हमारे शरीर में समसूत्री विभाजन कोशिका के प्रतिस्थापन में सहायता करता है क्योंकि मृत कोशिका निरन्तर नयी कोशिकाओं द्वारा प्रतिस्थापित की जाती हैं
कोशिका विभाजन के अंतर्गत संश्लेषण प्रावस्था अन्तरावस्था की एक प्रावस्था होती है| जिसके दौरान डी
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समसूत्री विभाजन |
अर्द्धसूत्री विभाजन |
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एक कोशिका द्वारा दो संतति कोशिकाओं का उत्पादन होता है |
एक कोशिका द्वारा चार संतति कोशिकाओं का उत्पादन होता है |
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संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका के समान होती है| |
संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका के आधी होती है| |
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यह कायिक कोशिका में संपन्न होता है |
यह जनन कोशिका में संपन्न होता है |
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विनिमय की प्रक्रिया नहीं होती| |
विनिमय की प्रक्रिया होती है| |
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इसके अंतर्गत आनुवांशिक पदार्थ का आदान-प्रदान नहीं होता |
इसके अंतर्गत आनुवांशिक पदार्थ का आदान-प्रदान होता है |
प्राणी कोशिका: जीवद्रव्य कला में एक खांच बनने से कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है| खांच के गहरा होने से कोशिकाद्रव्य दो नयी संतति कोशिकाओं में बंट जाता है|

प्राणी कोशिका में कोशिकाद्रव्य विभाजन द्वारा संतति कोशिका का निर्माण
पादप कोशिका: पादपों में एक कठोर कोशिका भित्ति होती है, जीवकला में खांच का निर्माण नहीं होता; हालांकि एक कोशिका पट्टिका का निर्माण कोशिका के केंद्र से प्रारम्भ हो जाता है जो इसे दो संतति कोशिकाओं में विभाजित करता है|

पादप कोशिका में कोशिकाद्रव्य विभाजन द्वारा संतति कोशिका का निर्माण
चक्र की शांत अवस्था
प्रथम पूर्वावस्था सबसे लम्बी होती है जो कि आगे पांच प्रावस्थाओं में विभेदित होती है:
(क) तनुपट्ट (लिप्टोटीन): गुणसूत्र धीर-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं| गुणसूत्रों का आपस में युग्मन प्रारम्भ हो जाता है|
(ख) युग्मपट्ट (जाइगोटीन): समजात गुणसूत्र एकसाथ आने लगते हैं| गुणसूत्र सूत्रयुग्मन के द्वारा सिनेप्टोनिमल सम्मिश्र का निर्माण होता है| एक जोड़ी सूत्रयुग्मित समजात गुणसूत्रों द्वारा चतुष्ठक का निर्माण होता है|
(ग) स्थूलपट्ट(पैकाईटीन): इसके दौरान, पुनर्योजन ग्रंथिकाएँ दिखाई देने लगती हैं, जिन पर समजात गुणसूत्रों के असंतति अर्द्धगुणसूत्रों के बीच विनयमन होता है|
(घ) द्विपट्ट (डिप्लोटीन): युगली के समजात गुणसूत्र विनिमय बिन्दु के अतिरिक्त एक-दुसरे से पृथक होने लगते हैं| विनिमय बिन्दु पर ‘X’ आकर की एक संरचना का निर्माण होता है जिसे काएज्मेटा कहते हैं|
(ड) पारगतिक्रम (डायाकाइनेसिस ): काएज्मेटा का अंत होने लगता है| गुणसूत्र पूर्णतया संघनित हो जाते हैं व तर्कुतंतु एकत्रित होकर समजात
गुणसूत्रों को अलग करने में सहयोग प्रदान करते हैं। अंत तक केंद्रिका अदृश्य हो जाती है और केन्द्रक-आवरण झिल्ली भी विघटित हो जाता है।
A. निम्न सांद्रता से उच्च सांद्रता तक गति करते हैं गति करते हैं
B. उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता तक गति करते हैं गति करते हैं
C. अर्ध पारगम्य झिल्लिका के माध्यम से उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता तक गति करते हैं एक अर्ध पारगम्य झिल्लिका के माध्यम से जल के अणुओं की उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता की ओर गति परासरण कहलाती है।
विलयन के अणुओं की निम्न सांद्रता से उच्च सांद्रता की ओर गति विसरण कहलाती है।
B. मेयर C. अर्नेस्ट मंच D. अर्नेस्ट हेकल सामूहिक प्रवाह परिकल्पना का सुझाव सन् 1930 में अर्नेस्ट मंच ने प्रस्तुत किया था।
इसके अनुसार ‘खाद्य पदार्थों का परिवहन सांद्रता प्रवणता के साथ फ्लोएम के माध्यम से संपन्न होता है।’
