A.
नंबर होता है।
B.
अंकीय नंबर होता है।
C.
अंकीय मान होता है।
D.
अंकीय बार होता है।
एक डिजिटल नंबर एक पिक्सल के विकिरण मान का औसत होता है। यह मान संवेदक द्वारा प्राप्त विद्यतु-चुंबकीय ऊर्जा पर आधारित है। इसकी गहनता का स्तर इसके प्रास को व्यक्त करता है।
A.
प्रतिबिंब के रूप में जाना जाता है।
B.
अंकीय बिम्ब के रूप में जाना जाता है।
C.
वायव फ़ोटोग्राफ़ी के रूप में जाना जाता है।
D.
फोटोग्राफ़िक प्रतिबिम्ब के रूप में जाना जाता है।
अंकीय प्रतिबिंब अलग-अलग पिक्चर तत्त्वों के मेल से बनते हैं। इन्हें पिक्सल कहा जाता है। प्रत्येक पिक्सल का एक अंकीय मान होता है और धरातल के द्विविमीय बिंब को इंगित करता है।
A.
पराबैंगनी किरणें हैं।
B.
अवरक्त किरणें हैं।
C.
रेडियो तरंगें हैं।
D.
गामा किरणें हैं।
सुदूर संवेदन में प्रयोग की जाने वाली ऊर्जा तरंगें दृश्य, अवरक्त व माइक्रोवेव तरंगें हैं। अवरक्त तरंगें मुश्किल से दिखाई देती हैं। ये गर्म विकिरण होती हैं, सभी गर्म निकाय अवरक्त किरणों के स्रोत होते हैं।
A.
अंकीय बिम्ब प्रक्रमण तकनीक है।
B.
चाक्षुष निर्वचन है।
C.
क्रमवीक्षण है।
D.
प्रक्रमण है।
गुणात्मक व मात्रात्मक दोनों ही प्रकार की विशेषताएँ चाक्षुष निर्वचन अथवा अंकीय बिम्ब प्रक्रमण तकनीक द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं। चाक्षुष निर्वचन करना एक स्वचालित अभ्यास है, जो बिंबों में किसी भी वस्तु को देखकर उसकी पहचान करता है। दूसरी तरफ, डिजिटल इमेज से हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर दोनों के संयुक्त प्रयोग से ही इच्छित सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।
A.
नष्ट हो जाती है।
B.
उपस्थिति रहती है।
C.
उत्पन्न होती है।
D.
पुनः प्रवेश करती है।
जब भू-पृष्ठ वस्तुओं से ऊर्जा परावर्तित होती हैं, तो यह पुनः वायुमंडल में प्रवेश करती है। वायुमंडल में गैस, जलकण व धूलकण आदि व्याप्त हैं। वस्तुओं द्वारा परावर्तित ऊर्जा इन वायुमंडलीय घटकों के संपर्क में आती है और वास्तविक ऊर्जा की विशेषताओं में परिवर्तन आ जाता है।
A.
आकार
B.
आकृति
C.
छाया
D.
गठन
छाया
सूर्य
प्रकाश किरण
का कोण व उस
वस्तु की ऊँचाई
पर निर्भर
करती है।
कुछ वस्तुओं
की आकृति
उनकी छाया के
अभाव में पहचान
पाना
मुश्किल
होता है।
उदाहरण के
रूप में, एम्पायर
स्टेट
बिल्डिंग, कुतुब
मीनार, भवनों
पर बनीं जल
टंकियाँ
केवल छाया
द्वारा ही
पहचानी जा
सकती हैं।
छाया, प्रतिबिंब
व्याख्या का
महत्त्वपूर्ण
कारक है, उपग्रही
प्रतिबिम्बों
की व्याख्या
में छाया कम
महत्त्वपूर्ण
है।
A.
कुल दृष्टि क्षेत्र (TFOV) क्षेत्र कहा जाता है।
B.
उच्च विभेदन दृश्य विकिरणमापी (HRVR) क्षेत्र कहा जाता है।
C.
तात्क्षणिक दृष्टि (IFOV) क्षेत्र कहा जाता है।
D.
स्पॉट उच्च विभेदन दृश्य (SPOT HRV) क्षेत्र कहा जाता है।
विस्कब्रूम क्रमवीक्षक में एक घूमने वाला दर्पण व एकमात्र संसूचक लगा होता है। संवेदक का वह पूरा क्षेत्र, जहाँ तक यह पहुँच सकता है, उसे स्कैनर का कुल दृष्टि क्षेत्र कहा जाता है वहीँ पूरे क्षेत्र का विस्कब्रूम क्रमवीक्षक का प्रकाशीय सिरा एक निश्चित आयाम का होता है, जिसे तात्क्षणिक दृष्टि (IFOV) क्षेत्र कहा जाता है।
A.
फ़ोटोग्राफ़ में परिवर्तित होते हैं।
B.
आंकड़े में परिवर्तित होते हैं।
C.
क्रमवीक्षक पंक्ति में परिवर्तित होते हैं।
D.
अंकों में परिवर्तित होते हैं।
क्रमवीक्षक दर्पण के दृश्य स्थल के आर-पार हिलने पर एकत्रित ऊर्जा संसूचक तक पहुँचकर विद्युतीय संकेतों को उत्पन्न करते हैं और ये संकेत पुनः अंकों में परिवर्तित होते हैं, जिन्हें चुम्बकीय पट्टी पर रिकॉर्ड करने के लिए आंकिक कहा जाता है।
A.
मानव नेत्र
B.
फ़ोटोग्राफिक निकाय
C.
सुदूर संवेदन युक्तियाँ
D.
भौगोलिक सूचना निकाय
मानवीय नेत्र एवं फ़ोटोग्राफिक निकाय दोनों ही धरातलीय पदार्थों से प्रदीप्त कुल प्रकाश ऊर्जा के सूक्ष्म भाग में कार्य करते हैं। दूसरी तरफ वर्तमान सुदूर संवेदन युक्तियाँ ऊर्जा के बृहत्तर परिसर तथा विकिरण, परावर्तित, उत्सर्जित, अवशोषित तथा पारगत ऊर्जा स्वरूप का अधिकतम उपयोग करते हैं जिनका तापमान 0° केल्विन या -273° सेल्सियस से अधिक है।
A.
कार्बन डाइआक्साइड
B.
हाइड्रोजन
C.
धूल के कणों
D.
