A. शोचनीय थी।
B. खराब थी।
C. अच्छी थी।
D. सम्मानीय थी।
मेसोपोटामिया समाज में एक पत्नी विवाह का प्रचलन था। समाज में दहेज प्रथा के प्रचलन के साक्ष्य मिलते है, परन्तु माना जाता है इस पर वधु का अधिकार होता था।
A. वायुदेवता थे।
B. आकाश देवता थे।
C. सूर्य देवता थे।
D. चन्द्र देवता थे।
मेसोपोटामिया के लोगों का कई देवी देवता को मानते थे। उनमे से प्रमुख सूर्य, आकाश, वायु व चन्द्र देवता थे। सभ्यता के प्रत्येक नगर में एक प्रधान मंदिर होता था, और वहां का देवता नगर का संरक्षक माना जाता था।
A. सुमेरिया के लोग थे ।
B. असीरीया के लोग थे ।
C. काल्डीयन के लोग थे ।
D. बेबीलोनिया के लोग थे ।
ऐसा माना जाता है की बेबीलोनिया के लोग रेगिस्तान की घुमक्कड़ प्रजाति के थे। इन्होने ई० पू० 2000 के लगभग सुमेर को विजित कर बेबीलोनिया को अपनी राजधानी बनाया। इसी कारण इसे बेबीलोनिया की सभ्यता कहा जाता है।
A. 1/2 भाग कर के रूप में देना पड़ता था ।
B. 1/3 भाग कर के रूप में देना पड़ता था ।
C. 1/4 भाग कर के रूप में देना पड़ता था ।
D. 1/10 भाग कर के रूप में देना पड़ता था ।
सुमेरिया सभ्यता के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था । इस काल में नहरों व बंधो का निर्माण हुआ जिससे कृषि का विकास संभव हुआ । इसलिए राज्य ने कृषको के ऊपर कर लगाया जिससे होने वाली आय निर्माण कार्यों में व्यय की जाये अथवा संकट के समय लोगों को अन्न मुहैया कराया जा सके ।
A. अस्सुर बनीपल ने कराया था ।
B. हम्मुराबी ने कराया था ।
C. नेबूचद नजर ने कराया था ।
D. नेबोपोलेस्सर ने कराया था ।
नेबूचद नजर की रानी ईरान की राजकुमारी थी तथा उसे प्रकृति से बहुत अधिक प्रेम था । चूंकि मेसोपोटामिया में उपजाऊ भूमी की कमी थी इसलिए नजर ने रानी को खुश करने के लिए बेबीलोन में सुन्दर बाग़ लगवाये जिन्हें हैंगिंग गार्डन कहा गया ।
दजला व फरत नदियों के बीच का भाग जहां मेसोपोटामिया सभ्यता का विकास हुआ था एक चंद्राकार की तरह है इसलिए इस क्षेत्र को उपजाऊ क्रिसेंट कहा जाता है।
सुमेरिया सभ्यता में शासन धर्म पर आधारित था । राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था । सारगन प्रथम इसका संस्थापक था। राजा के बाद पुरोहित का महत्त्व होता था तथा उसके बाद अमेलू अर्थात धनी व्यक्तियों का स्थान होता था ।
सुमेरिया सभ्यता के प्रमुख चार नगर उर
हम्मुराबी बेबीलोनिया का शासक था । वह अत्यंत शक्तिशाली व योग्य शासक था । उसे विश्व का प्रथम कानून निर्माता भी कहा जाता है ।
असीरीया निवासियों ने सर्वप्रथम लोहे के औजारों का प्रयोग कृषि कार्य में किया ।
सुमेरिया सभ्यता के लोगों ने देवी देवताओं के लिए जो मंदिर बनाये थे उन्हें
मेसोपोटामिया की लिपि में 300 अक्षर प्रयुक्त होते थे । इन्हें
मेसोपोटामिया का शाब्दिक अर्थ ऎसी भूमी से है जो दो नदियों के मध्य स्थित हो । दजला व फरात नदियों के मध्य स्थित होने के परिणाम स्वरूप यहाँ पर पनपी सभ्यता को मेसोपोटामिया की सभ्यता के नाम से जाना जाता है ।
33 वर्ष की अल्पायु में सिकंदर की मृत्यु हुई थी।
336 ई.पू. में सिकंदर सिंहासन पर आरूढ़ हुआ था।
सिकंदर महान मकदूनिया के शासक फिलिप का पुत्र था।
अलेक्जेंडर यूरोप में मैसेडोनिया का वासी था और वह सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करना चाहता था। लेकिन वह केवल मिस्र, पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों और दक्षिण एशिया के कुछ भागों को जीतने में ही सक्षम था।
भारत की समकालीन अनेक विलुप्त सभ्यताए है ये है मैसोपोटोमिया, मिस्र, यूनान, एवं रोम आदि हैं।
बेबीलोनिया
सिकन्दर ने अनेक नगरों और दूर-दूर के क्षेत्रों में पक्के राजमार्गों का निर्माण करवाया था, जिससे व्यापार के क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई। आवागमन के साधनों से सांस्कृतिक समन्वय में भी बहुत सहायता मिली।
1.सिकन्दर के आक्रमण की तिथि से ही भारत में तिथि -क्रम प्रारम्भ हुआ।
2. सिकन्दर ने उत्तर -पश्चिम सीमांत , पंजाब और सिंधु प्रदेश के राज्यों को जीतकर उन्हें राजनितिक एकता प्रदान की।
खगोल और ज्योतिष शास्त्र में प्रगति यूनानियों के योगदान से हुई सप्ताह के, दिनों के नाम, सूर्य, चंद्रमा व अन्य गृहों के नामों पर यूनानी प्रभाव को दर्शाता है ।
रोम साम्राज्य में बंदरगाहों, खानों, खदानों, ईंट-भट्टों, जैतून के तेल की फैक्टरियों आदि की संख्या काफी अधिक थी, जिनसे उसका आर्थिक आधारभूत ढाँचा काफी मजबूत था। गेहूँ, अंगूरी शराब तथा जैतून का तेल मुख्य व्यापारिक मदें थीं जिनका अधिक मात्रा में उपयोग होता था और ये मुख्यतः स्पेन, गैलिक प्रांतों, उत्तरी अफ्रीका, मिस्र तथा अपेक्षाकृत कम मात्रा में इटली से आती थीं, जहाँ इन फसलों के लिए सर्वोत्तम स्थितियाँ उपलब्ध था। स्पेन में जैतून का तेल निकालने का उद्यम 140-160 ईस्वी के वर्षों में अपने चरमोत्कर्ष पर था।
