A.
तमिलनाडु को प्रभावित करता है।
B.
ओडिशा को प्रभावित करता है।
C.
आंध्र प्रदेश को प्रभावित करता है।
D.
उत्तर प्रदेश को प्रभावित करता है।
मानसून के निवर्तन ऋतु में मौसम उत्तरी भारत में सूखा होता है लेकिन तमिलनाडु में शीत ऋतु में वर्षा होती है। यहाँ अक्टूबर और नवंबर वर्ष के सबसे अधिक वर्षा वाले महीने होते हैं।
A.
यह बहुत गर्म क्षेत्र है।
B.
जल की कमी के कारण हवाएँ शुष्क हो जाती हैं।
C.
इस क्षेत्र तक मानसून नहीं पहुँच पाता है।
D.
अरावली पर्वतमाला की दिशा समान्तर होने के कारण
राज्य में वर्षा की मात्रा दक्षिण-पूर्व व पूर्व से पश्चिम की ओर कम होती जाती है। अरब सागर से आने वाले मानसूनी हवाओं के लिए अरावली पर्वतमाला की दिशा समान्तर होने के कारण यह उन्हें रोक नहीं पाती है। जिससे ये राजस्थान में बहुत कम वर्षा होती हैं|
A.
केरल और तटीय कर्नाटक
B.
अंडमान व निकोबार द्वीप समूह
C.
कोरोमंडल तट
D.
असम और अरुणाचल प्रदेश
कोरोमंडल तट में सर्दियों के मौसम के दौरान वर्षा होती है और गर्मियाँ शुष्क होती हैं।
A.
जबलपुर में पाया जाता है।
B.
श्रीनगर में पाया जाता है।
C.
चेन्नई में पाया जाता है।
D.
जैसलमेंर में पाया जाता है।
जैसलमेर रेगिस्तान प्रदेश में स्थित है जहाँ शुष्कता एवं रेत के कारण तापमान अधिकतम होता है।
A.
अक्षांश
B.
ऊँचाई
C.
समुद्र से दूरी
D.
हिमालय पर्वत
आगरा और दार्जिलिंग एक ही अक्षांश पर स्थित हैं किन्तु जनवरी में आगरा का तापमान 16° सेल्सियस जबकि दार्जिलिंग में यह 4° सेल्सियस होता है। ऊँचाई के साथ तापमान घटता है। विरल वायु के कारण पर्वतीय प्रदेश मैदानों की तुलना में अधिक ठंडे होते हैं।
A.
उत्तर-पश्चिम भारत में अनियमित तीव्रता का निम्न दबाव क्षेत्र होता है।
B.
चक्रवात की आवृत्ति में भिन्नता होती है।
C.
पवनों द्वारा लाई जाने वाली नमी सभी ओर समान नहीं होती है।
D.
निम्न दबाव गर्त की धुरी में भिन्नता होती है।
उत्तर भारत के ऊपर कम दबाव मानसूनी हवाओं को आकर्षित करता है, जो भारत में वर्षा लाती हैं।
A.
Amw
B. Bwhw
C. Cwg
D. As
तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर As जलवायु प्रकार पाई जाती है। इस जलवायु प्रदेश में शुष्क ग्रीष्म ऋतु वाला मानसून प्रकार होता है।
A.
विभिन्न जलवायु प्रकार की घटना में सहायक है।
B.
विभिन्न प्रकार की फसलों को उगाने में सहायक है।
C.
विभिन्न प्रकार की आर्थिक गतिविधियों को संपन्न करने में सहायक है।
D.
मृदा की उर्वरता को परिवर्तित करने में सहायक है।
मानसून जलवायु की क्षेत्रीय विभिन्नता विभिन्न प्रकार की फसलों को उगाने में सहायक है।
A.
दक्षिण-पश्चिमी मानसून
B.
शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात
C.
मानसून निवर्तन
D.
स्थानीय वायु परिसंचरण
जाड़े के आरंभ में तमिलनाडु के तटीय प्रदेशों में मानसून निवर्तन के कारण वर्षा होती है।
A.
4
B. 6
C. 8
D. 3
भारत
को 8 जलवायु
प्रदेशों
में विभाजित
किया जा सकता
है।
Amw- लघु
शुष्क वाला
मानसून
As – शुष्क
ग्रीष्म ऋतु
वाला मानसून
Aw – उष्ण
कटिबंधीय
सवाना
Bwhw – अर्ध
शुष्क
स्टेपी
जलवायु
Bwhw – गर्म
मरुस्थल
Cwg – शुष्क
शीत ऋतु वाला
मानसून
प्रकार
Dfc – लघु
ग्रीष्म तथा
ठंडी आर्द्र
शीत ऋतु वाला
जलवायु
प्रदेश
E – ध्रुवीय
प्रकार
A.
जलवायु क्षेत्रों के चित्रण के लिए होता है।
B.
वर्षा वितरण के विश्लेषण के लिए होता है।
C.
मानसून की लंबी अवधि के पूर्वानुमान के लिए होता है।
D.
कृषि उत्पादन के पूर्वानुमान के लिए होता है।
सन् 1990-1991 में एल-निनो का प्रचंड रूप देखने को मिला था। इसके कारण देश के अधिकतर भागों में मानसून के आगमन में 5 से 12 दिनों की देरी हो गई थी।
A.
Aw
B.
As
C.
Dfc
D.
Cwg
उत्तर पूर्वी भारत Dfc जलवायु प्रकार के अंतर्गत आता है। यह लघु ग्रीष्म तथा ठंडी आर्द्र शीत ऋतु वाला जलवायु प्रदेश है।
A.
अपर्याप्त वर्षा वाला क्षेत्र है।
B.
उच्च वर्षा वाला क्षेत्र है।
C.
मध्यम वर्षा वाला क्षेत्र है।
D.
कम वर्षा वाला क्षेत्र है।
दक्कन पठार कम वर्षा वाला क्षेत्र है।
A.
12° उ अक्षांश कहलाता है।
B.
10° उ अक्षांश कहलाता है।
C.
अंडमान सागर कहलाता है।
D.
मन्नार की खाड़ी कहलाता है।
दो प्रमुख द्वीपसमूहों से मिलकर बने अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह को 10° उ अक्षांश पृथक करती है, जिसके उत्तर में अंडमान द्वीप समूह और दक्षिण में निकोबार द्वीप समूह स्थित हैं।
A.
2,400 किलोमीटर
है।
B. 2,800 किलोमीटर है।
C. 1,800 किलोमीटर है।
D. 2,600 किलोमीटर है।
हिमालय
पर्वत
तन्त्र
मुख्य रूप से
तीन समानांतर
श्रेणियों-
महान हिमालय, मध्य
हिमालय और
शिवालिक से
मिलकर बना है
जो पश्चिम से
पूर्व की ओर
एक चाप की
आकृति में
लगभग 2400 कि॰मी॰
की लम्बाई
में फैली
हैं।
A.
नेपाल हिमालय कहलाता है।
B.
