A.
12
B.
24
C.
36
D.
48
आवृतबीजी का भ्रूणपोष त्रिगुणित होता है जबकि मूल शीर्ष कोशिकाएँ द्विगुणित होती हैं| अतः भ्रूणपोष में 36 गुणसूत्र होने पर इसके मूल शीर्ष कोशिकाओं में 24 गुणसूत्र होंगे|
A.
पूर्वावस्था और अंत्यावस्था
B.
पश्चावस्था और मध्यावस्था
C.
अंतरावस्था और समसूत्री अवस्था
D.
अंत्यावस्था और समसूत्री अवस्था
कोशिका चक्र को दो अवस्थाओं में विभेदित किया गया है: पहली अंतरावस्था जिसके अंतर्गत कोशिका विभाजन के लिए तैयार होती है तथा दूसरी अवस्था समसूत्री अवस्था है जिसके अंतर्गत कोशिका विभाजन होता है|
A.
श्वान और शील्डन
B.
मेंडल और वीज्मान
C.
डार्विन और लैमार्क
D.
व्हीटकर और कार्प
श्वान और शिल्डिन ने कोशिका सिद्धांत दिया था जिसके अनुसार नई कोशिकाएँ पूर्ववर्ती कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं।
A.
15 मिनट
B.
30 मिनट
C.
45 मिनट
D.
59 मिनट
यदि, हर मिनट एक बैक्टीरिया के लगातार विभाजन से, एक घंटे में एक छोटी परखनली भर जाती है, तो परखनली का आधा हिस्सा 59 मिनट में भर जाएगा| क्यूंकि बैक्टीरिया समसूत्री विभाजन द्वारा अपनी संख्या में वृद्धि करता है|
A.
5pg
B.
10pg
C.
20pg
D.
40pg
अंडाणु एक अगुणित कोशिका होती है जिसमें 5pg (पिकोग्राम) डीएनए उपस्थित है. यह एक प्राणी कोशिका है जो की द्विगुणित होती है, इसमें 10pg (पिकोग्राम) डीएनए उपस्थित होगा| संश्लेषण प्रावस्था में डीएनए दुगुना होगा अतः G2 प्रावस्था में 20pg (पिकोग्राम) डीएनए तथा G1 प्रावस्था में 10pg (पिकोग्राम) डी.एन.ए उपस्थित होगा|
A.
गुणित कोशिकाओं के संलयन द्वारा जनन के दौरान अर्द्धसूत्री विभाजन गुणसूत्रों की संख्या को स्थायी बनाए रखने में सहायता करता है क्योंकि अगुणित कोशिकाएँ निषेचन के दौरान संलयन करके द्विगुणित युग्मनज का निर्माण करती हैं। प्रथम मध्यावस्था B. द्वितीय मध्यावस्था C. प्रथम पूर्वावस्था D. द्वितीय पूर्वावस्था प्रथम पूर्वावस्था सबसे लम्बी होती है जो कि आगे पांच प्रावस्थाओं में विभेदित होती है: तनुपट्ट (लिप्टोटीन), युग्मपट्ट (जाइगोटीन), स्थूलपट्ट (पैकाईटीन), द्विपट्ट (डिप्लोटीन) तथा पारगतिक्रम (डायाकाइनेसिस )| जनक कोशिका की आधी B. जनक कोशिका के समान C. जनक कोशिका की दुगुनी D. जनक कोशिका की तुगुनी प्रथम अर्धसूत्री विभाजन में संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या घटकर आधी हो जाती है| जबकि द्वितीयक अर्द्धसूत्री विभाजन में संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या समान ही रहती है| तर्कु पट्टिका B. गुणसूत्र पट्टिका C. मध्यावस्था पट्टिका D. अर्द्धगुणसूत्र पट्टिका समसूत्री विभाजन में मध्यावस्था के अंतर्गत सभी गुणसूत्र एक तल पर पंक्तिबद्ध हो जाते हैं जिसे मध्यावस्था पट्टिका कहते हैं| लिप्टोटीन B. जाइगोटीन C. पैकाईटीन D. डिप्लोटीन दो अर्द्धगुणसूत्रों के परस्पर विनिमय (क्रॉसिंग ओवर) प्रथम पूर्वावस्था की पैकाईटीन प्रावस्था के अंतर्गत होता है|
मृत कोशिकाओं के प्रतिस्थापन द्वारा समसूत्री विभाजन जीवों के भीतर संख्या में वृद्धि करने में सहायता करता है| यह बहुकोशिक जीवों में वृद्धि का आधार है| पादपों में, विभज्योतकीय ऊतकों में समसूत्री विभाजन के परिणामस्वरूप जीवनपर्यंत निरंतर वृद्धि होती है। जीवों के भीतर कोशिका की संख्या को घटाने में समसूत्री विभाजन कायिक प्रवर्धन में सहायता करता है| कायिक प्रवर्धन में समसूत्री विभाजन के द्वारा आनुवांशिक रूप से समान संततियों का उत्पादन होता है| इन संततियों को प्रतिरूप अर्थात क्लोन कहते हैं| समान B. दुगुना C. तिगुना D. चार गुना समसूत्री विभाजन में, समान आनुवांशिक अवयव के साथ दो समान संतति कोशिकाएँ बनती हैं। डी.एन.