जल के अणु
कार्बन डाईऑक्साइड, हाइड्रोजन व जलकण अवरक्त किरणों को अवशोषित कर लेते हैं, जबकि धूलकणों से नीली किरणों का प्रकीर्णन होता है। अतः ऊर्जा, जो या तो अवशोषित हो जाती है या वायुमंडलीय घटक जिसको प्रकीर्ण करते हैं, वह उपग्रहों में विद्यमान संवेदक तक नहीं पहुँच पाती और इन वस्तुओं की विशेषताएँ अभिलेखित नहीं हो पातीं।
विभेदन तीन प्रकार के होते हैं|
त्रियक रंगी मिश्र में जलाशय नीला तथा घने वनस्पति लाल रंग में प्रतीत होते हैं|
आँकड़ा उत्पाद के आधार पर संवेदकों को 2 वर्गों में विभाजित किया गया है:
1. फ़ोटोग्राफी;
2. फोटोग्राफ रहित आंकिक संवेदक।
फ़ोटोग्राममिति, वायव फ़ोटो के द्वारा विश्वसनीय मापन के विज्ञान एवं तकनीक से संबंधित है| फ़ोटोग्राममिति की सहायता से, फ़ोटो की परिशुद्ध लंबाई, चैड़ाई एवं ऊँचाई की माप का निर्धारण किया जाता है|
भारत में सबसे पहले 1920 में बड़े पैमाने पर आगरा शहर का वायव फ़ोटो लिया गया था| इसके इरावदी डेल्टा के वनों का वायु सर्वेक्षण किया गया, जो कि 1923-24 के दौरान पूरा हुआ था|
अल्प तिर्यक फोटोग्राफ और अति तिर्यक फोटोग्राफ ऊर्ध्वाधर अक्ष के साथ कैमरे अक्ष में एक जानबूझकर विचलन के साथ किये जाते हैं। तस्वीरों के इस प्रकार को प्रारम्भिक सर्वेक्षण में उपयोग किया जाता है।
|
वृहद मापनी फोटोग्राफ |
मध्यम मापनी फोटोग्राफ |
|
जब एक वायव फोटो की मापनी 1:15,000 तथा इससे बृहत होती है, तो इस प्रकार के फोटोग्राफ को बृहत मापनी फोटोग्राफ कहते हैं। |
वायव फोटो, जिसकी मापनी 1:15,000 से 1: 30,000 के मध्य होती है, उसे सामान्यतः मध्यम मापनी फोटोग्राफ कहा जाता है। |
ऊर्ध्वाधर वायव फोटोग्राफी का उपयोग निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए किया जाता हैं:
1. स्थलाकृतिक मानचित्रण
2. विषयगत मानचित्रण
3. रिमोट सेंसिंग
कैमरा लेंस केंद्र से धरातलीय तल पर दिए गए लंब को ऊर्ध्वाधर अक्ष कहा जाता है, जबकि लेंस के केंद्र से फोटो की सतह पर खींची गई साहुल रेखा को फोटोग्राफी/प्रकाशीय अक्ष कहते हैं।
मानचित्र से सीधे ही वायव फोटोग्राफी का पता नही लगाया जा सकता है क्योकि क्षेत्रफल मापीय नियंत्रण (प्रक्षेपण) और एक मानचित्र के परिप्रेक्ष्य और वायव फोटोग्राफी में बुनियादी अंतर है। यहां तक संगत वायव फोटोग्राफी में सुसंगत पैमाने की जरूरत नहीं होती है जब तक कि वे एक समतल क्षेत्र से न लिये गए हो। वायव फोटोग्राफी को दृश्य परिप्रेक्ष्य से को ध्यान से क्षेत्रफल मापीय नियंत्रण (प्रक्षेपण) में तब्दील किये जाने की जरूरत है। इससे पहले इन्हे मानचित्र विकल्प के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है।
इस प्रक्षेप में, प्रक्षेपित किरणें समांतर होती हैं, परंतु यह आवश्यक नहीं है कि वे लंब हो।

उदाहरण के लिए, त्रिभुज ABC को LL1 रेखा पर प्रक्षेपित किया गया है, जिसका प्रक्षेपित त्रिभुज ABC है।
लंबकोणीय प्रक्षेपण में धरातलीय दूरियाँ, लक्ष्य कोण तथा क्षेत्र सभी किसी लक्ष्य के उच्चता अंतरों से मुक्त होते हैं। मानचित्र, धरातल पर लंबकोणीय प्रक्षेप होते हैं। उदाहरण के लिए ABC कोण की प्रक्षेपित किरणें रेखा LL1 के लंबवत् हैं।

केंद्रीय प्रक्षेपण में सभी सीधे लाइने एक ही बिंदु पर आकर मिलती है, अर्थात केद्रीय प्रक्षेप में संगत बिंदुओं को मिलाने वाली सभी सीधी रेखाएँ, अर्थात् वह सीधी रेखा, जो वस्तु एवं आकृति के संगत बिंदुओं को जोड़ती है, एक ही बिंदु से होकर गुजरती है। लेंस के द्वारा प्रक्षेपित आकृति को केद्रीय प्रक्षेप माना जाता है। प्रक्षेपित किरणें Aa, Bb एवं Cc एक ही बिंदु O से गुज़रती हैं, जिसे संदर्श केंद्र कहते हैं।

ऊर्ध्वाधर फोटोग्राफ: वेव फोटो के दो विशिष्ट अक्ष होते है जो कमरे के केंद्र में बनते है एक धरातलीय तल की ओर एवं दूसरा फोटो के तल की ओर। कैमरा लेंस केंद्र से धरातलीय तल पर दिए गए लंब को ऊर्ध्वाधर अक्ष कहा जाता है लेंस के केंद्र से फोटो की सतह पर खींची गई साहुल रेखा को फोटोग्राफ/ऑप्टिकल अक्ष कहते हैं। जब फोटो की सतह को धरातलीय सतह के समांतर रखा जाता है, तब दोनों अक्ष एक-दूसरे से मिल जाते हैं।
लगभग ऊर्ध्वाधर वायव फोटोग्राफ: दोनों सतहों के बीच समांतरता प्राप्त करना काफी कठिन होता है, क्योंकि वायुयान पृथ्वी की वक्रीय सतह पर गति करता है। इसलिए फोटोग्राफ के अक्ष ऊर्ध्वाधर अक्ष से विचल हो जाते हैं। यदि इस प्रकार का विचलन धनात्मक या ऋणात्मक 3° के भीतर होता है, तो लगभग ऊर्ध्वाधर वायव फोटोग्राफ प्राप्त होते हैं।
वायव फोटोग्राफी प्रयोग करने के लिए दो तरीके हैं:
संदर्श बिंदु: यह वायव फोटोग्राफी से विश्वसनीय माप बनाता है। फोटोग्राममिति के सिद्धांत, इस प्रकार के फोटो की परिशु दध लंबाई, चौड़ाई एवं ऊँचाई की माप प्रदान करते हैं। इसलिए स्थलाकृतिक मानचित्रों को तैयार करने एवं उन्हें अद्यतन बनाने में, ये अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं।
प्रतिबिंब निर्वचन: यह वस्तुओं के स्वरूपों को पहचानने तथा उनके सापेक्षिक महत्त्व से संबंधित निर्णय लेने की प्रक्रिया है। प्रतिबिंब निर्वचन के सिद्धांत के प्रयोग से वायव फोटो की गुणात्मक जानकारियाँ ज्ञात की जा सकती हैं, जैसे- भूमि उपयोग, स्थलाकृतियों के प्रकार, मिट्टी के प्रकार इत्यादि।