भूमध्यसागर के आसपास पानी की शक्ति का तरह-तरह से इस्तेमाल किया जाता था। इस काल में जल-शक्ति से मिलें चलाने की प्रौद्योगिकी में ख़ासी प्रगति हुई। स्पेन की सोने और चाँदी की खानों में जल-शक्ति से खुदाई की जाती थी। उस समय सुगठित वाणिज्यिक और बैंकिंग-व्यवस्था थी और धन का व्यापक रूप से प्रयोग होता था। इन सभी बातों से हमें रोम की अर्थव्यवस्था के समुन्नत और प्रगतिशील होने की प्रवृत्ति का संकेत मिलता है।
जैसे-जैसे रोमन साम्राज्य का विस्तार दूर-दूर तक होता गया, रोमन साम्राज्य में सांस्कृतिक विविधता कई रूपों एवं स्तरों पर दिखाई दी, जैसे, धार्मिक सम्प्रदायों तथा स्थानीय देवी-देवताओं की भरपूर विविधता बोलचाल की अनेक भाषाएँ, वेशभूषा की विविध शैलियाँ, तरह-तरह के भोजन, सामाजिक संगठनों के रूप (जनजातीय और अन्य, यहाँ तक कि उनकी बस्तियों के अनेक रूप। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न भाषाओं का इस्तेमाल किया जाता था।परन्तु इनमें बहुत सी भाषाई संस्कृतियाँ पूर्णतः मौखिक थीं, वे कम से कम तब तक मौखिक रहीं जब तक उनके लिए एक लिपि का आविष्कार नहीं किया गया। उदाहरणार्थ, अर्मिनियाई भाषा का लिखना भी बहुत देर बाद पाँचवीं शताब्दी में शुरू हुआ। कईं स्थानों पर, लातिनी भाषा के प्रसार ने उन भाषाओं के लिखित रूप का स्थान ग्रहण कर लिया जिनका पहले से ही व्यापक प्रसार था।
दूसरी और तीसरी शताब्दियों के दौरान, अधिकतर प्रशासक तथा सैनिक अफसर इन्हीं उच्च प्रांतीय वर्गों में से होते थे जो प्रांतों को प्रशासित करते थे और सेना की कमान संभालते थे। थे। इस प्रकार उनका एक नया संभ्रांत वर्ग बन गया जो कि सैनेट के सदस्यों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली था क्योंकि उसे सम्राटों का समर्थन प्राप्त था। जैसे-जैसे यह नया समूह उभर कर सामने आया, सम्राट गैलीनस ने सैनेटरों को सैनिक कमान से हटाकर इस नए वर्ग के उदय को सुदृढ़ बना दिया। ऐसा कहा जाता है कि गैलीनस ने सैनेटरों को सेना में सेवा करने अथवा इस तक पहुँच रखने पर पाबंदी लगा दी थी ताकि साम्राज्य का नियंत्रण उनके हाथों में न जाने पाए।
संपूर्ण साम्राज्य में दूर-दूर तक अनेक नगर स्थापित किए गए थे जिनके माध्यम से समस्त साम्राज्य पर नियंत्रण रखा जाता था। भूमध्यसागर के तटों पर स्थापित बड़े शहरी केंद्र (कार्थेज,सिकंदरिया तथा एंटिऑक इनमें सबसे बड़े थे) साम्राज्यिक प्रणाली के मूल आधार थे। इन्हीं शहरों के माध्यम से ‘सरकार’ प्रांतीय ग्रामीण क्षेत्रों पर कर लगाने में सफल हो पाती थी, जिनसे साम्राज्य को अधिकांश धन-संपदा प्राप्त होती थी। इसका अर्थ यह हुआ कि स्थानीय उच्च वर्ग रोमन साम्राज्य को कर वसूली और अपने क्षेत्रों के प्रशासन के कार्य में सक्रिय सहायता देते थे। इटली और अन्य प्रांतों के बीच सत्ता का आकस्मिक अंतरण वास्तव में, रोम के राजनीतिक इतिहास का एक अत्यंत रोचक पहलू रहा है। दूसरी और तीसरी शताब्दियों के दौरान, अधिकतर प्रशासक तथा सैनिक अफसर इन्हीं उच्च प्रांतीय वर्गों में से होते थे जो प्रांतों को प्रशासित करते थे और सेना की कमान संभालते थे।
यद्यपि दास प्रथा की शुरूआत की गई थी और इसका श्रम के रूप में अधिकतर इस्तेमाल किया जाता था तथापि इसका अर्थ यह नहीं है कि रोम की अर्थव्यवस्था में सर्वदा श्रम दासों द्वारा ही किया जाता था। जब पहली शताब्दी में शांति स्थापित होने के साथ लड़ाई झगड़े कम हो गए तो दासों की आपूर्ति में कमी आने लगी और दास-श्रम का प्रयोग करने वालों को दास प्रजनन अथवा वेतनभोगी मज़दूरों जैसे सस्ते विकल्पों का सहारा लेना पड़ा। वेतनभोगी मजदूर सस्ते तो पड़ते ही थे, उन्हें आसानी से छोड़ा और रखा जा सकता था।
वास्तव में, रोम में सरकारी निर्माण-कार्यों पर, स्पष्ट रूप से मुक्त श्रमिकों का व्यापक प्रयोग किया जाता था क्योंकि दास-श्रम का बहुतायत प्रयोग बहुत मँहगा पड़ता था। भाड़े के मज़दूरों के विपरीत, गुलाम श्रमिकों को वर्ष भर रखने के लिए भोजन देना पड़ता था और उनके अन्य खर्चे भी उठाने पड़ते थे, जिससे इन गुलाम श्रमिकों को रखने की लागत बढ़ जाती थी। इसीलिए संभवतः बाद की अवधि में कृषि-क्षेत्र में अधिक संख्या में गुलाम मज़दूर नहीं रहे, कम-से-कम पूर्वी प्रदेशों में तो ऐसा ही हुआ। दूसरी ओर, इन दासों और मुक्त व्यक्तियों (अर्थात ऐसे दास जिन्हें उनके मालिकों ने मुक्त कर दिया था) को व्यापार-प्रबन्धकों के रूप में व्यापक रूप से नियुक्त किया जाने लगा, यहाँ स्पष्टतः उनकी अधिक संख्या में आवश्यकता नहीं थी।
नियोक्ताओं की यह आम धारणा थी कि निरीक्षण यानी देखभाल के बिना कभी भी कोई काम ठीक से नहीं करवाया जा सकता। इसलिए मुक्त तथा दास, दोनों प्रकार के श्रमिकों के लिए निरीक्षण सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू था। निरीक्षण को सरल बनाने के लिए, कामगारों को कभी-कभी छोटे दलों में विभाजित कर दिया जाता था। कोलूमेल्ला ने दस-दस श्रमिकों के समूह बनाने की सिफारिश की थी और यह दावा किया कि इन छोटे समूहों में यह बताना अपेक्षाकृत आसान होता है कि उनमें से कौन काम कर रहा है और कौन कामचोरी। इससे पता चलता है कि उन दिनों श्रम-प्रबंधन पर विस्तार से विचार किया जाता था।
