भूकंप अचानक घटित होता है, इसमें जान-माल का सबसे ज्यादा नुकसान होता है| इससे निपटने के निम्न उपाए हैं:
i. भूकंप नियंत्रण केन्द्रों की स्थापना
ii. भूकंप प्रभावित क्षेत्रों के लोगो में इसके प्रति जागरूकता|
iii. भूकंप प्रभावित क्षेत्रो में घर तथा दुकानों की डिज़ाइन में सुधार लाना |
प्राकृतिक आपदा भिन्न भिन्न प्रकार की होती है|
इनमे से दो मुख्य आपदा है:
i. वायुमंडलीय आपदा: सूखा, करकपात, उष्ण कटिबंधीय तूफान
ii. भौमिक : भूस्खलन, ज्वालामुखी, मृदा अपरदन
बहुत से ऐसी आपदाएं हैं जिनका मुख्य कारण प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से मानव ही है:
i. भोपाल गैस त्रासदी
ii. चेरनोबिल नाभिकीय आपदा
भारत के उत्तरी क्षेत्र तथा हिमालय पृथ्वी के अभिसरित परिसीमा में स्थित है| इस स्थान की विशेषता यह है की यहाँ दो प्लेट(भारतीय एवं यूरेशियन प्लेट) एक दूसरे के करीब आने के कारण एक दूसरे से टकराती है; जोकि भूकंप जैसे आपदा के लिए शक्ति संचालक के रूप में काम करती है| इसी कारण के भारत के उत्तरी क्षेत्र एवं हिमालय को ज्यादातर भूकंप के झटके महसूस होते हैं|
किसी भी क्षेत्र में जब एक लंबे समय तक कम वर्षा, अत्यधिक वाष्पीकरण और जलाशयों तथा
भूमिगत जल के अत्यधिक प्रयोग कारण से भूतल पर जल की कमी हो जाए, उस परिस्थिति को सूखा कहा जाता है| इस परिघटन में कई मौसम विज्ञान संबंधी तत्व जैसे वाष्पोत्सर्जन, भौम जल, मृदा में नमी, वाष्पीकरण, कृषि पद्धतियां, जल भंडारों की आपूर्ति, उगाये जाने वाली फ़सल, सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियाँ आदि शामिल हैं| यह मुख्यतः चार प्रकार के होते है|
आपदाओ को प्रभाबित करने वाले कारक कुछ इस प्रकार है।
1. किसी भी क्षेत्र के ऐतिहासिक और सामाजिक स्थिति के साथ उसके के आर्थिक विकास या एक क्षेत्र का स्तर आपदा के जोखिम को प्रभावित करता है।
2. आपदाओं की तीव्रता किसी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति पर भी निर्भर करता है।
प्राकृतिक आपदा उन अप्रेक्षित घटनाओ को कहा जाता है जिनके घटित होने में कुछ ऐसे ताकतें होती हैं जो मनुष्य के नियंत्रण में नही होती| जैसेकि चक्रबात, सुनामी, सूखा व अकाल, बाढ़ आदि| इन की बजह से भरी मात्रा में जान माल का नुकसान होता है क्योंकि यह थोड़े से समय में बिना चेतावनी के घटित होती हैं|
एक चक्रवात के गठन के लिए निमालिखित परिस्थितियां जरुरी हैं|
i. गर्म और नम हवा की अधिक मात्र में सतत आपूर्ती
ii. शक्तिशाली कोरिओली का वल
iii. क्षोभ मंडल में होने वाली वायुमंडलीय अस्थिरता
iv. वायु का निम्न दाव
भूस्खलन की आपदा को कम करने के लिए, निम्नलिखित प्रयास किये जाने चाहिए:
1. पहाड़ों की ढलानों बृक्ष रोपण करना चाहिए।
2. पहाड़ों की ढलानों पर सड़कों का निर्माण नहीं किया जाना चाहिए।
3. पहाड़ों की ढलानों पर भवनों का निर्माण नहीं किया जाना चाहिए।
भूकंप और ज्वालामुखी की बजह से महासागरीय धरातल में अचानक हलचल पैदा होती है | जिसके कारण महासागरीय जल अचानक विस्थापित हो कर ऊध्र्वाधर ऊँची तरंगें पैदा करता हैं| इन्ही लहरोँ को सुनामी अथवा भूकंपीय समुद्री लहरें कहा जाता है। सुनामी शब्द की उत्पत्ति दो जापानी शब्द “सु” (बंदरगाह) एवं “नामी” (लहर) हुई है|
सुनामी के कारण:
समुद्र में स्थित धरतलिय जल का अचानक विस्थापन निम्नलिखित कारणों से होता है:
भूकंपीय गतिविधि: यह सुनामी के सब से आम कारण है| उभय अन्त: समुद्री विवर्तन तथा प्रविष्ठन क्रिया कलाप समुद्री जल में तीब्र हलचल उत्त्पन्न करती हैं, जिसके कारण उर्ध्वाधर ऊँची तरंगें पैदा होती है|
अन्त: समुद्री भूस्खलन: समुद्र में होने वाले ज्वालामुखी विस्फोट अन्त: समुद्री भूस्खलन का मुख्य कारण है जिसके समुद्री तल के अवसादी चट्टान टूटती है एवं इसके प्रभाव से समुद्री जल का विस्थापन शुरू होता है | इसलिए यह सुनामी का दूसरा मुख्य कारण है |
ब्रह्मांडीय प्रभाब : कभी कभी बड़े आकर के उल्का भी सुनामी का कारण हो सकते है| जब कोई बड़े आकार का उल्का समुद्र में गिर जाता है, तो समुद्री जल का विस्थापन होता है और सुनामी की उत्पत्ति होती है|
भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्र इस प्रकार से हैं:
1. हिमालय और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
2. पश्चिमी घाट और नीलगिरी पहाड़ियों की ढलान तथा उच्च वर्षा क्षेत्र
3. उत्तर पूर्वी क्षेत्र
4. खनन एवं अवतलन के कारण, झारखंड, ओड़िसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, आदि राज्य
अधिकतर क्षेत्रों में भूस्खलन स्थानीय कारकों द्वारा प्रभावित होते हैं जिनके निपटन के लिए क्षेत्र विशेष उपायों का प्रयोग किया जाता है| इनमे से कुछ उपाए निम्नलिखित है:
i. इन क्षेत्रों में सड़क एवं बांध आदि का निर्माण वर्जित है|
ii. घाटियों और मध्यम ढलानों के क्षेत्रों में कृषि कार्य भी सिमित है|
iii. इन क्षेत्रो में सीढ़ीदार खेती को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए|
A.
उच्चावच एवं अपवाह को दर्शाता है।
B.
बस्तियों को दर्शाता है।
C.
संचार के साधनों को दर्शाता है।
D.
उपरोक्त सभी
स्थलाकृतिक मानचित्र बृहत् मापनी मानचित्र होते हैं जिनका उपयगो स्थलाकृतिक विवरण को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। इन मानचित्रों में उच्चावच, अपवाह, कृषि-भूमि, वन, बस्ती, परिवहन के साधन, स्कूलों की स्थिति, डाकघरों तथा अन्य सेवाओं एवं सुविधाओं को दर्शाने के लिए समान रंगों तथा प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है।
A.
