजावरण होता है। प्रवार एक पतला और झिल्लीदार आंतरिक बीजावरण होता है । नाभिका बीजावरण पर एक क्षत-चिह्न होता है, जिसके द्वारा वृद्धि कर रहे बीज फल से जुड़े रहते हैं। बीजांडद्वार के ऊपर एक छोटा छिद्र होता है।
A. हेलोबियल प्रकार
B. कोशिकीय प्रकार
C. केंद्रकी प्रकार
D. इसमें से कोई नहीं
केंद्रकी प्रकार में भ्रूणपोष केन्द्रक केन्द्रकी के चारों ओर भित्ति का निर्माण किए बिना विभाजित और पुनर्विभाजित हो जाता है। इस प्रकार, एक सामान्य कोशिकाद्रव्य में, केन्द्रकी के एक पुंज का निर्माण होता है। उदाहरण: नारियल जल।
A. सम्मुख पर्णविन्यास
B. एकांतर पर्णविन्यास
C. चक्करदार पर्णविन्यास
D. त्रयीअरीय पर्णविन्यास
सम्मुख पर्णविन्यास में प्रत्येक पर्व पर एक चक्कर में दो से अधिक पत्तियाँ जुड़ी हुई होती हैं। उदाहरण: सप्तपर्णी, कनेर, गैलियम, आदि।
कोष्ठकों की संख्या के आधार पर अंडाशय पांच प्रकार का होता है:एककोष्ठकी, द्विकोष्ठकी, त्रिकोष्ठकी, चतुष्कोष्ठकी और पंचकोष्ठकी|
A. लैमिनारिया
B. क्लैमाइडोमोनॉस
C. मैक्रोक्रिस्टिस
D. वॉल्वॉक्स
मैक्रोक्रिस्टिस केल्प (शैवाल) का एक जीनस है। इस जीनस में सभी ब्राउन शैवाल का बड़ा भाग शामिल होता है।
A. स्वच्छ जल की झीलों में
B. ठंडे समुद्र में
C. गर्म समुद्र में
D. नमकीन झीलों में
फेओफायसी या भूरा शैवाल, अधिकाँश समुद्री बहुकोशिकीय शैवाल का एक बड़ा समूह है, जिसमें ठंडे उत्तरी गोलार्ध के पानी के कई समुद्री शैवाल शामिल हैं।
सभी ब्रायोफाइट्स भ्रूणशील और गैर-संवहनी होते हैं: इनमें ऊतक और संलग्न जनन तंत्र पाए जाते हैं, लेकिन इनमें संवहनी ऊतक की कमी होती है। वे बीजों के माध्यम से पुनरुत्पादित होते हैं।
A. जिम्नोस्पर्म
B. टेरिडोफाइट
C. आवृतबीजी
D. ब्रायोफाइट्स
टैरिडोफाइट प्रथम स्थलीय पौधे हैं, जिनमें संवहन ऊतक अर्थात जाइलम और फ्लोएम होते हैं। ये ठंडे, गीले और छायादार स्थानों में पाए जाते हैं, किन्तु इनमें से कुछ रेतीली मिट्टी में भी उग सकते हैं।
A. स्पाईरुलीना
B. ड्रोसेरा
C. यूकेलिप्टस
D. वुल्फिया
वुल्फिया बहुत छोटे और सूक्ष्मदर्शी पौधे होते हैं जिनकी ऊँचाई लगभग 0.5 मिलीमीटर होती है |
A. एक परत
B. तीन परतें
C. चार परतें
D. पांच परतें
जिम्नोस का अर्थ है- अनावृत और स्पर्म का अर्थ है- बीज। अतः जिम्नोस्पर्म वे पौधे होते हैं, जिनमें बीजांड अंडाशय भित्ति से ढके हुए नहीं होते हैं। इसलिए, बीज अनावृत होते हैं। जिम्नोस्पर्म के सीधे आवृत आवरण बीजांड तीन परतों से बने होते हैं ।
A. ड्रोसेरा
