ऑस्ट्रेलिया में '‘अश्वेत’ को बाहर रखने की नीति’" श्रम के मुद्दे से संबंधित थी। कुछ मूल निवासी ऐसे सख्त हालात में खेतों में काम करते थे कि उसका दासप्रथा से अंतर बहुत कम था। मूल निवासीयों के अलावा बाद में चीनी आप्रवासियों ने सस्ता श्रम मुहैया कराया।लेकिन बाद में चीनी आप्रवासियों को प्रतिबंधित कर दिया गया था। ऑस्ट्रेलिया में '‘अश्वेत’ को बाहर रखने की नीति’" 1890 से 1950 तक सभी सरकारों एवं ऑस्ट्रेलिया में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की सरकारी नीति बन गई थी। इस नीति के तत्व 1970 के दशक तक अस्तित्व में बने रहे थे। 1974 तक लोगों के मन में यह भय घर कर गया था कि दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के ‘गहरी रंगत वाले’ लोग बड़ी तादाद में ऑस्ट्रेलिया आ सकते हैं, और इसीलिए ऑस्ट्रेलिया में ‘अश्वेतों’ को बाहर रखने के लिए सरकार द्वारा यह नीति अपनाई गई थी।
1968 में एक मानवशास्त्री डब्ल्यू.ई.एच.स्टैनर ने शीर्षक दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस पर एक व्याख्यान दिया था। उनके इस व्याख्यान ने 'आदिवासी जातियों को समझने के लिए उनके बारे में अध्ययन के महत्व के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। जिसे आगे चल कर हेनरी रेनॉल्ड्स ने अपनी प्रभावशाली पुस्तक, व्हाइ वरंट वी टोल्ड? (हमें बताया क्यों नहीं गया?), में सामने रखा। इस किताब में ऑस्ट्रेलियाई इतिहास लेखन के उस ढर्रे की भर्त्सना की गई थी, जिसमें कैप्टन कुक की ‘खोज’ से ही इतिहास की शुरुआत मानी जाती थी।उसके बाद से मूल निवासियों की संस्कृतियों का अध्ययन करने के लिए विश्वविद्यालयी विभागों की स्थापना हुई है। कलादीर्घाओं (आर्ट गैलरीज़) में देसी कलाओं की दीर्घाएँ शामिल की गई हैं, देसी संस्कृति को समझानेवाले कल्पनाशील तरीके से सज्जित कमरों के लिए संग्रहालयों में जगह बनाई गई है, और मूल निवासियों ने अपने जीवन-इतिहासों को लिखना शुरू किया है। यह सब एक अद्भुत प्रयास है। यह प्रयास समय रहते शुरू हो गया। अगर मूलनिवासियों की संस्कृतियों की अनदेखी बदस्तूर जारी रहती, तो इस समय तक उसका काफी कुछ विस्मृति की गर्त में जा चुका होता। 1974 से‘बहुसंस्कृतिवाद’ ऑस्ट्रेलिया की राजकीय नीति रही है, जिसने मूल निवासियों की संस्कृतियों और यूरोप तथा एशिया के आप्रवासियों की भांति-भांति की संस्कृतियों को समान आदर दिया है।
1920 के दशक तक संयुक्त राज्य अमरीका और कनाडा के मूल निवासियों के लिए कुछ भी बेहतर होना शुरू नहीं हुआ। संयुक्त राज्य अमरीका की समस्त जनता को प्रभावित करनेवाली बड़ी आर्थिक मंदी से कुछ साल पहले, 1928 में समाजवैज्ञानिक लेवाइस मेरिअम के निर्देशन में संपन्न हुआ एक सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ - दि प्रॉबलम ऑफ इंडियन एडमिनिस्ट्रेशन- जिसमें रिज़र्वेशन में रह रहे मूल निवासियों की स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाओं की दरिद्रता का बड़ा ही दारुण चित्र प्रस्तुत किया गया था।
गोरे अमरीकियों के मन में उन मूल निवासियों के प्रति सहानुभूति जागी, जिन्हें अपनी संस्कृति को पूरा-पूरा निभाने से रोका जाता था और साथ-ही-साथ नागरिकता के लाभों से भी वंचित रखा जाता था। इसने संयुक्त राज्य अमरीका में एक युगांतरकारी कानून को जन्म दिया – ‘1934 का इंडियन रिऑर्गेनाइज़ेशन एक्ट’ – जिसके द्वारा रिज़र्वेशन में मूल निवासियों को ज़मीन खरीदने और ऋण लेने का अधिकार हासिल हुआ। और इस तरह यह उनके लिए कई आर्थिक विकास लेकर आया।
‘नयी दुनिया’ के मूल निवासियों के लिए अंग्रेज़ी में निम्नलिखित विभिन्न शब्दों का प्रयोग किया गया था –
अबोरिन-नेटिव पीपल ऑफ औस्ट्रेलिया (लैटिन में ऐब का मतलब है, ‘से’ और ओरिजिन का, ‘शुरुआत’) । एबोरिजिनल-
एक विशेषण, जिसे संज्ञा की तरह इस्तेमाल करने की गलती अक़्सर की जाती है।
अमेरिकन इंडियन/एमरिंड अमेरींडियन- उत्तरी
और दक्षिणी अमरीका तथा कैरेबियन के मूल निवासी।
फर्स्ट नेशंस पीपल्स-मूल निवासियों के संगठित समूह, जिन्हें कनाडाई सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त थी (1876 के इंडियन्स एक्ट में ‘बैंड्स’ पद का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन 1980 के दशक से ‘नेशन्स’ शब्द प्रयुक्त होने लगा)
इंडिजीनस पीपल- ऐसे लोग, जो किसी जगह में हमेशा से रहते आए हैं ।
नेटिव अमेरिकन-उत्तरी और दक्षिणी अमरीका के देसी लोग (यह पद अब बहुप्रचलित है)
रेड इंडियन- गेहुंए वर्ण के लोग, जिनके निवास-स्थान को कोलंबस ने गलती से इंडिया समझ लिया था।
A. वैश्विक परस्पर निर्भरता प्राप्त
B. वंशवादी शासन बहाल
C. लोकतांत्रिक सुधारों को लागू
D. चीन में विदेशी प्रभाव का अंत
सन यात-सेन के "लोगों के तीन सिद्धांत" और त्यानआनमेन चौक विरोध प्रदर्शन और भी अधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता हासिल करने का चीनी लोगों का एक प्रयास का उदाहरण हैं।
A. वंशवादी शासन समाप्त करना
B. औद्योगिक के विकास में खलल डालना
C. पूंजीवाद को प्रोत्साहित करना
D. मानव अधिकारों की गारंटी
दोनों ग्रेट लीप फॉरवर्ड और सांस्कृतिक क्रांति उनके मूल लक्ष्यों में विफल रही थी और इससे चीन की अर्थव्यवस्था में विघटन हुआ था।
A. 1886
B. 1887
C. 1888
D. 1889
जापान में मीजी शासन के दोरान विनिर्माण क्षेत्र में महिलाओं की संख्या आधे से अधिक थी।
A. सैन्य प्रशिक्षण में बौद्ध धर्म पर बल देना
B. भूमि सुधार और विदेशी साम्राज्यवाद से लड़ना
C. उनके खेमे में महत्वपूर्ण व्यवसायियों को शामिल करना
D. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ सफलतापूर्वक लड़ाई लड़ना
चीनी कम्युनिस्टों को किसानों और महिलाओं का भारी समर्थन हासिल था। इन समूहों को उनके समर्थन के बदले में बेहतर रहने की स्थिति और समानता का वादा किया गया था।
A. दूसरे देशों से अलग-थलग जापान
B. चीन के साथ राजनीतिक संघ को प्राप्त करने
C. एक औद्योगिक शक्ति के रूप में जापान की स्थापना