लघुमान मानचित्र होते हैं।
B.
बृहत् मापनी मानचित्र होते हैं।
C.
अति लघुमान मानचित्र होते हैं।
D.
मध्यम मापनी मानचित्र होते हैं।
भूसंपत्ति मानचित्र और स्थलाकृतिक मानचित्र बृहत् मापनी मानचित्र होते हैं। बृहत मापनी मानचित्रों में छोटे क्षेत्रों को अपेक्षाकृत बृहत मापनी के द्वारा दिखाया जाता है। बृहत् मापनी मानचित्रों को 1:50,000 या अधिक मापनी पर व्यक्त किया जाता है।
A.
लघु मापनी मानचित्र होते हैं।
B.
बृहत् मापनी मानचित्र होते हैं।
C.
मध्यम मापनी मानचित्र होते हैं।
D.
अति बृहत् मापनी मानचित्र होते हैं।
भित्ति मानचित्र और एटलस मानचित्र लघु मापनी मानचित्र होते हैं। ये मानचित्र बृहत् क्षेत्र जैसे पूरे देश को प्रदर्शित करते हैं। ये कम विस्तार को प्रदर्शित करते हैं। लघु मापनी मानचित्र में 1:250,000 से छोटी मापनी पर व्यक्त किया जाता है।
A.
1867 में की गई थी।
B.
1667 में की गई थी।
C.
1767 में की गई थी।
D.
1761 में की गई थी।
पूरे देश के तत्कालीन मानचित्रों को बनाने के लिए 1767 में सर्वे ऑफ इंडिया की स्थापना की गई। सर्वे ऑफ़ इंडिया विभिन्न मापनियों के आधार पर पूरे देश का मानचित्र तैयार करता है।
A.
5 द्वीपों में बाँटा गया।
B.
6 द्वीपों में बाँटा गया।
C.
7 द्वीपों में बाँटा गया।
D.
3 द्वीपों में बाँटा गया।
प्राचीन भारतीय विद्वानों द्वारा सम्पूर्ण विश्व को 7 द्वीपों में बाँटा गया। जम्बू द्वीप के आसपास 6 द्वीप थे- प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। जम्बू द्वीप धरती के मध्य में स्थित है और इसके मध्य में इलावृत नामक देश है। इस इलावृत के मध्य में स्थित है सुमेरू पर्वत।
A.
मध्यकाल में हुआ था।
B.
वैदिक काल में हुआ था।
C.
अशोक के शासनकाल में हुआ था।
D.
आधुनिक काल में हुआ था।
भारत में मानचित्र बनाने का कार्य वैदिक काल में शुरू हो गया था, जब खगोलीय यथार्थता एवं ब्रह्मांडिकी रहस्योद्घाटन के प्रयत्न किए गए थे। आर्यभट्ट, वाराहमिहिर तथा भास्कर आदि के पौराणिक ग्रंथों में इन अभिव्यक्तियों को सिद्धांत या नियम के निश्चित रूप में दिखाया गया था।
A.
मानचित्रकला
B.
वायव फोटोग्राफ़ी
C.
ज्यामिती
D.
उपरोक्त में से कोई नहीं।
वायव फोटोग्राफ़ी सूदूर संवेदन का एक हिस्सा है। इस तकनीक में पृथ्वी की तस्वीरें विमान कैमरा द्वारा ली जाती हैं जो तस्वीर लिए जाने वाले क्षेत्र के ऊपर उड़ता है। इससे सतह पर होने वाले सर्वेक्षणों के तरीकों को सहयोग मिला।
A.
यूनानियों द्वारा रखी गई।
B.
अरबों द्वारा रखी गई।
C.
यूनानियों और अरबों द्वारा रखी गई।
D.
रोमनों द्वारा रखी गई।
यूनानी और अरब, विद्वान काफी कुशल गणितज्ञ थे जो उन्हें अच्छा मानचित्र निर्माता बनाता था। पृथ्वी की परिधि की माप तथा मानचित्र बनाने में भौगोलिक निर्देशांक की पद्धति के उपयोग जैसे कुछ महत्त्वपूर्ण योगदान यूनानी एवं अरब भूगोलविदों द्वारा दिए गए।
A.
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में पाए गए थे।
B.
मेसोपोटामिया में पाए गए थे।
C.
हुआंग हो घाटी में पाए गए थे।
D.
सिंध में पाए गए थे।
सबसे प्राचीन मानचित्र मेसोपोटामिया में पाए गए थे। यह चीनी मिट्टी की टिकिया पर बनाए गए थे जिसे 2,500 ईसा पूर्व का माना जाता है।
A.
मानचित्र कहलाती है।
B.
मानचित्र प्रक्षेप कहलाती है।
C.
मानचित्र परिवर्तन कहलाती है।
D.
मानचित्र निर्माण कहलाती है।
मानचित्र प्रक्षेप एक समतल सतह पर अक्षांश और देशांतर की रेखाजाल स्थानांतरित करने की विधि है। इस प्रकार के मूलज परिवर्तन के कारण जीऑयड के वास्तविक स्वरूप की दिशाओं, दूरियों, क्षेत्रों तथा आकारों में अपरिहार्य परिवर्तन होते हैं।
A.
गणितीय भूगोल है।
B.
खगोल विज्ञान है।
C.
मानचित्रकला है।
D.
भू-आकृति विज्ञान है।
मानचित्रकला भूगोल की एक प्राचीन शाखा है। यह मानचित्र, चार्ट, खाका तथा अन्य प्रकार के ग्राफ़ बनाने की कला, विज्ञान तथा तकनीक और उनका अध्ययन तथा उपयोग है।
A.
भू नियंत्रण दिग्बिंदु होते हैं।
B.
उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम होते हैं।
C.
मानचित्र पर कोई दिग्बिंदु होते हैं।
D.
ग्लोब पर कोई दिग्बिंदु होते हैं।
सामान्यतः चार दिशाएँ उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम मानी जाती हैं। इन्हें प्रधान दिग्बिंदु कहा जाता है। प्रधान दिग्बिंदुओं के बीच कई अन्य मध्यवर्ती दिशाएँ होती हैं।
A.
उच्चावच आकृतियों को प्रदर्शित करता है।
B.
संपत्ति की सीमाओं को प्रदर्शित करता है।
C.
सम्पूर्ण विश्व को प्रदर्शित करता है।
D.
संचार के साधन को प्रदर्शित करता है।
भूसंपत्ति मानचित्र कृषित भूमि की सीमाओं का निर्धारण कर तथा नगरों में निजी मकानों की योजना को दर्शाकर उनके स्वामित्व को दर्शाने के लिए बनाया जाता है। ये मानचित्र सरकार द्वारा विशेष रूप से भूमिकर, लगान की वसूली एवं स्वामित्व का रिकॉर्ड रखने के लिए बनाए जाते हैं।
A.
लघु मापनी मानचित्र होते हैं।
B.
बृहत् मापनी मानचित्र होते हैं।
C.
