A.
अलास्का की धारा
B.
गल्फ स्ट्रीम
C.
क्यूरोशियो (जापान) धारा
D.
हम्बोल्ट (पेरू) धारा
अटलांटिक महासागर की धारा गल्फ धारा है। यह एक गर्म जल धारा है जो गर्म जल को ठंडे जल क्षेत्रों में पहुँचाती है।
A.
पश्चिम पवन प्रवाह है।
B.
पूर्वी पवन प्रवाह है।
C.
उत्तरी पवन प्रवाह है।
D.
दक्षिण पवन प्रवाह है।
हिंद महासागर की धारा पश्चिम पवन प्रवाह है। यह एक ठंडी जल धारा है जो ठंडा जल गर्म जल क्षेत्रों में लाती है।
A.
गुरुत्वाकर्षण उत्पन्न करने में किया जाता है।
B.
विद्युत शक्ति उत्पन्न करने में किया जाता है।
C.
खनिज उत्पन्न करने में किया जाता है।
D.
चट्टानों को उत्पन्न करने में किया जाता है।
ज्वारों का उपयोग विद्युत शक्ति उत्पन्न करने में किया जाता है।
A.
तरंग आकार से संबंधित है।
B.
तरंग लंबाई से संबंधित है।
C.
तरंग के उच्चतम एवं निम्नतम बिंदु से संबंधित है।
D.
तरंग गति से संबंधित है।
तरंग शिखर एवं गर्त, तरंग के उच्चतम एवं निम्नतम बिंदु से संबंधित है।
A.
सूर्य का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव है।
B.
चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव है।
C.
पवनें हैं।
D.
समुद्र में भूकंप का आना है।
सुनामी तरंगों का कारण समुद्र में भूकंप का आना है।
A.
तरंग की ऊँचाई है।
B.
तरंग की चौड़ाई है।
C.
तरंग की आधी ऊँचाई है।
D.
यह लगातार दो लहरों के बीच का समय अंतराल है।
यह तरंग की ऊँचाई का आधा होता है।
A.
नदी प्रवाह
B.
जल का घनत्व एवं लवणता
C.
ज्वार-भाटा
D.
प्रचलित पवनें
जल का घनत्व एवं लवणता, तट का आकार एवं दिशा, गुरुत्वाकर्षण बल धाराओं की गति एवं उत्पत्ति को प्रभावित करने वाले कारक हैं।
A.
घर्षण होता है।
B.
वेग होता है।
C.
गुरुत्वाकर्षण होता है।
D.
पवन की दिशा होती है।
जैसे ही एक तरंग महासागरीय तट पर पहुँचती है इसकी गति कम हो जाती है। ऐसा गत्यात्मक जल के मध्य आपस में घर्षण होने के कारण होता है तथा जब जल की गहराई तरंग के तरंगदैर्ध्य के आधे से कम होती है, तब तरंग टूट जाते हैं।
A.
अटलांटिक महासागर की एक धारा है।
B.
प्रशांत महासागर की एक धारा है।
C.
हिंद महासागर की एक धारा है।
D.
आर्कटिक महासागर की एक धारा है।
क्यूरोशियो धारा को जापान धारा भी कहा जाता है। यह विश्व में गल्फ स्ट्रीम के बाद दूसरी सबसे शक्तिशाली धारा है। यह पश्चिमी उत्तरी प्रशांत महासागर में एक शक्तिशाली पश्चिमी सीमारेखा है।
धाराओं की दिशा परिवर्तित करने वाले दो कारक -1. प्रचलित पवनों का प्रभाव-प्रचलित पवने अपने मार्ग में पड़ने वाले जल राशि को अपनी दिशा के अनुरूप धकेलती हुई चलती है जिससे जल राशि प्रवाहित होती है।2. पृथ्वी की दैनिक गति- पृथ्वी की दैनिक गति का प्रभाव जल धाराओं के प्रवाह और उनकी गति पर पड़ते है।
उत्तरी व दक्षिणी विषुवतरेखीय जल धाराएँ, दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट से टकराती हैं। कुछ जल विषुवत रेखा के शान्त खंड से होकर गिनी तट से टकराता है। इसी उल्टे बहाव को विपरीत भूमध्यरेखीय धारा या गिनी की धारा कहते है।
दक्षिणी अटलांटिक धारा दक्षिणी अफ्रीका के पश्चिमी तट से टकराकर उत्तर की ओर मुड़ जाती है। इसे बेंग्वेला धारा कहते हैं। यह ब्राजील की गर्म एवं फाकलैंड की ठण्डी धारा का मिश्रण है। यह न अधिक गर्म ओर न अधिक ठण्डी है। इसी कारण से इस धारा को शीतोष्ण धारा माना जाता है।
दक्षिणी विषुवतरेखीय धारा, सैंट रॉक अन्तरीप से टकराकर दो भागों में विभाजित हो जाती है। उत्तरी धारा को हम उत्तरी ब्राजील धारा तथा दक्षिणी धारा को दक्षिणी ब्राजील धारा के नाम से जानते हैं। यह एक गर्म धारा है।
A.
जीवन का तंत्र
B.
जैविक और अजैविक घटकों से मिलकर बना तंत्र
C.
जंतुओं का तंत्र
D.
वनस्पतियों का तंत्र
जैविक और अजैविक घटकों से मिलकर बना तंत्र एवं उनका एक दूसरे से अंतर्सम्बन्ध पारितंत्र के रूप में जाना जाता है। यह स्थलीय एवं जलीय दो प्रकार का होता है।
A.
सरंध्रित मृदा व साथ ही ह्यूमस की पतली परत
B.
पोषक तत्त्वों से भरपूर व जैव पदार्थों का बहुत कम या न होना
C.
अम्लीय व पोषक तत्त्वों की कमी
D.
उपजाऊ जलोढ़
मरुस्थल पानी और पौधों की कमी की वजह से कई मायनों में बहुत भंगुर होते हैं। मरुस्थल में पौधों को विकसित होने में लंबा समय लगता है। मृदाओं में प्रायः प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व होते हैं क्योंकि अच्छे उत्पादन के लिए उन्हें केवल जल की आवश्यकता होती है और इनमें जैव पदार्थ बहुत कम या नहीं होते हैं।
A.
जलवायु द्वारा
B.
तापमान द्वारा
C.