पंजाब हिमालय कहलाता है।
C.
असम हिमालय कहलाता है।
D.
नागा पहाड़ियाँ कहलाता हैं।
काली एवं तीस्ता नदी के बीच का क्षेत्र नेपाल हिमालय कहलाता है।
A.
सिंधु और सतलुज नदी के बीच पाया जाता है।
B.
काली और तीस्ता नदी के बीच पाया जाता है।
C.
तीस्ता और ब्रह्मपुत्र नदी के बीच पाया जाता है।
D.
सतलुज और काली नदी के बीच पाया जाता है।
कुमाऊँ हिमालय, सतलुज और काली नदी के बीच पाया जाता है। इस क्षेत्र के कुछ भाग 7,000 मीटर ऊँचे हैं। बद्रीनाथ, नंदा देवी आदि इस क्षेत्र में स्थित हैं।
A.
नीलगिरी की पहाड़ियों पर स्थित है।
B.
अन्नामलाई की पहाड़ियों पर स्थित है।
C.
इलायची की पहाड़ियों पर स्थित है।
D.
नल्लामलाई की पहाड़ियों पर स्थित है।
डोडाबेट्टा नीलगिरी की पहाड़ियों पर 2,637 मीटर ऊँचाई पर उच्चतम शिखर है।
A.
हमलों की रोकथाम है।
B.
लकड़ी का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
C.
मानसूनी पवनों को रोककर वर्षा का कारण होता है।
D.
उत्तर की गर्म हवाओं से भारत की रक्षा करता है।
हिमालय मानसूनी पवनों को रोककर देश में वर्षा का कारण होता है।
A.
हिमालय से निकलती है।
B.
अरावली से निकलती है।
C.
सतपुड़ा से निकलती है।
D.
नीलगिरी से निकलती है।
बनास, चंबल की एकमात्र मुख्य सहायक नदी है, जो पश्चिम में अरावली से निकलती है।
A.
अरावली पहाड़ियों से उत्तर-पश्चिम में स्थित है।
B.
अरावली पहाड़ियों से पूर्व में स्थित है।
C.
अरावली पहाड़ियों से पश्चिम में स्थित है।
D.
अरावली पहाड़ियों से उत्तर-पूर्व में स्थित है।
विशाल भारतीय मरुस्थल अरावली पहाड़ियों से उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह एक ऊबड़-खाबड़ भूतल है जिस पर बहुत से अनुदैर्ध्य रेतीले टीले और बरखान पाए जाते हैं।
A.
अनामुडी शिखर पर आपस में मिलते हैं।
B.
नीलगिरी पहाड़ियों में आपस में मिलते हैं।
C.
सहयाद्रि पर आपस में मिलते हैं।
D.
इलायची पहाड़ियों में आपस में मिलते हैं।
ज़्यादातर प्रायद्वीपीय नदियों की उत्पत्ति पश्चिमी घाट से है। पूर्वी घाट अविरत नहीं है और महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा अपरदित हैं। पूर्वी और पश्चिमी घाट नीलगिरी पहाड़ियों में आपस में मिलते हैं।
A.
हिमनद द्वारा अपरदित है।
B.
अवसादी शैलों से निर्मित है।
C.
अस्थिर भूभागों में से एक है।
D.
स्थिर भूभागों में से एक है।
प्रायद्वीपीय भारत अनेक पठारों जैसे- हजारीबाग पठार, पालायु पठार, रांची पठार, मालवा पठार, कोयेम्बटूर पठार और कर्नाटक पठार से मिलकर बना है। यह भारत के सबसे प्राचीन और स्थिर भूभागों में से एक है।
A.
नेपाल हिमालय कहा जाता है।
B.
पंजाब हिमालय कहा जाता है।
C.
असम हिमालय कहा जाता है।
D.
कश्मीर हिमालय कहा जाता है।
हिमालय को पश्चिम से पूर्व क्षेत्रों के आधार पर विभाजित किया गया है। इन खण्डों को नदी घाटियों से सीमांकित किया गया है। सिंधु एवं सतलुज के बीच के हिमालय के क्षेत्र को पारंपरिक रूप से पंजाब हिमालय कहा जाता है किन्तु क्षेत्रीय रूप से इसे पश्चिम से पूर्व तक क्रमशः कश्मीर एवं हिमाचल हिमालय के रूप में जाना जाता है। सतलुज एवं काली नदियों के बीच का हिमालय का भाग कुमाऊँ हिमालय के रूप में जाना जाता है। काली एवं तीस्ता नदियाँ नेपाल हिमालय की विभाजक रेखा है और तीस्ता एवं दिहांग नदियों के बीच के हिमालय क्षेत्र को असम हिमालय के रूप में जाना जाता है।
A.
भूगोल के रूप में जाना जाता है।
B.
आकृति विज्ञान के रूप में जाना जाता है।
C.
भू-आकृति विज्ञान के रूप में जाना जाता है।
D.
एंथ्रोपोलॉजी के रूप में जाना जाता है।
किसी स्थान की आकृति, उसकी संरचना, प्रक्रिया और विकास की अवस्था का परिणाम है। भूआकृति पठार, मैदान और पहाड़ की तरह भूमि की सतह की विशेषताओं के विकास का अध्ययन है।
A.
कश्मीर घाटी का विस्तार है।
B.
लद्दाख के ठंडे मरुस्थल का विस्तार है।
C.
शिवालिक का विस्तार है।
D.
पंजाब मैदानों का विस्तार है।
हिमाचल का सूदूर उत्तरी भाग लद्दाख के ठंडे मरुस्थल का विस्तार है। यह ठंडा मरुस्थल लाहौल एवं स्पिति उपमंडल में स्थित है।
A.
मैदानों का व्यापक विस्तार है।
B.
मरुस्थलों का व्यापक विस्तार है।
C.
डेल्टा क्षेत्र का व्यापक विस्तार है।
D.
पर्वत श्रेणियों का व्यापक विस्तार है।
भारत के उत्तर में एक बड़े क्षेत्र में ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति है। इसमें हिमालय पर्वत श्रृंखलाएँ हैं, जिसमें अनेकों चोटियाँ, सुंदर घाटियाँ व महाखड्ड हैं।
A.
पलायस कहलाते हैं।
B.
बरखान कहलाते हैं।
C.
कुंड कहलाते हैं।
D.