अति लघु मापनी मानचित्र होते हैं।
D.
उपरोक्त में से कोई नहीं होते हैं।
भूसंपत्ति मानचित्र बृहत मापनी पर बनाए जाते हैं, जैसे- गाँवों का भूसंपत्ति मानचित्र 1 : 4, 000 की मापनी पर तथा नगरों का मानचित्र 1: 2, 000 और इससे अधिक मापनी पर बनाए जाते हैं।
A.
बढे हुए पैमाने पर बनाए जाते हैं।
B.
एक ही पैमाने पर बनाए जाते हैं।
C.
लघुमान पैमाने पर बनाए जाते हैं।
D.
किसी पैमाने पर नहीं बनाए जाते हैं।
पृथ्वी की सभी आकृतियों को उनके सही आकार एवं प्रकार में दिखाना असंभव है, इसलिए मानचित्र को मापनी के आधार पर घटाकर बनाया जाता है। मानचित्रों को मापनी तथा प्रक्षेप के आधार पर बनाया जाता है ताकि कागज का प्रत्येक बिंदु स्थल की वास्तविक स्थिति के तदनुरूपी हो।
A.
स्थलाकृतिक मानचित्र को बनाया जाता है।
B.
भूसंपत्ति मानचित्र को बनाया जाता है।
C.
भित्ति मानचित्र को बनाया जाता है।
D.
एटलस मानचित्र को बनाया जाता है।
भूसंपत्ति मानचित्र शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच भाषा के ‘कैडेस्त्रे ’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ क्षेत्रीय संपत्ति की पंजिका होता है। इन मानचित्रों को कृषित भूमि की सीमाओं का निर्धारण कर तथा नगरों में निजी मकानों की योजना को दर्शा कर उन के स्वामित्व को दर्शाने के लिए बनाया जाता है। ये मानचित्र सरकार द्वारा विशेष रूप से भूमिकर, लगान की वसूली एवं स्वामित्व का रिकॉर्ड रखने के लिए बनाए जाते हैं।
A.
ग्लोब कहा जाता है।
B.
मानचित्र कहा जाता है।
C.
चार्ट कहा जाता है।
D.
मापनी कहा जाता है।
किसी मापनी से लघुकृत हुए आयामों के आधार पर संपूर्ण पृथ्वी या उसके किसी भाग के चयनित, संकेतात्मक तथा सामान्य प्रदर्शन को मानचित्र कहा जाता है।
A.
मानचित्र करता है।
B.
पृथ्वी का चित्र करता है।
C.
ग्लोब करता है।
D.
प्रक्षेपण करता है।
ग्लोब पृथ्वी का सबसे अच्छा नमूना है। यह पृथ्वी के सबसे सटीक आकार को प्रदर्शित करता है। ग्लोब के इस गुण के कारण महाद्वीपों की आकृति एवं आकार इस पर सही प्रदर्शित किए जाते हैं। यह दिशा एवं दूरी को बहुत सटीक प्रदर्शित करता है।
A.
प्रक्षेपण कहलाता है।
B.
पैमाना कहलाता है।
C.
आख्यान कहलाता है।
D.
व्यापकीकरण कहलाता है।
मानचित्र पर दी गई दूरी तथा वास्तविक दूरी के बीच का अनुपात पैमाना कहलाता है।
A.
मापनी, स्वरुप एवं उद्देश्य की उचित विशिष्टताओं का सामान्य प्रदर्शन है।
B.
क्षेत्र एवं आकार की उचित विशिष्टताओं का सामान्य प्रदर्शन है।
C.
मापनी एवं आकार की उचित विशिष्टताओं का सामान्य प्रदर्शन है।
D.
उपरोक्त सभी है।
प्रत्येक मानचित्र एक निश्चित उद्देश्य के साथ बनाया जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि मानचित्र के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उसकी विषयवस्तु को सावधानीपूर्वक नियोजित किया जाए। ऐसा करते समय, एक मानचित्राकार को चुनी गई विषयवस्तु से संबंधित सूचनाओं को एकत्रित करके आवश्यकतानुसार उसे सरल करता है।
स्टेप 1: दोनों पक्षों को व्यक्त करने के लिए एक ही इकाई का उपयोग जाता है
1 सेमी = 500.000 सेमी
चरण 2: 500,000 सेमी का मीटर में परिवर्तन
1 सेमी = 1 100 मीटर
500,000 सेमी = 500,000 100 किमी
= 5000 मी
इसलिए 1 सेमी पैमाना 5000 मीटर को दर्शाता है या 1 सेमी 5 किमी को दर्शाता है
चरण 1: 4 सेमी मानचित्र पर 5 किमी जमीन को दर्शाता है
1 सेमी = 5 4 किमी जमीन पर
या फिर 1 सेमी = 1.25 किमी
चरण 2: चूकि 1 सेमी 1.25 किमी को दर्शाता है। रैखिक पैमाने की लंबाई को दिखाने की जरूरत 6 किमी (6x1.25) या 7.5 सेमी हो जाएगा।
चरण 3: 8 सेमी लंबाई की रेखा खींचिए, 1 सेमी के अंतराल पर लाइन के निशान लगाइए, और इसे किमी दूरी में लिखें।

निरूपक भिन्न की गणना निम्नलिखित चरणों का उपयोग कर की जा सकती है:
3750 मीटर = (3750 x 100) सेमी
निरूपक भिन्न = मानचित्र दूरी स्थान की दूरी
= 3.75 3750 X 100
= 375 3750 x 10000
= 1 100, 000
निरूपक भिन्न है 1: 100000।
पैमाने के वक्तव्य:
1 सेमी 100,000/100,000 (1 किमी=100,000 सेमी) को दर्शाता है
1 सेमी 1 किमी को दर्शाता है
1 मिलीमीटर = 1/1000 मीटर
1 किलोमीटर = 100.000 सेंटीमीटर
1 मील = 5280 फीट
220 गज = 1 फर्लांग
1 इंच = 2.54 सेंटीमीटर
1 मील = 1.61 किमी
पर्वतस्कंध:
पर्वत
शृंखलाओं से घाटी
की ओर की झुकी हुई
उत्तल ढाल वाली
आकृति को स्पर
या पर्वतस्कंध
कहा जाता है। इसे
यू आकार की समोच्च
रेखा के द्वारा
दर्शाया जाता
है, लेकिन
विपरीत तरीके
से।
V के दोनों
किनारे ऊँचाई
वाले भाग को दिखाते
हैं तथा इसकी चोटी
निचले हिस्से
को।

ऊर्ध्वाधर अंतराल: दो उत्तरोत्तर समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर हैं। इसे समोच्चरेखीय अंतराल भी कहते हैं। यह प्रायः अंग्रेजी के अक्षरों द्वारा लिखा जाता है। किसी भी मानचित्र पर प्रायः इसका मान स्थिर होता है।
क्षैतिज अंतराल: लगातार दो उत्तरोत्तर समोच्च रेखाओं के बीच क्षैतिज दूरी को क्षैतिज अंतराल कहते है।
