किसी निश्चित तापक्रम पर निश्चित आयतन वाली हवा की आर्द्रता-सामर्थ्य (अत्यधिक नमी धारण करनें की छमता) तथा उसमें मौजूद आर्द्रता की वास्तविक मात्रा (निरपेक्ष आर्द्रता) के अनुपात को सापेक्ष आर्द्रता कहतें हैं।
1. स्तरी मेघ : ये परतदार बादल होते हैं जोकि आकाश के बहुत बड़े भाग पर फैले रहते हैं। ये बादल सामान्यतः या तो उष्मा के ह्रास या अलग-अलग तापमानों पर हवा के आपस में मिश्रित होने से बनते हैं।
2. वर्षा मेघ: वर्षा मेघ काले या गहरे सलेटी रंग के होते हैं। ये मध्य स्तरों या पृथ्वी के सतह के काफी नजदीक बनते हैं। ये सूर्य की किरणों के लिए बहुत ही अपारदर्शी होते हैं। कभी-कभी बादल इतनी कम ऊँचाई पर होते हैं कि ये सतह को छूते हुए प्रतीत होते हैं। वर्षा मेघ मोटे जलवाष्प की आकृति विहीन संहति होते हैं।
कोहरा तथा कुहासा के कारण दृश्यता कम से शून्य तक हो जाती है। नगरीय एवं औद्योगिक केन्द्रों में धुएँ की अधिकता के कारण केन्द्रकों की मात्रा की भी अधिकता होती है जो कोहरे और कुहासे के बनने में मदद देती हैं। ऐसी स्थिति को, जिसमें कोहरा तथा धुआँ सम्मिलित रूप से बनते हैं, ‘धूम्र कोहरा’ कहते हैं। कुहासे एवं कोहरे में केवल इतना अंतर होता है कि कुहासे में कोहरे की अपेक्षा नमी अधिक होती है। कुहासा पहाड़ों पर अधिक पाया जाता है, क्योंकि ऊपर उठती हुई गर्म हवा ढाल पर ठंडी सतह के संपर्क में आती है। कोहरे कुहासे की अपेक्षा अधिक शुष्क होते हैं तथा जहाँ गर्म हवा की धारा ठंडी हवा के संपर्क में आती है वहाँ ये प्रबल होते हैं। कोहरे छोटे बादल होते हैं जिसमें धूलकण, धुएँ के कण तथा नमक के कण होते हैं। केंद्रकों के चारों ओर संघनन की क्रिया होती है।
पक्षाभ मेघ: पक्षाभ मेघों का निर्माण 8,000-12,000 मी॰ की ऊँचाई पर होता है। ये पतले तथा बिखरे हुए बादल होते हैं, जो पंख के समान प्रतीत होते हैं। ये हमेशा सफ़ेद रंग के होते हैं।
कपासी मेघ: कपासी मेघ रूई के समान दिखते हैं। ये प्रायः 4,000 से 7,000 मीटर की ऊंचाई पर बनते हैं। ये छितरे तथा इधर-उधर बिखरे देखे जा सकते हैं। ये चपटे आधार वाले होते हैं।
बादलों के प्रकारों का वर्गीकरण उनकी ऊँचाई, उनके आकार, उनके रंग तथा प्रकाश को परावर्तित करने की उनकी क्षमता के आधार पर किया जाता है। ऊँचाई के आधार पर बादलों के दस प्रकार माने गये हैं, और इन्हें तीन मुख्य वर्गों में रखा गया है । ये वर्ग हैं:
(1) उच्च मेघ (5 से 14 किलोमीटर)
(2) मध्य मेघ (2 से 7 किलोमीटर) तथा
(3) निम्न मेघ (2 किलोमीटर से नीचे)
इन तीन प्रकार मुख्य वर्गों को फिर से विभाजित किया गया है| जैसे की -
संघनन का संबंध वायु की संतृप्त अवस्था से है । जैसा कि बताया गया है जब वायु की सापेक्ष आर्द्रता 100 प्रतिशत हो जाती है अर्थात् वह संतृप्त हो जाती है, तो संघनन शुरु हो जाता है । यह एक प्रकार से जलवाष्प के तरल में बदलने की प्रक्रिया है ।
स्वतंत्रा हवा में, छोटे-छोटे कणों के चारों ओर ठंडा होने के कारण संघनन होता है तब इन छोटे-छोटे कणों को संघनन केंद्रक कहा जाता है।
संघनन हवा के आयतन, ताप, दाब, तथा आर्द्रता से प्रभावित होता है। संघनन तब होता है जब
वायुमण्डल में संघनन की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है । जब जलवाष्प के संघनन से निर्मित हिम कण या जल से भरी हुई वायु राशि धरातल के विभिन्न ऊँचाइयों पर फैल जाती है, तो उसे बादल कहा जाता है । ज्यादातर बादल छोटे छोटे जलकण से बने होते हैं पर कभी कभी वे छोटे हिमकणों से भी बनते है, यदि तापमान जमाब बिंदु से भी कम हो| ज्यादातर बादल गर्म और आद्र वायु के ऊपर उठने से बनते हैं पर कई बार यह बादल भिन्न तापमान में दो भिन्न वायुराशि के टकराने से भी बनते हैं| ये बादल कुहरे की तुलना में अधिक ऊँचाई पर पाए जाते हैं । जब इन जल कणों का आकार बहुत छोटा होता है, तब तक वे वायुमण्डल में तैरते रहते हैं ।
तुषार और कोहरे या कुहाशा के बीच में अंतर उनके दृश्यता, समय की स्थिति और तापमान के भिन्नता के आधार पर बनते है।
तुषार ठंडी सतहों पर बनता है जब संघनन तापमान के जमाव बिंदु से नीचे चले जाने पर होता है, अर्थात् ओसांक जमाव बिंदु पर या उसके नीचे होता है। अतिरिक्त नमी पानी की बूँदों की बजाय छोटे-छोटे बर्फ के रवों के रूप में जमा होती हैं। उजले तुषार के बनने की सबसे उपयुक्त अवस्थाएँ, ओस के बनने की अवस्थाओं के समान हैं, केवल हवा का तापमान जमाव बिन्दु पर या उससे नीचे होना चाहिए।
जब बहुत अधिक मात्रा में जलवाष्प से भरी हुई वायु संहति अचानक नीचे की ओर गिरती है तब छोटे-छोटे धूल के कणों के उपर ही संघनन की प्रक्रिया होती है और कोहरा तथा कुहासा का उत्पत्ति होते हैं। इसलिए कोहरा एक बादल है जिसका आधार सतह पर या सतह के बहुत निकट होता है। कोहरा तथा कुहासा के कारण दृश्यता कम से कम शून्य तक हो जाती है।
जब आर्द्रता धरातल के उपर हवा में संघनन केंद्रकों पर संघनित न होकर ठोस वस्तु जैसे पत्थर, घास, तथा पौधों की पत्तियों की ठंडी सतहों पर पानी की बूँदों के रूप में जमा होती है तब इसे ओस कहा जाता है।
इसके बनने के लिए उपयुक्त अवस्थाओं में शामिल हैं :
बादलों के अन्दर मौजूद पानी या हिम के कण जब पृथ्वी पर गिरने लगते हैं, तो उसे वर्षण कहते हैं। वर्षण तब होती है जब बादलों के भीतर बहुत तेजी के साथ संघनन होने लगता है और हवा इन संगठित कणों के वजन को संभाल नहीं पाती और सतह पर गिरा देती है|
वर्षण को विविध रूपों में देखा जा सकता है, उनमे से 4 प्रमुख रूप है:
