A. (x – a)2 + (y – b)2 = a2 – b
B. (x + a)2 + (y + b)2 = a2 – b2
C. (x – a)2 + (y + b)2 = a2 + b2
D. (x – a)2 + (y – b)2 = (a2 – b2)
बिंदु (x1, y1) से होकर जाने वाले और त्रिज्या ‘r’ वाले वृत्त का मानक समीकरण (General equation) है:
(x - x1)2 + (y - y1)2 = r2
अतः, अभीष्ट वृत्त का समीकरण है:
(x + a)2 + (y + b)2 = a2 – b2
परवलय (parabola) का शीर्ष (vertex) मूल बिंदु (origin) पर है और यह y-अक्ष के सापेक्ष सममित (symmetric) है, अर्थात् परवलय का अक्ष, y-अक्ष के अनुदिश (along) स्थित है।
परवलय चौथे चतुर्थांश (quadrant) में स्थित एक बिंदु (3, –5) से होकर जाता है। अतः, परवलय चौथे चतुर्थांश में स्थित है और इसका मानक समीकरण (standard equation) x2 = – 4ay है। बिंदु (3, –5) इस वक्र पर स्थित है, तो
(3)2 = –4a (–5)
9 = 20a
a = (9/20)
इस प्रकार, परवलय का समीकरण है:
x2 = – 4(9/20)y
= – (9/5)y
दिए गए परवलय में y2 है, अतः परवलय का अक्ष x-अक्ष है।
दिए गए परवलय का रूप y2 = 4ax है। अतः,
a = 4
नाभि (focus) (4, 0) पर स्थित है।
नियता (directrix) का समीकरण है: x = - 4
नाभिलंब जीवा (latus rectum) की लंबाई= 4a
= 4(4)
= 16
दिया गया है: रेखा का समीकरण x + y=5 और वृत्त का समीकरण x2+y2-2x-4y+3=0 है
इन्हें सरल करने पर, हम प्राप्त करते हैं:
दी गई रेखा और स्पर्शज्या (tangent) संपाती बिंदुओं (coincident points) (2, 3) और (2, 3) पर एक-दूसरे को प्रतिच्छेद करते हैं।
इस प्रकार, रेखा वृत्त को स्पर्श करती है और स्पर्श बिंदु (point of contact) (2, 3) है।
दी गई रेखाओं के समीकरणों को हल करने पर, हम प्राप्त करते हैं:
x = 1 और y = - 3
वृत्त का केंद्र (1, - 3) पर है।
वृत्त (2, 4) से होकर जाता है।
A.
B.
C.
D.
A.
B.
C.
D.
चूँकि y-अक्ष x, y, z-अक्षों पर क्रमशः 90°, 0°, 90° के कोण बनाता है, अतः इसके दिक्-कोसाइन (direction cosines) cos 90°, cos 0°, cos 90°, अर्थात 0, 1, 0 हैं।
मस्जिद की दो विशेषताएँ थीं-
दीवार में एक मेहराब, जो मक्का (किबला) की दिशा का संकेत देती है और एक मंच (मिम्बर) जहाँ से शुक्रवार को दोपहर की नमाज के समय प्रवचन दिए जाते हैं।
इमारत में एक मीनार जुड़ी होती है जिसका उपयोग नियत समयों पर प्रार्थना हेतु लोगों को बुलाने के लिए किया जाता है। मीनार नए धर्म के अस्तित्व का प्रतीक है।
शहरों और गाँवों में लोग समय का अंदाजा पाँच दैनिक प्रार्थनाओं और साप्ताहिक प्रवचनों की सहायता से लगाते थे।
9 वीं शताब्दी में खलीफा की पतनोन्मुख अवस्था में, अरब साम्राज्य अनेक स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो गया, तुर्क में कई खानाबदोश जनजातियां अस्तित्व में थीं,इन जनजातियों ने इस्लाम को उनके धर्म के रूप में अपनाया
इस्लाम के आगमन से पूर्व, अरब अनेक जनजातियों में विभाजित थे।
सन् 632 में पैगम्बर मुहम्मद के देहांत के बाद, कोई भी व्यक्ति वैध रूप से इस्लाम का अगला पैगम्बर होने का दावा नहीं कर सकता था। इसके परिणामस्वरूप, उनकी राजनैतिक सत्ता, उत्तराधिकार के किसी सुस्थापित सिद्धान्त के अभाव में उम्मा को हस्तांतरित कर दी गई। इससे नवाचारों के लिए अवसर उत्पन्न हुए। सबसे बड़ा नव-परिवर्तन यह हुआ कि खिलाफत की संस्था का निर्माण हुआ, जिसमें समुदाय का नेता (अमीर अल-मोमिनिन) पैगम्बर का प्रतिनिधि (खलीफा) बन गया। खिलाफत के दो प्रमुख उद्देश्य थे- एक तो कबीलों पर नियंत्रण कायम करना, जिनसे मिलकर उम्मा का गठन हुआ था और दूसरा, राज्य के लिए संसाधन जुटाना।
मध्यकालीन इस्लाम के धार्मिक विचारों वाले लोगों का एक समूह सूफी कहलाता था। ये लोग तपश्चर्या और रहस्यवाद के जरिये खुदा का अधिक गहन एवं और अधिक वैयक्तिक ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे।
वे मुहम्मद के शब्दों और कर्मों का अनुकरण करने, और पारंपरिक रूप से गरीबी और संयम का जीवन अपनाने का प्रयास करते हैं।
समाज जितना अधिक भौतिक पदार्थों और सुखों की ओर लालायित होता था, सूफी लोग उतना ही अधिक संसार का त्याग करना चाहते थे और केवल खुदा पर भरोसा (तवक्कल)करना चाहते थे। सूफी आनंद उत्पन्न करने और प्रेम तथा भावावेश उदीप्त करने के लिए संगीत समारोहों (समा) का उपयोग करते थे।
एक ईरानी सूफी बयाजिद बिस्तामी पहला व्यक्ति था, जिसने अपने आपको खुदा में लीन (फना) करने के महत्व को अपने उपदेश में बतलाया था। जिसमें रहस्यवादी खुद उस समय पूरी तरह से परमात्मा में लीन हो जाता है, जिस क्षण उसे स्वयं उसकी एवं उसके आसपास की वस्तुओं की कुछ सुध नहीं रहती।
पुस्तक चिकित्सा के सिद्धान्त (अल-कानून फिल तिब) की रचना इब्न सिना (980-1037) द्वारा की गई थी, जो व्यवसाय की दृष्टि से एक चिकित्सक और दार्शनिक था, यह दस लाख शब्दों वाली पांडुलिपि थी, जिसमें उस समय के औषधशास्त्रियों द्वारा बेची जाने वाली 760 औषधियों का उल्लेख किया गया है और उसके द्वारा अस्पतालों (बीमारिस्तान) में किए गए प्रयोगों तथा अनुभवों की जानकारी भी दी गई है। इस पुस्तक में आहार-विज्ञान (आहार के विनियमन के जरिए उपचार) के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। यह बताया गया है कि जलवायु और पर्यावरण का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, और कुछ रोगों के संक्रामक स्वरूप की जानकारी दी गई है। इस पुस्तक का उपयोग यूरोप में एक पाठ्यपुस्तक के रूप में किया जाता था जहाँ लेखक को एविसेन्ना के नाम से जाना जाता था। यह कहा जाता है कि एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक और कवि उमर खय्याम अपनी मृत्यु से ठीक पहले यह पुस्तक पढ़ रहे थे।
1.अरबों द्वारा जीती गई भूमि पर, जो मालिकों के हाथों में रहती थी, कर (खराज) लगता था, जो खेती की स्थिति के अनुसार पैदावार के आधे से लेकर उसके पांचवें हिस्से के बराबर होता था।
2. मुसलमान उपज का दसवां (उश्र) हिस्सा कर के रूप में भुगतान करते थे।