B. निपेंथिस
C. युट्रीकूलेरिया
D. ग्रेसिलेरिआ
ड्रोसेरा, जिसे आमतौर पर सनड्यूज के नाम से जाना जाता है, 170 से अधिक प्रजातियों के साथ कीटभक्षी पौधों की सबसे बड़ी प्रजाति में से एक है।
पोरफायरा एक लाल रंग का शैवाल है, जिसमें लगभग 70 प्रजातियां शामिल हैं।
A. 120
B. 64
C. 34
D. 12
फर्न के स्पोरोगोनियम में अधिकतम 64 बीजाणु होते हैं|
पाइनस अनावृत्तबीजी (Gymnosperms) पौधे का उदाहरण है| पाइनस लोंगएवा (Pinus longaeva) 5000 वर्षों तक जीवित रह सकता है।
A. रॉबर्टसन
B. रॉबर्ट हुक
C. लीवेनहोक
D. सिंगर
बहुभ्रूणता का सर्वप्रथम लीवेनहोक द्वारा निरीक्षण किया गया था| सन १७९१ की शुरुआत में वैन लीवेनहोक ने नारंगी के बीज में एक से अधिक भ्रूण का निरीक्षण किया था|
A. शैवाल
B. कवक
C. लाइकेन
D. आवृत्तबीजी
एंजियोस्पर्म जंतुओं के लिए प्राथमिक खाद्य स्रोत हैं| पुष्प नामक एक विशिष्ट संरचना में आवृत्तबीजियों के पराग कण और बीजांड विकसित होते हैं। इनके बीज फलों के अंदर होते हैं।
साइकैस जीवित जीवाश्म का एक उदाहरण है जो अनावृतबीजी का सबसे पुराना सदस्य भी है। यह पादप जगत के सबसे बड़े शंकु उत्पन्न करता है।
जिम्नोस्पर्म वे पौधे होते हैं, जिनमें बीजांड अंडाशय भित्ति से ढके हुए नहीं होते हैं। इसलिए, यह अनावृत बीज उत्पन्न करते हैं।
ब्रायोफाइटस को पादप जगत का उभयचर कहा जाता है|
जॉर्ज बेंथम और जोसेफ डाल्टन हूकर ने पुष्पीय पौधों के लिए वर्गीकरण की प्राकृतिक प्रणाली दी|
एल्जिन और कैरागीन का प्रयोग वाणिज्यिक रूप से किया जाता है।
शैवालों के दो कुछ उदाहरण हैं:
पादप जगत में शामिल हैं: शैवाल, ब्रायोफाइट, टैरिडोफाइट, अनावृत्तबीजी और आवृत्तबीजी।
A.
गुणसूत्र
B.
माइक्रोसोम
C.
लाइसोसोम
D.
मध्य पटलिका
एक पादप ऊतक में आसन्न कोशिकाओं को मध्य पटलिका नामक एक सीमेंटिंग ऊतक की एक पतली, चिपचिपी, असंगत परत द्वारा बंधित रखा जाता है। यह Ca और Mg पेक्टेट से बनी होती है।
कोशिका झिल्ली (जिसे प्लाज्मा झिल्ली, प्लाज़्मालेमा , या "फॉस्फोलिपिड बाईलेयर" भी कहा जाता है) कोशिका के अंदर उपस्थित कोशिकीय मशीनरी और बाह्य तरल पदार्थ के बीच अंतरापृष्ठ है।
प्रोटोप्लाज्म का सबसे प्रचुर और महत्वपूर्ण घटक जल है। यह कोशिकीय मैट्रिक्स के मूल विलायक का निर्माण करता है।
A.
हरे शैवाल में
B.
जीवाणु में
C.
एण्टअमीबा में
D.
ट्रिपैनोसोमा में
जीवाणु एककोशिकीय प्रोकैरियोटिक जीव हैं, जिनमें केन्द्रक का अभाव होता है |
A.
स्लाईडेन
B.
रॉबर्ट हुक
C.
रॉबर्ट ब्राउन
D.