वायव फोटोग्राफ का इस प्रकार भूमि उपयोग परिवर्तन का विश्लेषण करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।
वायव फोटोग्राफी के निम्न तीन प्रकार पैमाने के आधार पर पहचाने जाते हैं।
1. वृहत मापनी फोटोग्राफी: वायव फोटो की मापनी 1:15,000 तथा इससे बृहत को वृहत मापनी फोटोग्राफी कहते हैं।
2. मध्यम मापनी फोटोग्राफी: मध्यम मापनी फोटोग्राफी की मापनी 1:15,000 से 1:30,000 के मध्य होती है।
3. लघु मापनी फोटोग्राफी: 1: 30, 000 से लघु मापक वाले फोटोग्राफ को लघु मापनी फोटोग्राफ कहा जाता है।
Sp = Dp: Dg
= 5 सेमी: 50 किमी
= 5 सेमी: 50 Χ 100,000 सेमी
= 1: 1,000,000
= 1 इकाई 1,000,000 इकाइयों को व्यक्त करती है
इसीलिए, Sp = 1: 50,000
|
अल्प तिर्यक फोटोग्राफ |
अति तिर्यक फोटोग्राफ |
|
ऑप्टिकल अक्ष का विचलन ऊर्ध्वाधर अक्ष से<30 डिग्री होता है। |
ऑप्टिकल अक्ष का विचलन ऊर्ध्वाधर अक्ष से >30 डिग्री होता है। |
|
क्षेत्र ऊर्ध्वाधर तस्वीरों से भी बड़ा होता है लेकिन अति तिर्यक तुलना में छोटा। |
अति तिर्यक फोटोग्राफ का विस्तार क्षेत्र बड़ा होता है। |
|
इसे प्रारम्भिक सर्वेक्षण में प्रयोग किया जाता है। |
अति तिर्यक फोटोग्राफ प्रारम्भिक सर्वेक्षण और निदर्शी प्रयोजनों के लिए उपयुक्त है क्योकि यह भूमि की सतहों के वास्तविक परिप्रेक्ष्य का ध्यान रखता है। |
Sp= फोटो की दूरी:धरातलीय दूरी
= 4 सेमी: 2 किमी
= 4 सेमी: 2 X 100,000 सेमी
= 1: 200,000/4
= 1: 50,000 सेमी
= 1 इकाई 50,000 इकाइयों को व्यक्त करती है
इसीलिए, Sp = 1: 50,000

A.
ध्रुव के निकट सूर्य समकालिक कक्ष में स्थापित होते हैं।
B.
भू-स्थैतिक में स्थापित होते हैं।
C.
मध्यवर्ती कक्ष में स्थापित होते हैं।
D.
दीर्घवृत्ताकार उपग्रह कक्ष में स्थापित होते हैं।
मौसम संबंधी आकलन व संचार के लिए भेजे गए उपग्रह भू-स्थैतिक हैं। इन उपग्रहों का परिभ्रमण कक्ष पृथ्वी के परिभ्रमण दिशा से समायोजित है। ये उपग्रह अंतरिक्ष में लगभग 36,000 कि.मी. की उफँचाई पर स्थापित हैं। INSAT श्रेणी के उपग्रह इसके उदाहरण हैं।
A.
फ़ोटोग्राफ़ संवेदक
B.
फ़ोटोग्राफ़ रहित संवेदक
C.
अंकीय कैमरा
D.
उपग्रह
फ़ोटोग्राफ़ संवेदक संवेदक (कैमरा) किसी भी लक्ष्य बिंदुओं को एक क्षण विशेष में उद्भाषित कर अभिलेखन कर लेता है। दूसरी ओर फ़ोटोग्राफ़ रहित संवेदक किसी लक्ष्य के प्रतिबिंब को पंक्ति दर पंक्ति रूप में प्राप्त करते हैं। ये संवेदक स्कैनर के नाम से जाने जाते हैं।
A.
प्रतिबिंब में परिवर्तित कर देते हैं।
B.
फ़ोटोग्राफ़ में परिवर्तित कर देते हैं।
C.
अंकीय बिंब में परिवर्तित कर देते हैं।
D.
एफसीसी में परिवर्तित कर देते हैं।
संवेदक एकत्रित ऊर्जा को विद्युतीय क्रिया द्वारा आँकड़ों के रूपों को अंकीय बिंब में बदल देते हैं। ये आंकिक संख्याएँ पंक्ति व स्तंभ में क्रमानुसार व्यवस्थित होते हैं। इन संख्याओं को आँकड़ों से निर्मित प्रतिबिंबों में परिवर्तित किया जा सकता है।
सुदूर संवेदन प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त चित्र हमे भूपृष्ठ की वस्तुओं के बारे में संक्षिप्त ज्ञान प्रदान करता है एवं इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया को प्रतिम्बिम्ब निर्वचन कहा जाता है जिसमे हम भिन्न-भिन्न आधार पर वस्तुओं की पहचान की जाती है| प्रतिबिम्ब निर्वचन के इन आधारों को प्रतिबिम्ब निर्वचन के तत्व के रूप में जाना जाता है| यह है
i. आभा या रंग : विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा धरातलीय वस्तुओं से अंतः क्रिया के बाद परावर्तित जो कर संवेदकों तक पहुंचती है| यही परावर्तित ऊर्जा वस्तुओं के विशेषताओं के अनुरूप भिन्न भिन्न रंगों में सुदूर संवेदी चित्रों में प्रकट होती है|
ii. गठन : यह रंग सामंजस्य या धूसर आभा में सूक्ष्म भिन्नता से संबंधित है जो छोटे प्रतिरूपों के पुनरावृत्ति का एक वर्ग में भी जाना जाता है| गठन के आधार पर प्रतिबिम्बों को स्थूल एवं सूक्ष्म रूप में वर्गीकृत किया गया है|
iii. आकार: कभी-कभी किसी विशेष वस्तु को उसके आकार के आधार पर पहचाना जा सकता है जैसे की औद्योगिक संकुल स्थान, रिहायशी इलाका, शहर बीचों बीच स्थित खेल परिसर आदि|
iv. आकृति: किसी वस्तु की आकृति उसे पहचानने में मदद करता हैं। कुछ वस्तुओं जैसे मस्जिद व मंदिर की आकृति इतनी विशिष्ठ होती हैं कि उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।
v. छाया: किसी वस्तु की छाया सूर्य की रोशनी के कोण और वस्तु की ऊंचाई पर निर्भर करती है। कुछ वस्तुओं की आकृति इतनी जटिल होती है कि उन्हें उनकी छाया के अभाव में पहचान पाना मुश्किल होता है। उदाहरण: क़ुतुब मीनार
vi. प्रतिरुप: प्रतिरूप, परिदृश्य पर वस्तुओं के धरातलीय व्यवस्था है। प्राकृतिक व मानव-निमित व्यवस्थित धरातलीय प्रतिरूपों में आकार व वस्तुओं के अंतसम्बन्धों की पुनरावृत्ति होती है। उदाहरण के लिए, नियोजित रिहायशी क्षेत्रों को आसानी से पहचाना जा सकता है अगर वे एक ही प्रतिरूप का पालन करते हैं।
vii. साहचर्य: वस्तुओं को उनके आपसी संबंधों के सहायता से पहचाना जा सकता है| उदहारण किसी आवासीय क्षेत्र के निकट खेल का मैदान अथवा स्कूल का होना, किसी बड़े सहर में रेस कोर्स या स्टेडियम का होना इत्यादि|