3. जब गैर-मुसलमान कम कर देने के उद्देश्य से मुसलमान बनने लगे तो उससे राज्य की आय कम हो गई।
4. इस समस्या को दूर करने के लिए कराधान की एकसमान नीति अपनाई गई।
इस्लाम के मुख्य सिद्धांत हैं -
अ.ईश्वर, सिर्फ एक ही है, और मुहम्मद उसका पैगम्बर है।
ब.मुसलमानों को दिन में पाँच बार नमाज़ अदा करनी चाहिए
स.उन्हें, रमजान के पवित्र महीने के दौरान सुबह से शाम तक रोज़े रखने चाहिए।
द.उनके धन का एक हिस्सा दान में देकर गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए।
ई.उन्हें अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार मक्का की तीर्थयात्रा करनी चाहिए।
इसके अलावा, पैगंबर मुहम्मद ने मूर्ति पूजा को प्रतिबंधित कर अन्य लोगों के प्रति सद्व्यवहार करने के महत्व पर बल दिया
हजरत मोहम्मद एक मनुष्य और शिक्षक के रूप में विश्व के सम्पूर्ण इतिहास में एक बेमिसाल विभूति थे । हजरत मोहम्मद ने इस्लाम धर्म की स्थापना की ।
इस्लाम धर्म के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं -
समता, समानता और बंधुत्व इस्लाम धर्म के लोग मानते हैं । अल्लाह एक है और हम सभी उसके बन्दे हैं हजरत मोहम्मद अल्लाह का पैगाम लेन वाले पैगम्बर है। हजरत मोहम्मद ने जब अल्लाह का पैगाम लोगों को दिया हजरत मोहम्मद के अनुसार आत्मा अमर है ।
प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म की रक्षा करनी चाहिए परन्तु दूसरों के धर्म को कभी हानि नहीं पहुँचानी चाहिए मोहम्मद साहब के अनुसार अल्लाह और आत्मा में सीधा सम्बन्ध है और मूर्तिपूजा करना आडम्बरयुक्त जीवन का प्रतीक है।
इस्लाम धर्म की शिक्षाएं -
नमाज -प्रतिदिन पाँच बार नमाज पढ़ना ।
रमजान - रमजान के पवित्र महीने में रोजा रखना ।
कलमा - अल्लाह एक है और मोहम्मद उसके पैगम्बर हैं ।
ज़कात- अपनी उपार्जित आय से गरीबों में दान करना ।
हज - पूरे जीवन में एक बार मक्का की तीर्थयात्रा करना।
1092 में बगदाद के सलजुफ सुल्तान,मलिक शाह की मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य का विघटन हो गया। इससे बाइजेन्टाइन सम्राट एलेक्सियस प्रथम को एशिया माइनर और उत्तरी सीरिया को फिर से हथियाने का मौका मिल गया। पोप अर्बन द्वितीय के लिए ईसाई धर्म की जीवट प्रवृत्ति को फिर से जीवित करने का एक अवसर था। 1095 में, पोप ने बाइजेन्टाइन सम्राट के साथ मिलकर पुण्य देश (होली लैंड) को मुक्त कराने के लिए ईश्वर के नाम पर युद्ध के लिए आह्वान किया। 1095 और 1291 के बीच पश्चिमी यूरोपीय ईसाइयों ने पूर्वी भूमध्यसागर के तटवर्ती मैदानों में मुस्लिम शहरों के खिलाफ युद्धों की योजना बनाई और फिर लगातार अनेक युद्ध लड़े गए। इन लड़ाइयों को बाद में ‘धर्मयुद्ध’ का नाम दिया गया।
विजीत किए गए सभी प्रांतों का प्रशासन के प्रमुख गवर्नर (अमीर) और कबीलों के मुखिया (अशरफ) थे। केन्द्रीय राजकोष (बैत अल-माल) अपना राजस्व मुसलमानों द्वारा अदा किए जाने वाले करों से और इसके अलावा धावों से मिलने वाली लूट में अपने हिस्से से प्राप्त करता था। खलीफा के सैनिक, जिनमें अधिकतर बेदुइन थे, रेगिस्तान के किनारों पर बसे शहरों, जैसे कुफा और बसरा में शिविरों में रहते थे, ताकि वे अपने प्राकृतिक आवास स्थलों के निकट और खलीफा की कमान के अंतर्गत बने रहें। शासक वर्ग और सैनिकों को लूट में हिस्सा मिलता था और मासिक अदायगियाँ (अता) प्राप्त होती थीं। गैर-मुस्लिम लोगों द्वारा करों (खराज और जज़िया)को अदा करने पर, उनका सम्पत्ति का और धार्मिक कार्यों को संपन्न करने का अधिकार बना रहता था। यहूदी और ईसाई राज्य के संरक्षित लोग (धिम्मीस) घोषित किए गए और अपने सामुदायिक कार्यों को करने के लिए उन्हें काफी अधिक स्वायत्तता दी गई थी।
1)सिकंदरिया, सीरिया और मेसोपोटामिया के स्कूलों में, जो कभी सिकन्दर के साम्राज्य के भाग थे, अन्य विषयों के साथ-साथ यूनानी दर्शन, गणित और चिकित्सा की शिक्षा दी जाती थी। 2)उम्मयद और अब्बासी खलीफाओं ने ईसाई विद्वानों से यूनानी और सीरियाक भाषा की किताबों का अनुवाद कराया। अल-मामून के शासन में अनुवाद एक सुनियोजित क्रियाकलाप बन गया था।
3)बगदाद में पुस्तकालय-व-विज्ञान संस्थान (बायत अल-हिक्मा), जहाँ विद्वान काम करते थे, की स्थापना की गई।
4)अरस्तु की कृतियों, यूक्लिड की एलीमेंट्स और टोलेमी की पुस्तक एल्मागेस्ट की ओर अरबी पढ़ने वाले विद्वानों का ध्यान दिलाया गया।
5)खगोल विज्ञान, गणित और चिकित्सा के बारे में भारतीय पुस्तकों का अनुवाद भी इसी काल में अरबी में किया गया। ये रचनाएँ यूरोप में पहुँची और इनसे दर्शन-शास्त्र और विज्ञान में रुचि उत्पन्न हुई।
नये अधिग्रहीत प्रदेशों में बसी हुई आबादी का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। कृषि भूमि का सर्वोपरि नियंत्रण राज्य के हाथों मे था।
भू-राजस्व आय का मुख्य स्रोत था। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए राज्य ने विभिन्न उपाय लागू किए। राज्य ने सिंचाई प्रणालियों, बांधों और नहरों के निर्माण, कुओं की खुदाई के लिए सहायता दी। इस्लामी कानून में उन लोगों को कर में रियायत दी गई, जो जमीन को पहली बार खेती के काम में लाते थे। किसानों की पहल और राज्य के समर्थन के जरिए खेती-योग्य भूमि का विस्तार हुआ और प्रमुख प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों के अभाव की स्थिति में भी उत्पादकता में वृद्धि हुई। बहुत-सी नयी फसलों, जैसे - कपास, संतरा,केला, तरबूज, पालक और बैंगन की खेती की गई और यूरोप को उनका निर्यात भी किया गया।
क. दौलताबाद
ख. फिरोजशाह
ग. गोवा
ध. विजयनगर
ड.. 1336
च. चार
क. पाँच बार
ख. अल्लाह
ग. बराबर
घ. तुर्क
ड़. उत्तराधिकारी
च. अरबी
अब्बासी वंश जब इसके दुर्बल साम्राज्य पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा था, उस समय उसे यूरोप से एक नए खतरे का सामना करना पड़ा। रोमन कैथोलिक पोप ने मुसलमानों से पवित्र भूमि को अधिग्रहित करने के लिए सैन्य अभियान या धर्मयुद्ध शुरू करने के लिए ईसाई राजाओं और सामंतों को प्रोत्साहित किया। ईसाइयों और मुसलमानों के बीच तीन धर्मयुद्ध लड़े गए थे।