वरिष्ठ प्लिनी एक प्रसिद्ध प्रकृति विज्ञान के लेखक ने दास समूहों के प्रयोग की यह कहकर निंदा की कि यह उत्पादन आयोजित करने का सबसे खराब तरीका है क्योंकि इस प्रकार अलग-अलग समूह में काम करने वाले दासों को आमतौर पर पैरों में जंजीर डालकर एक-साथ रखा जाता था। ऐसे तरीके कठोर और क्रूर प्रतीत होते हैं, लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि आज विश्व में अधिकांश फैक्ट्रियाँ श्रम नियंत्रण के कुछ ऐसे ही सिद्धान्त लागू करती हैं। वास्तव में, रोमन साम्राज्य में कुछ औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने तो इससे भी अधिक कड़े नियंत्रण लागू कर रखे थे।
वरिष्ठ प्लिनी ने सिकंदरिया की फ्रेंकिन्सेंस यानी सुगंधित राल (रेसिन)की फैक्ट्रियों के हालात का वर्णन किया है, जहाँ उनके अनुसार कितना ही कड़ा निरीक्षण रखो, पर्याप्त प्रतीत नहीं होता थाः कामगारों के ऐप्रनों पर एक सील लगा दी जाती है, उन्हें अपने सिर पर एक गहरी जाली वाला मास्क या नेट पहनना पड़ता है और उन्हें फैक्ट्री से बाहर जाने के लिए अपने सभी कपड़े उतारने पड़ते हैं।
कृषि श्रमिक अवश्य ही थके-थके से रहते होंगे और उन्हें नापसंद किया जाता होगा क्योंकि तीसरी शताब्दी के एक राज्यादेश में मिस्र के किसानों द्वारा अपने गाँव छोड़कर जाने का उल्लेख है जिसमें यह कहा गया है कि वे इसलिए गाँव छोड़कर जा रहे थे ताकि उन्हें खेती के काम में न लगना पड़े।
संभवतः यही बात अधिकांश फैक्ट्रियों और कारखानों पर लागू होती थी। 398 के एक कानून में यह कहा गया है कि कामगारों को दागा जाता था ताकि यदि वे भागने और छिपने का प्रयत्न करें तो उन्हें पहचाना जा सके ।
इतिहासकार टैसिटस ने प्रारंभिक साम्राज्य के प्रमुख सामाजिक समूहों का वर्णन इस प्रकार किया हैः सैनेटर (पैट्रेस, शाब्दिक अर्थः पिता), अश्वारोही ’वर्ग के प्रमुख सदस्य, जनता का सम्माननीय वर्ग, जिनका संबंध् महान घरानों से था, फूहड़ निम्नतर वर्ग यानी कमीनकारू (प्लेब्स सोर्डिडा), जो उनके अनुसार, सर्कस और थिएटर तमाशे देखने के आदी थे, और अंततः दास। तीसरी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षो में सैनेट की सदस्य संख्या लगभग 1,000 थी और कुल सैनेटरों में लगभग आधे सैनेटर अभी भी इतालवी परिवारों के थे। साम्राज्य के परवर्ती काल में, जो चौथी शताब्दी के प्रारंभिक भाग में कॉन्स्टैनटाइन प्रथम के शासन काल से आरंभ हुआ, टैसिटस द्वारा उल्लिखित पहले दो समूह (सैनेटर और नाइट या अश्वारोही )एकीकृत होकर एक विस्तृत अभिजात वर्ग बन चुके थे। और इनके कुल परीवारों में से कम से कम आधे परिवार अफ्रीकी अथवा पूर्वी मूल के थे। यह ‘‘परवर्ती रोमन’’ अभिजात वर्ग अत्यधिक धनवान था किन्तु कई तरीकों से यह विशुद्ध सैनिक संभ्रांत वर्ग से कम शक्तिशाली था,जिनकी पृष्ठभूमि अधिकतर अभिजात वर्गीय नहीं थीं। ‘मध्यम’ वर्गों में अब नौकरशाही और सेना की सेवा से जुड़े आम लोग शामिल थे, किन्तु इसमें अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध सौदागर और किसान भी शामिल थे जिनमें बहुत-से लोग पूर्वी प्रांतों के निवासी थे। टैसिटस ने इस सम्माननीय मध्यम वर्ग का महान सीनेट गृहों के आश्रितों के रूप में वर्णन किया है। मुख्य रूप से सरकारी सेवा और राज्य पर निर्भरता ही इन मध्यम वर्गीय परिवारों का भरण-पोषण करती थी। उनसे नीचे भारी संख्या में निम्नतर वर्गों का एक विशाल समूह था, जिन्हें सामूहिक रूप से ह्यूमिलिओरिस यानी ‘‘निम्नतर वर्ग’’ कहा जाता था। इनमें ग्रामीण श्रमिक शामिल थे जिनमें बहुत से लोग स्थायी रूप से बड़ी जागीर में नियोजित थे, औद्योगिक और खनन प्रतिष्ठानों के कामगार, प्रवासी कामगार जो अनाज तथा जैतून की फसल कटाई और निर्माण उद्योग वेफ लिए अधिकांश श्रम की पूर्ति करते थे, स्व-नियोजित शिल्पकार जो, ऐसा बताया जाता था, कि मजदूरी पाने वाले श्रमिकों की तुलना में बेहतर खाते-पीते थे, बहुत बड़ी संख्या में कभी-कभी काम करने वाले श्रमिक, विशेषकर बड़े शहरों में, और वस्तुतः हजारों गुलाम जो विशेष रूप से पूरे पश्चिमी साम्राज्य में पाए जाते थे। पाँचवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल के एक इतिहासकार ओलिपिओडोरस ने, जो एक राजदूत भी था, लिखा है कि रोम नगर में रहने वाले कुलीन परिवारों को उनकी संपदाओं से वार्षिक आय 4000 पाउंड सोने के बराबर होती थी, इसमें वह उपज शामिल नहीं थी जिसका उपभोग वे सीधे कर लेते थे।
A. अबू बकर
B. अली
C. मुहम्मद
D. उमर
हिजरी साल 354 दिन, 12 महीने का एक चंद्र आधारित वर्ष है
A. छापें