B. क्लोरोफ़िल C. जल D. ऊर्जा यदि जल की हानि की पूर्ति मृदा से प्रतिस्थापन द्वारा नहीं हो पाती है, तो पौधे वाष्पोत्सर्जन शीघ्रता पूर्वक निरंतर नहीं कर सकते हैं।
B. पृष्ठ तनाव C. सासंजन D. वाष्पोत्सर्जन सासंजन: जल के अणुओं के बीच पारस्परिक आकर्षण। आसंजन : जल के अणुओं का ध्रुवीय सतहों की ओर आकर्षण। पृष्ठ तनाव : गैसीय अवस्था की अपेक्षा द्रव अवस्था में जल के अणुओं के बीच एक-दूसरे के प्रति अधिक आकर्षण | वाष्पोत्सर्जन: पौधे की सतह से जल का वाष्पीकरण |
B. संवहनी ऊतक C. एपिडर्मल ऊतक D. भरण ऊतक पौधों में लंबी दूरी तक परिवहन करने के लिए उत्तरदायी ऊतक संवहनी ऊतक हैं, जो दो प्रकार के होते हैं: जल के लिए ज़ाईलम और भोजन के लिए फ्लोएम।
B. तना द्वारा C. मूल द्वारा D. पत्तियों द्वारा पौधे अपने मूल रोमों के माध्यम से मृदा से जल का अवशोषण करते हैं। ये मृदा से जल का अवशोषण करने के लिए सतह के क्षेत्र में वृद्धि करते हैं।
B. अतिपरासारी C. समपरासारी D. अपरासारी जिस विलयन की परासरण सांद्रता कोशिका द्रव से कम होती है, वह अल्प परासारी विलयन कहलाता है। विलयन जिसकी परासरण सांद्रता कोशिका द्रव से अधिक होती है, अतिपरासारी तथा विलयन जिसकी परासरण सांद्रता कोशिका द्रव की परासरण सांद्रता के समान होती है, समपरासारी कहलाता है।
B. B. C. AB. D. O. रक्त समूह AB वाले व्यक्ति में उसकी लाल रुधिर कणिकाओं की सतह पर A और B दोनों प्रतिजन उपस्थित होते हैं और उनके रक्त सीरम में प्रतिजन A या B के विरुद्ध कोई भी प्रतिरक्षी नहीं होता| इसलिए रक्त समूह AB वाला व्यक्ति किसी भी समूह से रक्त ग्रहण कर सकता है किन्तु रक्तदान रक्त समूह AB वाले व्यक्ति को ही कर सकता है|
दायें अलिंद में स्थित फोसा ओवैलिस फोरामेन ओवैलिस का भ्रूणीय अवशेष है, जो सामान्यतः जन्म के तुरंत बाद बंद हो जाता है|
हाइपोफिसिल निवाहिका तंत्र रुधिर वाहिका का तंत्र है जो पश्च पियूष ग्रंथि और हाइपोथलमस को जोड़ता है| यह दोनों संरचनाओं के मध्य अन्तःस्रावी संचार को नियमित करता है|
B. यकृत परिसंचरण C. वृक्कीय परिसंचरण D. लसिका परिसंचरण निवाहिका परिसंचरण क्रमबद्ध परिसंचरण का एक भाग है जिसमें रक्त हृदय में लौटने से पहले एक बड़ी वाहिका के माध्यम एक प्रवाह केशिका से दूसरी प्रवाह केशिका में अपवाहित होता है |
B. श्वासपटलीय धमनी C. पुच्छ शूकधमनी D. निम्न धमनी निम्न श्वास पटलीय धमनियाँ दो छोटी वाहिकाएँ होती हैं,जो डायफ्राम को रक्त आपूर्ति करती हैं लेकिन उनकी उत्पत्ति में बहुत विभिन्नता होती है |
B. डायाफ्राम C. ह्यूमेरस D. जंघा स्पंदन को किसी भी जगह स्पर्श द्वारा महसूस किया सकता है जो एक धमनी को अस्थि के विरुद्ध संपीड़ित करने की अनुमति देता है। जैसे कलाई पर (रेडियल धमनी), गर्दन पर (कैरोटीड धमनी)|
“हिज के बंडल” को “ए.वी. बंडल” या “अलिंद निलय बंडल” भी कहते है, विदधुतीय प्रवाह के लिए विशेष तौर पर हृदय मांसपेशियों की कोशिकाओं का संग्रह है जो ए.वी. पर्व से स्तब्कीय शाखाओं के शीर्ष तक विद्युत् आवेगों को संचारित करता है|
द्विवलनी कपाट हृदय के चार कपाटों में से एक है| यह कपाट बाएँ अलिंद और बाएँ निलय के मध्य स्थित होता है| यह रक्त के प्रवाह को बाँए अलिंद से बाँए निलय में एक ही दिशा में निश्चित करता है|
कार्डिए तेंडीनेइ अन्कुरक मांसपेशियों के साथ अनुशिथिलन के दौरान हृदय वाल्व (जैसे त्रिवलनी कपाट और द्विवलनी कपाट) बंद करने में सहायता करता है ,जो निलय से अलिंद में रक्त के विपरीत प्रवाह को रोकता है|
B. एल.एस.डी. C. गांजा D. एपिनेफ्रीन एपिनेफ्रीन अधिवृक्क ग्रंथि द्वारा स्रावित एक हार्मोन है, जो हृदय स्पंदन को तीव्र कर देता है और रक्त वाहिकाओ को संकुचित करता है|
पुरकिंजे तंतु ठीक अंतहृर्द के नीचे हृदय की आंतरिक निलय भित्ति में स्थित होते हैं|
B. AB. C. D. B. रक्त समूह B वाले व्यक्ति में लाल रुधिर कणिकाओं की सतह पर प्रतिजन B और रुधिर सीरम में प्रतिरक्षी A के स्थान पर IgM प्रतिरक्षी होते हैं| इसलिए रक्त समूह B वाले व्यक्ति केवल रक्त समूह B या O वाले व्यक्ति से ही रक्त ग्रहण कर सकते हैं (B अधिक उचित है) और रक्त समूह B या AB वाले व्यक्ति को रक्तदान कर सकते हैं|
