A.
मेट्रिक और अंग्रेज़ी हैं।
B.
मेट्रिक और जर्मन हैं।
C.
अंग्रेज़ी और भारतीय हैं।
D.
मेट्रिक और भारतीय हैं।
मापनी को माप की एक या अन्य पद्धति के द्वारा व्यक्त किया जाता है। विश्व के विभिन्न देशों में माप के लिए उपयोग में लायी जाने वाली ये दो विभिन्न पद्धतियाँ हैं। मेट्रिक (मीटरीय) प्रणाली में किलोमीटर, मीटर, सेंटीमीटर आदि जैसी इकाइयाँ प्रयोग में लाइ जाती हैं, जबकि अंग्रेजी प्रणाली में मील, फर्लांग, यार्ड, फुट आदि जैसी इकाइयाँ प्रयोग की जाती हैं।
A.
संख्यात्मक रूप में व्यक्त की जाती है।
B.
लिखित प्रकथन के रूप में व्यक्त की जाती है।
C.
अनुपात के रूप में व्यक्त की जाती है।
D.
प्रतिशत के रूप में व्यक्त की जाती है।
मानचित्र की मापनी प्रकथन के रूप में वर्णित की जाती है। इसका अर्थ यह है कि मानचित्र पर 1 किलोमीटर दूरी धरातल के 10 किलोमीटर की दूरी को प्रदर्शित करती है। यह मानचित्र मापनी का सरलतम रूप है और समझने में आसान है।
A.
1:100,000 होगा।
B.
1:125,000 होगा।
C.
1:150,000 होगा।
D.
1:175,000 होगा।
पहला
चरण =
किलोमीटर को
सेंटीमीटर
में परिवर्तित
करते हैं।
5
किलोमीटर = 100,000 x 5
सेंटीमीटर
=
500,000
सेंटीमीटर
दूसरा
चरण : निरूपक
भिन्न =
मानचित्र
दूरी / धरातल
दूरी (सेंटीमीटर
में)
तीसरा
चरण : निरूपक
भिन्न = 4
/ 5,00,000 =
1/125,000
निरूपक
भिन्न = 1: 125,000
A.
1 सेंटीमीटर को 1 किलोमीटर के रूप में प्रदर्शित करती है।
B.
1: 1,00,000 के रूप में प्रदर्शित करती है।
C.
1 सेंटीमीटर = 220 मील के रूप में प्रदर्शित करती है।
D.
के रूप में प्रदर्शित करती है।
आलेखी मापनी में मानचित्र दूरी एवं धरातल दूरी को एक क्षैतिज मापनी के द्वारा दिखाया जाता है, जो छोटी अंतर्विभाजक रेखाओं के द्वारा चिह्नित होते हैं। ये प्राथमिक एवं द्वितीयक विभाजक होते हैं।
A.
1 सेंटीमीटर = 5 किलोमीटर होगा।
B.
1 सेंटीमीटर = 50 किलोमीटर होगा।
C.
1 सेंटीमीटर = 500 किलोमीटर होगा।
D.
1 सेंटीमीटर = 5,000 किलोमीटर होगा।
निरूपक
भिन्न को
निम्नलिखित
चरणों के
द्वारा
मापनी के
प्रकथन में
बदला जा सकता
है :
1:
500,000 का
अर्थ है :
मानचित्र
की 1 इकाई
धरातल की 500,000 इकाइयों
को व्यक्त
करती है।
1 सेंटीमीटर
= 500,000/100,000 (1 किलोमीटर
= 100,000 सेंटीमीटर)
या 1 सेंटीमीटर
5 किलोमीटर
को व्यक्त
करता है।
A.
220 इंच के बराबर होता है।
B.
3 यार्ड के बराबर होता है।
C.
660 फुट के बराबर होता है।
D.
63,360 इंच के बराबर होता है।
1
फर्लांग = 220
यार्ड
1
यार्ड = 3 फुट
1
फर्लांग = 220 x 3 फुट
= 600 फुट
A.
1 सेंटीमीटर 360 मीटर को व्यक्त करता है।
B.
1 इंच 1,000 यार्ड को व्यक्त करता है।
C.
1 किलोमीटर 22,360 मील को व्यक्त करता है।
D.
1 सेंटीमीटर 14173.23 इंच को व्यक्त करता है।
इंच और यार्ड इकाइयाँ माप की अंग्रेजी प्रणाली में प्रयोग की जाती हैं। जो लोग माप की एक प्रणाली से परिचित हैं हो सकता है कि दूसरी माप प्रणाली को न समझ सकते हों। इसलिए जो मापनी सम्पूर्ण रूप से माप की अंग्रेजी प्रणाली से परिवर्तित की जाती है इस प्रणाली से परिचित व्यक्ति के लिए सबसे उपयुक्त होगी।
A.
मानचित्र दूरी को व्यक्त करता है।
B.
धरातल के योग मानचित्र की दूरी को व्यक्त करता है।
C.
धरातल दूरी को व्यक्त करता है।
D.