प्रथम धर्मयुद्ध (1098-1099) में, फ्रांस और इटली के सैनिकों ने सीरिया में एंटीओक और जेरूसलम पर कब्जा कर लिया। शहर में मुसलमानों और यहूदियों की विद्वेषपूर्ण हत्याएँ की गईं और शहर पर विजय प्राप्त कर ली गई, जिसके बारे में ईसाइयों और मुसलमानों दोनों ने काफी लिखा है। मुस्लिम लेखकों ने ईसाइयों (जिन्हें फिरंगी अथवा इम्फीजी कहा जाता था) के आगमन का उल्लेख पश्चिमी लोगों के आक्रमण के रूप में किया है। इन्होंने सीरिया-पिफलिस्तीन के क्षेत्र में जल्दी ही धर्मयुद्ध द्वारा जीते गए चार राज्य स्थापित कर लिए। इन क्षेत्रों को सामूहिक रूप से ‘आउटरैमर’ (समुद्रपारीय भूमि) कहा जाता था और बाद के धर्मयुद्ध इसकी रक्षा और विस्तार के लिए किए गए।
आउटरैमर प्रदेश कुछ समय तक भली-भांति कायम रहा, लेकिन जब तुर्कों ने 1144 में एडेस्सा पर कब्जा कर लिया तो पोप ने एक दूसरे धर्मयुद्ध (1145-1149) के लिए अपील की। एक जर्मन और फ़्रांसीसी सेना ने दमिश्क पर कब्जा करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें हरा कर घर लौटने के लिए मजबूर कर दिया गया। इसके बाद आउटरैमर की शक्ति धीरे –धीरे क्षीण होती गई। धर्मयुद्ध का जोश अब खत्म हो गया और ईसाई शासकों ने विलासिता से जीना और नए-नए इलाकों के लिए लड़ाई करना शुरू कर दिया। सलाह अल-दीन (सलादीन) ने एक मिस्री-सीरियाई साम्राज्य स्थापित किया और ईसाइयों के विरुद्ध धर्मयुद्ध करने का आह्वान किया, और उन्हें 1187 में पराजित कर दिया। उसने पहले धर्मयुद्ध के लगभग एक शताब्दी बाद, जेरूसलम पर फिर से कब्जा कर लिया।उस समय के अभिलेखों से संकेत मिलता है कि ईसाई लोगों के साथ सलाह अल-दीन का व्यवहार दयामय था, जो विशेष रूप से उस तरीके के व्यवहार के विपरीत था, जैसा पहले ईसाइयों ने मुसलमानों और यहूदियों के साथ किया था। हालांकि उसने द चर्च ऑफ दि होली सेपलकर की अभिरक्षा का काम ईसाइयों को सौंप दिया था, लेकिन बहुत-से गिरजाघरों को मस्जिदों में बदल दिया गया, और जेरूसलम एक बार पिफर मुस्लिम शहर बन गया। इस शहर के छिन जाने से, 1189 में तीसरे धर्मयुद्ध के लिए प्रोत्साहन मिला, लेकिन धर्मयुद्ध करने वाले फिलिस्तीन में कुछ तटवर्ती शहरों और ईसाई तीर्थयात्रियों के लिए जेरूसलम में मुक्त रूप से प्रवेश के सिवाय और कुछ प्राप्त नहीं कर सके । मिस्र के शासकों, मामलुकों ने अंततः 1291 में धर्मयुद्ध करने वाले सभी ईसाइयों को समूचे फिलिस्तीन से बाहर निकाल दिया। धीरे-धीरे यूरोप की इस्लाम में सैनिक दिलचस्पी समाप्त हो गई और उसका ध्यान अपने आंतरिक राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास की ओर केन्द्रित हो गया।
इन धर्मयुद्धों ने ईसाई-मुस्लिम सम्बन्धों के दो पहलुओं पर स्थायी प्रभाव छोड़ा। इनमें से एक था,मुस्लिम राज्यों का अपने ईसाई प्रजाजनों की ओर कठोर रुख, जो लड़ाइयों की कड़वी यादों और मिली-जुली आबादी वाले इलाकों में सुरक्षा की जरूरतों का परिणाम था। दूसरा था, मुस्लिम सत्ता की बहाली के बाद भी पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार में इटली के व्यापारिक समुदायों (पीसा,जेनोआ और वैनिस)का अधिक प्रभाव।
1)जैसे-जैसे शहरों की संख्या में तेज् से बढ़ोतरी हुई, वैसे ही इस्लामी सभ्यता फली-फूली ।बहुत-से नए शहरों की स्थापना की गई, जिनका उद्देश्य मुख्य रूप से अरब सैनिकों (जुंड) को बसाना था, जो स्थानीय प्रशासन की रीढ़ थे। इस श्रेणी के फौजी शहरों में, जिन्हें मिस्र कहा जाता था(इजिप्ट का अरबी नाम), कुफा और बसरा इराक में, और फुस्तात तथा काहिरा मिस्र में थे।अब्बासी खिलाफत (800) की राजधनी के रूप में अपनी स्थापना के बाद आधी शताब्दी के अंदर बग्दाद की जनसंख्या बढ़ कर लगभग दस लाख तक पहुँच गई थी। इन शहरों के साथ-साथ दमिश्क, इस्फ़हान और समरकंद जैसे कुछ पुराने शहर थे, जिन्हें नया जीवन मिल गया था।खाद्यान्नों और शहरी विनिर्माताओं के लिए कच्ची सामग्री, जैसे कपास और चीनी के उत्पादन में वृद्धि की गई जिससे इन शहरों के आकार और इनकी जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई। इस प्रकार संपूर्ण क्षेत्र में शहरों का एक विशाल जाल विकसित हो गया। एक शहर दूसरे शहर से जुड़ गया और परस्पर संपर्क एव कारोबार बढ़ गया।
2)शहर के केंद्र में दो भवन-समूह होते थे, जहाँ से सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति का प्रसारण होता था: उनमें एक मस्जिद (मस्जिद अल-जामी) होती थी जहाँ सामूहिक नमाज़ पढ़ी जाती थी। यह इतनी बड़ी होती थी कि दूर से दिखाई दे सकती थी। दूसरा भवन-समूह केंद्रीय मंडी (सुक) था, जिसमें दुकानों की कतारें होती थीं, व्यापारियों के आवास (फंदक) और सर्राफ का कार्यालय होता था। ये दोनों इमारतें मुस्लिम साम्राज्य के सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन करती थीं।
3) मस्जिद के रूप में धार्मिक भवन की केंद्रीय उपस्थिति, मध्यकालीन इस्लामी शहर, विशेष रूप से सार्वजनिक जीवन में, धर्म की प्राथमिक भूमिका का साक्षी है।
4)शहर प्रशासकों (जो राज्य के आयन अथवा नेत्र थे)और विद्वानों और व्यापारियों(तुज्जर) के लिए घर होते थे, जो केंद्र के निकट रहते थे।
5)सामान्य नागरिकों और सैनिकों के रहने के क्वार्टर बाहरी घेरे में होते थे, और प्रत्येक में अपनी मस्जिद, गिरजाघर अथवा सिनेगोग(यहूदी प्रार्थनाघर), छोटी मंडी और सार्वजनिक स्नानघर (हमाम) और एक महत्त्वपूर्ण सभा-स्थल होता था।
6)शहर के बाहरी इलाकों में शहरी गरीबों के मकान, देहातों से लाई जाने वाली हरी सब्ज़ियों और फलों के लिए बाजार, काफिलों के ठिकाने और ‘अस्वच्छ’ दुकानें, जैसे चमड़ा साफ करने या रँगने की दुकानें और कसाई की दुकानें होती थीं।
7) मकान, स्थान और निवासियों के अनुसार होते थे जैसे कि झोपड़ियां, अपार्टमेंट अथवा पत्थर या ईंट की बड़ी इमारतें।