मानव गतिविधियों द्वारा
D.
वनस्पति द्वारा
बायोम जंतु एवं वनस्पति का एक समुदाय है जो बड़े भौगोलिक क्षेत्र में फैला हुआ है। भूमि पर विभिन्न बायोम की सीमाएँ मुख्य रूप से जलवायु द्वारा निर्धारति होती हैं।
A.
वायुमंडल
में आ जाती है
सूक्ष्म
जीवाणुओं
द्वारा
कार्बोहाइड्रेट्स
ऑक्सीजन
प्रक्रिया
द्वारा
कार्बन
डाइऑक्साइड
में
परिवर्तित
होकर पुनः वायुमंडल
में आ जाती है|
प्रेयरी
के रूप में B.
स्टैपी
के रूप में C.
सवाना
के रूप में D.
वेल्ड
के रूप में
उष्णकटिबंधीय
घास के मैदान
या सवाना, विषुवत
पर उष्णकटिबंधीय
वर्षा वनों
के उत्तर और
दक्षिण में
स्थित हैं।
दक्षिण
अमेरिका में
कई बड़े सवाना
पाए जाते
हैं।
भू-पर्पटी
से B.
जल
चक्र से C.
वायुमंडल
से D.
वन
बॉयोम से
जब
घुलनशील लवण
जल चक्र में
सम्मिलित हो
जाते हैं, तब ये
अपक्षय
प्रक्रिया
द्वारा
पृथ्वी की पर्पटी
पर और फिर बाद
में समुद्र
तक पहुँच
जाते हैं।
B.
78% C.
98% D.
75%
शुद्ध
और शुष्क वायु
में
नाइट्रोजन 78
प्रतिशत, ऑक्सीजन, 21
प्रतिशत, आर्गन 0.93
प्रतिशत
कार्बन डाई
ऑक्साइड 0.03
प्रतिशत तथा
हाइड्रोजन, हीलियम, ओज़ोन, निऑन, जेनान, आदि
अल्प मात्रा
में उपस्थित
रहती हैं।
कार्बन
डाइऑक्साइड B.
हाइड्रोजन C.
ऑक्सीजन D.
नाइट्रोजन
प्रकाश-संश्लेषण
प्रक्रिया
के दौरान
कार्बन
डाइऑक्साइड
कार्बनिक
यौगिकों और
ऑक्सीजन में
बदल जाती है
समुद्री
और स्वच्छ जल
पारितंत्र B.
स्थलीय
तथा जलीय
पारितंत्र C.
वायुमंडलीय
एवं
स्थलमंडलीय
पारितंत्र D.
वन
तथा घास का
मैदान
पारितंत्र
पारितंत्र
मुख्यतः दो
प्रकार के
हैं
:
स्थलीय
पारितंत्र व
जलीय
पारितंत्र।
स्थलीय
पारितंत्र
को पुनः ‘बायोम’
में
विभक्त किया
जा सकता है।
जलीय
पारितंत्र को
समुद्री
पारितंत्र व
ताजे जल के
पारितंत्र में
बाँटा जाता
है।
उत्पादक
B.
उपभोक्ता
C.
सूर्य
का प्रकाश D.
अपघटक
अजैविक
कारकों में
तापमान, वर्षा,
सूर्य
का प्रकाश, आर्द्रता,
मृदा
की स्थिति व
अजैविक या अकार्बनिक
तत्त्व; कार्बन
डाई आक्साइड,
जल, नाइट्रोजन,
कैल्शियम,
फॉस्फोरस,
पोटैशियम
आदि
सम्मिलित
हैं।
महासागर
B.
तटीय
ज्वारनदमुख C.
प्रवाल
भित्ति D.
सरिताएँ
स्वच्छ
जल के
पारितंत्र
में झीलें, तालाब,
सरिताएँ,
कच्छ
व दलदल शामिल
हैं।
जैव भू-रासायनिक चक्र दो प्रकार के हैं - एक गैसीय चक्र और दूसरा तलछटी चक्र 1. झीलें, नदियाँ, सरिताएँ व अन्य आर्द्र भूमि ताजा जल बायोम में आते हैं| 2. महासागर, प्रवाल- भित्ति, लैगून व ज्वारनद समुद्र जल बायोम में आते हैं| जलीय बायोम को दो वर्गों में बाँटा गया है, जैसे कि – ताजा जल बायोम एवं समुद्र जल का बायोम घास भूमि बायोम में शामिल जंतुओं हैं: जिराफ, जेबरा, भैंस, चीता, लक्कड़बग्घा, हाथी, चूहे, साँप व अन्य कीड़े आदि जीव। मरूस्थलीय बायोम में पाए जाने वाले मृदा एक मुख्य विशेषताएं है - पोषक तत्त्वों से भरपूर व जैव पदार्थों का कमी या न होना। खाद्य शृंखला की प्रक्रिया में एक स्तर से दूसरे स्तर पर ऊर्जा के रूपांतरण को ऊर्जा प्रवाह (फ्लो ऑफ़ एनर्जी) कहते हैं। इकोलोजी (Ecology) शब्द का अर्थ घर का विज्ञान| अर्थात, पृथ्वी पर पौधों, मनुष्यों, जन्तुओं व सूक्ष्म जीवाणुओं के घर- के रूप में इस शब्द का अध्ययन किया गया है | जर्मन प्राणीशास्त्री अर्नस्ट हैक्कल इस शब्द का प्रवर्तक है| जीवों के पोषण के लिए एक आवश्यक पदार्थों है, जो जीवों को ऊर्जा या संरचनात्मक घटक प्रदान करते है। अपघटक, वे हैं, जो मृत जीवों पर निर्भर हैं, जैसे- कौवा और गिद्ध, तथा कुछ अन्य अपघटक, जैसे -बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्म जीवाणु मृतकों को अपघटित कर उन्हें सरल पदार्थों में परिवर्तित करते हैं। मानव का वैज्ञानिक नाम होमो सेपियन्स है। जैविक घटकों का भूमि, वायु व जल के साथ पारस्परिक आदान-प्रदान जीवों के जीवित रहने, बढ़ने व विकसित होने में सहायक होता है। खाद्य शृंखलाएँ पृथक अनुक्रम न होकर एक दूसरे से जुड़ी होती हैं। अधिकांश पशु एक से अधिक खाद्य श्रृंखला के हिस्से होते हैं क्योंकि अपनी ऊर्जा की आवश्यकता पूर्ति के लिए वे एक से अधिक प्रकार के भोजन का भक्षण करते हैं। प्रजातियों के इस प्रकार जुड़े होने को खाद्य जाल (फ़ूड बेब) कहा जाता है। पारितंत्र के उत्पादकों में सभी हरे पौधे सम्मिलित हैं, जो प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते हैं। जैवमंडल पृथ्वी का वह भाग है, जहाँ सभी पौधों, जंतुओं, प्राणियों (जिसमें पृथ्वी पर रहने वाले सूक्ष्म जीव भी