एक सामान्य संख्या को व्यक्त करता है।
मानचित्रों पर दूरियाँ निरूपक भिन्न द्वारा प्रदर्शित की जाती हैं। निरूपक भिन्न, मानचित्र पर दो स्थानों के मध्य की दूरी तथा पृथ्वी पर उन्ही दो स्थानो की वास्तविक दूरी का अनुपात, जो एक भिन्न के रूप में व्यक्त किया जाता हैं। उदाहरण के लिए 1:25,000 या 1 /25,000 में 1 अंश मानचित्र पर दूरी एवं 25,000 हर पृथ्वी पर दूरी को व्यक्त करता हैं।
A.
अंश द्वारा व्यक्त किया जाता है।
B.
भाजक द्वारा व्यक्त किया जाता है।
C.
मापनी का प्रकथन द्वारा व्यक्त किया जाता है।
D.
निरूपक भिन्न द्वारा व्यक्त किया जाता है।
मापनी में मानचित्र दूरी अंश द्वारा व्यक्त किया जाता है। उदाहरणार्थ, 1:25,000 या 1 /25,000 में 1 मानचित्र की दूरी को व्यक्त करता है।
A.
1: 100,000 होगी।
B.
1: 10,000 होगी।
C.
1:1,000,000 होगी।
D.
1:50,000 होगी।
निम्नलिखित चरणों का प्रयोग करके मानचित्र की मापनी की गणना की जा सकती है : 3,750 मीटर = (3,750 x 100) सेंटीमीटर निरूपक भिन्न = मानचित्र दूरी / धरातल दूरी = 3.75 /3,750 x 100 = 375 / 3,750 x 10000 = 1 /100,000 इसलिए, मानचित्र की मापनी 1 : 100,000 है या 1 सेंटीमीटर : 1 किलोमीटर
A.
1: 12 होगा।
B. 1:24 होगा।
C. 1:36 होगा।
D. 1:34 होगा।
निम्नलिखित
चरणों के
द्वारा, दी गई
मापनी को
निरूपक
भिन्न में
बदला जा सकता
है :
1 इंच = 1 यार्ड
को व्यक्त
करता है।
1 इंच 1 x 36 इंच को
व्यक्त करता
है।
(1 यार्ड = 36 इंच)
1 इंच = 36 इंच को
व्यक्त करता
है।
निरूपक
भिन्न = 1
:36
निरूपक
भिन्न = 1
: 1,000,000
A.
1:1,000,000 होगा।
B. 1:2,000,000 होगा।
C. 1: 3,000,000 होगा।
D. 1:4,000,000 होगा।
निम्नलिखित
चरणों के
द्वारा, दी गई
मापनी को
निरूपक
भिन्न में
बदला जा सकता
है :
1
सेंटीमीटर = 10
किलोमीटर
1
सेंटीमीटर 10 x 100,000
सेंटीमीटर
को व्यक्त
करता है।
(1
किलोमीटर = 100,000
सेंटीमीटर)
1
सेंटीमीटर = 1,000,000
सेंटीमीटर
को व्यक्त
करता है।
निरूपक
भिन्न = 1
: 1,000,000
A.
1 सेंटीमीटर = 250,000 किलोमीटर होगा।
B.
1 इंच = 250,000 मील होगा।
C.
1 फर्लांग = 250 यार्ड होगा।
D.
1 सेंटीमीटर = 25,000 इंच होगा।
माप की मेट्रिक प्रणाली में प्रयोग की जाने वाली इकाइयाँ किलोमीटर, मीटर, सेंटीमीटर आदि हैं। इंच, फर्लांग, यार्ड आदि जैसी इकाइयाँ माप की अंग्रेजी प्रणाली में प्रयोग की जाती हैं।
A.
यार्ड
B.
किलोमीटर
C.
इंच
D.
मील
विश्व के विभिन्न देशों में माप के लिए उपयोग में लायी जाने वाली दो विभिन्न पद्धतियाँ हैं। इनमें किलोमीटर, मीटर तथा सेंटीमीटर मेट्रिक प्रणाली के अंतर्गत आते हैं। इस प्रणाली का उपयोग भारत में किया जाता है।
A.
5,000 फुट के बराबर है।
B.
6,300 इंच के बराबर है।
C.
8 फर्लांग के बराबर है।
D.
240 यार्ड के बराबर है।
मील
का प्रयोग
माप की
अंग्रेजी
प्रणाली में
किया जाता
है।
मापन
की इकाइयाँ
हैं :
1 मील = 5,280 फुट
1 मील = 63,360 इंच
1 मील = 8
फर्लांग
1 फर्लांग
= 220 यार्ड
A.
1 सेंटीमीटर = 2.55 सेंटीमीटर होगा।
B.
1 सेंटीमीटर = 2.53 किलोमीटर होगा।
C.
1 सेंटीमीटर = 2.50 मीटर होगा।
D.