B. प्रिकैवल्स C. उच्च महाशिरा और निम्न महाशिरा D. शिराकोटर उच्च महाशिरा एक लम्बी शिरा है जो शरीर के अर्ध उर्ध्व भाग से ऑक्सीजन रहित रक्त को हृदय के दाएँ अलिंद तक ले जाती है| निम्न महाशिरा (या आईवीसी) एक लम्बी शिरा है जो ऑक्सीजन रहित रक्त को शरीर के निचले भाग से हृदय के बाएँ अलिंद तक ले जाती है|
इलेक्ट्रो-एन्सेफ्लोग्राम और विद्युत् हृद लेख| रक्त और लसिका| सीरम भूरे रंग का द्रव है जो रक्त का थक्का बनते समय बाहर निकलता है अर्थात यह फाइब्रिनोजन को हटाकर प्लाज्मा है| खुला और बंद परिसंचरण तंत्र -जब हृदय द्वारा रक्त को रक्त वाहिकाओं में पंप किया जाता है जो कि रक्त स्थान (कोटरों ) या देहगुहा (साइनस) में खुलता है, तो यह खुला परिसंचरण तंत्र कहलता है, जैसे- आर्थोपोंड्स और मोलस्क में| - जब हृदय द्वारा रक्त का प्रवाह एक दूसरे से जुडी रक्त वाहिनियों के जाल में होता है तो यह बंद परिसंचरण तंत्र कहलाता है, जैसे- ऐनेलिडा और कशेरुकी में| Rh सहित (Rh+) व्यक्ति की लाल रुधिर कणिकाओं (RBC) में Rh प्रतिजन उपस्थित होता है और Rh हीन (Rh-) व्यक्ति की लाल रुधिर कणिकाओं (RBC) में Rh प्रतिजन अनुपस्थित होता है | दो हृदय ध्वनियाँ लब और डब हैं| क) पेशीजनक हृदय और तंत्रिकाजनक हृदय यदि हृदय में पेशीय तंतु में हृदय क्रिया उत्पन्न होती है और हृदय क्रियाओं को पेशीय (नोडल) ऊतकों की मांसपेशियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है, तो हृदय को पेशीजनक (मायोजेनिक) हृदय कहते हैं| यदि हृदय में क्रिया पेशीय तंतु द्वारा उत्पन्न नहीं होती है, लेकिन तंत्रिका उद्दिपन्न के कारण उत्पन्न होती है, तो हृदय को तंत्रीय हृदय (न्यूरोजेनिक हार्ट) कहते हैं । ख) प्रकुंचन और अनुशिथिलन हृदय प्रकोष्ठों का सिकुड़ना प्रकुंचन कहलाता है | हृदय प्रकोष्ठों का फैलना अनुशिथिलन कहलाता है | ऑक्सीजन रहित रक्त का दाएँ निलय से फेफड़ो तक प्रवाह और ऑक्सीजन सहित रक्त का फेफड़ो से बाएँ अलिंद में प्रवाह फुप्फुसीय परिसंचरण कहलाता है| ऑक्सीजन सहित रक्त का बाएँ निलय से शरीर के सभी अंगो (फेफड़ो को छोड़कर) में प्रवाह और ऑक्सीजन रहित रक्त का सभी अंगो से दाएँ अलिंद में प्रवाह दैहिक परिसंचरण कहलाता है| B. x2 – 2 C. x2 D. x2 + 1
B. –1,2 C. 1,2 D. –2,–1
B. g एक फलन है और f भी एक फलन है C. g एक फलन है और f एक फलन नहीं है D. f एक फलन नहीं है और g भी एक फलन नहीं है (i) f(x) = x2 तथा f(x) = 3x दिए गए अंतरालों में परिभाषित है|
x = 3 के लिए,
f(x) = x2 का प्रयोग करके f(3) = 32 = 9 और
f(x) = 3x का प्रयोग करके f(3)= 3×3 = 9 है
अतः f, x = 3 पर परिभाषित है, अतः, f फलन है।
(ii) g (x) = x2 अंतराल 0 ≤x < 2 में परिभाषित है|
g (x) = x2 का प्रयोग करके g(2) = 22 = 4
g(x) = 3x अंतराल 2 ≤ x ≤ 10 में परिभाषित है
g(x) = 3x का प्रयोग करके g(2) = 3 × 2 = 6
लेकिन x = 2 पर, g पर संबंध के दो मान हैं।
संबंध g फलन नहीं है।
a) चूँकि क्रमित युग्म समान हैं, अतः a) (f – g)x = f(x) – g(x) B. 4π रेडियन C. 6π रेडियन D. 12π रेडियन एक सेकंड में, एक पहिया 2 बार घूर्णन करता है और एक घूर्णन में यह 2π रेडियन से होते हुए मुड़ता है। B. π C. π /2 D. π /4 यदि t लघुत्तम धनात्मक वास्तविक संख्या इस प्रकार है कि सभी X के लिए f(x + t) = f(x), तो t को f(x) की अवधि कहा जाता है। हम जानते हैं कि 2 π लघुत्तम धनात्मक वास्तविक संख्या है, जिसके लिए sin (2 π + t) = sin t
B. π/9 रेडियन C. 61 π /540 रेडियन D. 3660/π रेडियन 20°20’ = (20+1/3)° B. C. D. [1, - 1]
B. 1 C. 2 D. ≥4
B. π C. π /2 D. π /4 यदि t लघुत्तम धनात्मक वास्तविक संख्या (smallest positive real number) इस प्रकार से है कि सभी x के लिए B. 2 : 1 C. 1 : 4 D. 4 : 6
तंत्रिकाक्ष या तंत्रीय तंतुओं के चारों ओर माइलीन आवरण में सतत अंतराल पर रेनवीयर के नोड स्थित होते हैं| लगभग एक माइक्रो मीटर लम्बे ये अन्तराल तंत्रिकाक्ष झिल्ली को अतिरिक्त कोशिकीय द्रव की ओर खोलते हैं (माइलीन आवरण तंत्रिकाक्ष पर वसा ऊतकों की परत होती है)|