8) शहर की दीवारों के बाहर सराय होते थे। सराय में लोग उस समय आराम कर सकते थे जब शहर के दरवाजे बंद कर दिए गए हों। सभी शहरों का नक्शा एक जैसा नहीं होता था, इस नक्शे में परिदृश्य, राजनीतिक परंपराओं और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर परिवर्तन किए जा सकते थे।
सांस्कृतिक अर्थ में, शब्द 'इस्लामी जगत' सम्पूर्ण विश्व में मुसलमानों के समुदाय को दर्शाता है। इस्लामी वास्तुकला की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मस्जिद और संबंधित धार्मिक इमारतों में झलकती है। धार्मिक इमारतों के माध्यम से, इस्लामी जगत में विविध संस्कृतियों का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
दसवीं शताब्दी तक एक ऐसी इस्लामी दुनिया उभर आई थी, जिसे यात्री आसानी से पहचान सकते थे।
धार्मिक इमारतें इस दुनिया की सबसे बड़ी बाहरी प्रतीक थीं। स्पेन से मध्य एशिया तक फैली हुई मस्जिदें, इबादतगाह और मकबरों का बुनियादी नमूना एक जैसा था -मेहराबें, गुम्बद, मीनार और सामूहिक प्रार्थना के लिए बड़े आंगन भी इसमें शामिल थे। ये इमारतें मुसलमानों की आध्यात्मिक और व्यावहारिक जरूरतों को अभिव्यक्त करती थीं। इस्लाम की पहली शताब्दी में, मस्जिद ने एक विशिष्ट वास्तुशिल्पीय रूप (खंभों के सहारे वाली छत) प्राप्त कर लिया था जो प्रादेशिक विभिन्नताओं से परे था।
मस्जिद में एक खुला प्रांगण (सहन) होता था, जहाँ पर एक फव्वारा अथवा जलाशय बनाया जाता था और यह प्राँगण एक बड़े कमरे की ओर खुलता, जिसमें प्रार्थना करने वाले लोगों की लंबी पंक्तियों और प्रार्थना (नमाज) का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति (इमाम) के लिए पर्याप्त स्थान होता था। बड़े कमरे की दो विशेषताएँ थीं- दीवार में एक मेहराब, जो मक्का (किबला) की दिशा का संकेत देती है और एक मंच (मिम्बर) जहाँ से शुक्रवार को दोपहर की नमाज के समय प्रवचन दिए जाते हैं। इमारत में एक मीनार जुड़ी होती है जिसका उपयोग नियत समयों पर प्रार्थना हेतु लोगों को बुलाने के लिए किया जाता है। मीनार नए धर्म के अस्तित्व का प्रतीक है। शहरों और गाँवों में लोग समय का अंदाजा पाँच दैनिक प्रार्थनाओं और साप्ताहिक प्रवचनों की सहायता से लगाते थे।
केंद्रीय प्राँगण (इवान)के चारों ओर निर्मित इमारतों के निर्माण का वही स्वरूप न केवल मस्जिदों और मकबरों में, बल्कि काफिलों की सरायों, अस्पतालों और महलों में भी पाया जाता था। उम्मयदों ने नखलिस्तानों में ‘मरुस्थली महल’ बनाए, जैसे फिलिस्तीन में खिरबत अल-मफजर और जोर्डन में कुसाईर अमरा, जो ठाठदार और विलासपूर्ण निवास-स्थानों और शिकार और मनोरंजन के लिए विश्राम-स्थलों के रूप में काम आते थे। महलों को, जो रोमन और ससानी वास्तुशिल्प के तरीके से बनाए गए थे, लोगों के चित्रों, प्रतिमाओं और पच्चीकारी से भव्य रूप से सजाया जाता था। अब्बासियों ने समरा में बागों और बहते हुए पानी के बीच एक नया शाही शहर बनाया जिसका जिक्र हारुन-अल-रशीद से जुड़ी कहानियों और आख्यानों में किया जाता है।
इस्लामी वास्तुकला में गुंबदों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस्लामी वास्तुकला में गुंबदों का सदियों से इस्तेमाल किया गया है। इस्लाम के दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में पहुंचने पर इस्लामी कला और स्थापत्य कला की कुछ अन्य अद्वितीय और उत्कृष्ट विशेषताओं का जन्म एवं विकास हुआ जिसके अंतर्गत, सुलेख और अमूर्त सजावट सम्मिलित थी । इस तरह की विशेषताओं में उतनी ही भिन्नताएँ देखी जा सकती हैं जितने विविध क्षेत्र थे और वे अब तक मौजूद हैं।
A. 17,47,000.
B. 17,48,000.
C. 17,49,000.
D. 17,50,000.
निशापुर में, घेराबंदी के दौरान, एक मंगोल राजकुमार को मार दिया गया। इस कारण, चंगेज़ खान ने आदेश दिया कि ‘शहर को इस तरह तबाह किया जाए कि वहां हल चलाया जा सके, और प्रतिशोध को उग्र रूप देने हेतु, बिल्लियों और कुतों को भी जिंदा नहीं चोदना चाहिए।’
A. अभिजात्य वर्ग
B. शाही लोग
C. आम लोगों का
D. गुलाम
सीनेट एक संस्था थी जो की अभिजात वर्ग का प्रतिनिधित्व किया करती थी। सीनेटरों में से अधिकांश रोम के अमीर परिवारों और इतालवी जमींदार वर्ग से थे।
A. गरीब को खाना खिलाना
B. जानवरों का दोहन
C. प्रौद्योगिकी का सुधार
D. श्रम का प्रबंधन
कोलुमेल्ला एक प्रथम शताब्दी कृषि लेखक था जो दक्षिणी स्पेन से आया था।
A. कान्स्टैनटाइन प्रथम
B. डायोक्लीशियन
C. टिबेरियस
D. ट्राजन
माना जाता है कि रोमन साम्राज्य के डायोक्लीशियन ने प्रशासनिक सुविधा के लिए साम्राज्य के कुछ क्षेत्रोँ पर अपने दावों को छोड़ दिया था क्योंकि ये या तो आर्थिक रूप से या रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नहीं थे।
A. 3 लाख
B. 4 लाख
C. 5 लाख
D. 6 लाख
प्राचीन रोमन साम्राज्य में गुलाम, जीवन के लगभग हर पहलू में शामिल थे। दास के कर्तव्य बेहद विविध थे, वे प्रत्येक व्यक्ति के काम पर निर्भर करता था।
A. गॉल
B. कांस्टेंटिनोपल
C. सिकंदरिया
D. विन्दोनिसा
रंगशाला दर्शकों के खेल, संगीत समारोहों, रैलियों या नाटकीय प्रदर्शन के लिए एक खुली हवा स्थल होता था।
A. एलेक्स
B. एरिक होब्सबौम
C. गॉर्डन चाइल्ड
D. फरगस मिलर
मिलर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर थे। यह पुस्तक 1993 में प्रकाशित हुआ था।
A. कोलुमेल्ला
B. ड्रेको
C. स्ट्रैबो
D. प्लिनी
प्लिनीने दास गिरोहों में काम करने वालो के पैरों में जंजीर बांधने के कार्य की निंदा की थी।
A. बाएटिका
B. कैम्पैनिया
C. गैलिया नार्बोनेंसिस
D. ट्यूनीशिया
गैलिया नार्बोनेंसिस आधुनिक फ्रांस के दक्षिणी तट पर स्थित है। ऑगस्टस के शा शासनकाल के दौरानए गैलिया नार्बोनेंसिस को उत्तरी गॉल के तीन प्रांतों से अलग करने के लिए यह नाम दिया गया था।
A. कोलुमेल्ला
B. ड्रेको
C. प्लिनी
D. सोलोन