1 इंच = 2.60 किलोमीटर होगा।
निरूपक
भिन्न (RF)
को
निम्नलिखित
चरणों का
प्रयोग करके
मापनी के
प्रकथन में
बदला जा सकता
है।
1: 253,440 का
अर्थ है :
मानचित्र की 1 इकाई
दूरी, धरातल की 253,440
इकाइयों को
व्यक्त करता
है।
1
सेंटीमीटर = 253,440/100,000
किलोमीटर को
व्यक्त करता
है।
(1
किलोमीटर = 100,000
सेंटीमीटर)
1 सेंटीमीटर
= 2.5344 किलोमीटर
या 1 सेंटीमीटर
= 2.53 किलोमीटर
को व्यक्त
करता है।
A.
1:254,440 होगा।
B.
1:263,440 होगा।
C.
1:253,440 होगा।
D.
1:252,440 होगा।
निम्नलिखित
चरणों का
प्रयोग करके
मापनी का
प्रकथन
निरूपक
भिन्न में
बदला जा सकता
है।
1 इंच 4 मील को
व्यक्त करता
है।
1 इंच 4 x 63,360 इंच को
व्यक्त करता
है।
1 इंच 253,440 इंच को
व्यक्त करता
है।
निरूपक
भिन्न = 1:253,440
A.
मान्य
B.
अमान्य
C.
अप्रभावित
D.
समान
मानचित्र
पर किन्हीं
दो स्थानों
के बीच की दूरी
एवं धरातल पर
उन्हीं दो
स्थानों के
बीच की दूरी
को एक
क्षैतिज
मापनी के
द्वारा
दिखाया जाता
है।
मानचित्र पर
दूरी को
मापने के लिए
इसका आसानी
से इस्तेमाल
किया जा सकता
है।
मानचित्र को
बड़ा या छोटा
करने पर भी
आलेखी मापनी
मान्य रहती
है।
हाँ, हम, रूढ़ चिन्हों एवं संकेतों और प्रतीक चिन्हों के द्वारा उनके प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेषताएं को पहचान सकते हैं क्योंकि यह चिन्हों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त किये हैं।
ढालों को मुख्यतः मंद, खड़ा, अवतल, उत्तल एवं तरंगित भागों में वर्गीकृत किये जाते हैं।
समोच्चरेखीय अंतराल बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि यह किसी भी क्षेत्र में अवस्थित स्थलाकृतियों की ढलान को निर्देशित करता है|
समोच्चरेखीय अंतराल को उर्ध्वाधर अंतराल भी कहा जाता है|
भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने स्थलाकृतिक मानचित्रों के लिए नयी शृंखला के अंतर्गत छोड़ दी गई भारत और पड़ोसी देशों की शृंखला के संख्यात्मक प्रणाली और विन्यास को अभिधारण किया है।
भारत का स्थलाकृतिक मानचित्र 1:10, 00, 000, 1:2,50, 000, 1: 1, 25, 000, 1:50, 000 तथा 1:25, 000 की मापनी पर तैयार किया जाता है, जिसमें अक्षांशीय एवं देशांतरीय मान क्रमशः 4° × 4°, 1° × 1°, 30’ × 30’, 15’× 15’ तथा 5’× 7’ 30” होते हैं।
सन् 1937 में दिल्ली सर्वेक्षण सम्मेलन होने तक भारत एवं उसके पड़ोसी देशों की शृंखला वाले मानचित्रों का निर्माण भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा किया जाता था।
स्थलाकृतिक शीट संख्या 63K/12 का मापक 1 इन्च 1 मील का समानुपातिक हैं अथवा 1 सेमी 50,000 सेमी या 500 मीटर (1:50,000) की दूरी का प्रतिनिधित्व करता है |
1 इन्च स्थलाकृतिक मानचित्र का अक्षांशीय एवं देशांतरीय सीमा का मान 15 डिग्री होती है |
भारतीय सर्वेक्षण विभाग के मुख्यालय देहरादून में स्थित है।
भारतीय सर्वेक्षण विभाग का गठन सन 1767 में ब्रिटिश इंडिया कम्पनी ने क्षेत्रों को संगठित करने हेतु किया था।
यह अत्यधिक तीव्र ढाल या खड़े पाश्र्वों वाली भू-आकृति है।
मानचित्र पर भृगु की पहचान पास-पास बनी समोच्च रेखाओं से की जाती है, जो आपस में जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।
एक मानचित्र पर स्थलीय ढाल के अंतर को निरूपित करने के लिए छायारंजित छोटी-छोटी रेखाएं। यदि ढाल अतिप्रवण होता है, तो ये रेखाएं अथवा हैश्यूर घनी, मोटी एवं अधिक सटी हुई होती है, और यदि ढाल मंद होता है तो ये बारीक तथा काफी खुली होती है।
बस्तियों के चुनाव को निर्धारित करने वाले अनेक कारक होते हैं, जैसे:
· जल के स्रोत
· भोजन की सुविधाएँ
· उच्चावच की प्रकृति
· व्यवसाय की प्रकृति एवं प्रकार