B. बेस्टिब्लुयर संयंत्र C. आर्गन ऑफ कॉर्टाई D. अर्द्धचंद्राकार नलिकाएँ आर्गन ऑफ कॉर्टाई आधार झिल्ली में स्थित होता है जिसमें रोम कोशिकाएँ श्रवण ग्राही के रूप में कार्य करती हैं| रोम कोशिकाएँ आर्गन ऑफ कॉर्टाई की आतंरिक सतह पर श्रंखला में पाई जाती हैं|
B. कायिक तंत्रिका तंत्र C. केंद्रीय तंत्रिका तंत्र D. अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र स्वायत्त तंत्रिका तंत्र आवेगों को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से चिकनी पेशियों तक ले जाता है | केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में मस्तिष्क और मेरुरज्जु सम्मिलित होते हैं जो सूचनाओं के संचारण और नियंत्रण का केंद्र है, जबकि अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र स्वायत्त तंत्रिका तंत्र का भाग है। इसलिए, यह कायिक तंत्र है जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से कंकाल की पेशियों में आवेगों को प्रसारित करता है।
अधश्चेतक; मस्तिष्क का वह भाग है जो शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है| रेनवीयर के नोड में माइलिन आवरण अनुपस्थित होता है| अधश्चेतक के साथ मिलकर लिंबिक तंत्र मनोभावों को नियंत्रित करता है | यूस्टेकियन नलिका मध्य कर्ण को श्वास नलिका से जोड़ती है; यह मध्य कर्ण से फेरिंक्स तक जाती है| इसका उद्देश्य मध्य कर्ण के दाब को वातावरण के दाब के बराबर करना होता है| यूस्टेकियन नलिका का कार्य मध्य कर्ण को सुरक्षित, वायवीय और शुष्क रखना है। वयस्क में यूस्टेकियन नलिका दो माँसपेशियों में टेंसर तालु और लेवेटर (उन्न्मनी) तालु द्वारा खोला जाता है। तंत्रिका तंतु मस्तिष्क को शरीर के बाकी भागों से जोड़ते हुए मस्तिष्क स्तम्भ से गुजरते हुए शरीर के दूसरे तरफ चले जाते हैं| जब वे मेड्यूला (मस्तिष्क तंत्र का हिस्सा) में बढ़ते हैं तो संवेदी तंतु से विनियमित हो जाते हैं। चालक तंतु मस्तिष्क के दाहिनी ओर से आते हैं और कशेरुकी स्तर तक पहुँचकर अपने पृष्ठीय आधार गैंग्लिया तक पहुँचने के लिए विनियमित हो जाते हैं| तंत्रिका आवेगों का एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक संचरण सिनेप्सिस द्वारा होता है| सिनेप्सिस तंत्रिका संधि है जिसका निर्माण पूर्व-सिनैप्टिक की तंत्रिकाक्ष और पश्च- सिनैप्टिक की दुम्राक्ष्य या कोशिका भित्ति से होता है| सिनेप्स के आधार पर तंत्रीय आवेगों का संचलन दो प्रकार से होता है : विद्युत् सिनेप्स पर संचलन : तंत्रिका आवेग सीधे एक विद्युत सिनेप्स के माध्यम से प्रेषित किया जाता है, यानी, एक धुरी के साथ आवेग की चाल के समान। रासायनिक सिनेप्स पर संचरण: रासायनिक सिनेप्स पर तंत्रिका आवेग सिनेप्टिक पुटिकायों में निहित न्यूरोट्रांसमीटर नामक विशेष रसायनों द्वारा संचरित किया जाता है। जब छोर पर आवेग आता है, तो सिनेप्टिकपुटिकाएं झिल्ली की ओर बढ़ने के लिए उद्दीपित हो जाती हैं औरझिल्ली के साथ न्यूरोट्स के बीच के अंतर में न्यूरोट्रांसमीटर को मुक्त कर देती हैं। ये न्यूरोट्रांसमीटर पश्च-सिनैप्टिक न्यूरॉन की झिल्ली पर स्थित अपने ग्राहियों से संयोजित होते हैं। इससे पश्च-सिनैप्टिक न्यूरॉन में विकिरण के कारण पश्च -सिनैप्टिक न्यूरॉन में आयन चैनल खुल जाते हैं। इसलिए आवेग संचरित हो जाता है। एक विद्युत सिनेप्स पूर्व-और पश्च सिनेप्सटिक कोशिकाओं, के मध्य संकरा अंतराल स्थापित करती है, जिसे अन्तरालीय संधि के रूप में जाना जाता है। अंतराल संधियों पर, कोशिकाएँ एक-दूसरे के लगभग 3.5 nm समीप होती हैं, जो 20-40 nm दूरी की तुलना में बहुत छोटी दूरी है और वे कोशिकाओं को रासायनिक स्नेप्सिस से अलग करती है। रासायनिक स्नेप्सिस के विपरीत, विद्युत स्नेप्सिस में पश्च सिनेप्सटिक विभव रासायनिक ट्रांसमीटर द्वारा आयन चैनलों के खुलने के कारण नहीं होता, अपितु दोनों न्यूरॉन्स के बीच सीधे विद्युत युग्मन द्वारा होता है | अतः विद्युतसिनेप्सिस में तंत्रिका आवेग तीव्रता से प्रसारित होता है, जबकि रासायनिक सिनेप्सिस में लगभग 1 मिलीसेकंड का समय लगता है| मस्तिष्क तंत्रिका तंत्र का केंद्रीय नियंत्रण अंग है। मानव मस्तिष्क खोपड़ी के अंदर अच्छी तरह से सुरक्षित रहता है। यह तीन मेनिंजेज , ड्यूरामैटर (बाहरी परत), एरेक्नॉइड (मध्य परत) और पायामैटर (सबसे निचला) द्वारा घिरा रहता है। मस्तिष्क को तीन भागो में विभक्त किया जा सकता है: अ) अग्रमस्तिष्क : इसमें सेरेब्रम, थैलेमस और हाइपोथैलेमस होते हैं। • सेरेब्रम मस्तिष्क का सबसे बड़ा हिस्सा है। यह दो गोलार्द्धों में विभाजित होता है जो कि तंत्रिका तंतु की पोटली से जुड़े होते हैं जिन्हें कॉर्पस कॉलोसम कहा जाता है। सेरेब्रल गोलार्धों की सतह को सेरेब्रल कॉर्टेक्स कहा जाता है, जो भूरे पदार्थ से बना होता है और इसे फोल्ड में डाल दिया जाता है। सेरेब्रल कॉर्टेक्स में मोटर क्षेत्र, संवेदी क्षेत्र और सहभागी क्षेत्र हैं। • थैलेमस मस्तिष्क गोलार्धों द्वारा पृष्ठीय रूप से अवरित है। • हाइपोथैलेमस थैलेमस के आधार पर स्थित है। ब) मध्य मस्तिष्क : यह अग्रमस्तिष्क और पश्च मस्तिष्क के बीच स्थित होता है। मध्य मस्तिष्क की ऊपरी सतह में तंतु होते हैं जो अग्रमस्तिष्क और पश्च मस्तिष्क को जोड़ते हैं। इसकी पृष्ठीय सतह में चार उभार होते है जिसे कॉर्पोरा क्वाड्रिजेमीन कहते है। स) पश्च मस्तिष्क : इसमें अनुमस्तिष्क (सेरिबैलम), पोन्स और मध्यांश (मेडुला) शामिल हैं। • सेरिबैलम(अनुमस्तिष्क ) सेरिब्रम के पश्च भाग से नीचे है और इसमें परत है। • पोन्स मध्यांश (मेडुला)से ऊपर है और मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ता है। • मध्यांश मस्तिष्क का सबसे निचला भाग है जो मस्तिष्क को रीढ़ की हड्डी से जोड़ता है। एक तंत्रिका झिल्ली में चयनात्मक पारगम्य आयन चैनल होते हैं। जब एक तंत्रिका कोशिका किसी भी आवेग का संचरण नहीं करती जैसे विराम अवस्था में , तो धुरी की झिल्ली पोटैशियम आयनों (K+) के लिए अधिक पारगम्य होती है और कोशिका और सोडियम आयनों (Na +) के अंदर उपस्थित ऋण आवेशित प्रोटीन के लिए लगभग अपारगम्य है। यह आयनिक प्रवणता को कोशिका में 2 K+ और 3 Na + बाहर की ओर सक्रिय संचरण द्वारा बनाए रखता है। इसके कारण, झिल्ली के अंदर शुद्ध धन आवेश और झिल्ली के अंदर शुद्ध ऋण आवेश होता है। इस चरण में संभावित अंतर को विराम विभव कहा जाता है। तंत्रिका आवेग की उत्पत्ति : विध्रुवीय अवस्था: एक उद्दीपन के रूप में अक्ष पर किसी भी बिंदु A पर , तंत्रिका कोशिका की झिल्ली Na+ के लिए पारगम्य हो जाती है और Na + आयन तेजी से झिल्ली की ओर जाते हैं। इससे उस बिंदु पर झिल्ली की ध्रुवीयता विपरीत हो जाती है, यानी, आंतरिक पक्ष धनात्मक हो जाता है और बाहरी पक्ष ऋणात्मक हो जाता है। इस चरण में झिल्ली को विध्रुविय और विभव अंतर को सक्रिय विभव या तंत्रिका आवेग कहा जाता है। तंत्रिका आवेग का संचरण: बिंदु A से पहले बिंदुओं पर, यानी, B पर झिल्ली विभव विराम पर है। एक तरफ झिल्ली विभव में परिवर्तन झिल्ली की आतंरिक सतह पर A स्थल से B स्थल की ओर और B से A झिल्ली के बाहर की ओर प्रवाह को निकट आसन्न सतह पर संचलन होता है। इस प्रकार स्थल B पर झिल्ली विध्रुवित हो जाती है और A पर उत्पन्न आवेग B तक पहुंच जाता है। तंत्रिकाक्ष की लम्बाई के समांतर क्रम का पुनरावर्तन होता है और आवेग का संचरण होता है B. (ii) और (iii) C. (i) और (iv) D. (i) और (iii) B. C. D. चूँकि रिक्त समुच्चय (empty set) प्रत्येक समुच्चय का एक उपसमुच्चय (subset) है।
B. {x ∈ R : -1< x< 3} C. {x ∈ R : -4< x< 7} D. {x ∈ R : -4< x< 3} B. {2, 4, 8, 10, 12} C. {3, 8, 10, 12} D. {2, 8, 10} B. {0, 1, 2} C. {-1, 0, 1} D. {1, 2}. B. {2, 4, 6} C. {2, 4, 6, 7} D. {1, 2, 3, 4, 5, 6, 7} B. 108 C. 86 D. 12 मैलपीगी नलिकाएँ कॉकरोच सहित अधिकांश कीटों में पायी जाने वाली उत्सर्जी संरचनाएँ होती हैं| मैलपीगी नलिकाएँ नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थो के उत्सर्जन और परासरण नियमन में सहायता करती हैं|
हाइपोथेलेमस, मस्तिष्क का एक भाग रक्त की उच्च संपरासारी सांद्रता का पता लगाता है। हाइपोथैलेमस पीयूष ग्रंथि को संदेश भेजता है जो एडीएच को स्रावित करता है| यह रक्त से वृक्क में पहुँचता है, जो अधिक जल को पुनःअवशोषित करता है, जिससे मूत्र की मात्रा कम और अधिक सांद्रित हो अर्थात अतिपरासारी अथवा उच्चपरासारी मूत्र।