1. हिमपात
2. तुषार वर्षा
3. ओलावृष्टि
4. वर्षा
(1) हिमपात - जब संघनन जमाव विन्दु से नीचे चला जाता है, तब जलवाष्प हिम के छोटे-छोटे कणों में परिवर्तित हो जाते हैं। ये ही छोटे-छोटे कण आपस में मिलकर विभिन्न आकारों में सतह पर गिरते रहते हैं ।
(2) सहिम वर्षा - जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है, जब वर्षा की बूँदों के साथ हिम के भी कण गिरने लगते हैं, तो उसे सहिम वर्षा कहा जाता है ।
(3) ओलावृष्टि - यदि वर्षण के फलस्वरूप हिम के कण गोले बन जाएं, तो इसके गिरने को ओले की वृष्टि कहा जाता है। सामान्यतया ये कपासी मेघ के वर्षा से बनते हैं ।
(4) वर्षा - इसके अन्तर्गत जल की बूंदें गिरती हैं। इन जल की बूंदों का निर्माण संघनन की प्रक्रिया से बनी छोटी-छोटी बूंदों के मिलने से होता है । इन बूँदों का आकार 0.5 मिलीमीटर से 1.5 मिलीमीटर हो सकता है ।
वर्षा की उत्पत्ति के आधार पर वर्षा को तीन प्रमुख प्रकारों में बाँटा जा सकता है- संवहनीय, पर्वतीय तथा चक्रवातीय या फ्रंटल
बादलों के अन्दर मौजूद पानी के कण जब पृथ्वी पर गिरने लगते हैं, तो उसे वर्षा कहते हैं|
एक साल में पृथ्वी की सतह पर अलग-अलग भागों में होने वाली वर्षा की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है तथा यह अलग-अलग मौसमों में भी होती है।
सामान्य तौर पर, विषुवत् वृत्त से ध्रुव की ओर जाने से, वर्षा की मात्रा धीरे-धीरे घटती जाती है। विश्व के तटीय क्षेत्रों में महाद्वीपों के भीतरी भागों की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है। विश्व के स्थलीय भागों की अपेक्षा महासागरों के ऊपर वर्षा अधिक होती है, क्योंकि वहां पानी के स्रोत की अधिकता के कारण वाष्पीकरण की क्रिया लगातार होती रहती है। वार्षिक वर्षण की कुल मात्रा के आधार पर विश्व की मुख्य वर्षण क्षेत्रों में शामिल हैः
A.
कर्क रेखा तथा विषुवत् वृत्त के मध्य होती है।
B.
मकर रेखा और विषुवत् वृत्त के मध्य होती है।
C.
कर्क रेखा एवं मकर रेखा के मध्य होती है।
D.
उपरोक्त सभी।
उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच पाई जाती है। संपूर्ण वर्ष सूर्य के ऊर्ध्वस्थ तथा अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की उपस्थिति के कारण यहाँ की जलवायु ऊष्ण एवं आर्द्र रहती है।
शीत हिम-वन जलवायु वन के प्रकार उत्तरी गोलार्द्ध, यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका में 40° -70 ° के बीच उत्तरी अक्षांश में पाये जाते है। यह जलवायु प्रकार उप दो प्रकार में विभाजित है -
1) DF - नम सर्दियों के साथ ठंडी जलवायु
2) DW - सूखी सर्दी के साथ ठंडी जलवायु
जननिक वर्गीकरण उनके कारणों के अनुसार मौसम के आयोजन का प्रयास करता है, जबकि अनुभवजन्य वर्गीकरण विशेष रूप से तापमान और वर्षा के आकड़ो पर आधारित है।
कोपेन का वर्गीकरण व्यापक रूप से अनुभवजन्य है जैसे कि यह न तो मौसम प्रक्रिया पर आधारित है और न ही यह जलवायु प्रकार के गठन के कारणों पर जोर देता है। वर्गीकरण वार्षिक और मासिक तापमान और वर्षा के माध्यम पर आधारित है।
ध्रुवीय जलवायु ध्रुवो से परे 700 उत्तरी अक्षांश मौजूद हैं। ये जलवायु उत्तरी गोलार्ध तक ही सीमित हैं। सबसे गरम महीने का औसत तापमान 10o सेल्सियस से अधिक नहीं होता है। यहाँ कोई गर्मी का मौसम नहीं होता है। ध्रुवीय जलवायु में टुंड्रा जलवायु और आइस कैप जलवायु शामिल हैं। गर्मियों के दौरान, टुंड्रा क्षेत्रों में दिन के प्रकाश की बहुत लंबी अवधि होती है।
ग्लोबल वार्मिंग ने वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और सीएफसी की वृद्धि की एकाग्रता को प्रेरित किया। यह मानव गतिविधियों के कारण होता है, जिसमें शामिल है:
1) तेजी से औद्योगिकीकरण
2) तकनीकी उन्नति
3) कृषि और परिवहन व्यवस्था में क्रांति
वैश्विक जलवायु परिवर्तन पृथ्वी की सतह के पास हो रहे परिवर्तनों के कारण होता है। ये परिवर्तन आंतरिक रूप से पृथ्वी की वायुमंडलीय प्रणाली के भीतर प्रेरित है या बाह्य रूप से अतिरिक्त स्थलीय कारकों से प्रेरित है जैसे आदमी।
गैसे जो लंबी तरंगों विकिरण को अवशोषित करती है ग्रीन हाउस गैसे कहा जाता है। वह प्रक्रिया जो पूरे वातावरण को सामूहिक रूप से गर्म रखती है उसे ग्रीन हाउस प्रभाव के रूप में जाना जाता है।
गैसे हैं-
1. कार्बन डाइऑक्साइड
2. क्लोरो फ्लोरो कार्बन
3. मिथेन
4. नाइट्रस ऑक्साइड
5. ओजोन, नाइट्रिक ऑक्साइड और
6. कार्बन मोनोऑक्साइड।
ओजोन गैस वायुमंडल के सबसे महत्वपूर्ण गैसो में से एक है जो समताप मंडल में अल्ट्रा वायलेट विकिरण को अवशोषित करती है और पृथ्वी की सतह तक पहुंचने के लिए अल्ट्रा वायलेट विकिरण को रोकती है और इस प्रकार पृथ्वी की सतह के लिए कंबल के रूप में काम करती हैं। अल्ट्रा वायलेट विकिरण मानव अस्तित्व के लिए बहुत हानिकारक हैं।
उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु, मकर राशि के कर्क रेखा और रेखा के बीच एवं 20 डिग्री और 40 डिग्री दोनों गोलार्द्धों के बीच अक्षांश पर मौजूद है, इस प्रकार की जलवायु उच्च और आर्द्र तापमान की विशेषता होती है और यहाँ साल भर में भारी वर्षा होती है। जलवायु के उष्णकटिबंधीय आर्द्र प्रकार को आगे तीन प्रकार में विभाजित किया गया है, अर्थात्:
1) उष्णकटिबंधीय गीला जलवायु (Af)
2) उष्णकटिबंधीय मानसून जलवायु (AM)
3) उष्णकटिबंधीय गीला और शुष्क जलवायु (Aw)