मरुद्यान कहलाते हैं।
जिन टिब्बों का निर्माण एक ही दिशा से बहने वाली हवाओं के द्वारा होता है इन्हें बरखान टिब्बा कहा जाता है। बरखान अर्ध चंद्राकर आकृति है, जिसका विकास प्रतिरोध के कारण होता है।
विशाल हिमालय हिमालय पर्वत श्रृंखला का हिस्सा हैं। विशाल हिमालय के दो प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:
1. वे हिमालय के चरम उत्तर में स्थित हैं और ज्यादातर पूरे साल बर्फ के साथ ढका रहता है।
2. उच्चतम चोटियाँ पूर्व - माउंट एवरेस्ट, कंचनजंगा विशाल हिमालय में स्थित हैं।
हिमालय भारत के उत्तर में स्थित हैं। इस तरह यहाँ तीन समानांतर पर्वतमालाऍ स्थित हैं:
1. विशाल हिमालय।
2. मध्य हिमालय।
वे है: (i) पीर पंजाल (कश्मीर) (ii) धौला धार (जम्मू एवं कश्मीर, और हिमाचल प्रदेश) (iii) महाभारत (नेपाल)
वे है: (i) डलहौजी, (ii) धर्मशाला, (iii) शिमला, (IV) मसूरी (V) नैनीताल और (vi) दार्जिलिंग
पूर्वांचल, भारत के चरम पूर्व में म्यांमार के नजदीक स्थित है। पूर्वांचल की हिल्स पटकाई नितंब, नगा हिल्स, मिजो हिल्स, जयंतिया हिल्स, खासी और गारो हिल्स हैं। इन सभी की ऊंचाई मध्यम हैं।
पश्चिमी घाट को महाराष्ट्र और कर्नाटक में सहयाद्रि और तमिलनाडु में नीलगिरी कहा जाता है।
वे बाढ़ के मैदान जो नए जलोढ़क है उन्हें उत्तर प्रदेश में खादर कहा जाता है और पंजाब में बेट कहा जाता है। मिट्टी इत्यादि की एक नई परत लगभग हर साल नदी में आई बाढ़ से जमा हो जाती है। खादर अक्सर उपजाऊ मिट्टी और गहन कृषि की विशेषता है।
यह पुरानी जलोढ़ और मैदानों के स्तर से ऊपर मिट्टी की परतो बना है। यह अक्सर कैल्शियम युक्त अश्मरी से व्याप्त होता है कंकर के रूप में जाने जाते है।
लघु हिमालय के मुख्य आकर्षण केंद्र धर्मशाला, मसूरी, कसौली, अल्मोड़ा, रानीखेत और लैंसडाउन हैं। इस क्षेत्र के दो महत्वपूर्ण स्थलाकृतियाँ शिवालिक और दून हैं।
प्रायद्वीपीय खंड कच्छ से आरम्भ होकर अरावली पहाड़ियों के पश्चिम से गुजरती हुई दिल्ली तक और फिर यमुना व गंगा नदी के समानांतर राजमहल की पहाड़ियों व गंगा डेल्टा तक जाती है।
करेवा भूआकृति कश्मीर हिमालय में पाई जाती है। कश्मीर हिमालय में अनेक दर्रे जैसे - करेवा, हिमनद, चिकनी मिट्टी और दूसरे पदार्थों का हिमोढ़ पर मोटी परत के रूप में जमाव है।
दोआब दो नदियों के बीच में गठित बाढ़ के मैदान है। दोआब दो नदियों को अलग करती है लेकिन पूरे क्षेत्र पर समान विशेषता को बनाए रखता है। पंजाब में चार दोआब पंजाब मैदान की एक भौतिक इकाई की बनाए रखें हुए है।
1. बिष्ट जालंधर दोआब: सतलुज और ब्यास के बीच।
2. बारी दोआब: रवि और चिनाब के बीच।
3. छाज दोआब: चिनाब और झेलम के बीच।
4. सिंध सागर दोआब: चिनाब और सिंधु नदी के बीच।

प्रायद्वीपीय पठार तिकोने आकार वाला कटा-फटा भूखंड है, जिसकी ऊँचाई 600 से 900 मीटर है। उत्तर पश्चिम में अरावली विस्तार, पूर्व में राजमहल पहाड़ियाँ, पश्चिम में गिर पहाड़ियाँ और दक्षिण में कार्डामम पहाड़ियाँ, प्रायद्वीपीय पठार की सीमाएँ निर्धारित करती हैं। उत्तर-पूर्व में शिलांग तथा कार्बी-एंगलोंग पठार भी इसी भूखंड का विस्तार है। प्रायद्वीपीय भारत अनेक पठारों जैसे - हजारीबाग पठार, पालायु पठार, रांची पठार, मालवा पठार, कोयंबटूर पठार और कर्नाटक पठार से मिलकर बना है। यह भारत के प्राचीनतम और स्थिर भू-भागों में से एक है। प्रायद्वीपीय पठार पर धरातलीय विविधताएँ पायी जाती हैं।
उच्चावच लक्षणों के आधार पर प्रायद्वीपीय पठार को तीन भागों में बांटा जा सकता है।
(i) दक्कन का पठार;
(ii) मध्य उच्च भाग;
(iii) उत्तरी-पूर्वी पठार
भूआकृतियों के आधार पर हिमालय को निम्नलिखित उपखंडों में विभाजित किया जा सकता है -
(i) कश्मीर या उत्तरी-पश्चिमी हिमालय;
(ii) हिमालय और उत्तराँचल हिमालय;
(iii) दार्जिलिंग और सिक्किम हिमालय;
(iv) अरुणाचल हिमालय;
(v) पूर्वी पहाड़ियाँ और पर्वत
भू वैज्ञानिक संरचना व शैल समूह की भिन्नता के आधार पर भारत को तीन भूवैज्ञानिक खंडो में विभाजित किया गया है जो भौतिक लक्षणों पर आधारित हैं -
(क) प्रायद्वीपीय खंड
(ख) हिमालय और अन्य प्रायद्वीपीय पर्वत मालाएँ
(ग) सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान
पश्चिमी हिमालय: जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश
मध्य हिमालय: उत्तरांचल
पूर्वी हिमालय:पश्चिम बंगाल, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश
उत्तरी मैदानों में पायी जाने वाली प्रमुख भू-आकृतियाँ हैं:
(1) खादर: वे तलछट और जलोढ़ मिट्टी का जमाव हैं। वे नदी के किनारे पाए जाते हैं।
(2) बांगड़: वे अवसादों के पुराने जमाव हैं और नदी के किनारे से दूर पाए जाते हैं। इसमें कंकर जमा होते हैं।
(3) भाबर: वे पत्थर की सतह नदी तल की ढलान के समानांतर हैं। नदियाँ या झरने गायब हो जाते है।
(4) तराई: यह दलदलीय और घने वन क्षेत्र है। यह एक क्षेत्र है जहां नदी बहुत धीरे धीरे बहती है।
विशाल हिमालय: विशाल हिमालय की लंबाई 2,500 किलोमीटर है। विशाल हिमालय की चौड़ाई 150 किमी से 400 किमी है।