B. हज्र अल अस्वाद
C. मलिका
D. जकात
उन्होंने मक्का में कारवां और आसपास के ओअसेस् पर छापें और अभियानों का आयोजन किया।
A. अब्द अल मलिक
B. अब्बास
C. अली
D. गजनी के महमूद
अब्द अल मलिक (685-705) और उनके उत्तराधिकारियों के शासनकाल के दौरान अरब और इस्लामी पहचान पर जोर दिया गया था।
A. अबू बकर
B. मुहम्मद
C. उमर
D. उथमान
दूसरा खलीफा उमर था। हिजरी युग उमर के शासन के दौरान स्थापित किया गया था।
A. अबू बकर
B. अली
C. उमर
D. उथमान
तीसरे खलीफा, उथमान ने अपना नियंत्राण मध्य एशिया तक बढ़ाने के अभियान चलाए थे।
मोहर की छाप एक सील (मुद्रण) के रूप में जानी जाती है।
मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन का स्थान, 2400 ई.पू. के बाद, धीरे-धीरे अक्कदी भाषा ने ले लिया। अक्कदी भाषा, शब्द अथवा अक्षर की बनावट के लिए 600 भिन्न चिन्हों के प्रयोग द्वारा कीलाक्षर लिपि में लिखी जाती थी। अक्कदी भाषा की व्युत्पत्ति मेसोपोटामिया सभ्यता के मुख्य केंद्र अक्कद शहर से हुई है ।
मेसोपोटामिया सभ्यता के
मेसोपोटामिया के लोगों के कई योगदानों में से षटदाशमिक प्रणाली भी एक अंग थी। यह
प्राप्त अवशेषों के आधार पर ऐसा अनुमान लगाया जाता है की असीरीय के निवासी इतिहास लेखन से भी परिचित रहे होंगे । ऐसा अनुमान वहां पर प्राप्त हुई अनेक मिट्टी की तख्तियों को देखकर लगाया जाता है ।
मारी में सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण प्राप्ति राजा जिम्री-लिम का शाही महल है। महल प्रशासन और उत्पादन का केंद्र था । महल में लगभग 260 कक्ष, कोठर, आंगन और एक पुस्तकालय था जिसमें बीस हजार से अधिक कीलाक्षर तख्तियाँ निहित थीं। इन तख्तियों में मेसोपोटामिया के सभी भागों और उसके आसपास के क्षेत्र से कई राजनयिक पत्राचार का उल्लेख था ।
3000 ई.पू. का वार्का से एक सुमेरियन स्त्री का यह सिर एक सफेद संगमरमर को तराशकर बनाया गया था। यह प्राचीन मूर्तिकला का एक विश्व-प्रसिद्ध नमूना है, इसके मुख, ठोड़ी और गालों की सुकोमल-सुंदर बनावट के लिए इसकी प्रशंसा की जाती है।
मेसोपोटामिया के निवासियों द्वारा कीलाक्षर लिपि की खोज मानव की सबसे अधिक क्रांतिकारी खोज थी । लिपि के ज्ञान के फलस्वरूप ही तत्कालीन ज्ञान, विज्ञानं, साहित्य, धर्म एवं कानून आदि का संरक्षण संभव हुआ है । उत्खनन में प्राप्त बहुसंख्यक मिट्टी की तख्तियां एवं पुस्तकालय इनके भौतिक उन्नयन पर प्रकाश डालते हैं । हम्मुराबी की विधि संहिता इस बात का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करता है । मेसोपोटामिया में स्थापत्य कला भी उन्नत थी । शिल्पी मेहराब एवं गुम्बद निर्माण में दक्ष थे । राजाओं के भव्य प्रासाद व सुन्दर देवालयों का भी निर्माण हुआ है । मूर्तिकला का भी विकास हुआ है ओअर उसमे सजीवता का अभाव झलकता है ।
मेसोपोटामिया के निवासी बहुदेववाद में विशवास रखते थे । वे शमांश, अनु, नन्नार, एन्लिन, तथा ईश्तर की पूजा किया करते थे । प्रत्येक नगर में एक देवालय होता था जिसे जिगुरत कहते थे । जिगुरत उस समय का शिक्षा केंद्र भी था । मेसोपोटामिया के लोग प्राकृतिक शक्तियों की पूजा भी किया करते थे । प्रत्येक नगर का एक प्रधान देवता होता था नगर के ऊंचे स्थान पर मंदिर बना कर उसकी पूजा की जाती थी । देवताओं को प्रसन्न करने हेतु लोग पशुओं जैसे भेंड, बकरी की बाली भी चढाया करते थे । मेसोपोटामिया के निवासी पुनर्जनम व पर्लोक्वाद में भी विशवास रखते थे । इसकी पुष्टी मृतकों के साथ दफ़न की जाने वाली दैनिक उपयोग की वस्तुओं से लगता है ।
आरंभिक कीलाक्षर लिपि को समझने में कई साल लगे थे क्योंकि इसमें सैकड़ों चिन्ह थे। इसके अलावा, मेसोपोटामिया के लिपिक को सैकड़ों चिन्ह सीखने पड़ते थे और उसे गीली पट्टी पर उसके सूखने से पहले ही लिखना होता था। लेखन कार्य के लिए बड़ी कुशलता की आवश्यकता होती थी, इसलिए लिखने का काम अत्यंत महत्वपूर्ण बौद्धिक उपलब्धि के रूप में माना जाता था। इस प्रकार, इस लिपी के पठन एवं लेखन में केवल सीमित संख्या में ही व्यक्तियों को एक लिपिक के रूप में प्रशिक्षित किया जाता था।
दक्षिण मेसोपोटामिया के मंदिर विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं जैसे उर जो चंद्र देवता था और इन्नाना जो प्रेम व युद्ध की देवी थी, को समर्पित थे । प्रारम्भिक मंदिर ईंटों से बनाए जाते थे और समय के साथ बड़े होते गए। क्योंकि उनमें खुले आँगन व उनके चारों ओर कई कमरे बने होते थे। लेकिन मंदिरों की बाहरी दीवारें कुछ खास अंतरालों के बाद भीतर और बाहर की ओर मुड़ी हुई होती थीं। यही मंदिरों की विशेषता थी।साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं।