B. हेनले का लूप C. दूरस्थ संवलित नलिका D. संग्रह नलिका संग्रह नलिका यूरिया के लिए पारगम्य होती है| यूरिया संग्रहित नलिका से अन्तराकाश में वापिस प्रवाहित होता है जो मध्यांशी अन्तराकाश में यूरिया के सांद्रता परासरण को नियमित करने में सहायता करता है|
परासरण नियमन वह प्रक्रिया है जो प्राणियों के शरीर में विलेय सांद्रता और तरल पदार्थो का नियमन करती है | वृक्कों द्वारा प्रति मिनट निस्यन्दित की गई रक्त की मात्रा को गुच्छीय निस्पंदन दर कहते हैं| एक स्वस्थ व्यक्ति में यह दर 125 मिली प्रति मिनट अर्थात 180 लीटर प्रति दिन होती है| वह तंत्रिका क्रियाविधि जो मूत्राशय से मूत्र उत्सर्जन करती है, मूत्रण प्रतिवर्त कहलाती है| नलिकाकार पुनरावशोषण की निम्न दो विधियाँ होती हैं : अ) सक्रिय अवशोषण: इसमें उर्जा का अवशोषण शामिल होता है, जैसे: ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, Na+, K+ और Ca++| ब) निष्क्रिय अवशोषण: इसमें किसी प्रकार की उर्जा का अवशोषण नहीं होता, किन्तु प्रवणता को बनाए रखा जाता है| जैसे, परासरण द्वारा जल का पुनरावशोषण, क्लोराइड आयनों का पुनरावशोषण| सान्निध्य मध्यांश वृक्क वल्कुटीय वृक्क वृक्काणुओं का 85% भाग बनाते हैं वृक्काणुओं का 15% भाग बनाते हैं | हेनले लूप बहुत छोटे होते हैं | हेनले लूप बहुत लम्बे होते हैं | यह मध्यांश में बहुत कम धँसे रहते है | यह मध्यांश में काफी गहराई तक धँसे रहते है | वासा रेक्टा उपस्थित या ह्रासित होता है| वासा रेक्टा हेनले लूप के समानांतर उपस्थित होता है| प्राणी उत्सर्जन की विधि उत्सर्जित पदार्थ छिपकली यूरिकाम्ल उत्सर्जन यूरिक अम्ल हाथी यूरिया उत्सर्जन यूरिया मछली अमोनियोत्सर्ग अमोनिया कॉकरोच यूरिकाम्ल उत्सर्जन यूरिक अम्ल वृक्क नलिका के विभिन्न भागों की अवशोषण क्षमता अलग-अलग होती है: अ) समीपस्थ संवालित नलिका अवशोषण में सर्वाधिक सक्रिय होती है| यह 99% जल और गुच्छीय निस्पंदन से अधिकांश ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, विटामिन-सी, Na+, K+ और Ca2+ का अवशोषण करती है | ब) हेनले लूप की अवरोही भुजा जल के लिए पारगम्य होती है, जबकि आरोही भुजा जल के लिए अपारगम्य होती है लेकिन विद्युत अपघट्य के लिए पारगम्य होती है| स) दूरस्थ संवालित नलिका और संग्रह नलिकाओ में Na+ और जल की पारगम्यता एल्डोस्टीरोन, एंटीडाइयूरेटिक हॉर्मोन और अलिन्दीय नेट्रीयेरेटिक पेप्टाइड हार्मोन द्वारा नियंत्रित होती है| इन प्रभावों के लिये ए.डी.एच. हार्मोन में असंतुलन उत्तरदायी होता है| उदकमेह के निम्न कारण होते हैं: (i) ए.डी.एच. के सामान्य संग्रह और पश्च पीयूष से इसके स्त्रावण का प्रभावित होना| (ii) ए.डी.एच. के निम्न स्तर के प्रति वृक्क का कोई प्रतिक्रिया देने में अक्षम होना| (iii) ए.डी.एच. हार्मोन की मूत्र को सांद्र करने की क्षमता का धीरे-धीरे कम होना| (i) गुच्छीय आसन्न (JG) उपकरण वृक्क के कार्यों में नियंत्रक की भूमिका निभाता है। इसमें मैक्यूला डेंसा कोशिकाएँ होती हैं जो दूरस्थ नलिका में Na + और Cl- सांद्रता के माध्यम से जीएफआर को समझ सकती हैं। रुधिर दाब में गिरावट के कारण जेजी कॉम्प्लेक्स सक्रिय होता है, जो कि रेनिन को स्रावित करता है जिस कारण एंजियोटेंसिनोजेन को एंजियोटेंसिन प्रथम में परिवर्तित किया जाता है और फिर एंजियोटेंसिन द्वितीय में परिवर्तित होता है। यह एल्डोस्टेरोन स्त्रवण के लिए अधिवृक्क वल्कुट को प्रेरित करता है, जो रक्त में Na+ और जल के पुनः अवशोषण को बढ़ाता है। इस प्रकार, जीएफआर में वृद्धि होती है। (ii) आन्तरिक उपकला में विशेष कोशिकाएँ होती हैं जिन्हें पॉडोसाइट्स या पाद कोशिकाएँ कहा जाता है, जिनमें अपशिष्ट पदार्थों के निस्यन्दन के लिए खांच छिद्र नामक सूक्ष्म छिद्र होते हैं। इन छिद्रों में से अपशिष्ट पदार्थों और जल का उत्सर्जन होता है, लेकिन ये छिद्र लाल रक्त कणिकाओं, श्वेत रक्त कणिकाओं , प्लेटलेट्स और प्लाज्मा प्रोटीन के निस्यन्दन को रोकते हैं। (iii) वृक्क द्वारा प्रति मिनट निस्यन्दन की मात्रा को गुच्छीय निस्यन्दन दर (जीएफआर) कहा जाता है। एक