अलैक्जेंडर फ्लेमिंग
रॉबर्ट हुक ने 1665 में कॉर्क में सर्वप्रथम मृत कोशिकाओं को देखा और इसकी खोज की| रॉबर्ट ब्राउन ने 1831 में सर्वप्रथम कोशिका में केन्द्रक की खोज की |
A.
राइबोसोम की उपस्थिति
B.
केन्द्रक झिल्ली की अनुपस्थिति
C.
कोशिका झिल्ली की अनुपस्थिति
D.
केन्द्रक झिल्ली की उपस्थिति
प्रोकैरियोट्स में केन्द्रक झिल्ली अनुपस्थित होती है तथा उपस्थित जीवद्रव्य कोशिका झिल्ली द्वारा घिरा होता है।
A.
गुणसूत्र में
B.
राइबोसोम में
C.
रसधानी में
D.
जीवद्रव्य में
गुणसूत्र केन्द्रक में उपस्थित एक धागेनुमा संरचना होती है | इसमें आनुवंशिक पदार्थ या डी.एन.ए उपस्थित होता है |
A.
70 S और 80 S
B.
35 S और 60 S
C.
60 S और 40 S
D.
50 S और 30 S
राइबोसोम मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं: प्रोकैरियोटिक राइबोसोम जो 70S होते हैं और यूकैरियोटिक राइबोसोम जो 80 S होते हैं | प्रोकैरियोटिक राइबोसोम की 50 S और 30 S उप इकाइयाँ तथा यूकैरियोटिक राइबोसोम की 60 S और 40 S उप इकाइयाँ हैं |
A.
गोल्जीकाय में
B.
लवकों में
C.
रसधानी में
D.
केन्द्रक में
माइटोकॉन्ड्रिया के समान लवकों में स्वयं के डी.एन.ए और राइबोसोम उपस्थित होते हैं|
A.
ग्रेना
B.
राइबोसोम
C.
माइटोकॉन्ड्रिया
D.
रसधानी
ग्रेना थाइलेकोइड नामक चपटी झिल्ली युक्त थैलियों से बनी होती है| ये सिक्कों के ढेर के समान व्यवस्थित होती हैं |
A.
अंतर-कोशिकीय पाचन क्रियाओं में सहायता करना
B.
कोशिकाओं के बीच संपर्क में सहायता करना
C.
डी.एन.ए प्रतिकृति में सहायता करना
D.
श्वसन में सहायता करना
कोशिका भित्ति सभी पादप कोशिकाओं और कुछ जीवाणुओं का एक मुख्य लक्षण है | यह कोशिकाओं के बीच संपर्क में सहायता करता है |
A.
स्टेरोइड्स
B.
फॉस्फोग्लिसराइड्स
C.
ट्राईग्लिसराइड्स
D.
फॉस्फोलिपिड्स
कोशिका झिल्ली एक अर्ध पारगम्य झिल्ली है जो प्रत्येक सजीव कोशिका के जीव द्रव्य को घेरती है। कोशिका झिल्ली के लिपिड घटक में मुख्य रूप से फॉस्फोग्लिसराइड्स शामिल होते हैं |
A.
जीवाणु
B.
पौधे
C.
जंतु
D.