· रक्षा
मापनी के आधार पर, मानचित्रों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है:
· बृहत मापनी मानचित्रों में भूसंपत्ति मानचित्र और स्थलाकृतिक मानचित्र शामिल हैं|
· लघुमान मानचित्रों में भित्ति मानचित्र और एटलस मानचित्र शामिल हैं|
मानचित्र अभिकल्पना में उचित संकेतों का चयन, उनके आकार एवं प्रकार, लिखावट का तरीका, रेखाओं की चैड़ाई का निर्धारण, रंगों का चयन, मानचित्र में मानचित्र अभिकल्पना के विभिन्न तत्त्वों की व्यवस्था और रूढ़ चिन्ह आदि सम्मलित हैं|
मानचित्र बनाने वाले को ‘मानचित्रकार’ कहा जाता है| मानचित्र बनाने की कला और विज्ञान को मानचित्रकारी के नाम से जाना जाता है| एक मानचित्रकार मानचित्र बनाने के लिए गणितीय सूत्रों की एक श्रंखला का उपयोग करता है|
‘मानचित्र’ शब्द लेटिन भाषा के ‘mappa’ शब्द से लिया गया है; जिसका अर्थ होता है- ‘कपड़ा’| जिस प्रकार से प्रारंभिक मानचित्र चमड़े, चर्मपत्र और कपड़ों पर बनाये जाते थे|
मापनी के आधार पर, मानचित्रों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है:
· बृहत मापनी मानचित्रों में भूसंपत्ति मानचित्र और स्थलाकृतिक मानचित्र शामिल हैं|
· लघुमान मानचित्रों में भित्ति मानचित्र और एटलस मानचित्र शामिल हैं|
मानचित्र अभिकल्पना में उचित संकेतों का चयन, उनके आकार एवं प्रकार, लिखावट का तरीका, रेखाओं की चैड़ाई का निर्धारण, रंगों का चयन, मानचित्र में मानचित्र अभिकल्पना के विभिन्न तत्त्वों की व्यवस्था और रूढ़ चिन्ह आदि सम्मलित हैं|
मानचित्र बनाने वाले को ‘मानचित्रकार’ कहा जाता है| मानचित्र बनाने की कला और विज्ञान को मानचित्रकारी के नाम से जाना जाता है| एक मानचित्रकार मानचित्र बनाने के लिए गणितीय सूत्रों की एक श्रंखला का उपयोग करता है|
‘मानचित्र’ शब्द लेटिन भाषा के ‘mappa’ शब्द से लिया गया है; जिसका अर्थ होता है- ‘कपड़ा’| जिस प्रकार से प्रारंभिक मानचित्र चमड़े, चर्मपत्र और कपड़ों पर बनाये जाते थे|
सबसे पुराने नक्शे मेसोपोटामिया में पाये गये थे। यह एक मिट्टी की गोली पर तैयार किये गए थे जो 2, 5000 ईसा पूर्व अंतर्गत आते है।
दिशा को मानचित्र पर एक काल्पनिक सीधी रेखा या जमीन पर सामान्य आधार पर दिशा के संबंध में विभिन्न नक्शो की कोणीय स्थिति के रूप में परिभाषित किया गया है। उत्तर की ओर की लाइन को शून्य दिशा या आधार दिशा लाइन के रूप में माना जाता है।
मानचित्र में हमेशा उत्तर दिशा को दर्शाया जाता है। अन्य सभी दिशाऍ इस संबंध में निर्धारित की जाती हैं। उत्तर दिशा एक दूसरे के संबंध में विभिन्न विशेषताओं का पता लगाने के लिए नक्शे के उपयोगकर्ता को सक्षम बनाती है।
i. पैमाना
ii. मानचित्र प्रक्षेपण
iii. मानचित्र सामान्यीकरण
iv. मानचित्र डिजाइन
v. मानचित्र का निर्माण और प्रस्तुतिकरण
यूनानी और अरब भूगोलवेत्ताओं ने आधुनिक मानचित्रकारी की नींव रखी। पृथ्वी की परिधि की माप और नक्शा बनाने में भौगोलिक निर्देशांक प्रणाली के उपयोग में यूनानी और अरब का महत्वपूर्ण योगदान हैं।
टोडरमल अकबर के शासनकाल के तहत एक राजस्व मंत्री थे। उन्होंने राजस्व संग्रह की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग के रूप में भूमि सर्वेक्षण और मानचित्र बनाने का बीड़ा उठाया।
भारत में नक्शा बनाने की नींव वैदिक काल के दौरान रखी गई थी, खगोलीय सत्य और ब्रह्माण्ड संबंधी खुलासे के भाव बनाये जा रहे थे। अभिव्यक्ति को 'सिद्धांतो' या आर्य भट्ट का शास्त्रीय संधि कानून, वाराहमिहिर और भास्कर में सघन गया।
|
भौतिक मानचित्र |
सांस्कृतिक मानचित्र |
|
भौतिक मानचित्र प्राकृतिक विशेषताओ को दर्शाते है। |
सांस्कृतिक मानचित्र मानव निर्मित विशेषताओ को दर्शाते है। |
|