सामान्य वयस्क में जीएफआर 120 - 125 मिली/मिनट होता है। अपेक्षाकृत स्थिर गुच्छीय निस्यन्दन दर का रखरखाव महत्वपूर्ण है क्योंकि जल और विलेय का पुनःअवशोषण इस बात पर निर्भर करता है कि नलिकाओं के माध्यम से निस्यंद प्रवाह कितनी जल्दी होता है। (iv) गुच्छीय वृक्काणु में हेनले (प्रतिधार गुणक) के दो लूप से निस्यंद प्रवाह और वासा रेक्टा (प्रतिधार परिवर्तक) में रक्त के प्रवाह के मध्य सम्बन्ध को प्रतिधारा क्रियाविधि कहते हैं| (v) एंटीडाईयुरेटिक हार्मोन (एडीएच) के स्रवण से सांद्रित मूत्र का निर्माण होता है, जो संग्रह नलिकाओं को जल के लिए पारगम्य बनाता है और मूत्र से जल उद्ग्रहण को बढ़ा देता है। pH का विनियमन शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड/बाइकार्बोनेट बफरिंगतंत्र द्वारा नियंत्रित होता है, जिसमें तीन चरण होते हैं: CO2 + H2O ↔ H2CO3 ↔ HCO3- + H+ HOH ↔ OH- + H+ CO2 + OH- + H+ ↔ HCO3- + H+ वृक्क द्वारा अम्ल का उत्सर्जन उन प्रमुख कारकों में से एक है, जो इस तंत्र को प्रभावित करते हैं। मूत्र में हाइड्रोजन आयनों (अम्ल) का उत्सर्जन प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट की सांद्रता को बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी होता है। स्तनधारी मूत्र हल्का-सा अम्लीय होता है। इसका pH लगभग 6 होता है और इसमें कोई बाइकार्बोनेट नहीं होता है। हालांकि, प्रारंभिक गुच्छीय निस्यंद में उच्च बाइकार्बोनेट सांद्रता और निम्न हाइड्रोजन आयन सांद्रता होती है। इसलिए, मूत्र निर्माण की प्रक्रिया में, अम्ल को निस्यंद में समायोजित और बाइकार्बोनेट को निष्कासित होना चाहिए। इसलिए, हाइड्रोजन आयन का उत्सर्जन और बाइकार्बोनेट आयन की प्राप्ति दोनों महत्वपूर्ण क्रियाविधियाँ हैं, जिनके द्वारा वृक्क शरीर के pH को नियंत्रित करने में सहायता करते हैं। दो संधियों के संधिस्थल पर उपास्थियाँ कोमल कंकाल ऊतक होती हैं। ये दो अस्थियों के संधिस्थल पर उपस्थित होती हैं और मुख्य रूप से संधियों या जोड़ों की सुरक्षा करती हैं। इनमें कोंड्रोइटिन लवण उपस्थित होते हैं। अंसफलक B. अक्षक C. जानुफलक D. उरास्थि अंस मखेला में दो हड्डियाँ होती हैं: अक्षक और अंसफलक| प्रत्येक अक्षक लम्बी, पतली अस्थि होती है जिसमे दो वक्र पाए जाते हैं| इस अस्थि को साधारणतया हँसली कहते हैं| एक्टिन B. मायोसिन C. मायोफाइब्रिल D. सार्कोप्लाजमिक जालिका पेशी तंतु की एक विशेषता पेशीद्रव्य में समान्तर रूप से व्यवस्थित अनेक तंतुओं की उपस्थिति होती है जिसे मायोफिल्मेंट्स या मायोफाइब्रिल कहा जाता है, जिसमें एक्टिन और मायोसिन प्रोटीन होते हैं। मेरोमायसिन से B. ट्रोपोमायसिन से C. ट्रोपोनिन से D. मायोग्लोबिन से प्रत्येक मोटा मायोसिन तंतु एक बहुलक प्रोटीन है| कई एकलकी प्रोटीन जिन्हें मेरोमायोसिन कहते हैं, एक मोटा मायोसिन तंतु बनाती हैं | ग्लूकोस (शर्करा) द्वारा B. जी.टी.पी द्वारा C. Ca2+ आयन द्वारा D. ए.टी.पी. द्वारा पेशियाँ संकुचन के लिए एटीपी के जल अपघटन से ऊर्जा प्राप्त करती हैं| चक्रीय क्रास सेतु बनाने के दौरान मायोसिन शीर्ष एटीपी को अपघटित कर ऊर्जा निर्मोचित करते हैं और इसके टूटने से लगातार पेशी संकुचन होता है| श्वेत पेशीय तंतुओं में B. लाल पेशीय तंतुओं में C. हृदयी पेशीय तंतुओं में D. रक्त में पेशी में ऑक्सीजन संग्रह करने वाला लाल रंग का एक वर्णक मायोग्लोबिन होता है| कुछ पेशियों में मायोग्लोबिन की मात्रा अधिक होती है जिससे वे लाल रंग की दिखती हैं| ऐसी पेशियों को लाल पेशियाँ कहते है| अंतरंग कंकाल B. बाह्यकंकाल C. अक्षीय कंकाल D. उपांगीय कंकाल मेरुदंड, करोटि और पसलियाँ, अक्षीय कंकाल का गठन करते हैं, जिसमे 80 अस्थियाँ शरीर की मुख्य अक्ष पर वितरित होती हैं| मनुष्य की खोपड़ी में प्रत्येक मध्यकर्ण में तीन छोटी अस्थियाँ होती है–मैलियस, इनकस एवं स्टेपीज, इन्हें सामूहिक रूप से कर्ण अस्थिकाएँ कहते है | इलियम B. श्रोणिउलूखल C. उरोस्थि D. ग्लीनॉइड गुहा अंस मेखला में, एक्रोमियन के नीचे एक गहरा गर्त होता है जिसे ग्लीनॉइड गुहा कहते है| यह ह्यूमरस के शीर्ष के साथ संधियोजन