मध्य हिमालय: मध्य हिमालय की लंबाई 3000 किमी है और 150 किमी चौड़ाई है।
बाहरी हिमालय: बाहरी हिमालय की लंबाई 2,500 किमी दूर है और इसकी चौड़ाई 10-50 किमी दूर है।
इस प्रकार के रूप पूर्वी घाट के मुख्य विशेषताएं हैं:
1. ये प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी हिस्से में स्थित हैं।
2. नदी द्वारा क्षय और कटाव के कारण ये टूटी हुई और कटी हुई होती हैं।
3. कुछ महत्वपूर्ण पहाड़ियाँ जवाड़ी पहाड़ियाँ, पलकोंडा श्रृंखला, नल्लामला पहाड़ियाँ, महेन्द्रगिरि पहाड़ियाँ आदि है।
सेंट्रल हाइलैंड्स की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:
1. यह प्रायद्वीपीय पठार का एक प्रभाग है। इसमें मालवा के पठार, बुंदेलखंड, बघेलखण्ड और छोटानागपुर पठार शामिल हैं।
2. अरावली इसके उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व में राजमहल की पहाड़ियाँ और दक्षिण में विंध्य हैं।
3. यह कठोर आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों से बना हुआ है।
यह भाभर के दक्षिण में स्थित है और यह इसके समानांतर बहती है। यह भाबर क्षेत्र के भूमिगत धाराओं से उभार द्वारा चिह्नित है। यहाँ जमा मिट्टी बेहतर है जो भाभर में जमा है। यह अत्यधिक नमी का क्षेत्र है। भूमिगत धाराओं के उद्भव की वजह से बड़े हिस्सों दलदली क्षेत्र हैं।
उत्तरी मैदान मूल रूप से गहरे अवसाद या 'कुंड' थे जो पर्वतीय क्षेत्र और प्रायद्वीपो के बीच स्थित है। प्रख्यात भूविज्ञानी एडवर्ड सुइस ने इसे एक 'फोर-गहरे' हिमालय पर पृथ्वी की लहरे कहा, एक प्रायद्वीप के उत्तरी भाग पर झोलदार जैसे इसे पहाड़ तरंगों के द्वारा दक्षिण की ओर से घेर लिया गया हो। हिमालय से आ रही नदियाँ गहराई में तलछट करती है इस प्रकार विशाल मैदानों का गठन होता है। इसके विपरीत कर्नल बुर्रार्ड ने इसे विशाल गहरी 'दरार' या पृथ्वी के उप-पपड़ी में 'अंश' के रूप में माना है जहाँ खोखली जगह में मलबा जमा हो जाता है। इस प्रकार, बुर्रार्ड ने उत्तरी मैदानों को एक दरार घाटी के रूप में माना लेकिन भारतीय गंगा अवसाद के अपने विचार को भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है। अधिकांश भूवैज्ञानिकों ने इसका सुइस के दृष्टिकोण का समर्थन भी किया।
भारत में दो प्रमुख द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर हैं। बंगाल की खाड़ी के द्वीप समूह में लगभग 572 द्वीप हैं। ये द्वीप 6 डिग्री उत्तर से 14 डिग्री उत्तर और 92 डिग्री पूर्व से 94 डिग्री पूर्व के बीच स्थित हैं। रीची द्वीप समूह और लंब्रीन्थ द्वीप यहाँ के दो प्रमुख द्वीप समूह हैं। बंगाल की खाड़ी के द्वीपों को दो श्रेणियों उत्तर में अंडमान और दक्षिण में निकोबार में विभाजित किया जा सकता है। ये द्वीप समुद्र में जलमग्न पर्वतों के हिस्सा हैं। बैरन आइलैंड नामक भारत का एकमात्र जीवंत ज्वालामुखी भी निकोबार द्वीप समूह में स्थित है। यह द्वीप असंगठित कंकड़, पत्थरों और गोलाश्मों से बना हुआ है।
कठोर एवं स्थिर प्रायद्वीपीय खंड के विपरीत हिमालय पर्वतमालाओं की भूवैज्ञानिक संरचना तरूण, दुर्बल और लचीली है। ये पर्वत वर्तमान समय में भी बहिर्जनिक तथा अंतर्जनित बलों की अभिक्रियाओं से प्रभावित हैं। इसके परिणामस्वरूप इनमें वलन, भ्रंश और क्षेप बनते हैं। इन पर्वतों की उत्पत्ति विवर्तनिक हलचलों से जुडी हैं। तेज बहाव वाली नदियों से अपरदित ये पर्वत अभी भी युवावस्था में हैं। गॉर्ज, V-आकार घाटियाँ, क्षिप्रिकाएँ व जल-प्रपात इत्यादि इसका प्रमाण हैं।
एक जैव विविधता वाला हॉटस्पॉट ऐसा जैविक भौगोलिक क्षेत्र है जिसे मनुष्यों से खतरा रहता है। विश्व भर में ऐसे 25 आकर्षण के केन्द्र हैं इन केन्द्रों में विश्व के 60 प्रतिशत पौधों, पक्षियों, स्तनपाई प्राणियों, सरीसृपों और उभयचर प्रजातियों का संरक्षण किया जाता है। प्रत्येक आकर्षण का केन्द्र आज खतरे के दौर से गुजर रहा है। और अपने 70 प्रतिशत मूल प्राकृतिक वनस्पति को खो चुका है।
जैव विविधता दो शब्दों के मेल से बना है, ‘बायो’ का अर्थ है- जीव तथा डाइवर्सिटी का अर्थ है- विविधता। साधारण शब्दों में किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों की संख्या और उनकी विविधता को जैव-विविधता कहते हैं। इसका संबंध पौधों के प्रकार, प्राणियों तथा सूक्ष्म जीवाणुओं से है। उनकी आनुवंशिकी और उनके द्वारा निर्मित पारितंत्र से है। यह पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवधारियों की परिवर्तनशीलता, एक ही प्रजाति तथा विभिन्न प्रजातियों में परिवर्तनशीलता तथा विभिन्न पारितंत्रों में विविधता से संबंधित है। जैव-विविधता सजीव संपदा है।
यह विकास के लाखों वर्षों के इतिहास का परिणाम है। जैव-विविधता को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है-
· आनुवांशिक जैव-विविधता
· प्रजातीय जैव-विविधता
· परितंत्रीय जैव-विविधता