वर्षों से मानचित्रों पर उच्चावच लक्षण प्रदर्शित करने के लिए अनेक विधियों का उपयोग होता रहा है। ये विधियाँ हैं: हैश्यूर, पहाड़ी छायांकन, स्तर आभा, बेंच मार्क, स्थानिक ऊँचाई तथा समोच्च रेखाएँ। परंतु सभी स्थलाकृतिक मानचित्रों पर किसी क्षेत्र के उच्चावच को दिखाने के लिए समोच्च रेखा एवं स्थानिक ऊँचाइयों का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है।
किसी भी स्थान के लोगों के व्यवसाय को हम उस क्षेत्र की भूमि उपयोग एवं वस्तियों के प्रकार के द्वारा जान सकते हैं| उदाहारण के लिए, ग्रामीण क्षेत्र में अधिकतर लोगों का मुख्य पेशा कृषि होता हैं| आदिवासी क्षेत्र में लकड़ी काटने के काम अधिक महत्वपूर्ण होता हैं जवकि मछली पकड़ने का काम तटीय क्षेत्र में अधिक होते हैं|
वैसे ही शहरों नौकरी और व्यापार आदि लोगों का मुख्य पेशा होते हैं|
यू आकार की घाटी
ऊँचाई पर स्थित हिमानियों के पार्श्व अपरदन के कारण इस प्रकार की घाटी का निर्माण होता है। इसका निचला तल चैड़ा एवं चपटा तथा किनारे खड़े होते हैं, जिसके कारण इसका आकार यू अक्षर के समान प्रतीत होता है। हिमनदों के प्रवाह के कारण V आकार की घाटी U आकार की घाटी में परिवर्तित होती है | U आकार की घाटी के सबसे निचले हिस्से को सबसे भीतर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है तथा इसके दोनों किनारों के बीच का अंतर अधिक होता है। बाहर की ओर स्थित दूसरी समोच्च रेखाओं के लिए एक समान अंतराल के साथ समोच्च रेखाओं का मान बढ़ता जाता है
समोच्च रेखाओं के कुछ मूल लक्षण:-
1. समोच्च रेखाएँ समान ऊंचाई वाले स्थान को दर्शाती हैं।
2. समोच्च रेखाएँ एवं उनकी आकृतियाँ स्थलाकृति के ढाल एवं ऊँचाई को दर्शाती हैं।
3. पास-पास खींची, अधिक घनी समोच्च रेखाएँ तीव्र ढाल को तथा दूर-दूर खींची हुई, कम घनी समोच्च रेखाएँ मंद ढाल को प्रदर्शित करती हैं।
4. दो या दो से अधिक समोच्च रेखाओं के एक-दूसरे से मिलने से उर्ध्वाधर वाली आकृतियाँ, जैसे- भृगु अथवा जलप्रपात आदि प्रदर्शित होते हैं।
समोच्च रेखाएँ समुद्र तल से विभिन्न उर्ध्वाधर अंतरालों, जैसे- 20, 50, 100 मीटर पर खींची जाती हैं। इसे समोच्च रेखाओं का अंतराल कहा जाता है। इसे सामान्यतः मीटर में व्यक्त किया जाता है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढाल प्रकृति के अनुसार दो समोच्च रेखाओं के बीच की क्षैतिजीय दूरी में अंतर होता है, जबकि उनके बीच का उर्ध्वाधर अंतराल अचल होता है। क्षैतिज दूरी, जिसे क्षैतिज तुल्यांक के नाम से भी जाना जाता है, मंद ढाल के लिए अधिक एवं तीव्र ढाल के लिए कम होती है।
पठार: एक विस्तृत चपटा उठा हुआ भूभाग, जिसकी ढाल अपेक्षाकृत पाश्र्वों पर खड़ी होती है तथा जो आसपास के मैदान या समुद्र से ऊँची उठी होती है, वह पठार कहलाती है। पठारों को दर्शाने वाली समोच्च रेखाएँ सामान्यतः किनारों पर पास-पास तथा भीतर की ओर दूर-दूर होती हैं।

यह V अक्षर की तरह दिखाई देती है। V आकार की घाटी पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती है। V आकार की घाटी का निचला भाग भीतरी समोच्च
रेखाओं के द्वारा दिखाया जाता है, जो पास-पास स्थित होती हैं तथा जिनके समोच्च का मान कम होता है। बाहर की ओर स्थित समोच्च रेखाओं का मान एक समान रूप से बढ़ता है।

पर्वतस्कंध:
पर्वत
शृंखलाओं से घाटी
की ओर की झुकी हुई
उत्तल ढाल वाली
आकृतियों को स्पर
या पर्वतस्कंध
कहा जाता है। इसे
U आकार
की समोच्च रेखा
के द्वारा दर्शाया
जाता है, लेकिन विपरीत
तरीके से। U के दोनों
किनारे ऊँचाई
वाले भाग को दिखाते
हैं तथा इसकी चोटी
निचले हिस्से
को।

i. मानचित्र के इस क्षेत्र में सबसे उच्च बिंदु की ऊंचाई लगभग 200 मीटर है|
ii. जमटीवा नदी इस क्षेत्र की दक्षिण पूर्वी दिशा में बहती है।
iii. कुयारदरी नाले के पूर्व में स्थित मुख्य बस्ती का नाम बंधवा है |
iv. इस क्षेत्र में प्रकीर्ण प्रकार के ग्रामीण वस्तियाँ हैं|
v. सिपू नदी के बीच में सफेद धब्बे खुली झाड़ को दर्शाते हैं|
vi. इस स्थलाकृतिक मानचित्र में दर्शायी गई दो प्रकार की वनस्पतियों हैं - पर्णपाती जंगल और काँटेदार वनस्पति।
vii. कुयारदरी नदी दक्षिण-पश्चिम की ओर प्रबाहित हो रही है।
viii. निम्न खाजुरी बाँध इस क्षेत्र की उत्तर में स्थित है।

1. 1 सेमी 50,000 सेमी या 500 मीटर की दूरी का प्रतिनिधित्व करता है।
2. कछवा, मोझवन, और बजहाँ, इस क्षेत्र की प्रमुख वस्तियाँ हैं |
3. गंगा, दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर बहती है।
4. भतौली गाँव गंगा के दक्षिणी तट पर स्थित है।
5. गंगा नदी के किनारे वृत्ताकार ग्रामीण बस्तियाँ पायी जाती हैं।
6. टोली और प्रेम का पुरा नामक डाकघर इस क्षेत्र में पाए जाते हैं |
7. पीला रंग, कृषि योग्य भूमि क्षेत्र को दर्शाता है।
8. भतौली गाँव के लोगों को नदी पार करने के लिए नाव का इस्तेमाल करना पड़ता हैं|

अवतल ढाल: जब उच्चावच स्थलाकृति का निचला भाग
मंद ढाल वाला एवं ऊपरी भाग खड़े ढाल
वाला हो, तो उसे अवतल ढाल कहा जाता
है। इस प्रकार के ढाल में समोच्च रेखाएँ
निचले भाग में दूर-दूर तथा ऊपरी भाग में
पास-पास होती हैं।



A.
15 डिग्री देशांतर होता है।
B.
24 डिग्री देशांतर होता है।
C.