गर्मियों में भी तापमान हिमांक से नीचे रहता है। हिम परतों के ये टुकड़े आर्कटिक एवं अंटार्कटिक जल में खिसक कर प्लावी हिम शैलों के रूप में तैरने लगते हैं।
विभिन्न जलवायु के प्रकार के तापमान की विशेषता भी अलग-अलग है:
1) ए (उष्णकटिबंध प्रदेश) - सबसे ठंडे माह का औसत तापमान 18 डिग्री सेल्सियस या अधिक है।
2) सी (गर्म समशीतोष्ण) जलवायु प्रकार- सबसे ठंडे माह का औसत तापमान अधिक से अधिक 3 डिग्री सेल्सियस होता है लेकिन 18 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहता है।
3) ई (ठंड) जलवायु प्रकार- सभी महीनों का औसत तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे होता है।
1) कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन जीवाश्म ईंधन (तेल, गैस और कोयले) के दहन, उद्योगों और वाहनों से मुख्य रूप से होता है।
2) वन और महासागर कार्बन डाइऑक्साइड में डूबे हुए हैं। वनों की कटाई, भूमि उपयोग में परिवर्तन की वजह से भी हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की एकाग्रता बढ़ जाती है।
सूर्य के चारों ओर, पृथ्वी की अस्थिरता और पृथ्वी के अक्षीय झुकाव में बदलाव करती है। बदले में यह सूर्य से प्राप्त आतपन की राशि परिवर्तित कर देता है, जो जलवायु को प्रभावित करता है।
।. यह भूमध्य सागर के आसपास उप-उष्णकटिबंधीय अक्षांशों में महाद्वीपों के पश्चिमी तट के साथ 30 डिग्री से 40 डिग्री अक्षांश के बीच पाई जाती है।
2. यह क्षेत्र गर्मियों में उप-उष्णकटिबंधीय उच्च और सर्दियों में पश्चिमी हवा के प्रभाव में है।
3. जलवायु की विशेषता गर्म, सूखी गर्मी और हल्के बरसात की सर्दियाँ है।
4. गर्मियों में मासिक औसत तापमान 25 डिग्री सेल्सियस के आसपास होता है और सर्दियों में 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहता है।
5. वार्षिक वर्षा 35 -90 सेमी के बीच रहता है।
1. हिमटोप जलवायु ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के आंतरिक भागों में पाई जाती है।
2. गर्मियों में भी तापमान हिमांक से नीचे रहता है।
3. इस क्षेत्र में वर्षा थोड़ी मात्रा में होती है।
4. अंटार्कटिक में 79° दक्षिण अक्षांश पर ‘‘प्लेट्यू स्टेशन’’ पर भी यही जलवायु पाई जाती है।
भूमंडलीय उष्मन धरती के वायुमंडल के औसत तापमान में वृद्धि विशेष रूप से एक निरंतर वृद्धि है जो जलवायु परिवर्तन का कारण बनता है। पिछले 50 वर्षों में माने गए तापमान में वृद्धि का लगभग 100% कारण ग्रीन हाउस गैस की सांद्रता के वातावरण में वृद्धि है जैसे- जल वाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ 2), मीथेन और ओजोन। ग्रीनहाउस गैसे वे गैसे है जो ग्रीनहाउस प्रभाव में योगदान देती है (देखें नीचे)। ग्रीन हाउस गैस में सबसे बड़ा योगदान जीवाश्म ईंधन के जलने कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन है।
ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव
ग्लोबल वार्मिंग के दो प्रमुख प्रभाव होते हैं:
जननिक, अनुप्रयुक्त और आनुभविक जलवायु के वर्गीकरण के बीच अंतर इस प्रकार है:
(1) जननिक वर्गीकरण उनके कारणों के अनुसार मौसम का आयोजन करने का प्रयास करता है।
(2) आनुभविक वर्गीकरण विशेष रूप से तापमान और वर्षा के अवलोकन डेटा पर आधारित है।
(3) अनुप्रयुक्त वर्गीकरण विशिष्ट प्रयोजन के लिए है।
गर्म समशीतोष्ण (मध्य अक्षांश) जलवायु मुख्य रूप से महाद्वीपों के पूर्वी और पश्चिमी मार्जिन पर 30o - 50o करने के अक्षांश से फैली हुई है। इसलिए इस क्षेत्र में वनस्पति के विभिन्न प्रकार पाये जाते है। इसमें भूमध्य प्रकार की वनस्पति घने चौड़ी पत्तियों वाले पेड़ शामिल है। पौधों की प्रजातियों के कम विविधता के साथ जैसे बीच, मेपल आदि और वनस्पति की नम उप उष्णकटिबंधीय प्रकार इसमें शामिल है।
'ए' प्रकार की जलवायु
1) यह उष्णकटिबंधीय जलवायु क्षेत्रों के अंतर्गत आता है।
2) यह तीन प्रकार का होता है: उष्णकटिबंधीय आर्द्र, मानसून, और उष्णकटिबंधीय आर्द्र और शुष्क जलवायु।
3) कोई शुष्क मौसम उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु में अनुभव नही किया जाता है।
4) सर्दियाँ सूखी होती हैं।
"बी" प्रकार की जलवायु
1) यह उप उष्णकटिबंधीय जलवायु क्षेत्रों के अंतर्गत आता है।
2) यह कम अक्षांशो में पाया जाता है।
3) मध्य अक्षांश शुष्क अर्द्ध शुष्क या सूखे हैं।
4) यह चार प्रकार के होते है: उप उष्णकटिबंधीय मैदान, उप उष्णकटिबंधीय रेगिस्तान के मध्य अक्षांश मैदान और मध्य अक्षांश रेगिस्तान।
जिस प्रकार की जलवायु के प्रकार का अनुभव हम करते है यह पिछले 10,000 साल से अधिक और कभी-कभी व्यापक उतार चढ़ाव के साथ प्रचलित हो सकती है। जलवायु में परिवर्तनशीलता हर समय होती है। पिछली सदी के नब्बे के दशक के चरम मौसम की घटनाओं के साक्षी बने। 1990 की शताब्दी में सबसे गरम तापमान दर्ज किया गया और दुनिया भर में सबसे भयावह बाढ़ आई।
जलवायु परिवर्तन के लिए कारण कई हैं, वे खगोलीय और स्थलीय कारणों में बांटा जा सकता है।
महासागरीय जल के गर्म होने की मुख्य प्रक्रियाएँ हैं –
(1) सौर विकिरण का अवशोषण,
(2) पृथ्वी के आंतरिक भाग से महासागरीय वितल द्वारा ऊष्मा का संवहन।
यह एक प्रकार से समुद्र का तल ही है | ये विश्व के सबसे चिकने तथा सबसे सपाट भाग हैं, जो महीन कणों वाले अवसादों जैसे मृत्तिका एवं गाद से ढके होते हैं। इनकी गहराई 3,000 से 6,000 मीटर के बीच होती है। वितल मैदान कुल महासागरीय क्षेत्र का 40 प्रतिशत भाग होता है ।