हैं) और उनके चारों तरफ के पर्यावरण जैसे की स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल के विविध घटकों के साथ उन जीवों के पारस्परिक अंतर्संबंध को कहते है। जैवमंडल के कारण ही, पृथ्वी पर पादपों एवं जन्तुओं का जीवन सम्भव होता है। स्थानांतरी कृषि में वनों को साफ करने से प्रजातियों के वितरण में बदलाव लाता है। यह परिवर्तन प्रतिस्पर्धा के कारण है, जहाँ द्वितीय वन-प्रजातियों जैसे- घास, बाँस और चीड़ आदि के वृक्ष प्रारंभिक प्रजातियों के स्थान पर उगते हैं और प्रारंभिक वनों की संरचना को बदल देते हैं। यही अनुक्रमण कहलाता है। किसी पारितंत्र या आवास में जीवों के समुदाय में परस्पर गतिक साम्यता की अवस्था ही पारिस्थितिक संतुलन है। जल चक्र पृथ्वी पर उपलब्ध जल के एक रूप से दूसरे में परिवर्तित होने या एक स्थान से दूसरे स्थान को गति करने की चक्रीय प्रक्रिया है| जल - वाष्प - बादल - हिमपात - वर्षा - इसी रूप से पृथ्वी जलचक्र संपूर्ण होते है | जल चक्र पृथ्वी पर उपलब्ध जल के एक रूप से दूसरे में परिवर्तित होने या एक स्थान से दूसरे स्थान को गति करने की चक्रीय प्रक्रिया है जिसमें कुल जल की मात्रा का क्षय नहीं होता बस रूप परिवर्तन और स्थान परिवर्तन होता है। इस चक्र में पानी (द्रव) , जो वाष्प बनकर वायुमण्डल में जाता है फिर संघनित होकर बादल बनता है और फिर बादल बनकर ठोस (हिमपात) या द्रव रूप में या वर्षा के रूप में सतह पर बरसता है। ऐसे ही, पृथ्वी जलचक्र संपूर्ण होते है | नाइट्रोजन यौगीकीकरण (Nitrogen fixation) एक ऐसा प्रक्रिया है, जिसके द्वारा वायुमण्डल की नाइट्रोजन अमोनियम में बदल जाती है। वायुमण्डलीय नाइट्रोजन या आणविक नाइट्रोजन अपेक्षाकृत अक्रिय पदार्थ है जो अन्य रसायनों से आसानी से क्रिया नहीं करता और नया यौगिक नहीं बनाता। किन्तु यौगीकरण की प्रक्रिया से ही नाइट्रोजन परमाणु को मुक्त कर देता है और यह दूसरे तरीकों से उपयोग में लाया जा सकता है। मरूस्थलीय बायोम को चार वर्गों में बर्गीकृत किया गया है, जैसेकि 1. गर्म व उष्ण मरुस्थल, 2. अर्धशुष्क मरुस्थल, 3. तटीय मरुस्थल, 4. शीत मरुस्थल वन बायोम को तीन मुख्य वर्गों में बर्गीकृत किया है, जैसे की - उष्ण कटिबंधीय, शीतोष्ण कटिबंधीय , बोरियल आदि| उष्ण कटिबंधीय वन बायोम को फिर से दो वर्गों में विभाजित किया है| जैसे की – भूमध्यरेखीय बायोम एवं पर्णपाती बायोम | बायोम, पौधों व प्राणियों का एक समुदाय है, जो एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पाया जाता है। विशेष परिस्थितियों में पादप व जंतुओं के अंर्तंसंबंधो के कुल योग को ‘बायोम’ कहते हैं। उदाहरन - वन, घास क्षेत्र, मरुस्थल बायोम आदि| प्रकाश-संश्लेषण क्रिया का प्रमुख सह-परिणाम ऑक्सीजन है। यह कार्बोहाइड्रेट्स के ऑक्सीकरण में सम्मिलित है जिससे ऊर्जा, कार्बन-डाइ-ऑक्साइड व जल विमुक्त होते हैं। ऑक्सीजन चक्र बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। बहुत से रासायनिक तत्त्वों और सम्मिश्रणों में ऑक्सीजन पाई जाती है। यह नाइट्रोजन के साथ मिलकर नाइट्रेट बनाती है तथा बहुत से अन्य खनिजों व तत्त्वों से मिलकर कई तरह के ऑक्साइड बनाती है जैसे- आयरन ऑक्साइड, एल्यूमिनियम ऑक्साइड, आदि। सूर्यप्रकाश में प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान, जल अणुओ के विघटन से ऑक्सीजन उत्पन्न होती है और पौधों की वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया के दौरान भी यह वायुमंडल में पहुंचती हैं। एक प्रजाति अपने आहार के आधार पर एक या एक से अधिक पोषण तल पर मौजूद रह सकती है। वे जीव, जिनका भोजन वनस्पतियों से समान चरणों में प्राप्त होता है, एक पोषण तल या ट्रोफिक लेवल में आते हैं। पोषण तल, पोषण संरचना एवं कार्यों को सामान्यतया पारिस्थितिकीय पिरामिड द्वारा दर्शाया जाता है, जिसमें उत्पादक आधार तैयार करते हैं और उसके बाद के स्तर क्रमशः मंजिलें तैयार करते हैं। उत्पादक होने के नाते हरी वनस्पतियां पहले पोषण तल पर आती हैं। शाकाहारी दूसरी मंजिल या तल पर माने जाते हैं। मांसाहारी, जो शाकाहारियों को अपना आहार बनाते हैं, तीसरे पोषण तल पर आते हैं, जबकि जो मांसाहारी जो मांसाहारियों का ही भक्षण करते हैं, वे चतुर्थ पोषण तल पर माने जाते हैं। चराई खाद्य शृंखला पौधों (उत्पादक) से आरंभ होकर माँसाहारी (तृतीयक उपभोक्ता) तक जाती है, जिसमें शाकाहारी मघ्यम स्तर पर हैं। हर स्तर पर ऊर्जा का ह्रास होता है, जिसमें