हम्मुराबी को संसार का प्रथम विधि निर्माता अथवा कानून निर्माता माना जाता है । उसके द्वारा स्थापित कानूनों की मान्यता आज भी बनी हुई है । हम्मुराबी ने स्वस्थ समाज एवं राज्य की स्थापना के लिए कानून तैयार करके उसे पत्थरों पर उत्कीर्ण करवाया था । 1902 में सूसा की खुदाई में फ्रांसीसी पुराविद को 8 फीट लम्बे बेलनाकार पत्थर पर हम्मुराबी की कानून संहिता प्राप्त हुई । इसमें हम्मुराबी को सूर्यदेव से कानून अर्जित करते हुए दिखाया गया है । यह विधि लेख लन्दन के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है । इस संहिता में 285 धाराएँ और लगभग 3600 पंक्तियाँ हैं ।
हम्मुराबी ने इसमें बेंकिंग के नियम, गिरवी के नियम, श्रमिकों और मालिकों के कर्त्तव्य एवं अधिकार, ब्याज दरों के निर्धारण संबंधी नियम व विधि,विवाह व उत्तराधिकार के नियम व अपराधों के लिए कठोर दंड की व्यवस्था की थी ।
विधि संहिता की धाराएँ -
१. कानून को कोई भी अपने हाथों में नहीं ले सकता । अपराधी को सजा देने का काम सरकार का है ।
२. कानून अमीर गरीब सबके लिए सामान है ।
३. सभी प्रकार के ठेकों के लिए नियम निर्धारित किये गए ।
४. कर्जदारों को रहत देने के लिए रेहान रखने की प्रथा चालू की गयी ।
५. ब्याज दरें निर्धारित की गयी । श्रमिकों की मजदूरी तय की गयी ।
मेसोपोटामिया की सभ्यता में समाज तीन भागों में बंटा था -
१. उच्च वर्ग
२. मध्य वर्ग
३. निम्न वर्ग
उच्च वर्ग - इस वर्ग में राजा, सामंत, उच्च अधिकारी, पुरोहित तथा राज परिवार के सदस्य होते थे । इस वर्ग के लोगों का जीवन विलासितापूर्ण वैभवपूर्ण एवं उच्चकोटी का था । इन्हें राज्य की और से विशेषाधिकार प्रदान किये गए थे ।
मध्य वर्ग - इस वर्ग में व्यापारी व किसान सम्मिलित थे । इनका जीवन सामान्य था । सभ्यता कृषि प्रधान थी उपजाऊ व उन्नत क्षेत्र होने के कारण लोग अधिक मात्र में अन्न व फल पैदा करते थे । मेसोपोटामिया के लोग शाकाहारी व मांसाहारी दोनों ही थे । मुख्य भोजन में गेहूं, जौ, दूध प्रमुख थे ।
निम्न वर्ग - इस वर्ग में दासों को सम्मिलित किया गया था । इनकी दशा बड़ी ही शोचनीय थी ।
मेसोपोटामिया में स्त्रियों की स्थिति संतोषजनक थी । एकलविवाह को आदर्श माना जाता था । उच्चवर्गीय लोग बहु विवाह भी करते थे ।
शहर सबसे पहले दक्षिण मेसोपोटामिया जो एक रेगिस्तान है में विकसित हुए।फरात और दजला नाम की नदियाँ उत्तरी पहाड़ों से निकलकर अपने साथ उपजाउ बारीक मिट्टी लाती रही है । जब इन नदियों में बाढ़ आती है अथवा जब इनके पानी को सिंचाई के लिए खेतों में ले जाया जाता है तब यह उपजाऊ मिट्टी वहाँ जमा हो जाती है।फरात नदी रेगिस्तान में प्रवेश करने के बाद कई धाराओं में बँटकर बहने लगती है। कभी-कभी इन धाराओं में बाढ़ आ जाती है और पुराने जमाने में ये धाराएँ सिंचाई की नहरों का काम देती थीं। इनसे आवश्यकता पड़ने पर गेहूँ, जौ और मटर या मसूर के खेतों की सिंचाई की जाती थी।दक्षिणी मेसोपोटामिया की खेती सबसे ज्यादा उपज देने वाली हुआ करती थी। हालांकि वहाँ फसल उपजाने के लिए आवश्यक वर्षा की कुछ कमी रहती थी।खेती के अलावा भेड़-बकरियाँ स्टेपी घास के मैदानों, पूर्वोत्तरी मैदानों और पहाड़ों के ढालों पर पाली जाती थीं । ये उपजाऊ स्थान बाढ़ की नदियों से काफी ऊँचाई पर स्थित थे, जिनसे भारी मात्रा में मांस, दूध् और ऊन आदि वस्तुएँ मिलती थीं। इसके अलावा, नदियों में मछलियों की कोई कमी नहीं थी और गर्मियों में खजूर के पेड़ खूब फल (पिंड खजूर) देते थे। शहरों का विकास ग्रामीण समृद्धी के कारण हुआ था।
मेसोपोटामिया में जो पहली पट्टिकाएँ पाई गई हैं वे लगभग 3200 ई.पू. की हैं। उनमें चित्र जैसे चिन्ह और संख्याएँ दी गई हैं। स्पष्टतः, लेखन कार्य तभी शुरू हुआ जब समाज को अपने लेन-देन का स्थायी हिसाब रखने की जरूरत पड़ी । लगभग 2600 ई.पू. के आसपास वर्ण कीलाकार हो गए और भाषा सुमेरियन थी। अब लेखन का इस्तेमाल हिसाब-किताब रखने के लिए ही नहीं, बल्कि शब्द-कोश बनाने, भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता प्रदान करने, राजाओं के कार्यों का वर्णन करने और कानून में उन परिवर्तनों को उद्घोषित करने के लिए किया जाने लगा जो देश की आम जनता के लिए बनाए जाते थे। मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन का स्थान, 2400 ई.पू. के बाद, धीरे-धीरे अक्कदी भाषा ने ले लिया। अक्कदी भाषा में कीलाकार लेखन का रिवाज ईसवी सन् की पहली शताब्दी तक अर्थात् 2000 से अधिक वर्षों तक चलता रहा।
A. 5वीं शताब्दी ईस्वी
B. 6वीं शताब्दी सीई
C. 7वीं शताब्दी
D. 8वीं सदी सीई
इस्लाम एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ "प्रस्तुत" है
A. पिता की
B. पति की
C. माता की
D. बेटे की
शादी के समय महिला का दहेज पति के पास चला जाता था। महिला उसके पिता की मुख्य वारिस होती थी और उसके पिता की मृत्यु के बाद संपत्ति की स्वतंत्र मालिक बन जाती थी।
A. 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व
B. 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व
C. 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व