D. पश्चिमी देशों द्वारा एशिया के औपनिवेशीकरण को प्रोत्साहित करना
1853 में कमांडर पेरी की यात्रा के बाद बाद जापानी सरकार द्वारा तेजी से औद्योगिकीकरण के लिए एक निति बनाई गयी थी,जिससे कि जापान पश्चिम में राष्ट्रों के साथ बराबरी पर आ सके।
A. 'फासिस्ट आदमी'
B. 'नाजी आदमी'
C. 'जातिवादी आदमी’
D. 'सोशलिस्ट आदमी'
माओ त्से तुंग ने जन्मभूमि, लोग, श्रम, विज्ञान और सार्वजनिक संपत्ति के विचार के लिए एक सोशलिस्ट आदमी के विचार को बढ़ावा दिया था।
A. पश्चिमी देशों के साथ सांस्कृतिक संपर्क
B. अलगाव की नीति
C. दक्षिण पूर्व एशिया में सैनिक शासन
D. संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ व्यापार संबंधों
पेरी के अमेरिकी सैन्य शक्ति के प्रदर्शन के बाद, जापान ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ व्यापार शुरू किया था।
A. फ्रांस
B. इंग्लैंड
C. हॉलैंड
D. रूस
1853 से पहले, जापान एक एकान्तवादी नीति का पालन करता था। केवल डच को नागासाकी में कारखाना लगाने की अनुमति थी।
A. 1895
B. 1896
C. 1897
D. 1898
1895 और 1945 के बीच, ताइवान, जापान के साम्राज्य का हिस्सा था। ताइवान जापान की पहली विदेशी कॉलोनी थी।
ब्रिटेन की संसद ने 1795 में दो जुड़वाँ अधिनियम पारित किए, जिनके अंतर्गत ‘लोगों को भाषण या लेखन द्वारा सम्राट, संविधान, या सरकार के विरुद्ध घृणा या अपमान करने के लिए उकसाना’ अवैध् घोषित कर दिया गया और 50 से आधिक लोगों की अनाधिकृत सार्वजनिक बैठकों पर रोक लगा दी गई। लेकिन ‘पुराने भ्रष्टाचार’ के विरुद्ध आंदोलन बराबर चलता रहा। ‘पुराना भ्रष्टाचार’ शब्द का प्रयोग राजतंत्र और संसद के संबंध् में किया जाता था। संसद के सदस्य जिनमें भू-स्वामी, उत्पादक तथा पेशेवर लोग शामिल थे, कामगारों को वोट का अधिकार दिए जाने के खिलाफ थे। उन्होंने ‘कार्न लॉज़ (अनाज के कानून) का समर्थन किया। इस कानून के अंतर्गत विदेश से सस्ते अनाज के आयात पर रोक लगा दी गई थी जब तक कि ब्रिटेन में इन अनाजों की कीमत में एक स्वीकृत स्तर तक वृद्धि न हो गई हो। जैसे-जैसे श्रमिकों की तादाद शहरों और कारखानों में बढ़ी, वे अपने गुस्से और हताशा को हर तरह के विरोध् में प्रकट करने लगे। 1790 के दशक से पूरे देश भर में ब्रैड अथवा खाद्य के लिए दंगे होने लगे। खाद्य व्यापार व्यापारियों के अनुकूल था । इसने गरीबों को प्रभावित किया। ब्रैड के भंडारों पर कब्जा कर लिया गया और उन्हें मुनाफाखोरों द्वारा लगाई गई ऊँची कीमतों से काफी कम मूल्य में बेचा जाने लगा जो आम आदमी के लिए वाजिब थीं और नैतिक दृष्टि से भी सही थीं।
औद्योगीकरण के प्रारंभिक वर्षों में श्रमजीवियों के पास उन कठोर कार्यवाहियों, जिनसे उनके जीवन में फरबदल हो रही थी, के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए न तो वोट देने का अधिकार था और न ही कोई कानूनी तरीका। अगस्त 1819 में 80,000 लोग अपने लिए लोकतांत्रिक अधिकारों, अर्थात् राजनीतिक संगठन बनाने, सार्वजनिक सभाएँ करने और प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकारों की मांग करने वेफ लिए मैनचेस्टर में सेंट पीटर्स मैदान में शांतिपूर्वक इक हुए। लेकिन उनका बर्बरतापूर्वक दमन कर दिया गया। इसे पीटर लू नरसंहार के नाम से जाना जाता है।
औद्योगीक क्रान्ति के दौरान जब यह ज्ञात हुआ कि भाप अत्यधिक शक्ति उत्पन्न कर सकता है तो यह बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ। द्रवचालित शक्ति के रूप में जल भी सदियों से ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बना रहा था, लेकिन इसका उपयोग कुछ खास इलाकों, मौसमों और चल प्रवाह की गति के अनुसार सीमित रूप में ही किया जाता था। भाप की शक्ति ऊर्जा का अकेला ऐसा स्रोत था जो मशीनरी बनाने के लिए भी भरोसेमंद और कम खर्चीला था। भाप शक्ति के आविष्कार और इसके सुधार से औद्योगीकरण को बल मिला। भाप की शक्ति का इस्तेमाल सर्वप्रथम खनन उद्योगों में किया गया।
1.थॉमस सेवरी (1650-1715) ने खानों से पानी बाहर निकालने के लिए 1698 में माइनर्स फ्रेंड नामक एक भाप के इंजन का मॉडल बनाया।
2.1712 में थॉमस न्यूकॉमेन मेन (1663-1729) द्वारा बनाया गया। इसमें सबसे बड़ी कमी यह थी कि संघनन बेलन (कंडेंसिंग सिलडर) के लगातार ठंडा होते रहने से इसकी ऊर्जा खत्म होती रहती थी।
3.जेम्सवॉट (1736-1819) ने एक ऐसी मशीन विकसित की जिससे भाप का इंजन केवल एक साधरण पंप की बजाय एक ‘प्राइम मूवर’ यानी प्रमुख चालक (मूवर)के रूप में काम देने लगा जिससे कारखानों में शक्तिचालित मशीनों को ऊर्जा मिलने लगी। इस आविष्कार से पूर्व भाप के इंजन का इस्तेमाल केवल कोयले की खानों में ही होता रहा था।
4.एक धनी निर्माता मैथ्यू बॉल्टन (1728-1809) की सहायता से वॉट ने ‘सोहो फाउंडरी’ का निर्माण किया। इस फाउंडरी से वॉट के स्टीम इंजन का उत्पादन होता था।
ब्रिटेन पहला औद्योगीकृत देश था क्योंकि यह सत्रहवीं शताब्दी से राजनीतिक दृष्टि से सुदृढ़ एवं संतुलित रहा था और इसके तीनों हिस्सों - इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड - पर एक ही राजतंत्र यानी सम्राट का एकछत्र शासन रहा था।
इसका अर्थ यह हुआ कि संपूर्ण राज्य में एक ही कानून व्यवस्था, एक ही सिक्का (मुद्रा-प्रणाली) और एक ही बाजार व्यवस्था थी। जिसने अधिकारियों को इन एकीकृत क्षेत्रों से होकर जाने वाले माल पर उचित करारोपण करने के लिए सक्षम बना दिया था।
सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक आते-आते,वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो गई। मुद्रा का प्रयोग विनिमय यानी आदान-प्रदान के माध्यम के रूप में व्यापक रूप से होने लगा था। लोगों को पैसा खर्च करने एवं माल की बिक्री के लिए अपने बाजार का विस्तार करने के विकल्प मिल गए। अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड एक बड़े आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजरा था, जिसे बाद में ‘कृषि -क्रांति’ कहा गया है। यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसके द्वारा बड़े जमींदारों ने अपनी ही संपत्तियों के आसपास छोटे-छोटे खेत (फार्म) खरीद लिए और गाँव की सार्वजनिक जमीनों को घेर लिया, इस प्रकार उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी भू-संपदाएँ बना लीं जिससे खाद्य उत्पादन की वृद्धि हुई। इससे भूमिहीन किसानों और गाँव की सार्वजनिक जमीनों पर अपने पशु चराने वाले चरवाहों एवं पशुपालकों को कहीं और काम-धंधा तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ा। उनमें से अधिकांश लोग आसपास के शहरों में चले गए।
प्रारंभ में नहरें कोयले को शहरों तक ले जाने के लिए बनाई गईं। इसका कारण यह था कि कोयले को उसके परिमाण और भार के कारण सड़क मार्ग से ले जाने में समय बहुत लगता था और उस पर खर्च भी अधिक आता था। इग्लैंड में पहली नहर ‘वर्सली कैनाल’ 1761 में जेम्स ब्रिंडली(1716-72) द्वारा बनाई गई, जिसका प्रयोजन केवल यही था कि उसके जरिये वर्सले (मैनचेस्टर के पास)के कोयला भंडारों से शहर तक कोयला ले जाया जाए। इस नहर के बन जाने के बाद कोयले की कीमत घटकर आधी हो गई।
नहरों का इस्तेमाल कोयलों के परिवहन के लिए किया जाता था। नहरें आमतौर पर बड़े-बडे़ उद्यमियों द्वारा अपनी ज़मीनों पर स्थित खानों, खदानों या जंगलों के मूल्य को बढ़ाने के लिए बनाई जाती थीं। नहरों के आपस में जुड़ जाने से नए-नए शहरों में बाजार बन गए। उदाहरण के लिए बर्मिंघम शहर का विकास केवल इसीलिए तेज गति से हुआ क्योंकि वह लंदन, ब्रिस्टल चैनल और मरसी तथा हंबर नदियों के साथ जुड़ने वाली नहर प्रणाली के मध्य में स्थित था। 1788 से 1796 तक की, ‘नहरोन्माद’ (केनल-मानिया)के नाम से पुकारे जाने वाली अवधि में पच्चीस नयी नहरों के निर्माण के लिए 46 नयी परियोजनाएँ शुरू की गईं ।
1851 में लंदन में विशेष रूप से निर्मित स्फटिक प्रासाद (क्रिस्टल पैलेस) में ब्रिटिश उद्योग
की उपलब्धियों को दर्शाने के लिए एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसे देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। उस समय देश की आधी जनसंख्या शहरों में रहती थी, लेकिन शहरों में रहने वाले कामगारों में से जितने लोग हस्तशिल्प की इकाइयों में काम करते थे, लगभग उतने ही फैक्ट्रियों या कारखानों में कार्यरत थे। 1850 के दशक से, शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों का अनुपात अचानक बढ़ गया, और उनमें से अधिकांश लोग उद्योगों में काम करते थे, यानी वे श्रमजीवी वर्ग के थे। अब ब्रिटेन के समूचे कार्य-बल का केवल 20 प्रतिशत भाग ही देहाती इलाकों में रहता था। औद्योगीकरण की यह रफ्तार अन्य यूरोपीय देशों में हो रहे औद्योगीकरण के मुकाबले बहुत ज्यादा तेज थी। ब्रिटिश उद्योग के विस्तृत अध्ययन में इतिहासकार ए.ई. मस्सन ने कहा है कि 1850 से 1914 तक की अवधि को एक ऐसा काल मानने के लिए पर्याप्त आधार हैं जिसमें औद्योगिक क्रांति वास्तव में अत्यंत व्यापक पैमाने पर हुई, जिससे संपूर्ण अर्थव्यवस्था और समाज की कायापलट, अन्य किसी भी परिवर्तन के मुकाबले बड़ी तेजी से और व्यापक रूप से हुआ था।
ब्रिटेन की संसद ने 1795 में दो जुड़वाँ अधिनियम पारित किए, जिनके अंतर्गत ‘लोगों को भाषण या लेखन द्वारा सम्राट, संविधान, या सरकार के विरुद्ध घृणा या अपमान करने के लिए उकसाना’ अवैध् घोषित कर दिया गया और 50 से आधिक लोगों की अनाधिकृत सार्वजनिक बैठकों पर रोक लगा दी गई। लेकिन ‘पुराने भ्रष्टाचार’ के विरुद्ध आंदोलन बराबर चलता रहा। ‘पुराना भ्रष्टाचार’ शब्द का प्रयोग राजतंत्र और संसद के संबंध् में किया जाता था। संसद के सदस्य जिनमें भू-स्वामी, उत्पादक तथा पेशेवर लोग शामिल थे, कामगारों को वोट का अधिकार दिए जाने के खिलाफ थे। उन्होंने ‘कार्न लॉज़ (अनाज के कानून) का समर्थन किया। इस कानून के अंतर्गत विदेश से सस्ते अनाज के आयात पर रोक लगा दी गई थी जब तक कि ब्रिटेन में इन अनाजों की कीमत में एक स्वीकृत स्तर तक वृद्धि न हो गई हो। जैसे-जैसे श्रमिकों की तादाद शहरों और कारखानों में बढ़ी, वे अपने गुस्से और हताशा को हर तरह के विरोध् में प्रकट करने लगे। 1790 के दशक से पूरे देश भर में ब्रैड अथवा खाद्य के लिए दंगे होने लगे। खाद्य व्यापार व्यापारियों के अनुकूल था । इसने गरीबों को प्रभावित किया। ब्रैड के भंडारों पर कब्जा कर लिया गया और उन्हें मुनाफाखोरों द्वारा लगाई गई ऊँची कीमतों से काफी कम मूल्य में बेचा जाने लगा जो आम आदमी के लिए वाजिब थीं और नैतिक दृष्टि से भी सही थीं।
अठारहवीं शताब्दी से, यूरोप के बहुत-से शहर क्षेत्रफल और आबादी दोनों ही दृष्टियों से बढ़ने लगे थे। यूरोप के जिन उन्नीस शहरों की आबादी सन् 1750 से 1800 के बीच दोगुनी हो गई थी,उनमें से ग्यारह ब्रिटेन में थे। इन ग्यारह शहरों में लंदन सबसे बड़ा था जो देश के बाज़ारों का केंद्र था, बाकी बड़े-बड़े शहर भी लंदन के आस-पास ही स्थित थे।लंदन ने संपूर्ण विश्व में भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था। अठारहवीं शताब्दी तक आते-आते भूमंडलीय व्यापार का केंद्र, इटली तथा फ्रांस के भूमध्यसागरीय पत्तनों (बंदरगाह) से हटकर, हॉलैंड और ब्रिटेन के अटलांटिक पत्तनों पर आ गया था। इसके बाद तो लंदन ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए ऋण प्राप्ति के प्रधान स्रोत के रूप में ऐम्सटर्डम का स्थान ले लिया। साथ ही, लंदन, इंग्लैंड, अफ्रीका और वेस्टइंडीज के बीच स्थापित त्रिकोणीय व्यापार का केंद्र भी बन गया। अमरीका और एशिया में व्यापार करने वाली कंपनियों के कार्यालय भी लंदन में थे। इंग्लैंड में विभिन्न बाजारों के बीच माल की आवाजाही प्रमुख रूप से नदी मार्ग से और समुद्री तट की सुरक्षित खाडि़यों में पानी के जहाजों से होती थी। रेलमार्ग का प्रसार होने तक, जलमार्गों द्वारा परिवहन स्थलमार्गों की तुलना में सस्ता पड़ता था और उसमें समय भी कम लगता था। काफी पहले यहाँ तक कि सन् 1724 से इंग्लैंड के पास नदियों के जरिये लगभग 1,160 मील लंबा जलमार्ग था जिसमें नौकाएँ चल सकती थीं और पहाड़ी इलाकों को छोड़कर, देश के अधिकांश स्थान नदी से अधिक से अधिक 15 मील की दूरी पर थे। चूंकि इंग्लैंड की नदियों के सभी नौचालनीय भाग समुद्र से जुड़े हुए थे, इसलिए नदी पोतों के जरिये ढोया जाने वाला माल समुद्रतटीय जहाजों तक जिन्हें ‘तटपोत’(कोस्टर) कहा जाता था, आसानी से ले जाया जा सकता था।