महासागर के अधस्तल के उच्चावच के अन्तर्गत कुछ अन्य तथा लघु संरचाएं भी पाई जाती हैं। जैसेकि - मध्य-महासागरीय कटक, समुद्री टीला, सबसे सपाट जलमग्न कैनियन, निमग्न द्वीप और प्रवाल द्वीप|
धरातल से वायुमण्डल में और फिर वायुमण्डल से धरातल में आर्द्रता के लेन-देन का इस जलीय चक्र में विविध प्रक्रियाएं शामिल हैं | जैसे की –
लवणता समुद्री जल के घनत्व को तथा महासागरीय जल के स्तरीकरण को भी प्रभावित करती है। यदि अन्य कारक स्थिर रहें तो समुद्री जल की बढ़ती लवणता उसके घनत्व को बढ़ाती है। उच्च लवणता वाला समुद्री जल, प्रायः कम लवणता वाले जल के नीचे बैठ जाता है। इससे लवणता का स्तरीकरण हो जाता है।
धरातल से वायुमण्डल में और फिर वायुमण्डल से धरातल में आर्द्रता के लेन-देन का एक निरन्तर चक्र को ही जलीय चक्र कहा जाता है । जलाशय के विभिन्न स्रोतों से वाष्पीकरण के द्वारा जल वाष्प वायुमण्डल में पहुँचता रहता है। अनुकुल परिस्थितियाँ पाकर यह जल वाष्प संघनित होकर बादल बनते हैं और बादलों से वर्षा के द्वारा यह जल वाष्प फिर से जलाशयों में पहुँच पाता है। यह चक्र निरन्तर जारी रहता है। जलीय चक्र पृथ्वी के जलमंडल में विभिन्न रूपों अर्थात् गैस, तरल व ठोस में जल का परिसंचरण प्रक्रिया है। चक्र करोड़ों वर्षों से कार्यरत है और पृथ्वी पर सभी प्रकार का जीवन इसी पर निर्भर करता है। इसका संबंध् महासागरों, वायुमंडल, भूपृष्ठ, अध्ःस्तल और जीवों के बीच जल के सतत् आदान-प्रदान से भी जुड़े हुए है।
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अन्तःसागरीय गर्त |
प्रवाल द्वीप |
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1. ये महासागर के सबसे गहरे भाग होते हैं । 2. गर्त की गहराई सामान्यतः 55 सौ मीटर होती है । 3. जिनका गर्त की गहराई कम किन्तु लम्बाई अधिक होती है, उन्हें खाई कहा जाता है । 4. विश्व के सबसे गहरा गर्त प्रशांत महासागर में स्थित मेरिआना खाई हैं जिनकी गहराई 11 किलोमीटर से भी अधिक है | |
1. यह एक निम्न आकार के द्वीप हैं जोकि गहरे अवनमन को चारों ओर से घेरे हुए होते हैं। 2. देखने में ये टीलों और कटकों की तरह ही दिखते हैं । 3. इसकी रचना जीवित या मृत जीवों के प्रभाव से होती है । 4. विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति आस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड तट के निकट है| |
प्रकृति में उपस्थित सभी जलों में खनिज लवण घुले हुए होते हैं। लवणता समुद्री जल का महत्वपूर्ण गुण है। महासागरीय जल में विविध प्रकार के लवणों का उपस्थिति होते हैं जैसे की - सोडि़यम क्लोराइड, मेग्नेशिया क्लोराइड, केल्शियम क्लोराइड, पोटेशियम क्लोराइड तथा सोडि़यम सल्फेट। इनमें सबसे अधिक योगदान सोडि़यम क्लोराइड का है। इन घुले हुए लवणों के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अलग-अलग समुद्रों के जल का खारापन अलग-अलग हो सकता है, लेकिन उसमें मिले हुए लवणों का प्रतिशत एक जैसा ही होगा।
इसका परिकलन 1,000 ग्राम॰ (एक किलोग्राम) समुद्री जल में घुले हुए नमक (ग्राम में) की मात्रा के द्वारा किया जाता है। इसे प्रायः प्रति 1,000 भाग (%॰) या PPT के रूप में व्यक्त किया जाता है। समुद्री जल के औसत लवणता 35 प्रति हजार है। इसका अर्थ है एक किलोग्राम जल में 35 ग्राम लवण की मात्रा का होना। 24.7%॰ की लवणता को खारे जल को सीमांकित करने का उच्च सीमा माना गया है।
निचे का चित्र महासागर के सतही जल एवं गहरी परतों के बीच सीमा क्षेत्र को दर्शाता है। यह सीमा समुद्री सतह से लगभग 100 से 400 मीटर नीचे प्रारंभ होती है एवं कई सौ मीटर नीचे तक जाती है। वह सीमा क्षेत्र जहाँ गहराई के बढ़ने के साथ साथ तापमान में तीव्र गिरावट आती है, उसे ताप प्रवणता क्षेत्र कहा जाता है। जल के कुल आयतन का लगभग 90 प्रतिशत गहरे महासागर में ताप प्रवणता के नीचे पाया जाता है। इस क्षेत्र में तापमान 0 डिग्री सेल्सियस पहुँच जाता है। मध्य एवं निम्न अक्षांशों में महासागरीय जल के तापमान को सतह से तली की ओर तीन परतों में बाँटा गया है। महासागर के इस क्षैतिज ताप वितरण के दूसरी परत को ताप प्रवणता परत कहा जाता है। यहाँ ताप प्रवणता तथा थर्मोक्लाईन की मोटाई 500 से 1,000 मीटर तक होती है।
महासागरीय जल की लवणता को प्रभावित करने में बहुत सी कारक जिम्मेदार होते हैं| उनमे से कुछ प्रमुख कारक हैं –
i. महासागरों की सतह के जल की लवणता मुख्यतः वाष्पीकरण एवं वर्षण पर निर्भर करती है।
ii. तटीय क्षेत्रों में सतह के जल की लवणता नदियों के द्वारा लाए गए ताजे जल के द्वारा तथा ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के जमने एवं पिघलने की क्रिया से सबसे अधिक प्रभावित होती है।
iii. पवन भी जल को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरण करके लवणता को प्रभावित करती है।
iv. महासागरीय धाराएँ भी लवणता में भिन्नता उत्पन्न करने में सहयोग करती हैं। जल की लवणता, तापमान एवं घनत्व परस्पर संबंधित होते हैं। इसलिए, तापमान अथवा घनत्व में किसी भी प्रकार का परिवर्तन किसी क्षेत्र की लवणता को प्रभावित करता है।