620 ई.पू. के आसपास, ड्रेको ने प्राचीन ग्रीस का पहला लिखित कानून बनाया था। इन कानूनों को बहुत कठोर बनाया गया था।
A. सात का दस्ता
B. आठ का दस्ता
C. नौ का दस्ता
D. दस का दस्ता
कोलुमेल्ला, एक लेखक, ने वकालत की थी कि दस मजदूरों के दस्तों के लिए कार्य आसान हो सकता है अगर समूह के प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले कार्य की मात्रा निर्धारित की जाये।
A. डायोक्लीशियन
B. जूलियस सीजर
C. त्राजान
D. वेस्पसियन
जूलियस सीजर ने पहली सदी ईसा पूर्व के मध्य में ब्रिटेन और जर्मनी जैसे क्षेत्रों तक साम्राज्य का विस्तार किया था।
A. ऑगस्टस
B. टिबेरियस
C. त्राजान
D. डायोक्लीशियन
सामान्य युग की पहली दो शताब्दियों के दौरान, बाहरी युद्ध रोमन साम्राज्य में बहुत कम लड़ा जाता था। इस अवधि में त्राजान ने विस्तार का प्रमुख अभियान चलाया था।
A. बाइजैकियम
B. कैम्पैनिया
C. गैलिली
D. सिसिली
ऐतिहासिक रिकॉर्ड से पता चलता हैकि इस क्षेत्र में शराब बनाने का कार्य 13 वीं सदी ईसा पूर्व से चल रहा है
A. अनैस्टेसियस
B. गिलगमेश
C. जूलियस सीजर
D. टिबेरियस
पांचवीं सदी के सम्राट अनैस्टेसियस ने दारा एक पूर्वी सीमांत शहर का निर्माण किया था उसने पूर्व के श्रमिको को आकर्षित करने के लिए मजदूरों को उच्च मजदूरी की पेशकश की थी
A. ऑगस्टस
B. कोंसटेंटाइन
C. डायोक्लीशियन
D. वेस्पसियन
उसने एक स्पष्ट सैन्य तानाशाही की स्थापना की और वह रोम के दूसरे चरण के लिए नींव रखने के लिए जिम्मेदार था
डिओक्लेटियन के शासन द्वारा राजनितिक परिवर्तन लाया गया|
बेहतर वेतन और बेहतर सेवा शर्तों के लिए सेना में असंतोष व्याप्त था|
सिंहासन का उत्तराधिकार परिवार के वंश पर आधारित था|
राजा, सेना और सीनेट, प्रशासन के प्रमुख अवयव थे।
रोमन साम्राज्य प्राचीन रोमन सभ्यता के उत्तर-रोमन गर्रिाज्य के बाद आया। यह साम्राज्य तीन महाद्वीपों में फैला हुआ था। यह 1500 साल तक शेष रहा और अपने-आप में एक शक्तिशाली आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनितिक एवं सैन्य ताकत था।
पैगंबर मुहम्मद, इस्लाम धर्म के संस्थापक थे
इन धर्मयुद्धों के परीणाम थे-
1)इनमें से एक था,मुस्लिम राज्यों का अपने ईसाई प्रजाजनों की ओर कठोर रुख, जो लड़ाइयों की कड़वी यादों और मिली-जुली आबादी वाले इलाकों में सुरक्षा की जरूरतों का परिणाम था। 2)दूसरा था, मुस्लिम सत्ता की बहाली के बाद भी पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार में इटली के व्यापारिक समुदायों का अधिक प्रभाव।
अब्बासियों के नेतृत्व में दवा नामक एक सुनियोजित आंदोलन ने उम्मयद वंश को उखाड़ फेंका । 750 में इस वंश की जगह अब्बासियों ने ले ली जो मक्का के ही थे। अब्बासियों ने उम्मयद शासन को दुष्ट बताया और यह दावा किया कि वे पैगम्बर मुहम्मद के मूल इस्लाम की पुनर्स्थापना करेंगे।
मुआविया प्रथम उम्मयद खलीफा थे उन्होंने 661 ईसवी में अली की मृत्यु के बाद स्वयं को खलीफा घोषित कर दिया उम्मयद कुरैश कबीले का एक समृद्ध वंश था।
एक हजार एक रातें (अलिफ लैला व लैला) की कई कहानियों में हमें मध्यकालीन मुस्लिम समाज की तस्वीर मिलती है। इन कहानियों में नाविकों, गुलामों, सौदागरों और सर्राफों जैसे कई पात्रों का वर्णन है।
मुस्लिम साम्राज्य हिंद महासागर और भूमध्यसागर के व्यापारिक क्षेत्रों के बीच फैला था। पाँच शताब्दियों तक, अरब और ईरानी व्यापारियों का चीन, भारत और यूरोप के बीच के समुद्री व्यापार पर एकाधिकार रहा।
पूर्वी सिरे में ईरानी व्यापारी मध्य एशियाई और चीनी वस्तुएँ, जिनमें कागज भी शामिल था, लाने के लिए बगदाद से बुखारा और समरकन्द (तुरान) होते हुए रेशम मार्ग से चीन जाते थे। इस व्यापार में इस्लामी सिक्कों का प्रयोग किया जाता था। दास-दासियों के रूप में स्त्री-पुरुष भी खलीफाओं और सुलतानों के दरबारों के लिए खरीदे जाते थे।
समरकन्द वाणिज्यिक तंत्र में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी था। यह तंत्र यूरोपीय वस्तुओं, मुख्यतः फर और स्लाव गुलामों के व्यापार के लिए उत्तर में रूस और स्केंडीनेविया तक फैला हुआ था। समरकंद यूरो-अरब व्यापार के साथ ही इंडो-अरब व्यापार के लिए भी एक महत्वपूर्ण मध्यवर्ती व्यापार केंद्र के रूप में विकसित हुआ।
राजकोषीय प्रणाली (राज्य की आय और उसका व्यय) और बाजर के लेन-देन ने इस्लामी देशों में धन के महत्त्व को बढ़ा दिया था। सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्वे बनाए जाते थे और वस्तुओं और सेवाओं की अदायगी के लिए भेजे जाते थे।
इस्लाम लोगों को धन कमाने से नहीं रोकता था, बशर्ते कि कुछ निषेध् संबंधी नियमों का पालन किया जाए।
खलीफा की उपाधी, अबू बक्र द्वारा शुरू की गई थी, खलीफा को समुदाय के प्रमुख के रूप में माना जाता था, वह लोगों का धार्मिक और राजनीतिक प्रमुख होता था।
622 ई. में मुहम्मद और उनके अनुयायियों को मदीना ओर पलायन करने के लिए बाध्य किया गया था, मक्का से मदीना के लिए यह प्रस्थान हिजरत के रूप में जाना जाता है, हिजरत का क्या महत्त्व यह था कि मुस्लिम कैलेंडर हिजरी की शुरुआत इसी वर्ष से हुई थी
उसने मूर्ति पूजा पर रोक लगा दी थी, एवं उसने सदव्यवहार की महत्ता पर भी बल दिया था, जिससे अमीर अरब नाराज़ हो गए थे
अरब में अनेक छोटे-छोटे कबीलों में लगातार एक दुसरे से लड़ते रहते थे ।
हजरत मोहम्मद ने कबीलों के बीच आपसी सौहार्द एवं भाईचारा बढ़ाने के लिए यह सन्देश देने लगे की ईश्वर एक है एक मात्र अल्लाह ही सीधे और सरल तरीके से प्रार्थना करनी चाहिए शुरू में मक्का के कई लोगों ने मोहम्मद साहब की बातों का विरोध किया था । जिसके कारण मोहम्मद साहब को मक्का छोड़कर मदीना जाना पड़ा ।
मोहम्मद साहब की मृत्यु के पश्चात् अरब में खलीफाओं का प्रभुत्व स्थापित हो गया खलीफा
को पैगम्बर के उत्तराधिकारी के रूप में मुस्लिम जगत में धार्मिक गुरु माने जाते थे । खलीफा राजनीतिक प्रशासक होता था।
क.