36 डिग्री देशांतर होता है।
D.
90 डिग्री देशांतर होता है।
पृथ्वी 24 समय जोन में विभाजित है। पृथ्वी के प्रत्येक टाइम ज़ोन का विस्तार 15 डिग्री देशांतर होता है। प्रत्येक 15 डिग्री देशांतर पर एक घंटे के समय का अंतर होता है।
A.
सुबह 5.04 बजे होंगे।
B.
शाम 5.04 बजे होंगे।
C.
4.57 बजे होंगे।
D.
शाम 4.57 बजे होंगे।
ग्रिनिच
एवं
न्यूयॉर्क
शहर के समय के
बीच का अंतर =
देशांतर का 74
डिग्री कुल
समय का अंतर = 74 x 4 = 296 मिनट
= 4 घंटे 56 मिनट
समय
का अंतर 4 घंटे 56 मिनट
होगा।
न्यू
यॉर्क शहर
प्रमुख
याम्योत्तर
के पश्चिम
में स्थित है
इसलिए
ग्रिनिच के
सापेक्ष स्थानीय
समय 4
घंटे
56 मिनट
कम होगा
अर्थात शाम 5.04 बजे
होंगे।
A.
0° याम्योत्तर से होकर गुजरती है।
B.
160° याम्योत्तर से होकर गुजरती है।
C.
180° याम्योत्तर से होकर गुजरती है।
D.
90° याम्योत्तर से होकर गुजरती है।
अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा एक काल्पनिक रेखा है जो लगातार दो दिनों को अलग करती है। इसे तारीखों के भ्रम की स्थिति से बचने के लिए बनाया गया था। 180° देशांतर रेखा लगभग उसी स्थान पर स्थित है, जहाँ से अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा गुजरती है। अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा एक सीधी रेखा नहीं है। यह प्रशांत महासागर में अनेक द्वीपों से होकर गुजरती है। प्रमुख याम्योत्तर के पूर्व में समय घटता है तथा पश्चिम में बढ़ता है।
A.
1 घंटे होता है।
B.
2 घंटे होता है।
C.
3 घंटे होता है।
D.
0 घंटे होता है।
भारत
में 68°7'
पूर्व
और 97°25' पूर्व
देशांतर के
बीच लगभग 30
डिग्री अंतर
है।
सौराष्ट्र
एवं अरुणाचल
प्रदेश के
मध्य
स्थानीय समय
का अंतर है:
30 x 4 = 120 मिनट
या 2 घंटे
भूमध्य रेखा उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के मध्य में खींची जाती है| भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण के संबंध में पृथ्वी की सीमा का निर्धारण अक्षांशों से किया जाता है| इसे महावृत्त भी कहा जाता है, जो ग्लोब को दो बराबर भागों में विभाजित करती है|
पूर्व और पश्चिम के विस्तार के साथ बड़े देश एक से अधिक समय क्षेत्र पाने के लिए एक से अधिक मानक मध्याह्न चुन सकते हैं। देश जैसे रूस, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका में एक से अधिक समय क्षेत्र है।
पृथ्वी पर 0° देशान्तर पर खींची गई मध्याह्न रेखा प्रधान मध्याह्न रेखा, प्रधान याम्योत्तर, या ग्रीनविच रेखा कहलाती है। दुनिया का मानक समय इसी रेखा से निर्धारित किया जाता हैं|
दुनिया एक वैश्विक गांव बन गया है। इसीलिए प्रधान मध्याह्न के समतुल्य अंतरराष्ट्रीय एकरूपता बनाए रखना महत्वपूर्ण है। इस प्रकार ग्रीनविच मीन टाइम को पूरी दुनिया के मानकीकृत समय के रूप में अपनाया गया है।
अंको की सुविधा के लिए ग्रीनविच वेधशाला के माध्यम से निकली देशांतर मध्याह्न को एक अंतरराष्ट्रीय समझौते से प्रधान मध्याह्न के रूप में अपनाया गया है। इसे 0 डिग्री का मूल्य दिया गया है। दुनिया भर में सभी समयो की गणना इस मध्याह्न के संदर्भ में की जाती है।
स्थान और ग्रीनविच के बीच का देशांतरीय अंतर 90 डिग्री है।
कुल समय का अंतर = 90X4
= 360 मिनट
= 360/60 घंटे
= 6 घंटे
ग्रीनविच और 90 डिग्री देशांतर पर स्थित जगह के बीच समय का अंतर छह घंटे है। यदि स्थान मुख्य मध्याह्न के पश्चिम में स्थित है, तो फिर समय उस जगह का ग्रीनविच की तुलना में छह घंटे कम हो जाएगा। यदि स्थान मुख्य मध्याह्न के पूर्व में स्थित है, तो फिर समय उस जगह का ग्रीनविच की तुलना में छह घंटे अधिक हो जाएगा।
मानक मेरिडियन एक तरीके से चयन किया जाता है जो 15° डिग्री या 7.5° से विभाज्य है, ताकि मानक समय और ग्रीनविच मीन टाइम के बीच भिन्नता को एक घंटे या आधे घंटे के गुणकों रूप में व्यक्त किया जा सके। इसकी गणना करना आसान है और सुविधाजनक रूप से इसका अनुसरण किया जा सकता है।
देशांतर और समय के बीच एक सम्बन्ध है। जैसे-जैसे पृथ्वी घुमाती हैं प्रत्येक जगह पर स्थानीय समय के रूप में सूर्यास्त और सूर्योदय होता है। देशांतर के एक ही मध्याह्न पर सभी स्थानों पर एक ही समय होता है और अलग शिरोबिंदु पर स्थित जगहों पर अलग-अलग स्थानीय समय होते है। 1 डिग्री देशांतर के अंतर से चार मिनट का अंतर होता है। इस प्रकार, हर 15° एक घंटे का अंतर होता है। पश्चिम की दिशा में हर 15° पर एक घंटे घटाना होगा। पूर्व दिशा में हर 15° पर एक घंटे को जोड़ना होगा।
एक जगह के अक्षांश को सूरज के अवलोकन के द्वारा निर्धारित किया जा सकता है। सूर्य के कोण को अक्षांश में अंतर निर्धारित करने के लिए पृथ्वी पर दो बिन्दुओ से मापा जाता है। प्रत्येक स्थान पर सूर्य के सर्वोच्च कोण से दो बार के बीच का अंतर हमें देशांतर में मतभेद बताता है। ध्रुव तारे की ऊंचाई भी एक जगह के अक्षांश को निर्धारित कर सकती हैं।
भारत के देशांतरीय अंतर 30 डिग्री 68 ° 7' पूर्व और 97 ° 25' पूर्व देशांतर के बीच है। इसीलिए पूर्वी और पश्चिमी सीमा के बीच दो घंटे का अंतर है। इस अंतर से बचने के लिए एक केंद्रीय मध्याह्न के स्थानीय समय को पूरे देश के लिए समय के रूप में लिया जाता है। 82 ° 30 'पूर्व देशांतर मिर्जापुर (भारत के बीच में) के माध्यम से गुजरता है। इस प्रकार यह भारत के लिए मानक मध्याह्न माना जाता है।
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निरपेक्ष स्थान |
सापेक्ष स्थान |