इंग्लैंड में वस्त्र उद्योग के लिए ऊन और सन महत्वपूर्ण कच्चे माल के रूप में थे । सत्रहवीं शताब्दी से इंग्लैंड भारत से बड़ी लागत पर सूती कपड़े की गांठों का आयात करता रहा था। लेकिन जब भारत के हिस्सों पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो गया, तब इंग्लैंड ने कपड़े के साथ-साथ कच्चे कपास (रूई) का आयात करना भी शुरू कर दिया जिसकी इंग्लैंड में आने पर कताई की जाती थी और उससे कपड़ा बुना जाता था।
अठारहवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में अच्छी तकनीकी के अभाव में कताई का काम अत्यंत धीमी गति और अत्यधिक मेहनत से किया जाता था।
इस कार्य को और अधिक कुशलतापूर्वक करने के लिए उत्पादन का काम धीरे-धीरे कताईगरों और बुनकरों के घरों से हटकर फैक्ट्रियों यानी कारखानों में चला गया।
1780 के दौरान कपास उद्योग ब्रिटिश औद्योगीकरण का प्रतीक बन गया था। कच्चे कपास का पूर्ण रूप से आयात किया जाता था और तैयार माल का निर्यात किया जाता था।
अन्वेषक और आविष्कार:
1.जॉन के (1704-64) द्वारा 1733 में बनाए गए .फ्लाइंग शटल लूम यानी उड़न तुरी करघे का आविष्कार किया गया।
2. जेम्स हरग्रीव्ज़ (1720-78) द्वारा 1765 में कताई मशीन(स्पीनिंग जैनी) का आविष्कार किया गया।
3. रिचर्ड ऑर्कराइट (1732-92) द्वारा 1769 में वॉटर फ्रेम का आविष्कार किया गया।
4. सैम्यूअल क्रॉम्टन (1753-1827) 1779 में ‘म्यूल’ का आविष्कार किया गया।
5.एडमंड कार्टराइट (1743-1823) द्वारा 1787 में पॉवर लूम यानी शक्तिचालित करघे का आविष्कार किया गया।
पहला भाप से चलने वाला रेल का इंजन-स्टीफेंसन का रॉकेट 1814 में बना। अब रेलगाडि़याँ परिवहन का एक ऐसा नया साधन बन गईं, जो वर्षभर उपलब्ध रहती थीं, सस्ती और तेज भी थीं और माल तथा यात्री दोनों को ढो सकती थीं। लोहे की पटरी ने 1760 के दशक में लकड़ी की पटरी का स्थान ले लिया था ।
इतिहासकार तर्क देते हैं कि रेलवे के आविष्कार के साथ औद्योगीकरण की संपूर्ण प्रक्रिया ने दूसरे चरण में प्रवेश कर लिया।
1801 में, रिचर्ड ट्रेविथिक (1771-1833) ने एक इंजन का निर्माण किया जिसे ‘पफिंग डेविल’ यानी ‘फुफकारने वाला दानव’, कहते थे। यह इंजन ट्रकों को कॉर्नवाल में उस खान के चारों ओर खींचकर ले जाता था जहाँ रिचर्ड काम करता था। 1814 में, एक रेलवे इंजीनियर जॉर्ज स्टीफेंसन (1781-1848) ने एक रेल इंजन बनाया जिसे ‘ब्लचर’ कहा जाता था। यह इंजन 30 टन भार 4 मील प्रति घंटे की रफ्तार से एक पहाड़ी पर ले जा सकता था। सर्वप्रथम रेलवे लाइन 1825 में स्टॉकटन और डॉर्लिंगटन शहरों के बीच बिछाई गई थी। इसके बाद 1830 में लिवरपूल और मैनचेस्टर को आपस में रेलमार्ग से जोड़ दिया गया। 1833-37 में ‘छोटे रेल उन्माद’ के दौरान 1400 मील लंबी लाइन बिछाई गई। 1844-47 के ‘बड़े रेल उन्माद’ के दौरान फिर 9,500 मील लंबी रेल लाइन बनाने की मंजूरी दी गई।
अठारहवीं सदी की कृषि क्रांति से पहले, मध्य युग से यूरोप भर में कृषि पद्धतियां एक सी। अठारहवीं सदी तक, यूरोप में प्रत्येक किसान आम भूमि पर खेती करता था और फिर वह अन्य किसानों के साथ प्राप्त उत्पादन का सांझा करता था।
अठारहवीं सदी के दौरान, इंग्लैंड में कृषि पद्धतियों में चार महत्वपूर्ण परिवर्तन कृषि क्रांति की विशेषता प्रकट करते हैं :
1)चकबंदी या बाड़ा पद्धति, जिसके द्वारा शक्तिशाली जमींदारों द्वारा संयुक्त ग्रामीण भूमि की चकबंदी कर छोटे-छोटे फार्म शक्तिशाली जमींदारों के बड़े फार्मों में मिला दिए गए।इसके फलस्वरूप खाद्य उत्पादन में वृद्धि हुई ।
2) कृषि के मशीनीकरण, या बड़े जमींदारों द्वारा कृषि क्षेत्र में मशीनों का बढ़ता उपयोग।
3) चार क्षेत्रीय फसल चक्र जैसी नयी कृषि पद्धति को बढ़ावा जिसमें भूमि को अनेक खेतों में विभाजित कर दिया जाता था जिसमें विभिन्न फसलों का उत्पादन किया जाता था।
4) पशुओं का चयनीत प्रजनन।
लॉर्ड चार्ल्स टाउनशेंड ने रूट क्रोप्स (जड़ वाली फसलों) के महत्व को लोकप्रिय बनाया, उनकी शलजम(टर्नीप) की खेती में विशेष दिलचस्पी थी; इसलिए उन्हें टर्नीप टाउनशेंड संबोधित किया जाता था। एक कृषि विशेषज्ञ रॉबर्ट बेकवेल सिस्टेमेटिक स्टॉक ब्रीडिंग का प्रचलन शुरू करने वाले पहले व्यक्ति थे जब उन्होने खाद्य मूल्य में वृद्धि के लिए भेड़ प्रजनन किया। इससे पहले, भेड़ पालन केवल ऊन के लिए किया जाता था किन्तु अब उन्होने पशुओं का चयन कर पशु-पालन करना शुरू कर दिया था। 18 वीं सदी के अंत से पहले, अंतःप्रजनन का उनका सिद्धांत इंग्लैंड में अच्छी तरह से स्थापित हो गया था।
थॉमस विलियम कोक ने चार क्षेत्रीय फसल चक्र को बढ़ावा दिया। वे प्रत्येक वर्ष भेड़ों के बालों की कटाई(शीप-शीयरिंग) का भी आयोजन किया करते थे ।उनके योगदान के परिणामस्वरूप, यूरोप भर से किसान उनके निर्देश प्राप्त करने एवं कृषि पर अपने ज्ञान का आदान-प्रदान करने के लिए आने लगे थे।
इंग्लैंड में अठारहवीं सदी के दौरान, कृषि के क्षेत्र में महान प्रयोग किए गए थे।
इस अवधि के दौरान बड़े जमींदारों द्वारा गांव के आम कृषि- क्षेत्र की व्यक्तिगत जोत के रूप में बाड़बंदी ग्रामीण इंग्लैंड में होने वाला पहला महत्वपूर्ण परिवर्तन था। नतीजतन, बीज की बुवाई और फसल की कटाई के लिए मशीनों की शुरुआत की गई एवं उनका इस्तेमाल किया गया। इसके साथ ही, फसल-चक्रण के प्रयोग द्वारा कृषि भूमि और अधिक उपजाऊ बन गई। घोड़े की सहायता से खींचा जाने वाला हल, घास या तृण जमा करने का औजार या यन्त्र (रेक), पोर्टेबल थ्रेशर, खाद-विस्तारक और दुग्धोत्पादक उपकरण के आविष्कार ने इंग्लैंड में कृषि में क्रांति ला दी। परिणामस्वरूप, इस अवधि के दौरान खाद्य उत्पादन और कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई ।