ख. गलत
ग. गलत
घ. सही
क. सही
ख.
ग.
घ. गलत
पहले खलीफा अबू बकर थे। उन्होंने अनेक अभियानों द्वारा विद्रोहों का दमन किया। दूसरे खलीफा उमर ने उम्मा की सत्ता के विस्तार की नीति को रूप प्रदान किया। तीसरा खलीफा, उथमान ने अधिक नियंत्रण प्राप्त करने के लिए प्रशासन को अपने ही आदमियों से भर दिया। परिणामस्वरूप इराक और मिस्र में विरोध उत्पन्न हो गया। उथमान की मृत्यु के बाद अली को चौथा खलीफा नियुक्त किया गया। अली के समय में ही इस्लाम दो मुख्य सम्प्रदायों शिया और सुन्नी में विभाजित हो गया था।
पैगम्बर मुहम्मद पेशे से सौदागर थे और भाषा तथा संस्कृति की दृष्टि से अरबी थे। वे मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते थे । उन्होंने आस्तिकों (उम्मा) के एक ही समाज की सदस्यता का प्रचार किया। पैगम्बर मुहम्मद ने अपने आपको खुदा का संदेशवाहक (रसूल) घोषित किया और यह प्रचार करने का आदेश दिया गया था कि केवल अल्लाह की ही इबादत यानी आराधना की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पूजा में दैनिक प्रार्थना के रूप में सरल अनुष्ठान शामिल होने चाहिए। उनके अनुयायियों को नैतिक सिद्धांतों जैसे कि दैनिक प्रार्थना (सलत) और नैतिक सिद्धान्त, जैसे खैरात बाँटना और चोरी न करना, का पालन करना चाहिए और उन्हें सामान्य धार्मिक विश्वासों के जरिये आपस में जुड़े होना चाहिए। उनके अनुयायियों को मुसलमान (मुस्लिम) कहा जाता था, उन्हें कयामत के दिन मुक्ति और धरती पर रहते हुए समाज के संसाधनों में हिस्सा देने का आश्वासन दिया जाता था।
प्राचीन इतिहास को भारतीय परिप्रेक्ष्य में जानने के लिए साधनों को तीन शीर्षकों में विभक्त किया जा सकता है - साहित्यिक साक्ष्य, विदेशी यात्रियों के साक्ष्य तथा पुरातात्विक अभिलेख व सामग्रियाँ।
साहित्यिक साक्ष्य : इसके अंतर्ग्रत विभिन्न साहित्यिक स्रोत जिनमे विभिन्न ऐतिहासिक कृतियाँ जैसे अर्थशास्त्र, पृथ्वीराजरासो आते हैं विभिन्न धर्म ग्रन्थ जिनमे बौध जैन व हिन्दू ग्रन्थ आते हैं भी इसके प्रमुख भाग है।
विदेशी यात्रियों के वृत्तांत : भारत में शुरू से विभिन्न देशों के निवासी आते रहे हैं । कुछ यात्री ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी यात्रा को लिपि बढ़ किया है । इनमे से प्रमुख हैं मेगस्थेनीज़ जिन्होंने मौर्य शासन के बारे में आख्यान लिखा है वही फा हेन ने गुप्त शासक चन्द्रगुप्त के काल का विस्तृत वर्णन किया है इसी प्रकार मध्य काल में भी आये यात्रियों ने अपने वृतांतों से हमें उस काल के विषय में ज्ञान प्रदान किया है ।
पुरातात्विक अभिलेख : ऐतिहासिक स्रोतों के रूप में हमें कई अभिलेख चट्टानों स्तंभों मंदिर की दीवारों व ताम्रपत्रों पर मिलते हैं यह अभिलेख उसको लिखवाने वाले शासक के समय व प्रशासन पर प्रकाश डालते हैं मौर्य सम्राट अशोक का सम्पूर्ण इतिहास उसके द्वारा अभिलेखों से ही ज्ञात होता है इन अभिलेखों से उस शासक की राज्य की सीमा का भी पता चलता था।
बोलचाल की भाषा के उदभव पर विभिन्न मत प्रस्तुत किए गए हैं:
1. यह माना जाता है कि होमो है बिलिस के मस्तिष्क की कुछ खास विशेषताएँ थीं जिसके कारण उनके लिए बात करना संभव रहा होगा।
2. ऊपर दिए गए कथन का यह अर्थ है कि भाषा का विकास 20 लाख साल पहले होना शुरू हो गया था। हालांकि वाक् पथ का विकास समान रूप से महत्वपूर्ण था। वाक् पथ करीब 2,00,000 साल पहले विकसित हुआ था और यह विशेष रूप से आधुनिक मानव से सम्बद्ध था।
3. यह मत दिया गया है कि भाषा और कला का विकास एक ही समय यानि 40,000 से 35,000 वर्ष पूर्व के आसपास हुआ था । बोलचाल की भाषा के विकास को कला के साथ नजदीकी से जोड़कर देखा जाता है क्योंकि दोनों ही संचार के माध्यम हैं।
लज़ारत गुफा में दो चूल्हे के साक्ष्य मिले हैं । गुफा के अंदर चूल्हे की उपस्थिति से आग के नियंत्रित उपयोग होने का पता चलता है जो एक महत्वपूर्ण आविष्कार था। अनेक कार्यों में इसका उपयोग किया जाता था जैसे कि- गुफा या झोपड़ी को अंदर से गर्म बनाए रखने के लिए, जंगली जानवरों को डराकर भगाने के लिए, खाना पकाने के लिए, उपकरण बनाने के लिए आदि।
भारतीय इतिहास लेखन की पुरातन अवधारणा आधुनिक से सर्वथा भिन्न थी। प्राचीन भारतीयों ने अपनी संकल्पना के अनुरूप उस काल का इतिहास लिखा, जिसे आधुनिक दृष्टि से देखना सर्वथा अनुचित है। पाश्चात्य विद्वानों ने इसी दृष्टिकोण को अपनाकर भारतीयों को ऐतिहासिक बुद्धि से हीन समझने की गलती की हैं। वास्तव में हमारा अपना इतिहास लेखन था, जिसे वे समझने में विफल रहे। भारतीय इतिहास लेखन की विकास यात्रा काफी लम्बी है। अतः हमारे इतिहास की संकल्पना और लेखन में अन्तर होना स्वाभाविक था। इसके अतिरिक्त भारत में क्षेत्रीय इतिहास लेखन की प्रवृत्ति भी विकसित हुई। मध्य युग में इस्लाम के आगमन के साथ अरबी और ईरानी इतिहास लेखन की प्रवृत्ति भी हमारे देश में प्रविष्ट हुई और कालांतर में वह भारतीय इतिहास लेखन का अंग बन गयी, परन्तु भारतीय इतिहास लेखन का प्रवाह पूर्ववत जारी रहा और अंग्रेजी सत्ता की स्थापना के बाद भारत में पश्चिम का इतिहास लेखन का भी आ गया। पश्चिम के साम्राज्यवादी इतिहास लेखन की अवधारणा की प्रतिक्रिया स्वरुप भारत में इतिहास लेखन की अन्य कई शैलियाँ विकसित हुई। भारत का वर्तमान इतिहास लेखन विगत चार दशकों में स्रोतों व साधनों के उपयोग, शोध की पद्धिति, विषय-वस्तु और वैचारिक दृष्टिकोण के साथ कुछ विकसित हुआ है। हिन्दू काल के भारतीय इतिहास की हम उस समय तक की घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन नहीं कर सकते जब तक कि भारत, विश्व के अन्य देशों के संपर्क में नहीं आया था। फ्लीट ने तो भारतीयों कि इतिहास लेखन की योग्यता पर