विस्कब्रूम क्रमवीक्षक एकमात्र संसूचक वाला एक घूमने वाला दर्पण है| इसका विन्यास इस प्रकार किया जाता है कि एक चक्कर पूरा करने पर संसूचक स्पेक्ट्रम के दृश्य एवं अवरक्त क्षेत्रों में बहुत सारे संकरे स्पेक्ट्रमी बैन्डों में प्रतिबिम्ब प्राप्त करते हैं| यह संसूचक दृश्य क्षेत्र के 900 से 1200 के मध्य प्रसर्पी होता है| मध्य में क्रमवीक्षण के लिए संवेदक का प्रकाशीय सिरा एक निश्चित आयाम का होता है जो तात्क्षणिक दृष्टि क्षेत्र के नाम से जाना जाता है|
बहुवर्णक्रमीय स्कैनर में परावर्तित किरणों के रूप में सुचनाओं को पंक्ति दर पंक्ति अभिलेखन करके दृश्य में परिवर्तन करती है| इस प्रक्रिया के दौरान मशीन चालित क्रमवीक्षण दर्पण दृश्य क्षेत्र के समकोण पर आगे व पीछे हिलता है, एवं क्रमवीक्षण की जाने वाली पंक्ति की लंबाई निर्धारित करता है| यह दृश्य क्षेत्र के नाम से जाना जाता है| क्रमवीक्षण विधि द्वारा सूचना प्राप्त करने की इस विधि को बिट बॉय बिट कहा जाता है| इस प्रक्रिया में बनने वाले दृश्य कोष्ठिकाओं से बना हुआ होता है, और इस से दृश्य चित्र का क्षेत्रीय विभेदन को निर्धारित होती है| क्रमवीक्षण दर्पण के आर पार हिलने के कारण इसमें एकत्रित होने वाली ऊर्जा संसूचक तक पहुँचती है और पुनः इसे विद्युतीय संकेतों में परिवर्तित करती है| अंततः ये संकेत अंको में परिवर्तित होते है, जिन्हें आंकिक कहा जाता है और इन्हें चुम्बकीय पट्टी पर अभिलेखित किया जाता है|
|
धरातलीय अवस्थाओं के बारे उपयोगी सूचनाओं का निष्कर्षण सुदूर संवेदकों के विभिन्न विभेदनों द्वारा ही संभव है| यह है: धरातलीय विभेदन : भूपृष्ठ पर साथ-साथ स्थित किसी दो वस्तुओं को पहचानने की संवेदक की क्षमता को धरातलीय विभेदन कहा जाता है| वर्णक्रमीय स्पेक्ट्रम विभेदन : यह संवेदक के विद्युत-चुंबकीय स्पेक्ट्रम के अलग अलग बैंडो में सूचना अभिलेखन की क्षमता को दर्शाता है | इन से मल्टीस्पेक्ट्रल चित्रों की प्राप्ति होती है| रेडियोमीट्रिक विभेदन : अलग अलग लक्ष्यों के पहचान के इस विभेदन का प्रयोग किया जाता है| रेडियोमीट्रिक विभेदन की वृद्धि के साथ ही विकिरण का अंतर कम होता जाता है जिनसे दो अलग वस्तुओं की पहचान करने में आसानी होती है| |
सुदूर संवेदन की प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों से हो कर गुजरती है|
1 ऊर्जा स्त्रोत : सुदूर संवेदन प्रक्रिया के प्रमुख उपादान इसका ऊर्जा स्त्रोत होता है| इसके अलावा क्षणदीप्ति उपकरणों के ऊर्जा स्त्रोत को भी सूचना प्राप्त करने के लिए उपयोग किया जा सकता है|
2. ऊर्जा का संचरण स्त्रोत से पृथ्वी के धरातल तक: सूर्य से प्राप्त किरण जब पृथ्वी के सतह पर पड़ी किसी वस्तु से टकराती है तो इनमें से कुछ उस बस्तु द्वारा अवशोषित होती है एवं कुछ विकिरित हो जाती हैं| इन किरणों को विद्युत् चुम्बकीय विकिरण कहा जाता है, जो वातावरण में अपनी गति के दौरान ऊर्जा की क्षति के कारण अपना गुण परिवर्तन करती है| इस परिवर्तन के कारण सुदूर सम्बेदकों द्वारा इनका चित्रण भी भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं|
3. पृथ्वी के धरातल के साथ ऊर्जा की अन्योन्यक्रिया : स्त्रोतों से संचरित ऊर्जा धरातलीय वस्तुओं के साथ अन्योन्यक्रिया करती है और इनके द्वारा ऊर्जा का अवशोषण, प्रेषण, परावर्तन व उत्सर्जन होता है। क्योंकि सतह पर स्थित समस्त वस्तुएं एक समान नहीं हैं, इन से होने वाली ऊर्जा का अन्योन्यक्रिया तथा अन्य प्रक्रियाएं भी एक समान नही होती हैं|
4. वायुमंडल से परावर्तित/उत्सर्जित ऊर्जा का प्रवंधन : अन्योन्य क्रिया के पश्चात वस्तुओं से ऊर्जा परावर्तित हो कर वायुमंडल में प्रवेश करती है| वायुमंडल में स्थित गैस, जलकण व धूलकण के कारण परावर्तित ऊर्जा के विशेषताओं में भी परिवर्तन आता है| इनमे से कुछ ऊर्जा वायुमंडलीय घटकों द्वारा अवशोषित अथवा प्रकिर्णित हो जाती है| अतः संवेदकों द्वारा इनका अभिलेखन संभव नहीं होता |
5. परावर्तित तथा उत्सर्जित ऊर्जा का अभिसुचन: परावर्तित एवं उत्सर्जित ऊर्जा का अभिलेखन उपग्रहों में स्थित संवेदक को द्वार किया जाता है जो की पृथ्वी के सतह से लगभग 700 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया गया है|
6. प्राप्त ऊर्जा का अभिसारण : यह परावर्तित ऊर्जा विद्युत् चुंबकीय ऊर्जा के रूप में संवेदकों द्वारा संगृहीत होती है संवेदक इनमें छिपी सूचनाओं को बिंब का रूप देती हैं| उसके बाद इन्ही बिम्बों को अंकीय रूप अथवा आंकड़ों के माध्यम से पृथ्वी पर स्थापित धरातलीय केन्द्रों को प्रेषित किया जाता हैं ।
7. आंकड़ो से विषयानुरूप सूचना सामग्री का निष्कर्षण : धरातलीय केन्द्रों में आंकडों की एकत्रीकरण के दौरान पायी गयी त्रुटियों को दूर किया जाता है एवं शुद्ध आंकिक आँकड़ों का बिंब प्रकमण तकनीक के द्वारा एवं चाक्षुष विधि से विश्लेषण किया जाता है। उसके पश्चात भिन्न भिन्न विषयानुसार इनसे सूचना प्राप्त की जाती है|
8. निष्कार्षित सूचनाओं का मानचित्र एवं सारणी के माध्यम से अभिसारण : अंततः विषयी मानचित्रों के रूप में इन विश्लेषित सूचनाओं को रूपांकित किया जाता है|
सुदूर संवेदन के फायदे:
सुदूर संवेदन की सीमायें
A.