A. 1770
B. 1771
C. 1772
D. 1773
जेम्स कुक एक ब्रिटिश अन्वेषक और खगोलशास्त्री था।
A. 'ईसाई से संबंधित'
B. 'गोरों से संबंधित'
C. 'किसी से भी संबंधित नहीं'
D. 'देशी लोगों से संबंधित'
सरकार के आदेश से देश के ऊपर मूल निवासियों के अधिकारों को अस्वीकार करने में ऐसा किया गया था।
A. कैनबरा
B. सिडनी
C. मेलबोर्न
D. एडिलेड
यह ऑस्ट्रेलिया के दो सबसे बड़े और धनी शहरों सिडनी और मेलबोर्नशहरों के बीचकैनबरा स्थित है।
A. ऑस्ट्रेलिया
B. ब्राजील
C. भारत
D. श्रीलंका
राष्ट्रीय क्षमा दिवस एक ऑस्ट्रेलियाई घटना है इसे 26 मई को हर साल आयोजित किया जाता है।
A. 1869 और 1885
B. 1870 और 1885
C. 1871 और 1885
D. 1872 और 1885
मेटीस कनाडा में देशी यूरोपीय मूल के लोग हैं। उन्हें उनकी विरासत पर गर्व है।
A. 'आँसू की राह'
B. 'खून के निशान'
C. 'जल की राह'
D. ‘संघर्ष की राह’
अमेरिकी राष्ट्रपति एंड्रयू जैक्सन द्वारा अपनी जमीन से बेदखल करने के लिए चेरोकीस को अमेरिकी सेना द्वारा आदेश दिया गया जिनमे 15,000 देशी लोग थे, उनमें से ज्यादातर की मौत हो गई थी जब उन्हें महान अमेरिकी रेगिस्तान में ले जाया गया था । इसलिए, इस घटना को 'आँसू की राह' के रूप में जाना जाता है।
A. 1830 के दशक
B. 1840
C. 1850
D. 1860
1840 के दशक में सोने के निशान कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका में पाए गए थे।
अठारहवीं सदी के दौरान इंग्लैंड में कृषि क्षेत्र में उन्नत पैदावार हेतु जिन कारकों ने अपना योगदान दिया वे थे :
• चकबंदी या बाड़ा पद्धति का विकास ।
• इस अवधि के दौरान विकसित उन्नत कृषि तकनीक और चलन में सुधार ।
रिचर्ड यंग ने कृषि पर कई पुस्तकें लिखी। उन्होंने फार्मर्स 'कैलेंडर प्रकाशित की और पुस्तक ‘एनल्स ऑफ एग्रीकल्चर’ का भी प्रकाशन शुरू किया। इन दोनों पत्रिकाओं में किंग जॉर्ज III ने 'राल्फ रॉबिन्सन' के उपनाम से कृषि से संबंधित लेख लिखे थे।
लॉर्ड चार्ल्स टाउनशेंड सहित जेथ्रो टुल ने रूट फ़ार्मिंग(मूल कृषि) के महत्व को लोकप्रिय बनाया। इंग्लैंड में कृषि क्रांति में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान सीड ड्रिल(बीज बोने वाला यंत्र) और हॉर्स ड्रॉन हॉ( घोड़े की सहायता से खींचा जाने वाला हल)का आविष्कार था।
अठारहवीं सदी से पहले, यूरोप में प्रत्येक किसान आम भूमि पर खेती करता था और फिर वह अन्य किसानों के साथ प्राप्त उत्पादन का सांझा करता था।
किंग जॉर्ज III ने फामर्स 'कैलेंडर और पुस्तक ‘एनल्स ऑफ एग्रीकल्चर’ पत्रिकाओं में 'राल्फ रॉबिन्सन' के उपनाम से कृषि से संबंधित लेख लिखे थे।
लॉर्ड चार्ल्स टाउनशेंड ने रूट क्रोप्स (जड़ वाली फसलों) के महत्व को लोकप्रिय बनाया, उनकी शलजम(टर्नीप) की खेती में विशेष दिलचस्पी थी; इसलिए उन्हें टर्नीप टाउनशेंड संबोधित किया गया था।
अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैंड में एक कृषि विशेषज्ञ रॉबर्ट बेकवेल ने सिस्टेमेटिक स्टॉक ब्रीडिंग का प्रचलन शुरू करने वाले पहले व्यक्ति थे।
अठारहवीं शताब्दी के दौरान, घोड़े की सहायता से खींचा जाने वाला हल, घास या तृण जमा करने का औजार या यन्त्र (रेक), पोर्टेबल थ्रेशर, खाद-विस्तारक और दुग्धोत्पादक उपकरण के आविष्कार ने इंग्लैंड में कृषि में क्रांति ला दी।
यॉर्कशायर में, ऊन कतरने वालों ने ऊन कतरने के ढाँचों (शीयरिंग फर्म )को तोड़ दिया। ये लोग परंपरागत रूप से अपने हाथों से भेड़ों के बालों की कटाई करते थे। 1830 के दंगों में फार्मों में काम करने वाले श्रमिकों को भी लगा कि उनका धंधा तो चौपट होने वाला है क्योंकि खेती में भूसी से दाना अलग करने के लिए नयी खलिहानी मशीनों (थ्रेशिंग मशीन) का इस्तेमाल शुरू हो गया था। दंगाइयों ने इन मशीनों को तोड़ डाला।
जनरल नेड लुड के नेतृत्व में लुडिज्म (1811-17) नामक अन्य आंदोलन चलाया गया। यह एक अन्य किस्म के विरोध् प्रदर्शन का उदाहरण था। लुडिज्म के अनुयायी मशीनों की तोड़फोड़ में ही विश्वास नहीं करते थे, बल्कि न्यूनतम मजदूरी, नारी एवं बालश्रम पर नियंत्रण, मशीन के आविष्कार से बेरोजगार हुए लोगों के लिए काम और कानूनी तौर पर अपनी माँगे पेश करने के लिए मजदूर संघ (ट्रेड यूनियन) बनाने के अधिकार की भी माँग करते थे।
यॉर्कशायर में, ऊन कतरने वालों ने ऊन कतरने के ढाँचों (शीयरिंग फर्म )को तोड़ दिया। ये लोग परंपरागत रूप से अपने हाथों से भेड़ों के बालों की कटाई करते थे। 1830 के दंगों में फार्मों में काम करने वाले श्रमिकों को भी लगा कि उनका धंधा तो चौपट होने वाला है क्योंकि खेती में भूसी से दाना अलग करने के लिए नयी खलिहानी मशीनों (थ्रेशिंग मशीन) का इस्तेमाल शुरू हो गया था। दंगाइयों ने इन मशीनों को तोड़ डाला।
इंग्लैंड में अठारहवीं सदी के दौरान, इंग्लैंड में कृषि में क्रांति आई ।चकबंदी या बाड़ा पद्धति के द्वारा शक्तिशाली जमींदारों द्वारा संयुक्त ग्रामीण भूमि की चकबंदी कर छोटे-छोटे फार्म बड़े फार्मों में मिला दिए गए।इसके फलस्वरूप खाद्य उत्पादन में वृद्धि हुई ।चकबंदी के फलस्वरूप, भूमिहीन किसान पास के शहरों में नौकरी की तलाश में जाने के लिए मजबूर हो गए।
किंग जॉर्ज III जिन्होने कृषि में गहन रूचि ली थी, बकिंघम पैलेस के शाही निवास पर थोड़ी भूमि को जोता था। यहाँ तक किउन्होंने अपने मित्रों को स्वयं को फार्मर जॉर्ज संबोधित करने को कहा ।उन्होंने पत्रिकाओं में किसानों के लिए 'राल्फ रॉबिन्सन' के उपनाम से अनेक लेख:फार्मर्स 'कैलेंडर और ‘एनल्स ऑफ एग्रीकल्चर’ भी लिखे। इन दोनों पत्रिकाओं में ने कृषि से संबंधित लेख लिखे थे।
एक करिश्माई व्यक्तित्व वाले जनरल नेड लुड के नेतृत्व में लुडिज्म (811-17) नामक अन्य आंदोलन चलाया गया। यह एक अन्य किस्म के विरोध् प्रदर्शन का उदाहरण था। लुडिज्म के अनुयायी मशीनों की तोड़फोड़ में ही विश्वास नहीं करते थे, बल्कि न्यूनतम मजदूरी, नारी एवं बाल श्रम पर नियंत्रण, मशीनों के आविष्कार से बेरोजगार हुए लोगों के लिए काम और कानूनी तौर पर अपनी मांगें पेश करने के लिए मजदूर संघ (ट्रेड यूनियन) बनाने के अधिकार की भी माँग करते थे।