D. 8वीं सदी ईसा पूर्व
असीरियाई साम्राज्य पश्चिमी एशिया में दजला नदी के ऊपरी घाटी में स्थित था। यह नौवी से सातवीं सदी ईसा पूर्व के बीच अपने चरम पर था।
A. हावी
B. प्रिन्सिपेट
C. रेसपब्लिका
D. अत्याचारी
प्रिन्सिपेट रोमन साम्राज्य की पहली अवधि थी जो सीजर ऑगस्टस के शासनकाल की शुरुआत से तीसरी शताब्दी के संकट तक मानी जाती है।
A. वास्तु अवशेष
B. जीवाश्म अवशेष
C. पैपाइरस
D. पत्थर शिलालेख
पैपाइरसएक ईख की तरह का पौधा है जो कि मिस्र में नील नदी के किनारे पैदा होता है।
A. 438 ईस्वी
B. 538 ईस्वी
C. 638 ईस्वी
D. 738 ईस्वी
यरूशलेम ईसाइयों की नजरो में एक महत्वपूर्ण स्थान था। यह जगह यीसू के सूली पर चढ़ाये जाने और उनके दोबारा जी उठने के साथ जुडी हुई है।
A. 1098 सीई से 1099 सीई
B. 1145 सीई से 1149 सीई
C. 1189 सीई से 1192 सीई
D. 1195 सीई से 1197 सीई
प्रथम धर्मयुद्ध में, फ्रांस और इटली के सैनिकों ने सीरिया में एंटीओक पर कब्जा कर लिया, और यरूशलेम का अपना दावा किया था।
A. 104 अध्यायों
B. 114 अध्यायों
C. 120 अध्यायों
D. 130 अध्यायों
कुरान अरबी भाषा में लिखा गया था। अध्याय या 'सुरा' को उनकी लंबाई के अनुसार जगह दी गयी है, सबसे छोटा अध्याय सबसे पीछे रखा गया है।
A. अब्द अल मलिक
B. अली
C. हुसैन
D. मुआविया
661 ईस्वी में अली की हत्या के बाद मुआविया ने खुद को अगला खलीफा घोषित किया और उसने उमय्यद राजवंश की संस्थापना की थी।
A. अबू बकर
B. अली
C. उमर
D. उथमान
मोहम्मद की मृत्यु के बाद, कई जनजातियों ने इस्लामी राज्य से नाता तोड़ लिया था। पहले खलीफा, अबू बकर ने अभियानों की एक श्रृंखला के द्वारा इस विद्रोह को दबा दिया था।
A. अरब और ईरानी
B. शिया और सुन्नी
C. उमय्यदों और अब्बासिद
D. तुर्क और समानी
अली तीसरे खलीफा, उथमान की मौत के बाद चौथा खलीफा था। अली ने मुहम्मद की पत्नी आयशा को ऊट की लड़ाई में पराजित किया था।
A. बुहावी
B. ईरानी
C. समानी
D. तुर्क
तुर्किस्तान (अराल सागर के उत्तर-पूर्व में चीन की सीमाओं तक) की मध्य एशियाई मैदान से खानाबदोश जनजाति थी। उन्होंने धीरे-धीरे इस्लाम को अपनाया था।
A. चीन
B. मिस्र
C. हड़प्पा
D. मेसोपोटामिया
महान मस्जिद को 850 ईस्वी में बनाया गया था। मीनार 50 मीटर ऊँची है, और ईंट से बनी है।
A. भगवत गीता
B. महाभारत
C. पंचतंत्र
D. रामायण
पहलवी प्राचीन ईरान की पवित्र पुस्तकों की भाषा थी।
A. अल-मुतवक्किल
B. अल मामून
C. अल रशीद
D. अल मलिक
अबु खलीफा अल मामुन का मानना था कि कुरान परमेश्वर की रचना है
A. मुआविया
B. आयशा
C. उथमान
D. हुसैन
अली चौथा खलीफा था। उन्होंने ऊट की लड़ाई में खुद को स्थापित किया और मुहम्मद की पत्नी आयशा के नेतृत्व वाली एक सेना को पराजित किया था।
A. यहूदी और इसाई
B. यहूदी और मुसलमान
C. शिया और ईसाई
D. सुन्नी और यहूदी
इस्लामी साम्राज्य में यहूदी और ईसाइयों को संरक्षित नागरिक के रूप में घोषित किया गया था।
A. अशरफ
B. अता
C. खराज या जजिया
D. जकात
खराज या जजिया जैसे करों के कारण,यहूदियों और ईसाइयों को उनके सांप्रदायिक मामलों के संचालन में स्वायत्तता दी गई थी
A. राबिया
B. आयशा
C. फातिमा
D. खादीजा
सूफी परमानंद प्रेरित और प्यार और जुनून की भावनाओं को प्रोत्साहित करने के लिए संगीत समारोहों का इस्तेमाल किया करते है। बसरा की राबिया ने भगवान के प्रचार के लीये भगवान (इश्क) के लिए एक गहन प्यार को माध्यम बनाया था।
A. अलेक्जेंडर
B. एलेक्सियस प्रथम
C. मलिक शाह
D. अर्बन द्वितीय
बगदाद के सुल्तान मलिक शाह की 1092 में मौत ने बाइज़ेटाइन सम्राट को एशिया माइनर और उत्तरी सीरिया को हासिल करने का एक मौका दिया था।
दमिश्क(डमास्कस) उमय्यद खलीफा की राजधानी थी
मुहम्मद बिन कासिम ने 712 ई. में सिंध प्रांत पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया था।
अबू बक्र, मुहम्मद के तुरंत बाद उनका उत्तराधिकारी बना था
मुसलमानों के कैलेंडर का नाम हिजरी है
ईसाइयों और यहूदियों ने मुहम्मद पर अपना प्रभाव छोड़ा था
तोलुई, जो चंगेज़ खान के सबसे छोटा बेटा था, के वंशज ने, चीन और ईरान पर शासन किया था।
ख्वारज़्म के शासक, सुल्तान मुहम्मद ने, 1218 ईसवी में, मंगोल प्रतिनिधियों को मार डाला। इसीलिए, 1221 ईसवी में, मंगोल ने ख्वारज़्म पर हमला किया।
बातू खान, चंगेज़ खान के एक पोते, ने एश्यिा में चीन के कई हिस्से; तथा यूरोप में रूस, पोलैंड, हंगरी और पर कब्ज़़ा कर लिया।
गज़न खान, चंगेज़ खान के सबसे छोटे बेटे तोलुई के वंशज का था। वह इस्लाम में परिवर्तन करने वाला सबसे पहला मंगोल था।
युद्धकला के क्षेत्र में चीन वासियों की सबसे महत्वपूर्ण देन बारूद की खोज है।
चंगेज खान चीनी को हराने में सफल रहा था, क्योंकि इस समय चीनी समाज, एक विभाजित समाज था, और इस पर तीन राजवंशों, जिनमें से प्रत्येक का एक स्वतंत्र क्षेत्र पर नियंत्रण था, के द्वारा शासन किया जा रहा था !