सभी मनुष्यों के लिए दैनिक जीवन में जैव-विविधता एक महत्वपूर्ण संसाधन है। जैव-विविधता का एक महत्वपूर्ण भाग ‘फसलों की विविधता’है, जिसे कृषि जैव-विविधता भी कहा जाता है। जैव-विविधता को संसाधनों के उन भंडारों के रूप में भी समझा जा सकता है, जिनकी उपयोगिता भोज्य पदार्थ, औषधियाँ और सौंदर्य प्रसाधन आदि बनाने में है। जैव संसाधनों की ये परिकल्पना जैव-विविधता के विनाश के लिए भी उत्तरदायी है। साथ ही यह संसाधनों के विभाजन और बँटवारे को लेकर उत्पन्न नये विवादों का भी जनक है। खाद्य फसलें, पशु, वन संसाधन, मत्स्य और दवा संसाधन आदि कुछ ऐसे प्रमुख आर्थिक महत्त्व के उत्पाद हैं, जो मानव को जैव-विविधता के फलस्वरूप उपलब्ध होते हैं।
जीवन का हर रूप एक दूसरे पर इतना निर्भर है कि किसी एक प्रजाति पर संकट आने से दूसरों में असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है। यदि पौधों और प्राणियों की प्रजातियाँ संकटापन्न होती हैं, तो इससे पर्यावरण में गिरावट उत्पन्न होती है और अन्ततोगत्वा मनुष्य का अपना अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है।|
आनुवांशिक जैव-विविधता: जीवन निर्माण के लिए जीन एक मूलभूत इकाई है। किसी प्रजाति में जीन की विविधता ही आनुवंशिक जैव-विविधता है। समान भौतिक लक्षणों वाले जीवों के समूह को प्रजाति कहते हैं। मानव आनुवांशिक रूप से ‘होमोसेपियन’प्रजाति से संबंधित है, जिसमें कद, रंग और अलग दिखावट जैसे शारीरिक लक्षणों में काफी भिन्नता है।
प्रजातीय विविधता: यह जैव-विविधता, रूपात्मक, शारीरिक और आनुवंशिक सुविधाओं से परिलक्षित होता है। प्रजातियों की विविधता अपनी समृद्धि, बहुतायत और उनके प्रकार के माध्यम से मापा जा सकता है। कुछ क्षेत्रों में प्रजातियों की संख्या अधिक होती है और कुछ में कम।
|
राष्ट्रीय उद्यान |
अभयारण्य |
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वनस्पतियों और जीव दोनों के संरक्षण के लिए किया जाता है। |
केवल जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए किया जाता है। |
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वन उत्पाद को इकठ्ठा नहीं किया जाता हैं। |
वन उत्पाद को इकठ्ठा किया जा सकता है। |
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निजी स्वामित्व की अनुमति नहीं है। |
निजी स्वामित्व की अनुमति है। |
|
क्षेत्र का सीमांकन किया जाता है। |
क्षेत्र की सीमांकन नहीं किया जाता है। |
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भूमि पर खेती की अनुमति नहीं दी जाती । |
भूमि पर खेती की अनुमति दी जाती है। |
|
जानवरों की चराई की अनुमति नहीं है। |
चराई की अनुमति दी जाती है। |
जैव विविधता के संरक्षण प्रजातियों की रक्षा करना और दुर्लभ प्रजातियों को विलुप्त होने से रोकने को संदर्भित करता है। संरक्षण नीति के लक्ष्य यह सुनिश्चित करता है कि विकास को कायम रखना चाहिए, जिससे प्राकृतिक बलों को नए प्रजाति की उद्भव और उसे बनाए रखने की सहायता मिल सके| मानव को पर्यावरण-मैत्री संबंधी पद्धतियों के प्रति जागरूक किया जाए और विकास की ऐसी व्यावहारिक गतिविधियाँ अपनाई जाएँ, जो दूसरे जीवों के साथ समन्वित हों और सतत् पोषणीय हों।
प्राकृतिक संसाधनों व पर्यावरण संरक्षण की अंतर्राष्ट्रीय
संस्था (आई यू सी एन) ने संकटापन्न पौधों व जीवों की प्रजातियों को संरक्षण के उद्देश्य से तीन वर्गों में विभाजित किया है। वे है :
संकटापन्न प्रजातियाँ: इसमें वे सभी प्रजातियाँ सम्मिलित हैं, जिनवेफ लुप्त हो जाने का खतरा है। इंटरनेशनल यूनियन फाँर द कोंशरवेशन आँफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेश, विश्व की सभी संकटापन्न प्रजातियों के बारे में रेड लिस्ट के नाम से सूचना प्रकाशित करता है। उदाहरण: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, भारतीय राइनो और आर्किड पौधे आदि
सुभेद्य प्रजातियाँ: इसमें वे प्रजातियाँ सम्मिलित हैं, जिन्हें यदि संरक्षित नहीं किया गया या उनके विलुप्त होने में सहयोगी कारक यदि जारी रहे तो निकट भविष्य में उनके विलुप्त होने का खतरा है। इनकी संख्या अत्यधिक कम होने के कारण, इनका जीवित रहना सुनिश्चित नहीं है। उदाहरण: एशियाई हाथी और लैब्राडोर बतख
दुर्लभ प्रजातियाँ: संसार में इन प्रजातियों की संख्या बहुत कम है। ये प्रजातियाँ कुछ ही स्थानों पर सीमित हैं या बड़े क्षेत्र में विरल रूप में बिखरी हुई हैं। उदाहरण: सीटी मकड़ी और कुवाच्किंग मेंढक
जैव-विविधता में प्रत्येक जीव पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है| जिसके कारण है:
i. ऊर्जा की अभिग्रहण तथा संरक्षण
ii. जैविक सामग्री का उत्पादन और विघटन
iii. पारितंत्र में जल व पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखने में सहायक होती है।
iv. वायुमंडलीय गैस को स्थिर करती हैं और जलवायु को नियंत्रित करने में सहायक होती हैं।
v. विविध पारितंत्र में प्रजातियों का जीवित रहने का एक बेहतर संभावना होती है।
vi. अधिक आनुवंशिक विविधता वाली प्रजातियों की तरह अधिक जैव-विविधता वाले पारितंत्र में पर्यावरण के बदलावों को सहन करने की अधिक सक्षमता होती है।