अंतः समुद्री पर्वत श्रेणी या कटक - महाद्वीपों पर विद्यमान विशाल पर्वत पद्धति समुद्र के जल के नीचे भी विद्यमान है। इन महासागरीय पर्वतों को अंतः समुद्री पर्वत श्रेणी कहते है। ये रेखीय मेखला के समान हैं, जो महासागरों के मध्य स्थित हैं। अतः इन्हें मध्य महासागरीय पर्वत श्रेणी भी कहते हैं। सभी मध्य महासागरीय पर्वत श्रेणी एक विश्वव्यापी व्यवस्था का निर्माण करती हैं ये एक महासागर से दूसरे महासागर के साथ परस्पर जुड़ी हुई हैं। ये पर्वत श्रेणियाँ कहीं-कहीं भ्रंशों द्वारा कट जाती हैं, जहाँ प्रायः भूकंप आते हैं। महासागरीय पर्वत श्रेणियों में ज्वालामुखी आम बात हैं, जिससे कई प्रकार के समुद्री धरातलीय लक्षणों का निर्माण होता है। मध्यवर्ती अटलांटिक पर्वत श्रेणी सबसे बड़ी और अविच्छिन्न जलमग्न पर्वत श्रेणी है जो अटलांटिक महासागर के मध्य में उत्तर से दक्षिण तक जाती है। इसकी आकृति अंग्रेजी के अक्षर ’एस’ के समान है। इसकी कुल लम्बाई 64000 किलोमीटर तक है|
जल को जीवन कहा जाता है। जल पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्रकार के जीवों के लिए अत्यंत आवश्यक घटक है। जल हमारे सौर मंडल का दुर्लभ पदार्थ है। सूर्य अथवा सौरमंडल में अन्यत्र कहीं भी जल नहीं है। पृथ्वी के धरातल पर जल की प्रचुर आपूर्ति है | पृथ्वी की सतह का लगभग 70 प्रतिशत से अधिक भाग जल से भरे हुए है और 29 से 30 प्रतिशत भाग स्थल के अंतर्गत है | पृथ्वी के जल के वितरण उत्तरी गोलार्द्ध में 43 प्रतिशत एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में 57 प्रतिशत में बाँटा हुआ है| जल की इस विशाल आपूर्ति के कारण ही इस जलीय ग्रह हम ‘नीला ग्रह’ कहते हैं।
महासागरीय सतही जल का औसत तापमान लगभग 17° सेल्सियस है | महासागरीय जल के तापीय वितरण को 2 वर्गों में विभाजित किया गया है |
उर्द्धाधर वितरण - तापमान के उध्र्वाधर वितरण में भी विविधता पाई जाती है। गहराई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटता जाता है। यह इसलिए होता है; क्योंकि महासागरीय जल का ऊपरी भाग अधिकतम सूर्यातप प्राप्त करता है। सूर्य की किरणें जैसे-जैसे अन्दर प्रवेश करती हैं, प्रकीर्णन, परावर्तन तथा विसरण के कारण उनकी शक्ति घटती जाती है। हालांकि तापमान की यह ह्रास दर सभी गहराइयों पर एक समान नहीं होती। लगभग 100 मीटर की गहराई तक जल का तापमान लगभग सतह के तापमान के बराबर रहता है। जबकि सतह से 1800 मीटर की गहराई पर तापमान लगभग 15° सेल्सियस से घटकर 2° सेल्सियस रह जाता है। 1800 मीटर से 4000 मीटर की गहराई पर तापमान घटकर 2° सेल्सियस से 1.6° सेल्सियस रह जाता है। महासागरीय जल की तापीय-गहराई का पाश्र्वचित्र के द्वारा बढ़ती हुई गहराई के साथ तापमान का ह्रास तथा घटना को प्रदर्शित करते है।
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महासागरीय जल के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारक हैं –
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यह सभी कारकों महासागरीय जल के तापमान को प्रभावित करने के लिए उत्तरदायी होते हैं |
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समुद्री टीला |
गाईऑट |
|
1. समुद्री टीला गभीर सागरीय मैदान या वितल मैदान में स्थित एक पर्वत है| 2. इनकी उच्चाई 1000 मीटर से अधिक है| 3. कभी-कभी ये समुद्री टीले इक्के-दुक्के द्वीपों के रूप में समुद्री अधस्तल से ऊपर उठ जाते हैं। हवाई और ताहिती द्वीप ज्वालामुखी की अनावृत चोटियाँ इसका उदाहरण हैं। 4. इनके शीर्ष नुकीले तथा शंकुआकार होते हैं। 5. इनकी उत्पत्ति ज्वालामुखी से होते हैं | 6. इनमे से किसी किसी टीलें की उच्चाई 3000 मीटर से भी अधिक होती हैं| |
1. गाईऑट भी गभीर सागरीय मैदान या वितल मैदान में स्थित एक पहाड़ है| 2. इनकी उच्चाई भी 1000 मीटर से अधिक है| 3. समुद्रतल के ऊपर उठने वाले ज्वालामुखी की चोटी जब अपरदन द्वारा चैरस हो जाती है और पानी से ढक जाती है तो उसे गाईऑट (निमग्न द्वीप) कहते हैं। 4. इनके शीर्ष समतल होते है |
5. यह भी ज्वालामुखी से उत्पन्न होते है | 6. एक साधारण गाईऑट की व्यास 20- 25 किलोमीटर तक होता है| |
महासागरीय अध्स्तल तथा बेसिन को चार प्रमुख भागों में बाँटा गया है-
महाद्वीपीय शेल्फ़ तथा महाद्वीपीय निमग्न तट - यह एक समुद्र का तट ही है, जो जल में मग्न हो गया है । प्रत्येक महाद्वीप का विस्तृत सीमांत होता है, जो अपेक्षाकृत उथले समुद्रों तथा खाड़ियों से घिरा होता है। महाद्वीप का यह उथला जलमग्न विस्तार, महाद्वीपीय निमग्न तट तथा महाद्वीपीय शेल्फ़ कहलाता है, जहां जल की गहराई 120 मीटर से 370 मीटर तक होती है।
ये मग्न तट मनुष्य के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते हैं क्योंकि यहीं सबसे अधिक समुद्री खाद्य पदार्थ, खनिज पदार्थ तथा तेल एवं प्राकृतिक गैस प्राप्त होते हैं । ये मछली पकड़ने के भी समृद्धतम स्थल हैं ।
महाद्वीपीय ढाल - महाद्वीपीय सीमांत का वह निरंतर ढलवा भाग जोकि महाद्वीपीय निमग्न तट से सागर की ओर वितल मैदान तक विस्तृत होता है, उसे महाद्वीपीय ढाल कहा जाता है| इसकी गहराई 180 मीटर से 360 मीटर तक होती है।
गभीर सागरीय मैदान या वितल मैदान - गभीर सागरीय मैदान महासागरीय बेसिनों के मंद ढाल वाले क्षेत्र होते हैं। यह गहरे महासागरीय तल के अत्यन्त समतल तथा आकृति विहीन मैदान हैं, जिसकी गहराई 3,000 से 6,000 मीटर के बीच होती है।
महासागरीय गर्त - ये महासागर के सबसे गहरे भाग होते हैं, अपेक्षाकृत खड़े किनारों वाले संकीर्ण बेसिन तथा गर्त होते हैं। अपने चारों ओर की महासागरीय तली की अपेक्षा ये 3 से 5 किमी॰ तक गहरे होते हैं।
A.
ब्राजील धारा - अटलांटिक महासागर
B.
क्यूरोशिवो धारा - प्रशांत महासागर
C.
पश्चिम पवन प्रवाह - हिन्द महासागर
D.