उदाहरण: उच्चावच मानचित्र, जलवायु मानचित्र, आदि |
उदाहरण: राजनीतिक मानचित्र, जनसंख्या के मानचित्र, आदि |
क) चिह्न या प्रतीक एक छोटी सी जगह में बहुतायत जानकारी की देते है।
ख) मानचित्र आसानी, जल्दी से तैयार किये जा सकते है और इनकी सहायता के साथ पढ़ना आसान है।
ये नक्शे आम तौर पर गहरे व् मोटाई में तैयार किये जाते हैं ताकि इन्हे दूरी से देखा जा सके। वे कक्षाओं और एक अधिक दर्शकों को दिखाने में प्रयोग किये जाते हैं। ये मानचित्र मोटे तौर पर बहुत बड़े क्षेत्र को दर्शाते है जैसे पूरी दुनिया, महाद्वीपों और देशों, आदि। पैमाने स्थलाकृतिक नक्शे की तुलना में छोटे होते है लेकिन एटलस के नक्शे से अधिक बड़े होते है।
नक्शे पर दिखायी गयी रेखीय विशेषताओं की दो व्यापक श्रेणियाँ हैं:
(i) सरल रेखा: इसे डिवाइडर या पैमाने की एक जोड़ी से मापा जा सकता है।
(ii) अनियमित या वक्र रेखा: यह एक धागे या रोटा मीटर एक उपकरण की मदद से मापा जा सकता है।
यह मानचित्र क्षेत्र की गणना का एक साधन है। इस यंत्र में मापन के लिए हिलने-डुलने वाली छड़ी को बनाया गया है जिसका ठिकाना एक रेडियल चाप को तय करने के लिए एक छोर पर रहने के लिए विवश है। मापन क्षेत्र का एक सूचकांक के निशान के साथ एक घड़ी की दिशा में अपनी परिधि के साथ पता लगाया है। एक सुविधाजनक बिंदु से शुरू करने के लिए जिसे ट्रेसिंग उपकरण के सूचकांक वास्तव में वापस करना होता है।
वाद्य इकाइयों में अंक देने के लिए इस क्षेत्र की परिधि की ट्रेसिंग के पहले और बाद डायल पर पढ़ना। इन रीडिंग विशेष उपकरण को वर्ग इंच या सेंटीमीटर में क्षेत्रों में कन्वर्ट करने के लिएनिरंतर एक ही से गुणा करते हैं।
A.
2004
B.
2005
C.
2001
D.
1998
भूकंप, सुनामी आदि आपदाओं की एक श्रृंखला के बाद, भारत सरकार ने आपदा प्रबंधन के सभी आधुनिक तकनीकों के साथ एक अलग विभाग स्थापित करने का फैसला किया।
A.
वनों की कटाई है।
B.
अत्यधिक जनसँख्या है।
C.
उच्च तापमान है।
D.
यातायात साधनों में वृद्धि है।
भारत में बाढ़ का कारण वनों की कटाई, बाढ़ के मैदानों में बस्तियों का बसना और अपवाह मॉर्ग का भर जाना है।
A.
जैसलमेर
B.
बाड़मेर
C.
कच्छ
D.
राजस्थान का उत्तरी भाग
राजस्थान का उत्तरी भाग मध्यम सूखा प्रभावित क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
A.
00 उत्तर और 200 उत्तर
के बीच पाए
जाते हैं।
B. 250 उत्तर और 250 दक्षिण के बीच पाए जाते हैं।
C. 300 उत्तर और 300 दक्षिण के बीच पाए जाते हैं।
D. 350 उत्तर और 350 दक्षिण के बीच पाए जाते हैं।
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात 30° उत्तर तथा 30° दक्षिण अक्षांशों के बीच पाए जाते हैं।
A.
ज्वालामुखी है।
B.
भूस्खलन है।
C.
भूकंप है।
D.
सुनामी है।
सामान्यतः भूस्खलन भूकंप, ज्वालामुखी फटने, सुनामी और चक्रवात की तुलना में कोई बड़ी घटना नहीं है, परन्तु इसका प्राकृतिक पर्यावरण और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
A.
शीतोष्ण जलवायु क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किए गए हैं।
B.
भूकंप के उच्च जोखिम क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किए गए हैं।
C.
भूस्खलन के लिए उच्च चपेट वाले क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किए गए हैं।
D.
शुष्क रेगिस्तान क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किए गए हैं।
सभी हिमालयी राज्यों एवं पूर्वोत्तर राज्यों को भूकंप के उच्च जोखिम क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया है। भूस्खलन पहाड़ी क्षेत्रों की एक सामान्य विशेषता है।
A.
कोसी नदी पर बने हैं।
B.
गंडक नदी पर बने हैं।
C.
गोमती नदी पर बने हैं।
D.