श्वसन, उत्सर्जन व विघटन प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं। खाद्य शृंखला में तीन से पाँच स्तर होते हैं और हर स्तर पर ऊर्जा कम होती जाती है। अपरद खाद्य शृंखला चराई खाद्य शृंखला से प्राप्त मृत पदार्थों पर निर्भर है और इसमें कार्बनिक पदार्थ का अपघटन सम्मिलित हैं। शीतोष्ण कटिबंधीय बायोम बोरियल बायोम 1. यह बायोम पूर्वी उत्तरी अमेरिका, उत्तरी-पूर्वी एशिया, पश्चिमी व मध्य यूरोप में स्थित हैं | 1. यह बायोम यूरेशिया व उत्तरी अमेरिका का उच्च अक्षांशीय भाग- साइबेरिया का कुछ भाग, अलास्का, कनाडा व स्केंडेनेवियन देश में स्थित हैं| 2. यहाँ तापमान 20° से 30° से॰ वर्षा - समान रूप से वितरित - 750 से 1500 मि.मी. स्पष्ट ऋतुएं तथा असाधारण शीत। 2. यहाँ छोटी आर्द्र ऋतु व मध्यम रूप से गर्म ग्रीष्म ऋतु तथा लंबी (वर्षा रहित) शीत ऋतु। वर्षा मुख्यतः हिमपात के रूप में 400 से 1000 मि॰मी॰ 3. यहाँ मध्यम घने चैड़े पत्ते वाले वृक्ष, जैसे की - ओक, बीच, मेप्पल आदि सामान्य प्रजातियाँ और पशुओं में गिलहरी, खरगोश, पक्षी, काले भालू, पहाड़ी शेर व स्कंक आदि पाए जाते हैं | 3. यहाँ सदाबहार कोणधारी वन जैसे - पाइन, फर व स्पू्रस आदि। कठपफोड़ा, चील, भालू, हिरण, खरगोश, भेड़िये व चमगादड़ आदि मुख्य प्राणी पाए जाते हैं। इकोलोजी शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों ‘ओइकोस’ और ‘लोजी’ से मिलकर बना है। ओइकोस का शाब्दिक अर्थ ‘घर तथा ‘लोजी’ का अर्थ विज्ञान या अध्ययन से है। शाब्दिक अर्थानुसार इकोलोजी-पृथ्वी पर पौधों, मनुष्यों, जतुओं व सूक्ष्म जीवाणुओं के घर- के रूप में अध्ययन है | एक-दूसरे पर आश्रित होने के कारण ही ये एक साथ रहते हैं| जर्मन प्राणीशास्त्री अर्नस्ट हैक्कल, जिन्होंने सर्वप्रथम सन् 1869 में ओइकोलोजी शब्द का प्रयोग किया, पारिस्थितिकी के ज्ञाता के रूप में जाने जाते हैं। जीवधारियों (जैविक) व अजैविक (भौतिक पर्यावरण) घटकों के पारस्परिक संपर्क के अघ्ययन को ही पारिस्थितिकी विज्ञान कहते हैं। अतः जीवधारियों का आपस में व उनका भौतिक पर्यावरण से अंतसंबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन ही पारिस्थितिकी है। पारितंत्र की संरचना में वहाँ उपलब्ध पौधों व जंतुओं की प्रजातियों का वर्णन सम्मिलित है। यह उनेक (प्राणियों व पौधों की प्रजातियों के) इतिहास, वितरण व उनकी संख्या को भी वर्णित करता है। संरचना की दृष्टि से, सभी पारितंत्र में जैविक व अजैविक कारक होते हैं। अजैविक या भौतिक कारकों में तापमान, वर्षा, सूर्य का प्रकाश, आर्द्रता, मृदा की स्थिति व अजैविक या अकार्बनिक तत्त्व; कार्बन डाई आक्साइड, जल, नाइट्रोजन, कैल्शियम, फाँस्पफोरस, पोटाशियम आदि ) सम्मिलित हैं। जैविक कारकों में उत्पादक, प्राथमिक, द्वितीयक व तृतीयक, उपभोक्ता तथा अपघटक शामिल हैं। पारितंत्रा के जीवाणु एक खाद्य - शृंखला से परस्पर जुड़े हुए होते हैं। उदाहरण के लिए - पौधे पर जीवित रहने वाला एक कीड़ा (बीटल) एक मेंढ़क का भोजन है, जो मेढ़क साँप का भोजन है और साँप एक बाश द्वारा खा लिया जाता है। यह खाद्य क्रम और इस क्रम से एक स्तर से दूसरे स्तर पर ऊर्जा प्रवाह ही खाद्य शृंखला (फ़ूड चैन) कहलाती है। खाद्य शृंखला की प्रक्रिया में एक स्तर से दूसरे स्तर पर ऊर्जा के रूपांतरण को ऊर्जा प्रवाह (फ्लो ऑफ़ एनर्जी) कहते हैं। खाद्य शृंखलाएँ पृथक अनुक्रम न होकर एक दूसरे से जुड़ी होती हैं। उदाहरणार्थ - एक चूहा, जो अन्न पर निर्भर है, वह अनेक द्वितीयक उपभोक्ताओं का भोजन है और तृतीयक माँसाहारी अनेक द्वितीयक जीवों से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक माँसाहारी जीव एक से अधिक प्रकार के शिकार पर निर्भर है। परिणामस्वरूप खाद्य शृंखलाएँ आसपास में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। प्रजातियों के इस प्रकार जुड़े होने (अर्थात् जीवों की खाद्य शृंखलाओं के विकल्प उपलब्ध होने पर) को खाद्य जाल (फ़ूड वयेब) कहा जाता है। उत्तरी विषुवतरेखीय धारा विषुवत रेखा के उत्तर में उत्तर-पूर्वी सन्मार्गी पवनों के द्वारा पूर्व से पश्चिम को चलती है, और कैरेबियन सागर के निकट दो भागों में विभाजित हो जाती है। एक धारा उत्तर की ओर गल्फ स्ट्रीम में जाकर मिलती है। दूसरी धारा दक्षिण की ओर चलकर मैक्सिको की खाड़ी में पहुँच जाती है। सागरों के जल का घनत्व, तापमान ऊँचा रहने पर घट जाता है। जल हल्का होकर फैलता है, तथा उसकी ऊँचाई बढ़ जाती