बेंगुएला धारा - प्रशांत महासागर
बेंगुएला धारा दक्षिणी अन्ध महासागर मे बहने वाली एक ठंडी महासागरीय धारा हैं, जो दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट से टकराकर, तट के सहारे-सहारे उत्तर दिशा में प्रवाहित होती हैं।
A.
उष्ण जल स्रोत
B.
वलय
C.
धाराएँ
D.
बवंडर
वलय, कोरियालिस बल के कारण उत्तरी गोलार्ध में जल की गति की दिशा के दाहिनी तरफ और दक्षिणी गोलार्ध में बायीं ओर प्रवाहित होता है तथा उनके चारों ओर बहाव को वलय कहा जाता है। इनके कारण सभी महासागरीय बेसिनों में वृहत् वृत्ताकार धाराएँ उत्पन्न होती हैं।
A.
निम्न ज्वार उत्पन्न होता है।
B.
उच्च ज्वार उत्पन्न होता है।
C.
कोई ज्वार उत्पन्न नहीं होता है।
D.
सतह धाराएँ उत्पन्न होती हैं।
जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है तो इसे उपभू के रूप में जाना जाता है उस दौरान उच्च ज्वार उत्पन्न होता है।
A.
ज्वार-भाटा कहते हैं।
B.
ज्वारीय धाराएँ कहते हैं।
C.
वृहत् ज्वार कहते हैं।
D.
निम्न ज्वार कहते हैं।
ज्वारीय बलों द्वारा उत्पन्न धाराएँ ज्वारीय धाराएँ कहलाती हैं।
A.
A
B. C
C. D
D. B
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में अक्षर 'B' शुष्क जलवायु के लिए निरूपित किया गया है। इसे कटिबंधीय स्टेपी (BSh) , उपोष्ण कटिबंधीय मरूस्थल (BWh), मध्य अक्षांशीय स्टेपी (BSk) तथा मध्य अक्षांशीय मरूस्थल (BWk) मे उप-विभाजित किया गया है।
A.
A–B–C–E
B. A–C–D–E
C. B–C–D–E
D. A–C–D–F
समूह A–C–D–E में सभी जलवायुवीय प्रकार आर्द्रता स्थितियों को प्रस्तुत करते हैं।
A.
Af की
श्रेणी के
अंतर्गत आती
है।
B. Aw की श्रेणी के अंतर्गत आती है।
C. AM की श्रेणी के अंतर्गत आती है।
D. AN की श्रेणी के अंतर्गत आती है।
भारत में उष्णकटिबंधीय मानसून प्रकार सामान्य है। मानसूनी हवाएँ मौसम के अनुसार दिशा बदलती रहती हैं।
A.
समुद्री पश्चिम तटीय जलवायु है।
B.
आर्द्र महाद्वीपीय जलवायु है।
C.
भूमध्यसागरीय जलवायु है।
D.
आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय है।
यह जलवायु महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर 45 डिग्री और 55 डिग्री के अक्षांशों के मध्य पाई जाती है।
A.
चार समूहों में विभाजित है।
B.
पाँच समूहों में विभाजित है।
C.
छः समूहों में विभाजित है।
D.
तीन समूहों में विभाजित है।
कोपेन जलवायु वर्गीकरण पद्धति पाँच मुख्य समूहों जिनमें प्रत्येक अनेक प्रकारों एवं उप प्रकारों में विभाजित हैं।
A.
मासिक और वार्षिक तापमान स्थिति के औसत पर आधारित है।
B.
वार्षिक वर्षण स्थितियों के औसत पर आधारित है।
C.
वर्षा एवं तापमान के मासिक तथा वार्षिक आंकड़ों के औसत पर आधारित है।
D.
मृदा एवं जलवायु स्थितियों पर आधारित है।
कोपेन का वर्गीकरण वर्षा एवं तापमान के मध्यमान वार्षिक एवं मध्यमान मासिक आँकड़ों पर आधारित एक आनुभविक पद्धति है।
A.
आनुभविक
B.
जननिक
C.
अनुप्रयुक्त
D.
गैर आनुभविक
जलवायु का वर्गीकरण तीन वृहत् उपगमनों आनुभविक, जननिक और अनुप्रयुक्त द्वारा किया गया है। आनुभविक वर्गीकरण प्रेक्षित किए गए विशेष रूप से तापमान एवं वर्णन से संबंधित आँकड़ों पर आधारित होता है। जननिक वर्गीकरण जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने का प्रयास है। जलवायु का अनुप्रयुक्त वर्गीकरण किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया जाता है। उपरोक्त विकल्पों में गैर आनुभविक जलवायु के वर्गीकरण के अंतर्गत नहीं आता है।
A.
सभी महीनों में उच्च वर्षा
B.
सबसे ठंडे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिंदु से अधिक
C.
सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक
D. सभी महीनों का औसत तापमान 10° सेल्सियस के नीचे
उष्ण कटिबंधीय जलवायु की विशेषता 18 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक निरंतर तापमान है।
A.
ट्रिवार्था का वर्गीकरण
B.
वी. कोपेन की आनुभविक पद्धति
C.
ओ. श्रीट का वर्गीकरण
D.
हेल्मुट लैंड्सबर्ग का वर्गीकरण
वी. कोपेन द्वारा विकसित की गई जलवायु के वर्गीकरण की आनुभविक पद्धति का सबसे व्यापक उपयोग किया जाता है। कोपेन ने वनस्पति के वितरण और जलवायु के बीच एक घनिष्ठ संबंध की पहचान की।
A.
विशिष्ट उद्देश्य पर आधारित होता है।
B.
आँकड़ों पर आधारित होता है।
C.
कारणों पर आधारित होता है।
D.
संगठित सूचना पर आधारित होता है।
जलवायु का वर्गीकरण तीन वृहत् दृष्टिकोणों आनुभविक, जननिक और अनुप्रयुक्त द्वारा किया गया है। आनुभविक वर्गीकरण प्रेक्षित किए गए विशेष रूप से तापमान एवं वर्णन से संबंधित आँकड़ों पर आधारित होता है। जननिक वर्गीकरण जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने का प्रयास है। जलवायु का अनुप्रयुक्त वर्गीकरण किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया जाता है।
A.
आर्द्रता जलवायु को इंगित करते हैं।
B.
शुष्कता को इंगित करते हैं।
C.
शीत जलवायु को इंगित करते हैं।
D.
शुष्क एवं आर्द्र जलवायु को इंगित करते हैं।
जलवायु समूहों को तापक्रम एवं वर्षा की मौसमी विशेषताओं के आधार पर कई उप-प्रकारों में विभाजित किया गया है जिसको छोटे अक्षरों द्वारा प्रदर्शित किया गया है। शुष्कता वाले मौसमों को छोटे अक्षरों m, w तथा s द्वारा इंगित किया गया है।
A.
उपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी जलवायु को निर्दिष्ट करता है।
B.
उपोष्ण कटिबंधीय मरूस्थल जलवायु को निर्दिष्ट करता है।
C.
मध्य अक्षांशीय स्टेपी जलवायु को निर्दिष्ट करता है।
D.