प्राकृतिक आपदाएँ- जैसे- भूवंफप, बाढ़, ज्वालामुखी उद्गार, दावानल, सूखा आदि पृथ्वी पर पाई जाने वाली प्राणिजात और वनस्पति जात को क्षति पहुँचाते हैं और परिणामस्वरूप संबंधित प्रभावित प्रदेशों की जैव-विविधता में बदलाव आता है। कीटनाशक और अन्य प्रदूषक, जैसे- हाइड्रोकार्बन और विषैली भारी धातु संवेदनशील और कमशोर प्रजातियों को नष्ट कर देते हैं। वे प्रजातियाँ, जो स्थानीय आवास की मूल जैव प्रजाति नहीं हैं, लेकिन उस तंत्र में स्थापित की गई हैं, उन्हें ‘विदेशज प्रजातियाँ’ कहा जाता है। ऐसे बहुत सी विदेशज प्रजातियों पारितंत्र में प्राकृतिक या मूल जैव समुदाय को व्यापक नुकसान किये जा रहे हैं ।
पिछले
50 सालों से, दुनिया
की भूमि क्षेत्र
के 50-90 प्रतिशत क्षेत्र
मानव गतिविधियों
से काफी प्रभावित
हुआ है, जिसकी सबसे
अधिक परिणाम, पर्यावरण
से संबंधी समस्याओं
मुख्यतः जैव विविधता
से संबंधित समस्याओं
में पर्याप्त
वृद्धि में पाए
जाते हैं |

जैव विविधता
पर मानव का प्रभाव
निम्नलिखित क्षेत्र
में पाया जा सकता
है:
कृषि:
कृषि परिदृश्य
पर मानवजाति के
व्यापकता की वजह
से जैव विविधता
पर एक महत्वपूर्ण
प्रभाव पड़ता
है।
प्रजाति
निवास स्थान के
नुकसान: खेती के कारण
पैतृक निवास स्थान
के नुकसान बहुत
ही प्रकट हो गया
है। इसी के कारण
ही, हमने छोटी घास
प्रेयरी की 85% से
अधिक, मिश्रित
घास प्रेयरी के
80% भाग को खो दिया
है ।
शहरीकरण: शहरीकरण
के कारण, आबादी शहरी
क्षेत्रों में
रहने के लिए अधिक
स्थान की जरूरत
है। आबादी
के लिए भूमि की बढ़ती
जरूरत
ही दुनिया
में जैव विविधता
को तेजी से कम करने के लिए एक प्रमुख
कारक
कहा जाता है।
विनिर्माण: निर्माण
उद्योगों जैव
विविधता के नुकसान
में एक महत्वपूर्ण
भूमिका निभा रहे
हैं। यह सभी उद्योगों
मुख्यतः कच्चे
माल पर आधारित
उद्योगों, प्राकृतिक
संसाधनों पर पूरी
तरहा से निर्भरशील
होते हैं जिसकी
बजह से जैव विविधता
में ह्रास हो रहा
है।
वैश्वीकरण: वैश्वीकरण
सीधे पर्यावरण
के लिए हानिकारक
नहीं है, परिवहन
के कुछ पहलुओं,
विशेष
रूप से समुद्री
नौवहन यातायात,
प्राकृतिक
प्रणाली पर एक
दबाव रखा है। नए निवासस्थल
में प्रजातियों
के आव्रजन
का सुविधा
प्रदान
तथा जलीय पारिस्थितिकी
प्रणालियों
में प्रदूषण
शुरू
होने
के कारण ही तटीय आवासों
एवं जैव विविधता
में विनष्ट
हो रहे है | वैश्वीकरण
के सबसे बड़ा प्रभाव
पैतृक
निवास
में विदेशी
प्रजाति
की आगमन है।
'जैव विविधता
का हॉट-स्पॉट' जैविक
रूप से उच्च विविधता
और स्थानिक प्रजातियों
का एक बड़ा प्रतिशत
है। उदाहरण के
लिए, दुनिया
के 20 प्रतिशत पौधों
पृथ्वी की सतह
का 5 प्रतिशत अंश
में पाए जाते हैं।
इन सभी क्षेत्रों
में उच्च जैव विविधता
है और इन में से
कई क्षेत्र मानव
गतिविधियों से
आशंकाजनित अवस्था
में है।
विश्व
जैव विविधता के
हॉट-स्पॉट: दुनिया
की प्रमुख जैव
विविधता के हॉट
स्पॉट हैं:
1. उष्णकटिबंधीय
एंडीज (वेनेजुएला,
कोलंबिया, इक्वाडोर, पेरू,
और बोलीविया)
2. पूर्वी
मेडागास्कर
3. फिलीपींस
4. भारत
के पश्चिमी घाट
5. पूर्वी
हिमालय
6. अटलांटिक
वन, ब्राजील

दुनिया भर में जैव विविधता के ह्रास के लिए विभिन्न कारक उत्तरदायी हैं। उन प्रमुख कारकों में से कुछ हैं:
i. जनसँख्या वृद्धि
ii. वनों की कटाई
iii. प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन
iv. प्राकृतिक निवास का विनाश
v. प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप, बाढ़, आदि
vi. पर्यावरण प्रदूषण
vii. पशुओं का शिकार करना
जैव विविधता के ह्रास को रोकने के लिए निम्नलिखित कदम जरुरी है:
i. प्रजातियों के विलुप्त होने को रोकने के लिए उचित योजना और प्रबंधन किया जाना चाहिए।
ii. वनीकरण
iii. पर्यावरण का अत्यधिक शोषण की जाँच तथा नियंत्रण
iv. शिकार पर प्रतिबंधित
v. जंगली जानवरों का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रण
vi. पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति
A.
इलाहाबाद
B.
पटना
C.
भोपाल
D.
झांसी
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित है।
A.
ओडिशा
B.
गुजरात
C.
पश्चिम बंगाल
D.
राजस्थान
कर्क रेखा गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम से होकर गुजरती है। यह ओडिशा से होकर नहीं गुजरती है।
A.
पश्चिम बंगाल
B.
मध्य प्रदेश
C.
उत्तर प्रदेश
D.
कर्नाटक
मध्य प्रदेश की सीमाऐं पांच राज्यों की सीमाओं से मिलती है। इसके उत्तर में उत्तर प्रदेश, पूर्व में छत्तीसगढ़, दक्षिण में महाराष्ट्र, पश्चिम में गुजरात, तथा उत्तर-पश्चिम में राजस्थान है।
A.
गुजरात, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और पंजाब हैं।
B.
गुजरात, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और राजस्थान हैं।
C.
गुजरात, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान हैं।
D.
गुजरात, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र हैं।
भारतीय राज्य गुजरात, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान की सीमाएँ पाकिस्तान के साथ लगती हैं।
A.
केरल
B.
गुजरात
C.
कर्नाटक
D.