पवन की गति के निर्धारण में किया जाता है।
B.
पवन की दिशा के निर्धारण में किया जाता है।
C.
पवन की आर्द्रता के निर्धारण में किया जाता है।
D.
पवन तापमान के निर्धारण में किया जाता है।
पवन वेगमापी यंत्र का उपयोग वायु की दिशा निर्धारित करने में किया जाता है। पवन की गति के साथ ही यह यंत्र पवन की बहाव दिशा की सूचना भी देता रहता है।
A.
वायुघनत्वमापी द्वारा दर्ज किया जाता है।
B.
वायुदाबमापी द्वारा दर्ज किया जाता है।
C.
आर्द्रतामापी द्वारा दर्ज किया जाता है।
D.
पवनवेगमापी द्वारा दर्ज किया जाता है।
वायुमंडलीय दाब का मापन वायुदाबमापी द्वारा किया जाता है। यह मिलीबार में मापा जाता है। मानक वायुमंडलीय दाब 1,013.25 मिलीबार है।
A.
वायुदाबमापी द्वारा दर्ज किया जाता है।
B.
वर्षामापी द्वारा दर्ज किया जाता है।
C.
तापमापी द्वारा दर्ज किया जाता है।
D.
पवन वेगमापी द्वारा दर्ज किया जाता है।
वायु का तापमान तापमापी द्वारा दर्ज किया जाता है। तापमान सामान्यतः सेल्सियस या सेंटीग्रेड (C) या फारेनहाइट (F) पैमाने पर दर्ज किया जाता है। तापमान की एक अन्य इकाई केल्विन भी है।
A.
2.03 किलो प्रति वर्ग सेंटीमीटर होता है।
B.
2.04 किलो प्रति वर्ग सेंटीमीटर होता है।
C.
1.03 किलो प्रति वर्ग सेंटीमीटर होता है।
D.
1.04 किलो प्रति वर्ग सेंटीमीटर होता है।
सामान्य अवस्था में समुद्र तल पर वायु का दाब 1.03 किलो प्रति वर्ग सेंटीमीटर होता है। इसे यदि अन्य इकाइयों में व्यक्त करें तो यह 1,013.25 मिलीबार या 760 मिमी हेक्टोग्राम के रूप में होगा।
A.
दिल्ली
B.
मुंबई
C.
पुणे
D.
कोलकाता
पूरे देश की मौसम वेधशालाएँ प्राप्त आंकड़ों को पुणे स्थित केंद्रीय वेधशाला को दिन में दो बार भेजती हैं।
A.
मौसम चार्ट के रूप में जाना जाता है।
B.
मौसम मानचित्र के रूप में जाना जाता है।
C.
सिनाप्टिक मौसम चार्ट के रूप में जाना जाता है।
D.
क्लोरोप्लेथ मानचित्र के रूप में जाना जाता है।
अनेक मौसम वेधशालाओं से प्राप्त आंकड़ों को विशेष कोड का उपयोग कर एकल चार्ट में समाविष्ट किया जाता है। इस प्रकार के मौसम चार्ट को सिनाप्टिक मौसम चार्ट के रूप में जाना जाता है।
A.
तापमापी हैं।
B.
मौसम चार्ट हैं।
C.
वायुदाबमापी हैं।
D.
मानचित्र हैं।
मौसम पूर्वानुमान के लिए मौसम चार्ट प्राथमिक यंत्र हैं क्योंकि ये वायुराशियों, वायुदाब यंत्रों आदि को खोजने में सहयोग करते हैं।
A.
समवर्षा रेखाएँ कहलाती हैं।
B.
समताप रेखाएँ कहलाती हैं।
C.
समदाब रेखाएँ कहलाती हैं।
D.
आइसोहेल कहलाती हैं।
मानचित्र पर सागर तल के बराबर घटाए हुए वायुदाब से तुलनात्मक रूप में समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाकर खीची जाने वाली रेखा, समदाब रेखाएँ होती हैं।
A.
पारा और जल हैं।
B.
जल एवं अल्कोहल हैं।
C.
अल्कोहल तथा ब्रोमाइन हैं।
D.
पारा एवं अल्कोहल हैं।
उच्च एवं न्यून तापमापी में इस्तेमाल किए जाने वाले दो द्रव पारा एवं अल्कोहल हैं क्योंकि अन्य द्रवों की तुलना में तापमान बढ़ने एवं घटने पर क्रमशः उनमें विस्तार एवं सिकुड़न होती है।
A.
विश्व मौसम विज्ञान संगठन है।
B.
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग है।
C.
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण है।
D.
नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर है।
भारत के मौसम मानचित्र को प्रतिदिन तैयार करने वाला विभाग भारतीय मौसम विज्ञान विभाग है, जो यह कार्य भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह (इनसैट) की सहायता से करता है।
A.
सतह से करता है।
B.
वायु की ऊपरी परतों से करता है।
C.
अंतरिक्ष से करता है।
D.
वायु की निचली परतों से करता है।
तुल्यकाली उपग्रह से मौसम से संबंधित अंतरिक्ष-आधारित सूचनाएँ प्राप्त होती हैं।
A.
तापमापी है।
B.
पवन वेगमापी है।
C.
अमीटर है।
D.
वायुदाबमापी है।
अमीटर एक उपकरण है जिसका इस्तेमाल सर्किट में विद्युत प्रवाह को मापने के लिए किया जाता है। मौसम विज्ञान वेधशाला में इसका उपयोग नहीं किया जाता है।
A.