करके कंधों की जोड़ बनाती है| एक्रोमियन B. श्रोणिउलूखल C. ग्लीनॉइड गुहा D. इस्चियम प्रत्येक श्रोणि अस्थि तीन अस्थियों के संलयन से बनी होती है| इन अस्थियों के संयोजन स्थल पर एक गुहा एसिटैबुलम होती है, जिससे उरु अस्थि (फीमर) संधियोजन करती है| धुराग्र संधि B. सैडल (काठी )संधि C. कब्ज़ा संधि D. विसर्पीसंधि अक्षक और शीर्षधरा के बीच की संधि को धुराग्र संधि कहते है जो साइनोवियल संधि का एक प्रकार है | आंतरकशेरुक गद्दी मेरुदंड के प्रत्येक कशेरुका के बीच एक चपटी वृत्ताकार प्लेट है| यह एक मोटा रेशीय छल्ला होता है जिसका केन्द्रीय भाग कोमल, गाढ़ा, तरल जैसा होता है| यह मेरुरज्जु स्तम्भ के लिए एक गद्दी और अघातरोधक की तरह काम करता है | टिबिया और फिबुला B. रेडियस और कार्पल्स C. मैटाकार्पल्स और अंगुलियों के फैलेंजेज D. ह्यूमरस और रेडियस दीर्घवृत्ताभ संधि (जोड़) साइनोविअल संधि है, जिसमे कंद दीर्घवृत्ताकार गुहा में जकड़ी होती है जैसे कलाई की संधि| एक कंदीय संधि (जोड़) किसी अक्षीय घुमाव को नहीं होने देता लेकिन लचक, विस्तारण, अभिवर्तन, अपवर्तन और पर्यावर्तन को होने देता है| टिबिया और फीमर B. ह्यूमरस और रेडियस C. मेटाकार्पल और कार्पल D. मेटाकार्पल और फैलेंजेज SOLUTION
A. कैरोलस लीनियसSOLUTION
A. मृदा जलSOLUTION
A. आसंजनSOLUTION
A. विभज्योतक ऊतकSOLUTION
A. मूल रोम द्वाराSOLUTION
A. अल्प परासारीSOLUTION
A.
A.SOLUTION
Right Answer is: C
SOLUTION
A. आहार नाल से यकृत तकSOLUTION
A. निवाहिका परिसंचरणSOLUTION
A. वृक्क धमनीSOLUTION
A. कलाईSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
Right Answer is: D
SOLUTION
A. मेस्कालिनSOLUTION
SOLUTION
A. O.
A.SOLUTION
A. फुफ्फुस शिराSOLUTION
Right Answer is:
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
Right Answer is:
SOLUTION
SOLUTION
Right Answer is:
SOLUTION
Right Answer is:
SOLUTION
ग) फुप्फुसीय परिसंचलन और दैहिक परिसंचलन
A. x2 – 1 SOLUTION
A. 2,–1 SOLUTION
A. f एक फलन है और g एक फलन नहीं है SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
b) क्या A से B में f एक फलन है? क्यों?
SOLUTION
SOLUTION
x – 2 = 4 और y + 3 = 1
x = 4 + 2 = 6 और y = 1 – 3 = –2
SOLUTION
f(x) = 4x + 1 और g(x) = 6x -7
(a) कितनी वास्तविक संख्याओं x के लिए, f(x) = g(x)?
(b) कितनी वास्तविक संख्याओं x के लिए, f(x) < g(x)?
SOLUTION
SOLUTION
a) f - g.
b) f/g.
SOLUTION
= x – 1 – (2x – 5)
= x – 1 – 2x + 5
= 4 – x
b) (f/g)x = f(x)/g(x) = (x – 1)/(2x – 5), जहाँ x ≠ 5/2.SOLUTION
A. 2π रेडियन SOLUTION
अतः, 2 घूर्णनों में यह 4π रेडियन से होते हुए मुड़ेगा।
A. 2 πSOLUTION
A. 2π/9 रेडियनSOLUTION
= (61/3)°
= (61/3)×(π/180) रेडियन
= 61π/540 रेडियन
A. SOLUTION
A. 0SOLUTION
A. 2 πSOLUTION
f(x + t) = f(x), तो t को f(x) की अवधि कहा जाता है। हम जानते हैं कि π लघुत्तम धनात्मक वास्तविक संख्या है, जिसके लिए
tan ( π + t) = tant.
A. 1 : 3SOLUTION
A. तंत्रिका माइलीन आवरण से आवरित होती हैSOLUTION
A. आधार झिल्लीSOLUTION
A. स्वायत्त तंत्रिका तंत्रSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
“मस्तिष्क का दायाँ भाग शरीर के बाएँ भाग को नियंत्रित करता है,जबकि मस्तिष्क का बायाँ भाग शरीर के दाएँ भाग को नियंत्रित करता हैSOLUTION
SOLUTION

SOLUTION
SOLUTION
Right Answer is:
SOLUTION

SOLUTION
A. (i) और (iii) SOLUTION
A. 



SOLUTION
A. {x ∈ R : -1< x< 7}SOLUTION
A. {2, 3, 4, 5, 8, 10, 12}SOLUTION
A. {-2, -1, 0, 1, 2}SOLUTION
A. {1, 3, 5}SOLUTION
A. 130SOLUTION
Right Answer is: A
SOLUTION
SOLUTION
A. समीपस्थ संवलित नलिकाSOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
प्राणी
उत्सर्जन की विधि
उत्सर्जित पदार्थ
छिपकली
यूरिकाम्ल उत्सर्जन
‘ख’
हाथी
‘क’
यूरिया
‘ग’
अमोनियोत्सर्ग
अमोनिया
कॉकरोच
‘घ’
यूरिक अम्ल
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A. SOLUTION
A.
B.
C.
D.
Right Answer is: ASOLUTION
A. SOLUTION
A.