आंध्र प्रदेश
कर्क रेखा राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिमी बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम से होकर गुजरती है।


|
अंतर का आधार |
उत्तरी मैदान |
प्रायद्वीपीय पठार |
|
1. स्थान |
यह हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार के बीच स्थित हैं। उत्तरी मैदान घनी आबादी वाले हैं। |
भारत के दक्षिणी भाग में पुराने पठार हैं। इन्हे प्रायद्वीपीय पठार कहा जाता है। इनकी आबादी कम है। |
|
2. संभाग |
ये निम्नलिखित क्षेत्रों में विभाजित हैं: 1. सिंधु घाटी 2. गंगा घाटी 3. ब्रह्मपुत्र घाटी |
पठार निम्नलिखित क्षेत्रों में बांटा गया है: 1. केन्द्रीय हाईलैंड 2. दक्कन के पठार। |
|
3. संभाग के स्थान |
भारत-गंगा के मैदान पाकिस्तान में पश्चिम से बांग्लादेश की ओर और पूर्व में असम तक फैले है |
यह पश्चिम में राजस्थान और दक्षिण में कन्याकुमारी तक पूर्व में राजमहल की पहाड़ियों तक फैला है। |
|
4. उच्चावच |
यह समुद्र के स्तर से ऊपर 200 मीटर तक की उंचाई के मैदान हैं। |
प्रायद्वीपीय पठार पठारी भूमि के साथ एक व्यापक और उथली घाटियों और गोल पहाड़ियों के पठार है। |
|
5. जलवायु |
यहाँ गर्मियाँ गर्म होती हैं और सर्दियाँ ठंडी होती हैं। |
जलवायु यहाँ गर्म और आर्द्र है। |
|
6. फसलें |
मुख्य रूप से चावल, गन्ना, कपास और गेहूं की फसले उत्पादित की जाती हैं। |
मूंगफली और मसाले जैसे बाजरा, मक्का, तिलहन जैसे मोटे अनाज उगाए जाते हैं। |
|
7. मिट्टी |
जलोढ़ मिट्टी यहां पायी जाती हैं। |
मिट्टी लावा से बनी होती है अर्थात काली मिट्टी यहां पायी जाती हैं। |
|
8. खनिज |
लोहा, कोयला, अभ्रक आदि खनिज पाए जाते हैं। |
सोने और मैंगनीज यहां पाया जाने वाला मुख्य खनिज हैं। |
|
9. नदियाँ और सिंचाई |
सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियां। नहरे, कुऍ, ट्यूबवेल सिंचाई के मुख्य स्रोत हैं। |
कृष्णा, कावेरी, तापी, नर्मदा, महानदी, गोदावरी, चंबल, बेतवा, सिंध, केन नदियों का यहाँ प्रवाह है। टैंक सिंचाई का मुख्य स्रोत हैं। |
|
10. परिवहन |
परिवहन के साधन अच्छी तरह से विकसित हैं। |
परिवहन के साधन कम विकसित हैं। |
उत्तर का विशाल मैदान स्थिति एवं विस्तार:-
भारत में हिमालय के दक्षिण में उत्तर के विशाल मैदान की लंबाई 2,400 किमी व चैड़ाई 240 किमी से 320 किमी है। मैदान का क्षेत्रफल 7.7 लाख वर्ग किमी है।
ख. जलप्रवाह
भारत में हिमालय के दक्षिण में उत्तर का विशाल मैदान फैला हुआ है। तराई के दक्षिण से, दक्षिण के पठार के उत्तर तक और पाकिस्तान की सीमा से गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी के डेल्टा तक इस मैदान का विस्तार है। यह मैदान संसार का सबसे बड़ा मैदान है। इस मेदान की लम्बाई 2,400 किमी तथा चौड़ाई 240 किमी से 320 किमी के बीच है। इस मैदान की ऊँचाई लगभग 200 मीटर है। इसका विस्तार भारत के लगभग 1/4 भाग में है। इस मैदान से सतलज,रावी, व्यास, चिनाब, झेलम, यमुना, गंगा, घाघरा, गोमती, गंडक, कोसी, ब्रह्मपुत्र आदि नदियाँ प्रवाहित होती हैं। इस मैदान का क्षेत्रफल 7.7 लाख वर्ग किमी है। अध्ययन की सुविधा के लिए इस मैदान को निम्न 5 भागों में बाँटा गया है -
(1) गंगा का ऊपरी मैदान - यह मैदानी क्षेत्र पश्यिम में यमुना से लेकर पूर्व में गंगा-यमुना के संगम स्थल इलाहाबाद तक विस्तृत है। यह दिल्ली से उत्तर प्रदेश राज्य के इलाहाबाद तक फैला है। इन क्षेत्रों में नदियाँ उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं। इसको गंगा-यमुना का दोआब कहते हैं। गंगा का उद्गम गोमुख हिमनद है।
(2) गंगा का मध्यवर्तीय मैदान - यह क्षेत्र इलाहाबाद से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार तक विस्तृत है। इस क्षेत्र के अन्तर्गत घाघरा, गंडक, कोसी व सोन नदियाँ आती हैं। इन क्षेत्रों में औसतन 150 सेमी तक वर्षा होती है। इन क्षेत्रों में कभी-कभी इतनी वर्षा होती है जिससे बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कभी भंयकर सूखा भी पड़ जाता है।
(3) गंगा का निचला मैदान - यह क्षेत्र पश्चिमी बंगाल में स्थित है। इस मैदान का पूर्वी भाग बंगाल तक फैला है। इस मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण को है। इस मैदान के दक्षिण में गंगा विस्तृत डेल्टा का निर्माण करती है जिससे यह मैदान अत्यंत उपजाऊ है।
(4) सतलज का मैदान - यह क्षेत्र सतलज और यमुना नदी के बीच में फैला है। हरियाणा और पंजाब राज्य इसी मैदान के अन्दर आते हैं। इस क्षेत्र के उत्तरी भाग की मिट्टी अत्यंत उपजाऊ है इस मैदान का दक्षिणी क्षेत्र रेतीला व कम उपजाऊ है।
(5) ब्रह्मपुत्र का मैदान - इस क्षेत्र का विस्तार असम राज्य में है। उत्तर व दक्षिणी भाग पहाड़ी भागों से घिर होने तथा बाढ़ से बनी दलदली भूमि के कारण इस क्षेत्र के थोड़े से ही भाग पर खेती होती है। यहाँ पर वर्षा की मात्रा 200 सेमी है। इस मैदान का आर्थिक विकास कम हुआ है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ जनसंख्या अत्यंत कम है। बंगाल में ब्रह्मपुत्र नदी डेल्टा बनाती है।
ग. व्यवसाय:- गंगा के निचले मैदानो में चावल व जूट की खेती बड़े पैमाने पर होती है। सतलज के मैदानो में गेहूँ की खेती होती है। ब्रह्मपुत्र के निचले मैदानो में चावल, चाय और जूट की खेती होती है।
A.
मानसरोवर झील के निकट से निकलती है।
B.
पिंडारी ग्लेशियर से निकलती है।
C.
गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है।
D.
यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलती है।
विश्व की सबसे बड़ी नदियों में से एक ब्रह्मपुत्र कैलाश पर्वत श्रेणी में मानसरोवर झील के निकट चेमायुँगडुंग हिमनद से निकलती है।
A.
पद्मा के नाम से जानी जाती है।
B.
मेघना के नाम से जानी जाती है।
C.
हुगली के नाम से जानी जाती है।
D.
स्वर्ण गंगा के नाम से जानी जाती है।
बांग्लादेश में गंगा नदी को पद्मा नदी के नाम से जाना जाता है।
A.
गोमती है।
B.
दामोदर है।
C.
पेनगंगा है।
D.
व्यास है।
गंगा की सहायक नदी गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी और महानंदा हैं।
A.
चम्बल
B.
कृष्णा
C.
गोदावरी
D.
नर्मदा
नर्मदा अमरकंटक के निकट निकलती है। यह भारतीय प्रायद्वीप को उत्तर भारत से विभाजित करती है।
A.
गंडक
B.
कोसी
C.
सोन
D.
दामोदर
दामोदर नदी छोटानागपुर पठार के पूर्वी किनारे पर बहती है और भ्रंश घाटी से होती हुई हुगली नदी में गिरती है। पहले इसे बंगाल का शोक कहा जाता था किन्तु अब इस नदी को दामोदर घाटी कार्पोरेशन नामक एक बहुद्देशीय परियोजना ने नियंत्रित कर लिया है।
A.
जालीनुमा अपवाह प्रतिरूप होता है।
B.
अरीय अपवाह प्रतिरूप होता है।
C.