दामोदर नदी पर बने हैं।
पहला बाँध 1953 में तेलैया में दामोदर नदी की एक सहायक नदी बराकर नदी पर बनाया गया था। दूसरा बाँध 1955 में कोनार में दामोदर नदी की दूसरी सहायक नदी कोनार पर बनाया गया था। दो बाँध बराकर तथा दामोदर नदी पर 1957 में मैथन में और 1959 में पंचेत में बनाया गया।
A.
भाखड़ा नांगल बाँध है।
B.
दामोदर घाटी निगम है।
C.
अन्नासागर परियोजना है।
D.
हीराकुंड बांध है।
भारत में इस परियोजना को दामोदर नदी से आने वाली बाढ़ को रोकने के लिए स्थापित किया गया था जिसे प्रायः बाढ़ के कारण शोक की नदी माना जाता था।
A.
जुलाई और अक्टूबर में बनते हैं।
B.
अक्टूबर और नवम्बर में बनते हैं।
C.
सितंबर और नवम्बर में बनते हैं।
D.
जुलाई तथा अगस्त में बनते हैं।
भारत की आकृति प्रायद्वीपीय है और इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर स्थित है। अतः यहाँ आने वाले चक्रवात इन्हीं दो जलीय क्षेत्रों में पैदा होते हैं। मानसूनी मौसम के दौरान चक्रवात 10° से 15° उत्तर अक्षांशों के बीच पैदा होते हैं। बंगाल की खाड़ी में चक्रवात ज़्यादातर अक्टूबर और नवम्बर में बनते हैं।
पहाडियों एव पर्वतीय क्षेत्रों मे पाए जाने वाले आवागमन के प्राकृतिक मार्गों को दर्रा कहा जाता हैं।
आपदा प्रबंधन संस्थान की स्थापना सन 1993 में ब्राजील के रियो-डी-जेनेरो में तथा 1994 में जापान के योकोहामा में की गयी थी|
चक्रवात के निम्न वायु दाव वाले मेघ रहित केन्द्र को तूफान के चक्षु के नाम से जाना जाता है|
असम के ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित सबसे बड़ा माजुली द्वीप हर साल बाढ़ के चपेट में आता है|
भारत में राजस्थान के ज्यादातर भाग तथा गुजरात का कच्छ इलाका अत्यधिक सूखा ग्रस्त है|
वर्षा जल संलवन सूखे का प्रभाव कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सूखा प्रतिरोधी फसलों के बारे में प्रचार-प्रसार सूखे से लड़ने के लिए एक दीर्घकालिक उपाय है।
चक्रवात के दौरान समुद्र के सतह का जल असाधारण रूप से ऊपर उठता है, इसे तूफान महोर्मि कहा जाता है|
सुनामी आमतौर पर प्रशांत महासागरीय तट पर, जिसमें अलास्का, जापान, फिलिपाइन, दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे द्वीप, इंडोनेशिया और मलेशिया तथा हिन्द महासागर में म्यांमार, श्रीलंका और भारत के तटीय भागों में आती है।
भारत को निम्नलिखित 5 भूकंपीय क्षेत्रों में बाँटा है।
|
भूस्खलन के परिणाम निम्नवत हैं;
|
जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, पश्चिम बंगाल के उपखंड और उत्तर-पूर्व के सभी सात प्रदेश अत्यधिक भूकंप-प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं| इनके अलावा गुजरात और महाराष्ट्र में भी कुछ भूकंप आये हैं|
स्थलाकृतिक मानचित्रों में 4 प्रकार की ग्रामीण बस्तियों को पहचाना जा सकता है |
· संहत
· प्रकीर्ण
· रैखिक
· वृत्ताकार
स्थलाकृतिक मानचित्रों का अध्ययन करने के लिए पाठक को मानचित्रों पर दी गई निर्देशिका, रूढ़ चिन्ह, प्रतीक चिन्ह एवं रंगों को जानना आवश्यक है।
चित्रमय पैमाने को एक रेखीय ग्राफ के माध्यम से दर्शाया जाता है। इसके कुछ फायदे हैं:
i) दूरी रैखिक पैमाने की मदद से आसानी से मापी जा सकती है।
ii) यह मौखिक बयान और प्रतिनिधि अंश को चित्रमय पैमाने में परिवर्तित करने के लिए आसान है।
iii) यह मानचित्र पर दूरी की माप का उपयोग करने के लिए आसान है।
iv) यह नक्शा कम या बढ़ा है, तब भी मान्य है।
निम्न चरणों पर रकथन को प्रतिनिधि अंश पैमाने में परिवर्तित करने के लिए विचार किया जाना चाहिए:
चरण 1: दी गयी इकाई को आवश्यकता के अनुसार सेंटीमीटर या इंच में बदले।
चरण 2: फार्मूला लागू करे,
निरूपक भिन्न = मानचित्र दूरी / जमीन दूरी