दो
B.
तीन
C.
चार
D.
पाँच
भारत में, मौसम वेधशालाओं को उनके यंत्रों तथा प्रतिदिन लिए गए प्रेक्षणों की संख्या के आधार पर सामान्यतः पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है।
अधिकतम और न्यूनतम तापमापी के नली के निचले भाग तथा बल्ब में भरे जाने वाले तरल पदार्थ अल्कोहल है|
तापमापी का आविष्कार ऐन्डर्स सेल्सियस ने किया था।
मौसम का अर्थ है किसी निर्दिष्ट स्थान एवं समय पर वायुमंडलीय दाब, तापमान, आर्द्रता, वर्षण, मेघमयता तथा पवन की दृष्टि से वायुमंडल की दशा या स्थिति से हैं|
मौसम उपग्रह, विभिन्न मौसम संबंधी तत्त्वों के धरातलीय प्रेक्षण के साथ-साथ वायुमंडल की ऊपरी परतों का भी व्यापक तथा विस्तृत प्रेक्षण करते हैं। तुल्यकाली उपग्रह से मौसम से संबंधित अंतरिक्ष-आधारित सूचनाएँ प्राप्त होती हैं।
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सेंटीग्रेड मापनी |
फ़ारेनहाइट मापनी |
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सेंटीग्रेड तापमापी ऐन्डर्स सेल्सियस के नाम पर रखा गया है। |
फ़ारेनहाइट तापमापी गेब्रियल फारेनहाइट के नाम पर रखा गया है। |
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इस तापमापी पर पिघलते हुए हिम का तापमान 0°C तथा उबलते हुए पानी का तापमान 100°C होता है।
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इस तापमापी पर पानी का हिमांक एवं क्वथनांक क्रमश 32°C एवं 212°C होता है। |
भारतीय मौसम संबंधी प्रेक्षणों के उच्चतम वर्ग - वर्ग-1 है। इस वर्ग की वेधशालाओं में निम्नलिखित विशिष्ट यंत्रों की सुविधा पाए जाते हैं -
भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह तापमान, मेघावरण, पवन एवं अन्य मौसम परिघटनाओं के मूल्यवान प्रेक्षण उपलब्ध कराता है।
भारत में, मौसम वेधशालाओं तथा भारतीय मौसम संबंधी प्रेक्षणों को उनके यंत्रों एवं प्रतिदिन लिए गए प्रेक्षणों की संख्या के आधार पर सामान्यतः पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ), जो संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) का एक विशेष एजेंसी है, दुनिया भर के सभी वेधशालाओं द्वारा उठाए मौसम संबंधी प्रेक्षणों का समन्वय करता है।
सन् 1688 में एडमंड हिलेरी ने 30° उत्तर एवं दक्षिण अक्षांशों के लिए एक मानचित्र का प्रकाशन किया था, जिसमें व्यापारिक पवनों तथा प्रचलित माँनसून पवनों की दिशाओं को प्रदर्शित किया गया था।
वर्षामापी एक मौसम यंत्र हैं, जिसके द्वारा वर्षा की मात्रा को मापा जाता है। वर्षामापी यंत्र में धातु का सिलिंडर होता है, जिस पर एक गोलाकार कीप लगा होता है। कीप का व्यास सामान्यतः 20 से.मी. होता है। वर्षा के पानी को इसमें इकठ्ठा किया जाता है तथा मापक ग्लास के द्वारा इसे मापा जाता है। सामान्यतः वर्षा को मिलीमीटर या सेंटीमीटर की इकाई में मापा जाता है।
मौसमी परिघटनाओं को मापने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले यंत्र निम्न हैं :
1. वायुदाब की सतत रिकार्ड - निर्द्रव वायुदाबमापी
2. हवा की दिशा – वात दिग्दर्शी
3. हवा के वेग – पवन-वेगमापी
4. हवा की आद्रता – आद्र एवं शुष्क बल्ब तापमापी
5. दिन के अधिकतम और न्यूनतम तापमान - अधिकतम और न्यूनतम तापमापी
6. वर्षा की मात्रा – वर्षामापी
एक वायु दाब लेखी वायुदाब की निगरानी के लिए इस्तेमाल किया जाता है और यह यंत्र भी निर्द्रव वायुदाबमापी यंत्र की भाँति कार्य करता है। विस्थापन की अधिकता के लिए कई वायु रहित बक्सों को एक-दूसरे के उपर रखा जाता है। लीवरों के एक तंत्र से यह गति बढ़ जाती है, जिससे इसका अभिलेखन एक घूर्णी ढोल से संलग्न कागज पर स्वलेखी कलम से होता है। वायुदाब लेखी यंत्र के पाठ्यांक सदैव शुद्ध नहीं होते हैं, इसलिए पारा वायुदाबमापी यंत्र के साथ तुलना करके मानक बनाए जाते हैं।
वायु के तापमान को मापने के लिए उच्च तापमापी एवं निम्न तापमापी का उपयोग किया जाता है | अधिकतम तापमापी को दिन के उच्चतम तापमान को अंकित करने के लिए बनाया जाता है। जैसे ही तापमान बढ़ता है, नली का पारा ऊपर की ओर बढ़ने लगता है, किन्तु जब पारा ठंडा होता है, तब यह नली में संकीर्णन के कारण नीचे की ओर नहीं जा पाता है। पारे को नीचे लाने के लिए इसे फिर से व्यवस्थित किया जाता है। न्यूनतम तापमापी के द्वारा दिन के न्यूनतम तापमान का प्रेक्षण किया जाता है। इस तापमापी में पारे के स्थान पर अल्कोहल का उपयोग किया जाता है। जब तापमान घटता है, तो नली में रखी धातु की पिन नीचे चली जाती है तथा न्यूनतम तापमान पर जाकर रूक जाती है |
विश्व स्तर पर मौसम संबंधी प्रेक्षणों को तीन स्तरों पर अभिलिखित किया जाता है | ये हैं: धरातलीय वेधशालाएँ, उपरितन वायु वेधशालाएँ तथा अंतरिक्ष स्थित प्रेक्षण प्लेटफार्म |
धरातलीय वेधशालाएँ - एक आदर्श धरातलीय वेधशाला में अनेक मौसम तत्त्वों, जैसे- तापमान, अधिकतम एवं न्यूनतमद्ध, वायुदाब, आर्द्रता, मेघ, पवन एवं वर्षा को मापने तथा अभिलेखन करने वाले यंत्र होते हैं। ये प्रेक्षण संपूर्ण विश्व में, दिन के एक निश्चित समय पर लिए जाते हैं, जिसे विश्व मौसम विज्ञान संस्थान द्वारा तय किया जाता है। इसमें प्रयुक्त यंत्र अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होते हैं, ताकि विश्व स्तर पर प्रेक्षणों में समानता रखी जा सके।