ए प्रतिकृति में अक्षमता के कारण अनुवांशिक सूचनाओं में कोई परिवर्तन नहीं होता। हृदय की सामान्य क्रियाओं का नियमन विशेष पेशी ऊतक (नोडल ऊतक) द्वारा स्वः नियमित होता है, इसलिए हृदय को पेशीजनक या मायोजनिक कहते हैं| दूसरी तरफ परानुकम्पी तंत्रिकाओं से प्राप्त तन्त्रिय आवेग हृदय स्पंदन एवं क्रियाविभव की संवहन गति को कम करते हैं, अतः यह हृद निकास कम करता है| क) एकल परिसंचरण: मछलियों में हृदय ऑक्सीजन रहित रक्त को पंप करता है जो कि क्लोमों द्वारा ऑक्सीकृत होता है और शरीर के अंगो में इसकी आपूर्ति करता है, जहाँ से ऑक्सीजन रहित रक्त हृदय में वापिस आता है | ख) अपूर्ण द्विसंचरण उभयचर और सरीसृप में होता है, दायाँ अलिंद फेफड़ो से ऑक्सीजन युक्त रक्त प्राप्त करता है और बायाँ अलिंद शरीर के दूसरे अंगों से ऑक्सीजन रहित रक्त प्राप्त करता है| हालांकि, वे एक निलय में मिश्रित हो जाते हैं जो मिश्रित रक्त को पंप करता है| इस प्रकार इसे अपूर्ण द्विसंचरण भी कहा जाता है। ग) द्विसंचरण: पक्षियों और स्तनधारियों में, बाएँ और दायें अलिंद द्वारा प्राप्त ऑक्सीजनयुक्त और ऑक्सीजन रहित रक्त क्रमशः उसी ओर के निलय तक जाता है। निलय बिना किसी मिश्रण के इसे पंप करते हैं, अर्थात, इन प्राणीयों में दो अलग-अलग परिसंचरण मार्ग उपस्थित हैं। इसे द्विसंचरण कहा जाता है। जब हमें कभी चोट लगती है, तो चोट में से कुछ समय तक रक्त बहता है, लेकिन शीघ्र ही रक्त का बहाव बंद हो जाता है| ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर से रक्त के अतिरिक्त प्रवाह को रोकने के लिए, रक्त में एक विधि होती है जिसे रक्त स्कंदन या थक्का कहते हैं| एक थक्के या स्कंदन में धागों का एक जाल होता है जिसे फाइब्रिन कहते हैं जिसमें रक्त के मृत और क्षतिग्रस्त पदार्थ उलझे रहते हैं| फाइब्रिन थ्रोबिन एंजाइम द्वारा प्लाज्मा में उपस्थित अक्रियाशील फाइब्रिनोजन के रूपांतरण से बनते हैं| थ्रोम्बिन प्लाज्मा में उपस्थित दूसरे अक्रियाशील पदार्थ से बनता है| कैल्शियम आयन स्कंदन के उपरोक्त दोनों चरणों के लिए आवश्यक होते हैं| रक्त स्कंदन चोटग्रसत रक्त वाहिकाओं को बंद करते है और इस प्रकार रक्त प्रवाह रुक जाता है| उच्च रक्तचाप के कारण वृक्क को अत्याधिक रक्त निस्यंदित करना पड़ता है, जिससे वृक्काणु क्षतिग्रस्त हो जाते हैं| इस स्थिति को मधुमेह वृक्कविकृति कहते हैं| क्योंकि वृक्क में गुच्छीय निस्यंद निष्क्रिय हो जाता है, शरीर में अपशिष्ट पदार्थ एकत्रित हो जाते हैं| जबकि निस्यंदन और महत्वपूर्ण रक्त प्रोटीन बने रहने चाहिए|
शर्करा अणुओं को समीपस्थ संवलित नलिका की ल्यूमिनल सतह पर मौजूद सोडियम-शर्करा सह-परिवहन अणुओं की क्रिया से पुनः अवशोषित किया जाता है। यदि वे मधुमेह के मामले में पूरी तरह से संतृप्त हैं, तो शर्करा के अतिरिक्त अणु मूत्र में उत्सर्जित हो जाते हैं।
ए.एन.एफ, जी.एफ.आर में वृद्धि करके, रेनिन और ऐल्डोस्टीरोन स्राव में कमी करके और संगृहीत नलिका द्वारा नमक के पुनः अवशोषण को रोककर, नमक और जल के उत्सर्जन में वृद्धि करता है| अभिवाही धमनिका में वाहिकासंकुचन और अपवाही धमनिका में वाहिकासंकीर्णन से जीएफआर में वृद्धि होती है|
B. भूख C. प्यास D. पोषक तत्वों का अवशोषण अधिवृक्क वल्कुट एल्डोस्टीरोन हार्मोन स्रावित करता है जो शरीर में सोडियम-पोटैशियम को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है|
हेनले लूप और वासा रेक्टा के बीच छोटे क्षैतिज प्रवणता को एक बड़े लंबवत परासरणीय प्रवणता में परिवर्तित कर दिया जाता है। यह वृक्क को नाइट्रोजन के उपापचय से बने यूरिया की उच्च सांद्रता के साथ मूत्र उत्सर्जन की अनुमति देता है|
जीएफआर की सामान्य दर 90-125 मिली/मि. है| यदि दर में लगातार कमी आ रही हो,तो यह वृक्क की निष्क्रियता का संकेत है|