i) आवश्यक जगह या रेखा के साथ कागज की एक पट्टी से सीधे बढ़ाए।
ii) मापी जाने वाली दूरी की सीमा को चिह्नित करें।
iii) रैखिक पैमाने के साथ पट्टी रखे और दूरी पढ़ें।
निरूपक भिन्न को अंश में दिखाया जाता है क्योंकि यह दिखाता है कि असली दुनिया को मानचित्र पर फिट करने के लिए कितना कम किया जाता है। उदाहरण के लिए, 1: 24,000 के एक अंश से पता चलता है कि मानचित्र पर लंबाई में एक इकाई 24,000 जमीन पर एक ही इकाइयों को दर्शाता है। इसका मतलब एक मिमी, एक सेमी या एक इंच मानचित्र पर 24,000 मिमी, 24,000 सेमी और 24,000 इंच क्रमश:जमीन पर दर्शाता है।
चूँकि यह मानचित्र दूरी और जमीन दूरी का अनुपात है और कोई भी इकाई नहीं है, इसे किसी भी देश में इस्तेमाल किया जा सकता है, भले ही हम उस देश में प्रयोग की जाने वाली दूरी की इकाइयों से परिचित नहीं हैं। इसी कारण से इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर या प्राकृतिक पैमाने के रूप में भी जाना जाता है।
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अवतल ढाल |
उत्तल ढाल |
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जब उच्चावच स्थलाकृति का निचला भाग मंद ढाल वाला एवं ऊपरी भाग खड़े ढाल वाला हो, तो उसे अवतल ढाल कहा जाता है। |
अवतल ढाल के विपरीत, उत्तल ढाल का ऊपरी भाग मंद एवं निचला भाग खड़ा होता है। |
महाखड्ड (गार्ज): उच्च भागों में, जहाँ नदियों के द्वारा पार्श्व अपरदन की अपेक्षा उर्ध्वाधर अपरदन की क्रिया तीव्र होती है, वहाँ तंग घाटी का निर्माण होता है। ये गहरी तथा संकरी नदी घाटियाँ होती हैं, जिनके दोनों किनारों का ढाल बहुत तीव्र होता है। तंग घाटी को पास-पास स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है, जिसमें भीतरी समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर बहुत कम होता है, जो इसके दोनों किनारे को दिखाता है।
समोच्च रेखा माध्य समुद्र तल से समान ऊँचाई वाले बदुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा
होती है। पहले स्थलाकृतिक मानचित्रों में समोच्च रेखाओं को खींचने के लिए धरातलीय सर्वेक्षण तथा तल-मापन विधि का उपयोग किया जाता था।
रूढ़ चिन्ह एवं संकेत, कम समय में मानचित्रों में किसी भी विषय के बारे में अधिक और व्यापक जानकारी दर्शाते हैं |
अन्य
विशेषताओं में
शामिल हैं:
1. आसानी
से खींचा और समझा
जा सकता है ।
2. कम खर्चीला
होता है ।
3. सार्थक
एवं अर्थवहुल
होता है ।
4. प्रतीक,
रंग और
अक्षर विभिन्न
विशेषताओं और
घटना को चित्रित
करने के लिए इस्तेमाल
किये जाते हैं।
स्थलाकृतिक मानचित्र पर प्रदर्शित कुछ प्राकृतिक विशेषताएँ हैं – भूमिरूप, अपवाह, वनस्पति, आदि और मानवकृत विशेषताएँ जैसे – सड़क, रेलवे, बाँध, वस्ति, आदि सम्मलित हैं|
भू-सतह के प्राकृतिक एवं मानवकृत विशेषताओं को प्रदर्शित करने वाला, बड़ी मापनी पर खींचा गया, एक छोटे क्षेत्र का मानचित्र है। इस मानचित्र पर उच्चावच समोच्च रेखाओं द्वारा प्रकट किया जाता है।
विश्व की अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र शृंखला के अंतर्गत स्थलाकृतिक मानचित्र बृहत मापनी पर पूरे विश्व के लिए 1:10,00, 000 अथवा 1: 2, 50,000 की मापनी पर मानकीकृत मानचित्र तैयार करने के लिए अभिकल्पित किए जाते हैं।
पैमाने के प्रकथन के लाभ:
(i) इस पैमाने को व्यक्त करने के लिए थोड़ा समय की आवश्यकता है।
(ii) यह बड़े पैमाने की सरलतम रूप है और समझने में आसान है।
(iii) यह दूरी के बारे में सही विचार देता है।
(iv) इसे माप की किसी भी प्रणाली में व्यक्त किया जा सकता है।
हानियाँ:
(i) यह उन लोगों के द्वारा ही समझ में किया जा सकता है जो प्रयोग की जाने वाली माप की इकाई के साथ परिचित हो।