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यह ग्रिड प्रणाली के समन्वय पर आधारित एक स्थिति है। |
यह अन्य स्थानों के संबंध में स्थित एक जगह है। |
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अक्षांश और देशांतर का उपयोग सटीक स्थान को खोजने के लिए किया जाता हैं। |
कुछ तय स्थलों पर स्थान को खोजने के लिए उपयोग किया जाता है। |
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उदा.; रोम 42º उत्तर और 13º पूर्व पर स्थित है |
उदा .; यह स्कूल, पार्क, अस्पताल, आदि हो सकते है |
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स्थानीय समय |
मानक समय |
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1. एक जगह का स्थानीय समय उसका मध्याह्न समय है। |
1. मानक समय एक क्षेत्र का केंद्रीय मध्याह्न समय है। |
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2. एक ही मध्याह्न पर स्थान समय एक ही होता है। |
2. देश में सभी स्थानों पर एक समान समय होता है। |
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3. एक जगह का समय दोपहर की धूप से माना जाता है। |
3. इसका सूर्य के स्थान के साथ कोई संबंध नहीं है। |
अक्षांशों की महत्वपूर्ण विशेषताएं इस प्रकार हैं: -
i) अक्षांश क्षैतिज रेखाओ का विस्तार पूर्व-पश्चिम दिशा में हैं।
ii) वे एक दूसरे के समानांतर हैं।
iii) वे 1º की लगातार अंतराल पर खींची गयी हैं।
iv) वे ध्रुव की ओर आकार में कम होती हैं।
v) उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में 89 रेखाऍ प्रत्येक में समान हैं।
vi) अक्षांश भूमध्य रेखा के उत्तर या दक्षिण के संबंध में पृथ्वी की सीमा तक व्यक्त है।
पृथ्वी के चारों ओर की काल्पनिक रेखाऍ दो रेखाओ के सेट से बनी हैं; अक्षांश और देशांतर। अक्षांश रेखाऍ पूर्व-पश्चिम दिशा की ओर और देशांतर पृथ्वी पर उत्तर-दक्षिण दिशा में बनी हुई हैं। इनका प्रयोग दुनिया में किसी भी जगह के स्थान को खोजने के लिए किया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा एक काल्पनिक रेखा होती है, जो दो लगातार कैलेंडर तिथियों को अलग करती है| यह रेखा सीधी नहीं होती है| यह सात स्थानों पर टेढ़ी-मेढ़ी है| यह प्रशांत महासागर में कई द्वीपों से होकर गुजरती है| तिथियों के मध्य भ्रान्ति को समाप्त करने के लिए इसे बनाया गया है| यह 1800 देशांतर के समान है| अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को पार करने के लिए एक दिन जोड़ा या घटाया जाता है| इस प्रकार, पूर्व की तिथियाँ पश्चिम की तुलना में एक दिन आगे होती हैं तथा पश्चिम की तिथियाँ पूर्व की तिथियों से एक दिन पीछे होती हैं|
i) प्रत्येक मध्याह्न अर्द्ध सर्कल है और उत्तरी ध्रुव से दक्षिण ध्रुव तक फैली हुई है।
ii) लगातार दो शिरोबिंदुओ के बीच की दूरी भूमध्य रेखा पर अधिक हो जाती है और ध्रुव की ओर कम हो जाती है।
iii) देशांतर में 360 रेखाऍ होती हैं।
iv) दायें कोण पर भूमध्य रेखिय शिरोबिंदु एक दूसरे को काटते है।
v) सभी शिरोबिंदु लंबाई में बराबर हैं।
vi) देशांतर 0 डिग्री से 180 ° पूर्व की ओर और पश्चिम की ओर प्रमुख मध्याह्न पर भिन्न होते है।
A.
संदर्श प्रक्षेप कहा जाता है।
B.
असंदर्श प्रक्षेप कहा जाता है।
C.
रूढ़ प्रक्षेप कहा जाता है।
D.
शंक्वाकार प्रक्षेप कहा जाता है।
गणितीय या रूढ़ प्रक्षेप वे प्रक्षेप होते हैं, जिनको गणितीय गणना एवं सूत्रों के द्वारा बनाया जाता है तथा इनका संबंध प्रक्षेपित प्रतिबिंब के साथ कम होता है।
A.
समान क्षेत्र होते हैं।
B.
शुद्ध धारक होते हैं।
C.
सही-सही आकृति होती है।
D.
शुद्ध मापन होते हैं।
दिगंशीय प्रक्षेप वह है, जिसमें केंद्र से सभी बिंदुओं की दिशाओं को सही-सही दर्शाया जाता है। ये प्रक्षेप नौपरिवहन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं।
A.
शंकु
B.
बेलन
C.
ग्लोब
D.
समतल
ग्लोब एक अविकासनीय सतह होती है, जिसे बिना सिकोड़े, खंडित किए अथवा तोड़े-मोड़े चपटा नहीं किया जा सकता। इसकी सतह में अविकासनीय पृष्ठ के गुण होते हैं । इसलिए सभी गुणों जैसे- आकृति, आकार तथा दिशा आदि का ग्लोब से अनुरेखण लगभग असंभव है।
A.
रूढ़ प्रक्षेप
B.
शंक्वाकार प्रक्षेप
C.
खमध्य प्रक्षेप
D.
बेलनी प्रक्षेप
खमध्य प्रक्षेप में समतल सतह ग्लोब के किसी बिंदु को स्पर्श करता है तथा इस पर रेखाजाल को प्रक्षेपित किया जाता है, सामान्यतः सतह को ग्लोब पर इस प्रकार रखा जाता है कि वह ग्लोब के किसी एक ध्रुव से स्पर्श करे। क्षेत्र एवं आकृति का विरूपण केंद्र बिंदु से बढ़ जाता है।
A.
शंक्वाकार विकासनीय पृष्ठ का उपयोग करके बनाया जाता है।
B.
गोलाकार विकासनीय पृष्ठ का उपयोग करके बनाया जाता है।
C.
बेलनाकार विकासनीय पृष्ठ का उपयोग करके बनाया जाता है।
D.
समतल विकासनीय पृष्ठ का उपयोग करके बनाया जाता है।
एक कागज का बना बेलन ग्लोब को लपेट लेता है तथा उस पर समांतरों एवं याम्योत्तरों को प्रक्षेपित किया जाता है। जब बेलन को काट कर खोला जाता है, तब यह समतल कागज पर बेलनी प्रक्षेप प्रदान करता है।
A.
घुमाया जा सकता है।
B.
समतल किया जा सकता है।
C.
बढ़ाया जा सकता है।
D.
समतल नहीं किया जा सकता है।
अक्षांश एवं देशांतरों के जाल को विकासनीय पृष्ठ पर प्रक्षेपित किया जा सकता है। बेलन, शंकु तथा समतल में विकासनीय पृष्ठ के गुण होते हैं।
A.
प्रकाश के स्रोत के बिना बनाया जाता है।
B.
प्रकाश के स्रोत के साथ बनाया जाता है।
C.