क्यूंकि सर्दियों में पसीना नहीं आता, अतः रक्त का आयतन बढ़ जाता है, इसलिए रक्त की परासरण क्षमता कम हो जाती है| परासरण ग्राहियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं और प्यास केंद्र के संकेत भी निष्क्रिय हो जाते हैं|
B. वासा रेक्टा की आरोही भुजा द्वारा C. वासा रेक्टा की अवरोही भुजा द्वारा D. अन्तराकाशी द्वारा हेनले-लूप की अवरोही भुजा भी वासा रेक्टा की आरोही भुजा के साथ प्रतिधारा उत्पन्न करती है और हेनले-लूप की आरोही भुजा अवरोही वासा रेक्टा के साथ प्रतिधारा उत्पन्न करती है। चूंकि दोनों भुजाएं स्वतंत्र रूप से पारगम्य होती हैं, सोडियम क्लोराइड आरोही भुजा से अवरोही तक विसरित हो जाएगा जबकि जल अवरोही से आरोही भुजा तक विसरित हो जाएगा।
B. लार C. हार्मोन D. रक्त मूत्राशय में मूत्र भर जाने से उसके फैलने के कारण केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र द्वारा संदेश उत्पन्न होता है| मूत्राशय भित्ति से इन आवेगों को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में भेजा जाता है| केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में (CNS) मूत्राशय की चिकनी पेशियों के संकुचन तथा मूत्राशयी अवरोधिनी के शिथिलन हेतु एक प्रेरक संदेश जाता है, जिससे मूत्र का उत्सर्जन होता है|
B. समीपस्थ संवलित नलिका C. दूरस्थ संवलित नलिका D. हेनले का लूप सांद्रित मूत्र निर्माण में हेनले-लूप वासा रेक्टा के साथ महतवपूर्ण भूमिका निभाता है| हेनले-लूप की दो भुजाओं में निस्यंद का प्रवाह विपरीत दिशा में होता है और प्रतिधारा उत्पन्न करता है| यह प्रतिधारा तंत्र मध्यांश के अन्तराकाशी की प्रवणता को बनाए रखती है, जो संग्रहित नलिका द्वारा जल के सहज अवशोषण में योगदान करती है इस प्रकार सान्द्र मूत्र उत्सर्जन होता है|
वृक्क पथरी के लक्षण तब तक नहीं दिखते जब तक वह मूत्र वाहिनी (जिसके माध्यम से मूत्र मूत्राशय में जाता है) में नीचे आने न लगे| ऐसी परिस्थिति में, पथरी वृक्क से मूत्र के प्रवाह को अवरुद्ध करती है| जिसके कारण वृक्क में सूजन या वृक्क में दर्द होता है| यह दर्द सामान्यतः गंभीर होता है|
कृत्रिम वृक्क एक निस्यंद उपकरण है जिसका प्रयोग शरीर से अतिरिक्त द्रव और अपशिष्ट पदार्थो को निकालने के लिए कृत्रिम वृक्क यंत्र के साथ किया जाता है| इसका उपयोग दोनों वृक्कों के क्षतिग्रस्त होने पर किया जाता है |
B. मूत्र की मात्रा और गुण में कोई परिवर्तन नहीं होता C. अधिक सांद्रित मूत्र का निर्माण होता D. अधिक तनु मूत्र का निर्माण होता सांद्रित मूत्र निर्माण में हेनले-लूप वासा रेक्टा के साथ महतवपूर्ण भूमिका निभाता है| हेनले-लूप की दो भुजाओं में निस्यंद का प्रवाह विपरीत दिशा में होता है और प्रतिधारा उत्पन्न करते हैं| यह प्रतिधारा तंत्र मध्यांश के अन्तराकाशी की प्रवणता को बनाए रखती है, जो संग्रहित नलिका द्वारा जल के सहज अवशोषण में योगदान करती है इस प्रकार सान्द्र मूत्र उत्सर्जित होता है|
गुच्छ से निकलने वाली अपवाही धमनिका, वृक्कीय नलिका के चारों ओर सूक्ष्म केशिकाओं का जाल बनाती है, जिसे परिनालिका केशिका जाल कहते हैं| इस जाल से निकलने वाली एक सूक्ष्म वाहिका हेनले–लूप के समांतर चलते हुए U-आकार की संरचना वासा रेक्टा बनाती है|
B. अपारगम्य, पारगम्य C. पारगम्य, अपारगम्य D. अर्ध पारगम्य, चयनात्मक हेनले के लूप की अवरोही भुजा जल के लिए पारगम्य है परन्तु वैद्युत अपघट्य के लिए लगभग अपारगम्य है। यह नीचे की ओर जाते हुए निस्यंद को सांद्र करती है| आरोही भुजा जल के लिए अपारगम्य होती है, लेकिन वैद्युत अपघट्य के लिए पारगम्य है। इसलिए आरोही भुजा में निस्यंद सांद्र क्षारीय हो जाता है|