है। जबकि तापमान गिरने से जल का घनत्व बढ़ जाता है। भारी एवं ठंडा जल संकुचित होकर नीचे बैठ जाता है। सागर का जल सदा गतिशील रहता है। सागर में जल की यह गति ढाल के कारण होती है, किन्तु धाराओं की गति का ढाल से कोई संबंध नहीं होता। सन्मार्गी पवनों का प्रवाह, तापमान की भिन्नता और धनत्व में अन्तर, वर्षा की मात्रा में अन्तर आदि कारण धाराओं को जन्म देने में सहायक हैं। उत्तरी व दक्षिणी विषुवतरेखीय जल धाराएँ, दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट से टकराती हैं। कुछ जल विषुवत रेखा के शान्त खंड से होकर गिनी तट से टकराता है। इसी उल्टे बहाव को विपरीत भूमध्यरेखीय धारा या गिनी की धारा कहते है। दक्षिणी अटलांटिक धारा दक्षिणी अफ्रीका के पश्चिमी तट से टकराकर उत्तर की ओर मुड़ जाती है। इसे बेंग्वेला धारा कहते हैं। यह ब्राजील की गर्म एवं फाकलैंड की ठण्डी धारा का मिश्रण है। यह न अधिक गर्म ओर न अधिक ठण्डी है। इसी कारण से इस धारा को शीतोष्ण धारा माना जाता है। दक्षिणी विषुवतरेखीय धारा, सैंट रॉक अन्तरीप से टकराकर दो भागों में विभाजित हो जाती है। उत्तरी धारा को हम उत्तरी ब्राजील धारा तथा दक्षिणी धारा को दक्षिणी ब्राजील धारा के नाम से जानते हैं। यह एक गर्म धारा है। उत्तरी विषुवतरेखीय धारा विषुवत रेखा के उत्तर में उत्तर-पूर्वी सन्मार्गी पवनों के द्वारा पूर्व से पश्चिम को चलती है, और कैरेबियन सागर के निकट दो भागों में विभाजित हो जाती है। एक धारा उत्तर की ओर गल्फ स्ट्रीम में जाकर मिलती है। दूसरी धारा दक्षिण की ओर चलकर मैक्सिको की खाड़ी में पहुँच जाती है। सागरों के जल का घनत्व, तापमान ऊँचा रहने पर घट जाता है। जल हल्का होकर फैलता है, तथा उसकी ऊँचाई बढ़ जाती है। जबकि तापमान गिरने से जल का घनत्व बढ़ जाता है। भारी एवं ठंडा जल संकुचित होकर नीचे बैठ जाता है। सागर का जल सदा गतिशील रहता है। सागर में जल की यह गति ढाल के कारण होती है, किन्तु धाराओं की गति का ढाल से कोई संबंध नहीं होता। सन्मार्गी पवनों का प्रवाह, तापमान की भिन्नता और धनत्व में अन्तर, वर्षा की मात्रा में अन्तर आदि कारण धाराओं को जन्म देने में सहायक हैं। सूर्य व चन्द्रमा के आकर्षण शक्ति सागर जल-तल को नित्यप्रति क्रमशः ऊपर नीचे करती रहती है, जिसे ज्वार भाटा कहते है। भूमध्य रेखा पर चन्द्रमा प्रत्येक माह में लम्बवत रहता है जिसके कारण ज्वार की असमान्यता वहाँ न्यूनतम रहती है, अर्थात दीर्ध ज्वार एवं अन्य दिनों के ज्वार में अंतर कम रहता है। इसे ही “भूमध्यरेखीय ज्वार” कहते है। चन्द्रमा अपनी कक्ष पर, अंडाकार आकृति में पृथ्वी के चारो ओर घूमता है, ऐसे अवस्था में घूमता हुआ चन्द्रमा जब पृथ्वी से निकटतम दूरी पर आ जाता है, तब यह लगभग 3,56,000 कि.मी. दूर होता हैl इसके विपरीत जब यह पृथ्वी से अत्यधिक दूर रहता है, तब यह लगभग 4,07,000 कि.मी. दूर होता हैl पृथ्वी के परिभ्रमण के कारण प्रत्येक स्थान पर चौबीस घंटे में दो बार ज्वार एवं दो बार भाटा आता है। महासागरीय जल एक ही स्थान पर जब एक ज्वार और एक भाटा आता है, तब इसे `दैनिक ज्वार-भाटा` कहते हैं। इनमें भूमध्य रेखा पर चन्द्रमा प्रत्येक माह में लम्बवत रहता है जिसके कारण ज्वार की असमान्यता वहाँ न्यूनतम रहती है, अर्थात दीर्ध ज्वार एवं अन्य दिनों के ज्वार में अंतर कम रहता है। इसे ही “भूमध्यरेखीय ज्वार” कहते है। चन्द्रमा अपनी कक्ष पर, अंडाकार आकृति में पृथ्वी के चारो ओर घूमता है, ऐसे अवस्था में घूमता हुआ चन्द्रमा जब पृथ्वी से निकटतम दूरी पर आ जाता है, तब यह लगभग 3,56,000 कि.मी. दूर होता हैl इसके विपरीत जब यह पृथ्वी से अत्यधिक दूर रहता है, तब यह लगभग 4,07,000 कि.मी. दूर होता हैl सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में प्रत्येक पूर्णमासी तथा अमावस्या के दिन होते हैं, इस स्थिति को `सिजिगी` कहते हैंl पृथ्वी के परिभ्रमण के कारण प्रत्येक स्थान पर चौबीस घंटे में दो बार ज्वार एवं दो बार भाटा आता है।