निश्चित घंटों पर लिए गए प्रेक्षणों को कोड के द्वारा पूर्वानुमान केंद्रों पर प्रेषित किया जाता है। केंद्रीय कार्यालय, इन सूचनाओं का अभिलेख रखता है, जिसके आधार पर मौसम मानचित्र एवं मौसम चार्ट बनाए जाते हैं। मौसम मानचित्र और मौसम चार्ट हमारे लिए उपयोगी होते हैं। वे मौसम की भविष्यवाणी के लिए प्राथमिक उपकरण प्रदान करते हैं। वे विविध वायुराशि, वायुदाब प्रणाली आदि को चिन्हित करने तथा पहचान ने में मदद करते हैं| वे पायलटों, रक्षा कर्मियों, किसानों और मछुआरों जैसे लोगों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं।
मौसम संबंधी पूर्वानुमान की मदद से खराब मौसम जैसे तूफान, चक्रवात, भारी बारिश आदि होने की संभावना पर पहले से ही सुरक्षा उपाय करने में सहायता मिलती है। कुछ दिन पहले मौसम का पूर्वानुमान किसानों, पोत के नाविक दल, पायलट, मछुआरों, सैनिकों आदि के लिए बहुत-ही उपयोगी होता है। मौसम की पूर्वानुमान से जहाजों और हवाई जहाज के चालक दल के सदस्यों के लिए बहुत आवश्यक है, क्योंकि खराब मौसम उनके कार्य में बिघ्न घटाते है और अक्सर गंभीर दुर्घटनाओं का कारण होते है। तटीय क्षेत्रों में रहने वाले मछुआरों को मौसम के पूर्वानुमान पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है क्योंकि समुद्री तूफान उनके जीवन के लिए खतरनाक हो सकता है।
वायु में उपस्थित आर्द्रता को मापने के लिए शुष्क बल्ब तापमापी एवं आर्द्र बल्ब तापमापी का उपयोग किया जाता है| शुष्क बल्ब तथा आर्द्र बल्ब तापमापी एक ही तरह के होते हैं, जो एक लकड़ी के तख्ते पर स्थित होते हैं। शुष्क तापमापी का बल्ब वायु में खुला रहता है, जबकि आर्द्र तापमापी का बल्ब गीले मलमल के कपड़े से लिपटा होता है। इसके एक सिरे को आसुत जल से भरे छोटे बर्तन में डुबोए रखकर इसे लगातार गीला रखा जाता है। आर्द्र बल्ब से वाष्पीकरण होने पर इसका तापमान घट जाता है, क्योंकि वाष्पीकरण की दर वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा पर निर्भर करती है। वायु में जितनी अधिक आर्द्रता होगी, वाष्पीकरण की दर उतनी ही कम होगी, फलस्वरूप, शुष्क एवं आर्द्र बल्बों के बीच के पाठ्यांकों का अंतर कम होगा। दूसरी तरफ, जब वायु शुष्क होती है, तब आर्द्र बल्ब की सतह से वाष्पीकरण तेजी से होगा, जो इसके तापमान को कम कर देगा तथा दोनों के पाठ्यांकों का अंतर अधिक होगा। इसलिए आर्द्र एवं शुष्क बल्ब के पाठ्यांक का अंतर आर्द्रता के सापेक्ष वायुमंडल की अवस्था को निर्धारित करता है। अंतर जितना ही अधिक होगा, वायु उतनी ही अधिक शुष्क होगी।
स्टीवेंसन स्क्रीन का उपयोग तापमापी को वर्षण एवं सूर्य की सीधी किरणों से बचाने के लिए किया जाता है। वायु इसके चारों ओर सुगमता से घूम सकती है। परंपरागत स्टीवेंसन स्क्रीन मुख्यतः लकड़ी का बना होता है, जिसके किनारे झरोखेदार होते हैं, जिससे वायु का सुगमता से प्रवेश हो सके। विकिरण को परावर्तित करने के लिए इसे श्वेत रंग से रंगा जाता है। स्टीवेंसन स्क्रीन के उद्देश्य वायुमंडलीय वायु के तापमान, आर्द्रता और दबाव को मापने के लिए एक मानकीकृत पर्यावरण प्रदान करना है।
वास्तविक कार्यकारी वह है, जब कार्यकारी शक्तियां किसी राष्ट्र के राजा या राष्ट्रपति के पास हों, और वह उनपर स्वयं भी कार्य करता हो| एक वास्तविक कार्यकारी को डी-फैक्टो कार्यकारी भी कहा जाता है|
नाममात्र कार्यकारी वह है, जब उसके नाम की कार्यकारिणी और प्रशासन की पूर्ण शक्तियां किसी राष्ट्र के राजा या राष्ट्रपति के पास निहित हों, लेकिन कार्यान्वयन की वास्तविक शक्ति मंत्रिमंडल के पास होती है|
‘कार्यपालिका’शब्द का अर्थ है- एक व्यक्ति का समूह जो नियमों और विनियमों के कार्यान्वयन पर ध्यान दे| दूसरे शब्दों में कार्यपालिका सरकार की वह शाखा है, जो विधानसभा द्वारा अपनाए गए नियमों और विनियमों के कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी है| कार्यपालिका सरकार का वह अंग है जो कार्यान्वयन और प्रशासन के लिए जिम्मेदार होता है|
संसदीय सरकार में, कैबिनेट को संसद की समिति के रूप में वर्णित किया गया है| कैबिनेट में कार्यकारी और विधायी शाखाएं दोनों आती हैं| बगेहोट (Bagehot) ने कैबिनेट का वर्णन; हाइफन (जो जोड़ता है), बक्कल (जो कार्यकारी और विधायी भागों को आपस में बांधता है) के रूप में किया है| कैबिनेट की विशेषताए इस प्रकार से हैं:
‘कैबिनेट मंत्री’ और ‘मंत्रिपरिषद’ के मध्य अंतर निम्न प्रकार से है:
पहला, ‘मंत्रिपरिषद’ एक ऐसा निकाय है, जिसे संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त है, जबकि कैबिनेट एक छोटा निकाय है और इसका गठन प्रशासनिक सुविधा के लिए किया गया है|
दूसरा, परिषद एक विशाल निकाय है| इसमें 40 से भी अधिक मंत्री हो सकते हैं, जबकि कैबिनेट एक छोटा निकाय है, उसमें आम तौर पर 15 से 20 सदस्य होते हैं|
तीसरा, कैबिनेट के सभी सदस्य मंत्रिपरिषद के सदस्य होते हैं, लेकिन मंत्रिपरिषद के सभी सदस्य कैबिनेट मंत्री नहीं हो सकते हैं|
संविधान के अनुच्छेद 61 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा संविधान के प्रावधानों के उल्लंघन पर संसद के किसी सदन द्वारा उस पर महाभियोग लगाया जा सकता है| इसके लिए आवश्यक है:
राष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और वह तब तक अपने पद पर बना रहेगा जब तक कि उसका उत्तराधिकारी पद की शपथ ग्रहण नहीं कर लेता है| वह पुनर्निर्वाचन के लिए पात्र होता है| राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति को संबोधित कर अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग कर सकता है|