B. थायरॉइड ग्रंथि C. यकृत D. तैल ग्रंथि यकृत पित्त का स्राव करती है जिसमें कॉलेस्ट्रोल,निम्नीकृत स्टीरॉयड हार्मोन,विटामिन और औषध होते हैं| त्वचा में उपस्थित स्वेद और तैलीय ग्रन्थियाँ अपने स्राव के द्वारा कुछ पदार्थो जैसे नमक, लैक्टिक अम्ल, स्टेरोल्स,हाइड्रोकार्बंस आदि का निष्कासन करती हैं|
B. हीमेटूरिया C. डाईयूरिया D. एनयूरिया वृक्क की कुसंक्रिया से रक्त में यूरिया का संचय हो सकता है, जिसे यूरीमिया कहा जाता है, जो अत्यधिक हानिकारक है और इससे वृक्क कार्य करने में विफल हो सकते हैं।
डायाफ्राम पसली पंजर के नीचे तक फैली मांसपेशियों की एक शीट है। डायाफ्राम आमाशय की गुहा से वक्ष गुहा को अलग करता है और श्वसन में एक महत्वपूर्ण कार्य करता है।
कार्बनिक एनहाइड्रेज एक जिंक युक्त एंजाइम है जो कार्बन डाइऑक्साइड के हाइड्रेशन को उत्प्रेरित करता है।
अन्तः फुफ्फुसीय दाब वायुमंडलीय दाब से कम होता है तो अंतःश्वसन में वायु बलपूर्वक, बाहर से फेफड़ों के अन्दर जाती है जबकि वायुमंडलीय दाब की तुलना में अन्तः फुफ्फुसीय दाब में थोड़ी सी वृद्धि से निःश्वसन होता है|
क्रमशः (i) श्वसन नलिकाएँ (ट्रेकिआ) (ii) क्लोम (गिल) जीवों द्वारा ऑक्सीजन (O2) का उपयोग अप्रत्यक्ष रूप से पोषक अणुओं जैसे ग्लूकोस को तोड़ने और जीवन की विभिन्न क्रियाओं के लिए ऊर्जा प्राप्त करने के लिए किया जाता है | केंचुए में गैसों का विनिमय शरीर की सतह की आर्द्र क्यूटिकल द्वारा होता है | वायु की वह मात्रा (आयतन) जो बलपूर्वक निःश्वसन के बाद एक व्यक्ति अंतः श्वासित कर सकता है उसे जैव क्षमता (वीसी) कहते हैं | एथलीट (धावकों) और पर्वत निवासियों में वीसी उच्च होती है | रक्ताणु (इरिथ्रोसाइट) लगभग 97% ऑक्सीजन का शरीर में परिवहन करते हैं | शेष 3% का परिवहन प्लाज्मा में विलीन होता है | ऑक्सीजन रक्त में ऑक्सीहीमोग्लोबिन के रूप में होती है | एक हीमोग्लोबिन अणु अधिकतम चार ऑक्सीजन अणुओं का वहन करता है | बाइकार्बोनेट आयन और विलीन कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बनिक अम्ल के रूप में परिवर्तित कर pH में प्रबल परिवर्तन रुधिर मध्यक (ब्लड बफर) कहलाता है । रक्त की अम्लता या क्षारीयता को अम्लीय या क्षारीय पदार्थों के मिश्रण द्वारा बदला जा सकता है। कार्बोनेट/बाई कार्बोनेट बफर तंत्र इस मिश्रण के लिए क्षतिपूर्ति करता है और आवश्यक सीमा के भीतर pH को बनाए रखता है (i)दमा में श्वसनी और श्वसनिकाओं की शोथ के कारण श्वसन के समय घबराहट तथा कठिनाई होती है | (ii) वातस्फीति एक चिरकालिक रोग है जिसमें कूपिका भित्ति क्षतिग्रस्त होने के कारण गैस विनिमय सतह घट जाती है| ध्रूमपान इसके मुख्य कारको में से एक है | (ii) व्यावसायिक श्वसन संबंधी विकार उन व्यक्तियों में श्वसन तंत्र की सूजन है जो कुछ उद्योगों में जैसे पत्थर की पिसाई या पत्थर तोड़ने का काम करते हैं | वहां इतने धूल कण निकलते है कि शरीर का सुरक्षा तंत्र उन्हें पूरी तरह निष्कासित नहीं रोक पाता है |अधिक समय तक इन धूल कणों के संपर्क में रहने से फाइब्रोसिस (रेशमी ऊतकों की प्रचुरता) हो जाता है, जिससे फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुँचता है | फेफड़े द्विस्तरीय फुफ्फुसावरण से ढके होते हैं जिसे प्ल्यूरा कहते हैं | दो प्ल्यूरा झिल्लियाँ एक पतली सतह फुफ्फुस गुहा जिसमें फुफ्फुसावरणी द्रव भरा होता है, द्वारा पृथक होती है| यह फेफड़ों की सतह पर घर्षण को कम करता है | दो प्रकार के प्ल्यूरा हैं : (i) पेराइटल प्ल्यूरा :यह बाह्य फुफ्फुसावरणी झिल्ली है जो वक्षीय स्तर के निकट संपर्क में रहती है | (ii) विसरल प्ल्यूरा :यह आतंरिक फुप्फुसावरणी झिल्ली है जो फेफड़ों की सतह के संपर्क में रहती है | मानव श्वसन तंत्र में एक जोड़ी बाह्य नासाद्वार, नासा गुहा