भूमि तथा पौधों में विभिन्न विधियों द्वारा वायुमंडल की स्वतंत्र नाइट्रोजन का नाइट्रोजनीय यौगिकों के रूप में स्थायीकरण और उनके पुनः स्वतंत्र नाइट्रोजन में परिवर्तित होने का अनवरत प्रक्रम को नाइट्रोजन चक्र कहा जाता है। वायुमंडल की संरचना का प्रमुख घटक नाइट्रोजन, वायुमंडलीय गैसों का 79 प्रतिशत भाग है। विभिन्न कार्बनिक यौगिक जैसे- एमिनो एसिड, न्यूक्लिक एसिड,विटामिन व वर्णक आदि में यह एक महत्त्वपूर्ण घटक है। पृथ्वी पर जीवन विविध प्रकार के जीवित जीवों के रूप में पाया जाता है। ये जीवधारी विविध प्रकार के पारिस्थितकीय अतसर्बंधों पर जीवित हैं। जीवधारी बहुलता व विविधता में ही जिंदा रह सकते हैं। इसमें (अर्थात्, जीवित रहने की प्रक्रिया में) विधिवत प्रवाह जैसे- ऊर्जा, जल व पोषक तत्त्वों की उपस्थिति सम्मिलित है। इनकी उपलब्धता संसार के विभिन्न भागों में भिन्न है। यह भिन्नता क्षेत्रीय होने के साथ-साथ सामयिक (अर्थात् वर्ष के 12 महीनों में भी भिन्न है) भी है। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले 100 करोड़ वर्षों में वायुमंडल व जलमंडल की संरचना में रासायनिक घटकों का संतुलन लगभग एक जैसा अर्थात् बदलाव रहित रहा है। रासायनिक तत्त्वों का यह संतुलन पौधे व प्राणी उतकों से होने वाले चक्रीय प्रवाह के द्वारा बना रहता है। यह चक्र जीवों द्वारा रासायनिक तत्त्वों के अवशोषण से आरंभ होता है और उनके वायु, जल व मिट्टी में विघटन से पुनः आरंभ होता है। ये चक्र मुख्यतः सौर ताप से संचालित होते हैं। जैवमंडल में जीवधारी व पर्यावरण के बीच ये रासायनिक तत्त्वों के चक्रीय प्रवाह जैव भू-रासायनिक चक्र कहे जाते हैं। ‘बायो’ का अर्थ है जीव तथा ‘ज्यो’ का तात्पर्य पृथ्वी पर उपस्थित चट्टानें, मिट्टी, वायु व जल से है। जैव भू-रासायनिक चक्र दो प्रकार के हैं - एक गैसीय और दूसरा तलछटी चक्र गैसीय चक्र में पदार्थ का मुख्य भंडार/स्रोत वायुमंडल व महासागर हैं। तलछटी चक्र के प्रमुख भंडार पृथ्वी की भूपर्पटी पर पाई जाने वाली मिट्टी, तलछट व अन्य चट्टानें हैं। संरचना की दृष्टि से, सभी पारितंत्र में जैविक व अजैविक कारक होते हैं। अजैविक या भौतिक कारकों में तापमान, वर्षा, सूर्य का प्रकाश, आर्द्रता, मृदा की स्थिति व अजैविक या अकार्बनिक तत्त्व; कार्बन डाई आक्साइड, जल, नाइट्रोजन, कैल्शियम, फाँस्पफोरस, पोटाशियम आदि ) सम्मिलित हैं। जैविक कारकों में उत्पादक, प्राथमिक, द्वितीयक व तृतीयक, उपभोक्ता तथा अपघटक शामिल हैं। उत्पादकों में सभी हरे पौधे सम्मिलित हैं, जो प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते हैं। प्रथम श्रेणी के उपभोक्ताओं में शाकाहारी जंतु जैसे-हिरण, बकरी, चूहे और सभी पौधों पर निर्भर जीव शामिल हैं। द्वितीयक श्रेणी के उपभोक्ताओं में सभी माँसाहारी जैसे- साँप, बाघ, शेर आदि शामिल हैं। कुछ माँसाहारी, जो दूसरे माँसाहारी जीवों पर निर्भर हैं, उन्हें चरम स्तर के शीर्ष माँसाहारी के रूप में जाना जाता है। जैसे- बाज़ और नेवला आदि। अपघटक, वे हैं, जो मृत जीवों पर निर्भर हैं (जैसे- कौवा और गिद्ध, तथा कुछ अन्य अपघटक, जैसे -बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्म जीवाणु मृतकों को अपघटित कर उन्हें सरल पदार्थों में परिवर्तित करते हैं। प्राथमिक उपभोक्ता, उत्पादक पर निर्भर हैं, जबकि प्राथमिक उपभोक्ता, द्वितीयक उपभोक्ताओं के भोजन बनते हैं। द्वितीयक उपभोक्ता फिर तृतीयक उपभोक्ताओं के द्वारा खाए जाते हैं। अपघटक प्रत्येक स्तर पर मृतकों पर निर्भर होते हैं। ये अपघटक इन्हें (मृतकों को) विभिन्न पदार्थों, जैसे- कार्बनिक व अकार्बनिक अवयवों और मिट्टी की उर्वरता के लिए पोषक तत्त्वों में परिवर्तित कर देते हैं। किसी विशेष क्षेत्र में किसी विशेष समूह के जीवधारियों का भूमि, जल अथवा वायु (अजैविक तत्त्वों) से ऐसा अर्तंसंबंध जिसमें ऊर्जा प्रवाह व पोषण शृंखलाएं स्पष्ट रूप से समायोजित हों, उसे पारितंत्र कहा जाता है| विभिन्न बायोम की सीमा का निर्धारण जलवायु व पारितंत्र मुख्यतः दो प्रकार के हैः स्थलीय पारितंत्र व जलीय पारितंत्र । स्थलीय पारितंत्र को पुनः ‘बायोम’ में विभाजित किया जाता है। बायोम, पौधों व प्राणियों का एक समुदाय है, जो एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पाया जाता है। पृथ्वी पर अपक्षय संबंधी तत्त्व करते हैं। अतः विशेष परिस्थितियों में पादप व जंतुओं के अंर्तंसंबंधो के कुल योग को ‘बायोम’ कहते हैं। इसमें वर्षा, तापमान, आर्द्रता व मिट्टी संबंधी अवयव भी शामिल हैं। संसार के कुछ प्रमुख पारितंत्र: वन, घास क्षेत्र, मरुस्थल और टुण्ड्रा पारितंत्र हैं। जलीय पारितंत्र को समुद्री पारितंत्र व ताजे जल के पारितंत्र में बाँटा जाता है। समुद्री पारितंत्र में महासागरीय, तटीय ज्वारनदमुख, प्रवाल भित्ति, पारितंत्र सम्मिलित हैं। ताजे जल के पारितंत्र में झीलें, तालाब, सरिताएँ, कच्छ व दलदल शामिल हैं। दक्षिण
अमेरिका B.