यद्यपि चंगेज खान ने, अपने अभियानों में से एक से, उत्तर भारत और असम के माध्यम से वापस लौटने पर विचार किया था, किन्तु उसके भविष्यवक्ता द्वारा गर्मी, प्राकृतिक वास और बीमार चिन्हों की सुचना प्राप्त होने पर उसने अपना विचार बदल दिया, अतः भारत, चंगेज खान के निशाने से बच गया था!
चीन की महान दीवार(ग्रेट वॉल) चीन में, उत्तरी चीन और मध्य एशिया के कृषि समाज पर खानाबदोशों के हमलो द्वारा उत्त्पन्न की गई अशांति और भय की प्रतीक है!
मंगोल, लोगों की एक विविधतापूर्ण इकाई थी, जो भाषा में पूर्व में तारतर्स, खितान और मंचू से तथा पश्चिम में तुर्की जनजाति से साम्यता रखते थे, कुछ मंगोल चरवाहे थे, जबकि कुछ शिकारी संग्रहकर्ता थे, वे मध्य एशिया के घास के मैदानों(स्टेपिज़)में खानाबदोश के रूप में जीवन व्यतीत करते थे!
1270 ईसवी में, मंगोल का चीन में सुंग राजवंश पर विजय के बाद, चंगेज खान का एक पोता, कुबलाइ खान, शहरों और किसानों के रक्षक के रूप में उभरा।
उत्तर: चंगेज खान, वर्तमान समय के मंगोलिया के उत्तर में ओनोन नदी के समीप 1162 में पैदा हुआ था, चंगेज खान क प्रारम्भिक जीवन बहुत मुश्किल था, उसके पिता की कम उम्र में हत्या कर दी गई थी, अपने भाइयों और सौतेले भाइयों के साथ उसका पालन-पोषण, उसकी माँ के द्वारा किया गया था, अगले दस वर्ष कठिनाइयों से भरे हुए थे, एक बार उसे गुलाम बना दिया गया था, और उसके विवाह के तुरन्त बाद उसकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया था, जिसे पुनः प्राप्त करने के लिये उसे लड़ना पड़ा था, उसने एक मित्र बोघुरचु, उसके भाई जमुका, और वृद्व चाचा, ओंग खान के साथ मिलकर गुट का भी निर्माण किया था, 1180 से1190 तक उसने, ओंग खान के साथ उसके गुट का इस्तेमाल जमुका के खिलाफ किया, इस के पश्चात उसने अपने आत्मविश्वास में वृद्धी की और कई अन्य जनजातियों के खिलाफ आगे बढ़ा और उसने अपनी स्थिति मजबूत कर ली, इससे उसका मैदानी क्षेत्र(स्टेपीज़ लैंड) की राजनीति में प्रभाव बढ़ गया, मंगोल सरदार की परीषद ने इसे मान्यता प्रदान की और उसे चंगेज खान का खिताब दिया गया, वह अपने समय के सबसे बर्बर शासक के रूप में माना जाता था!
उसकी सैनिक उपलब्धियां विस्मित कर देने वाली थीं। यह बहुत हद तक स्टेपी-क्षेत्र की युद्ध शैली के बहुत से आयामों को आवश्यकतानुसार परिवर्तन और सुधार करके उसको प्रभावशाली रणनीति में बदल पाने का परिणाम था। मंगोलों और तुर्कों के घुड़सवारी और तीरंदाजी के कौशल ने उसकी सेना को गति प्रदान की थी। उन्होंने घोर शीत-ऋतु में युद्ध अभियान प्रारंभ किए तथा उनके नगरों और शिविरों में प्रवेश करने के लिए बर्फ से जमी हुई नदियों का राजमार्गों की तरह प्रयोग किया और युद्ध के लिए एक प्रभावी रणनीति के रूप में इलाके में चलायमान प्रकाश के अपने ज्ञान को उपयोग में लाया।चंगेज़ खान ने घेराबंदी-यंत्र (सीज-इंजन)और नेफ्था बमबारी के महत्त्व को शीघ्र जाना। उसके इंजीनियरों ने उसके शत्रुओं के विरुद्ध अभियानों में इस्तेमाल के लिए हल्के चल -उपस्कर (लाइट पोर्टेबल ईक्विपमेंट)का निर्माण किया जिसके युद्ध में घातक प्रभाव होते थे। उसने इनका प्रयोग अपने विरोधियों के विरुद्ध किया।

1206 में, चंगेज खान ने यासा, अर्थात आज्ञप्ति या आदेश, को प्रख्यापित किया। मंगोल की पहचान की रक्षा करने हेतु, यासा कानून का इस्तेमाल, एक आधिकारिक संहिता के रूप में, किया गया। चंगेज खान की तुलना, मूसा और सुलैमान जैसे कानून निर्माताओं से की गई। मंगोल की दृष्टि में उन्होंने मंगोल की जातीयता को बरकरार रखा।
चंगेज खान ने पहले से ही एक फूर्तीली हरकारा पद्धति अपना रखी थी जिससे राज्य के दूरदराज के स्थानों में परस्पर संपर्क रखा जाता था। अपेक्षित दूरी पर निर्मित सैनिक चैकियों में स्वस्थ एवं बलवान घोड़े तथा घुड़सवार संदेशवाहक तैनात रहते थे। इस संचार पद्धति की व्यवस्था करने के लिए मंगोल यायावर अपने पशु-समूहों से अपने घोड़े अथवा अन्य पशुओं का दसवाँ हिस्सा प्रदान करते थे। इसे कुबकुर कर कहते थे।इस उगाही को यायावर लोग अपनी स्वेच्छा से प्रदान करते थे, जिससे उन्हें अनेक लाभ प्राप्त होते थे। चंगेज़ खान की मृत्यु के उपरांत इस हरकारी पद्धति (याम) में और भी सुधर लाया गया। इस पद्धति की गति तथा विश्वसनीयता यात्रियों को आश्चर्य में डाल देती थी। इससे महान खानों को अपने विस्तृत महाद्वीपीय साम्राज्य के सुदूर स्थानों में होने वाली घटनाओं की निगरानी करने में सहायता मिलती थी।