आधुनिक वैज्ञानिक युग में इतिहास की उपयोगिता असंदिग्ध है, क्योंकि इतिहास मानवीय समाज के विकास की गाथा है। शेक अली का मत है कि इतिहास कि उपेक्षा करने वाले राष्ट्र का कोई भविष्य नहीं होता है। अतः एक राष्ट्र के उत्थान और विकास के लिए इतिहास का अध्ययन आवश्यक है। इतिहास का उद्देश्य कविता के समान मनुष्य को मनोरंजक शिक्षा देना है। यह मात्र आदर्श नही है अपितु हेरोडोटस, लिवी टेसीटस, गिबन तथा मैकाले की कृतियों के अध्ययन से सत्य प्रतीत होता है। इतिहास एक दर्पण है, जहाँ सभी प्रकार की बौद्धिक सामग्री उपलब्ध होती है। बुद्धिमान व्यक्ति यहाँ से अपनी जीवनोपयोगी वस्तुओं को प्राप्त कर सकते हैं। ज्ञानार्जन के लिए वे युद्ध, विजय, साम्राज्य विस्तार तथा शासकों की निरंकुशता तथा शोषण से सम्बंधित इतिहास के पृष्ठों का अवलोकन करते हैं। इतिहास शिक्षाप्रद है। इतिहास मनुष्य को विवेकपूर्ण बनाता है। इतिहास ही विश्व के वर्तमान स्वरुप की पृष्ठभूमि का ज्ञान प्रदान करता है। इतिहास अतीत की गौरवपूर्ण देन है। यह मानव की क्रियाओं तथा उपलब्धियों का कोष है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी इतिहास की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इतिहास हमें मानवीय समाज का ज्ञान भी प्रदान करता है। समाज के स्वरुप, क्रमिक विकास, मानव स्वाभाव तथा मानव प्रगति का विवेचन इतिहास में ही मिलता है। आधुनिक युग में रेल, परिवहन, वायु सेवा तथा चन्द्रमा पर मानव का अवतरण के परोक्ष में इतिहास निहित है। राजनीति में सफलता उसी व्यक्ति को मिल सकती है, जिसे फेड्रिक महान, नैपोलियन बोनापार्ट, चर्चिल और
नगरों की स्थापना से कम-से-कम पाँच हजार वर्ष पूर्व घटित घटनाओं ने नगरों की स्थापना में अपना योगदान दिया। इन अत्यंत दूरगामी प्रभाव डालने वाले परिवर्तनों में से एक थाः धीरे –धीरे खानाबदोश ज़िंदगी को छोड़कर खेती के लिए एक स्थान पर बस जाना, जो लगभग दस हजार साल पहले शुरू हो गया था। खेती अपनाने से पहले, लोग अपने भोजन हेतु पेड़-पौधें की उपज एकत्र किया करते थे। धीरे –धीरे उन्होंने भिन्न-भिन्न पौधें के बारे में जानकारी प्राप्त की। जैसे- वे कहाँ उगते हैं, वे किस मौसम में फलते हैं, आदि-आदि। इस जानकारी के आधार पर उन्होंने पौधे उगाना सीख लिया। पश्चिमी एशिया में, गेहूँ और जौ, मटर और कई तरह की दालों की फसलें उगाई जाती थीं। पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया में ज्वार-बाजरा और धन की फसलें आसानी से उगाई जा सकती थीं। ज्वार-बाजरा अफ्रीका में पैदा किया जाता था। उन्हीं दिनों, लोगों ने भेड़-बकरी, ढोर, सूअर और गधे जैसे जानवरों को पालतू बनाना सीख लिया था। तब, पौधें से निकलने वाले रेशों, जैसे रूई तथा पटसन और पशुओं पर उगने वाले रेशों जैसे ऊन आदि से कपड़े बुने जाने लगे थे। कुछ समय बाद, आज से लगभग पाँच हजार साल पहले ढोरों और गधें जैसे पालतू जानवरों को हलों तथा गाडि़यों में जोता जाने लगा था। इन घटनाक्रमों के फलस्वरूप और भी अनेक परिवर्तन हुए। जब लोग फसलें उगाने लगे तो उन्हें एक ही स्थान पर तब तक रहना पड़ता था जब तक कि उनकी उगाई हुई फसल पक न जाए। इसलिए एक स्थान पर बसकर रहना आम बात हो गई और इसके फलस्वरूप, लोग अपने रहने के लिए अधिक स्थायी घर बनाने लगे। इसी बीच कुछ जन-समुदायों ने मिट्टी के बर्तन बनाना भी सीख लिया। अनाज और अन्य उपज इकट्ठी करने के लिए और नए उगाए गए अनाजों से तरह-तरह के भोजन बनाने के लिए इन बर्तनों का इस्तेमाल किया जाने लगा। वस्तुतः खाद्य पदार्थों को अधिक स्वादिष्ट और सुपाच्य बनाने के लिए, भोजन बनाने की प्रक्रिया पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। साथ ही, पत्थर के औजार बनाने के तरीकों में भी बदलाव आया। हालाँकि औजार बनाने के पहले वाले तरीके भी चालू रहे पर कुछ औजारों तथा उपकरणों को, घिसाई की विशद प्रक्रिया के जरिये, चिकना और पॉलिशदार बनाया जाने लगा। अनेक नए उपकरण बनाए गए जैसे -अनाज साफ करने के लिए ओखली व मूसल और पत्थर की कुल्हाड़ी, कसिया और फावड़ा जिनसे जुताई के लिए भूमि साफ की जाती थी और बीज बोने के लिए खुदाई की जाती थी।कुछ इलाकों में, लोग ताँबा और टिन (राँगा) जैसी धातुओं के खनिजों का उपयोग करना सीख गए। कभी-कभी, ताँबे के खनिजों को इकठ्ठा करके उनके खास नीले, हरे रंग की वजह से उनका इस्तेमाल किया जाता था। इससे आगे चलकर धातुओं से गहने और औजार बनाने का रास्ता खुल गया। दूरस्थ स्थानों (और समुद्रों) से उत्पन्न होने वाली कुछ अन्य प्रकार की चीज़ो के बारे में भी जानकारी बढ़ती जा रही थी। ये चीजें थीं: लकड़ी, पत्थर, हीरे-जवाहरात, धातुएँ, सीपियाँ और ज्वालामुखी का पक्का जमा हुआ लावा। स्पष्टतः लोग इन चीजों और इनके बारे में अपनी जानकारी के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते थे और उनका प्रसार करते रहते थे। इस प्रकार व्यापार में वृद्धि होती गई, गाँवों और कस्बों का विकास होता गया और लोगों का आवागमन बढ़ता गया, जिसके फलस्वरूप पुराने छोटे-छोटे जन-समुदायों के स्थान पर छोटे-छोटे राज्य विकसित हो गए। यद्यपि ये परिवर्तन बहुत धीमी गति से हुए और इस प्रक्रिया में कई हजार वर्ष लग गए, लेकिन जब शहर स्थापित हो गए और उनका विकास होने लगा तो इन परिवर्तनों की रफतार भी तेज हो गई। इसके अलावा, इन परिवर्तनों के दूरगामी परिणाम निकले। कुछ विद्वानों ने तो इसे ‘क्रांति’ कहकर पुकारा, क्योंकि लोगों के जीवन में संभवतः इतना अधिक परिवर्तन आ गया था कि उन्हें पहचानना ही मुश्किल हो गया था।
A.