फीताकृमि
प्रोकैरियोट्स एककोशिकीय जीव हैं जिनमें कोशिकांग या अन्य आंतरिक झिल्ली-बाध्य संरचनाएँ अनुपस्थित होती हैं। इनमें केन्द्रक के स्थान पर एक गुणसूत्र पाया जाता है | उदाहरण: जीवाणु, माइकोप्लाज़्मा, आदि |
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं के उदाहरण हैं:
· जीवाणु
· माइकोप्लाज्मा
गुणसूत्र केंद्रक में उपस्थित एक धागेनुमा संरचना है। इसमें आनुवंशिक पदार्थ या DNA उपस्थित होता है ।
केन्द्रक कोशिका में निर्देशक के रूप में कार्य करता है|
साइटोपंजर निम्नलिखित कार्यों में सहायता करता है:
· कोशिकीय परिवहन
· कोशिका विभाजन
· कोशिकांगों की गति
· कोशिका के आकार को बनाए रखना
· अंतरकोशिकीय और अंतराकोशिकीय परिवहन, जैसे पुटिकाओं की गति।
गोल्जी सम्मिश्र की सिस एवं ट्रांस स्थितियों के बीच अंतर:
·
·
कोशिका में रसधानी का महत्व:
· यह जल की अधिकतम मात्रा, पोषक तत्वों और खनिजों का संचय करती है |
· यह कोशिका की वृद्धि और दीर्घिकरण में सहायक होती है |
कोशिका आवरण कोशिका का सबसे बाहरी आवरण होता है, जो कोशिकाओं को आकार और कठोरता प्रदान करता है। कोशिका आवरण के तीन मूल स्तर होते हैं:
· ग्लाइकोकेलिक्स
· कोशिका भित्ति और
· जीवद्रव्य झिल्ली या अर्ध पारगम्य झिल्ली
अन्तः प्रदव्ययी जलिका के प्रमुख कार्य निम्न हैं:
· यह एक कोशिका को द्रव्यी ढाँचा प्रदान करती है।
· यह केंद्रक सहित कोशिका के अनेक भागों के बीच प्रोटीनों के परिवहन के लिए चैनल के रूप में कार्य करती है।
· यह अनेक जैव रासायनिक क्रियाओं के लिए सतह प्रदान करती है।
· तारककाय या तारककेंद्र जंतु कोशिकाओं में उपस्थित होते हैं।
· प्रत्येक तारककाय में तारककेंद्र नामक छोटी संरचनाओं का एक युग्म होता है।
· प्रत्येक तारककाय में ट्यूब्यूलिन प्रोटीन के, समान दूरी पर स्थित परिधीय सूत्रकों के नौ समूह होते हैं।
· परिधीय सूत्रक एक त्रिक में उपस्थित होते हैं।
· केंद्रीय प्रोटीनयुक्त भाग धुरी कहलाता है और अरीय दंडों की सहायता से परिधीय त्रिकों की नलिकाओं से जुड़ा होता है।
· तारककेंद्र पक्ष्माभ या कशाभिका और तर्कु तंतुओं के आधारीय शरीर का निर्माण करते हैं।
iii. यूकैरियोटिक जीवों के दो उदाहरण निम्न हैं:
मनुष्य और पौधे |
A.
दो समसूत्री में तथा दो अर्द्धसूत्री में
B.
दो समसूत्री में तथा चार अर्द्धसूत्री में
C.
एक समसूत्री में तथा दो अर्द्धसूत्री में
D.
दो समसूत्री में तथा एक अर्द्धसूत्री में
प्रत्येक समसूत्री तथा अर्द्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था के दौरान एक गुणसूत्र में अर्द्धगुणसूत्रों की संख्या दो-दो होती है|
A.
प्राणी कोशिका, कोशिकाद्रव्य विभाजन
B.
पादप कोशिका, कोशिकाद्रव्य विभाजन
C.
प्राणी कोशिका, अर्द्धसूत्री विभाजन
D.
पादप कोशिका, अर्द्धसूत्री विभाजन
दिए गए चित्र में एक प्राणी कोशिका में कोशिकाद्रव्य विभाजन को दर्शाया गया है| इसमें जीवद्रव्य कला में एक खांच बनने से कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है| खांच के गहरा होने से कोशिकाद्रव्य दो नयी संतति कोशिकाओं में बंट जाता है|
A.
केंद्रिका अद्रश्य हो जाती है पूर्वावस्था के अंत में केन्द्रक आवरण टूट जाता है, जिससे माइक्रोट्युबुल गुणसूत्र के काइनेटोकोर तक पहुँचते हैं| केन्द्रक आवरण का टूटना पूर्वावस्था के अंत को चिन्हित करता है|
4 B. 3 C. 2 D. 1SOLUTION
A.