कक्ष, नासाग्रसनी, कंठनली, वायु–नली, श्वसनिकाएं और वायु कूपिकाएं शामिल होते हैं । बाह्य नासाद्वार होंठो के ठीक ऊपर उपस्थित होते हैं | ये नासा मार्ग द्वारा नासा कक्ष तक पहुँचते हैं। नासा कक्ष नासाग्रसनी में खुलता है, जो ग्रसनी का एक भाग है, यह आहार और वायु के लिए उभयनिष्ट मार्ग है। कंठ एक उपास्थिमय पेटिका है जो ध्वनि उत्पादन में सहायता करता है; यह श्वासनली तक जाता है। श्वासनली एक सीधी नलिका है, जो वक्ष गुहा के मध्य तक 5वीं वक्षीय कशेरुकी तक जाकर दायीं और बायीं दो प्राथमिक श्वसनियों में विभाजित हो जाती है। प्रत्येक श्वसनी द्वितीयक और तृतीयक स्तर की श्वसनी, श्वसनिकाओं और बहुत पतली अंतस्थ श्वसनिकाओं में समाप्त हो जाती है। श्वासनली, प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक श्वसनी, और प्रारंभिक श्वसनिकाएं अपूर्ण उपास्थिल वलयों से आलंबित होती हैं। प्रत्येक अंतस्थ श्वसनिका अनेक पतली अनियमित भित्ति युक्त और वाहिकायुक्त थैली जैसी संरचनाओं का निर्माण करती है जिन्हें वायु कूपिका कहा जाता है। श्वसन नाल, श्वसनिकाएं और वायु कूपिकाओं का शाखित जाल फेफड़ों की रचना करता है | फेफड़े द्विस्तरीय झिल्ली जिसमें फुफ्फुसावरणी द्रव भरा होता है, से ढके होते हैं जिसे प्ल्यूरा कहते हैं | बाह्य फुफ्फुसावरणी झिल्ली वक्षीय परत के निकट संपर्क में रहती है |जबकि आतंरिक फुफ्फुसावरणी झिल्ली फेफड़ों की सतह के संपर्क में रहती है | श्वसन का नियमन : तंत्रिका तंत्र के कारण शरीर के ऊतकों में माँग के अनुरूप श्वसन की लय को संतुलित और स्थिर बनाए रखने की क्षमता होती है | मस्तिष्क के मेड्यूला क्षेत्र में एक विशिष्ट श्वसन लयकेंद्र विद्यमान होता है, जो मुख्य रूप से श्वसन के नियमन के लिए उत्तरदायी होता है मस्तिष्क के पोंस में एक अन्य केंद्र स्थित होता है जिसे श्वसन प्रभावी केंद्र कहते हैं |जो श्वसन लयकेन्द्र के कार्यों को संयत(सुधार) कर सकता है | लयकेंद्र के पास एक रसोसंवेदी केंद्र स्थित होता है जो लयकेंद्र के लिए अति संवेदी होता है | यह CO2 और हाइड्रोजन आयनों के लिए अतिसंवेदी होता है | CO2 और हाइड्रोजन आयनों की सांद्रता में वृद्धि इस केंद्र को सक्रिय कर सकती है जो बदले में श्वसन प्रक्रिया में आवश्यक समायोजन करने के लिए लयकेन्द्र को संकेत भेजता है| महाधमनी चाप और ग्रीवा धमनी से जुडी संवेदी संरचनाएं भी CO2 और H+ सांद्रता के परिवर्तन को पहचान सकती हैं तथा प्रतिकारक क्रिया हेतु लयकेंद्र को आवश्यक संकेत भेज सकती हैं| श्वसन लय के नियमन में ऑक्सीजन की भूमिका महत्त्वहीन होती है | B. उच्च रक्तदाब C. हृदय अघात D. एथिरोकांठिय हृदय की मांसपेशियों को पर्याप्त रक्त नहीं मिलने से वक्ष में दर्द या असुविधा होती है जिसे हृद शूल (एंजिना) कहते हैं| यह वक्ष में दबाव या संकुचन के दर्द की तरह महसूस की जा सकती है। दर्द कंधे, बाहों, गर्दन, जबड़े या पीठ में भी हो सकता है। मध्यम आयु वर्ग और वृद्ध व्यक्तियों में यह सामान्य है।
B. कैल्सियम और फाइब्रिन C. कैल्सियम और कॉलम D. प्रोथ्रोम्बिन और थ्रोम्बोप्लास्टीन रक्त स्कंदन तंतुओ का एक जाल है जिसे फ्रीब्रिन कहते है जो प्लाज्मा में एंजाइम थ्रोम्बिन द्वारा अक्रियाशील फिब्रीनोजन के रूपांतरण द्वारा बनता है, जो बदले में एंजाइम कॉम्प्लेक्स थ्रोम्बोकिनेज द्वारा प्रोथ्रोम्बीन नामक प्लाज्मा में मौजूद एक अन्य निष्क्रिय पदार्थ से बनता है। प्रोथ्रोम्बिन का निर्माण थ्रोम्बोप्लास्टिन द्वारा किया जाता है।
B. 1.0 सेकंड C. 0.8 मिनट D. 0.8 सेकंड हृदय प्रति मिनट 72 बार स्पंदन करता है, अर्थात प्रति मिनट कई हृद चक्र होते है, इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हृद चक्र की अवधि 0.8 सेकंड है|