जिसे चकबंदी या बाड़ा पद्धति के द्वारा 1770 के दशक से छोटे-छोटे सैकड़ों फार्म (खेत) शक्तिशाली जमींदारों के बड़े फार्मों में मिला दिए गए। इस पद्धति से बुरी तरह से प्रभावित हुए गरीब परिवारों ने औद्योगिक काम देने की मांग की। लेकिन कपड़ा उद्योग में मशीनों के प्रचलन से हजारों की संख्या में हथकरघा बुनकर बेरोजगार होकर गरीबी की मार झेलने को मजबूर हो गए, क्योंकि उनका करघा मशीनों का मुकाबला नहीं कर सकता था।
औद्योगिकरण- मशीनों व इंजनों के अविष्कारों द्वारा इंग्लैण्ड व यूरोप में अनेक फैक्ट्रियों की स्थापना हुई। जिससे कम समय व कम लागत में अधिक माल तैयार किया जाने लगा। कारखानों और मिलों में समस्त प्रक्रियाऐं एक ही छत के नीचे व एक मालिक के हाथों में आ गई।अनेक कारणों से औद्योगिक कं्राति सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में शुरू हुई-1. कोयला व लोहे की उपलब्धि- मशीनों के निर्माण के लिए आवश्यक लोहा व उन्हें चलाने के लिए ऊर्जा के रूप में कोयले की प्रचुर उपलब्धता।2. उपनिवेशवाद- इंग्लैण्ड को अपने उपनिवेशो से उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल प्रचुर मात्रा में प्राप्त हो जाता था व तैयार माल की खपत के लिए बाजारों के रूप में उपनिवेश उपलब्ध थे।3. पूंजी का संचय- इंग्लैण्ड ने विदेशी व्यापार से अधिक मात्रा में पूंजी का संचय कर लिया था। जिससे कल कारखानों की स्थापना आसानी से हो सकी।4. जल यातायात की सुविधा- माल के परिवहन के लिए जलीय जहाजों के निर्माण की सुविधा उपलब्ध थी।
औद्योगीकरण के प्रारंभिक वर्षों में श्रमजीवियों के पास उन कठोर कार्यवाहियों, जिनसे उनके जीवन में फरबदल हो रही थी, के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए न तो वोट देने का अधिकार था और न ही कोई कानूनी तरीका। अगस्त 1819 में 80,000 लोग अपने लिए लोकतांत्रिक अधिकारों, अर्थात् राजनीतिक संगठन बनाने, सार्वजनिक सभाएँ करने और प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकारों की मांग करने वेफ लिए मैनचेस्टर में सेंट पीटर्स मैदान में शांतिपूर्वक इक हुए। लेकिन उनका बर्बरतापूर्वक दमन कर दिया गया। इसे पीटर लू नरसंहार के नाम से जाना जाता है।
जनरल नेड लुड के नेतृत्व में लुडिज्म (1811-17) नामक अन्य आंदोलन चलाया गया। यह एक अन्य किस्म के विरोध् प्रदर्शन का उदाहरण था। लुडिज्म के अनुयायी मशीनों की तोड़फोड़ में ही विश्वास नहीं करते थे, बल्कि न्यूनतम मजदूरी, नारी एवं बालश्रम पर नियंत्रण, मशीन के आविष्कार से बेरोजगार हुए लोगों के लिए काम और कानूनी तौर पर अपनी माँगे पेश करने के लिए मजदूर संघ (ट्रेड यूनियन) बनाने के अधिकार की भी माँग करते थे।
1851 में लंदन में विशेष रूप से निर्मित स्फटिक प्रासाद (क्रिस्टल पैलेस) में ब्रिटिश उद्योग
की उपलब्धियों को दर्शाने के लिए एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसे देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। उस समय देश की आधी जनसंख्या शहरों में रहती थी, लेकिन शहरों में रहने वाले कामगारों में से जितने लोग हस्तशिल्प की इकाइयों में काम करते थे, लगभग उतने ही फैक्ट्रियों या कारखानों में कार्यरत थे। 1850 के दशक से, शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों का अनुपात अचानक बढ़ गया, और उनमें से अधिकांश लोग उद्योगों में काम करते थे, यानी वे श्रमजीवी वर्ग के थे। अब ब्रिटेन के समूचे कार्य-बल का केवल 20 प्रतिशत भाग ही देहाती इलाकों में रहता था। औद्योगीकरण की यह रफ्तार अन्य यूरोपीय देशों में हो रहे औद्योगीकरण के मुकाबले बहुत ज्यादा तेज थी। ब्रिटिश उद्योग के विस्तृत अध्ययन में इतिहासकार ए.ई. मस्सन ने कहा है कि 1850 से 1914 तक की अवधि को एक ऐसा काल मानने के लिए पर्याप्त आधार हैं जिसमें औद्योगिक क्रांति वास्तव में अत्यंत व्यापक पैमाने पर हुई, जिससे संपूर्ण अर्थव्यवस्था और समाज की कायापलट, अन्य किसी भी परिवर्तन के मुकाबले बड़ी तेजी से और व्यापक रूप से हुआ था।
'गोल्ड रश'के कारण रेलवे पटरी का महाद्वीप में निर्माण किया गया था, रेल लाइन के निर्माण के कारण अन्य उद्योगों को बल मिला था व अमेरिकी अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिला
1840 में संयुक्त राज्य अमरीका के कैलिफोर्निया में सोने के कुछ चिन्ह मिले। इसने‘गोल्ड रश’ को जन्म दिया। यह उस आपाधापी का नाम है, जिसमें हजारों की संख्या में आतुर यूरोपीय लोग चुटकियों में अपनी तवफदीर सँवार लेने की उम्मीद में अमरीका पहुँचे। यह घटना अमेरिका के इतिहास में 'गोल्ड रश' के रूप में जानी जाती है।
मूल निवासी मिसिसिपी नदी के साथ यूरोपयों के साथ हस्तशिल्प का आदान-प्रदान करने के लिए नियमित रूप से इक्कट्ठा होते थे
होपी अमेरिकी देश की जनजाति है जो अब कैलिफोर्निया के पास रहती हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका के औद्योगिक विकास के लिए जिम्मेदार कारण हैं:
1. सबसे पहला प्रमुख कारण रेलवे उपकरणों का विनिर्माण था। रेलवे परिवहन गोल्ड रश के कारण फैला था।
2. विभिन्न इंडस्ट्रीज भी रेलवे उपकरणों का निर्माण करने के लिए विकसित की गई जिससे दूर के परिवहन स्थानों को तेजी से लिंक व खेती के लिए महत्वपूर्ण मशीनरी का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सके। परिणामस्वरुप, संयुक्त राज्य अमेरिका में कारखानों की व औद्योगिक शहरों की संख्या में वृद्धि हुई।
3. इस अवधि के दौरान बड़े पैमाने पर कृषि का विस्तार किया गया व विशाल क्षेत्रों को खेतों में विभाजित कर कृषि की मंजूरी दी गयी।
ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीय आबादकारों, मूल निवासियों और ज़मीन के बीच आपसी रिश्तों का किस्सा उत्तरी और दक्षिणी अमरीका के किस्से से कई बिंदुओं पर मिलता-जुलता है, हालांकि इसकी शुरुआत 300 साल बाद हुई। मूल निवासियों के साथ हुई मुलाक़ात को लेकर कैप्टन कुक और उसके जत्थे के आरंभिक ब्यौरे मूल निवासियों के दोस्ताना व्यवहार के बारे में उत्साहपूर्ण हैं। लेकिन जब एक मूल निवासी ने कुक की हत्या कर दी - हवाई में,ऑस्ट्रेलिया में नहीं - तब ब्रिटिशों का रवैया पूरी तरह से उलट गया।
जब राज्यों का एकीकरण किया गया और 1911 में ऑस्ट्रेलिया की एक राजधानी बनाने की योजना चल रही थी, तब उसके लिए ‘वूलव्हीटगोल्ड’नाम का सुझाव दिया गया था! अंततः उसका नाम कैनबरा रखा गया। जो एक स्थानीय शब्द कैमबरा से बना है, जिसका अर्थ है, ‘सभा-स्थल’।
यूरोपीय बस्तियों के तहत ऑस्ट्रेलिया का आर्थिक विकास अमरीका जितना भिन्नतापूर्ण नहीं था। भेड़ों के विशाल फार्म और खानें उसके पश्चात, मदिरा बनाने हेतु अंगूर के बाग और गेहूँ की खेती एक लंबी अवधि में और काफी परिश्रम से विकसित हो पाईं, इन्होंने ऑस्ट्रेलिया की संपन्नता की बुनियाद तैयार की।
मानवशास्त्री डब्ल्यू.ई.एच.स्टैनर के व्याख्यान ने आदिवासियों के कौशल, उनकी संस्कृति और उनकी कथाओं के वृहद खजाने पर प्रकाश डाला और कहा कि इसे संग्रहीत एवं संरक्षित किया जाना चाहिए । उन्होंने अपने व्याख्यान को “दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस” का शीर्षक दिया। यह इतिहासकारों की चुप्पी थी जिन्होनें मूल निवासियों की उपेक्षा की थी एवं उन्होंने कैप्टन कुक द्वारा ऑस्ट्रेलिया की खोज करने के समय से ही ऑस्ट्रेलिया का इतिहास लिखा था।
ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों को जिन क्रूरताओं का सामना करना पड़ा था वे थीं:
अ) उनकी ज़मीन को टेरा न्यूलिअस जिसका मतलब था, ‘जो किसी की नहीं है’ मानकर उनसे छीन लिया जाता था।
ब) बच्चों को अधिग्रहित कर लिया जाता था, एवं उन्हें उनके परिजनों से बलपूर्वक अलग कर दिया जाता था।
18 वीं सदी में, पश्चिमी गोरों ने 'सभ्य' को परिभाषित किया, जिसमे साक्षरता, एक संगठित धर्म और शहरीकरण के अनुसार 'सभ्य' लोगों को परिभाषित किया गया था। उनके मुताबिक, अमेरिका के मूल निवासी 'असभ्य' थे।
फ्रांसीसी दार्शनिक जीन जेक्स रूसो का कहना था कि "असभ्य" लोगों, की प्रशंसा की जानी चाहिए, क्योंकि वे 'सभ्यता'के भ्रष्टाचार से अछूते थे। उन्हें वर्णन करने के लिए एक लोकप्रिय शब्द उदात्त उत्तम जंगली का इस्तेमाल किया।
जेफरसन का सपना यूरोपयों आबादी के साथ छोटे खेतों वाले एक देश का था, मूल निवासी ने अपनी जरूरतों के लिए फसलों में वृद्धि की जबकि यूरोपियन समुदाय ने अपने लाभ के लिए की थी। जेफरसन के विचार में, मूल निवासी के इस रवैये ने उन्हें 'असभ्य' बना दिया था ।
उत्तरी अमेरिका के पहले बाशिंदे 30,000 वर्ष पहले बेरिंग जलडमरू मध्य के आर-पार फैले एक भूमि सेतु के रस्ते एशिया से आये थे, और 10,000 वर्ष पूर्व आखिरी हिमयुग के दौरान वे दक्षिण की तरफ़ बढे।
शब्द 'मूल निवासी'का शाब्दिक अर्थ वह स्थान है जहाँ वह व्यक्ति पैदा हुआ और रहता है । 12 वीं सदी तक, यूरोपीयनो ने उपनिवेश देशों के निवासियों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया था ।
शब्द 'आबादकार' दक्षिण अफ्रीका में बसने वाले डच व ब्रिटिश जो न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया,आयरलैंड में और यूरोपीय जो अमेरिका में बसे थे के लिए प्रयोग किया गया था।
18 वीं सदी से दक्षिण अमेरिका मध्य, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के क्षेत्रों में यूरोप से आए आप्रवासी बसने लगे इस प्रक्रिया ने बहुत से मूल निवासियों को दूसरे इलाकों में जाने पर मजबूर किया यूरोपीय लोगों की ऐसी बस्तियों को कालोनी कहा जाता था ।
ऑस्ट्रेलिया पर मानव बस्ती का एक विशाल इतिहास रहा है। 'आदिवासी' 40,000 साल से अधिक पहले से ही महाद्वीप पर आने लगे थे। वे न्यू गिनी से आये थे, जो उस समय एक भूमि पुल से ऑस्ट्रेलिया से जुड़ा था।
अमेरिकियों को मूल निवासीयों के इतिहास और उनके हालात विकसित करने की आवश्यकता के महत्व का एहसास 1920 के दशक के बाद हुआ।
सामाजिक वैज्ञानिक लुईस मेरियम ने संयुक्त राज्य अमेरिका की मंदी से पहले एक सर्वेक्षण में ‘दि प्रॉब्लम ऑफ़ इंडियन एडमिनिस्ट्रेशन’ का निर्देशन किया और 1928 में प्रकाशित किया।
ऑस्ट्रेलिया में मानव निवास का इतिहास लंबा है। शुरुआती मनुष्य या आदिमानव जिन्हें ‘ऐ बॉरिजिनीज़’ कहते हैं (यह कई भिन्न-भिन्न समाजों के लिए प्रयुक्त एक सामान्य नाम है) ऑस्ट्रेलिया में 40,000 साल पहले आने शुरू हुए (संभवतः उससे भी पहले से)। वे ऑस्ट्रेलिया के साथ एक भू-सेतु से जुड़े न्यू गिनी से आए थे। मूल निवासियों की अपनी परंपराओं के हिसाब से वे ऑस्ट्रेलिया आए नहीं थे,बल्कि हमेशा से यहीं थे। बीती सदियाँ ‘स्वप्नकाल’ कही जाती थीं। इस कथन को समझना यूरोपीय लोगों के लिए मुश्किल था, क्योंकि इसमें अतीत और वर्तमान का अंतर धुँधला हो जाता था। 18वीं सदी के आखिरी दौर में ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासियों के 350 से 750 तक समुदाय थे।हर समुदाय की अपनी भाषा थी।
‘अमरीका’ -पहली बार अमेरिगो वेसपुकी (1451-1512) का यात्रा-वृत्तांत छपने के बाद प्रयुक्त ‘कनाडा’ कनाटा से निकला शब्द (1535 में खोजी जक कार्टियर को मिली जानकारी के मुताबिक, ह्यूरों-इरोक्यूइस की भाषा में कनाटा का मतलब था, ‘गाँव’) ‘ऑस्ट्रेलिया’ - महान दक्षिणी महासागर में स्थित भूमि के लिए सोलहवीं सदी में प्रयुक्त नाम (लातिनी में ‘दक्षिण’ को ऑस्ट्रल कहते हैं।)‘न्यूज़ीलैंड’ हॉलैंड के तासमान द्वारा दिया गया नाम, जिसने सबसे पहले 1642 में इन टापुओं को देखा था (डच भाषा में ‘समुद्र’ को जी कहते हैं।
A. अरावाक
B. एज़्टेक
C. इन्का
D. माया
एज़्टेक समाज में, योद्धा, पुजारी और रईस सबसे ज़्यादा इज़्ज़तदार समूह थे। व्यापारीयों को भी काफी इज़्ज़त हासिल थी और सरकार में राजदूतों और जासूसों के रूप में काम करने का मौक़ा मिला।