मानचित्र तकनीक से बनाया जाता है।
D.
गणितीय सूत्र की सहायता से बनाया जाता है।
संदर्श प्रक्षेप मानचित्र प्रक्षेप की एक रेखांकन तकनीक होती है। इसे विकासनीय पृष्ठ पर ग्लोब के याम्योत्तर तथा समांतर से बने जाल के प्रतिबिंब को प्रक्षेपित करके बनाया जा सकता है।
A.
एक अर्द्धवृत्त बनाते हैं।
B.
एक बृहत् वृत्त बनाते हैं।
C.
एक वृत्त-चाप बनाते हैं।
D.
एक पूर्ण वृत्त बनाते हैं।
देशांतर के याम्योत्तर उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर, एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक खींचे जाते हैं। दो विपरीत याम्योत्तर एक पूर्ण वृत्त अर्थात् ग्लोब की परिधि का निर्माण करते हैं।
A.
समान लंबाई के होते हैं।
B.
समान लंबाई के नहीं होते हैं।
C.
ध्रुव पर मिलते हैं।
D.
अर्द्धवृत्त होते हैं।
अक्षांशों के समांतर ग्लोब के चारों ओर स्थित वे वृत्त हैं, जो विषुवत वृत्त के समांतर एवं ध्रुवों से समान दूरी पर स्थित होते हैं। पृथ्वी की आकृति के कारण वे एक समान लंबाई के नहीं होते हैं। इनका विस्तार ध्रुव पर बिंदु से लेकर विषुवत वृत्त पर ग्लोबीय परिधि तक होता है।
A.
किसी क्षेत्र के दिए गए बिंदुओं के बीच की दूरी
B.
क्षेत्र की यथार्थ आकृति होती है।
C.
क्षेत्र का क्षेत्रफल होता है।
D.
दिशा होती है।
यथाकृतिक प्रक्षेप वह है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों की आकृति को सही-सही चित्रित किया जाता है जबकि क्षेत्र के आकार को बनाए रखना, क्षेत्र विकृति है। ये छोटे क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होता है।
A.
समदूरस्थ प्रक्षेप है।
B.
समक्षेत्र प्रक्षेप है।
C.
समान आकृति है।
D.
दिगंशीय प्रक्षेप है।
समक्षेत्र प्रक्षेप या होमोलोग्राफ़ीय प्रक्षेप वह प्रक्षेप होता है जिसमें पृथ्वी के विभिन्न भागों को सही-सही दर्शाया जाता है। इसमें अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं का रेखाजाल इस प्रकार से बनाया जाता है कि मानचित्र का प्रत्येक चतुर्भुज क्षेत्रफल में ग्लोब पर स्थित संगत चतुर्भुज के ठीक बराबर होता है।
A.
लैम्बर्ट प्रक्षेप पर रेखांकित की जाती है।
B.
बेलनाकार प्रक्षेप पर रेखांकित की जाती है।
C.
मर्केटर प्रक्षेप पर रेखांकित की जाती है।
D.
बोन प्रक्षेप पर रेखांकित की जाती है।
रंब रेखा या लेक्सोड्रोम मर्केटर प्रक्षेप पर किसी दो बिंदुओं को जोड़ने वाली सीधी रेखा होती है। यह नौपरिवहन के दौरान दिशाओं का निर्धारण करने में बहुत उपयोगी है।
A.
लैम्बर्ट प्रक्षेप है।
B.
मर्केटर प्रक्षेप है।
C.
शंकु प्रक्षेप है।
D.
दिगंशीय प्रक्षेप है।
लैम्बर्ट प्रक्षेप या बेलनाकार सम-क्षेत्रफल प्रक्षेप केवल विषुवत वृत्त के साथ सही मापन है। ध्रुवों को विषुवत वृत्त के समान एवं समांतर दिखाया जाता है इसलिए ध्रुव की ओर विकृति में वृद्धि होती जाती है।
A.
मर्केटर प्रक्षेप है।
B.
लैम्बर्ट प्रक्षेप है।
C.
शंकु प्रक्षेप है।
D.
त्रिविम प्रक्षेप है।
शंकु प्रक्षेप विश्व मानचित्र के लिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि जिस गोलार्द्ध में मानक अक्षांश वृत्त चुना जाता है, उसके विपरीत गोलार्द्ध में चरम विकृति होती है। जिस गोलार्द्ध में यह बनाया जाता है, उसके लिए भी यह अनुपयुक्त है, क्योंकि उसमें भी ध्रुव पर तथा विषुवत वृत्त के पास विकृति होने के कारण इसका उपयोग बड़े क्षेत्र को प्रदर्शित करने के लिए अनुपयुक्त है।
A.
अक्षांश
B.
रेखाजाल
C.
देशांतर
D.
विषुवत वृत्त एवं प्रमुख याम्योत्तर
मानचित्र प्रक्षेप अक्षांशों एवं देशांतरों का जाल को समतल सतह पर स्थानांतरण है।
A.
शंकु प्रक्षेप
B.
अभिलंब प्रक्षेप
C.
तिर्यक प्रक्षेप
D.
ध्रुवीय प्रक्षेप
तिर्यक प्रक्षेप ग्लोब स्पर्शरेखीय विकासनीय पृष्ठ की स्थिति पर आधारित एक प्रक्षेप होता है। यदि विकासनीय पृष्ठ जैसे शंकु, सिलेंडर या समतल विषुवत वृत्त या ध्रुव के बीच किसी बिंदु पर स्पर्शरेखीय होता है, तो इसे तिर्यक प्रक्षेप कहा जाता है।
A.
प्रदेश की आकृति एवं आकार
B.
दिए गए किसी दो बिंदुओं के बीच की दूरी
C.
किसी एक बिंदु की दिशा
D.
उपरोक्त्त सभी
मानचित्र प्रक्षेप अधिक विरूपण के बिना समतल कागज पर पृथ्वी को गोलाकार दिखाने का प्रयास है। इस प्रकार क्षेत्र की सही माप, आकृति, दिशा एवं दूरी मानचित्र में संरक्षित करने के लिए चार प्रमुख वैश्विक गुण हैं।
A.
कांच पर पृथ्वी का एक मॉडल होता है।
B.
पृथ्वी का वह मॉडल जो छोटी मापनी की सहायता से कागज के समतल सतह पर दर्शाया जाता है।
C.
कागज पर पृथ्वी की रूपरेखा है।
D.
किसी भी पैमाने के बिना पृथ्वी का मॉडल है।
पृथ्वी के मॉडल को छोटी मापनी की सहायता से कागज के समतल सतह पर दर्शाया जाता है। यह मॉडल पृथ्वी का छोटा रूप कहलाता है। यह मॉडल लगभग गोलाभ होता है, जिसमें ध्रुव का व्यास विषुवतीय व्यास से छोटा होता है तथा इस पर रेखाजाल को स्थानांतरित किया जा सकता है।
A.
लंबकोणीय प्रक्षेप कहलाता है।
B.
त्रिविम प्रक्षेप कहलाता है।
C.
नोमानिक प्रक्षेप कहलाता है।
D.