मध्य अक्षांशीय मरूस्थल जलवायु को निर्दिष्ट करता है।
मरूस्थलों में वर्षा थोड़ी किंतु गरज के साथ तीव्र बौछारों के रूप में होती है जो मृदा में नमी पैदा करने में कारगर नहीं होती है। ग्रीष्म ऋतु में अधिकतम तापमान बहुत ऊँचा होता है।
A.
मध्य कैलिफोर्निया है।
B.
दक्षिण चीन है।
C.
उत्तर भारत के मैदान हैं।
D.
उत्तर-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका है।
भूमध्य सागरीय जलवायु भूमध्य सागर के चारों ओर तथा उपोष्ण कटिबंध से 30° से 40° अक्षांशों के बीच महाद्वीपों के पश्चिमी तट के साथ-साथ पाई जाती है। मध्य कैलिफोर्निया, मध्य चिली तथा आस्ट्रेलिया के दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण-पश्चिमी तट इसके उदाहरण हैं।
A.
धान का कटोरा
B.
घास का मैदान
C.
धूल का कटोरा
D.
खनिज क्षेत्र
1930 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका के बृहत मैदान के दक्षिण-पश्चिमी भाग में, जिसे ‘धूल का कटोरा’कहा जाता है, भीषण सूखा पड़ा।
A.
A-B-C-E हैं।
B.
A-C-D-E हैं।
C.
B-C-D-E हैं।
D.
A-C-D-F हैं।
कोपेन ने पाँच प्रमुख जलवायु समूह निर्धारित किए जिनमें से चार तापमान पर और एक वर्षण पर आधारित है। कोपेन के अनुसार बडे़ अक्षर A,C,D तथा E आर्द्र जलवायु को तथा B अक्षर शुष्क जलवायु को निरूपित करता है।
A.
P द्वारा व्यक्त की जाती है।
B.
E द्वारा व्यक्त की जाती है।
C.
F द्वारा व्यक्त की जाती है।
D.
G द्वारा व्यक्त की जाती है।
ध्रुवीय जलवायु 70° अक्षांश से परे ध्रुवों की ओर पाई जाती है। ध्रुवीय जलवायु दो प्रकार की होती हैः (i) टुण्ड्रा (ET); (ii) हिम टोपी (EF) ।
A.
1996
B. 1994
C. 1998
D. 1999
वर्ष 1998 न केवल 20वीं सदी बल्कि सहस्राब्दी का सबसे गर्म वर्ष था।
A.
30 डिग्री से 50 डिग्री अक्षांश के मध्य है।
B.
40 डिग्री से 50 डिग्री अक्षांश के मध्य है।
C.
35 डिग्री से 40 डिग्री अक्षांश के मध्य है।
D.
45 डिग्री से 50 डिग्री अक्षांश के मध्य है।
यह मुख्यतः महाद्वीपों के पूर्वी और पश्चिमी सीमांतों पर विस्तृत है।
A.
पराबैंगनी किरणों को क्षोभमंडल के माध्यम से गुज़रने देता है।
B.
गामा किरणों को क्षोभमंडल के माध्यम से गुज़रने देता है।
C.
अवरक्त किरणों को क्षोभमंडल के माध्यम से गुज़रने देता है।
D.
रेडियो तरंगों को क्षोभमंडल के माध्यम से गुज़रने देता है।
ओज़ोन परत में छिद्र पराबैंगनी किरणों को क्षोभमंडल के माध्यम से गुज़रने देता है।
समुद्री पश्चिमी तट जलवायु आमतौर पर उत्तर पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिका, कैलिफोर्निया के उत्तरी और न्यूजीलैंड के पश्चिमी तट के क्षेत्रों में पायी जाती है।
कोप्पन ने पांच प्रमुख जलवायु समूहों को मान्यता दी इनमें से चार तापमान पर आधारित है और एक वर्षा पर आधारित हैं। जलवायु समूह प्रकार, छोटे पत्र द्वारा नामित, वर्षा के मौसम पर आधारित और तापमान विशेषताओं में विभाजित हैं।
|
समूह |
प्रकार |
अक्षर संकेत |
विशेषताऐ |
|
A-उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु |
आर्द्र उष्णकटिबंधीय
उष्णकटिबंधीय मानसून
उष्णकटिबंधीय आर्द्र और शुष्क |
Af
Am
Aw |
कोई शुष्क मौसम
मानसूनी, लघु शुष्क मौसम
शीतकालीन शुष्क मौसम |
|
B-शुष्क जलवायु |
उपोष्णकटिबंधीय मैदान |
BSh BWh BSk BWk |
कम अक्षांश अर्ध शुष्क या शुष्क
कम अक्षांश शुष्क या शुष्क मध्य अक्षांश अर्ध शुष्क या शुष्क मध्य अक्षांश शुष्क या शुष्क |
|
C- गर्म समशीतोष्ण (मध्य अक्षांश) जलवायु |
आर्द्र उपोष्णीय भूमध्यसागरीय
समुद्री पश्चिमी तट |
Cfa
Cs Cfb |
कोई शुष्क मौसम नही, गर्म गर्मी
सूखी गर्म गर्मी कोई शुष्क मौसम नही, गर्म और ठंडी गर्मियाँ |
|
D- शीत बर्फ वन जलवायु |
महाद्वीपीय आर्द्रता
उप―उत्तरधु्रवीय |
Df
Dw |
कोई शुष्क मौसम नही, तीक्ष्ण सर्दियाँ
शीतकालीन शुष्क और बहुत तीक्ष्ण |
|
E- ठंडी जलवायु |
टुंड्रा |
ET
EF |
गर्मियाँ न के बराबर
बारहमासी बर्फ |
|
H- पर्वतीय क्षेत्र |
पर्वतीय क्षेत्र |
H |
बर्फ से आच्छादित पर्वतीय क्षेत्र |

C
2.शीतकालीन तापमान औसतन 10
C से 15
C
3.अनियमित वर्षा काल व जून से अक्टूबर में
4.वर्षा की मात्रा के अनुसार प्राकृतिक वनस्पति में अत्यधिक विविधता
5.प्रमुख वृक्ष - साल, सागौन,शीशम आम जामुन आदि
A.
उसे थर्मल डिवाइड कहा जाता है।
B.
उसे ऊष्मप्रवैगिकी कहा जाता है।
C.
उसे ताप प्रवणता (थर्मोक्लाइन) कहा जाता है।
D.
उसे थर्मोहेलाइन कहा जाता है।
जल के कुल आयतन का लगभग 90 प्रतिशत गहरे महासागर में ताप प्रवणता के नीचे पाया जाता है। इस क्षेत्र में तापमान 0 डिग्री सेल्सियस पहुँच जाता है।
A.
जल का प्रवाह है।
B.
जल के सतत एवं निर्देष्ट दिशा वाले प्रवाह हैं।
C.
महासागरों में जल का प्रवाह है।
D.
नदियों में जल का प्रवाह है।
महासागर के जल के सतत एवं निर्देष्ट दिशा वाले प्रवाह को महासागरीय धारा कहते हैं।
A.
एक प्रायद्वीप
B.
एक चट्टान
C.
मूंगा चट्टान
D.
ज्वालामुखीय द्वीप
प्रवाल द्वीप एक अंगूठी के आकार की मूंगा चट्टान है, जो आंशिक या पूर्ण रूप से खारे पानी से घिरा रहता हैI इसके किनारों पर मूंगा द्वीप होते हैI
A.