A. अरावाक
B. एज़्टेक
C. इन्का
D. माया
एज़्टेक समाज में, योद्धा, पुजारी और रईस सबसे ज़्यादा इज़्ज़तदार समूह थे। व्यापारीयों को भी काफी इज़्ज़त हासिल थी और सरकार में राजदूतों और जासूसों के रूप में काम करने का मौक़ा मिला।
A. अरावाक
B. एज़्टेक
C. इन्का
D. माया
एज़्टेक समाज एक श्रेणीबद्ध समाज था। इसके अंदर योद्धाओं, पुजारियों और रईसों को सबसे ज़्यादा इज़्ज़त दी जाती थी। उनके बीच से एक सर्वोच्च नेता का चयन किया जाता था, जिसे पृथ्वी पर सूर्य का प्रतिनिधि माना जाता था। वह अपनी मृत्यु तक पृथ्वी पर शासन करता था।
A. अरावाक
B. कैरिब
C. इन्का
D. माया
अरावाक उदार थे और स्पेनिश की सोने की तलाश में उनकी मदद की थी।लेकिन जब स्पेनिश ने क्रूरता दिखाई तो अरावाक ने उनका विरोध किया।
A. कम्बल
B. कालीन
C. झूलन खटोला
D. शाल
बुनाई की कला को अरावाक द्वारा अत्यधिक विकसित किया गया था। झूलन खटोला बुनना उनकी विशेषता में से एक था। इसके अलावा उन्हें मिटटी के बर्तन, टोकरी बुनने, कपास बुनने और मिटटी के औज़ार बनाने में भी महारत हासिल थी।
A. एज़्टेक
B. कैरिब
C. इन्का
D. माया
कैरिब एक भयंकर जनजाति थी।उनके हथ्यार साधारण थे जो लकड़ी, हड्डी व पत्थर से बनाये गए थे।उनके हत्यारों में लाठियां और तीर-कमान शामिल थे जिनमे ज़हर लगा होता था जिसके कारण ज़ख्म भी घातक साबित होता था।
A. कप्तान कुक
B. क्रिस्टोफर कोलंबस
C. हेनरी हडसन
D. सर फ्रांसिस ड्रेक
कोलंबस के बेड़े में एक नाव ‘सांता मरिया’ और दो छोटी किश्तियाँ पिंटा और नीना शामिल थीं।
A. अरावाक
B. एज़्टेक
C. इन्का
D. माया
एज़्टेक समाज में दास के रूप में बच्चों की बिक्री आम तौर पर केवल एक सीमित अवधि के लिए होती थी और दास अपनी स्वतंत्रता वापस खरीद सकते थे।लेकिन एज़्टेक समाज इस बात को सुनिश्चित करता था कि सभी बच्चे स्कूल जाएँ।
एज़्टेक मध्य अमेरिकी जनजाति थी।
तुपिनांबा इंडियंस दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट पर गांवों में निवास करते थे।
अरावाकी लुकायो कैरेबियन द्वीप पर निवास करते थे।
पुर्तगाली खोजकर्ता वास्को डी गामा ने भारत के समुद्री मार्ग की खोज की थी ।
वर्ष 1498 में पुर्तगालीयों ने भारत के समुद्री मार्ग की खोज की थी ।
यूरोपवासियों ने ऐसे देशों के व्यापारिक भागों की खोज के लिए अज्ञात महासागरों में साहसपूर्ण अभियान किये जहाँ से वे चाँदी और मसाले प्राप्त कर सकते थे।इस काम को सर्वप्रथम स्पेन और पुर्तगाल के निवासियों ने शुरू किया। उन्होंने पोप से उन प्रदेशों पर शासन करने का अनन्य अधिकार प्राप्त कर लिया जिन्हें वे भविष्य में खोजेंगे।
खोजकर्ताओं को अमेरिका में दो संस्कृतियां प्राप्त हुई। कैरीबियन क्षेत्र तथा ब्राजील में छोटी निर्वाह अर्थव्यवस्थाएँ थीं। दूसरी ओर विकसित खेती और खनन पर आधारित शक्तिशाली राजतांत्रिक व्यवस्थाएँ थीं। मैक्सिको और मध्य अमरीका के एजटेक और माया समुदाय और पेरू के इंका समुदाय के समान यहाँ भव्य वास्तुकला थी।
ब्राजील में सोना अथवा चांदी मिलने की कोई संभावना नहीं थी। लेकिन वहाँ एक प्राकृतिक संसाधन था, जिसका उन्होंने भरपूर लाभ उठाया और यह संपदा थी ‘टिंबर’ यानी इमारती लकड़ी। ब्राजीलवुड वृक्ष, जिसके नाम पर यूरोपवासियों ने इस प्रदेश का नामकरण किया, से एक सुंदर लाल रंजक मिलता था।
इंका लोगो ने लेखन की किसी प्रणाली का विकास नहीं किया था। किंतु उनके पास हिसाब लगाने की एक प्रणाली अवश्य थी- यह थी क्विपु, यानी डोरियों पर गाँठें लगाकर गणितीय इकाइयों का हिसाब रखना। कुछ विद्वानों का विचार है कि इंका लोग इन धागों में एक किस्म का संकेत बुनते थे।
भूमि उद्धार का अभिप्राय बंजर भूमि को आवासीय या कृषि योग्य भूमि में परिवर्तन से है। कई बार, भूमि उद्धार विभिन्न जलस्रोतों से जमीन लेकर भी किया जाता है।
निशिजिन क्योतो की एक बस्ती है। 16वीं शताब्दी में वहाँ 31 परिवारों का बुनकर संघ था। 17वीं शताब्दी के आखिर तक इस समुदाय में 70,000 लोग थे। रेशम उत्पादन फैला और 1713 में केवल देशी धागा इस्तेमाल करने के आदेश जारी किए गए जिससे उसे और प्रोत्साहन मिला। निशिजिन में केवल विशिष्ट प्रकार के महंगे उत्पाद बनाए जाते थे। रेशम उत्पादन से ऐसे क्षेत्रीय उद्यमी वर्ग का विस्तार हुआ जिन्होंने आगे चलकर तोकुगावा व्यवस्था को चुनौती दी। जब 1859 में विदेशी व्यापार की शुरुआत हुई, जापान से रेशम का निर्यात अर्थव्यवस्था के लिए मुनाफे का प्रमुख स्रोत बन गया, एक ऐसे समय में जबकि जापानी अर्थव्यवस्था पश्चिमी वस्तुओं से मुकाबला करने की कोशिश कर रही थी।
सन यात-सेन के दर्शन ने नेशनल पीपुल्स पार्टी के राजनीतिक दर्शन के आधार का निर्माण किया। पार्टी को कुओमीनतांग के रूप में जाना जाता था। पार्टी के बलों ने मांचू राजवंश को अपदस्थ करने एवं गणतंत्र की स्थापना करने का नेतृत्व किया।
चियांग काई-शेक के नेतृत्व में कुओमीनतांग की पराजय ने उसे ताइवान पलायन करने के लिए बाध्य कर दिया । वहाँ उन्होंने चीनी गणतंत्र की स्थापना की। 1894-95 में जापान के साथ हुई लड़ाई में यह जगह चीन को जापान के हाथ में सौंपनी पड़ी थी और तब से वह जापानी उपनिवेश बनी हुई थी।
'क्रांति' का अर्थ शासितों के एक प्रमुख समूह द्वारा सत्ता उखाड़ने से पूर्व मौजूद प्रणाली के तहत अवैध समझी जाने वाली विधियों के प्रयोग द्वारा सरकार को उखाड़ फेंकना होता है।
(i) राज्य परिषद और गणतंत्र के अध्यक्ष कांग्रेस द्वारा निर्वाचित किए जाते थे।
(ii) यह सुनिश्चित करता था कि कानून लागू किए जाए और प्रशासन का ठीक से संचालन हो।
(iii) राज्य परिषद ने राजनीतिक ब्यूरो (पोलित ब्यूरो) का चयन किया जो महत्वपूर्ण निर्णय लेता था।
साम्यवादी अंतर्राष्ट्रीय (कौमिंटर्न) या तृतीय अंतर्राष्ट्रीय (1919-1943) मार्च 1919 के दौरान मास्को में शुरू किया गया एक अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट संगठन था।लेनिन और ट्रॉट्स्की जैसे नेताओं ने कौमिंटर्न या तृतीय अंतर्राष्ट्रीय (थर्ड इंटेरनेशनल) का गठन किया था ।