मर्केटर प्रक्षेप कहलाता है।
जब प्रकाश के स्रोत को ग्लोब के मध्य रखा जाता है, तब प्राप्त प्रक्षेप नोमानिक प्रक्षेप कहलाता है। यह प्रक्षेप प्रकाश को ग्लोब के केंद्र में रख कर प्राप्त किया जाता है।
A.
वह लैम्बर्ट का बेलनाकार सम-क्षेत्र प्रक्षेप होता है।
B.
वह मर्केटर प्रक्षेप होता है।
C.
वह शंक्वाकार प्रक्षेप होता है।
D.
वह दिगंशीय प्रक्षेप होता है।
याम्योत्तर एवं अक्षांशों के सहारे मापनी का विस्तार उच्च अक्षांशों पर तीव्रता से बढ़ता है। परिणामस्वरूप, ध्रुव के निकटवर्ती देशों का आकार उनके वास्तविक आकार से अधिक हो जाता है।
लैम्बर्ट के बेलनाकार सम-क्षेत्रफल प्रक्षेप के गुण
· सभी समान्तर एवं याम्योत्तर सीधी रेखाएँ होती हैं, जो एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं।
· ध्रुवीय समान्तर भी विषुवत वृत्त के बराबर होते हैं।
· मापनी केवल विषुवत वृत्त के पास ही शुद्ध होती है|
एक मानक अक्षांश रेखा वाले शंकु प्रक्षेप की सीमाये:
क. यह प्रक्षेप विश्व मानचित्र के लिए उपयुक्त नहीं है|
ख. जिस गोलार्द्ध में मानक अक्षांश वृत्त चुना जाता है, उसके विपरीत गोलार्द्ध में चरम विकृति होती है|
ग. यह विशाल क्षेत्रों को दर्शाने के लिए भी उपयुक्त नहीं है|
घ. ध्रुव पर तथा विषुवत वृत्त के पास विकृति अधिक होती है|
एक मानचित्र पर अक्षांश और देशांतर रेखाएं सदैव ही किसी स्थान की सही स्थिति का बोध कराती हैं|
मानचित्र प्रक्षेपण के पश्चात् पृथ्वी की वास्तविक दिशाओं, दूरी, क्षेत्रों और आकारों में परिवर्तन हो सकता है|
A.
80°30’ पूर्व से की जाती है।
B.
82°60’ पूर्व से की जाती है।
C.
81°20’ पूर्व से की जाती है।
D.
82°30’ पश्चिम से की जाती है।
भारतीय मानक समय का निर्धारण 82°30’ पूर्व से किया जाता है। यह भारत में मिर्ज़ापुर से होकर गुजरती है। भारतीय मानक समय ग्रिनिच माध्य समय से 5 घंटे और 30 मिनट आगे है।
A.
प्रमुख याम्योत्तर का स्थानीय समय होता है।
B.
180 डिग्री देशांतर का स्थानीय समय होता है।
C.
मानक याम्योत्तर का स्थानीय समय होता है।
D.
प्रथम याम्योत्तर का स्थानीय समय होता है।
अधिकांश देशों के एक से अधिक देशांतर हैं। इसलिए, रेलवे, वायुमॉर्ग, संचार आदि के लिए अलग-अलग समय कार्यक्रम के प्रबंधन में मुश्किल होती है। प्रत्येक देश अपनी प्रशासनिक सीमाओं के भीतर समय की एकरूपता बनाए रखने के लिए अपने मानक समय का चयन करते हैं। किसी देश के केंद्रीय याम्योत्तर को उस देश का मानक याम्योत्तर माना जाता है तथा उसके स्थानीय समय को देश का मानक समय माना जाता है।
A.
उसका केंद्रीय याम्योत्तर होता है।
B.
देश का प्रथम याम्योत्तर होता है।
C.
देश का अंतिम याम्योत्तर होता है।
D.
कोई भी याम्योत्तर होता है।
यह देश का केंद्रीय याम्योत्तर होता है। मानक याम्योत्तर का चुनाव इस तरह किया जाता है कि ये 150° या 7°30' द्वारा विभाजित हों, ताकि मानक समय एवं ग्रिनिच माध्य समय के बीच के अंतर को 1 या आधे घंटे के गुणक के रूप में बताया जा सके। अधिक विस्तार वाले देश एक से अधिक मानक याम्योत्तर चुन सकते हैं।
A.
समय ज़ोन के निर्धारण में होता है।
B.
पृथ्वी की गति के निर्धारण में होता है।
C.
पृथ्वी के क्षेत्र के निर्धारण में होता है।
D.
तापमंडलों के निर्धारण में होता है।
विषुवत
वृत्त से
ध्रुव की ओर
अक्षांशों
का उपयोग
तापमंडलों
के निर्धारण
में होता है। विभिन्न
तापमंडल हैं :
i. 0° से 23½° तक
उत्तर और
दक्षिण उष्ण
कटिबंध
ii. 23½°
से 66½°
तक
शीतोष्ण
कटिबंध
iii. 66½° से 90°
तक
शीत कटिबंध
A.
प्रति घंटा 30° देशांतर को पार करता हुआ दिखाई देता है।
B.
प्रति घंटा 15° देशांतर को पार करता हुआ दिखाई देता है।
C.
प्रति घंटा 45° देशांतर को पार करता हुआ दिखाई देता है।
D.
प्रति घंटा 0° देशांतर को पार करता हुआ दिखाई देता है।
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती हुई 360° देशांतर अर्थात् एक चक्कर लगभग 24 घंटे में पूरा करती है। चूँकि, 180° देशांतर प्रमुख याम्योत्तर के पूर्व एवं पश्चिम दोनों ओर स्थित है, इसलिए सूर्य पूर्व से पश्चिमी गोलार्द्ध में जाने में 12 घंटे का समय लेता है। इस प्रकार सूर्य पूर्व से पश्चिम प्रति घंटा 15° देशांतर को पार करता हुआ दिखाई देता है। प्रत्येक 15 डिग्री पश्चिम की ओर जाने पर 1 घंटा घटता है। 15 डिग्री पूर्व की ओर जाने पर 1 घंटा जुड़ता है।
A.
विषुवत वृत्त पर मिलते हैं।
B.
उत्तरी ध्रुव पर मिलते हैं।
C.
ग्लोब के सभी बिंदुओं पर मिलते हैं।
D.
कहीं भी नहीं मिलते हैं।
देशांतरीय
याम्योत्तर
अर्द्धगोलाकार
होती हैं, जो
ध्रुवों पर
एक बिंदु पर
मिलती हैं।
याम्योत्तर
की रेखाएँ
प्रमुख
याम्योत्तर
से 180 डिग्री
पूर्व और
प्रमुख
याम्योत्तर
से 180 डिग्री
पश्चिम
क्रमांकित
होते हैं। ये
दोनों
देशांतरीय
याम्योत्तर
उत्तरी
ध्रुव पर मिलते
हैं।
A.
प्रतिशत में मापे जाते हैं।
B.
अनुपात में मापे जाते हैं।
C.
डिग्री में मापे जाते हैं।
D.
अंश में मापे जाते हैं।