B. थक्का C. फिब्रिनोल्य्सिस D. थ्रोम्बस थ्रोम्बस रक्त का एक थक्का है जो अपने मूल स्थान से जुड़ी हुई रक्त वाहिका में बनता है|
B. हाइपरग्लाइसिमिया C. हाइपोग्लाइसिमिया D. ग्लाईकोलिसिस हाइपरग्लाइसिमिया एक ऐसी स्थिति है जो रक्त में ग्लूकोज के अत्यधिक उच्च स्तर से होती है, जब शरीर में पर्याप्त इंसुलिन नहीं होता है या इंसुलिन का उपयोग नहीं कर पाता है। यह ग्लूकोज को ऊर्जा में परिवर्तित करता है। हाइपरग्लाइसिमिया अक्सर मधुमेह को इंगित करता है जो नियंत्रण से बाहर होता है|
ई.सी.जी. हृदय से विद्युत आवेगों की रिकॉर्डिंग है जो हृदय रोगों, अतालता और चयापचय विकारों की जाँच और निदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है|
हिपेरिन बसोफिल्स द्वारा स्रावित एक प्राकृतिक स्कंदन रोधक है जो स्वतः रक्त स्कंदन को रोकता है|
विसरण दर को प्रभावित करने वाले कारक: विसरण परासरण किसी भी माध्यम में संपन्न हो सकता है। केवल द्रव माध्यम में संपन्न होता है। विसरण करने वाले अणु गैस, द्रव या ठोस हो सकते हैं। विलायक के अणुओं की गति का समावेश होता है। अर्ध पारगम्य झिल्लिका आवश्यक नहीं होती। केवल अर्ध पारगम्य झिल्लिका के माध्यम से संपन्न होता है। अन्य पदार्थों की उपस्थिति महत्वहीन होती है| अन्य पदार्थों की उपस्थिति द्वारा प्रभावित होता है। विसरण दाब द्वारा प्रभावित होता है| तंत्र के द्रवस्थैतिक दबाव द्वारा प्रभावित होता है। कार्बनिक एनहाइड्रेस में जिंक धातु होती है | जंतुओं में एंजाइम का प्राथमिक कार्य रक्त और अन्य ऊतकों में अम्ल-क्षार के संतुलन को बनाए रखने के लिए कार्बन डाईऑक्साइड का बाईकार्बोनेट में अंतःपरिवर्तन करना है| यह ऊतकों से बाहर कार्बन-डाईऑक्साइड का परिवहन करने में भी सहायता करता है |
श्वसन मापी(स्पाइरोमीटर) एक उपकरण है जो फेफड़ों द्वारा ली गई और छोड़ी गई वायु का आयतन मापने के लिए उपयोग किया जाता है |
ऑक्सीजन की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड में हीमोग्लोबीन के प्रति अधिक बंधुता होती है | यदि ये दो अणु,अर्थात् कार्बन-डाईऑक्साइड और ऑक्सीजन एक ही समय पर उपस्थित हो तो,अधिक बंधुता युक्त अणु, उपलब्ध ग्राही बंधन स्थल पर बंधित होंगे | इस प्रकार कार्बन मोनोऑक्साइड, हीमोग्लोबिन से बंधने के लिए ऑक्सीजन के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है, जिसके परिणामस्वरूप कार्बन मोनोऑक्साइड विषाक्तता उत्पन्न हो सकती है।
हीमोग्लोबिन लौह युक्त ऑक्सीजन-परिवहन धात्वीय प्रोटीन (मेटलप्रोटीन) है जो कशेरुकाओं की लाल रक्त कोशिकाओं और कुछ अकशेरुकाओ के ऊतकों में होता है। रक्त में हीमोग्लोबिन फेफड़ों या क्लोमों (गिलों) से ऑक्सीजन को शरीर के बाकी भागों में परिवहन करता है (अर्थात् ऊतक) जहां यह कोशिका के उपयोग के लिए ऑक्सीजन मुक्त करता है।
प्रकाश संश्लेषण और कोशिकीय श्वसन पूरक प्रक्रियाएँ हैं क्योंकि इनमें जल, ऊर्जा, कार्बन-डाईऑक्साइड, ऑक्सीजन और ग्लूकोस के समान तत्व शामिल होते हैं | लेकिन प्रत्येक प्रक्रिया अन्य से विपरीत होती है| अभिकारक और उत्पाद भी विपरीत होते हैं |
कीटों में श्वसन तंत्र को श्वसन नलिका तंत्र कहते हैं | इसमें वायु से भरी नलिकाओं में सीधे वातावरण से ऑक्सीजन का विसरण होता है |
गैसों के मिश्रण में प्रत्येक गैस की दाब में भागीदारी को आंशिक दाब कहते हैं और इसे ऑक्सीजन के लिए pO2 द्वारा दर्शाते हैं |हीमोग्लोबीन के साथ ऑक्सीजन का बंधन प्राथमिक तौर पर O2 के आंशिक दाब से सम्बंधित है | ऑक्सीजन की सांद्रता में वृद्धि हीमोग्लोबीन की बंधन क्षमता को बढ़ाती है|
रक्त और गैसीय वातावरण के बीच, मुख्यतः दाब/सांद्रता प्रवणता के आधार पर फेफड़ो के कूपीय तंत्र में, ऑक्सीजन और कार्बन डाईऑक्साइड के अणुओं का सरल विसरण द्वारा निष्क्रिय विनियम होता है|