राष्ट्रपति लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो| यदि संसद के किसी भी सदन का कोई भी सदस्य राष्ट्रपति पद के लिए चुना जाता है तो उसे राष्ट्रपति पद की शपथ लेने से पूर्व ही वह पद त्यागना होगा| वह किसी सरकारी लाभ के पद पर न हो|
भारत के उप-राष्ट्रपति पद की योग्यताएं निम्न प्रकार से हैं:
सरकार के प्रमुख के अंतर्गत, सामंजस्य से संसदीय कार्यकारी में विधायिका और कार्यकारी कार्य विधानसभा में सामान्यतः बहुमत प्राप्त दल के नेता को प्रधान मंत्री कहा जाता है| संसद में कार्यकारी इसके कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है, यहाँ तक कि राज्य का प्रमुख राजा या राष्ट्रपति भी हो सकता है|
अध्यक्षीय कार्यकारी में राज्य का प्रमुख राष्ट्रपति होता है| वह सरकार का भी प्रमुख होता है| सामान्यतः राष्ट्रपति का चुनाव सीधे तौर पर लोगों द्वारा किया जाता है और वह विधायिका के लिए जवाबदेह भी नहीं होता है|
कैबिनेट के कार्य इस प्रकार से हैं:
मंत्रिपरिषद का गठन प्रधान मंत्री करता है, जो औपचारिक रूप से राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाते हैं| वह मंत्रियों के पदों का आवंटन करता है और वह किसी भी मंत्री को इस प्रक्रिया से हटा भी सकता है| मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता प्रधान मंत्री करता है| वह सरकार की नीतियों का निर्धारण करता है| वह भिन्न मंत्रियों के कार्यों का समायोजन करता है और अंतर-विभागीय विवादों को सुलझाता है| योजना आयोग का अध्यक्ष भी प्रधान मंत्री ही होता है, वह नियोजन की प्रक्रिया में एक प्रमुख निकाय की भांति कार्य करता है|
प्रधान मंत्री राष्ट्रपति को सभी महत्वपूर्ण मसलों पर सलाह देता है; जैसे नियंत्रक व महालेखा परीक्षक, मुख्य चुनाव आयुक्त, उच्च और उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति| वह राष्ट्रपति को संसद को बुलाने और उसकी मंजूरी पर, लोकसभा को भंग करने और आपातकाल की घोषणा करने पर भी सलाह देता है|
राष्ट्रपति 5 वर्ष के लिए चुना जाता है। राष्ट्रपति पद के लिए सीधे जनता के द्वारा निर्वाचन नहीं होता। राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। इसका अर्थ यह है कि राष्ट्रपति का निर्वाचन आम नागरिक नहीं बल्कि निर्वाचित विधायक और सांसद करते हैं। यह निर्वाचन समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और एकल संक्रमणीय मत के सिद्धांत के अनुसार होता है। संविधान के अनुच्छेद 55 के अनुसार, जहाँ तक संभव हो राष्ट्रपति के चुनाव में भिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व का मानक समान होना चाहिए| राज्यों के मध्य इस तरह की एकरूपता के लिए, इसे प्रत्येक राज्य के लिए निर्धारित किया गया है:
कावेरी नदी के जल से कर्नाटक और तमिलनाडु के मध्य गंभीर जल विवाद उत्पन्न हो गया| विवाद की जड़ कावेरी नदी के जल के बंटवारे पर प्रश्न चिह्न लगाती है|
भारतीय संविधान इंग्लिश संविधान से अधिक कठोर परंतु अमेरिकी संविधान से अधिक लोचदार है।
लोकतंत्र को पुराने सामंतीवादी व्यवस्था से इसलिए बेहतर माना जाता है क्योंकि यह लोगों की इच्छा को अच्छी तरह अभिव्यक्त करता है।
प्रसिद्ध केशवानंद भारती मामले (1973) में, सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि, संविधान मौलिक अधिकारों समेत किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, लेकिन ज्ञातव्य हो कि इससे संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन नहीं हो; इस प्रकार, बुनियादी संरचना का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ था।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे।
सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति वेंकटचलैया संविधान की समीक्षा करने के लिए गठित आयोग के अध्यक्ष थे।
भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया गया था।
लोकसभा में 85वाँ संशोधन विधेयक 23 दिसंबर1999, को पेश किया गया था।
भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था।
A.
यूनेस्को है।
B.
यूनिसेफ है।
C.
यूएनसीटीएडी है।
D.
डब्ल्यूएमओ है।
मौसम प्रेक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा अधिकृत एजेंसी मौसम विज्ञान संस्थान (डब्ल्यूएमओ) है।
A.
चेन्नई में है।
B.
कोलकाता में है।
C.
नई दिल्ली में है।
D.
मुम्बई में है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का वर्तमान में मुख्यालय मौसम भवन, लोधी रोड, नई दिल्ली में स्थित है।
A.
1801 में की गई थी।
B.
1850 में की गई थी।
C.
1865 में की गई थी।
D.
1875 में की गई थी।
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) की स्थापना 1875 में कलकत्ता में की गई थी।
A.
0° होता है।
B.
32° होता है।
C.
273° होता है।
D.
100° होता है।
फारेनहाइट पैमाने के 32° और 212° पर तथा सेल्सियम पैमाने के 0° और 100° पर क्रमशः जल जमता एवं उबलता है।
A.
उच्च तथा न्यून तापमापी
B.
स्टीवेंसन स्क्रीन
C.
निर्द्रव वायुदाबमापी
D.
वायुदाब लेखी
तापमापी और अन्य सभी मौसम विज्ञान उपकरण जिन्हें सुरक्षात्मक बॉक्स के अंदर रखा जाता है, को स्टीवेंसन स्क्रीन के रूप में जाना जाता है।
A.
जलवायु कहलाती है।
B.
मौसम कहलाता है।
C.
प्राकृतिक भूगोल कहलाती है।
D.
वनस्पति कहलाती है।
मौसम किसी स्थान की अल्पकालिक वायुमंडलीय स्थित है। वायुमंडलीय दाब, तापमान आर्द्रता, वर्षण, मेघमयता तथा पवन की दृष्टि से वायुमंडल की दशा जैसे कारकों पर मौसम निर्भर होता है।
A.
कम होगा।
B.
अधिक होगा।
C.
समान होगा।
D.
या तो अधिक होगा या कम होगा।