59
B.
57
C.
56
D.
52
महासागरीय गर्तें महासागरों के सबसे गहरे भाग होते हैं। महासागरों में 59 गर्तों को खोजा जा चुका है।
A.
मोतियों के अच्छे स्रोत बनते हैं।
B.
सोने के अच्छे स्रोत बनते हैं।
C.
जीवाश्मी ईंधनों के अच्छे स्रोत बनते हैं।
D.
हीरे के अच्छे स्रोत बनते हैं।
महाद्वीपीय शेल्फ़, प्रत्येक महाद्वीप का विस्तृत सीमांत होता है, जो अपेक्षाकृत उथले समुद्रों तथा खाड़ियों से घिरा होता है। महाद्वीपीय शेल्फ़ों पर लंबे समय तक प्राप्त स्थूल तलछटी अवसाद जीवाश्मी ईंधनों के स्रोत बनते हैं।
A.
महासागरीय अधस्तल का भाग हैं।
B.
भूतल का भाग हैं।
C.
वायुमंडल का भाग हैं।
D.
मरुस्थल क्षेत्रों का भाग हैं।
गर्तें महासागरीय अधस्तल का भाग हैं।
A.
हिंद महासागर
B.
अटलांटिक महासागर
C.
आर्कटिक महासागर
D.
प्रशांत महासागर
आर्कटिक महासागर विश्व में सबसे छोटा महासागर है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 5.4 मिलियन वर्ग मील है।
A.
समुद्री टीला है।
B.
महासागरीय गभीर है।
C.
गहरा समुद्री मैदान है।
D.
महाद्वीपीय शेल्फ़ है।
महासागरों में पाई जाने वाली लघु उच्चावच आकृति समुद्री टीला है।
A.
हिमस्खलन
B.
मृदा
C.
महासागरीय भूस्खलन
D.
महासागर धाराएँ
महासागर जल के तापमान को प्रभावित करने वाला कारक अक्षांश, भूमि का असमान वितरण, जल, प्रचलित पवनें और महासागर धाराएँ हैं।
A.
आइसोहैलाईन कहा जाता है।
B.
हैलोक्लाइन कहा जाता है।
C.
सलोक्लाइन कहा जाता है।
D.
लवणता कहा जाता है।
लवणता साधारणतः गहराई के साथ बढ़ती है तथा एक स्पष्ट क्षेत्र होता है, जिसे हैलोक्लाईन कहा जाता है।
A.
वाष्पीकरण और वर्षा दर है।
B.
तटीय क्षेत्रों में स्वच्छ जल का अंतर्वाह है।
C.
महासागर धाराएँ एवं पवनें है।
D.
महासागर जल का तापमान है।
महासागर जल की लवणता को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक महासागर जल का तापमान है।
A.
वॉन झील
B.
ग्रेट साल्ट झील
C.
ग्रेट झील
D.
ओकोबो झील
वॉन झील टर्की में है। इसकी लवणता 330%0 है।
A.
काला सागर है।
B.
बाल्टिक सागर है।
C.
लाल सागर है।
D.
मृत सागर है।
मृत सागर में लवणता 238%0 है। मृत सागर की गहराई 306 मीटर है। यह विश्व की उच्चतम लवणता वाली झील है।
A.
चिली का तट है।
B.
आर्कटिक महासागर में साइबेरियाई शेल्फ़ है।
C.
सुमात्रा का पश्चिमी तट है।
D.
ग्रैंड कैनियन है।
आकर्टिक महासागर में स्थित साइबेरियन शेल्फ़ विश्व में सबसे बड़ा शेल्फ़ है जिसकी चौड़ाई 1,500 किलोमीटर है।
A.
जल चक्र कहलाता है।
B.
जलीय चक्र कहलाता है।
C.
जीवन चक्र कहलाता है।
D.
वायुमंडलीय चक्र कहलाता है।
जल का परिसंचरण विभिन्न रूपों अर्थात् गैस, तरल व ठोस में होता है।
A.
ठंडी धारा है।
B.
गर्म धारा है।
C.
महत्वपूर्ण समुद्र मार्ग है।
D.
सतह तरंग है।
गल्फ स्ट्रीम अटलांटिक महासागर की एक महत्वपूर्ण धारा है। यह एक गर्म धारा है।
A.
2 - 20 मीटर
के मध्य होती
है।
B. 200 - 3000 मीटर के मध्य होती है।
C. 20 - 200 मीटर के मध्य होती है।
D. 2000 - 20,000 मीटर के मध्य होती है।
ढाल वाले प्रदेश की प्रवणता 2 से 5 डिग्री के बीच होती है। ढाल वाले प्रदेश की गहराई 200 मीटर एवं 3,000 मीटर के बीच होती है। ढाल का किनारा महाद्वीपों के समाप्ति को इंगित करता है। इसी प्रदेश में कैनियन एवं खाइयाँ दिखाई देते हैं।
A.
तरंगें कहलाती हैं।
B.
धाराएँ कहलाती हैं।
C.
ज्वार-भाटा कहलाती हैं।
D.
महोर्मि (Surge) कहलाती हैं।
जलवायु संबंधी प्रभावों (वायु एवं वायुमंडलीय दाब में परिवर्तन) के कारण उत्पन्न जल की गति को महोर्मि (Surge) कहा जाता है।
A.
किलोमीटर में मापी जाती है।
B.
नॉट में मापी जाती है।
C.
मील में मापी जाती है।
D.
शॉट्स में मापी जाती है।
तरंग गति नॉट में मापी जाती है।
A.
हिन्द महासागर
B.
अटलांटिक महासागर
C.
प्रशांत महासागर
D.
आर्कटिक महासागर
ब्राजील धारा अटलांटिक महासागर की एक महत्वपूर्ण धारा है।
A.
फ़ारस की खाड़ी में आता है।
B.
सेंट लॉरेंस की खाड़ी में आता है।
C.
मैक्सिको की खाड़ी में आता है।
D.
फंडी की खाड़ी में आता है।
विश्व का सबसे ऊँचा ज्वारभाटा कनाडा के नवास्कोशिया में स्थित फंडी की खाड़ी में आता है। ज्वारीय उभार की ऊंचाई 15 से 16 मीटर के बीच होती है क्योंकि वहाँ पर दो उच्च ज्वार एवं दो निम्न ज्वार प्रतिदिन आते हैं|
A.
महाद्वीपीय ढाल होते हैं।
B.
महाद्वीपीय जल सीमा होती है।
C.
वितलीय मैदान हैं।
D.
खाईयाँ होती हैं।
उच्चावच स्वरुप जो मछली पकड़ने के लिए सबसे उपयुक्त क्षेत्र होते हैं, जहाँ महाद्वीपीय जल सीमा होती है।
A.
कैल्शियम युक्त जीवों की मृत आवरण से निर्मित होती हैं।
B.
सिलिका युक्त जीवों की मृत आवरण से निर्मित होती हैं।
C.
अवसादों के संचय से निर्मित होती हैं।
D.
पौधों एवं जंतुओं के कार्बनिक अवशेषों से निर्मित होती हैं।
प्रवाल कैल्शियम युक्त जीवों की मृत आवरण से निर्मित होती हैं।