(ii) पैमाने समान नहीं रहते जब बढ़ा हुआ नक्शा कम हो जाता है।
भारत में माप की प्रणाली मीट्रिक प्रणाली का प्रयोग किया जाता है। इस प्रणाली में किलोमीटर, मीटर और सेंटीमीटर इकाइयों का प्रयोग किया जाता है। इसीलिए समीर द्वारा मापी गयी भूमि 10 किमी है। सैम अमेरिका से है जहां माप की अंग्रेजी प्रणाली अनुसरण किया जाता है।
प्रयोग की जाने वाली इकाइयाँ मील, फर्लांग, गज, फ़ीट आदि हैं
सैम द्वारा प्रयोग की जाने वाली इकाई की गणना की जा सकती है:
= 0.62 मील 1 किमी
10 किमी X 0.62 मील
6.2 मील
भूमि की दूरी वही रहती है, लेकिन उनके द्वारा इस्तेमाल की गयी माप की इकाइयाँ अलग थी।
निरूपक भिन्न के लाभ .:
i) चूँकि यह केवल अंश है और एक माप के किसी विशेष इकाई के लिए स्वतंत्र है, यह सभी देशों में प्रयोग किया जा सकता है।
ii) भले ही कोई व्यक्ति विभिन्न इकाइयों से परिचित न हो जैसे कि इंच, फर्लांग आदि, आसानी से इस पैमाने का उपयोग कर सकते हैं।
निरूपक भिन्न की हानियाँ:
i) दूरी को इस विधि से सीधे मापा नहीं जा सकता क्योंकि यह केवल एक आंशिक प्रणाली है।
ii) जब भी एक नक्शा फ़ोटोग्राफ़ी की रीति से बढ़ाता या कम करता है निरूपक भिन्न एक समान नही रहता।
पैमाने रेखा का प्रयोग मानचित्र पर पैमाने को दिखाने के लिए किया जाता है।

उदाहरण के लिए
i) पैमाने रेखा के द्वारा इस नक्शे पर से पता चलता है कि 1 किमी जमीन पर मानचित्र पर किस प्रकार प्रतीत होता है।
ii) इस रेखा का उपयोग जमीन पर दूरी का अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

चरण 1: सेमी में मीटर में बदले
1 मीटर = 100 सेमी
220 मीटर = 220 X 100
चरण 2: निरूपक भिन्न = नक्शा दूरी / जमीन दूरी
= 1 /220 X 100
= 1/220,000
इसलिए, निरूपक भिन्न = 1: 220,000
चरण 1: दोनों पक्षों को व्यक्त करने के लिए एक ही इकाई का उपयोग किया जाता है
1 सेमी = 63,360 सेमी
चरण 2: 63,360 सेमी को किमी में बदलिये
1 सेमी = 1 100,000
63,360 सेमी = 63,360 100,000
= 6336 में 10,000 या 0.63360 किमी
इसलिए पैमाने 1 सेमी से 0.6 किमी तक के लिए है
किसी भी चट्टान का अचानक ढलान से नीचे की ओर खिसकन भूस्खलन कहलाता हैं|
चक्रवात, भूकंप, बाढ़, सूखा, ज्वलामुखी विस्फोट आदि कुछ प्रमुख प्राकृतिक आपदायें हैं|
ये पर्यावरण की वे अनपेक्षित घटनायें हैं जिनके अकस्मात् घटित होने के कारण भरी मात्रा में जान माल की क्षति होती है|
आपदा प्रबंधन के तीन मुख्य अवस्थाएं होती है, जैसे
आपदा से पहले: किसी भी आपदा के बारें में जरुरी आंकडे तथा सूचना का एकत्रीकरण, आपदा से संबंधित क्षेत्रो का मानचित्र आदि का निर्माण एवं लोगो में जागरूकता
आपदा के दौरान: युद्ध स्तरीय बचाव एवं राहत कार्य
आपदा के पश्चात: आपदा से पीडित लोगों का पुनर्वास
आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 में आपदा को एक भयावह दुर्घटना, किसी एक क्षेत्र में घटित महाविपत्ति, मानवकृत कारण या दुर्घटना के परिणामों के रूप में परिभाषित किया गया है|
आपदाओं से एक बड़े स्तर पर जान की क्षति या मानव पीड़ा होती है, पर्यावरण की हानि एवं विनाश जिसकी प्रकृति या परिमाण प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले मानव समुदाय की सहन क्षमता से परे हो। यह अधिनियम आपदा प्रबंधन की केंद्रीकृत प्रणाली को बढ़ावा देता है|
आपदा प्रायः एक अनपेक्षित घटना होती है, जो ऐसी ताकतों द्वारा घटित होती है, जो मानव के नियंत्रण में नहीं हैं।
जबकि प्राकृतिक संकट, प्राकृतिक पर्यावरण में हालात के वे तत्त्व हैं जिनसे धन-जन या दोनों को नुकसान पहुँचने की संभाव्यता होती है। जैसे- महासागरीय धाराएँ, हिमालय में तीव्र ढाल तथा अस्थिर संरचनात्मक आवृफतियाँ अथवा रेगिस्तानों तथा हिमाच्छादित क्षेत्रों में विषम जलवायु दशाएँ आदि।