अभिकेंद्री अपवाह प्रतिरूप होता है।
D.
वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप होता है।
जब सभी दिशाओं से नदियाँ बहकर किसी झील या गर्त में विसर्जित होती हैं, तो ऐसे अपवाह प्रतिरूप को अभिकेंद्री प्रतिरूप कहते हैं।
A.
गंगा की सहायक नदियाँ हैं।
B.
सिंधु की सहायक नदियाँ हैं।
C.
यमुना की सहायक नदियाँ हैं।
D.
ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियाँ हैं।
सिंधु नदी की बहुत-सी सहायक नदियाँ जैसे - शयोक, गिलगित, जास्कर, हुंजा, नुबरा, शिगार, गास्टिंग व द्रास हिमालय पर्वत से निकलती हैं। दाहिने तट पर मिलने वाली अन्य मुख्य सहायक नदियाँ खुर्रम, तोची, गोमल, विबोआ और संगर हैं।
A.
हिमालयी क्षेत्र की नदियाँ हैं।
B.
मैदानी क्षेत्र में निकलने वाली नदियाँ हैं।
C.
पूर्व दिशा में बहने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ हैं।
D.
अरब सागर में गिरने वाली छोटी नदियाँ हैं।
न्यूनतम अपरदानात्मक क्रिया करने वाली नदियाँ पूर्व दिशा में बहने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ हैं क्योंकि इनका ढाल तीव्र नहीं होता है।
A.
गंगा और लूनी हैं।
B.
कोसी और सोन हैं।
C.
ब्यास और तापी हैं।
D.
सिंधु और ब्रह्मपुत्र हैं।
सिंधु और ब्रह्मपुत्र दोनों नदियाँ कैलाश पर्वत श्रेणी में मानसरोवर के निकट से निकलती हैं।
A.
लूनी है।
B.
दामोदर है।
C.
गंडक है।
D.
दक्षिण गंगा है।
भारत का सबसे बड़ा अपवाह तंत्र है, जिसमें उत्तर में हिमालय से निकलने वाली बारहमासी व अनित्यवाही नदियाँ और दक्षिण में प्रायद्वीप से निकलने वाली अनित्यवाही नदियाँ शामिल हैं। सोन इसके दाहिने किनारे पर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदी है। बाँये तट पर मिलने वाली महत्त्वपूर्ण सहायक नदियाँ रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी व महानंदा हैं।
A.
लूनी है।
B.
तापी है।
C.
चम्बल है।
D.
सोन है।
नर्मदा एवं तापी नदी प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख नदी हैं। ये भ्रंश घाटी में होकर बहती हैं और बाकी प्रायद्वीपीय नदियों के विपरीत अरब सागर में एश्चुअरी बनाते हुए गिरती है जबकि प्रायद्वीपीय भारत की ज्यादातर बड़ी नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं और डेल्टा बनाती हैं।
A.
कावेरी है।
B.
कृष्णा है।
C.
नर्मदा है।
D.
गंगा है।
नर्मदा नदी अमरकंटक पठार के पश्चिमी पार्श्व से लगभग 1,057 मीटर की ऊँचाई से निकलती है। यह दक्षिण में सतपुड़ा और उत्तर में विंध्याचल श्रेणियों के बीच होकर बहती है। लगभग 1,312 किलोमीटर दूरी तक बहने के बाद यह भड़ौच के दक्षिण में अरब सागर में मिलती है और 27 किलोमीटर लंबा ज्वारनदमुख बनाती है।
A.
विष्णु प्रयाग है।
B.
कर्ण प्रयाग है।
C.
देव प्रयाग है।
D.
रुद्र प्रयाग है।
यह नदी उत्तराखण्ड राज्य के उत्तरकाशी जिले में गोमुख के निकट गंगोत्री हिमनद से 3,900 मीटर की ऊँचाई से निकलती है। यहाँ यह भागीरथी के नाम से जानी जाती है। देवप्रयाग में भागीरथी, अलकनंदा से मिलती है और इसके बाद यह गंगा नदी कहलाती है।
A.
कोसी है।
B.
झेलम है।
C.
सोन है।
D.
बेतवा है।
सिंधु नदी तंत्र में पाँच सहायक नदियाँ झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज शामिल हैं।
A.
शैलों की कठोर क्रिस्टलीय सतह है।
B.
उच्च ढाल है।
C.
कम वेग है।
D.
घने जंगल है।
उच्च ढाल के कारण नदियों के वेग में वृद्धि होती है; इस प्रकार निक्षेपण की तुलना में अपरदन अधिक होती है। केवल मंद गति से बहने वाली नदियाँ अपने मुहाने पर डेल्टा बनाती हैं।
A.
रावी नदी शामिल है।
B.
यमुना नदी शामिल है।
C.
गंगा नदी शामिल है।
D.
सिंधु नदी शामिल है।
पंचनद नाम पंजाब की पाँच मुख्य नदियों सतलुज, व्यास, रावी, चेनाब और झेलम को दिया गया है।
A.
पूर्वी घाट है।
B.
पश्चिमी घाट है।
C.
हिमालय है।
D.
दक्कन पठार है।
हिमालय भारत की सबसे नवीन भौगोलिक विशेषता वाला पर्वत है। वह अभी भी विकास की प्रक्रिया में है।
A.
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा गुजरात से होकर बहती है।
B.
बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से होकर बहती है।
C.
मध्य प्रदेश, गुजरात एवं राजस्थान से होकर बहती है।
D.
कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से होकर बहती है।
कावेरी नदी द्रोणी का 3 प्रतिशत भाग केरल में 41 प्रतिशत भाग कर्नाटक में और 56 प्रतिशत भाग तमिलनाडु में पड़ता है। इसकी महत्त्वपूर्ण सहायक नदियाँ काबीनी, भवानी और अमरावती हैं।
A.
हरियाणा एवं राजस्थान से होकर बहती है।
B.
जम्मू एवं कश्मीर तथा राजस्थान से होकर बहती है।
C.
पंजाब एवं हिमालय से होकर बहती है।
D.
उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश से होकर बहती है।
व्यास, सिंधु की एक महत्त्वपूर्ण सहायक नदी है, जो समुद्र तल से 4,000 मीटर की ऊँचाई पर रोहतांग दर्रे के निकट व्यास कुंड से निकलती है। यह नदी कुल्लू घाटी से गुजरती है और धौलाधर श्रेणी में काती और लारगी में महाखड्ड का निर्माण करती है। यह पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है जहाँ हरिके के निकट सतलुज नदी में मिलती है।
A.
जल संभर के रूप में जानी जाती है।
B.
नदी संभर के रूप में जानी जाती है।
C.
अपवाह संभर के रूप में जानी जाती है।
D.
जल ग्रहण क्षेत्र के रूप में जानी जाती है।
अपवाह द्रोणी को दूसरे से अलग करने वाली सीमा को ‘जल विभाजक’ या ‘जल-संभर’ कहते हैं।