नदियों के बीच भूमि
B. पहाड़ियों के बीच भूमि
C. समुद्र के बीच भूमि
D. रेगिस्तान के बीच भूमि
नाम 'मेसोपोटामिया' ग्रीक शब्द 'मेसोस' से लिया गया है, जिसका अर्थ है मध्य, और 'पोटैमोस', जिसका अर्थ है नदी।
A. काँस्य
B. ताम्र
C. पत्थर
D. लोहा
मेसोपोतामियन सभ्यता का विकास काँस्य युग के दौरान हुआ| काँस्य का उपयोग मानवीय जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में हुआ।
A. 1820 के दशक
B. 1840 के दशक
C. 1860 के दशक
D. 1890 के दशक
मेसोपोटामिया में पुरातत्व 1840 के दशक में शुरू हुआ| एक-दो स्टालों में, जैसे उरुक और मारी, उत्खनन कई दशकों तक चली|
A. आवाजों का संकेत
B. झंडे द्वारा संकेत
C. धुआँ द्वारा संकेत
D. आग द्वारा संकेत
मारी के राजाओं को सदा सतर्क एवं सावधन रहना पड़ता था। विभिन्न जन-जातियों के चरवाहों को राज्य में चलने-फिरने की इजाज़त तो थी, परन्तु उन पर कड़ी नज़्ार रखी जाती थी। राजाओं तथा उनके पदाधिकारियों के बीच हुए पत्रा-व्यवहार में इन पशुचारकों की गतिविधियों और शिविरों का उल्लेख किया गया है। एक पदाधिकारी ने राजा को लिखा कि उसने रात को बार-बार आग से किए गए ऐसे संकेतों को देखा, जो एक शिविर से दूसरे शिविर को भेजे थे, और उसे किसी छापे या हमले की योजना के बारे में संदेह हुआ।
A. अलेक्जेंडर
B. अस्सुरबनिपल
C. हम्मुराबी
D. नाबोनिदुस
स्वतंत्र बेबीलोन का अंतिम शासक नाबोनिदुस था|
A. 5000 ईसा पूर्व।
B. 4000 ईसा पूर्व।
C. 2000 ईसा पूर्व
D. 1000 ईसा पूर्व
सबसे प्राचीन ज्ञात मेसोपोटामियन मंदिर, जो दक्षिणी मेसोपोटामिया में स्तिथ था, अधपक्का ईटों से बनाया गया था| यह एक छोटा मंदिर था|
A. नुकीला
B. आकार
C. निशान
D. कलम
मेसोपोटामिया मिट्टी की तख्तियों पर लिखते थे।
A. पट्टलेख
B. जीत
C. उपकरण
D. शिलालेख
पट्टलेख प्राचीन इतिहास के बारे में जानकारी की महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक हैं।
A. अक्कदी
B. असीरियाई
C. एमोराइट
D. आर्मीनियन
अक्कदी, एमोराइट, असीरियाई और आर्मीनियन कुछ वर्ग थे, जो प्राचीन मेसोपोटामिया में शासन करते थे।
A. बहस दर्ज करने के लिए
B. धार्मिक पुस्तके लिखने के लिए
C. व्यापार लेनदेन दर्ज करने के लिए
D. गीतों को लिखने के लिए
जब एक समाज व्यापार में शामिल है, बातचीत, लेनदेन का रिकार्ड रखने के लिए आवश्यक हैं। इस सुविधा के लिए, लेखन विकसित किया गया था।
A. रिकॉर्ड बहस
B. धार्मिक पुस्तकों के बारे में
C. रिकॉर्ड व्यापार लेनदेन
D. गीतों को लिखना
जब एक समाज व्यापार में शामिल है, बातचीत, लेनदेन का रिकार्ड रखने के लिए आवश्यक हैं। इस सुविधा के लिए, लेखन विकसित किया गया था।
A. 7000-6000 ईसा पूर्व
B. 6000-5000 ईसा पूर्व
C. 5000-4000 ईसा पूर्व
D. 4000-3000 ईसा पूर्व
कृषि इराक (मेसोपोटामिया) में 7000-6000 ईसा पूर्व के बीच में विकसित हुई।
A. बेबीलोन
B. नीनवे
C. ऊर
D. उरुक
मेसोपोटेमिया परंपरा में, शहर जो कि 'शहर' नाम से जाना गया था, वह था उरुक|
A. फ़ारसी
B. सुमेरियन
C. संस्कृत
D. लैटिन
सुमेरियन मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी भाषा थी। यह 2600 ईसा पूर्व के आसपास इस्तेमाल की गयी थी।
A. पत्थर
B. दीवार के चित्रों
C. हस्तशिल्प
D. खाल
मारी मेसोपोटेमिया का एक समृद्ध व्यापारिक शहर था, जहाँ विदेशी लोग अक्सर आते थे। मारी के राजा का महल प्रशासनिक केंद्र था। इसका अक्सर विदेशी पर्यटकों द्वारा दौरा किया गया था। जिस कमरे में वे विदेशी अतिथियों से मिलते थे, वहां की दीवारें को भित्ति-चित्रों द्वारा सजाई गयी थी, जो अतिथियों को हतप्रभ करते थे।
A. 2000 ईसा पूर्व।
B. 20001 ईसा पूर्व।
C. 2002 ईसा पूर्व।
D. 2003 ईसा पूर्व।
2000 ईसा पूर्व के बाद, मारी की शाही राजधानी विक्सित हुई।
A. नाबोपोलास्सर
B. ज़िम्रिलिम
C. गिलगमेश
D. अलेक्जेंडर
नाबोपोलास्सर, जो नव बेबीलोन साम्राज्य के पहले राजा थे, नवम्बर 626 से - अगस्त 605 ईसा पूर्व तक राज किया।
A. अक्कड़
B. बेबीलोन
C. ऊर
D. उरुक
शहरी जीवन, व्यापर और लेखन के बीच में सम्बन्ध का उल्लेख एक लंबे सुमेरियन महाकाव्य में किया गया है| यह एनमर्कर के बारे में है, जो उरुक के सबसे प्राचीन शासकों में से एक थे|
A. कांस्य उपकरण
B. ईंट स्तंभों के निर्माण
C. कुम्हार का चाक
D. तेल निकलने वाली तकनीक
मेसोपोटेमिया सभ्यता ने पहिये के सिद्धांत की जल्द से जल्द खोज की थी, दक्षिणी इराक में। कुम्हार के चाक का उपयोग करने के लिए 4000-3000 ईसा पूर्व से इस अवधि के दौरान वापस पता लगाया है।
A. 2200 ईसा पूर्व
B. 3200 ईसा पूर्व
C. 4200 ईसा पूर्व
D. 5200 ईसा पूर्व
पहली मेसोपोटेमिया तख्तियाँ, 3200 ईसा पूर्व के आसपास लिखी गयी।
A. तख्ता
B. मुद्रण
C. मोती
D. ढांचा
मोहरें उन बक्सों पर लगाई जाती थी जिनमें समान रखकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाता थ। मोहरों की छपाई अर्द्ध गीली मिट्टी की सतह पर बनाई जाती थी फिर उन्हें सूखने दिया जाता था। यह शायद इसलिए किया जाता था जिससे बक्सा अपने गंतव्य तक पहुंचने से पहले या प्रेषक के पास वापस आने के बीच में कहीं ना खोला जाय।