अंतः श्वसन तब प्रारंभ हो सकता है जब फेफड़ों का दाब ( आंतर फुफ्फुसीय दाब) वायुमंडलीय दाब से कम हो | अंतःश्वसन डायाफ्राम के संकुचन के प्रारंभ से ही शुरू हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप बॉयल नियम के अनुसार आंतर फुफ्फुसीय सतह का विस्तार होता है और सापेक्ष दाब में वृद्धि होती है | वायुमंडलीय और वायु कूपिका दाब के बीच अंतर के कारण सापेक्ष दाब वायु प्रवाह उत्पन्न करता है |
सामान्य श्वसन के दौरान अंतःश्वसन या निःश्वसन का आयतन ज्वारीय आयतन होता है| यह लगभग 500मिली होता है, जो कि एक न्यूनतम मान है | इसमें आईआरवी(IRV) औसतन 2500-3000 मिली है | ERV औसतन 1000-1100 मिली है | वीसी (VC) में ERV, IRV और TV सम्मिलित हैं |
O2 का आंशिक दाब 104 mm Hg होता है जब यह वायु कूपिका में उपस्थित हो|
वायुमंडलीय वायु में ऑक्सीजन का आंशिक दाब 159 mm Hg होता है और वायु कूपिका में यह 104 mm Hg होता है वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड का आंशिक दाब 0.3 mm Hg होता है और वायु कूपिका में यह 40 mm Hg होता है |
निगलने के दौरान, कंठच्छद कंठद्वार को आवरित करता है, जिससे भोजन श्वासनली या ट्रेकिआ में प्रवेश नहीं करता है।
जैव क्षमता वायु का अधिकतम आयतन है जो एक व्यक्ति अधिकतम अंतः श्वसन के पश्चात बाहर छोड़ सकता है |
ऑक्सीजन तनाव एक द्रव में विलीन ऑक्सीजन अणुओं का आंशिक दबाव होता है, जैसे रक्त प्लाज्मा।
अवायवीय श्वसन ऑक्सीजन के उपयोग के बिना कोशिकीय श्वसन के माध्यम से ऊर्जा उत्पन्न करने की प्रक्रिया है |
व्यायाम के दौरान या उसके बाद या जब शरीर में ऑक्सीजन (हाइपोक्सिया) की कमी होती है, उदाहरण के लिए उच्च ऊंचाई या एनीमिया के परिणामस्वरूप ऑक्सीजन मांग को पूरा करने के लिए गहरा श्वासोच्छ्वास ही अतिश्वासन (हाईपरनिआ) है |
B. जीवद्रव्यकुंचन C. विसरण D. समपरासारी परासरण और कोशिका भित्ति की शक्ति के कारण, पादप कोशिकाओं में स्फीति दाब का निर्माण होता है। पादप कोशिकाओं में स्फीति दाब का नियमन कोशिका वृद्धि और जैव स्थिरता/सम अवस्था- दोनों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
B. कम फूलते हैं। C. फूलते नहीं हैं स्टार्च और सेलुलोज की तुलना में प्रोटीनों में अत्यंत उच्च अंतःशोषण क्षमता होती है। इसलिए, अंतःशोषण करने पर स्टार्च युक्त गेहूँ के बीजों की तुलना में प्रोटीन युक्त मटर के बीज अधिक फूलते हैं।
B. सक्रिय परिवहन C. निष्क्रिय परिवहन D. वाहक परिवहन कोशिकीय ऊर्जा का व्यय किए बिना, किसी झिल्ली में पदार्थों की गति निष्क्रिय परिवहन कहलातीहै। यह किसी सांद्रता प्रवणता के अनुसार संपन्न होती है।
B. वातरंध्रीय C. रंध्रीय D. त्वचीय पौधों में सबसे महत्वपूर्ण प्रकार का वाष्पोत्सर्जन रंध्रीय वाष्पोत्सर्जन है। यह रंध्रों के माध्यम से संपन्न होता है, जो पत्ती में और हरे तनों की बाह्य त्वचा पर उपस्थित सूक्ष्म छिद्र होते हैं।
अंतः परासरण के कारण पादप कोशिकाएँ स्फीत हो जाती हैं जबकि, बहिः परासरण के कारण पादप कोशिकाएँ ढीली हो जाती हैं।
B. केवल दाब प्रवणता पर निर्भर होती है। C. दाब प्रवणता और सांद्रता प्रवणता दोनों पर निर्भर होती है। D. दाब प्रवणता और सांद्रता प्रवणता दोनों पर निर्भर नहीं होती है। परासरण की दिशा और दर, दाब प्रवणता और सांद्रता प्रवणता दोनों पर निर्भर होती है।
जल खंड में तनाव के कारण, ज़ाईलम वाहिकाओं और वाहिनिकियों का नकारात्मक दाब विभव होता है।
B. अन्तः परिवहन C. परिवहन D. वाष्पीकरण अंतःशोषण विसरण का एक प्रकार है, जिसके द्वारा जल का अवशोषण ठोस या कोलाइड्स करते हैं, जिससे उनका आयतन अत्यधिक बढ़ जाता है।
B. हर्ट्ज़ C. मेगावाट D. वाट जल विभव को दाब के रूप में मापा जाता है और इसकी इकाई पास्कल होती है, जिसे Pa के रूप में प्रकट किया जाता है।