उत्तरी
अमेरिका C.
ऑस्ट्रेलिया D.
अंटार्कटिका
अपनी
विशिष्ट
कठोर जलवायु
के कारण
अंटार्कटिका
पर कोई भी
देशी
वनस्पति या
जंतु नहीं
पाए जाते
हैं।
1970 B.
1969 C.
1972 D.
1975
भारत सरकार
ने विभिन्न
प्रकार की
प्रजातियों
को बचाने, संरक्षित
करने और
विस्तार
करने के लिए, वन्य जीव
सुरक्षा
अधिनियम सन् 1972 में पारित
किया है।
संकटापन्न
प्रजातियों
के संरक्षण
के लिए प्रयास
करने चाहिए। B.
वन्य
जीवों व
पौधों का
अंतर्राष्ट्रीय
व्यापार, नियमों
के अनुरूप
होना चाहिए। C.
प्रत्येक
देश को वन्य
जीवों के
आवास को
चिह्नित कर
उनकी
सुरक्षा को
सुनिश्चित
करना चाहिए। D.
नई
प्रजातियों
के लिए शोध
होने चाहिए।
जैव-विविधता
संरक्षण के
लिए सुझाए गए
तरीकों में
नई
प्रजातियों
के लिए शोध
नहीं शामिल
था।
150 B.
155 C.
160 D.
162
जैव-विविधता
के सम्मेलन
में लिए गए
संकल्पों का
भारत सहित
अन्य 155 देशों
ने
हस्ताक्षर
किया है।
एक
सुभेद्य
प्रजाति B.
एक
संकटापन्न
प्रजाति C.
एक
दुर्लभ
प्रजाति D.
एक
विदेशज
प्रजाति
संकटापन्न
प्रजातियाँ
वे सभी
प्रजातियाँ
हैं,
जिनके
लुप्त हो
जाने का खतरा
है।
रेड
पांडा एक ऐसी
ही प्रजाति
है|
60 B.
50 C.
40 D.
70
ऊष्णकटिबंधीय
वर्षावन
पृथ्वी पर
पाई जाने वाली
प्रजातियों
के 50 प्रतिशत
का
प्रतिनिधित्व
करते हैं।
B.
1991 C.
1992 D.
1993
सन्
1992 में
ब्राजील के
रियो-डी-जेनेरो
में
जैव-विविधता
के सम्मेलन
का आयोजन
किया गया था।
प्रजातियों
की विविधता
से B.
प्रजातियों
में जीन की
विविधता से C.
प्रजातियों
के रूपों में
विविधता से D.
पौधों
की
प्रजातियों
में विविधता
से
प्रजातियों
में जीन की
विविधता
आनुवांशिक जैव-विविधता
के रूप में
जाना जाता
है। यह विविधता
प्रजातियों
की जनसँख्या
के स्वस्थ
नस्ल के लिए
आवश्यक है।
कम
प्रजातियों
वाले
क्षेत्र
होते हैं। B.
समृद्ध
प्रजातियों
वाले
क्षेत्र
होते हैं। C.
प्रजातियों
में विविधता D.
नगण्य
प्रजातियों
वाला
क्षेत्र
वे
क्षेत्र जो
प्रजातियों
में समृद्ध
हैं,
जैव-विविधता
के हॉट-स्पॉट
के रूप में
जाने जाते
हैं।
आनुवंशिक
विविधता B.
प्रजातीय
विविधता C.
पारिस्थितिकी
तंत्र
विविधता D.
एप्लाइड
विविधता
एप्लाइड
विविधता पर
जैव-विविधता
का अध्ययन नहीं
किया जाता
है।
नेशनल
पार्क(National
parks) B.
महा
विविधता
केंद्र’ (Mega diversity centres) C.
हॉट
स्पॉट (Hot
spots) D.
प्रजातीय
जैव-विविधता (Species diversity)
वह
देश,
जो
उष्ण
कटिबंधीय
क्षेत्र में
स्थित हैं, उनमें
संसार की
सर्वाधिक
प्रजातीय
विविधता पाई
जाती है।
उन्हें ‘महा
विविधता
केंद्र’ (Mega diversity centres) कहा
जाता है।
विषुवत
रेखा से
ध्रुवों की
ओर घटती है। B.
विषुवत
रेखा से
ध्रुवों की
ओर बढ़ती है। C.
किसी
निश्चित
पैटर्न का
अनुगमन नहीं
करती है। D.
ध्रुवों
पर जैव
विविधता
अधिकतम होती
है।
जैव-विविधता
विषुवत रेखा
से ध्रुवों
की ओर घटती
है।
पशु
अस्तित्व के
लिए B.
मानव
अस्तित्व के
लिए C.
विकास
के लिए D.
वनस्पति
अस्तित्व के
लिए
जैव-विविधता
मानव
अस्तित्व के
लिए
महत्वपूर्ण
है।
शिकार
करना B.
वन्य
जीवों का
संरक्षण
करना C.
मनोरंजन
करना D.
पालतू
जानवर पालना
राष्ट्रीय
उद्यान और
अभ्यारण्य
स्थापित किए
जाने का
उद्देश्य वन्य
जीवों का
संरक्षण
करना है।
भू-विविधता B.
फसल
विविधता C.
सांस्कृतिक
विविधता D.
रासायनिक
विविधता
जैव-विविधता
का एक
महत्वपूर्ण
भाग ‘फसलों
की विविधता’ है, जिसे
कृषि
जैव-विविधता
भी कहा जाता
है। विभिन्न
प्रकार की
फसलों की
खेती की जाती
है, जिनकी
उपयोगिता
भोज्य
पदार्थ, औषधियाँ
और सौंदर्य
प्रसाधन आदि
बनाने में है।
रेड
लिस्ट B.
ग्रीन
लिस्ट C.
ब्लू
लिस्ट D.