जब ये अभियान रुक गए और मंगोल विजय से शांति स्थापित हो गई तो इससे व्यापारिक संबंध् परिपक्व हुए। रेशम मार्ग पर व्यापार और भ्रमण अपने शिखर पर पहुँचा।अब रेशम मार्ग चीन में ही खत्म नहीं होता था।यह उत्तर की ओर मंगोलिया तथा नवीन साम्राज्य के केंद्र कराकोरम की ओर बढ़ गया। संचार और यात्रियों के लिए सुलभ यात्रा मंगोल शासन की एकजुटता को बनाए रखने हेतु अत्यंत आवश्यक थी। सुरक्षित यात्रा के लिए यात्रियों को पास जिसे फारसी में पैजा और मंगोल भाषा में जेरेज कहा जाता था,जारी किए जाते थे। इस सुविधा के लिए व्यापारी बाज नामक कर अदा करते थे जिसका यह तात्पर्य था, कि वे मंगोल शासक (खान) की सत्ता स्वीकार करते थे।
ऐसा कहा जाता है कि चंगेज़ खान ने यास 1206 के किरिलताई में लागू की थी। अपने प्रारंभिक स्वरूप में यास को यसाक लिखा जाता था जिसका अर्थ था विधि, आज्ञप्ति व,आदेश। तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक, किसी तरह से मंगोलों ने यास शब्द का प्रयोग ज्यादा सामान्य रूप में करना शुरू कर दिया। इसका मतलब था चंगेज खान की विधि-संहिता। । इस बात की पूरी संभावना है कि यास मंगोल जनजाति की ही प्रथागत परंपराओं का एक संकलन था। यास मंगोलों को समान आस्था रखने वालों के आधार पर संयुक्त करने में सफल हुआ। उसने चंगेज़ खान और उनके वंशजों से मंगोलों की निकटता को स्वीकार किया। यद्यपि मंगोलों ने भी काफी हद तक स्थानबद्ध जीवन-प्रणाली के कुछ पहलुओं को अपना लिया था, फिर भी यास ने उनको अपनी कबीलाई पहचान बनाए रखने और अपने नियमों को उन पराजित लोगों पर लागू करने का आत्म-विश्वास दिया।यास एक बहुत ही सशक्त विचारधारा थी। यह चंगेज खान की कल्पना-शक्ति से प्रेरित थी जिसने विश्वव्यापी मंगोल राज्य की संरचना में अहम भूमिका निभाई।
चंगेज खान, पुरानी जनजातीय प्रतिद्वंद्विता एवं उन विभिन्न जनजातीय समूहों जो उसके महासंघ के सदस्य थे, की पहचान को मिटाने को कृत-संकल्प था। उसने दशमलव इकाइयों में सेना को संगठित करने की प्रथा को समाप्त कर दिया। उसने प्राचीन जनजातीय समूहों को विभाजित कर उनके सदस्यों को नवीन सैनिक इकाइयों में विभक्त कर दिया। उस व्यक्ति को जो अपने अधिकारी से अनुमति लिए बिना बाहर जाने की चेष्टा करता था, उसे कठोर दंड दिया जाता था। सैनिकों की सबसे बड़ी इकाई लगभग दस हजार सैनिकों (तुमन) की थी जिसमें अनेक कबीलों और कुलों के लोग शामिल होते थे। नयी सैनिक टुकडि़यों को, जो उसके चार पुत्रों के अधीन थीं और विशेष रूप से चयनित कप्तान के अधीन कार्य करती थी, नोयान कहा जाता था। इस नयी व्यवस्था में उसके अनुयायियों का वह समूह भी शामिल था जिन्होंने बड़ी निष्ठा से, कई वर्ष घोर प्रतिकुल अवस्था में भी चंगेज खान का साथ दिया था।
A. कैंटरबरी टेल्स
B. ओलिवर ट्विस्ट
C. द मिलर्स टेल
D. पार्लियामेंट ऑफ़ बर्ड्स
इस उपन्यास में, पात्रों की कहानियां व विवरण का प्रयोग अंग्रेज़ी समाज, विशेषकर चर्च का, विरोधाभास व आलोचनात्मक किया गया है|
सामंतो द्वारा जिन अधिकारों का उपभोग किया जाता था, उनमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं -
1 ) उन्हें, संपत्ति पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त था, जो कि उन्हें स्वामी (राजा) द्वारा प्रदान की जाती थी।
2 ) वे, 'सामंती सेना' के रूप में पहचानी जाने वाली सैनिकों की टुकड़ी रख सकते थे, एवं उन्हें सिक्के ढ़ालने का भी अधिकार था।
श्रेणियाँ, मध्ययुगीन यूरोप में आर्थिक संगठन का आधार थीं, प्रत्येक शिल्प अथवा उद्योग को एक श्रेणी में संगठीत किया गया था। ये श्रेणियाँ, माल की गुणवत्ता, मूल्य एवं बिक्री को नियंत्रित करती थीं ।
13 वीं सदी में, कई कृषिदास उनके मालिको की दासता से भाग निकले थे और नए शहरों में जाकर छुप गए थे, यदि उनके मालिक, उन्हें नहीं खोज पाते थे और वें सफलतापूर्वक एक वर्ष की अवधि पूर्ण कर लेते थे, तो वे एक स्वतन्त्र व्यक्ति की भांति जीवन यापन कर सकते थे, इस कारण मध्ययुगीन यूरोप में यह कहावत लोकप्रिय हो गयी थी।
जागीर, यूरोप की सामंती व्यवस्था में प्रशासन की सबसे निम्न इकाई थी, जागीर, सामंतों को दी जाने वाली संपत्ति होती थी। इस जागीर में अनेक गांवों के साथ विशाल प्रदेश होते थे, एवं लगभग सभी प्रकार के संसाधन होते थे।
'एंजल्स' और सक्सोंस, केंद्रीय यूरोप से आए थे, और छठी शताब्दी के दौरान इंग्लैंड में बस गये थे। देश का नाम ‘इंग्लैंड’ शब्द 'एंजल-लेंड' का ही संशोधित रूप है, क्योंकि इंग्लैंड में 'एंजल्स' निवास करते थे ।