B. लगभग 3 लीटर C. लगभग 4 लीटर D. लगभग 5 लीटर स्थलीय पौधे प्रतिदिन अत्यधिक मात्रा में जल अवशोषित करते हैं, जो वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से वायु में निर्मुक्त हो जाता है। मक्के का एक परिपक्व पौधा एक दिन में लगभग 3 लीटर जल का अवशोषण करता है|
B. प्राप्य मृदाजल C. गुरुत्वीय जल D. केशिका जल आर्द्रता जल मृदा के कणों को बांधे रखता है और पौधों के लिए उपलब्ध नहीं होता।
B. 10 bars C. .10 bars D. 1 bars जल विभव को दाब के रूप में मापा जाता है और इसकी इकाई पास्कल होती है, जिसे Pa के रूप में प्रकट किया जाता है। 1 मेगा पास्कल = 10 bars होती है।
दाब विभव साई p (Ψp) के द्वारा प्रकट किया जाता है। यह स्फीति दाब के कारण होता है।
दाब में वृद्धि से जल विभव बढ़ जाता है। जल विभव को ग्रीक चिह्न Psi (ψ) द्वारा दर्शाया जाता है। सक्रिय परिवहन में सांद्रता प्रवणता के विपरीत अणुओं को खींचने के लिए ऊर्जा का उपयोग होता है । जीवद्रव्यकुंचन जल की गति के प्रति पादप कोशिकाओं या ऊतकों की प्रतिक्रिया है, जो आस-पास के विलयन पर निर्भर होती है। एक कोशिका का जल विभव विलेय और दाब विभव दोनों द्वारा प्रभावित होता है। उनके बीच संबंध निम्नानुसार है: Ψw = Ψp + Ψs पोरिन प्लास्टिड्स, माइटोकॉन्ड्रिया और कुछ जीवाणुओं की बाह्य झिल्ली में विशाल छिद्रों का निर्माण करने वाले प्रोटीन हैं जो, छोटे प्रोटीनों के आकार तक के अणुओं को पारित होने देते हैं। बिन्दुस्राव जल रंध्रों के माध्यम से संपन्न होता है। फ्लोएम नलियाँ– फ्लोएम नलियाँ शर्करा और अन्य ‘भोजनों’ को ऊपर और नीचे दोनों दिशाओं में ले जाती हैं। जीवों की जनन कोशिकाओं में कुछ जीवों में केन्द्रक के विभाजन के पश्चात कोशिकाद्रव्य का विभाजन नहीं होता| इसके परिणामस्वरुप बहुकेन्द्रकी स्थिति बनती है जिससे संकोशिका अर्थात सिन्सीटियम का निर्माण होता है। जैसे कि नारियल के तरल भ्रूणपोष में| अन्तरावस्था B. अंत्यावस्था C. संश्लेषण प्रावस्था D. एम प्रावस्था समसूत्री विभाजन को निम्न चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है: पूर्वावस्था अर्थात प्रोफेज़ मध्यावस्था अर्थात मेटाफ़ेज़ पश्चावस्था अर्थात एनाफेज तथा अंत्यावस्था अर्थात टीलोफ़ेज़ कोशिका विभाजन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोशिका दो या दो से अधिक कोशिकाओं में विभाजित होती है| कोशिका विभाजन मुखयतः दो प्रकार का होता है- समसूत्री विभाजन तथा अर्द्धसूत्री विभाजन| समसूत्री विभाजन को चार अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है: 1) पूर्वावस्था अर्थात प्रोफेज़ 2) मध्यावस्था अर्थात मेटाफ़ेज़ 3) पश्चावस्था अर्थात एनाफेज तथा 4) अंत्यावस्था अर्थात टीलोफ़ेज़ समसूत्री विभाजन के परिणामस्वरुप दो आनुवांशिक रूप से समान संतति कोशिकाओं का निर्माण होता है| कोशिका विभाजन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोशिका दो या दो से अधिक कोशिकाओं में विभाजित होती है|SOLUTION
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मेड्यूला ओबलोंगाटा के विशेष तंत्रिका केंद्र स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (ANS) के द्वारा हृदय की क्रियाओं को संयमित कर सकता है|
अनुकम्पीय तंत्रिकाओं से प्राप्त तन्त्रिय आवेग हृदय संपदन को तीव्र करते हैं, निलय संकुचन को सुदृढ बनाते हैं अतः हृद निकास बढ़ता है|
अधिवृक्क अंतस्था (एड्रिनल मेडूला) के हार्मोन (एड्रिनलीन और नॉरएड्रिनलीन) भी ह्रदय क्रियाविधि को नियंत्रित करते हैं|
क) एकल परिसंचरण
ख) अपूर्ण द्विसंचरण
ग) द्विसंचरण
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