येलो
लिस्ट
संकटापन्न
प्रजातियों
में वे सभी
प्रजातियाँ
सम्मिलित
हैं, जिनके
लुप्त हो
जाने का खतरा
है।
इंटरनेशनल यूनियन
फॉर द
कंज़रवेशन ऑफ
नेचर एंड
नेचुरल रिसोर्सेज़
(आईयूसीएन)
विश्व की सभी
संकटापन्न
प्रजातियों
के बारे में
सूचना 'रेड लिस्ट'
नाम
से प्रकाशित
करता है।
सागर के तरंगों का जन्म प्राय: पवनों के कारण होता है। तरंग में जल का कुछ भाग ऊपर उठा हुआ और कुछ नीचे दबा हुआ रहता है। तरंग का ऊपर उठा भाग शिखर और नीचे का दबा हुआ भाग खात या द्रोणी कहलाता है। इन्हीं के द्वारा तरंगों की माप ज्ञात की जाती है। एक शिखर से दूसरे शिखर अथवा एक द्रोणी से दूसरी द्रोणी तक की दूरी "तरंग की लम्बाई" कहलाती है। द्रोणी और शिखर के बीच का अन्तर "तरंग की ऊँचाई" कहलाती है। तरंग का आकार वायु के वेग पर निर्भर करता है। वायु के वेग के अनुसार ही तरंगों का आकार छोटा-बड़ा होता है। बन्द सागरों की अपेक्षा खुले सागरों में तरंगों की ऊँचाई अधिक होती है। महासागरों में तरंगों की लम्बाई 100 से 500 मीटर तक और ऊँचाई प्राय: 1.5 से 4.0 मीटर तक हो जाती है। इसकी गति पूर्णमासी तथा अमावस्या के मध्य कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की सप्तमी और अष्टमी की तिथियों में सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी के साथ समकोण बनाते है। समकोणीय स्थिति के द्वारा सूर्य और चन्द्रमा, महासागरीय जल को अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं। पृथ्वी का वह भाग जो चन्द्रमा के सामने पढ़ता है, चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति से प्रभावित होता है। तथा इसके ठीक पीछे वाला भाग सबसे कम प्रभावित होता है। अत: सबसे अधिक आकर्षण शक्ति के प्रभाव से, पृथ्वी तल पर सामने पड़ने वाले भाग का जल आकर्षित होकर ऊपर की ओर उठता है, जिससे सागर में उच्चतम ज्वार की स्थिति निर्मित हो जाती है। अयनवृतीय ज्वार - सूर्य की उत्तरायण एवं दक्षिणायण स्थिति के साथ-साथ चन्द्रमा भी विषुवत रेखा से कर्क एवं मकर अयन रेखा की ओर झुक जाता है। इसी कारण दीर्ध ज्वार अयनवृतिय (कर्क एवं मकर) दोनों की स्थितियों वाला आता है। ज्वारों के विभिन्न प्रकार, महासागरों में पाये जाते है, जो निम्नलिखित हैं पृथ्वी का वह भाग जो चन्द्रमा के सामने पढ़ता है, चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति से प्रभावित होता है। तथा इसके ठीक पीछे वाला भाग सबसे कम प्रभावित होता है। अत: सबसे अधिक आकर्षण शक्ति के प्रभाव से, पृथ्वी तल पर सामने पड़ने वाले भाग का जल आकर्षित होकर ऊपर की ओर उठता है, जिससे सागर में उच्चतम ज्वार की स्थिति निर्मित हो जाती है।SOLUTION
A.
SOLUTION
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SOLUTION
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22%SOLUTION
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C.
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वायुमंडलीय नाइट्रोजन का पौधों तथा जीवों के लिए आवश्यक विविध यौगिकों में परिवर्तन और इन नाइट्रोजन यौगिकों का उनके (मृत जीवों एवं पौधों के) वियोजन के पश्चात् नाइट्रोजन गैस के रूप में पुनः वायुमंडल में लौटने की चक्रीय प्रक्रिया जो कई चरणों में सम्पन्न होती है। वायुमंडलीय नाइट्रोजन से प्राकृतिक प्रक्रिया द्वारा नाइट्रिक एसिड का निर्माण होता है जो वर्षा जल के माध्यम से मिट्टी में पहुंचता है। यहाँ चूनापत्थर तथा क्षारों से अभिक्रिया होने पर नाइट्रेट की उत्पत्ति होती है जिसका संग्रह मिट्टी में होता है जो पौधों के पोषण के काम आती है। मिट्टी से पौधों द्वारा ग्रहण की गई नाइट्रोजन जटिल कार्बनिक योगिकों में परिवर्तित हो जाती है। मिट्टी में विद्यमान विशेष प्रकार के बैक्टीरिया प्राणियों के त्यक्त पदार्थों, सूखे पौधों तथा मृत प्राणियों को सड़ाकर अमोनिया तथा अमोनिया लवण में परिवर्तित कर देते हैं जिसे अन्य प्रकार के बैक्टीरिया नाइट्रेट में बदल देते हैं जिसका संग्रह मिट्टी में होता है। मिट्टी में उपस्थित इस संयुक्त नाइट्रेट को तीसरे प्रकार के (अनाइट्रीकारी) बैक्टीरिया नाइट्रोजन गैस में परिवर्तित कर देते हैं और यह मुक्त होकर पुनः वायुमंडल में वापस पहुंच जाती है। इस प्रकार एक नाइट्रोजन चक्र पूर्ण होता है।
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1990SOLUTION
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भूमध्यरेखीय ज्वार - भूमध्य रेखा पर चन्द्रमा के प्रत्येक माह में लम्बवत होने के कारण ज्वार की असमान्यता न्यूनतम रहती है। अर्थात दीर्ध ज्वार एवं अन्य दिनों के ज्वार में अंतर कम रहता है, इसे ही “भूमध्यरेखीय ज्वार” कहते है।
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1. वृहत अथवा दीर्ध ज्वार
2. लघु ज्वार
3. भूमि- उच्च एवं भूमि-निम्न ज्वार
4. अयनवृतिय तथा भूमध्यरेखीय ज्वार
5. दैनिक ज्वार-भाटा
6. अर्ध-दैनिक ज्वार–भाटा
7. मिश्रित ज्वार भाटा
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v. सागरों में धाराओं का प्रवाह प्राय: गोलाकार देखा जाता है। धाराओं की यह प्रकृति पृथ्वी के परिभ्रमण से सम्बन्धित है।
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